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                                          सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                                   लेखनी- दिसंबर-2010





                                            


                                 

                    "  डूबते सूरज की आंखों में था उगते सूरज  का सपना    

                          अंधियारा तोडेगा अब  आकर  मेरा  वह  अपना।  "  


                                                         -  शैल अग्रवाल

                                             अंत या एक और शुरुआत !!    

                                                     ( मृत्यु विशेषांक)   

                                                         अंक 46-वर्ष-4            



इस अंक में - कविता धरोहरः हरिवंश राय बच्चन ।  माह की कवियत्रीः दीप्ति गुप्ता। माह विशेषः शैल अग्रवाल, विनोद शुक्ल, बालकवि बैरागी। कविता आज और अभीः कुसुम सिन्हा, प्रवीण पंडित   । बाल कविताः महादेवी वर्मा।


मंथनः रजनीश शुक्ला  । परिचर्चाः शैल अग्रवाल। आत्म कथ्यः सुधा अरोड़ा।  कहानी समकालीनः सुधा अरोड़ा। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। कहानी धरोहरःआचार्य चतुरसेन शास्त्री। सत्यकथाः देवी नागरानी।  लघुकथाः आलोक सातपुते, निर्मला सिंह। संस्मरणः रूपसिंह चन्देल। हास्य व्यंग्यः हरिशंकर परसाई। सरोकारः राघवेन्द्र सिंह । हितोपदेशः  सीताराम गुप्ता। चौपालः वेदप्रताप वैदिक।  बालकहानीः फारसी लोककथा। मासिक खबरों से भरपूर रंगारंग  विविधा। 

                                        संपादन, संरचना व प्रकाशनः शैल अग्रवाल

                                संपर्क सूत्रः  editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

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                                                                                                                                                    अपनी बात

बाहर नज़र जाती है तो यहां इंगलैंड में इस वक्त घर मकान पेड़-पौधे जमीन, सबको एक ठंडी और नीरव बर्फ की चादर के नीचे सोता पाती हूँ। दृश्य मनोरम है परन्तु सूना और मौत के से सन्नाटे से घिरा हुआ...स्पंदन हीन। तो क्या प्रकृति में भी यह मौत की प्रक्रिया वैसे ही होती है जैसी हमारे बीच। शायद, हां..। जड़ हो या चेतन, यह नाश और सृजन की प्रक्रिया तो सदा ही रही  है और रहेगी भी। पुराना हटता है तभी नया उग पाता है। अभी फूल पत्ते पक्षी और सुरभि  व कलरव से हीन है धरती पर अगले चन्द महीनों में ही चमन पुनः वैसे ही गुलज़ार हो जाएगा। यह बूढ़े जर्जर पेड़ फिर नया जन्म लेकर लहके और महकेंगे। एक बार फिर जीवन दर्शन के गूढ़ रहस्यों ने मन को उलझा लिया है। बनारस में पलते-बढ़ते,  एक कौतूहल ...एक जिज्ञासा बचपन से ही मन में आ जुड़ी थी मृत्यु को लेकर जो आज भी वैसे ही कायम है, अपने उसी चुम्बकीय आकर्षण , सहज भय और गूढ़ दर्शन में रची-रमी।


यदि  दार्शनिक और विचारकों की मानें तो  पृथ्वी ही नहीं समस्त बृह्मांड में कोई भी अंत, अंत नहीं  और ना ही कोई आरंभ आरंभ, क्योंकि सबकुछ वैसे ही वापस जनमता और पनपता रहता है नए रूप और नए गुण के साथ। कुछ भी  नष्ट या समाप्त नहीं होता यहां । ...एक दर्शन और सिद्धांत जो मानव जीवन व मृत्यु के संदर्भ में भी शायद सच हो । आखिर,  हम भी तो उसी प्रकृति का ही हिस्सा हैं। फिर वैज्ञानिक भी तो यही मानते हैं। उनका कहना है कि सृष्टि में एक निश्चित मात्रा में ही उर्जा और पदार्थ मौजूद हैं, जो कभी नष्ट या समाप्त नही होते,   बस  आकार और रूप बदल कर चक्कर लगाते रहते हैं।  ...इशारा शायद उसी  '  क्षिति जल पावक गगन समीरा' की ओर ही है जिनके पंचतत्वों  द्वारा निर्मित  यह 'अधम शरीरा ' है। जड़ और जीव , दोंनों इससे  ही  उत्पन्न भी होते हैं और इसी में तिरोहित भी । नियंता को अब फिर चाहें हम ईश्वर कहें या चेतना की सामूहिक उर्जा, या मात्र एक रासायनिक प्रक्रिया, यह हमारी अपनी ग्राह्यता और समझ पर है,,,समाज और परिवेश, धर्म व संस्कारों के पूर्वाग्रहों पर है। .


.मृत्यु का सीधा संबंध अंत और विछोह से है और दोनों ही पीड़ादायक और अवसादपूर्ण स्थितियां है। संघटन और विघटन का राग वैराग...जीवन मृत्यु का यह निरंतर का अभिसार कहां , और किसके इशारे पर कब,  कैसे  शुरु हुआ था,  कहना मुश्किल है, पर चक्र आज भी  तो वैसे ही  निरंतर और ध्रुव  है। ...खुद जीवन की सारी उर्जा, शोध सभी  आज भी अमरत्व की तलाश, यानी मृत्यु पर विजय कैसे पाई जाए, आत्म संरक्षण कैसे हो , इसी पर केंद्रित है। फिर भी युगों युगों बाद, हजारों आधे अधूरे सच और सैकड़ों अटकलों के बाद  मृत्यु एक रहस्य ही है। और इस पर विजय पाना अमरत्व को तलाशना तो बहुत दूर की बात है, इस गुत्थी को सुलझा तक नहीं पाए हम । आजभी आम हो या खास हर व्यक्ति अपनी-अपनी तरह से मृत्यु से परे स्वर्ग, नरक और अंतिम निर्णयाक दिन आदि , जाने क्या-क्या सोचकर ही  अस्तित्व को अक्षिण्णु बनाए रखने की तलाश में है।


जीवन तत्व और प्राण का रासायनिक मिश्रण और विष्फोट है या फिर पूर्व कर्मों के आधार पर एक सुनोयोजित मौका...या फिर दृष्टि के आगे फैला  बस एक मायावी  भ्रम...एक स्वप्न जिसका अंत 'जगने' के बाद ही होगा । और जगना भी ऐसा वैसा नहीं , ऐसा जगना जिसमें  चेतना, ईंद्रियां, किसी का कोई अतापता नहीं।  ...संगी साथी तो छोड़ो शायद आभास और एहसास तक नहीं रह जाते क्योंकि जीव हो या वनस्पति, सब  बृह्म या उस सामूहिक चेतना में वापस समाहित हो जाते हैं। इसी को चाहें तो अमरत्व या मुक्ति भी कह सकते हैं हम। न कोई साक्ष्य रह जाता है और ना ही कोई साक्षी...और यदि है भी तो बड़े-बड़े ज्ञानी-विज्ञानी आज भी इसी को तो ढूंढ रहे हैं।...


औघड़ भोले बाबा की तीन लोक से न्यारी ... शिवमय  नगरी काशी वाकई में अनूठी और भिन्न है। इसके अधिनायक शिव महलों में नहीं शमशान में रहते हैं और उनके गले में हीरे पन्नों की नहीं, मुंडमाला है।  उन्होंने संसार के साथ साथ जीवन के अन्तिम  सच को भी अपनाया है।  काशी वह नगरी है जहां जीवन तो जीवन, मृत्यु का भी महोत्सव चौबीसों घंटे चलता रहता  है। ठीक भी तो है , जबतक मृत्यु को न जाना जाए , अमरत्व कैसे समझ में आएगा। मृत्यु से क्या डरना? यहां पल-बढ़कर भी मौत सोच में न आए , जीवन के प्रति एक स्वस्थ वैराग न ढले संस्कारों में , विचारों में, असंभव-सी ही बात है। मणिकर्णिका, हरिश्चन्द्र या अस्सी घाट पर दिन रात की वे जलती चिताएं और आसपास के गांवों से बसों की छतों पर चढ़े, रिक्शों के पीछे बंधे चले आते मुर्दे आज भी शहर के दैनिक यथार्थ में ऐसे रचे- बिंधे हैं कि अधिकांशतः काशी वासियों के लिए यह आवागमन सामान्य तो है, पर अर्थहीन या विलुप्त नहीं।


यहां मृत्यु  वीभत्स या डरावनी नहीं,  मृत्यु को लेकर एक सहजता है यहां पर। जीवन मरण के इस क्रम को समझने की प्रक्रिया बचपन से ही जो शुरु  हो जाती है यहां , भले ही अवचेचन मन में ही क्यों न रहे यह सब। माटी का तन माटी में ही जाना है ,उसी  पंचतत्व में विलीन हो जाएगा एक दिन बच्चा-बच्चा जानता है यहां पर।

बचपन में , विशेषतः बरसात के दिनों में यदि  किसी मुर्दे के आसपास से पैदल निकलना हो तो कैसे आंख बन्द करके तेजी से निकलती थी, या फिर कचौड़ी गली के सकरे रास्तों में जहां दो आदमियों का साथ साथ निकलना तक आरामदेह नहीं, सामने से आता कोई अंतिम यात्रा पर दिख जाता तो कैसे आसपास के किसी भी चबूतरे या दरवाजे की ड्योढ़ी पर डरती कांपती चढ़ जाती थी रास्ता देने के लिए आज भी तो नहीं भूल पाई हूं। ... और अगर कहीं गलती से शरीर का कोई कोना शव की काठी से छू जाता तो अशुभ की आशेका से कैसे धौंकनी जैसी छाती लिए जड़ और चैतन्य एक साथ तुरंत ही  हो जाती थी, आज भी तो नहीं भुला पाई हूँ।


नौका बिहार करते हुए वो चलती चिताओं पर से पहले तो आंख न हटाना फिर रात भर उनके सपने देखना ... आज की हर रोमांचक और डरावनी फिल्मों से ज्यादा उलझाने वाला था। माना मृत्यु के बारे में हल्के उपमान देना ठीक नहीं, पर बहुत गंभीरता से लेना भी तो ठीक नहीं। क्योंकि मृत्यु नहीं जिन्दगी ही  सार है जिन्दगी का।   

जीवन मृत्यु को प्रत्यक्ष रूप में साथ साथ समेटे, यह नगरी बहुत कुछ ऐसा सिखलाती और देती है हमें , जो शायद दूसरे शहरों में उतनी सहजता से देखने और समझने को न मिले। कुछ हद तक शमशान में रहते औघड़ों की तरह एक बड़ा शमशान है काशी, जहां दबा ढका कुछ भी नहीं। हां सब जानते समझते हुए भी इस अंतिम सच को नकारना, इस शाश्वत निरंतरता को भूलने की कोशिश करना मानव स्वभाव की शायद एक बड़ी  कमजोरी है। सोचने पर मज़बूर हूं कि यह भय अवश्य ही अनजाने भविष्य का ही होगा, परिचित से बिछुड़ने का ही होगा...मोह जितना अधिक होगा , विछोह उतना ही कष्टप्रद।  मोह शायद संसार का सबसे बड़ा भय है...सबसे बड़ा विकार है। तभी तो शायद हमारे धर्मग्रन्थों में कमल की तरह जीने की शिक्षा दी गई है। जीवन जल में...इस संसार में रहकर भी उससे पूर्णतः निर्लिप्त। ...पर शायद कम ही होंगे जो इस नए कपड़े बदलने की अवश्यंभावी प्रक्रिया के प्रति पूर्णतः सहज रह पाते हों...निर्लिप्त कमल से जी पाएँ... सोचें तो इसी पर विजय पाने के लिए ही तो वाणप्रस्थ और सन्यास आश्रम की परिकल्पना है हमारे धर्मग्रन्थों में।

लेखनी के इस अंक में हमने मृत्यु और उससे जुड़े ऐसे कई एहसास व आभासों को टटोलने की कोशिश की है। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि जिज्ञासा पूरी तरह से भले ही शांत न हो, कम-से-कम सोचने पर तो मजबूर करेगा ही आपको यह अंक....


आप क्या सोचते और जानते हैं विषय पर, आपके विचारों को जानना रुचिकर होगा।

                                                                                                                                                 - शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                                 कविता धरोहर
                                                                                                                                           हरिवंश राय बच्चन


   पतझड़ की शाम









है यह पतझड़ की शाम, सखे !

नीलम-से पल्लव टूट ग‌ए,
मरकत-से साथी छूट ग‌ए,
अटके फिर भी दो पीत पात
जीवन-डाली को थाम, सखे !
है यह पतझड़ की शाम, सखे !

लुक-छिप करके गानेवाली,
मानव से शरमानेवाली
कू-कू कर कोयल माँग रही
नूतन घूँघट अविराम, सखे !
है यह पतझड़ की शाम, सखे !

नंगी डालों पर नीड़ सघन,
नीड़ों में है कुछ-कुछ कंपन,
मत देख, नज़र लग जा‌एगी;
यह चिड़ियों के सुखधाम, सखे !
है यह पतझड़ की शाम, सखे !








प्रबल झंझावत है साथी






 




देह पर अधिकार हारे
विवशता से पर पसारे
करुण रव रत पंछियों की, आ रही है पांत साथी
प्रबल झंझावत साथी

शब्द हर शब्द मर मर
तरु गिरे भू से उखड़ कर
उड़ गये छत और छप्पर, मच गया उत्पात साथी
प्रबल झंझावत साथी  
                           
हंस रहा संसार खग  पर                                                                                                                                                    कह रहा जो आह भर
लुट गए मेरे सलोने, नीड़ के तृण पात साथी
प्रबल झंझावत है साथी।      














तुम तूफान समझ पाओगे ?










तुम तूफान समझ पाओगे ?

गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता 'हरहर'--इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ,
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,
जाता है अज्ञात दिशा को ! हटो विहंगम, उड़ जाओगे !
तुम तूफान समझ पाओगे ?








 

देखो टूट रहा है तारा !





 





नभ के सीमाहीन पटल पर
एक चमकती रेखा चलकर
लुप्त शून्य में होती- बुझता एक निशा का दीप दुलारा !
देखो टूट रहा है तारा ! 

हुआ न उड्डगण में क्रंदन भी,
गिरे न आंसू के दो कण भी,
किसके उर में आह उठेगी होता जब लघु अंत हमारा !                                                                                                                                                                                            देखो, टूट रहा है तारा !

यह परवशता या निर्ममता
निर्बलता या बल की क्षमता
मिटता एक, देखता रहता दूऱ खड़ा तारक दल सारा !
देखो, टूट रहा है तारा ।

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                                                                                                                                         माह की कवियत्री
                                                                                                                                            -दीप्ति गुप्ता


‘मृत्यु से पहला परिचय’ 

 






पहला परिचय तुमसे, बचपन  में  हुआ था तब
मैं थी अबोध - अन्जान, बेबस भोली  सी जब
पार्थिव  शरीर  में  दादी  के  
तुम उतरी 'भगवान' बन  के
निश्चेष्ट दादी  को  पड़ा  देख
पूछा    मैंने   रोक   संवेग -
'दादी  बोलती  क्यों  नहीं ?
आँख  खोलती क्यों  नहीं ? '

माँ बोली - आँचल में मुँह कर
ले गए 'भगवान' दादी को अब घर,
वहीं  रहेगी  दादी  हर पल !
मैं उदास, खामोश, लगी रोने फिर झर-झर,
रोते - रोते  लुढ़क  गयी   दादी   पर
सुबक - सुबक कर कहती थी  डर  कर
'दादी,   कहना   मानूँगी
मिट्टी  में  नहीं  खेलूँगी
टॉफी  तुमको  दे   दूँगी..'

तभी  उठाया मुझे किसी ने
तुरत लगाया गले किसी ने
कहा प्यार से थपक - थपक
वहीं  रहेगी  दादी  अब  बस
विदा करेगें हम तुम मिल सब

‘भगवान’
इस नाम से ‘तुमको’ जाना था तब




  

  




'मृत्यु से मेरा दूसरा परिचय'






  

 





मेरे आँगन में चिड़िया का बच्चा निष्प्राण पड़ा था,
और मेरा चुनमुन नन्हा  मन  खेल  में  पड़ा था,

आँगन  में  उछलती  कूदती,
मैं एकाएक गम्भीर हो  गयी,
'दादी' मुझको याद आ गयी,
जोर से चीखी,और बौंरा गयी,
माँ  और नानी दौड़ के आयीं
पूछा - क्यों चीखी चिल्लायी ?

नन्ही  अँगुली   उठी  उधर
पड़ा था 'वो' निश्चेष्ट  जिधर
काँपे था  तन  मेरा थर-थर
हौले से मैं बोली,
यह  बोलता  नहीं....
आँख खोलता नहीं.....
इसे भी भगवान जी... कहते-कहते
माँ से लिपट गई मैं कस कर,

उस नन्हे बच्चे को,
निर्ममता से तुम ग्रस कर
मुझे  बना  गई  थी पत्थर ! 

  

  

  

 

'मृत्यु से मेरा तीसरा परिचय'






  

    



   पहाड़ी   लड़कियों  की  टोली 
  जिसमें थी मेरी, एक हमजोली 
  नाम  था - उसका ‘रीमा रंगोली‘ 
  सुहाना  सा मौसम, हवा थी मचली 
  तभी वो अल्हड़ 'पिरुल' पे फिसली 
  पहाड़ी   से   लुढ़की, 
  चीखों   से   घिरती 
  मिट्टी  से   लिपटी 
  खिलौना  सी  चटकी ! 
  चीत्कार थी उसकी पहाड़ों से टकरायी 
  सहेलियां सभी थी  बुरी तरह घबराई  

           पर -

  मैं  न  रोई, न चीखी, न  चिल्लाई 
  बुत बन  गई, और आँखे थी पथराई, 
  मौत के इस खेल से, मैं  थी डर गई, 
  दादी  का जाना, चिड़िया का  मरना 
  उसमें थी, एक  नयी  कड़ी  जुड़ गई, 
  पहले  से मानों  मैं  अधिक मर गई, 
  लगा जैसे मौत तुम मुझमें  घर कर गईं, 
  दिलो   दिमाग  को  सुन्न कर गईं 
  मुझे  एकबार  फिर जड़  कर गईं !




  

  

                   


                 सहेली 

     






 'जीवन  मिला   है    जब   से,  
  तुम्हारे  साथ  जी  रही  हूँ तब  से, 
  तुम    मेरी   और   मैं   तुम्हारी      
  सहेली      कई      बरस     से,  
  तुम    मुझे   'जीवन' की   ऒर 
  धकेलती    रही   हो    कब   से, 
  "अभी  तुम्हारा  समय  नहीं  आया" 
  मेरे कान  में कहती  रही हो हँस के, 

                      
जब  - जब   मैं   पूछती   तुमसे,   
  असमय    टपक    पड़ने    वाली 
  तुम इतनी समय की  पाबंद कब से ? 
  तब   खोलती  भेद, कहती   मुझसे, 
  ना,  ना, ना, ना    असमय   नहीं, 
  आती   हूँ  समय    पे  शुरू  से, 
 'जीवन'  के   खाते   में   अंकित 
  चलती   हूँ,  तिथि -  दिवस   पे     
 'नियत घड़ी'  पे  पहुँच  निकट  मैं 
  गोद   में  भर  लेती  हूँ  झट  से !

 'जीवन  मिला   है    जब   से,  
  तुम्हारे  साथ  जी  रही  हूँ तब  से !











        सूक्ष्मा 

 






तू इतनी सूक्ष्म , तू इतनी सूक्ष्म  कि 
तुझे देखा नहीं जा सकता 
छुआ नहीं जा सकता

 

बस तुझे महसूस किया जा सकता है, 
जब तेरा अस्तित्व तन मन में समा जाता है, 
हर साँस बोझिल, दिल बुझा-बुझा हो जाता है, 
तू "सूक्ष्म" पर तेरा बोझ  कितना असहनीय  ! 

  

  

  

 

'बोलो कहाँ नहीं हो तुम








' बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
जगाया सोई मौत को कह कर मैने -
बोलो कहाँ नहीं हो तुम !

बोलो कहाँ नहीं हो तुम

 
अचकचा   कर उठ  बैठी सचमुच ,
देखा  मुझे   अचरज  से  कुछ,
बोली –
मैं तो  सबको अच्छी लगती  - सुप्त-लुप्त
मुझे  जगा  रही  तुम,  क्यूं  हो  तप्त ?
मैं बोली - जीवन अच्छा, बहुत अच्छा लगता है
पर,  बुरी नहीं लगती हो तुम
बुरी  नहीं   लगती   हो  तुम !
ख्यालों में बनी रहती हो तुम
जीवन  का  हिस्सा  हो तुम,
अनदेखा   कर  सकते  हम ?
ऐसी   एक    सच्चाई   तुम
जीवन  के संग हर पल,  हर क्षण,
हर   ज़र्रे  ज़र्रे     में   तुम,
बोलो  कहाँ  नहीं   हो  तुम ?

बोलो  कहाँ  नहीं   हो तुम ? 

 जल में हो तुम,  थल में हो तुम,
व्योम में पसरी, आग में हो तुम,
सनसन  तेज़  हवा  में हो तुम,
सूनामी   लहरों    में  तुम,
दहलाते  भूकम्प  में  तुम,
बन प्रलय उतरती धरती पे जब,
तहस नहस  कर  देती सब तुम,
अट्ठाहस करती जीवन पर,
भय  से  भर   देती   हो  तुम !

उदयाचल से सूरज को, अस्ताचल  ले जाती तुम,
खिले फूल की पाँखों में, मुरझाहट बन जाती तुम,
जीवन में कब - कैसे, चुपके से, छुप जाती तुम
जब-तब झाँक इधर-उधर से, अपनी झलक दिखाती तुम,
कभी जश्न में चूर नशे से, श्मशान बन जाती तुम,
दबे पाँव जीवन के साथ, सटके चलती जाती तुम,
कभी पालने  पे  निर्दय हो, उतर चली आती हो तुम
तो  मिनटों में यौवन को  कभी, लील जाती  हो तुम,
बाट  जोहते  बूढ़ों  को, कितना  तरसाती  हो  तुम,
बोलो  कहाँ  नहीं  हो  तुम ?

बोलो  कहाँ  नहीं  हो  तुम ? 

         

  

  

             चिरायु 







मृत्यु  तुम शतायु हो, चिरायु  हो !
तभी तो इन शब्दों  के समरूप हो, समध्वनि हो,
शतायु, चिरायु, मृत्यु
तुम अमर हो, अजर हो,
तुम अन्त हो, अनन्त हो,
तुम्हारे आगे कुछ नहीं,
सब कुछ तुम में समा जाता है,
सारी दुनिया, सारी सृष्टि
तुम पर आकर ठहर जाती है,
तुम में विलीन हो जाती है,
तुम अथाह सागर हो,

तुम निस्सीम आकाश हो,
इस स्थूल जगत को अपने में समेटे हो,
फिर भी कितनी सूक्ष्म हो
संसार  समूचा तुमसे आता, तुम में जाता,
महिमा तुम्हारी  हर कोई गाता,
रहस्यमयी  सुन्दर  माया हो
आगामी  जीवन की छाया हो !! 


  

  

            'मौत   में  जीवन'








मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 
सूखी  झड़ती  पत्तियों  के  बीच फूल  को मुस्कुराते देखा है, 
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 

दो  बूँद   सोख   कर   नन्हे   पौधे   को   लहलहाते   देखा  है 
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 
'पके'  फलों  के  गर्भ  में, जीवन संजोये बीजों को छुपे देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 



 मधुमास की आहट से, सूनी शाखों में कोंपलों को फूटते देखा है
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 
राख  के  ढेर   में  दबी  चिन्गारी  को चटकते, धधकते  देखा है।
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 

 सूनी पथराई आँखों में  प्यार  के  परस  से सैलाब उमड़ते  देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 
बच्चों  की किलकारी से, मुरझाई झुर्राई दादी को मुस्काते देखा है, 
 मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है ! 

  

 


जीवन स्रोत






  

 





जीवन के दो छोर
एक छोर पे जन्म
दूसरे पे मृत्यु
जन्म से आकार पा कर ‘जीवन’
एक दिन मृत्यु में विलय हो जाता है
ऐसा तुम्हे लगता है,
पर मुझे तो कुछ और नज़र आता है,
"मृत्यु जन्म की नींव है "
जहाँ से जीवन फिर से पनपता है,
मृत्यु वही अन्तिम पड़ाव है,
जिस से गुज़र कर, जिसकी गहराईयों में पहुँचकर                                                                                                            सारे पाप मैल धो कर, स्वच्छ और उजला हो कर
जीवन पुनः आकार पाता है !
मृत्यु' उसे सँवार कर, जन्म की ऒर सरका देती है,
और यह 'संसरण' अनवरत चलता रहता है !
फिर तुम क्यों मृत्यु से डरते हो, खौफ खाते हो ?

अन्तिम पड़ाव, अन्तिम छोर है वह,
जन्म पाना है तो सृजन बिन्दु की ऒर प्रयाण करना होगा,
इस अन्तिम पड़ाव से गुज़रना होगा,
उस पड़ाव पे पहुँचकर, तुम्हे जीवन का मार्ग दिखेगा,
तो नमन करो - जीवन के इस अन्तिम, चरम बिन्दु को
जो जीवन स्रोत है, सर्जक है ! 

  

  

  

            अन्तिमा








हे अन्तिमा  जब दिल में समा जाती है तू
तो अजब सी शान्ति, ठन्डक  का एहसास बन जाती है तू,
जीवन्तता से आपूरित मन,
अद्भुत शक्ति, ठसक से भरा होता है तन,
तन मन को आलिंगन करने के तेरे ढंग निराले,
कभी तू हँसते हँसते आ जाती है,
कभी तू खेलते खेलते आदमी से लिपट जाती है,
कभी तू खाने वाले के ग्रास में छुप कर बैठ जाती है,
कभी तू सोए  हुए को चिरनिद्रा  में ले जाती है,
तू बड़ी नटखट है .....
नहीं आती तो देह से लाचार, धुंधली नज़र से टटोलती,
खटिया पर गुड़ी मुड़ी पड़ी दादी के
बलाने, मिन्नते करने  पर भी नहीं आती,
कभी तू  किसी की इच्छा के बिना, उसके जीवन में
इस तरह बैठ जाती है कि जीवन एक चलती फिरती लाश लगता है,
कभी तू मरने वाले के लिए उत्सव  बन जाती है,
न जाने कितनी लालसाएँ  लिए वह तेरी बाँहों में समा जाता है,
दूसरा जन्म पाने की आशा  में खुशी खुशी मर जाता है,
कभी तू अमृत को विष  और  विष को अमृत  बना देती है
कभी तू कंस का काल बन जाती है,
कभी तू रावण  के तीर भोंक देती है,
तू सर्वशक्तिमान, सर्वद्रष्टा, सर्वव्यापी है
इसलिए तू सन्मति, सद्गति  और अन्तिम  परिणति है ! 

  

  

  

  

 

    जब   भी  आऒ,  अपनो   की   तरह  आऒ







 

तुम जब   भी  आऒ,  अपनो   की   तरह  आऒ 
मैं  नहीं चाहती  कि तुम ‘अतिथि’ की  तरह आऒ, 
पहले   से – ‘तारीख – समय’  बता   कर  आओ, 
बिल्कुल    मेरी    अपनी   बन    कर    आऒ, 
  पर, जब   भी  आऒ  अपनो   की   तरह  आऒ 
तुम जब   भी  आऒ  अपनो   की   तरह  आऒ 

                    
ले  कर  विदा   सबसे, गले  तुम्हारे  लग  जाऊँगी 
लेकर  होठों  पे  मुस्कान,  जाने  को  तैयार  रहूँगी 
मुड़कर  पीछे  न देखूँगी, रुदन  न  हाहाकार  करूँगी 
पर, जब   भी   आऒ  अपनो   की   तरह  आऒ 
तुम जब   भी   आऒ  अपनो   की   तरह  आऒ 

  


बच्चों को, अपने  घर को, पन्नों पे  कविता छन्दों को 
आँगन के कोने -कोने को, गमले  में खिलते फूलों को 
जाने  से  पहले देखूँगी,  एक बार जी भर कर सबको 
पर, जब   भी   आऒ  अपनो   की   तरह  आऒ 
 तुम जब   भी   आऒ  अपनो   की   तरह  आऒ 

  

  

  

  

  



  '  परम  समाधि'








युगों - युगों  से  सन्तो ने
आत्मिक  मन्थन  कर  के
अनन्त  अमरता  साधी
पर मैनें, तुमने, हमने,
झेली तन  की  हर व्याधि,
ढेली  मन  की  हर आधि !
जीवन - यात्रा करते - करते,
और  इसमें  ही जीते  मरते
काटी   ज़िन्दगी   आधी !
लीन  हो   गए  मन  से,
मुक्त  हो   गए  तन  से,
मृत्यु  बनी  परम  समाधि
मृत्यु  बनी  परम  समाधि ! 




  

  

  "मुक्ति का द्वार"








अब  मैं  समझ  गई,  हे मौत !
तुम कहीं भी, कभी भी आ सकती हो,
तुम्हारा आना निश्चित है, अटल है,
जीवन  में  तुम  ऐसे  समाई हो,
जैसे आग में तपन, काँटे में चुभन !
सोच-सोच हर पल तुम्हारे बारे में,
मैं  निकट हो  गई  इतनी,
सखी  होती घनिष्ठ जितनी,
तुम  बनकर  जीवन दृष्टि,     
लगी  करने  विचार- सृष्टि 
भावों  की  अविरल  वृष्टि !

मैं जीवन में 'तुमको', तुम में लगी देखने 'जीवन'
इस   परिचय  से  हुआ  अभिनव  'प्रेम मन्थन'
प्रेम  ढला  "श्रद्धा"   में
"श्रद्धा" से  देखा भरकर 
 तुम लगी मुझे  तब  "सिद्धा" ! 
 तुम्हारे  लिए  मेरा  ये "प्यार"
बना  जीवन   "मुक्ति का द्वार" !

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                                                                                                                                              माह विशेष



अच्छा ही तो है...










चाहे जितना
सींचो सँवारो
या फिर कीमती
गुलदानों में
सजालो-------
जानती हूँ
क्षण-भँगुर
जीवन यह 
इन्ही फूलों सा
खिलेगा 
और झर जाएगा
और आज जो
झरता है
कल फिर शायद
उग भी आएगा
मत कहो मगर
फिर अब यह
शोक किस बात का--
अच्छा ही तो है
जो नाजुक इन
फूल-पत्तियों पास
दो आँखें
एक मन नहीं
देखें सुनें जो 
सब सुख-दुख
जानें पहचानें 
फिर रिश्तों में 
जुड़-बट कर
ढूँढा करें 
उम्र-भर
और आंसू सी
झर-झर   
मिट जाएँ---


-शैल अग्रवाल











कोई अधूरा पूरा नहीं  होता








कोई अधूरा पूरा नहीं होता 
और एक नया शुरू होकर 
नया अधूरा छूट जाता 
शुरू से इतने सारे 
कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते 

परंतु इस असमाप्त – 
अधूरे से भरे जीवन को 
पूरा माना जाए, अधूरा नहीं 
कि जीवन को भरपूर जिया गया 
इस भरपूर जीवन में 
मृत्यु के ठीक पहले भी मैं 
एक नई कविता शुरू कर सकता हूँ

मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह 
जीवन की अपनी पहली कविता की तरह 
किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए।


           -विनोद कुमार ळुक्ल














        मरने में








मरने में मरने वाला ही नहीं मरता
उसके साथ मरते हैं
बहुत सारे लोग
थोड़ा-थोड़ा!

जैसे रोशनी के साथ
मरता है थोड़ा अंधेरा।
जैसे बादल के साथ
मरता है थोड़ा आकाश।
जैसे जल के साथ
मरती है थोड़ी सी प्यास।
जैसे आंसुओं के साथ
मरती है थोड़ी सी आग भी।
जैसे समुद्र के साथ
मरती है थोड़ी धरती।
जैसे शून्य के साथ
मरती है थोड़ी सी हवा।

उसी तरह
जीवन के साथ

थोड़ा-बहुत मृत्यु भी
मरती है।

इसीलिये मृत्य
जिजीविषा से
बहुत डरती है।

डा.कन्हैयालाल नंदन

















     झर गये पात








झर गये पात
बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी?

 
नव कोपल के आते आते
टूट गये सब के सब नाते
रीम करे इस नव पल्लव को
पड़े नहीं पीड़ा सहनी
झर गये पात बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी?

 
कहीं रंग है, कहीं राग है
कहीं चंग है, कहीं फैग है
और धूसरित पात नाथ को
टुक टुक देखे शाख बिरहनी
झर गये पात बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी?

 
पवन पाश में पड़े पात ये
जनम-मरण में रहे साथ ये
“वृंदावन” की श्लथ बाहों में
समा गयी ऋतु की “मृगनयनी”
झर गये पात बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी?


         -बाल कवि बैरागी














रोपता हूँ बीज तुममें








रोपता हूँ बीज तुममें
कल्पतरु अब तुम उगाओ।

याद है (?)-
कल्पांत की वेला
भयावह,
हाथ मेरा थामकर तुमने कहा था;

सृष्टि का क्रम तो नहीं ऐसे थमेगा,
गर्भ में अपने
तुम्हें
धारण करूँगी मैं!
तुम मुझे ऋतुदान दो!

पर तभी आकाश फूटा,
हाथ में से हाथ छूटा,
हो गए हम दूर।

फिर तो न जाने
तुम कहाँ
औ’ मैं कहाँ!

बीज कुछ मैंने समेटे
एक मुट्ठी में,
एक हाथ में पौध धान की
कस कर थामी।
रहा तरता तब तक
जब तक
नहीं मिली वह
नाव काठ की
सींग-बँधी जो महा मत्स्य के।

तिरते-तिरते
किसी तरह से
नाव प्रलय के पार आ गई।
अंधकार ही अंधकार था।
नहीं मिलीं तुम।

रहा भटकता
कालरात्रि भर
लिए हाथ में
बीज,
धान की पौध साथ में।

शब्द बनकर गूँजती थीं तुम :

गर्भ में अपने
तुम्हें
धारण करूंगी मैं!
तुम मुझे ऋतुदान दो!

और तुमको खोजता मैं
आ गया इस लोक में।

मिल गई तुम
व्यग्र, व्याकुल,
स्वर्णगर्भा,
उर्वरा,
मृत्युंजया,
रस में नहाई
जोहती थीं राह मेरी।

उस फसल की याद आई
जल गई जो
बह गई जो
गल गई जो।

उस फसल की याद आई
भूमि को जिसने ग्रसा था
और जबड़ों बीच जिसके
वायु का गोलक फँसा था।

उस फसल की याद आई
हर नदी जिसने सुखाई,
पर्वतों की ठोस काया
रेत सी जिसने उडा़ई।

चाह की थी क्या कभी
वैसी फसल की
उस कल्प के
मनु ने अभागे?

अब उगानी है फसल
जो सृष्टि बनकर
लहलहाए
और भर दे
सब दिशाएँ
प्राणरक्षक वायुओं से।

हाँ, उगानी है फसल
संजीवनी की,
फिर प्रलय
जिससे न आए,
आज यह संकल्प लेकर
रोपता हूँ बीज तुममें।
कल्पतरु अब तुम उगाओ!

-ऋषभ देव शर्मा

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                                                                                                                                         कविता आज और अभी



      जाड़े की धूप








पलभर नहीं टिकती कहीं
भागती ही जाती है
कभी आंगन कभी मुडेर
कभी बरगद की छैयां

                  जाड़े की धुप जैसे नन्हीं गौरैया

तेल मलें दादाजी
बैठे दालान में
मचिया ले खदेड़ रही
दादीजी धुप को
बाह छुड़ा  भाग रही
धूप की परछाइयाँ

                   जाड़े की धुप जैसे नन्हीं गौरैया

कभी इधर कभी उधर
खेलती है दौड़ धुप
कूक रही कुहू कुहू
कोयल अमरैया

               जाड़े की धुप जैसे नन्हीं गौरैया

 सरसों के फूलों पर
भवरे मद्लायें 
फूलों का रस चूसे 
फूल सुंघनी चिरैया

                जाड़े की धुप जैसे नन्हीं गौरैया

बड़ी भली लागे है
रजाई की गरमाई
शीतल जल लागे जैसे
काटे ततैया

                     जाड़े की धुप जैसे नन्हीं गौरैया


         - कुसुम सिन्हा











               धूप--








 धूप दरख्तों में हंस-हंस कर, घुटने-घुटने बैठ गयी
 पत्तों से चांदी सी छनकर ,घुटने-घुटने बैठ गयी
 
 धता बता कर कोहरे को , जब सूरज ने खोली आँखें
 आगत के स्वागत में नम कर, घुटने-घुटने बैठ गयी
 
 खेतों की लज्जा को ज्योंही ,सरसों ने हंस कर ढांपा
 चादर सी हर ओर पसर कर, घुटने-घुटने बैठ गयी
 
 शिशु -उजाले ने प्राची का पहला -पहला दूध पिया
 माँ के आँचल सी हंस-हंस कर, घुटने-घुटने बैठ गयी
 
 माघ-पूस की रात तापते, देखा बडी उमरिया को
 अलस्सवेरे चुप्प ठिठुरकर , घुटने-घुटने बैठ गयी
 
 
 मुट्ठी दाना , अंजुरी पानी,गाना चंद पाखिओं का
 नरम-गरम सी धूप मचल कर, घुटने-घुटने बैठ गयी 
                         --प्रवीण पंडित

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                                                                                                                                                                 मंथन





                                                                                                                                                  -                                                     

                                                                                                                                   डॉ.रजनीश कुमार शुक्ल



मृत्यु नहीं है अन्त

विश्व की सभी संस्कृतियों में मृत्यु अत्यन्त गहन विचारणा का केन्द्र है। इस संसार में गति का बने रहना ही जीवन है। गति का रुक जाना, संसरण का समाप्त हो जाना मृत्यु है। मृत्यु को सर्वत्र भय के रुप में देखा गया है, अन्त समझा गया है। इसलिये सभी उपासना पन्थ और सभी सांस्कृतिक जीवन यत्न मृत्यु को टालने का यत्न हैं। आधुनिक विज्ञान की समस्त प्रगति भी इसी मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की मानवी जिजीविषा का परिणाम हैं। किन्तु इस समग्र संसार में कोई एक घटना अनिवार्य और प्रत्येक के द्वारा दुर्निवार है तो वह है मृत्यु। सभी जानते हैं कि जातस्य ध्रुवो म्रुत्युः। पर इस संबन्ध में मजेदार बात यह है कि इस् सुनिश्चित तथा शाश्वत घटना पर विश्व के समस्त शास्त्रों मे अत्यन्त स्वल्प वर्णन प्राप्त होता है कि मृत्यु क्या है?

मृत्यु का विचार इतना इतना भय भरने वाला है कि व्यक्ति इसका चिन्तन भी नहीं करना चाहता । बस जिस किसी तरह इसको टालना चाहता है, इससे बचना चाहता है। पर यह मृत्यु है कि मनुष्य जाति के सभी प्रयासों को निष्फल करती हुई शाश्वत और अटल है। जो शाश्वत है वह मरता नहीं, उसक अन्त नहीं होता है जो घटित होता है वह काल और देश की सीमा में घटित होता है। यह घटित घटना काल और देश की सीमा में ही अन्त को भी प्राप्त करता है। इस दृष्टि को सामने रख कर के विचार करने पर तो मृत्यु ही शाश्वत है। जब मृत्यु शाश्वत और दुर्निवार है तो इससे भय कैसा जब यह घटना नहीं है तो इसको रोका भी कैसे जा सकता है। संभवतया यही कारण है कि तत्वद्रष्टा और धर्मवेत्ता इसको स्वीकार करते हुये इससे परे का विचार करते हैं।

मृत्यु पर सोचना भी भयकारी है इस पर लिखने का साहस भी नहीं था किन्तु इस भावदशा के होते हुये भी लिखने के अनेक कारण हैं उन सब की चर्चा तो अलग निबन्ध का विषय हो जायेगा। किन्तु एक कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि मै काशी में रहता हूँ जो हिन्दु धर्म संस्थान में मृत्यु का श्रेष्ठ स्थान है, मोक्षदायक है इस हेतु वरेण्य है। प्रत्येक हिन्दू काशी में मरने को मंगलपर्व मानता है। अतः काशी में रहते हुये मृत्यु का विचार तो करना ही चाहिये।

समस्त विश्व में जो अमंगल है वह इस स्थान पर् मंगलकारी कैसे हो जाता है। श्मशान और कब्रिस्तान मनुष्य के लिये मंगल पर्व तो कभी नहीं समझे गये हैं। पर यह काशी अजूबा है यह नगर महाश्मशान कहा गया है अहर्निश् जलने वाली चिताग्नि ही इसकी पहचान है, पर इस महाश्मशान का एक नाम आनन्दवन है। इस नाम ने ही मुझे चौंकाया है जगाया है कि काशी में रहना तभी सार्थक है। मृत्यु को जाना जाय, मरना क्या है इस को समझा जाय।

इस दिशा मे जब विचार शुरु किया तो स्वाभाविक रुप से मानव अनुभव के सबसे प्राचीन  लेख वेदों की और ध्यान जाना ही चाहिये। अतएव मैने इसे वेदों में तलाशने की कोशिश की। वेद में मृत्यु को दूर रखने के अनेक यत्न दिखायी देते हैं। किन्तु मृत्यु का स्वरुप का विवेचन सम्पूर्ण वैदिक संहिताओं में कहीं दिखायी नहीं देता है। जीवनोत्तर जीवन की बात तो है, पुनर्जन्म के सूत्र भी दिखाई देते हैं पर् मृत्यु का रहस्य विवेचित नहीं है। हाँ यह प्रश्न जरुर खडा किया गया है कि यह जगत् कहाँ से आता है और कहाँ विलीन हो जाता हैं। किन्तु इस बात का निर्देश नहीं मिलता कि मृत्यु अपने आप में क्या है इसका रहस्य क्या है ?

 अब यह विचारणीय अवश्य है कि स्वरुप विवेचित न होने पर भी इस का प्रयोग एक विशिष्ट अर्थ सन्दर्भ में होता है तो यह् अर्थ सन्दर्भ क्या है और इसके पर्याय क्या क्या है? इस दृष्टि से विचार करने पर यह अर्थ बहुविध अर्थ ध्वनित करता है। कोशो मे प्राणवियोग, पञ्चता, कालधर्म दिष्टान्त,प्रलय अत्यय, अन्त, नाश, वियोग, निधन दीर्घनिद्रा, निमीलन, अवसान, विलय आदि जाने कितने शब्दार्थ पर्याय प्राप्त होते हैं। इन में अनेक ऐसे हैं जो मजेदार है प्रचलित अर्थ को नवीन सन्दर्भ भी देते हैं। साथ ही साथ अनेक रहस्यों को उजागर भी करते हैं।  इनमें सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है नाश शब्द। ना शब्द का अर्थ है नष्ट हो जाना किन्तु ध्यान रहे नाश का तात्पर्य सर्वनाश नहीं है। अपितु रुप परिवर्तन मात्र है- न आश् अर्थात् ऐसा नहीं था। एक पदार्थ जब दुसरे पदार्थ का रुप ग्रहण करता है तो उसे  प्रथम को नष्ट होना पडता है।

कारण रुप पदार्थ या वस्तु के नष्ट हुये बिना कार्य रुप पदार्थ उत्पन्न नही होता है। नैयायिक इसी को ध्वन्स कहते है, कपालध्वंस से ही घट उत्पन्न होता है। जो नष्ट हो करके उत्पन्न करता है वही कारण है। इसको सृष्टि के आरंभवादी विचार से समझा जा सकता है। कारण कार्य को नष्ट हो करके ही उत्पन्न करता है, इस नाश में वस्तु का सर्वथा अपलाप नहीं होता है। एक का अन्त दूसरे का आरंभ बन कर के प्रकट होता है। यदि सत्कार्यवादी दृष्टि से विचार किया जाय तो वस्तु तो नष्ट ही नहीं होती है। जिसे हम मृत्यु के रुप में समझतें हैं वह मात्र रुप अपरिवर्तन है। रुप बदलता है वस्तु वही रहती है। वस्तु की सत्ता में परिवर्तन बिना किसी पदार्थ का रुप और गुण में परिर्तन ही पुराने का तिरोभाव और नये का आविर्भाव है। अब यह प्रश्न जरुर है कि जब मृत्यु या परिवर्तन वास्तविक न हो कर प्रतीति मात्र है तो यह वास्तविक भय क्यों उत्पन्न करती है। मनुष्य स्वयं की सत्ता के साथ साथ उससे जुडा जो कुछ है उसको चिर् स्थायी क्यॊं बनाना चाहता है। इसका उत्तर न तो वैज्ञानिक विधि से मिलना संभव दिखता है न ही तर्क और युक्ति से दिया जाना ही संभव है।

मृत्यु का विचार करते समय स्वाभाविक रुप से चर-अचर, स्थावर-जंगम सबका विचार न उपस्थित हो कर मात्र मनुष्य के ही मृत्यु की बात कौंधती है। शायद इसलिये कि हमने मान लिया है कि ’न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं किञ्चित्’। यही कारण है कि मानव की मृत्यु ही मृत्यु विषयक चिन्तन का केन्द्र बनती है। मानव जीवन के सापेक्ष ही हम अन्यों के जीवन मरण का विचार करने के लिये बाध्य हैं। लेकिन मानव जीवन में मृत्यु एक ऐसी घटना है  जो या तो जुगुप्सा पैदा करती है अथव क्रोध उत्पन्न करता है। किन्तु यह एक वास्तविकता है जिसमें सबको हिस्सा लेना ही पडता है। एक ऐसा विराट है जिसमें सबका जीवन डूब जाता है। लेकिन यह इस स्थिति में ही होता है जब जीवन अर्थ नहीं मालूम होता। जीवन का अर्थ यदि बन्धन है तो ऐन्द्रिक अनुभव का जीवन ही है, अर्थात् बंधा हुआ जीवन अपूर्णता के बोध से लबालब जीवन। सर्वत्र खण्ड दृष्टि का जीवन ही यदि वास्तविक जीवन है तो मृत्यु क्या है? प्रत्येक यह मानता है कि मृत्यु जीवन का विलोम है अर्थात् जीवन खण्ड है तो मृत्यु को अखण्ड होना चाहिये, जीवन सान्त है तो मृत्यु को अनन्त तथा जीवन के प्रतीति की दशा में यथार्थ होना चाहिये। परन्तु कोई न तो इसको स्वीकार करता है न तो किसी कॊ इसे स्वीकार ही करना चाहिये। मृत्यु शब्द के कॊशीय अर्थ में पर्याय रूप में एक शब्द प्राप्त होता है’ कालधर्म’। यह कालधर्म ्शब्द बहुत कुछ बातें कहता है। काल एक निर्विच्छिन्न गति है अप्रतिहत घूमता रहता है। कभी नहीं रुकता यही उसका धर्म है। यदि अविच्छिन्न्ता नहीं है तो काल नहीं है। काल तो सबका कारण है ’कालो जगतः कारणं’। अब इस आलोक में देखने पर मृत्यु स्वयं अघटित है और अघटित रहते हुये किसी अन्य घटना का कारण बनता है। मृत्यु अन्त नहीं है अनन्त की यात्रा है, कालधर्म है। एक के बाद दूसरी घटना के होने का निमित्त कारण है। मृत्यु न होती तो संसरण कैसे होता। संसरण है तो जीवन है अर्थात् म्रुत्यु है तो जीवन है। जन्म और मृत्यु में पूरकता है। जन्म बिना मृत्यु नहीं है तो यह् भी सत्य है की बिना मृत्यु के जीवन का भी मूल्य नहीं समझा जा सकता है। यही मृत्यु का मूल्य है जो जीवन को भी मूल्यवान बनाता है।

इस सन्दर्भ में विचार को आगे बढाया जाय तो यह समझ में आने लगता है कि जिसे हम जीवन का अन्त या नाश समझते हैं वह वास्तव में जीवन का हेतु है। बुद्ध ने तो स्पष्टतः  जाति ,जरा और मरण को भव का हेतु कहा है। यह मरण ही है जो भव की परिवर्तनशील सत्ता को संभव बनाता है।

अब इस प्रश्न पर् विचार किया जा सकता है कि यदि मृत्यु इतनी महत्वपूर्ण तथा त्रैकालिक सत्ता वाली है तो यह् इतनी दुःखदायी क्यों है। इस पर तनिक भी विचार किया जायेगा तो ध्यान आता है कि  दुःख म्रुत्यु का नहीं है बल्कि जीवन में जो कुछ ज्यादा है उन सबके छूट जाने का होता है। यह अर्जित के प्रति लोभ, मोह है। इस लोभ और मोह से मुक्ति तभी है है जब इनको जीवन से अलग समझा जाय। लेकिन भूत द्रव्यों और भौतिक संबन्धों को अपने जीवन का अविभाज्य भाग मान लेने पर इस विलगाव का बोध दुःख है। इस दुःख से मुक्ति विलगाव और जुडाव की दृष्टि का परिवर्तन ही है। यही ज्ञान है। इसको इस दृष्टि से समझा जाय कि आचार्य को मृत्यु कहा गया है ’आचार्यो मृत्युः’ । आचार्य को मृत्यु कहने का तात्पर्य है कि जो ज्ञान देता है वह् मृत्यु समान है। जिसको ज्ञान चाहिये उसे अपने को मिटाना पडता है॥ सभी सस्कार पूर्वधारणायें सब को मिटा कर ही ज्ञान मिलता है। जब बुद्धि में पूर्व के संस्कार ठूँसे हुये हों तो ज्ञान कैसे समायेगा। नया तो तभी प्रवेश पा सकता है। जब पुराने को हटाया जाय। पुराने को हटाने और नये के लिये जगह बनाने की प्रक्रिया का नाम मृत्यु है।

संसार भी ऐसे ही चलता है, कल्पना कीजिये कि दुनिया में हजारो वर्ष उम्र वाले बूढे लोगो से भरी हुई है। तो कैसा विद्रूप होगा संसार का वह चित्र। निष्क्रिय तथा भरी भरी  जिसमें नये को बमुश्किल जगह मिलेगी। प्रत्येक व्यक्ति अपनेमें अपना इतिहास होगा। फिर रावण और कंस जैसे राक्षस भी शाश्वत हो जायेगें। इनके मरने की कल्पना भी नहीं हो सकती है क्योंकि मृत्यु तो कल्पित भी नहीं हो सकेगी। कभी कोई राक्षसी शक्ति पराजित नहीं नष्ट नहीं होगी क्योकि मृत्यु के अभाव में सब शाश्वत हो जायेगें। फिर इस न समाप्त होने वाली स्थिति को जीवन तो नहीं कहा जा सकता है।

यह मिटना और मिटने का कालधर्म नवीनता की अनिवार्य शर्त है। इसीलिये काशी में मृत्यु मंगल है। यह नगर मरण की मंगलवादिता के कारण ही अविनाशी नगर है॥ जहाँ मरना उत्सव होगा वहीं नित्यता हो सकती है। प्रवाही नित्यता और कुटस्थ नित्यता दोनो मृत्यु से ही पहचाने जाते हैं। यदि निर्बन्ध होना निर्ग्रन्थ होना मुक्ति है तो यह भी मृत्यु की पूर्वापेक्षा तो करता ही है। बन्धन का नाश तो बन्धन के कारण और बन्धन हेतु दोनो की मृत्यु ही है। अर्थात् मुक्ति तो मरना है। जन्म तो मृत्यु का हेतु है। जन्म बांधता है। जो बंधता है उसको मुक्त होना ही चाहिये। वह इसी जन्म में हो जाय तो मंगल है। अर्थत् मुक्ति की तैयारी के साथ मरना मंगल है। यदि मुक्ति कै तैयारीपूर्वक मरण नहीं है तो  यह मृत्यु नही है अपितु रुप परिवर्तन मात्र है।  एक बन्धन से दुसरे बन्धन में जाना मात्र है। अतः म्रुत्यु को मंगलमय बनाना ही उचित जीवन ध्येय है। इस ध्येय की संप्राप्ति ही  म्रुत्यु से मुक्ति की अवाप्ति है अर्थात अमरत्व की प्राप्ति है।      

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                                                                                                                                  -शैल अग्रवाल

सच झूठ से परे


कैसी होगी वह अंधेरी सुरंग जिसके अंदर और पार क्या है, जानने को सभी उत्सुक रहते हैं, जानते हुए भी कि जीते जी यह संभव नहीं!


मृत्यु अपने सारे रहस्यों और गुत्थियों के साथ आज भी वैसे ही निष्ठुर, पार्थिव और पूर्णतः मौन है... एक ऐसा यथार्थ है जो अदृश्य साये सा पल पल साथ तो है परन्तु वक्त आने पर ही सामने आ पाता है। फिर भी इसका आभास, अहसास और यथार्थ, कटने और बिछुड़ने का दर्द शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने सहा और जाना न हो। अंधेरे में टटोलती –सी विभिन्न धर्मों ने अपनी-अपनी व्याख्या और छवियां दी है इसकी। विभिन्न विभिन्न मनीषियों और विचारकों ने अपनी-अपनी तरह से समझना और सुलझाना चाहा है इस रहस्य को। कइयों ने इसे अंत तो कइयों ने एक नया आरंभ कहा है। स्वर्ग-नरक की कल्पना और अंतिम परीक्षण व निर्णय आदि भी इसी जिज्ञासा के ही तो परिणाम हैं, जबकि वास्तविकता क्या है कोई नहीं जानता। किसी की कल्पना में मौत भगवान की तरफ ले जाती एक दिव्य प्रकाश की सुरंग है तो नास्तिकों के लिए एक स्वाभाविक रासायनिक प्रक्रिया का अंत जहां से संभवतः एक नई शुरुवात भी हो सकती है ।

क्या है यह जीवन-मृत्यु का खेल? क्यों इस अगम अनंत के रहस्यों को कोई नहीं समझ पाया ? हां इतना अवश्य सोचती हूं कि यदि वाकई में यह शरीर पुराने कपड़ों की तरह है जिसे छोड़कर हम नए कपड़े ..नए जीवन में प्रवेश करते है , तो भी कितने होंगे जो जीवन और मृत्यु के प्रति सहज हो पाते हैं, हर आगामी परिवर्तन को संतोष और परिपूर्णता से गले लगा पाते हैं। कोई मृत्यु का स्वरूप आलिंगन में आती प्रेमिका की तरह पाता है तो किसी को उसमें काले भैंसे पर सवार यमराज नज़र आते हैं। प्रायः मृत्यु का पूर्वाभास( स्वयं व्यक्तियों की या उनके निकट संबन्धियों की) और पुनर्जन्म की पुनः पुनः सामने आती गाथाएं व किवदन्तियां रहस्य को सुलझाने के बजाय और अधिक उलझाती हैं। अन्य हजारों की तरह मुझे भी बचपन से ही हुए हैं इस तरह के कुछ पूर्वाभास और पूर्वाग्रह। अधिकांशतः किसी आगामी दुर्घटना से बचने के लिए चेतावनी रही है या फिर किसी निकटतम स्वजन से विछोह का संदेश। दो को मैंने कहानियों में भी बांधा है, अन्य अभी तक वैसे ही मन की गीली मिट्टी में रोपित हैं। आपके साथ दो ऐसी घटनाओं को बांटना चाहूंगी।

1.       बात पिछली सदी के सातवें दशक के शुरुवात  की है। पतिदेव अपनी एक इच्छित और लम्बे समय से प्रतीक्षित नौकरी के साक्षात्कार के लिए जाने वाले थे । हम सब बहुत खुश थे। सुबह की यात्रा की सारी तैयारी करके सोई कि सुबह विलंब न हो। अचानक ही स्वप्न में देखती हूँ कि पूरी तरह से सफेद सिर से पैर तक लम्बा कुरता पहने एक बुजुर्ग मेरे सामने खड़े मुस्कुरा रहे हैं, हाथ में लाठी और बेहद लम्बी दाढ़ी उनकी चिर बुजुर्गियत का एहसास दे रही थी। मेरे लिए वह अपरिचित और रहस्य थे, क्योंकि इसके पहले मैंने उन्हें कभी नहीं देखा या जाना था। मेरी आंखों की प्रश्नात्मक उलझन को देखकर वह खुद ही बोले । 'मैं बुध हूँ। बुध…।' ' क्या वह बुधवार...हफ्ते का एक दिन?' मेरी जिज्ञासा फिर आंखों से छलकी। ' हां-हां, वही बुध। और मैं यह कहने आया हूँ कि सुबह पति को साक्षात्कार के लिए मत जाने दे।' वे पुनः­­­­ बेहद चिंतित और आग्रह भरी आवाज में बोले। 'पर यह कैसे संभव है... साल भर से इंतजार कर रहे थे वह इस दिन का। हंसेंगे नहीं मुझपर जब मैं कहूंगी कि मैने ऐसे-ऐसे सपना देखा है आप नौकरी के साश्रात्कार पर मत जाओ। क्या मानेंगे वह मेरी बात ? '


अब बुजुर्ग के चिंतित होने की बारी थी।


'मानना ही होगा। मैं बुध हूँ । पति, पिता , श्वसुर तीनों रूपों में तेरी रक्षा कर रहा हूँ।' मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वे कौन हैं , क्या कह रहे हैं और इस सपने को एक सच्ची चेतावनी मानकर इसका अनुसरण करना भी चाहिए या नहीं? वे मानो मेरे मन के एक-एक भाव को पढ़ रहे थे। खुद ही बोले –अच्छा अगर पति को रोक नहीं सकती ,तो खुद भी साथ जा और पति व बेटी के बीच में बैठना। उनकी आवाज में जाने कैसी सच्चाई और आग्रह था कि सुबह पति के उठने से पहले ही मैं और मेरी दस महीने की बेटी, दोनों तैयार थे साथ जाने के लिए। पति ने हंसकर कहा ,' तुम भी नहीं मानती थके बिना। यह 150 मील की लम्बी यात्रा वह भी एक ही दिन में छोटे बच्चे के साथ करने की क्या जरूरत है।' ' हमारी घुमाई हो जाएगी और आपका साथ। यहां घर में बैठे-बैठे ही हम क्या करेंगे' -कहकर मैं बेटी के साथ कार में जा बैठी। इसबार बेटी को पीछे कार सीट में बांधने की बजाय आगे सीट पर  बिठाया और पति व बेटी के बीच में मैं बैठी हुई थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे स्वप्न में आदेश मिला था। 'इसे सीट में क्यों नहीं बैठातीं , ज्यादा सुरक्षित रहेगी।' 'दांत आ रहे हैं , रातभर जगी है। बुखार भी है। ऐसे ही रहने दो । मैं कसकर पकड़े हूं और सीट बेल्ट भी दोनों को ही बांधे हुए है।' पति को मेरी आधी बात समझ में आई, पर इस अटपटी बात को पूर्णतः समझें इतना वक्त नहीं था उनके पास ।

तीन घंटों में 150 मील का सफर पूरा करना था। कार सत्तर अस्सी की रफ्तार से दौड़ रही थी। हम अभी मुश्किल से सत्तर अस्सी मील का सफर यानी कि आधा सफर तय कर पाए थे अचानक ही एक के बाद एक दो पटाके जैसी भयानक आवाजें हुईं । कुछ सोचें समझें या भयभीत तक हों इसके पहले ही हमारी कार खुद ही फिसल कर तीसरी से दूसरी , दूसरी से पहली और पहली से बाइ लेन जो मोटर वे पर सुरक्षा के लिए होती है । उसपर उलटी खड़ी हुई थी। यहां इंगलैंड के नवंबर के महीने में भी पसीने से लथपथ पतिदेव रूमाल से माथे का पसीना  पोंछते बोले। यह तो चमत्कार ही है। आज तो साक्षात् भगवान ने ही आकर हमें बचाया है। तीसरी लेन से यूं बाइ लेन तक पहुंच जाना वह भी बिना किसी चोट-खरोच के , जबकि सैकड़ों कारें अगल-बगल से गुजर रही थीं...यह कैसे संभव हुआ ?  पति पूर्णतः स्थिति की कवच सी आकस्मिकता से अभिभूत थे औ मैं मन ही मन बुध कहूं या भगवान  के उस सार्थक हस्तक्षेप के लिए मन ही मन उन्हें धन्यवाद दे रही थी।

अगले दिन जब पिताजी को फोन पर यह सब सुनाया थो बहुत ही सहज ढंग से उन्होंने कहा –हां हमारे कोई बड़े बुजुर्ग हैं , जो रक्षा करते हैं हमारी। मुझे भी दिखते हैं और दो बार मेरी भी जान बचाई है इन्होंने। मैं अवाक् थी। आश्चर्य और भी बढ़ा जब पता चला कि पति, पिताजी और श्वसुर जी , तीनों का ही जन्म वाकई में बुधवार को ही हुआ था। 

अगले तीस वर्षों में दो बार फिर आए हैं वे । पुनः दोनों बार ही बहुत बड़ा सहारा ...एक सामयिक चेतावनी और हस्तक्षेप बनकर।  एकबार एक बेहद निराशाजनक परिस्थिति में उजाले की किरण बनकर और दुबारा बात नवें दशक के शुरुवात की है। और बनारस की है। मां की मृत्यु को अभी सालभर भी नहीं हुआ था। मैंने बच्चों के साथ उनकी छुट्टी के पूरे दो महीने बस पिताजी के साथ ही बिताने का मन बनाया था। बच्चों का बिना ए.सी. के काम नहीं चलता था और पिताजी को ए.सी. रास नहीं आता था। इसलिए  हमारा साथ चाहकर भी वे अलग कमरे में सोने पर मजबूर थे। लगभग घंटे भर पहले ही वह हमारे पास गपशप करके अपने कमरे में सोने गए थे। अचानक सपने में देखती हूं कि कसकर पानी बरस रहा है। हम कार से कहीं जा रहे हैं। बीच किसी जंगल सी जगह में पिताजी ने कार रुकवाई है। लघुशंका के लिए आगे खेतों की तरफ ओट ढूंढते बढ़े जा रहे हैं वे। अचानक कसकर बिजली कड़की है और सामने खड़ा पेड़ पिताजी पर गिरने वाला है । सड़क के उस पार से वही सफेद कपड़े और सफेद दाढ़ी वाले बुजुर्ग तेजी से दौड़े चले आ रहे हैं, उन्हें बचाने के लिए। इसके पहले सपना आगे बढ़े, में जग जाती हूँ। सीधे तीर-सी पिताजी की ओर दौड़ती हूं। आधे रास्ते में ही पिताजी दीवाल का सहारा लेकर खड़े पसीने में लथपथ मिल जाते हैं। बड़ी मुश्किल से बस इतना ही कह पाते हैं , में तेरे पास ही आ रहा था। जैसे तैसे उन्हें बिस्तर तक वापस ले जाती हूं। डॉ. का कहना था जबर्दस्त हार्ट अटैक था। सही समय पर हस्तक्षेप न होता , तो बचाना मुश्किल था। एक बार फिर मैं दिल की गहराइयों से भगवान की आभारी थी।

 

इन घटनाओं का यूँ आभास और वह भी लगभग उसी वक्त जबकि वे घट रही थीं अपने आप में एक अद्भुत संयोग है। सोचने पर मजबूर हूँ कि क्या वाकई में यह बस एक अंधेरे में तीर-तुक्का है, या एक अगूढ़ रहस्य और दिव्य हस्तक्षेप। अंधेरे में जाने से डरते बालक जैसा डर है या उससे भी आगे बहुत कुछ है...जिनके रहते हमें जीवन और मृत्यु के प्रति शंकित और निराश होने की जरूरत नहीं।...

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                                                                                                                                                    आत्मकथ्य





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                                                                                                                                                      सुधा अरोड़ा

किसी को ऊंची जगह से नीचे देखने में डर लगता है । किसी को वॉटर फोबिया होता है यानी पानी में जाने से डर। किसी को मंच या माइक फोबिया होता है , किसी को ट्रैवल फोबिया , किसी को डेथ फोबिया। मुझे ये तीनों हैं । पहले मंच पर चढ़कर माइक के सामने आते ही मैं थरथराने लगती थी, हाथ पैर ठंडे होने लगते थे । धीरे धीरे इस भय से मुक्त हुई । ट्रैवल फोबिया इस कदर था कि मैं मुंबई से सिर्फ अपने मायके कोलकाता जाया करती थी । कहीं से किसी सेमिनार का आमंत्रंत्रण आया तो रूह फना हो जाती थी। हमेशा ‘न’ सुन सुन कर लोगों ने बुलाना बंद कर दिया पर पिछले तीन सालों से मैंने यात्रा के डर से भी अपने को मुक्त किया । 2010 में अपनी सेहत को ठेंगा दिखाते हुए ,  मैंने दर्जन भर यात्राएं कीं -एक ज़िद़ में ! लेकिन तीसरे भय से मैं अब तक मुक्त नहीं हो पाई । अपने युवुवाकाल से ही मैं इससे आक्रांत रही हूं। अगर मृत्यु भय न होता तो मैं लेखिका ही न बनती । मैंने जो पहली कहानी मई 1964 में लिखी थी उसका नाम था -‘‘एक सेंटीमेन्टल डायरी की मौत’’ जो सारिका के मार्च 1966 के अंक में प्रकाशित हुई थी लेकिन पहली प्रकाशित कहानी थी - ‘‘मरी हुई चीज़ ’’ - सितम्बर 1965।

 

मृत्यु भय मौत के आने से ज्यादा ज़िन्दगी के छूटने का भय है । कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जिसे अपने जीवन से प्यार न हो । मृत्यु भय भी कहीं न कहीं जीवन को कसकर थामे रखने और अपनी अंजुरियों से रेत के कणों की तरह जीवन को रीत जाने से बचा लेने के प्रयास का ही पर्याय है। ज़िन्दगी से इतना प्यार करते है हम सब,  इसीलिए तो मृत्यु भय सालता है । हां , कभी कभी जीवन कुछ ऐसी स्थितियों की ओर धकेल देता है कि जीने से ज्यादा मौत में आदमी सुकून तलाशने लगता है जबकि सुकून की चाहत से ज़्यादा यह स्थिति जीवन संघर्ष और जीने की मुश्किल , दारुण स्थितियों से पलायन है । ऐसी स्थिति से कई लड़़कियां , औरतें गुज़रती हैं जिन्हें अपना सारा जीवन अंधेरी सुगंग सा लगता है और वे उसमें से निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पातीं । ऐसी ही एक लड़की की कहानी है - अन्नपूर्णा मंडल । पर यह कहानी स्थितियों का विकराल रूप दिखाने के बावजूद आत्महत्या के निर्णय को समर्थन नहीं देती ।

 

एसी स्थितियों से गुजरती हुई कोई लड़की अगर इस कहानी को पढ़े तो उसे आत्महत्या का निर्णय एक समाधान नहीं , एक चुनौती की तरह लगेगा । वह भीषण हताशा के माहौल से छूट निकलने के अनेकों कारण तलाशेगी और उन कारणों को खुद दुर्बीन से देखेंगी जो किसी लड़की के शादी के बाद उसके कोमल और मासूम सपनों को रेशा रेशा बिखेर कर उसे एक अस्तित्वहीन इकाई में बदल देता है - जब वह स्वीकार करती है - ‘‘ मैं जल्दी थक गई , इसमें दोष तो मेरा ही है ’’ और अपनी बेटियों के लिए अपने मां बाप को हिदायत देती है - ‘‘ बड़ी होने पर ये दोनों अगर आसमान को छूना चाहें  तो यह जानते हुए भी कि वे आसमान को छू नहीं पाएंगी , इन्हें रोकना मत ! ’’

 

और सचमुच आज की पीढ़ी़ की लड़की के लिए यह एक चुनौती है कि उन्हें अपने पैरों पर खड़े होना है ।

 

अपनी पिछली पीढ़ी़ की औेरतों द्वारा झेली गई मानसिक गुलामी से मुक्त होकेकर अपना स्पेस सुरुरक्षित करना है । पति के रूप में उन्हें एक हुक्मरान नहीं, कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला एक साथी चाहिए।

 

आज की मध्यवर्गीय युवा लड़की , अपने मूल्यों और संस्कारों को बरकरार रखते हुए , एक बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में संघर्ष रत है ।

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                                                                                                                                        कहानी समकालीन


                                                                                                                                          - सुधा अरोड़ा

             अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी 

प्यारी मां और बाबा ,

            चरण - स्पर्श ।

मुझे मालूम है बाबा , लिफाफे पर मेरी हस्तलिपि देखकर लिफाफे को खोलते हुए तुम्हारे हाथ कांप गए होंगे । तुम बहुत एहतियात के साथ लिफाफा खोलोगे कि भीतर रखा हुआ मेरा खत फट न जाए।
सोचते होगे कि एक साल बाद आखिर मैं तुमलोगों को खत क्यों लिखने बैठी । कभी तुम अपने डाकघर से , कभी बाबला या बउदी अपने आफिस से फोन कर ही लेते हैं फिर खत लिखने की क्या ज़रूरत । नहीं , डरो मत , ऐसा कुछ भी नया घटित नहीं हुआ है । कुछ नया हो भी क्या सकता है।

बस , हुआ इतना कि पिछले एक सप्ताह से मैं अपने को बार-बार तुमवलोगों को खत लिखने से रोकती रही । क्यों ? बताती हूं । तुम्हें पता है न , बम्बई में बरसात का मौसम शुरु हो गया है । मैं तो मना रही थी कि बरसात जितनी टल सके , टल जाए  , लेकिन वह समय से पहले ही आ धमकी । और मुझे जिसका डर था , वही हुआ । इस बार बरसात में पार्क की गीली मिट्टी सनी सड़क से उठकर उन्हीं लाल केंचुओं की फौज घर के भीतर तक चली आई है । रसोई में जाओ तो मोरी के कोनों से ये केंचुए मुंह उचका-उचका कर झांकते हैं , नहाने  जाओ तो बाल्टी के नीचे कोनों पर वे बेखौफ चिपके रहते हैं । कभी-कभी पैरों के नीचे अचानक कु? पिलपिला सा महसूस होता है और मैं डर जाती हूं कि कहीं मेरे पांव के नीचे आकर कोई केंचुआ मर तो नहीं गया ? 

इस बार मुझे बांकुड़ा का वह अपना ( देखो ,अब भी वही घर अपना लगता है ) घर बहुत याद आया । बस , ये यादें ही तुम्हारे साथ बांटना चाहती थी । पता नहीं तुम्हें याद है या नहीं , पता नहीं बाबला को भी याद होगा या नहीं ,  हम कितनी बेसब्री से बरसात के आने का इन्तज़ार करते थे । मौसम की पहली बरसात देखकर हम कैसे उछलते-कूदते मां को बारिश के आने की खबर देते जैसे पानी की बूंदें सिर्फ़ हमें ही दिखाई देती हैं , और किसी को नहीं । पत्तों पर टप-टप-टप बूंदों की आवाज़ और उसके साथ हवा में गमकती फैलती मिट्टी की महक हमें  पागल कर देती थी , हम अख़बार को काट-काट कर कागज़ की नावें बनाते और उन्हें तालाब में छोड़ते । मां झींकती रहतीं और हम सारा दिन पोखर के पास और आंगन के बाहर , हाथ में नमक की पोटली लिए , बरसाती केंचुओं को ढूंढते रहते थे । वे इधर-उधर बिलबिलाते से हमसे छिपते फिरते थे और हम उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मारते थे । नमक डालने पर उनका लाल रंग कैसे बदलता था , केंचुए हिलते थे और उनका शरीर सिकुड़कर रस्सी हो जाता था । बाबला और मुझमें होड़ लगती थी कि किसने कितने ज्यादा केंचुओं को मारा । बाबला तो एक -एक केंचुए पर मुट्ठी भर- भर कर नमक डाल देता था ।  

मां , तुम्हें याद है , तुम कितना चिल्लाती थीं बाबला पर -- इतना नमक डालने की क्या जरूरत है रे  खोका । पर फिर हर बार जीतता भी तो बाबला ही था -- उसके मारे हुए केंचुओं की संख्या ज्यादा होती थी । बाबा , तुम डाकघर से लौटते तो पूछते -- तुम दोनों हत्यारों ने आज कितनों की हत्या की ? फिर मुझे अपने पास बिठाकर प्यार से समझाते -- बाबला की नकल क्यों करती है रे । तू तो मां अन्नपूर्णा है , देवीस्वरूपा , तुझे क्या जीव - जन्तुओं की हत्या करना शो भा देता है ? भगवान पाप देगा रे । 

आज मुझे लगता है बाबा , तुम ठीक कहते थे । हत्या चाहे मानुष की हो या जीव-जन्तु की , हत्या तो हत्या है ।

तो क्या बाबा , उस पाप की सज़ा यह है कि बांकुड़ा के बांसपुकुर से चलकर इतनी दूर बम्बई के अंधेरी  इलाके के महाकाली केव्स रोड के फ्लैट में आने के बाद भी वे सब केंचुए मुझे घेर-घेर कर डराते हैं , जिन्हें पुकुर के आस-पास नमक छिड़क छिड़क कर मैंने मार डाला था ।

यह मेरी शादी के बाद की पांचवीं बरसात है । बरसात के ठीक पहले ही तुमने मेरी शादी की थी । जब बांकुड़ा से बम्बई के लिए मैं रवाना हुई , तुम सब की नम आंखों में कैसे दिए टिमटिमा रहे थे जैसे तुम्हारी बेटी न जाने कौन से परीलोक जा रही है जहां दिव्य अप्सराएं उसके स्वागत में फूलों के थाल हाथों में लिए खड़ी  होंगी । यह परीलोक , जो तुम्हारा देखा हुआ नहीं था पर तुम्हारी बेटी के सुन्दर रूप के चलते उसकी झोली में आ गिरा था , वर्ना क्या अन्नपूर्णा और क्या उसके डाकिए बापू शिबू मंडल की औकात थी कि उन्हें रेलवे की स्थायी नौकरी वाला सुदर्शन वर मिलता ? तुम दोनों तो अपने जमाई राजा को देख -देख कर ऐसे फूले नहीं समाते थे कि मुझे बी.ए. की सालाना परीक्षा में भी बैठने नहीं दिया और दूसरे दर्जे की आरक्षित डोली में बिठाकर विदा कर दिया । जब मैं अपनी बिछुआ-झांझर संभाले इस परीलोक के द्वार दादर स्टेशन पर उतरी तो लगा जैसे तालाब में तैरना भूल गई हूं । इतने आदमी तो मैंने अपने पूरे गांव में नहीं देखे थे । यहां स्टेशन के पुल की भीड़ के हुजूम के साथ सीढ़ियां उतरते हुए लगा जैसे पेड़ के सूखे पत्तों की तरह हम सब हवा की एक दिशा में झर रहे हैं । देहाती सी लाल साड़ी में तुम्हारे जीवन भर की जमा-पूंजी के गहने  और कपड़ों का बक्सा लिए जब अंधेरी की ट्रेन में इनके साथ बैठी तो साथ बैठे लोग मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं और बाबला कभी -कभी कलकत्ता के चिड़ियाघर में वनमानुष को घूरते थे । और जब महाकाली केव्स रोड के घर का जंग खाया ताला खुला तो जानते हो , सबसे पहले दहलीज़ पर मेरा स्वागत किसने किया था __ दहलीज़ की फांकों में सिमटे-सरकते , गरदन उचकाते लाल-लाल केंचुओं ने । उस दिन मैं बहुत खुश थी । मुझे लगा , मेरा बांकुड़ा मेरे आंचल से बंधा-बंधा मेरे साथ-साथ चला आया है । मैं मुस्कुराई थी । पर मेरे पति तो उन्हें देखते ही खूंख्वार हो उठे । उन्होंने चप्पल उठाई और चटाख् - चटाख् सबको रौंद डाला । एक - एक वार में इन्होंने सबका काम तमाम कर डाला था । तब मेरे मन में पहली बार इन केंचुओं के लिए माया -ममता उभर आई थी । उन्हें इस तरह कुचले जाते हुए देखना मेरे लिए बहुत यातनादायक था ।

हमें एकान्त देकर आखिर इनकी मां और बहन भी अपने घर लौट आई थी । अब हम रसोई में परदा डालकर सोने लगे थे । रसोई की मोरी को लाख बंद करो , ये केंचुए आना बंद नहीं करते थे । पति अक्सर अपनी रेलवे की ड्यूटी पर सफर में रहते और मैं रसोई में । और रसोई में बेशुमार केंचुए थे । मुझे लगता था , मैंने अपनी मां की जगह ले ली है और मुझे सारा जीवन रसोई की इन दीवारों के बीच इन केंचुओं के साथ गुजारना है । एक दिन एक केंचुआ मेरी निगाह बचाकर रसोई से बाहर चला गया और सास ने उसे देख लिया । उनकी आंखें गुस्से से लाल हो गईं । उन्होंने चाय के खौलते हुए पानी की केतली उठायी और रसोई में बिलबिलाते सब केंचुओं पर गालियां बरसाते हुए उबलता पानी डाल दिया । सच मानो बाबा , मेरे पूरे शरीर पर जैसे फफोले पड़ गए थे , जैसे खौलता हुआ पानी उनपर नहीं , मुझ पर डाला गया हो । वे सब फौरन मर गए , एक भी नहीं बचा । लेकिन मैं ज़िन्दा रही । मुझे तब समझ में आया कि मुझे अब बांकुड़ा के बिना ज़िन्दा रहना है । पर ऐसा क्यों हुआ बाबा , कि मुझे केंचुओं से डर लगने लगा । अब वे जब भी आते , मैं उन्हें वापस मोरी में धकेलती , पर मारती नहीं । उन दिनों मैंने यह सब तुम्हें ख़त में लिखा तो था , पर तुम्हें मेरे ख़त कभी मिले ही नहीं । हो सकता है , यह भी न मिले । या मिल भी जाए तो तुम कहो कि नहीं मिला । फोन पर मैंने पूछा भी था - चिट्ठी मिली ? तुमने अविश्वास से पूछा - पोस्ट तो की थी या ..... । मैं हंस दी थी - अपने पास रखने के लिए थोड़े ही लिखी थी । तुमने आगे कुछ नहीं कहा ।  और बात ख़तम ।

फोन पर इतनी बातें करना संभव कहां है ।  फोन की तारों पर मेरी आवाज़ जैसे ही तुम तक तैरती हुई पहुंचती है , तुम्हें लगता है , स--ब ठीक है । जैसे मेरा जिन्दा होना ही मेरे ठीक रहने की निशानी है । और फोन पर तुम्हारी आवाज़ सुनकर मैं परेशान हो जाती हूं क्योंकि फोन पर मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि तुम जिस आवाज़ को मेरी आवाज़ समझ रहे हो , वह मेरी नहीं   है । तुम फोन पर मेरा कुशल - क्षेम ही सुनना चाहते हो और मैं तुम्हें केंचुओं के बारे में कैसे बता सकती हूं ?  तुम्हारी आवाज़ से मैं चाहकर भी तो लिपट नहीं सकती । मुझे तब सत्रह सौ किलोमीटर की दूरी बुरी तरह खलने लगती है । इतनी लम्बी दूरी को पारकर डेढ़ साल पहले जब मैं वहां बांकुड़ा पहुंची थी , मुझे लगा था , मैं किसी अजनबी गांव में आ गई हूं जो मेरा नहीं है । मुझे वापस जाना ही है , यह सोचकर मैं अपने आने को भी भोग नहीं पाई । मैंने शिथिल होकर खबर दी थी कि मुझे तीसरा महीना चढ़ा है । मैं आगे कुछ कह पाती कि तुम सब में खुशी की लहर दौड़ गई थी । मां ने मुझे गले से लगा लिया था , बउदी ने माथा चूम लिया था । मैं रोई थी , चीखी थी , मैंने मिन्नतें की थीं कि मुझे यह बच्चा नहीं चाहिए , कि उस घर में बच्चे की किलकारियां सिसकियों में बदल जाएंगी , पर तुम सब पर कोई असर नहीं हुआ । तुम चारों मुझे घेरकर खड़े हो गए -- भला पहला बच्चा भी कोई गिराता है , पहले बच्चे को गिराने से फिर गर्भ ठहरता ही नहीं , मां बनने में ही नारी की पूर्णता  है , मां बनने के बाद सब ठीक हो जाता है , औरत को जीने का अर्थ मिल जाता है । मां , तुम अपनी तरह मुझे भी पूर्ण होते हुए देखना चाहती थी । मैंने तुम्हारी बात मान ली और तुम सब के सपनों को पेट में संजोकर वापस लौट गई ।

वापस । उसी महाकाली की गुफाओं वाले फ्लैट में । उन्हीं केंचुओं के पास । बस , फर्क यह था कि अब वे बाहर फर्श से हटकर मेरे शरीर के भीतर रेंग रहे थे । नौ महीने मैं अपने पेट में एक दहशत को आकार लेते हुए महसूस करती रही । पांचवे महीने मेरे पेट में जब उस आकार ने हिलना-डुलना शुरु किया , मैं भय से कांपने लगी थी । मुझे लगा , मेरे पेट में वही बरसाती केंचुए रेंग रहे हैं , सरक रहे हैं  । आखिर वह घड़ी भी आई , जब उन्हें मेरे शरीर से बाहर आना था और सच मां , जब लम्बी बेहोशी के बाद मैंने आंख खोलकर अपनी बगल में लेटी सलवटों वाली चमड़ी लिए अपनी जुड़वां बेटियों को देखा , मैं सकते में आ गई । उनकी शक्ल वैसी ही गिजगिजी लाल केंचुओं जैसी झुर्रीदार थी । मैंने तुमसे कहा भी था -- देखो तो मां , ये दोनों कितनी बदशक्ल हैं , पतले -पतले  ढीले -ढाले  हाथ -पैर और सांवली -मरगिल्ली सी । तुमने कहा था - बड़ी बोकी है रे तू , कैसी बातें करती है , ये तो साक्षात् लक्ष्मी - सरस्वती एक साथ आई हैं तेरे घर । तुम सब ने कलकत्ता जाकर अपनी बेटी और जमाई बाबू के लिए कितनी खरीदारी की थी , बउदी ने खास सोने का सेट भिजवाया  था । सब दान-दहेज समेटकर तुम यहां आई और चालीस दिन मेरी , इन दोनों की और मेरे ससुराल वालों की सेवा-टहल करके

लौट गईं । इन लक्ष्मी - सरस्वती के साथ मुझे बांधकर तुम तो बांकुड़ा के बांसपुकुर लौट   गईं , मुझे बार-बार यही सुनना पड़ा - एक कपालकुण्डला को अस्पताल भेजा था , दो को और साथ ले आई ।

बाबा , कभी मन होता था - इन दोनों को बांधकर तुम्हारे पास पार्सल से भिजवा दूं कि मुझसे ये नहीं  संभलतीं , अपनी ये लक्ष्मी सरस्वती सी नातिनें तुम्हें ही मुबारक हों पर हर बार इनकी बिटर-बिटर सी ताकती हुई आंखें मुझे रोक लेती थीं ।

मां, मुझे बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम्हारी तरह एक अच्छी मां कभी नहीं बन पाऊंगी  जो जीवन भर रसोई की चारदीवारी में बाबला और मेरे लिए पकवान बनाती रही और फालिज की मारी ठाकुर मां की चादरें धोती - समेटती रही । तुम्हारी नातिनों की आंखें मुझसे वह सब मांगती हैं जो मुझे लगता  है , मैं कभी उन्हें दे नहीं पाऊंगी ।

इन पांच सात महीनों में कब दिन चढता था , कब रात ढल जाती थी , मुझे तो पता ही नहीं चला । इस बार की बरसात ने आकर मेरी आंखों पर छाए सारे परदे गिरा दिए हैं । ये दोनों घिसटना सीख गई हैं । सारा दिन कीचड़ मिट्टी में सनी केंचुओं से खेलती रहती हैं । जब ये घुटनों घिसटती हैं , मुझे केंचुए रेंगते दिखाई देते हैं और जब बाहर सड़क पर मैदान के पास की गीली मिट्टी में केंचुओं को सरकते देखती हूं तो उनमें इन दोनों की शक्ल दिखाई देती है । मुझे डर लगता है , कहीं मेरे पति घर में घुसते ही इन सब पर चप्पलों की चटाख - चटाख बौछार न कर दें या मेरी सास इन पर केतली का खौलता हुआ पानी न डाल दें । मैं जानती हूं , यह मेरा वहम है पर यह लाइलाज है और मैं अब इस वहम का बोझ नहीं उठा सकती ।  

इन दोनों को अपने पास ले जा सको तो ले जाना । बाबला और बउदी शायद इन्हें अपना लें । बस , इतना चाहती हूं कि बड़ा होने पर ये दोनों अगर आसमान को छूना चाहें तो यह जानते हुए भी कि वे आसमान को कभी छू नहीं पाएंगी , इन्हें रोकना मत । 

इन दोनों  के रूप में  तुम्हारी बेटी तुम्हें  सूद  सहित वापस  लौटा रही हूं । इनमें तुम मुझे देख पाओगे शायद ।  

बाबा , तुम कहते थे न - आत्माएं कभी नहीं मरतीं । इस विराट व्योम में , शून्य में , वे तैरती रहती हैं -- परम शान्त होकर । मैं उस शान्ति को छू लेना चाहती हूं । मैं थक गई हूं बाबा । हर शरीर के थकने की अपनी सीमा होती है । मैं जल्दी थक गई , इसमें दोष तो मेरा ही है । तुम  दोनों  मुझे  माफ  कर  सको  तो  कर देना ।

इति ।


                                                                                                                                     तुम्हारी आज्ञाकारिणी बेटी,
                                                                                                                                                  अन्नपूर्णा मंडल

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                                                                                                                                            कहानी समकालीन


                                                                                                                                              -शैल अग्रवाल

                                    वार्ड नँ. 18

फटे गुब्बारे में से निकली हवा सा धीरे-धीरे सारा तनाव बाहर निकल आया। देखने आए लोग मुस्कुराने लगे। नर्सों के हाथ-पैरों में फिर से फुर्ती आ गई। मैरी आज छह महीने के बाद उठकर जो बैठी है। बिस्तर पर लेटे-लेटे, ऑक्सीजन मास्क के नीचे जीवन से लड़ रही मैरी अचानक स्वस्थ लगने लगी है। 

   कुशल हाथों ने जल्दी-जल्दी बिस्तर की सारी सलवटें हटा दीं। जीवन और मौत की दूरी कितनी है मालूम नहीं पर इन दरवाजों के बीच निकलती जिन्दगियों ने मौत को अक्सर बहुत पास से, जीवन के साथ-साथ चलते देखा है। रिश्तों का टूटता बिछुड़ता अहसास और असँभावित सँभावनाओं का डर---- पानी की काँपती चन्द बूँदें आँखों में तैरने लगती हैं। रोने से भी बद्तर एक करुण मुस्कान होठों पर आ चुपकी है, जो अवश्यँभावी है उससे डरा नहीं जाता--- एकनिष्ठ आत्म-समर्पण माँगती हैं ये निर्णयात्मक घड़ियाँ। और मैरी ने ईशू के आगे हाथ जोड़कर, खुद को, रॉबर्ट को, अब ईश्वर के भरोसे छोड़ दिया।

                " सॉरी मिसेज व्हाइट अब आपके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता। "

डॉ. के अभी चन्द घँटों पहले कहे ये शब्द बार-बार मैरी को समय गिलास में रक्खी बालू सी फिसलती जिन्दगी की क्षण-भँगुरता का अहसास दिला रहे थे। तुम्हारे पास वक्त बहुत कम है। बार-बार कानों में आकर फुसफुसा रहे थे।

                " तो मुझे क्या करना चाहिए, क्या चाहते हो तुम ? "  मैरी उन दीवाल पर नाचती, परेशान करती परछाइयों से ही पूछने लगी। सामने चार्ट पर बड़े-बड़े अक्षरों में "टी. एल. सी. ओनली" लिखकर डॉ कूपर अपनी इन्सानी मजबूरियों से बँधे, लाचार आगे बढ़ जाते हैं। ऐसे वक्तों में याद आता है कि शायद हमसे अलग कोई ऊपर बैठा अपने ठँग से दुनिया सँचालित कर रहा है, जिसकी योजना में हमारी कोई दखलँदाजी नहीं। कुछ भी नहीं बदला जा सकता। कुछ भी नहीं किया जा सकता। ज्ञान और विज्ञान से भी नहीं। टी. एल. सी. यानीकि ‘ टैन्डर लविंग केयर ’। बस प्यार ही प्यार। दुलार ही दुलार…। और इससे ज्यादा क्या चाहिए जिन्दगी को ? मैरी समझ नहीं पा रही। प्यार के, आवाहन के, ये शब्द भला मृत्यु-दँड कैसे हो सकते हैं ? ये तो मुक्ति के दस्तावेज थे। मुक्ति, इस दर्द और घुटन से। मुक्ति, इस जर्जर अस्सी वर्ष की जीर्ण काया से। शायद एक नयी रोमाँचक यात्रा की शुरुवात हो या फिर एक लम्बी अखँड विस्मृति की, चैन की नींद मिले। दोनों ही स्थितियाँ ज्यादा राहतमय थीं। रहस्यमय और रोमाँचक थीं। जब हाथ में कुछ नहीं तो सोचना क्या ? डरना कैसा ? तीन महीने से एक बहादुर सिपाही की तरह दर्द और बीमारी से लड़ रही मैरी ने आज हथियार रख दिए थे। अब इनकी कोई जरूरत नहीं। समय आ गया था जब साहस के साथ सच को भी अन्दर समेट लिया जाए और मैरी ने यही किया भी। डॉ. ने उसके कमजोर हाथ प्यार से अपने हाथों में लेकर, दूर कहीं घुप कुँए से आती मजबूर सी आवाज में पूछा था " क्या आप मुझे सुन सकती हैं मिसेज व्हाइट ? " और मैरी ने उत्साह में अपनी कमजोर पलकें दो बार झपका कर स्वीकृति दी थी।

                " सॉरी, अब आपके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता।"

फिर बन्द हो गया सब... दवा,  इंजेक्शन और पल-पल की जाँच-पड़तालों का सिलसिला। आखिर कितना दर्द बर्दाश्त करती मैरी, कबतक और क्यों बर्दाश्त करती, विशेषत: तब, जब जिन्दगी की चिनगारी हर पल दर्द की एक मोटी परत से ढकी रहती थी। दर्द जो सोडा की बोतल में बँद गैस के बुदबुदों सा उसकी रग-रग में भर गया था। बाहर आने को कुलमुला रहा था। 

                बच्चों सी उत्साहित मैरी आज उठ बैठी थी वैसे ही जैसे बुझने से पहले लौ कुछ और तेज हो जाती है। आज वह खाने के साथ वाइन लेगी और पुडिंग भी। बिल्कुल वैसे ही जैसे चालीस साल पहले लेती थी फ्रैंक के साथ। चिल्ड आइसक्रीम और हौट कस्टर्ड। कितना चिढ़ाता था फ्रैंक उसे, "  तुम्हारी पुडिंग भी बिल्कुल तुम्हारे स्वभाव की ही तरह है...हौट और कोल्ड सबकुछ साथ-साथ।"

मैरी के सुनहरे बालों में खेलती धूप फ्रैंक की आँखों में चिनगारी बनकर मचल उठती। उसकी नीली आँखों में तैरती खुशी मन में प्यार का सागर लहरा देती। आज सबकुछ बस कितना ठँडा और फीका रह गया है। सिकुड़ते,  एँठते पैरों में मोजे चढ़ाते हुए मैरी ने सोचा। उसकी खुरदुरी काया सी खुरदुरी जिन्दगी अब कभी मखमली नहीं हो पाएगी। फ्रैंक जाने कहाँ खो गया था। उस कब्रिास्तान में जहाँ मैरी अक्सर फूल लेकर जाती थी, वहाँ तो बस उसकी यादें ही सोई पड़ी थीं। फिर भी बक्त-बेवक्त वह राहत ढूँढती वहाँ पहुँच ही जाती थी। उन्हें ही दुलरा और सहला आती थी। समय का घोड़ा ठक-ठक दिनों को अपने पैरों से रौंदता कुचलता भागा जा रहा था पर ये हठीली यादें झाग फेंकती, हाँफती आज भी उसीके साथ घिसटी जा रही हैं। मैरी की तरह ही, अपने गन्तव्य से जूझती-भागती,  जान-बूझकर अनजान बनती-- अपनी इच्छाओं से खुद ही अनिभिज्ञ।

                वार्ड नँ. अठ्ठारह अजीब सा कमरा है। रौशन और हवादार...खुला-खुला, पर कराहती काली परछाइयों में बन्द। रहस्यमय और सुनसान पर फीके कहकहों से गूँजता। सबकुछ भूलकर आँखें बन्द कर लो, तो नींद आ ही जाती है- राहत मिल ही जाती है। पर अपना और दूसरों का दर्द, सब कुछ भूलकर, पीछे छोड़कर सो पाना हर व्यक्ति के लिए इतना आसान तो नहीं !

        किशोरी मैन्डी बिल्कुल अपनी माँ जैसी ही सुन्दर है।

नाजुक, कलात्मक फूलों के गुलदस्ते को हाथ में पकड़े बिस्तर पर लेटी रोजलिन आज भी अपनी बेटी से कम सुन्दर नहीं। कौन कह सकता है कि इसे जानलेवा कैन्सर है और इसकी जिन्दगी भी  वर्ष क्या, चन्द महीनों से ज्यादा की नहीं है। सामने रखे हुए सुन्दर पके फलों की तरह, बाहर से देखने में तो पूर्णतः स्वस्थ और सुन्दर पर अन्दर-ही –अन्दर कैंसर के कीड़ों से घुनी हुई।

रोजलिन को अभी-अभी थियेटर ले गए हैं। हँसकर, साहस और आत्म-विश्वास के साथ उसने अपने पति और बेटी से विदा ली है। पति जो अभीतक मुस्करा रहा था। प्यार से हाथ सहला-सहलाकर रोजलिन को तसल्ली दे रहा था,  बेटी से आँखें चुराकर आँसू पोंछने लग जाता है। 

                पर बेटी को तो अब आँख चुराने का भी होश नहीं। वह आज जी भरकर रोना चाहती है। उसे तो यह भी पता नहीं कि वह आखिर यूँ लगातार रो भी क्यों रही है ? इसलिए कि उसकी मां बहुत बीमार है या फिर इस खुशी में कि वह अब जल्दी ही ठीक हो जाएगी। बिस्तर पर रक्खे हुए फूल रोजलिन का इन्तजार करते रहेंगे,  वैसे ही जैसे किसी मकबरे पर रक्खे करते हैं-- खूब अच्छी तरह से जानते हुए भी कि शायद नीचे चैन से सोया इन्सान अब कभी नहीं जग पाएगा। पर रोजलिन को तो जगना ही होगा, अपनी मैन्डी की खातिर। फूल सी बिखरी इस खुशनुमा जिन्दगी की खातिर। अभी तो लड़ाई शुरु हुई है। मैरी की बात और है, वह तो थककर सँधिपत्र दे चुकी है। हार चुकी है, नहीं शायद जीत चुकी है। फिसलते कगारों पर टिके पेड़ों सी गिरने से डरना भूल चुकी है।

                वार्ड नँ.  18 अजीब सा कमरा है, डरावना, अजनबी, पर एकबार जान लो, अपना लो, तो आरामदेह हो जाता है।  घर बन जाता है। बिल्कुल जिन्दगी की तरह। शरीर में छुपी अदृश्य आत्मा की तरह,  बेहद दुबली-पतली कृष्-काय पर्ल.. पर्ल जो अपने दुख को मुस्कान में समेटे, हरेक का हालचाल पूछती घूमती रहती है। लगता ही नहीं अभी चन्द दिनों पहले इसका भी ऑपरेशन हुआ है। अपने कार्डों को, फूलों को, एक-एककर बड़े जतन से बार-बार सजाती-सँवारती पर्ल। एक कार्ड अचानक जाने क्या कह जाता है कि हँसती मुस्कुराती पर्ल, गुड़िया सी शिथिल होकर लुढक जाती है। सुबकने लग जाती है। मन करता है जाकर उसके आँसू पोंछूँ, कुछ कहूँ पर पैर जमीन से जुड़ गए हैं। दुख और नदी, दोनों बस बहना ही जानते हैं। भला कौन छीन पाया है उनके इस अधिकार को। और शायद इस बहाव को रोकने से बाढ़ भी तो आ सकती है ? अचानक बेटे-बेटियों और शुभ-चिन्तकों का एक हुजूम, फूलों और मुस्कानों से लदा-फँदा पर्ल का हालचाल लेने आ जाता है। और पर्ल वैसे ही अपनी अलौकिक मुस्कान से उनका स्वागत करती है। वैसे भी सुना तो यही है कि देवदूत कभी नहीं रोते।

                चारो तरफ दुख और दर्द का हुजूम, अजीब सा माहौल है। वही एक जानी-पहचानी कहानी। पँख नुची मुर्गियें सी आहत जिन्दगी, ठीक होने के इन्तजार और उत्कँठा में बेचैन छटपटाती। इधर-उधर दौड़ती-भागती। मन कराहता है इस शरीर से सारे रिश्ते तोड़ लो। पर अगले पल ही हाथ दर्द की गोलियों की तरफ खुद ब खुद बढ़ जाता है।

                ' बस आज और दर्द बर्दाश्त कर लो, कल सब ठीक हो जाएगा।' नर्स कह रही है।

शब्द जाने-पहचाने जरूर हैं पर जाने क्यों अब बेईमान लग रहे हैं।

' फिकर मत करो बहुत मामूली सी तकलीफ है। '

'  फिकर' , फिकर तो यहाँ हवा में मक्खन की टिक्की सी जमी पड़ी है। अगर जरा भी नर्म-दिली से सोचो तो स्पष्ट छुरी सा काट सकते हो उसे। यह बात दूसरी है कि अगले पल ही मक्खन सी पकड़ से फिसलकर बह भी जाएगी। बस एक हमदर्द मुस्कान की उष्मा में, एक आश्वासित स्पर्श के नीचे।

                पर दर्द तो सिर्फ महसूस किया जा सकता है, न। महसूस करने के लिए दर्द से गुजरना होता है और चाहकर कोई भी दर्द से गुजरना नहीं चाहता। पोर्कीपाइन सी अपनी बाँह को सहलाते-खुजाते मैं सोच रही हूँ अब कौन सा कोना बचा है जहाँ अगला इँजेक्शन लगाएगी यह नर्स। पर परेशान होने की जरूरत नहीं, नर्स झट कुछ ढूँढ ही लेती है और पचासों गाठों जैसी दुखती गुठलियों में एक नयी गुठली और शामिल हो जाती है।

 'कसकर पकड़ी रहो, बाद में अपने मित्रों को दिखाना कि देखो मुझे कितनी सूइयाँ लगी हैं', नर्स मुस्कुराकर कहती है।

' दिखाना' , किसे दिखाना ? यहाँ, जहाँ आदमी बन्द आँखों से चलता है, कौन देखेगा और क्या देखेगा ?

                छोटी-सी गुड़िया-सी वैलरी चुपचाप सबका दर्द महसूस कर रही है, बाँट रही है। रात में दबे पाँव आकर हर ड्रिप और खाली सैलाइन के बैगों को बदल जाती है। उघड़े कम्बलों को उढ़ा जाती है। गिरे तकियों को फिर से सिराहने लगा जाती है। शायद किसी दर्द में थोड़ी राहत मिले। कोई उलझी डोर सुलझ जाए।

                रोड-रोलर सी सारा भी बार-बार सब देख जाती है। सबकुछ एक व्यवस्थित तरीके से ही तो चल रहा है फिर अक्सर क्यों अँधेरी छतों पर कराहती ये परछाइयाँ चुगली कर देती हैं, मुँह चिढ़ा जाती हैं ?

 ' तुम्हारी व्यवस्था ठीक है पर हम चाहें तो एक पल में ही किसी शैतान बच्चे सा यह सारा खेल बिगाड़ सकते हैं ' कहजाती हैं।     

                माना अस्पताल डरावनी जगहें हैं पर ये अस्पताल आत्मीय जगहें भी तो बन सकती हैं अगर हम लोगों को जान लें, अपना लें, बिल्कुल जिन्दगी की तरह। हर पीड़ा एक दृष्टि देती है। दृष्टि जो देख सकती है। आत्मसात् कर सकती है। हमें विध्वँस और पलायन के मार्ग बताती है। कभी-कभी तो जीतना भी सिखाती है। दर्द की तहों को चीरकर पुनः सम्पूर्ण सृजन करना भी सिखाती है । और फिर जैसे हर इतिहास घावों से भरा होता है, घावों का भी तो अपना एक इतिहास होता है। स्मृति-स्मारक सा इन्हें भी तो धोया और चमकाया जा सकता है। पाला और सहेजा जाता है। 

            एक घाव जिसने कभी जिन्दगी का सबसे प्यारा उपहार दिया था आज उसी घाव से निकल कर सब कुछ बाहर आ गया है। एक जादुई थैला, उसका मुँह, मुँह की बन्द सील, सब कुछ। अचानक जब विजय-स्मारक बस मील का एक पत्थर बनकर रह जाए, तब क्या करना चाहिए?  कुछ नहीं शायद... क्या कुछ करने और न करने से कोई ऐतिहासिक महत्व घट या बढ़ जाता है ? आनन्द और दर्द से जुड़ी हर अदृश्य डोरी तो शायद जीवन से जुड़ी होती है। यादें बन रग-रग में रक्त सी दौड़ती है। शिराओं में वक्त-बेवक्त बिजली सी कड़कती है । चाहे अनचाहे आँखों से बेबक्त की बरसात-सी बहती है। पर होठों पर हठीली मुस्कान सी बैठी गुनगुनाती भी तो यही है।


        देख रही हूं, अचानक वार्ड में एक हलचल सी हो गई है। कई नर्सें एक साथ मैरी के बिस्तर की तरफ दौड़ पड़ी हैं। उसके बिस्तर के चारो तरफ परदा खींच दिया गया है। उसे सबसे काट और अलग कर दिया गया है। क्या मैरी गयी--- मन फिर डरता है। अस्पताल कितनी निराशामय और दुखपूर्ण जगह है। कैसे रह पाते हैं यह डॉ. और नर्सें यहाँ चौबीसों घँटे, इसी माहौल में ?

        सहमी आँखें फिर से मैरी के बिस्तर की तरफ ही चली जाती हैं। बिस्तर साफ-सुथरा और खाली है... नये मरीज के इन्तजार में।... 

मैरी शायद हॉस्पिस चली गई।... या फिर शायद..?.मन अब आगे और सोचना नहीं चाहता। ठीक ही तो है, ज्यादा जुड़ना भी तो ठीक नहीं,  जीवन की तरह... गुलदान में बिस्तर के पीछे रक्खे मैरी के इन फूलों की तरह, जो अब एक नये मरीज को राहत देने के लिए तैयार हैं।  

                                                                                                                      मई-2000  

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                                                                                                                                           कहानी धरोहर


                                                                                                                           - आचार्य चतुरसेन शास्त्री   

                    नामालूम सी एक खता 

गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतखाने में चले आए थे।

रात दूध में नहा रही थी। दूर के पहाडों की चोटियाँ बर्फ से सफेद होकर चाँदनी में बहार दिखा रही थीं। आरामबाग के महलों के नीचे पहाडी नदी बल खाकर बह रही थी। मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था और उसकी खुली खिडकी के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी।

खुले हुए बाल उसकी फिरोजी रंग की ओढनी पर खेल रहे थे। चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुँथी हुई फिरोजी रंग की ओढनी पर, कसी कमखाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर अंगूर के बराबर बडे मोतियों की माला झूम रही थी। सलीमा का रंग भी मोती के समान था। उसकी देह की गठन निराली थी। संगमरमर के समान पैरों में जरी के काम के जूते पडे थे, जिन पर दो हीरे दक-दक चमक रहे थे।

कमरे में एक कीमती ईरानी कालीन का फर्श बिछा हुआ था, जो पैर रखते ही हाथ-भर नीचे धँस जाता था। सुगंधित मसालों से बने शमादान जल रहे थे। कमरे में चार पूरे कद के आईने लगे थे। संगमरमर के आधारों पर सोने-चाँदी के फूलदानों में ताजे फूलों के गुलदस्ते रखे थे। दीवारों और दरवाजों पर चतुराई से गुँथी हुई नागकेसर और चम्पे की मालाएँ झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था। कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरी की देश-विदेश की वस्तुएँ करीने से सजी हुई थीं।

बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे। इतनी रात होने पर भी नहीं आए थे। सलीमा खिडकी में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। सलीमा ने उकताकर दस्तक दी। एक बांदी दस्तबस्ता हाजिर हुई।

बांदी सुंदर और कमसिन थी। उसे पास बैठने का हुक्म देकर सलीमा ने कहा-

'साकी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बाँसुरी?

बांदी ने नम्रता से कहा- हुजूर जिसमें खुश हों।

सलीमा ने कहा- पर तू किसमें खुश है?

बांदी ने कम्पित स्वर में कहा- सरकार! बांदियों की खुशी ही क्या!

सलीमा हँसते-हँसते लोट गई। बांदी ने बंशी लेकर कहा- क्या सुनाऊँ?

बेगम ने कहा- ठहर, कमरा बहुत गरम मालूम देता है, इसके तमाम दरवाजे और खिडकियाँ खोल दे। चिरागों को बुझा दे, चटखती चाँदनी का लुत्फ उठाने दे और वे फूलमालाएँ मेरे पास रख दे।

बांदी उठी। सलीमा बोली- सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूँ।

बांदी ने सोने के गिलास में खुशबूदार शरबत बेगम के सामने ला धरा। बेगम ने कहा- उफ्! यह तो बहुत गर्म है। क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?

बांदी ने नम्रता से कहा- दिया तो है सरकार!

'अच्छा, इसमें थोडा सा इस्तम्बोल और मिला।

साकी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई। इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज मिलाई। फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के सामने ला धरा।

एक ही साँस में उसे पीकर बेगम ने कहा- अच्छा, अब सुनो। तूने कहा था कि तू मुझे प्यार करती है; सुना, कोई प्यार का ही गाना सुना।

इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढकाकर मदमाती सलीमा उस कोमल मखमली मसनद पर खुद भी लुढक गई और रस-भरे नेत्रों से साकी की ओर देखने लगी। साकी ने बंशी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया :

दुखवा मैं कासे कँ मोरी सजनी...

बहुत देर तक साकी की बंशी कंठ ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही। धीरे-धीरे साकी खुद भी रोने लगी। साकी मदिरा और यौवन के नशे में चूर होकर झूमने लगी।

गीत खत्म करके साकी ने देखा, सलीमा बेसुध पडी है। शराब की तेजी से उसके गाल एकदम सुर्ख हो गए हैं और और ताम्बुल-राग रंजित होंठ रह-रहकर फडक रहे हैं। साँस की सुगंध से कमरा महक रहा है। जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती काँपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे काँप रहा है। प्रस्वेद की बूँदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं।

बंशी रखकर साकी क्षण भर बेगम के पास आकर खडी हुई। उसका शरीर काँपा, ऑंखें जलने लगी, कंठ सूख गया। वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आंचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी। इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुँह चूम लिया।

फिर ज्यों ही उसने अचानक ऑंख उठाकर देखा, तो पाया खुद दीन-दुनिया के मालिक शाहजहाँ खडे उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं।

साकी को साँप डस गया। वह हतबुध्दि की तरह बादशाह का मुँह ताकने लगी। बादशाह ने कहा- तू कौन है? और यह क्या कर रही थी?

साकी चुप खडी रही। बादशाह ने कहा- जवाब दे!

साकी ने धीमे स्वर में कहा- जहाँपनाह- कनीज अगर कुछ जवाब न दे, तो?

बादशाह सन्नाटे में आ गए- बांदी की इतनी हिम्मत?

उन्होंने फिर कहा- मेरी बात का जवाब नहीं? अच्छा, तुझे निर्वस्त्र करके कोडे लगाए जाएँगे।!

साकी ने अकम्पित स्वर में कहा- मैं मर्द हूँ।

बादशाह की ऑंखों में सरसों फूल उठी। उन्होंने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की ओर देखा। वह बेसुध पडी सो रही थी। उसी तरह उसका भरा यौवन खुला पडा था। उनके मुँह से निकला- उफ्! फाहशा! और तत्काल उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया। फिर उन्होंने कहा- दोजख के कुत्ते! तेरी यह मजाल!

फिर कठोर स्वर से पुकारा- मादूम!

एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खडी हुई। बादशाह ने हुक्म दिया- इस मरदूद को तहखाने में डाल दे, ताकि बिना खाए-पिए मर जाए।

मादूम ने अपने कर्कश हाथों से युवक का हाथ पकडा और ले चली। थोडी देर बाद दोनों एक लोहे के मजबूत दरवाजे के पास आ खडे हुए। तातारी बांदी ने चाभी निकाल दरवाजा खोला और कैदी को भीतर ढकेल दिया। कोठरी की गच कैदी का बोझ ऊपर पडते ही काँपती हुई नीचे धसकने लगी!

प्रभात हुआ। सलीमा की बेहोशी दूर हुई। चौंककर उठ बैठी। बाल सँवारने, ओढनी ठीक की और चोली के बटन कसने को आईने के सामने जा खडी हुई। खिडकियाँ बंद थीं। सलीमा ने पुकारा- साकी! प्यारी साकी! बडी गर्मी है, जरा खिडकी तो खोल दे। निगोडी नींद ने तो आज गजब ढा दिया। शराब कुछ तेज थी।

किसी ने सलीमा की बात न सुनी। सलीमा ने जरा जोर से पुकारा- साकी!

जवाब न पाकर सलीमा हैरान हुई। वह खुद खिडकी खोलने लगी। मगर खिडकियाँ बाहर से बंद थीं। सलीमा ने विस्मय से मन-ही-मन कहा क्या बात है लौंडियाँ सब क्या हुईं?

वह द्वार की तरफ चली। देखा, एक तातारी बांदी नंगी तलवार लिए पहरे पर मुस्तैद खडी है। बेगम को देखते ही उसने सिर झुका लिया।

सलीमा ने क्रोध से कहा- तुम लोग यहाँ क्यों हो?

'बादशाह के हुक्म से।

'क्या बादशाह आ गए।

'जी हाँ।

'मुझे इत्तिला क्यों नहीं की?

'हुक्म नहीं था।

'बादशाह कहाँ हैं?

'जीनतमहल के दौलतखाने में।

सलीमा के मन में अभिमान हुआ। उसने कहा- ठीक है, खूबसूरती की हाट में जिनका कारबार है, वे मुहब्बत को क्या समझेंगे? तो अब जीनतमहल की किस्मत खुली?

तातारी स्त्री चुपचाप खडी रही। सलीमा फिर बोली- मेरी साकी कहाँ है?

'कैद में।

'क्यों?

'जहाँपनाह का हुक्म।

'उसका कुसूर क्या था?

'मैं अर्ज नहीं कर सकती।

'कैदखाने की चाभी मुझे दे, मैं अभी उसे छुडाती हूँ।

'आपको अपने कमरे से बाहर जाने का हुक्म नहीं है।

'तब क्या मैं भी कैद हूँ?

 

'जी हाँ।
सलीमा की ऑंखों में ऑंसू भर आए। वह लौटकर मसनद पर गड गई और फूट-फूटकर रोने लगी। कुछ ठहरकर उसने एक खत लिखा :

'हुजूर! कुसूर माफ फर्मावें। दिनभर थकी होने से ऐसी बेसुध सो गई कि हुजूर के इस्तकबाल में हाजिर न रह सकी। और मेरी उस लौंडी को भी जाँ बख्शी की जाए। उसने हुजूर के दौलतखाने में लौट आने की इत्तला मुझे वाजिबी तौर पर न देकर बेशक भारी कुसूर किया है। मगर वह नई कमसिन, गरीब और दुखिया है।

- कनीज

सलीमा

चिट्ठी बादशाह के पास भेज दी गई। बादशाह ने आगे होकर कहा- लाई क्या है?

बांदी ने दस्तबस्ता अर्ज की- खुदावन्द! सलीमा बीबी की अर्जी है!

बादशाह ने गुस्से से होंठ चबाकर कहा- उससे कह दे कि मर जाए! इसके बाद खत में एक ठोकर मारकर उन्होंने उधर से मुँह फेर लिया।

बांदी सलीमा के पास लौट आई। बादशाह का जवाब सुनकर सलीमा धरती पर बैठ गई। उसने बांदी को बाहर जाने का हुक्म दिया और दरवाजा बंद करके फूट-फूटकर रोई। घंटों बीत गए, दिन छिपने लगा। सलीमा ने कहा- हाय! बादशाहों की बेगम होना भी क्या बदनसीबी है। इंतजारी करते-करते ऑंखें फूट जाएँ, मिन्नतें करते-करते जबान घिस जाए, अदब करते-करते जिस्म टुकडे-टकडे हो जाए फिर भी इतनी सी बात पर कि मैं जरा सो गई, उनके आने पर जग न सकी, इतनी सजा! इतनी बेइज्जती! तब मैं बेगम क्या हुई? जीनत और बांदियाँ सुनेंगी तो क्या कहेंगी? इस बेइज्जती के बाद मुँह दिखाने लायक कहाँ रही? अब तो मरना ही ठीक है। अफसोस- मैं किसी गरीब किसान की औरत क्यों न हुई!

धीरे-धीरे स्त्रीत्व का तेज उसकी आत्मा में उदय हुआ। गर्व और दृढ प्रतिज्ञा के चिन्ह उसके नेत्रों में छा गए। वह साँपिन की तरह चपेट खाकर उठ खडी हुई। उसने एक और खत लिखा:

'दुनिया के मालिक!

आपकी बीवी और कनीज होने की वजह से मैं आपके हुक्म को मानकर मरती हूँ। इतनी बेइज्जती पाकर एक मलिका का मरना ही मुनासिब भी है। मगर इतने बडे बादशाह को औरतों को इस कदर नाचीज तो न समझना चाहिए कि एक अदनी-सी बेवकूफी की इतनी कडी सजा दी जाए। मेरा कुसूर सिर्फ इतना ही था कि मैं बेखबर सो गई थी। खैर, सिर्फ एक बार हुजूर को देखने की ख्वाहिश लेकर मरती हूँ। मैं उस पाक परवरदिगार के पास जाकर अर्ज करूँगी कि वह मेरे शौहर को सलामत रखे।

-सलीमा

खत को इत्र से सुवासित करके ताजे फूलों के एक गुलदस्ते में इस तरह रख दिया कि जिससे किसी कि उस पर फौरन ही नजर पड जाए। इसके बाद उसने जवाहरात की पेटी से एक बहुमूल्य अँगूठी निकाली और कुछ देर तक ऑंखें गडा-गडाकर उसे देखती रही। फिर उसे चाट गई।

बादशाह शाम की हवाखोरी को नजरबाग में टहल रहे थे। दो-तीन खोजे घबराए हुए आए और चिट्ठी पेश करके अर्ज की- हुजूर गजब हो गया! सलीमा बीबी ने जहर खा लिया है और वह मर रही हैं!

क्षण-भर में बादशाह ने खत पढ लिया। झपटे हुए सलीमा के महल पहुँचे। प्यारी दुलहिन सलीमा जमीन पर पडी है। ऑंखें ललाट पर चढ गई हैं। रंग कोयले के समान हो गया है। बादशाह से न रहा गया। उन्होंने घबराकर कहा- हकीम, हकीम को बुलाओ! कई आदमी दौडे।

बादशाह का शब्द सुनकर सलीमा ने उसकी तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा- जहे-किस्मत!

बादशाह ने नजदीक बैठकर कहा- सलीमा! बादशाह की बेगम होकर क्या तुम्हें यही लाजिम था?

सलीमा ने कष्ट से कहा- हुजूर! मेरा कुसूर बहुत मामूली था।

बादशाह ने कडे स्वर में कहा- बदनसीब! शाही जनानखाने में मर्द को भेष बदलकर रखना मामूली कुसूर समझती है? कानों पर यकीन कभी न करता, मगर ऑंखों-देखी को भी झूठ मान लूँ?

तडफकर सलीमा ने कहा- क्या?

बादशाह डरकर पीछे हट गए। उन्होंने कहा- सच कहो, इस वक्त तुम खुदा की राह पर हो, यह जवान कौन था?

सलीमा ने अचकचाकर पूछा- कौन जवान?

बादशाह ने गुस्से से कहा- जिसे तुमने साकी बनाकर पास रखा था।

सलीमा ने घबराकर कहा- हैं! क्या वह मर्द है?

बादशाह- तो क्या तुम सचमुच यह बात नहीं जानतीं?

सलीमा के मुँह से निकला- या खुदा!

फिर उसके नेत्रों से ऑंसू बहने लगे। वह सब मामला समझ गई। कुछ देर बाद बोली- खाविन्द! तब तो कुछ शिकायत ही नहीं; इस कुसूर को तो यही सजा मुनासिब थी। मेरी बदगुमानी माफ फर्माई जाए। मैं अल्लाह के नाम पर पडी कहती हूँ, मुझे इस बात का कुछ भी पता नहीं है।

बादशाह का गला भर आया। उन्होंने कहा- तो प्यारी सलीमा! तुम बेकुसूर ही चलीं? - बादशाह रोने लगे।

सलीमा ने उनका हाथ पकडकर अपनी छाती पर रखकर कहा- मालिक मेरे! जिसकी उम्मीद न थी, मरते वक्त वह मजा मिल गया। कहा-सुना माफ हो और एक अर्ज लौंडी की मंजूर हो।

बादशाह ने कहा- जल्दी कहो सलीमा!

सलीमा ने साहस से कहा- उस जवान को माफ कर देना।

इसके बाद सलीमा की ऑंखों से ऑंसू बह चले, और थोडी ही देर में वह ठंडी हो गई।!

बादशाह ने घुटनों के बल बैठकर उसका ललाट चूमा और फिर बालक की तरह रोने लगे।

गजब के अंधेरे और सर्दी में युवक भूखा-प्यासा पडा था। एकाएक घोर चीत्कार करके किवाड खुले। प्रकाश के साथ ही एक गंभीर शब्द तहखाने में भर गया- बदनसीब नौजवान! क्या होश-हवास में है?

युवक ने तीव्र स्वर में पूछा- कौन?

जवाब मिला- बादशाह।

युवक ने कुछ भी अदब किए बिना कहा- यह जगह बादशाहों के लायक नहीं है। क्यों तशरीफ लाए हैं?

'तुम्हारी कैफियत नहीं सुनी थी, उसे सुनने आया हूँ।




कुछ देर चुप रहकर युवक ने कहा- सिर्फ सलीमा को झूठी बदनामी से बचाने के लिए कैफियत देता हूँ। सुनिए : सलीमा जब बच्ची थी, मैं उसके बाप का नौकर था। तभी से मैं उसे प्यार करता था। सलीमा भी प्यार करती थी, पर वह बचपन का प्यार था। उम्र होने पर सलीमा पर्दे में रहने लगी और फिर वह शहंशाह की बेगम हुई। मगर मैं उसे भूल न सका। पाँच साल तक पागल की तरह भटकता रहा, अंत में भेष बदलकर बांदी की नौकरी कर ली। सिर्फ उसे देखते रहने और खिदमत करके दिन गुजारने का इरादा था। उस दिन उज्ज्वल चाँदनी, सुगंधित पुष्पराशि, शराब की उत्तेजना और एकांत ने मुझे बेबस कर दिया। उसके बाद मैंने ऑंचल से उसके मुख का पसीना पोंछा और मुँह चूम लिया। मैं इतना ही खतावार हूँ। सलीमा इसकी बाबद कुछ नहीं जानती।

बादशाह कुछ देर चुपचाप खडे रहे। इसके बाद वे बिना दरवाजा बंद किए ही धीरे-धीरे चले गए।



सलीमा की मृत्यु को दस दिन बीत गए। बादशाह सलीमा के कमरे में ही दिन-रात रहते हैं। सामने नदी के उस पार पेडों के झुरमुट में सलीमा की सफेद कब्र बनी है। जिस खिडकी के पास सलीमा बैठी उस दिन-रात को बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी, उसी खिडकी में उसी चौकी पर बैठे हुए बादशाह उसी तरह सलीमा की कब्र दिन-रात देखा करते हैं। किसी को पास आने का हुक्म नहीं। जब आधी रात हो जाती है, तो उस गंभीर रात्रि के सन्नाटे में एक मर्म भेदिनी गीतध्वनि उठ खडी होती है। बादशाह साफ-साफ सुनते हैं, कोई करुण-कोमल स्वर में गा रहा है.. 'दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी...

                    नामालूम सी एक खता 
गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतखाने में चले आए थे।

रात दूध में नहा रही थी। दूर के पहाडों की चोटियाँ बर्फ से सफेद होकर चाँदनी में बहार दिखा रही थीं। आरामबाग के महलों के नीचे पहाडी नदी बल खाकर बह रही थी। मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था और उसकी खुली खिडकी के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी।

खुले हुए बाल उसकी फिरोजी रंग की ओढनी पर खेल रहे थे। चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुँथी हुई फिरोजी रंग की ओढनी पर, कसी कमखाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर अंगूर के बराबर बडे मोतियों की माला झूम रही थी। सलीमा का रंग भी मोती के समान था। उसकी देह की गठन निराली थी। संगमरमर के समान पैरों में जरी के काम के जूते पडे थे, जिन पर दो हीरे दक-दक चमक रहे थे।

कमरे में एक कीमती ईरानी कालीन का फर्श बिछा हुआ था, जो पैर रखते ही हाथ-भर नीचे धँस जाता था। सुगंधित मसालों से बने शमादान जल रहे थे। कमरे में चार पूरे कद के आईने लगे थे। संगमरमर के आधारों पर सोने-चाँदी के फूलदानों में ताजे फूलों के गुलदस्ते रखे थे। दीवारों और दरवाजों पर चतुराई से गुँथी हुई नागकेसर और चम्पे की मालाएँ झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था। कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरी की देश-विदेश की वस्तुएँ करीने से सजी हुई थीं।

बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे। इतनी रात होने पर भी नहीं आए थे। सलीमा खिडकी में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। सलीमा ने उकताकर दस्तक दी। एक बांदी दस्तबस्ता हाजिर हुई।

बांदी सुंदर और कमसिन थी। उसे पास बैठने का हुक्म देकर सलीमा ने कहा-

'साकी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बाँसुरी?

बांदी ने नम्रता से कहा- हुजूर जिसमें खुश हों।

सलीमा ने कहा- पर तू किसमें खुश है?

बांदी ने कम्पित स्वर में कहा- सरकार! बांदियों की खुशी ही क्या!

सलीमा हँसते-हँसते लोट गई। बांदी ने बंशी लेकर कहा- क्या सुनाऊँ?

बेगम ने कहा- ठहर, कमरा बहुत गरम मालूम देता है, इसके तमाम दरवाजे और खिडकियाँ खोल दे। चिरागों को बुझा दे, चटखती चाँदनी का लुत्फ उठाने दे और वे फूलमालाएँ मेरे पास रख दे।

बांदी उठी। सलीमा बोली- सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूँ।

बांदी ने सोने के गिलास में खुशबूदार शरबत बेगम के सामने ला धरा। बेगम ने कहा- उफ्! यह तो बहुत गर्म है। क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?

बांदी ने नम्रता से कहा- दिया तो है सरकार!

'अच्छा, इसमें थोडा सा इस्तम्बोल और मिला।

साकी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई। इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज मिलाई। फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के सामने ला धरा।

एक ही साँस में उसे पीकर बेगम ने कहा- अच्छा, अब सुनो। तूने कहा था कि तू मुझे प्यार करती है; सुना, कोई प्यार का ही गाना सुना।

इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढकाकर मदमाती सलीमा उस कोमल मखमली मसनद पर खुद भी लुढक गई और रस-भरे नेत्रों से साकी की ओर देखने लगी। साकी ने बंशी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया :

दुखवा मैं कासे कँ मोरी सजनी...

बहुत देर तक साकी की बंशी कंठ ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही। धीरे-धीरे साकी खुद भी रोने लगी। साकी मदिरा और यौवन के नशे में चूर होकर झूमने लगी।

गीत खत्म करके साकी ने देखा, सलीमा बेसुध पडी है। शराब की तेजी से उसके गाल एकदम सुर्ख हो गए हैं और और ताम्बुल-राग रंजित होंठ रह-रहकर फडक रहे हैं। साँस की सुगंध से कमरा महक रहा है। जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती काँपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे काँप रहा है। प्रस्वेद की बूँदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं।

बंशी रखकर साकी क्षण भर बेगम के पास आकर खडी हुई। उसका शरीर काँपा, ऑंखें जलने लगी, कंठ सूख गया। वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आंचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी। इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुँह चूम लिया।

फिर ज्यों ही उसने अचानक ऑंख उठाकर देखा, तो पाया खुद दीन-दुनिया के मालिक शाहजहाँ खडे उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं।

साकी को साँप डस गया। वह हतबुध्दि की तरह बादशाह का मुँह ताकने लगी। बादशाह ने कहा- तू कौन है? और यह क्या कर रही थी?

साकी चुप खडी रही। बादशाह ने कहा- जवाब दे!

साकी ने धीमे स्वर में कहा- जहाँपनाह- कनीज अगर कुछ जवाब न दे, तो?

बादशाह सन्नाटे में आ गए- बांदी की इतनी हिम्मत?

उन्होंने फिर कहा- मेरी बात का जवाब नहीं? अच्छा, तुझे निर्वस्त्र करके कोडे लगाए जाएँगे।!

साकी ने अकम्पित स्वर में कहा- मैं मर्द हूँ।

बादशाह की ऑंखों में सरसों फूल उठी। उन्होंने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की ओर देखा। वह बेसुध पडी सो रही थी। उसी तरह उसका भरा यौवन खुला पडा था। उनके मुँह से निकला- उफ्! फाहशा! और तत्काल उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया। फिर उन्होंने कहा- दोजख के कुत्ते! तेरी यह मजाल!

फिर कठोर स्वर से पुकारा- मादूम!

एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खडी हुई। बादशाह ने हुक्म दिया- इस मरदूद को तहखाने में डाल दे, ताकि बिना खाए-पिए मर जाए।

मादूम ने अपने कर्कश हाथों से युवक का हाथ पकडा और ले चली। थोडी देर बाद दोनों एक लोहे के मजबूत दरवाजे के पास आ खडे हुए। तातारी बांदी ने चाभी निकाल दरवाजा खोला और कैदी को भीतर ढकेल दिया। कोठरी की गच कैदी का बोझ ऊपर पडते ही काँपती हुई नीचे धसकने लगी!

प्रभात हुआ। सलीमा की बेहोशी दूर हुई। चौंककर उठ बैठी। बाल सँवारने, ओढनी ठीक की और चोली के बटन कसने को आईने के सामने जा खडी हुई। खिडकियाँ बंद थीं। सलीमा ने पुकारा- साकी! प्यारी साकी! बडी गर्मी है, जरा खिडकी तो खोल दे। निगोडी नींद ने तो आज गजब ढा दिया। शराब कुछ तेज थी।

किसी ने सलीमा की बात न सुनी। सलीमा ने जरा जोर से पुकारा- साकी!

जवाब न पाकर सलीमा हैरान हुई। वह खुद खिडकी खोलने लगी। मगर खिडकियाँ बाहर से बंद थीं। सलीमा ने विस्मय से मन-ही-मन कहा क्या बात है लौंडियाँ सब क्या हुईं?

वह द्वार की तरफ चली। देखा, एक तातारी बांदी नंगी तलवार लिए पहरे पर मुस्तैद खडी है। बेगम को देखते ही उसने सिर झुका लिया।

सलीमा ने क्रोध से कहा- तुम लोग यहाँ क्यों हो?

'बादशाह के हुक्म से।

'क्या बादशाह आ गए।

'जी हाँ।

'मुझे इत्तिला क्यों नहीं की?

'हुक्म नहीं था।

'बादशाह कहाँ हैं?

'जीनतमहल के दौलतखाने में।

सलीमा के मन में अभिमान हुआ। उसने कहा- ठीक है, खूबसूरती की हाट में जिनका कारबार है, वे मुहब्बत को क्या समझेंगे? तो अब जीनतमहल की किस्मत खुली?

तातारी स्त्री चुपचाप खडी रही। सलीमा फिर बोली- मेरी साकी कहाँ है?

'कैद में।

'क्यों?

'जहाँपनाह का हुक्म।

'उसका कुसूर क्या था?

'मैं अर्ज नहीं कर सकती।

'कैदखाने की चाभी मुझे दे, मैं अभी उसे छुडाती हूँ।

'आपको अपने कमरे से बाहर जाने का हुक्म नहीं है।

'तब क्या मैं भी कैद हूँ?

 

'जी हाँ।
सलीमा की ऑंखों में ऑंसू भर आए। वह लौटकर मसनद पर गड गई और फूट-फूटकर रोने लगी। कुछ ठहरकर उसने एक खत लिखा :

'हुजूर! कुसूर माफ फर्मावें। दिनभर थकी होने से ऐसी बेसुध सो गई कि हुजूर के इस्तकबाल में हाजिर न रह सकी। और मेरी उस लौंडी को भी जाँ बख्शी की जाए। उसने हुजूर के दौलतखाने में लौट आने की इत्तला मुझे वाजिबी तौर पर न देकर बेशक भारी कुसूर किया है। मगर वह नई कमसिन, गरीब और दुखिया है।

- कनीज

सलीमा

चिट्ठी बादशाह के पास भेज दी गई। बादशाह ने आगे होकर कहा- लाई क्या है?

बांदी ने दस्तबस्ता अर्ज की- खुदावन्द! सलीमा बीबी की अर्जी है!

बादशाह ने गुस्से से होंठ चबाकर कहा- उससे कह दे कि मर जाए! इसके बाद खत में एक ठोकर मारकर उन्होंने उधर से मुँह फेर लिया।

बांदी सलीमा के पास लौट आई। बादशाह का जवाब सुनकर सलीमा धरती पर बैठ गई। उसने बांदी को बाहर जाने का हुक्म दिया और दरवाजा बंद करके फूट-फूटकर रोई। घंटों बीत गए, दिन छिपने लगा। सलीमा ने कहा- हाय! बादशाहों की बेगम होना भी क्या बदनसीबी है। इंतजारी करते-करते ऑंखें फूट जाएँ, मिन्नतें करते-करते जबान घिस जाए, अदब करते-करते जिस्म टुकडे-टकडे हो जाए फिर भी इतनी सी बात पर कि मैं जरा सो गई, उनके आने पर जग न सकी, इतनी सजा! इतनी बेइज्जती! तब मैं बेगम क्या हुई? जीनत और बांदियाँ सुनेंगी तो क्या कहेंगी? इस बेइज्जती के बाद मुँह दिखाने लायक कहाँ रही? अब तो मरना ही ठीक है। अफसोस- मैं किसी गरीब किसान की औरत क्यों न हुई!

धीरे-धीरे स्त्रीत्व का तेज उसकी आत्मा में उदय हुआ। गर्व और दृढ प्रतिज्ञा के चिन्ह उसके नेत्रों में छा गए। वह साँपिन की तरह चपेट खाकर उठ खडी हुई। उसने एक और खत लिखा:

'दुनिया के मालिक!

आपकी बीवी और कनीज होने की वजह से मैं आपके हुक्म को मानकर मरती हूँ। इतनी बेइज्जती पाकर एक मलिका का मरना ही मुनासिब भी है। मगर इतने बडे बादशाह को औरतों को इस कदर नाचीज तो न समझना चाहिए कि एक अदनी-सी बेवकूफी की इतनी कडी सजा दी जाए। मेरा कुसूर सिर्फ इतना ही था कि मैं बेखबर सो गई थी। खैर, सिर्फ एक बार हुजूर को देखने की ख्वाहिश लेकर मरती हूँ। मैं उस पाक परवरदिगार के पास जाकर अर्ज करूँगी कि वह मेरे शौहर को सलामत रखे।

-सलीमा

खत को इत्र से सुवासित करके ताजे फूलों के एक गुलदस्ते में इस तरह रख दिया कि जिससे किसी कि उस पर फौरन ही नजर पड जाए। इसके बाद उसने जवाहरात की पेटी से एक बहुमूल्य अँगूठी निकाली और कुछ देर तक ऑंखें गडा-गडाकर उसे देखती रही। फिर उसे चाट गई।

बादशाह शाम की हवाखोरी को नजरबाग में टहल रहे थे। दो-तीन खोजे घबराए हुए आए और चिट्ठी पेश करके अर्ज की- हुजूर गजब हो गया! सलीमा बीबी ने जहर खा लिया है और वह मर रही हैं!

क्षण-भर में बादशाह ने खत पढ लिया। झपटे हुए सलीमा के महल पहुँचे। प्यारी दुलहिन सलीमा जमीन पर पडी है। ऑंखें ललाट पर चढ गई हैं। रंग कोयले के समान हो गया है। बादशाह से न रहा गया। उन्होंने घबराकर कहा- हकीम, हकीम को बुलाओ! कई आदमी दौडे।

बादशाह का शब्द सुनकर सलीमा ने उसकी तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा- जहे-किस्मत!

बादशाह ने नजदीक बैठकर कहा- सलीमा! बादशाह की बेगम होकर क्या तुम्हें यही लाजिम था?

सलीमा ने कष्ट से कहा- हुजूर! मेरा कुसूर बहुत मामूली था।

बादशाह ने कडे स्वर में कहा- बदनसीब! शाही जनानखाने में मर्द को भेष बदलकर रखना मामूली कुसूर समझती है? कानों पर यकीन कभी न करता, मगर ऑंखों-देखी को भी झूठ मान लूँ?

तडफकर सलीमा ने कहा- क्या?

बादशाह डरकर पीछे हट गए। उन्होंने कहा- सच कहो, इस वक्त तुम खुदा की राह पर हो, यह जवान कौन था?

सलीमा ने अचकचाकर पूछा- कौन जवान?

बादशाह ने गुस्से से कहा- जिसे तुमने साकी बनाकर पास रखा था।

सलीमा ने घबराकर कहा- हैं! क्या वह मर्द है?

बादशाह- तो क्या तुम सचमुच यह बात नहीं जानतीं?

सलीमा के मुँह से निकला- या खुदा!

फिर उसके नेत्रों से ऑंसू बहने लगे। वह सब मामला समझ गई। कुछ देर बाद बोली- खाविन्द! तब तो कुछ शिकायत ही नहीं; इस कुसूर को तो यही सजा मुनासिब थी। मेरी बदगुमानी माफ फर्माई जाए। मैं अल्लाह के नाम पर पडी कहती हूँ, मुझे इस बात का कुछ भी पता नहीं है।

बादशाह का गला भर आया। उन्होंने कहा- तो प्यारी सलीमा! तुम बेकुसूर ही चलीं? - बादशाह रोने लगे।

सलीमा ने उनका हाथ पकडकर अपनी छाती पर रखकर कहा- मालिक मेरे! जिसकी उम्मीद न थी, मरते वक्त वह मजा मिल गया। कहा-सुना माफ हो और एक अर्ज लौंडी की मंजूर हो।

बादशाह ने कहा- जल्दी कहो सलीमा!

सलीमा ने साहस से कहा- उस जवान को माफ कर देना।

इसके बाद सलीमा की ऑंखों से ऑंसू बह चले, और थोडी ही देर में वह ठंडी हो गई।!

बादशाह ने घुटनों के बल बैठकर उसका ललाट चूमा और फिर बालक की तरह रोने लगे।

गजब के अंधेरे और सर्दी में युवक भूखा-प्यासा पडा था। एकाएक घोर चीत्कार करके किवाड खुले। प्रकाश के साथ ही एक गंभीर शब्द तहखाने में भर गया- बदनसीब नौजवान! क्या होश-हवास में है?

युवक ने तीव्र स्वर में पूछा- कौन?

जवाब मिला- बादशाह।

युवक ने कुछ भी अदब किए बिना कहा- यह जगह बादशाहों के लायक नहीं है। क्यों तशरीफ लाए हैं?

'तुम्हारी कैफियत नहीं सुनी थी, उसे सुनने आया हूँ।




कुछ देर चुप रहकर युवक ने कहा- सिर्फ सलीमा को झूठी बदनामी से बचाने के लिए कैफियत देता हूँ। सुनिए : सलीमा जब बच्ची थी, मैं उसके बाप का नौकर था। तभी से मैं उसे प्यार करता था। सलीमा भी प्यार करती थी, पर वह बचपन का प्यार था। उम्र होने पर सलीमा पर्दे में रहने लगी और फिर वह शहंशाह की बेगम हुई। मगर मैं उसे भूल न सका। पाँच साल तक पागल की तरह भटकता रहा, अंत में भेष बदलकर बांदी की नौकरी कर ली। सिर्फ उसे देखते रहने और खिदमत करके दिन गुजारने का इरादा था। उस दिन उज्ज्वल चाँदनी, सुगंधित पुष्पराशि, शराब की उत्तेजना और एकांत ने मुझे बेबस कर दिया। उसके बाद मैंने ऑंचल से उसके मुख का पसीना पोंछा और मुँह चूम लिया। मैं इतना ही खतावार हूँ। सलीमा इसकी बाबद कुछ नहीं जानती।

बादशाह कुछ देर चुपचाप खडे रहे। इसके बाद वे बिना दरवाजा बंद किए ही धीरे-धीरे चले गए।

सलीमा की मृत्यु को दस दिन बीत गए। बादशाह सलीमा के कमरे में ही दिन-रात रहते हैं। सामने नदी के उस पार पेडों के झुरमुट में सलीमा की सफेद कब्र बनी है। जिस खिडकी के पास सलीमा बैठी उस दिन-रात को बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी, उसी खिडकी में उसी चौकी पर बैठे हुए बादशाह उसी तरह सलीमा की कब्र दिन-रात देखा करते हैं। किसी को पास आने का हुक्म नहीं। जब आधी रात हो जाती है, तो उस गंभीर रात्रि के सन्नाटे में एक मर्म भेदिनी गीतध्वनि उठ खडी होती है। बादशाह साफ-साफ सुनते हैं, कोई करुण-कोमल स्वर में गा रहा है.. 'दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी...

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                                                                                                                                           सत्य वार्ता


                                                                                                                                        देवी नागरानी


 मासूम सिसकियाँ

"मां तुम भैया को लेकर कब आओगी? जल्दी आओ ना!" नन्हीं सी तीन साल की उम्र की वो नन्हीं सी कली प्लास्टिक के फ़ोन पर कहे जा रही है. हाँ ! वह प्राची है.

और नील नम आँखों से शून्यता के उस पार देख रहा है जहाँ उसे अपना अस्तित्व, अपने आस पास का घर-संसार और उसमें बसने वाले लोग एक स्वप्न से लग रहे हैं. सिर्फ़ हकीकत के रूप में प्राची का लगातार फ़ोन पर बात का सिलसिला जो अपनी माँ को बार बार आवाज़ देती रही, वही उसे हकीकत की दुनिया में ला रही है. सुनने वाला दर्द को जानता है, पहचानता है, पर ला-दवा उस दर्द को आंसुओं के साथ पी जाना अब उसके बस में नहीं.

" पापा माँ को हस्पताल से ले आओ ना. मुझे माँ पास जाना है पापा..पा.." और उसकी आवाज़ सुबकती सिसकियों की धारा बनकर आस पास के गूँजती रही पल पल, हर पल. आज चौथा दिन था, पर नील और उसके माता-पिता ख़ुद को असमर्थ पा रहे है उस नन्हीं जान को यह बताते हुए कि स्नेहिल उसकी माँ अब नहीं रही. वह हर बन्धन की डोर को तोड़ कर चली गई है और अपने पीछे छोड़ गई है एक बिलखता हुआ क्रंदन!!!

कितने खुश थे वो दोनों- नील और स्नेहिल सबके साथ अपने घर संसार में. प्राची उनकी बगिया की पहली कली, जिसको ३१/२ साल से अपने आँचल की ठंडी छाँव में प्यार से सींचा, पाला और महकने का मौका दिया.

"प्राची अपने भाई को अगले साल राखी बंधेगी ना?" कहती हुई स्नेहिल खुशी से विभोर हो उठती थी. बस अब नौ महीने पूरे होने को थे और उन्हें पता था की आने वाला नव महमान लड़का है. एक सम्पूर्ण परिवार का स्वप्न और अपने आने वाले भविष्य से अनजान वो खुशी के सागर पिए जाते थे, सपनों के नए जाल बुनते जाते थे. ड्यू डेट जुलाई २५ या २६ की मिली हुई थी, पर २३ तारिख को घर में तहलका सा मचा हुआ था. स्नेहिल बिन-जल मछली की तरह मचल रही थी, परिवार के सभी लोग उसे सहलाने की, पुचकारने की कोशिश में लगे थे. हस्पताल फ़ोन लगाया, गाड़ी स्टार्ट हुई और स्नेहिल की ज़िंदगी की रफ़्तार गाड़ी की रफ़्तार से मेल जोल न खाकर हिच्कौले खाने लगी. पिछली सीट पर बेचैनियों से घिरी स्नेहिल को बीच राह में छाती में दर्द का अहसास हुआ, पर नील की माता जी को लगा कि वो प्रसव पीड़ा का अंश है, सो सहलाते पुचकारते हस्पताल पहुंचे, जहाँ वह तुरंत डाक्टरों के हवाले कर दी गई, जहाँ उसे अब आइ.सी. यूं. में ओक्सीजन दिया जा रहा था. बस कुछ पलों में दुखद समाचार देते हुए डाक्टर ने समझाया " कार में उसे जो घुटन हो रही थी, वो लंग्स में ब्लाक आने के कारण थी और बच्चा उसी वक्त ओक्सीजन न मिलने के कारण स्वाँस न ले पाया और......!!!"

नील के पिता जो ख़ुद एक बहुत ही बड़े पद पर नियुक्त एक तजुर्बेकार डॉक्टर थे, सूचना पाते ही कुछ समझकर, तुरंत आठ दस डॉक्टर की टीम मंगाई, एक हेलीकोप्तर को भी एमरजेंसी के लिए तैयार रखवा लिया. अब सभी डॉक्टर स्नेहिल को बचाने की कोशिश में जुट गए सभी. शायद किसी हस्पताल ले जाना पड़े स्नेहिल को, यही सोच कर सब तैयारियाँ हुई.

"पिताजी, माँ को लेकर आप जल्दी आइये, स्नेहिल........" और भारी आवाज़ में नील ने स्नेहिल के माता पिता को शिशू के दुखद समाचार के बारे में बताते हुए परिस्थिति से अवगत कराया. वे कैलिफोर्निया में थे और जल्द से जल्द जो फ्लाईट उन्हें मिली उसे लेकर न्यू यार्क के लिए रवाना हुए. आकुल व्याकुल मन मयूर नाना-नानी बनने के सुनहरे स्वप्न जो बुन चुके थे वे वहीं के वहीं बस निराशा के ढेर बनकर टूटकर बिखरते रहे-".भगवान् करे स्नेही यह सदमा बर्दाश्त कर पाये और संभल जाए ताकि वह अपनी प्राची को भरपूर प्यार के साथ संभाल सके. "


यह प्राची की माँ की फुसफुसाती आवाज़ थी जो शायद भगवान् के कानों तक नहीं पहुँची.

स्नेहिल ख़ुद एक रीसर्च साइंटिस्ट थी और ३७ साल की उम्र में जो नाम और शोहरत उसने पाई वह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात थी. पिता और ससुर दोनों डॉक्टर, नील कंप्यूटर प्रोफ़ेशन का उच्च अधिकारी रहा. घर का माहौल सदा ही खुशियों से महकता रहा और प्राची की तोतली आवाजें और आने वाले बालक की सुखद किलकारियों के आगमन की आशा से सभी बहुत खुश थे और अब...!!

"माँ का गर्भाशय निकलना पड़ा. जो नाल माँ और बच्चे को जोड़ती रही वह टूट गई और खतरे का कोई अंश बाकी न रहे इसलिए यह कदम ज़रूरी था" कहते हुए डॉक्टर ललित फिर थियेटर में वापस चले गये. ज़िंदगी और मौत के झूले में झूल रही थी स्नेहिल और उसके साथ जुड़ी सब की आशाएं और नील साक्षी बना खडा है, चिंतन के धुंध में घिरा हुआ, सिर्फ़ आवाजें, आवाजें और उनकी गूँज थी आसपास. "

"मैं भी चलूंगी आपके साथ" प्राची माँ का पल्लू पकड़ कर कह रही थी. "पापा मुझे भी ले चलो, मैं माँ के साथ जाऊंगी."

जब घर से निकल रहे थे तब स्नेहिल ने पुचकारते हुए अपनी जान प्राची से कहा " बेटा तुम यहीं रहो घर पर, मैं हस्पताल से तुम्हारे भाई को ले आऊँगी."

और अब प्राची का सामना कैसे होगा ? स्नेहिल को कैसे संभाल पाऊँगा? उसके खाली दामन को किस आस से भर पाऊँगा? उल्झनों का ताँता और नम आँखों में तैरती हुई यादों की परछाइयाँ दिल की दहलीज़ पर रूककर भी नहीं रुकी. पत्थरों को शायद किसी ने रोते हुए नहीं देखा है, पर सच मानो उनमें भी धड़कन होती है पर वे खामोशिओं से हर सदमे को झेलते हैं....!

नील की सोच के सिलसिले को पिता के स्नेहिल छुहाव ने पुचकारा

. बेटे के दर्द को, उसके अरमानों के घात को समझ पा रहा था वह, पर मजबूर था. डॉक्टर था, समझ रहा था, जो कभी किताब के पन्नों में पढ़ा, आज ज़ामिन बन कर वही केस उसकी बहु स्नेहिल पर पूरा उतर रहा है रफ़्ता रफ़्ता.

"बेटा ऐसा आजतक नहीं सुना है, और न देखा है कि लंग्स के ब्लाक की वजह से शिशु को और माँ को जान से हाथ धोना पड़ता है, पर पुस्तकों में पढ़ा है. अब दुआएं करो की हमारी स्नेहिल को कुछ न हो!!" कहते हुए पिता फ़िर से थयेटर में अंदर चले गए, जहाँ अभी अभी डा॰ ललित गए.

नील चौकना हो गया. पिताजी यह क्या कह रहे हैं? और उसे एहसास होने लगा उस बेबसी का जो एक लहूलुहान छटपटाहट सी सिहरन बनकर उसके सीने के हर कोण में समा गई. इतने सारे डॉक्टर मिलकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे, स्नेहिल को बचाने की हर मुमकिन कोशिश नाकाम हुई. हाथ जो दुआओं के दर पर उठ रहे थे अब छाती पीट रहे थे. आशा का दामन थाम कर इन्सान रेत पर घरौंदे बनाता है, उन्हें संवारता है, और फिर जब उन्हें बिखरता हुआ देखता है तो सहरा की तपती धूप सी जलन तड़प बन कर उसकी आत्मा के अधर को भी जला देती है. उससे भी ज्यादा पीड़ा दायक रेगिस्तान के बीचों बीच रेत के ढेर पर बनाया हुआ आशियाँ एक ऐसे टीले की तरह होता है, जो डह तो जाता है पर मुठी की पकड़ में नहीं आत. यही बेबसी की चरम सीमा है. आशाओं का दामन हाथ से छूटता चला जाता है, उम्मीदों की सभी किरणें जाने कहाँ लुप्त हो जाती है, और चारों तरफ़ से घेर लेता है मायूसी का अँधेरा. यही हालत थी उस वक्त नील और उसके माता पिता की.

"बेटे तुम माँ को लेकर घर जाओ और प्राची को जाकर संभालो , मैं एअरपोर्ट से तुम्हारे सास-ससुर को लेकर घर आता हूँ." नील के पिता ने उसे सहलाते हुए कहा. दर्द का सैलाब जब जब बहता है तो न जाने क्या क्या डूब जाता है. इन्तिहाये-ग़म अपना चलन नहीं बदलता, हाँ रुख ज़रूर बदल कर बस रुलाता चला जाता है. इस हकीकत को कोई झुठला नहीं सकता कि ज़िंदगी का अंत मौत है, पर ऐसा कठोर उसका मंज़र, उफ़!! देखने पर तो पत्थर भी रो पड़े, दर्द भी सिसकियाँ लेता रहे.

जब प्राची के नाना-नानी आए तो लोगों का जमघट देखा. यह तो पता था शिशु नहीं रहा, पर देर न लगी यह जानने में कि किस बुरी तरह से जिंदगी ने उनके साथ छल करके उन्हें बुरी तरह से पछाड़ दिया है, आगे पाँव धरते ही जो मंज़र आँखों को दिखा....

कास्केड में माँ -स्वरूप स्नेहिल शांत चित सजी-धजी दुल्हनी वेश भूषा से और उसकी गोद में उसका शिशु जो ममता के बिना जी नहीं पाया, दोनों एक निश्चिंत निद्रा की गोद में विश्राम से लेटे थे. दिल को दहलाने वाला यह दृश्य हर सीने पर एक छाप छोड़ गया और आज दस दिन के बाद भी जब एक छटपटाहट मन को झिंझोड़ रही है तो कलम उठाकर अपनी पीड़ा से राहत पाने के लिए दर्द की परिभाषा की गहराइयों में झांकने की फिर से कोशिश कर रही हूँ, जिससे आमना सामना न जाने कितनी बार होता रहा है. कभी मुझे रुलाने में वो कामयाब रहती है, कभी तो खुद भी इस मानव मन की पीड़ा से परेशाँ होकर सिसकने लगती है.


" भगवान् मेरी ही बेटी की जीवन डोर क्यों काट दी" यह क्रंदन स्नेहिल की माँ का था जो वहीं पर बैठी अब अपनी बेटी की छाती पर सोये शिशु को सहलाते हुए अपने ज़ख्म कुरेदने लगी.

आज फ़ोन से पता किया , यही जाना कैसे प्राची आज भी खिलौने वाले फ़ोन से अपनी माँ को आवाज़ दे रही है, बुला रही है. उसे कौन यह समझाए की ज़िंदगी को छीनने वाली मौत उसकी माँ और भाई को उससे दूर, बहुत दूर ले गई है, जहाँ सिर्फ जाने की राह खुलती है, लौट आने की नहीं. वह तो इंतज़ार में अब भी आस लगाये कह रही है "मां भैया को लेकर जल्दी घर आओ, माँ आ जाओ, आओ...माँ.!!!" 

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                                                                                                                                                    लघुकथा


संवेदना

मोटर-सायकल से गुजरते हुए एक जगह लगी भीड़ को देखकर वह रूक गया । उसने एक लड़के से पूछा, तो पता चला कि पास के स्कूल की एक लूना सवार महिला शिक्षिका को ट्रक ने ठोकर मारकर मौत की नींद सुला दिया है। वह अन्दर तक काँप गया। उसकी पत्नी भी वहीं पास के स्कूल में शिक्षिका थी और लूना से ही आती-जाती थी। वह आशंकित होकर धड़कते दिल से भीड़ को चीरते हुए पहुँचा। उसकी नजर लाश पर पड़ी। लाश किसी दूसरी महिला की थी। उसने चैन की साँस ली, और फिर अपनी गाड़ी स्टार्ट कर सीटी बजाता हुआ अपने घर आ गया।


                                                                                                             आलोक कुमार सातपुते








दाह संस्कार

दीनदयाल  की मृत्यु हो गई, उनके अंतिम संस्कार हेतु लखनऊ से दूसरा बेटा आया, कानपुर से सबसे बड़ा बेटा भी आया , तीसरा और सबसे छोटा बेटा तो हमेशा दीनदयाल के साथ ही रहता था। उसने ही पिता का उपचार एम्स में करवाया था, क्योंकि दीनदयाल लगभग एक महीने से बीमार चल रहे थे, वह भी गंभीर रूप से।

नौकरी से रिटायर होने के कुछ दिनों बाद ही दीनदयाल की मृत्यु हो गयी थी, अतः वह तीनों बेटों के पास बारी बारी से रहते थे। पिता के इलाज में छोटे बेटे के काफी ज्यादा रुपये खर्च हो गये थे और वह कुछ कर्ज के बोझ से भी दब गया था। अतः वह काफी देर तक पिता के शव के पास चुपचाप गमगीन बैठा रहा, फिर धीरे से अपने दोनों बड़े भाइयों से पिता का दाह संस्कार करने के लिए बोला।

छोटे भाई की बात सुनकर दोनों बड़े भाई ऐसे चुप हो गए, जैसे उन्हें सांप सूंघ गया हो। थोड़ी देर बाद छोटे बेटे ने अपनी बात दोहराई , तो दीनदयाल का बड़ा बेटा बोला, ‘देखो घी और लकड़ी तो बहुत मंहगे हैं, इसलिए पिताजी का शव विध्युत शवदाह गृह ले चलते हैं।  उसी से ...इस तरह फूल चुनने और हवन का झंझट भी नहीं होगा।‘

तुरंत मंझला बेटा बोला, ‘ क्यों न पापा का शव गंगा में बहा दें, उससे अस्थि विसर्जन का भी झंझट नहीं होगा?’

अपने चाचा और पापा की बातें दीनदयाल का बेटा गौरव वहीं बैठा सुन रहा था। चीखते हुए बोला, ‘ बाबा का अंतिम सेस्कार जैसे आप लोग कह रहे हैं , उस तरह नहीं होगा । उनका दाह संस्कार वैदिक रीति से ही होगा। और हां पापा, आप चिंता न करो, मरने के बाद आपका शव  मैं बिजली से जलवा दूंगा।‘

गौरव की बातें सुनकर उसके पापा और चाचा के चेहरे पेड़ से टूटी हुई सूखी डाल की तरह नीचे लटक गए।


                                                                                                                                                   -निर्मला सिंह

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                                                                                                                                           संस्मरण


                                                                                                                                     -  रूपसिंह चन्देल

सपनों में पिता


पिछले दिनों पिता एक बार फिर आए । इस बार वह वर्षों बाद ......शायद छ:-सात वर्ष बाद । हर बार की भांति वह मेरे साथ बैठे , बातें की, कुछ समझाया , साथ लेकर कहीं गए .... एक अपरिचित स्थान , जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था ।एक समय था जब वह महीना-दो महीना में आते , कुछ देर ही ठहरते , कुछ कहते.... जो मुझे कभी याद नहीं रहता था । वह जब भी आते उनकी वेश-भूषा निपट गंवई होती....अर्थात् मोटे सूत की कानपुर के किसी मिल की बनी लुंगी और बण्डी । कलकत्ता से रेलवे की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् उन्होंने बेहद साधारण कपड़े अपना लिए थे.......किसानों वाले । लुंगी, पुरुषों की धोती का आधा, सफेद-बदरंग होती । लेकिन इस बार वह गांव की अपनी प्रिय वेशभूषा में नहीं , कलकत्ता की प्रिय वेशभूषा....मंहगी सफेद बुर्राक धोती और सफेद लक-दक कुर्ता में थे । हाथ में भद्र बंगालियों की पहचान वाला छाता , पैरों में अच्छी चप्पलें और चेहरे पर खिली मुस्कान ।

 

पहले वह जब आते जाने से पहले भोजन की मांग करते ... अपनी पसंद लौकी या तोराई की सब्जी और चपाती । मैं जब भोजन की व्यवस्था में व्यस्त होता , वह कब खिसक जाते पता नहीं चलता । उनकी यही बात मुझे बाद में याद रहती .... शेष सब भूल जाता । घर वाले दुखी होते कि पिता उनके सपनों में क्यों नहीं आते !

 

पिता जी की मृत्यु (20 सितम्बर,1970)  के इक्कीस वर्ष पांच दिन (25 सितम्बर,1991)  बाद मां की मृत्यु हुई और उन्हें अफसोस था कि इस पूरी अवधि में वह दो बार ही उनके सपनों में आए थे । और किसी के सपने में वह शायद ही कभी आए । मेरे सपनों में आने के लिए सभी के पास अपने तर्क थे । कुछ के अनुसार उनकी बीमारी में सबसे अधिक सेवा मैंने की थी , और उनकी मृत्यु के समय मैं उनके निकट नहीं था । शायद अंतिम क्षण उनकी आंखें मुझे खोजती रही होगीं ....इसलिए और भोजन मांगने के लिए उन लोगों के तर्क रहे कि जब मैं उनकी मृत्यु से एक दिन पहले इण्टरमीडिएट का प्राइवेट फार्म भरने कानपुर जा रहा था तब उन्होंने अपने लिए लौकी मंगा देने की मांग की थी, जिसे अनुसुना कर मैं चला गया था ..... ।

 

पिता जी के उन स्वप्नों से मुक्ति के लिए लोग सुझाव देते कि मैं सुबह किसी भिखारी को भोजन करवाऊं या किसी ब्राम्हण को अन्न दान दूं या मंदिर में कुछ दे आऊं । भिखारी को कुछ देना समझ आता, लेकिन मुझ जैसा नास्तिक शेष सलाहों पर मुस्करा देता । अपने हितैषियों के विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण था और वह चार-छ: बार के अनुभव के बाद तय हुआ था ।

 

पिता जी जब भी सपने में आते..... कुछ दिनों के अंदर मैं किसी न किसी परेशानी का सामना कर रहा होता । वह परेशानी शारीरिक होती , आर्थिक या किसी भी प्रकार की..... और कुछ अवसरों के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहले ही पहुंच लेता कि जिस किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए मैं प्रयत्नशील था उसमें असफलता मिलने वाली थी या स्वयं अथवा परिवार का कोई व्यक्ति बीमार होने वाला था । अंतत: होता भी यही । मेरा निष्कर्ष था कि सपने में पिता का आना इस बात का पूर्वाभास देना था कि कोई न कोई संकट आसन्न है ।

 

जिन्दगीभर संघर्षरत रहने वाले पिता शायद मृत्योपरांत भी संघर्षों में मेरे साथ थे । सपनों में आकर शायद वह मुझे आगाह करते थे । लेकिन यह भी सही है कि समस्या या संकट कितना ही गहन क्यों न रहा हो मैं हर बार उससे उबरता रहा हूं । तो क्या वह आगाह कर मेरी रक्षा करते रहे । स्वप्न विश्लेषक होता तो यह जानने का प्रयत्न करता । एक समय आया कि उनके स्वप्न में आने के बाद सुबह ही मैं यह घोषणा कर देता कि कोई संकट संभावित है ।

 

लेकिन इस बार.... इतने वर्षों बाद, बिल्कुल अलग वेश-भूषा ... लकदक कपड़ों में पिता का आना मुझे अच्छा लगा । सपना मैं भूल गया ... याद रहा केवल उनका वह परिधान जिसमें कलकत्ता में या छुट्टियों में गांव आने में उन्हें देखता था । सुबह मन आशंकित हुआ कि क्या घटित होने वाला है .... उनका आना किस बात की ओर संकेत है ! सोचता रहा और सोचता रहा पिता के बीहड़ जीवन के बारे में जो उनसे , चाचा  (काका) और मां से जाना था । 

 

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पिता का प्रारंभिक और अंतिम जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा । 

 

मेरे पितामह कानपुर के रावतपुर (मसवानपुर) के रहनेवाले थे, जो जी0टी0 रोड पर अवस्थित है और अब शहर के मध्य में है । पितामह नवाबगंज थाने में सिपाही थे । वे लंबे और हृष्ट-पुष्ट शरीर के धनी..... शायद छ: फुट से अधिक लंबे और उनके पैर इतने बड़े कि मोची विशेष आदेश पर उनके लिए जूते तैयार करता था । इतने लंबे डील-डौल वाले पिता की संतान मेरे पिता कुल पांच फुट तीन इंच लंबे थे, लेकिन बलिष्ठ थे । शायद मेरी दादी छोटे कद की थीं । दादी की मृत्यु पिता जी के जन्म के ढाई वर्ष बाद हो गयी थी । दादा जी ने दूसरी शादी की । सौतेली दादी कद-काठी में ठीक-ठाक थीं । उनसे जन्में मेरे चाचा की लंबाई भी दादा जैसी थी ।

 

दादा ने नवाबगंज थाने के पास अपना बड़ा-सा मकान बनवा लिया था । यह उन दिनों की बात रही होगी जब कानपुर का विस्तार हो रहा था । एक समय कानपुर की बसावट नवाबगंज के आस-पास थी , जिसे आज भी पुराना कानपुर कहा जाता हैं । 1857 की क्रांति के बाद जो नया कानपुर बसा वह परेड के इर्द-गिर्द था। आज जहां आर्डनैंस इक्विपमेण्ट फैक्ट्री है , वहां 1857 में अंग्रेजों का किला था ....कच्ची-पक्की ईटों से निर्मित । इससे कुछ दूर ही है परेड..... जो उन दिनों सैनिकों का परेड ग्राउण्ड हुआ करता था । 1857 की  कानपुर का निर्णायक युध्द इसी परेड ग्राउण्ड और किले मध्य हुआ था।

 

नवाबगंज कब बसा ज्ञात नहीं , लेकिन कानपुर का इतिहास 1338 के आसपास से मिलता है । इसे इलाहाबाद के तत्कालीन चन्देल वंशीय राजा कान्हदेव ने बसवाया था । अपने लाव-लश्कर के साथ कन्नोज जाते हुए वह गंगा के किनारे जिस स्थान पर ठहरे थे वह आज के नवाबगंज के पास था । तब वहां निपट जंगल था , लेकिन कान्हदेव को वहां की रमणीकता भा गयी थी । उन्होंने संचेडी (आज कानपुर के पास एक कस्बा) के तत्कालीन राजा को उस स्थान पर एक गांव बसाने के लिए कहा था । जो गांव बसा वह कान्हदेव के नाम पर कान्हपुर कहलाया , जिसका स्वामित्व एक ब्राम्हण को प्राप्त था । उस गांव के स्वामित्व के लिए उसी ब्राम्हण परिवार का मुकदमा मोतीलाल नेहरू और कैलाशनाथ काटजू द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में लड़ा गया था   ('कानपुर का इतिहास' - ले0. नारायण प्रसाद अरोड़ा )। कालान्तर में वही कान्हपुर आज का कानपुर बना ।

 

नवाबगंज में मकान बनाने के बाद दादा का कितना रिश्ता अपने गांव रावतपुर से रहा था यह जानकारी नहीं । नवाबगंज से रावतपुर की दूरी कुछ ही किलोमीटर है ।

 

पिता जब तेरह वर्ष के थे दादा की मृत्यु हो गयी थी । सौतेली दादी मेरे चाचा को लेकर अपने मायके चली गयीं और पिता अपनी एक मात्र बहन के यहां चले गये , जो उनसे कई वर्ष बड़ी और पनकी के पास एक छोटे-से गांव देसामऊ में ब्याही थीं । पिता पढ़-लिख नहीं पाए लेकिन उनकी अपनी स्वतंत्र सोच थी । कुछ दिन बहनोई के साथ उनके खेतों में काम कया, लेकिन बात नहीं बनी । उन दिनों इंच-इंच जमीन की मारा-मारी नहीं थी । गांव के इर्द-गिर्द जंगल फैला हुआ था । बहन से पैसे लेकर पिता जी ने एक जोड़ी भेैसे खरीदे और लगभग दस बीघा जमीन खेती योग्य तैयार की । दो वर्ष खेती की, लेकिन काम-काज में बहनोई का दखल बर्दाश्त नहीं हुआ । हल , भैसे बहन के दरवाजे छोड़ आगरा भाग गए । उन दिनों प्रथम विश्वयुध्द चल रहा था । सेना में भर्ती हो रही थी । तब पिता जी की आयु मात्र सोलह वर्ष थी ।

 

पिता भर्ती के लिए गए और उनका चयन नहीं हुआ । कारण थी उनकी आयु । अठारह वर्ष से कम के युवक को भर्ती नहीं किया जा रहा था । चयन बोर्ड में अंग्र्रेज अफसरों के अलावा एक कुशवाहा साहब भी थे । पिता जी निराश भर्ती कार्यालय के बाहर घूम रहे थे । बाहर निकलने पर कुशवाहा जी ने उन्हें देखा और उन्हें पास बुलाया । पूरी जानकारी के बाद बोले , ''मेरे साथ आओ ।''

 

पिता उनके पीछे हो लिए । कुछ देर चलने के बाद वह एक लंबे-चौड़े मकान में पहुंचे । वह कुशवाहा साहब का अपना घर था । पिता जी को भोजन करवाने के बाद कुशवाहा साहब बोले , ''घर के पड़ोस में मेरा एक हाता हेै । अभी दिखा दूंगा । छ: भैंसे हैं । छ: महीने तक तुम उस हाते में रहोगे ..... केवल दिसा -मैदान के लिए बाहर जाओगे । एक भैंस तुम्हारे नाम ..... उसका दूध केवल तुम इस्तेमाल करोगे .... दण्ड-बैठक....व्यायाम ...कुश्ती .....केवल अपने शरीर पर ध्यान दोगे....दूसरा कोई काम नहीं । भेैेंसों की देखभाल के लिए आदमी है । तुम्हारे खान-पान की चिन्ता मेरी । छ: महीने बाद फिर भर्ती का प्रयास करना.....तब तुम्हें निराश नहीं होना पड़ेगा ।''

 

कुशवाहा साहब ने घी, काजू , पिश्ता , बादाम....अर्थात् सभी प्रकार की पौष्टिक चीजें पिता जी के लिए उपलब्ध करवाई थीं।

 

मुझे सुनकर आश्चर्य हुआ था कि क्या ऐसे लोग भी थे जो एक अपरिचित युवक के लिए इतना करते थे । सौ वर्षों में हम कहां से कहां पहुंच गए !

 

पिता जी ने कुशवाहा साहब की आज्ञा का पालन किया । छ: महीने में ही उनका शरीर खिल उठा था । दूसरी बार भी चयन बोर्ड में कुशवाहा साहब थे । उन्होंने पहले ही बता दिया था कि पिता जी अपनी उम्र उन्नीस वर्ष बताएगें । कुछ अन्य बातें भी उन्होंने बतायी थीं। इस बार पिता जी सेलेक्ट हुए और कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद इटली भेज दिए गए ।

 

वहां से विश्वयुध्द समाप्ति के बाद वह लौटे थे ।

 

भारत लौटते ही सेना की नौकरी छोड़ पुन: खेती की ओर रुख किया था । फिर भैसे खरीदे और (उन्हें इस बात की आशंका थी कि बैलों की खेती उनके लिए फलीभूत नहीं होगी) खेती में लग गए । लेकिन कुछ दिनों बाद ही बहनोई की दखलंदाजी से परेशान होकर मुम्बई भाग गए । वहां किसी मारवाड़ी के यहां काम किया । स्पष्ट है कि कोई छोटा काम ही रहा होगा..... घरेलू नौकर जैसा । एक दिन उस मारवाड़ी के घर के आंगन में नाली के पास उन्होंने लगभग एक सेर सोना पड़ा देखा । उन्होंने उसे उठाकर मारवाड़ी को दे दिया । उनकी ईमानदारी से मारवाड़ी ने उन्हें बख्शीश देना चाहा, लेकिन उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया और नौकरी छोड़ दी। उन्हें मारवाड़ी के  पेशे पर संदेह हो गया था ।

 

पुन: एक बार कानपुर वापसी । फिर गांव.....फिर चख-चख और पुन: प्रस्थान ।

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इस बार पिता जी जा पहुंचे कलकत्ता । आज जिस प्रकार बिहार-उत्तर प्रदेश के लोग दिल्ली दौड़ रहे हैं ... उन दिनों कलकत्ता उनका शरणस्थल था । कई दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद जीने का जुगाड़ सोचा । भद्र बंगाली समाज सुबह नीम की दातून आज भी पसंद करता है .... उन दिनों पसंद करने वालों की संख्या बहुत अधिक थी । उन दिनों जीविका का यह एक अच्छा साधन था और आज की भांति नीम के पेड़ों का संरक्षण भी न था । पिता ने लंबे समय तक सड़क किनारे सुबह-सुबह दातून बेचकर जीविका चलायी । कुछ समय बाद किसी परिचित के माध्यम से पश्चिम बंगाल पुलिस में भर्ती हो गए । दो वर्ष नौकरी की । एक बार वह और उनका साथी सिपाही एक चोर को ट्रेन से आसनसोल ले जा रहे थे । चोर को हथकड़ी लगी हुई थी और एक ने उसकी जंजीर पकड़ रखी थी । रात गहराई तो दोनों साथी खिड़की के रास्ते आ रही शीतल बयार में झपकी लेने लगे । एक जगह ट्रेन धीमी हुई और चोर ने आहिस्ते से जंजीर छुड़ाई और अंधेरे में कूद गया । साथ के यात्री ने इन्हें जगाया । जंजीर खींचकर ट्रेन रोकी । दोनों टार्च की रोशनी में जंगल छानते रहे , अपनी झपकी को कोसते रहे और स्वयं जेल के सीखचों के पीछे जाने की कल्पना करते रहे ।

 

सुबह दोनों एक गांव के बीच से निकले । भाग्य ने साथ दिया । एक लोहार की दुकान पर नजर पड़ी और दोनों चौंके । चोर लोहार से अपनी हथकड़ी कटवा रहा था । बाज की तेजी से झपठकर दोनों ने चोर को जा पकड़ा था ।

 

आसनसोल से कलकत्ता लौट  पिता ने पुलिस की नौकरी भी छोड़ दी थी ।

 

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एक बार फिर गांव । फिर वही स्थितियां और पुन: कलकत्ता वापसी ।  पुराने साथियों के सहयोग से वह रेलवे में खलासी नियुक्त हो गए । इस बार मन जमाने का प्रयत्न किया और वर्षों तक देसामऊ नहीं गए । बहनोई की मृत्यु का समाचार मिलने पर कुछ दिनों के लिए गए और अपने खेत जवान भांजे को सौंप वापस लोट गए ।

 

पिता जी अथक परिश्रमी , बेहद सीधे, सरल, कोमल हृदय और ईमानदार व्यक्ति थे । सुबह चार बजे उठ जाते । कई मील चलकर कालीबाड़ी जाते .... काली दर्शन के लिए, लौटते, चाय पीते और साढ़े छ: बजे लोको वर्कशॉप (हावड़ा) के लिए निकल जाते । शाम छ: बजे के लगभग लौटते । मेरे बचपन के कितने दिन हावड़ा में बीते, यह याद नहीं लेकिन बावनगाछी की याद है मुझे । बहुत खूबसूरत फ्लैट्स थे वे ....तीन मंजिला । मेरा परिवार पहली मंजिल में रहता था । आमने -सामने फ्लैट्स के बीच लगभग सौ फुट चौड़ी जगह थी । रेलवे के वे फ्लैट्स चारदीवारी से घिरे हुए थे । केवल एक ओर... पूर्व का रास्ता खुला हुआ था, जिधर सड़क गुजरती थी और जिसे पारकर मैं पिता जी को प्रतिदिन शाम वर्कशॉप से लौटते देखता था।  दक्षिण दिशा की दीवार का कुछ भाग तोड़कर लोगों ने रास्ता बना लिया था जो एक मैदान में निकलता था , जहां से होकर लोग सीधे बाजार जाते थे । कभी -कभी हम बच्चे उस मैदान में खेलने निकल जाते थे ।

 

अपने श्रम और लगन के बल पर पिता जी खलासी से सीढ़ियां चढ़ते हुए फिटर तक पहुंच चुके थे। मेरे जन्म से पहले ही वह फिटर बन चुके थे । कॉलोनी में उनका अच्छा रुतबा और सम्मान था । उस कॉलोनी के कुछ फ्लैट्स अफसरों को अलॉट थे और मैं देखता कि सहयोगियों के बीच ही नहीं बंगाली अफसरों के बीच भी पिता जी 'बाबू जी' के रूप में जाने जाते थे । मां-पिता दोनों ही निरक्षर थे लेकिन वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा देखना चाहते थे । उनकी इस लालसा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भाई साहब पाचवीं में थे पिता जी ने उन्हें नेहरू जी की जीवनी खरीदकर भेंट की थी ।

 

बड़े भाई  ने जैसे ही गांव से पाचवीं उत्तीर्ण किया पिता जी उन्हें कलकत्ता ले गए  और अंग्रेजी ज्ञान न होने के कारण बड़े भाई को पांचवीं में ही प्रवेश दिलाया । पिता जी ने जब 1959 में अवकाश ग्रहण किया , तब भाई साहब ने हाई स्कूल किया था । वह उन्हें रेलवे में बाबू बनवाना चाहते थे । भाई साहब को नियुक्ति मिल रही थी , लेकिन बंगाली चयन अधिकारी ने पिता जी से चार सौ रुपए रिश्वत मांगी, जिसे देने से उन्होंने इंकार कर दिया और बड़े भाई को पिता जी के साथ ही कलकत्ता से प्रस्थान करना पड़ा था ।

 

पिता जी ने मुझे दो बार पढ़ने के लिए स्कूल भेजा । उन दिनों मैं पांच वर्ष के लगभग था । पहला स्कूल घर से बहुत दूर नहीं था । सामान्य-सा विद्यालय था वह । आया मुझे और मेरे पड़ोसी मनभरन , जिन्हें हम काका कहते थे , के छोटे बेटे प्रेमचन्द को लेने आती । मां सजा-धजाकर बड़े चाव से मुझे स्कूल भेजतीं । लेकिन मुझे वहां घबड़ाहट होती । मैंने न पढ़ने का मन बना लिया । लेकिन मन बना लेने से बात बनने वाली नहीं थी । कुछ बहाना चाहिए था और मेरे बाल मन ने बहाना खोज लिया था । मैंने जिद पकड़ ली कि स्कूल नहीं जाऊंगा ।

 

''क्यों ?'' पिता , भाई ने पूछा । भाई ने धमकाया भी, लेकिन पिता जी ने प्यार से समझाया था ।

 

''क्योंकि वहां जमीन पर बैठाते हैं ......फट्टे पर ।''

 

''सभी बच्चे बेैठते हैं ....तुम्हारे लिए कुर्सी मेज थोड़े लगाई जाएगी .....कोई अनोखे हो!''

 

बड़े भाई की इस बात पर मैं रोने लगा था । मुझे यह सब आज भी ज्यों का त्यों याद है। पिता जी ने भाई को डांटा , मुझे पुचकारा , मां ने सहलाया और समझाया , लेकिन बाल जिद .... नहीं का मतलब था नहीं ।

 

स्कूल का प्रिन्सिपल , जो एक बिहारी बाबू थे , मिस्टर सिन्हा , आया से मेरे स्कूल न आने का कारण जान समझाने - रिझाने घर दौड़े आए । तरह-तरह के लालच दिए , पर मैं जिद पर अटल रहा। लेकिन बड़े भाई छोड़ने वाले नहीं थे । वह जिस हायर सेकेण्डरी स्कूल से हाई स्कूल कर रहे थे , उसके पास एक अच्छा-सा स्कूल था ... मेज कुर्सी .... अच्छे स्मार्ट अध्यापकों और अच्छी ड्रेस वाला । बड़े भाई ने कैसे जुगाड़ बनाया, पता नहीं, लेकिन उन्होंने मुझे वहां प्रवेश दिला दिया । अब बचने का कोई रास्ता नहीं था । बड़े भाई के साथ बस से जाने-आने लगा । वहां मेरा मन भी लगने लगा । इसका एक कारण और था । बड़े भाई हर दिन लंच में मेरे पास आते और कभी लड्डू तो कभी कोई अन्य मिठाई मुझे दे जाते । घर में वह मुझे अंग्रेजी पढ़ाते  और पढ़ाई से बिदकने वाला मैं पढ़ने लगा था । लेकिन सत्र समाप्ति से पूर्व ही अकस्मात मां को गांव जाना पड़ा और मुझे और मेरी छोटी बहन को भी उनके साथ लौटना पड़ा। उसके बाद की मेरी पढ़ाई गांव में ही हुई ।

 

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लेकिन दो बातों के उल्लेख के बिना बात अधूरी ही रहेगी । यद्यपि पिता जी का सम्पूर्ण जीवन ही किसी उपन्यास की मांग करता है, लेकिन संक्षेप में दो घटनाओं का उल्लेख करना चाहता हूं ।

 

पहली घटना मां ने बतायी थी । उन दिनों बड़े भाई छोटे थे और पिता जी के पास रेलवे का छोटा मकान था । उन दिनों उनकी डयूटी शिफ्ट में रहती थी । वह रात शिफ्ट में थे और वेतन का दिन था वह । उस दिन वह रेलवे लाईन के साथ शाम वर्कशॉप जा रहे थे। रास्ते में उन्हें उनका एक सहयोगी मिला, जो दिन की शिफ्ट करके लौट रहा था । दोनों ने पांच मिनट बातचीत की । सहयोगी घर और पिता जी वर्कशॉप की ओर बढ़ गए । कुछ दूर जाने पर पिता जी को नोटों भरा पर्स मिला । खोलकर देखा .... सोचा और अनुमान लगाया कि वह पर्स कुछ देर पहले मिले सहयोगी का था जिसमें उसका वेतन था । उन्होंने पर्स आफिस में जमा कर दिया ।

 

पर्स उसी सहयोगी का था ।

 

दूसरी घटना आंखों देखी है । जाड़े के दिन थे । प्रेमचंद के अतिरिक्त कॉलोनी में मेरा कोई साथी नहीं था । बड़े भाई के साथियों की संख्या पर्याप्त थी । शाम बीच के मैदान में वह अपने मित्रों के साथ वॉलीवाल खेलते...नियमत: । मैं सजधज कर -- कोट-पैण्ट पहन फ्लैट के नीचे सीढ़ियों के साथ बने छोटे चबूतरे पर बैठ उन्हें खेलता देखता । उस दिन मेरी दृष्टि सड़क की ओर से आ रहे काफ़िले पर जा टिकी । चार लोगों ने चारपाई थाम रखी थी और साथ कम से कम दस-पन्द्रह लोग थे । काफ़िला निकट आया । भाई और उनके साथियों का खेल थम गया । पता चला चारपाई पर घायल पिता थे । क्रेन से वह किसी डिब्बे को उठा रहे थे कि क्रेन का पहिया टूटकर उनकी छाती पर आ गिरा था । खून से लथपथ पिता सामने ....भाई किंकर्तव्यविमूढ़ । पूरी  कॉलोनी इकट्ठा थी ....सिर ही सिर ...शोर और चीत्कार करती मां । उसके बाद क्या हुआ मैं जान नहीं पाया । बाद में कितने ही दिन मैं भाई के साथ रात रेलवे अस्पताल जाता रहा था । पिता जी स्वस्थ हो गये थे, लेकिन भारी-भरकम पहिए ने उन्हें जो आंतरिक चोट पहुंचाई थी , कालांतर में वही उनकी मृत्यु का कारण बनी थी । उस घटना के कुछ दिनों बाद उनका प्रमोशन हुआ ....... ड्राइवर के रूप में । वह मालगाड़ी चलाने लगे और उसी पद से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया था ।

 

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अवकाश ग्रहण के बाद पिता जी ने गांव में बसने का निर्णय किया , जबकि उनके साथियों ने उन्हें कलकत्ता में रुकने का आग्रह किया था । तीन हजार का एक अच्छा-सा मकान भी उन्हें मिल रहा था । पैसा भी था, लेकिन मां गांव रहना चाहती थीं । मां को उनके चाचा (कंचन सिंह गौतम) ने तेरह बीघे खेत दे दिए थे और मकान बनाने की जगह । नाना के पास यह जमीन अतिरिक्त थी । गांव में सर्वाधिक उपजाऊ खेत उन्हीं के पास थे , लेकिन जो जमीन उन्होंने मां को दी थी वह ऊंची -नीची और चरीदा थी, जिसे कभी उपजाऊ नहीं बनाया जा सका । पिता जी ने अपने गांव देसामऊ में जो खेत भांजे को जोतने-बोने और उनके लौटने पर उन्हें लौटा देने के लिए दिए थे उस भांजे ने कोर्ट में उन्हें मृत घोषित कर (शपथ पत्र देकर) वे खेत अपने नाम लिखा लिए थे । लोगों ने पिता जी को जब भांजे पर मुकदमा करने की सलाह दी तब उन्होंने उत्तर दिया ,'' भांजा बेटा समान होता है ...... उससे कैसा मुकदमा !''

 

कानपुर शहर से सटे उन दस बीघे खेतों की कीमत आज लगभग ढाई-तीन करोड़ रुपए है । उसी प्रकार मेरे पितामह का जो मकान नवाबगंज में था पिताजी की उदासीनता के कारण नगर महापालिका ने उसे अपने अधिकार में ले लिया था ।

 

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गांव आकर कलकत्ता के बाबू जी पूरे किसान हो गए  थे और गांव में 'चंद्याल' के नाम से जाने जाने लगे । नौकरी करने के दौरान जब भी वह गांव आते (मेरा ननिहाल ही मेरा गांव है ) हर दिन किसी न किसी के घर आमंत्रित रहते । एक युवा नाई, जिसका नाम मैं भूल गया हूं , सप्ताह में दो बार उनकी तेल-मालिश करने आता और बाबू जी मुक्त हस्त पैसे खर्च करते । मां के ठाठ सदैव शाही रहे । बनारसी साड़ी से नीचे कुछ नहीं पहना और यह सब 1962 तक चला । पिता जी ने भले ही खेती में झोंक अपने को माटी कर लिया था , लेकिन मां और हम सब तब तक अच्छा जीवन जीते रहे जब तक अवकाश प्राप्त होने के समय एक मुश्त मिला पैसा समाप्ति की कगार पर नहीं पहुंचा । लेकिन पिता जी ने शायद पहले ही यह स्थिति भांप ली थी  । उन्होंने दुधारू गाएं , भैसें पाल ली थीं .... खेती करने के भैसों के साथ । उन दिनों तेरह जानवर थे मेरे यहां । कुछ खेत तिहाई में दिए जाते और कुछ वह स्वयं करते  । लेकिन नाले के किनारे होने के कारण भयानक जाड़े में खेतों को पाला मार जाता और फसल के नाम पर जो मिलता उससे लागत बमुश्किल निकल पाती ।

 

कलकत्ता की अपनी आदत के अनुसार पिता सुबह चार बजे जागते । अब गाय-भैसों की सेवा उनके लिए काली दर्शन था । कुट्टी काटते, सानी तेैयार करते और साढ़े पांच बजे तक हसिया फावड़ा ले खेतों की ओर निकल जाते । जानवर घर से कुछ दूर पसियाने के बीच बने बड़े से घेर में रहते थे और पिता भी वहीं सोते थे । उनके खेतों की ओर जाने से पहले ही गाय-भैंसों का दूध निकालने या दूधिया से निकलवाने के लिए मां बालटी लटका घेर पहुंच जाती थीं ।

 

पिता जी के रिटायरमेण्ट की राशि खत्म होने के बाद और बड़े भाई की नौकरी लगने तक घर का खर्च गाय-भैंसों के कटता दूध से ही चला था । मुक्त भाव से लोगों को चीजें देने वाले ....ठाठ-बाट से रहने वाले पिता जवान बेटे की उतारन पहनने के लिए विवश थे ,लेकिन उन्हें कभी खीझते-झींकते ...दुखी होते या शिकायत करते नहीं देखा । 'दुखे-सुखे समेकृत्वा' वाला भाव रहता उनके चेहरे पर । जानवरों के लिए सानी आदि तैयार करते हुए ऊंची आवाज में भजन गाते रहते तरन्नाम में ।

 

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1967 में पहली बार उनके फेफड़ों में फोड़ा हुए । खांसी के साथ बलगम नहीं मवाद निकलता । शहर में दिखाया गया । इंजेक्शन ....लगभग एक सौ इंजेक्शन लगे । चार महीने लगे ठीक होने में । ठीक होते ही पुन: काम । डाक्टरों ने शायद उनके मर्ज को टी.बी. समझाा था । जबकि छाती पर वर्षों पहले गिरे क्रेन के पहिए के जख्म से उन्हें फेफड़ों का कैंसर हो गया था । इंजेक्शन ने कुछ समय के लिए कष्ट मुक्त कर दिया था । लेकिन तीन वर्ष बाद पुन: वह उभरा और इस बार जानलेवा साबित हुआ । बलगम के स्थान पर जो पस वह उगलते उसमें इतनी बदबू होती कि घर का कोई भी व्यक्ति उनके निकट ठहरने से कतराता । मां भी घबड़ाती, लेकिन मैं रात-दिन उनकी सेवा में रहा । मिट्टी के बड़े बर्तन में राख डाल दी गई थी । जब भी उन्हें खांसी आती मैं उनके सिर के नीचे हाथ लगा उन्हें आधा उठाता और राख भरा मिट्टी का बर्तन उनके मुंह के पास कर देता । उनके थूकने के बाद साफ कपड़े से उनका मुंह साफ करता । लगभग डेढ़ महीना यह सिलसिला चला था ।

 

19 सितम्बर, 1970 को सुबह इंटरमीडिएट का फार्म भरकर (20 सितम्बर अंतिम तिथि थी)  21 को वापस लौट आने की बात उनसे कहकर मैं कानपुर गया । लेकिन बीस सितम्बर की रात मेरे छोटे बहनोई ने कानपुर पहुंच मुझे उनके दिवगंत होने की सूचना दी थी ।

 

मृत्यु के समय मैं उनके अंतिम दर्शन से वंचित रहा था । क्या इसीलिए वे मेरे सपनों आते रहे । लेकिन उनके आने का जो विश्लेषण मैंने किया था इस बार भी वह सही सिध्द हुआ । मध्य मई में मेरा एक अत्यावश्यक कार्य सम्पन्न होना था , जो नहीं हुआ । पिता शायद उसका पूर्वाभास देने आए थे ।

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                                                                                                                                                  हास्य व्यंग्य


                                                                                                                                             - हरिशंकर परसाई

भोलाराम का जीव

धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफ़ारिश के आधार पर स्वर्ग या नरक में निवास-स्थान ‘अलॉट' करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था। सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी। आखिर उन्होंने खीझ कर रजिस्टर इतने जोर से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई। उसे निकालते हुए वे बोले - "महाराज, रिकार्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुँचा।"

धर्मराज ने पूछा - "और वह दूत कहाँ है?"
"महाराज, वह भी लापता है।"
इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बदहवास वहाँ आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे - "अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?"

यमदूत हाथ जोड़ कर बोला - "दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊँ कि क्या हो गया। आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया। पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम का देह त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की। नगर के बाहर ज्यों ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्यों ही वह मेरी चंगुल से छूट कर न जाने कहाँ गायब हो गया। इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्मांड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला।"

धर्मराज क्रोध से बोला - "मूर्ख ! जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया।"
दूत ने सिर झुका कर कहा - "महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी। मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके। पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया।"
चित्रगुप्त ने कहा- "महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को कुछ चीज़ भेजते हैं और उसे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा लेते हैं। होजरी के पार्सलों के मोजे रेलवे अफसर पहनते हैं। मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं। एक बात और हो रही है। राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बन्द कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने मरने के बाद खराबी करने के लिए तो नहीं उड़ा दिया?"

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा - "तुम्हारी भी रिटायर होने की उमर आ गई। भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?"
इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गए। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले - "क्यों धर्मराज, कैसे चिंतित बैठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?"
धर्मराज ने कहा - "वह समस्या तो कब की हल हो गई। नरक में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए हैं। कई इमारतों के ठेकेदार हैं जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाईं। बड़े बड़े इंजीनियर भी आ गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया। ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मज़दूरों की हाजिरी भर कर पैसा हड़पा जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं। वह समस्या तो हल हो गई, पर एक बड़ी विकट उलझन आ गई है। भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इस ने सारा ब्रह्मांड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला। अगर ऐसा होने लगा, तो पाप पुण्य का भेद ही मिट जाएगा।"

नारद ने पूछा - "उस पर इनकमटैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो।"
चित्रगुप्त ने कहा - "इनकम होती तो टैक्स होता। भुखमरा था।"
नारद बोले - "मामला बड़ा दिलचस्प है। अच्छा मुझे उसका नाम पता तो बताओ। मैं पृथ्वी पर जाता हूँ।"
चित्रगुप्त ने रजिस्टर देख कर बताया - "भोलाराम नाम था उसका। जबलपुर शहर में धमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे  के  टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था। उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और एक लड़की। उम्र लगभग साठ साल। सरकारी नौकर था। पाँच साल पहले रिटायर हो गया था। मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इस लिए मकान मालिक उसे निकालना चाहता था। इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया। आज पाँचवाँ दिन है। बहुत सम्भव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है तो उसने भोलाराम के मरते ही उसके परिवार को निकाल दिया होगा। इस लिए आप को परिवार की तलाश में काफी घूमना पड़ेगा।"

मां-बेटी के सम्मिलित क्रंदन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गए।
द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगाई - "नारायण! नारायण!" लड़की ने देखकर कहा- "आगे जाओ महाराज।"
नारद ने कहा - "मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है। अपनी मां को जरा बाहर भेजो, बेटी!"
भोलाराम की पत्नी बाहर आई। नारद ने कहा - "माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?"
"क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गए, पेंशन पर बैठे। पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में सब गहने बेच कर हम लोग खा गए। फिर बरतन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दी।"
नारद ने कहा - "क्या करोगी मां? उनकी इतनी ही उम्र थी।"
"ऐसा तो मत कहो, महाराज ! उम्र तो बहुत थी। पचास साठ रुपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं कर के गुजारा हो जाता। पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गये और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली।"

दुःख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं। वे अपने मुद्दे पर आए, "मां, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से उन का विशेष प्रेम था, जिस में उन का जी लगा हो?"
पत्नी बोली - "लगाव तो महाराज, बाल बच्चों से ही होता है।"
"नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है। मेरा मतलब है, किसी स्त्री।।।"
स्त्री ने गुर्रा कर नारद की ओर देखा। बोली - "अब कुछ मत बको महाराज ! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो। जिंदगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की ओर आँख उठाकर नहीं देखा।"
नारद हँस कर बोले - "हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है। यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा, माता मैं चला।"
स्त्री ने कहा - "महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उन की रुकी हुई पेंशन मिल जाए। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए।"
नारद को दया आ गई थी। वे कहने लगे - "साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं। फिर भी मैं सरकारी दफ्तर जाऊँगा और कोशिश करूँगा।"

वहाँ से चल कर नारद सरकारी दफ़्तर पहुँचे। वहाँ पहले ही से कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला - "भोलाराम ने दरख़्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी।"
नारद ने कहा - "भई, ये बहुत से ‘पेपर-वेट' तो रखे हैं। इन्हें क्यों नहीं रख दिया?"
बाबू हँसा - "आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख़्वास्तें ‘पेपरवेट' से नहीं दबतीं। खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए।"

नारद उस बाबू के पास गए। उस ने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास चौथे ने पाँचवें के पास। जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफ़सरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा - "महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए। अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा।"

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे। बाहर चपरासी ऊँघ रहा था। इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं। बिना ‘विजिटिंग कार्ड' के आया देख साहब बड़े नाराज हुए। बोले - "इसे कोई मन्दिर वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आए! चिट क्यों नहीं भेजी?"
नारद ने कहा - "कैसे भेजता?  चपरासी सो रहा है।"
"क्या काम है?" साहब ने रौब से पूछा।
नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया।
साहब बोले- "आप हैं बैरागी। दफ़्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते। असल में भोलाराम ने गलती की। भई, यह भी एक मन्दिर है। यहाँ भी दान पुण्य करना पड़ता है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख़्वास्तें उड़ रही हैं। उन पर वज़न रखिए।"

नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गई। साहब बोले - "भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेंशन का केस बीसों दफ़्तरों में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है उतने की स्टेशनरी लग जाती है। हाँ, जल्दी भी हो सकती है मगर।।।" साहब रुके।
नारद ने कहा - "मगर क्या?"
साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, "मगर वज़न चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूँगा। साधु-संतों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं।"
नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबराए। पर फिर संभलकर उन्होंने वीणा को टेबल पर रख कर कहा - "यह लीजिए। अब जरा जल्दी उसकी पेंशन ऑर्डर निकाल दीजिए।"
साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई। चपरासी हाजिर हुआ।
साहब ने हुक्म दिया - बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फ़ाइल लाओ।

थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़-सौ दरख़्वास्तों से भरी फ़ाइल ले कर आया। उसमें पेंशन के काग़ज़ात भी थे। साहब ने फ़ाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा - "क्या नाम बताया साधु जी आपने?"
नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है। इसलिए जोर से बोले - "भोलाराम!"
सहसा फ़ाइल में से आवाज आई - "कौन पुकार रहा है मुझे। पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?"
नारद चौंके। पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए। बोले - "भोलाराम ! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?"
"हाँ ! आवाज आई।"
नारद ने कहा - "मैं नारद हूँ। तुम्हें लेने आया हूँ। चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है।"
आवाज आई - "मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख़्वास्तों पर अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।"

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                                                                                                                                                 सरोकार


                                                                                                                                             राघवेन्द्र सिंह




आवश्यकता है! बापू के वर्गीकरण की


एक बार मैं बैंक से धन निकलाने गया। जहाँ एक लम्बी कतार लगी थी। उसी में एक वृद्ध महिला जिसका
खड़ा होना भी मुश्किल था जो बीच-बीच में फर्श पर बैठ जाती थी। न चाहते हुए भी वह ऐसा कर रही थी। चूँकि
उसका शरीर उस लायक नहीं था कि वह अधिक समय खड़ी रह सके। एक छात्र जो विद्यालय के वेश में था शायद
अपने मध्यावकाश में वहाँ आया था। वह अत्यधिक जल्दी में लग रहा था। एक भद्र पुरुष भी था जो किसी महकमे का
कर्मचारी लग रहा था। उसकी बेचैनी बता रही थी कि वह भी अधिक समय दे सकने की स्थिति में नहीं है। दूसरी
घटना हमारे घर में काम करने वाली महिला, जो बामुश्किल दो जून की रोटी की व्यवस्था कर पाती थी। वह तथा
उसका पति दोनो मिलकर किसी प्रकार अपने लड़के को अध्ययन करा रहे थे। इण्टरमीडिएट में वह 63 प्रतिशत
अंकों के साथ उत्तीर्ण हुआ। साथ ही हमारे मित्र का पुत्र भी इण्टरमीडिएट मंे 82 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण हुआ।
जिसके लिए अलग कमरा, कम्प्यूटर आदि आधुनिक सुख-सुविधाओं की सम्पूर्ण व्यवस्था थी। विद्यालय आने तथा
जाने के लिए एक दो पहिया वाहन तथा घर में ट्यूशन की भी व्यवस्था थी। जहाँ एक तरफ उस सुविधा सम्पन्न हमारे
मित्र के पुत्र को एक अच्छे कालेज में विज्ञान के साथ प्रवेश मिल गया वहीं उस अनपढ़ गरीब माता पिता के पुत्र. को
अंक कम होने के कारण कालेज तथा शिक्षा वर्ग में समझौता करना पड़ा। लाख चाहने पर भी उसको मनपसंद
कालेज तथा वर्ग न मिल सका। जब कि उस गरीब छात्र की लगन एवं मेहनत हमारे मित्र के पुत्र से कहीं अधिक थी।
उक्त दोनों घटनाओं ने हमारे मानस पटल पर निशान छोड़ दिये। मुझे लगने लगा कहीं तो कुछ सामाजिक
व्यवस्था में गड़बड़ है। बैंक की लम्बी लाइन में अलग- अलग उम्र तथा सामाजिक वर्गों के लोग एक साथ समय की
एक ही कीमत पर। निश्चित ही उस वृद्ध को एक-एक पल वर्षों सा लग रहा होगा। इसी प्रकार छात्र तथा उस
व्यक्ति को अपने समय की कीमत अन्य की तुलना में अधिक लग रही होगी। ठीक इसी तरह उक्त अनपढ़
माता-पिता तथा पढ़े लिखे परिवार तथा साधन सम्पन्न व्यक्ति दोनो के बच्चो को अंको के प्रतिशत के मामले में एक
ही तराजू से तौलना बेमानी सी लगी। मैने उक्त देानेा घटनाओं की चर्चा अपने मित्रों से की। उन्हें बताया इस प्रकार
के वर्तमान सामाजिक वर्गीकरण व्यवस्था में कही बड़ी गड़बड़ हैं। उनमें से किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। दोनो
घटना घटे लगभग छह वर्ष बीत गये बात आयी गयी हो गयी।
एक दिन मुझे उसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लेखों तथा पत्रों के संग्रह को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ।
जिन्हें पढ़ते-पढ़ते अचानक मेरी नजर के सामने बापू द्वारा लिखे दो लेख जो वर्ष 1924 में कैदियों के विषय पर लिखे
गये थे। जिन्हें पढ़कर मेरे मन कें संवेदनशील तंत्र झनझना उठे। जिनमें उन्होंने लिखा था कैदियो का जो वर्गीकरण
है, इसमें कैदियों के हित की अपेक्षा प्रशासन के हित का अधिक ध्यान रखा जाता है। उदाहरणार्थ हम देखते है कि
पक्के अपराधी तथा ऐसे मनुष्य जिन्होंने कोई नैतिक नहीं, केवल मामूली कानून भंग का अपराध किया है। एक ही
अहाते, एक ही खण्ड यहां तक कि एक ही कोठरी में साथ-साथ रखे जाते हैं। उन्होंने आगे लिखा है भिन्न-भिन्न
प्रकार के चालीस या पचास कैदी लगातार महीनो एक ही कोठरी में बन्द किये जाते है। जरा आप इस स्थिति की
कल्पना करे- एक शिक्षित मनुष्य जो मुहर लगे हुए टिकट का उपयोग करने पर शासकीय दृष्टि से स्टाम्प
अधिनियम के अन्तर्गत दंडित किया गया था। उसी ब्लाक में रखा गया था। जिसमे खतरनाक माने जाने वाले पक्के
अपराधी रखे गये थे। खूनियों, अपहरणकर्ताओ, चोरो ओर मामूली कानून भंग के अपराधियों का एक ही जगह में ठूस
दिया जाना भी रोज की बात नहीं है। कई काम तो ऐसे है, जैसे रहट खीचना। ऐसे कामों में हट्टे-कट्टे आदमी ही
लगाये जा सकते है। एक बार कुछ अत्यन्त भावुक व्यक्ति एक ऐसी टुकड़ी में रख दिये गये जिस टुकड़ी के
अधिकंाश कैदी ऐसी अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करते रहते थे जिसे कोई भला आदमी सुन भी नहीं सकता। जो लोग
अश्लील भाषा का प्रयोग करते है उन्हें उसमें कोई अश्लीलता नहीं लगती। किन्तु ऐसी भाषा जब किसी भावुक व्यक्ति
के सम्मुख प्रयुक्त की जाती है तब वह उसे बहुत अखरती है। उन्होंने अपने दूसरे लेख में भी कुछ ऐसा ही चित्रित
किया उन्होंने लिखा है- ऐसा कहा जाता है कि अपराध करने वाले लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि कानून
किसी का लिहाज नहीं करता और चाहे कोई अमीर आदमी चोरी करे या कोई ग्रेजुएट या मजदूर कानूनी दृष्टि में सब
समान है। यह तो एक निर्दोष और अच्छे कानून का गलत अर्थ लगाना है। यदि कानून की दृष्टि में सभी
समान है जैसा कि होना भी चाहिए तो हर आदमी के साथ उसकी सहन शक्ति को देखकर बर्ताव किया
जाना चाहिए। जिस चोर का शरीर नाजुक हो उसे भी 30 कोडे लगाना और जो हट्टा कट्टा हो उसे भी
30 कोडे लगाना निष्पक्ष व्यवहार नहीं माना जायेगा। वह तो नाजुक शरीर वाले के साथ अनुचित शख्ती
और शायद हट्टे-कट्टे शरीर वाले के साथ अनुग्रह ही किया जायेगा। उसी तरह उदाहरण के तौर पर
मोती लाल जी को सख्त जमीन पर बिछी- नारियल की खुरदरी चटाई पर सुलाना समान व्यवहार का
नहीं अतिरिक्त सजा देने का उदाहरण है। इसी में बापू ने विषय को आगे बढ़ाते हुए वर्गीकरण को अनिवार्य
बताते हुए लिखा है- जैसा मैंने ऊपर बताया वर्गीकरण अनिवार्य है और वह किया भी जाता है फिर कोई
कारण नहीं कि वह वैज्ञानिक और मानवतापूर्ण भी क्यो न हो। मैं जानता हूँ कि मेरे सुझाए गये ढंग से
वर्गीकरण करने का मतलब है सही पद्धति में अमूल चूल परिवर्तन। बेशक इसमें खर्च ज्यादा होगा और नई
पद्धति को चलाने के लिए दूसरे ढंग के लोगो की भी जरूरत होगी। लेकिन आज अतिरिक्त खर्च होगा तो
अन्त में बचत भी होगी। मैं जो क्रान्तिकारी परिवर्तन सुझा रहा हूँ उसका सबसे बड़ा लाभ तो यह होगा कि
अपराधों की संख्या में निश्चित रूप से कमी आयेगी और कैदियो में सुधार होगा।
बापू के उक्त सुझाव को पढ़ मुझे एक और घटना याद आ गयी- हमारे गांव में एक परिवार था।
जिसमें मां-बाप के अतिरिक्त दो लड़के थे। एक खेती करता था तथा दूसरा लड़के सरकारी डिग्री कालेज
में कर्मचारी था बटवारे में पिता ने अपने रिहायशी भवन के दो भागकर एक अपने गरीब किसान बेटे को दे
दिया तथा दूसरा डिग्री कालेज के कर्मचारी पुत्र को इसी प्रकार का बटवारा उसने अपनी पंाच बीघा कृषि
भूमि का भी किया। नतीजन गरीब बेटे को भोजन लाले पड़ गये तथा सरकारी कर्मचारी पुत्र को उक्त
हिस्से का केाई खास लाभ नहीं हुआ।
बापू के विचारों को पढ़कर मेरे उद्दवलित मन की अलग- अलग कड़ियाँ आपस में जुड़ने लगी।
मुझे लगने लगा मैं सही था। मेरे साथ घटित पिछली सभी घटनाएँ एक ही व्यवस्था के अलग-अलग
आयाम थी। मेरी व्याकुलता शान्त हो गयी। आज से 86 वर्षो पूर्व बापू के विचार तथा सुझाव आज भी
यथार्थ तथा आवश्यक है। ऐसा लगता है, बापू की आत्मा आज भी हमारे बीच यही कही है। उन्हें कष्ट है
समाज के वर्गीकरण की अव्यवस्था को लेकर। वह चाहते ईमानदारी से बगैर किसी स्वार्थ के हर स्तर पर
सामाजिक वर्गीकरण हो तथा व्यक्ति की क्षमता, स्थिति तथा सहनशक्ति के हिसाब से उसका आंकलन
हो।

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                                                                                                                                         हितोपदेश





                                                                                                                              

                                                                                                                                     -सीताराम गुप्त

क्षमा वीरस्य भूषणम्

 

चाणक्य कहते हैं:

गते शोके न कर्त्तव्यो भविष्यं नेव चिन्तयेत् ,

वर्तमानेन   कालेन   प्रवर्तन्ते   विचक्षणाः।

 

अर्थात् मनुष्य को बीती हुई बात पर दुख नहीं करना चाहिए और न ही आने वाले समय की चिंता करनी चाहिए क्योंकि बुद्धिमत्ता इसी में है कि वर्तमान में जैसा समय चल रहा है उसके अनुसार ही अपना आचरण करें। पर क्या यह संभव है? क्या अतीत की दुखद घटनाओं को सरलता से भुलाया जा सकता है? क्या तनावपूर्ण संबंधों को बआसानी नज़रअंदाज़ करना मुमकिन है? हाँ, यह संभव है लेकिन तभी जब व्यक्ति में क्षमा की क्षमता का विकास हो। हमारे संबंधों में; चाहे वे व्यक्तिगत या पारिवारिक हों अथवा सामाजिक, राजनीतिक, व्यावसायिक या आर्थिक; सुधार न होने या न सुधरने का प्रमुख कारण है क्षमा का अभाव। क्षमाशील व्यक्ति ही बीती हुई बातों को भूलकर दुख से मुक्ति पा सकता है और वर्तमान में सम्यक् आचरण कर सकता है। ऐसा व्यक्ति ही भविष्य की चिंता से भी मुक्त रह सकता है।

 

     क्षमा एक अद्भुत गुण है पर क्या क्षमा माँगना और क्षमा करना इतना सरल है? वस्तुतः यह इतना आसान नहीं लेकिन असंभव तो बिल्कुल नहीं। क्षमा माँगने वाला और क्षमा करने वाला दोनों ही बड़े माने जाते हैं। जिसने क्षमा देना सीख लिया वह बहुत बड़ा वीर है। ‘‘क्षमा  वीरस्य भूषणम्।’’ बहादुर ही क्षमा नामक आभूषण को धारण कर सकते हैं। यहाँ बहादुरी से तात्पर्य बाहुबल से नहीं है अपितु मन की शक्ति से है। सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण से है। जो अपने मन को वश में कर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर सकता है वही आत्मज्ञान को प्राप्त हो सकता है। आत्मज्ञान प्राप्त होने पर ही व्यक्ति मिथ्या अहंकार और दूसरे घातक मनोभावों से मुक्त होकर दूसरों को क्षमा कर सकता है, अथवा क्षमा-याचना कर सकता है। वस्तुतः ‘क्षमा’ एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को आत्मज्ञान का अवसर प्रदान करती है। क्षमा द्वारा सही अर्थों में व्यक्ति का आध्यात्मिक उत्थान संभव है। यही सच्ची वीरता है और वास्तविक उपचार भी।

 

    आम लोगों की सोच है कि क्षमा कमज़ोरी का प्रतीक है और क्रोध और हिंसा में ताक़त दिखलाई पड़ती है लेकिन वास्तविक ताक़त वहीं है जहाँ क्षमा का भाव है। बदले की भावना या घृणा हिंसा उत्पन्न करती है जबकि क्षमा में निहित है अहिंसा का भाव। अहिंसा द्वारा ही सात्त्विक व स्थायी परिवर्तन संभव है। क्षमा द्वारा अहिंसा का अनुपालन होता है जो योगमय जीवन का प्रारंभ है। येाग के आठ अंगों में पहला अंग है ‘यम’ और ‘यम’ का पहला तत्त्व है ‘अहिंसा’। इस प्रकार क्षमा धारण करने वाला व्यक्ति वास्तव में एक योगी की श्रेणी में ही आ जाता है।

 

    जैन धर्म में चौबीस तीर्थंंकर हुए हैं जिनमें सबसे पहले तीर्थंकर हुए हैं भगवान ऋषभदेव। गोम्मटेश इन्हीं के पराक्रमी पुत्र हुए हैं जिन्हें बाहुबली के नाम से जाना जाता है। बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे और न ही आदि तीर्थंकर के ज्यष्ेठ पुत्र ही लेकिन फिर भी वे जैन धर्म में तीर्थंकरों से भी बढ़कर प्रतिष्ठित और पूज्य हुए। क्या अपने नाम बाहुबली के अनुरूप ही शारीरिक बल और परम पराक्रमशीलता के कारण ही वे प्रतिष्ठित और वंदनीय हुए? शायद नहीं। बाहुबली की प्रतिष्ठा का कारण वह बल था जो सामान्य जनों में ही नहीं बड़े-बड़ों में भी दुर्लभ होता है।

 

    तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र सम्राट भरत दिग्विजय के लिए निकले लेकिन उनके अनुज युवराज बाहुबली ने उनका आधिपत्य स्वीकार करने से मना कर दिया। दोनों के बीच द्वंद्व हुआ और इसमें बाहुबली विजयी हुए। लेकिन बाहुबली की प्रतिष्ठा का कारण युद्ध में विजय नहीं है। युद्ध में पराजित होने पर भरत ने बाहुबली को पराजित करने के लिए अमोघ शस्त्र चक्ररत्न का वर्जित प्रयोग भी किया लेकिन चक्ररत्न निष्पफल होकर वापस लौट आया।

 

    बाहुबली अपराजेय रहे लेकिन अपने अग्रज भरत की साम्राज्य लिप्सा और विजय प्राप्त करने के लिए अपने ही अनुज पर चक्ररत्न के वर्जित प्रयोग को देखकर वे अत्यंत आहत हुए और उनमें इस असार संसार के प्रति विरक्ति का भाव उत्पन्न हो गया। उन्होंने राज्य त्याग करने का निर्णय ले लिया और अपने अग्रज सम्राट भरत से क्षमायाचना करके अपना राज्य उन्हें सौंप धर्म की शरण में चले गए। बाहुबली के इस अत्यंत विनम्र व्यवहार और त्याग से विमुग्ध उनके भाई सम्राट भरत ने कहा कि तुम सचमुच बाहुबली हो अन्यथा कौन समर्थ व्यक्ति विजय के उपरांत त्याग और शांति स्वीकार करता है।

 

    ऋषभदेव के इस पुत्र ने विजय के उपरांत भी न केवल अपने अग्रज को क्षमा न कर अपमानित नहीं किया अपितु उनसे ही क्षमायाचना की। ऐसा महान बल उनमें उदित हुआ। रामधरी सिंह ‘दिनकर’ ने भी कहा है:

 

क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,

उसका क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल  हो।

 

    अपने इसी अद्वितीय त्याग के कारण बाहुबली तीर्थंकरों से भी अधिक पूजनीय हो गए। उन्होंने इस असार संसार पर नियंत्रण करने की अपेक्षा स्वयं पर नियंत्रण किया और जो स्वयं पर अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण कर सके वही सच्चा वीर है। जो दूसरों को उसकी ग़लतियों के बावजूद क्षमा कर सकता है वही सच्चा वीर है। स्वतंत्रता, आत्मज्ञान, आत्मनियंत्रण, नम्रता और क्षमाशीलता ही वीरता के लक्षण हैं बाहुबल नहीं। जो हिंस्र पशु का वध नहीं उसको पालतू बना कर उसे हिंसा से विरत कर सके वही बाहुबली है। क्षमा किसी भी प्रकार तपस्या से कम नहीं है। लिखा है:

 

क्षमापरं  तपो नास्ति, न सन्तोषात् परं सुखम् ।

न  च  लोभात् परो व्याधिर्नच धर्मो दयापर:।।

 

क्षमा से बढ़कर तप, संतोष से अधिक सुख, लोभ से अधिक व्याधि और दया से श्रेष्ठ धर्म नहीं है।

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हाल ही में भारत सरकार ने फ्रांस के सहयोग से गुजरात में एक बड़े आणविक भट्टे को लगाने का निर्णय लिया है । कितने सुरक्षित हैं देश के आम नागरिक इस तरह के प्रयोगों से? क्या कदम ले रही है सरकार उनकी सुरक्षा को लेकर या फिर...  ?   प्रस्तुत है  संदर्भ में डॉ. वैदिक का एक विचारोत्तेजक आलेख !


                                                                                                                                         चौपाल









                                                                                                                                  

                                                                                                                            -डॉ. वेदप्रताप वैदिक

हमारे सैकड़ों भोपाल

भोपाल का हादसा हमारे हिंदुस्तान का सच्चा आइना है| भोपाल ने बता दिया है कि हम लोग कैसे हैं, हमारे नेता कैसे हैं, हमारी सरकारें और अदालतें कैसी हैं| कुछ भी नहीं बदला है| ढाई सौ साल पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं| गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह ! अब से 264 साल पहले पांडिचेरी के फ्रांसीसी गवर्नर के चंद सिपाहियों ने कर्नाटक-नवाब की 10 हजार जवानों की फौज को रौंद डाला| यूरोप के मुकाबले भारत की प्रथम पराजय का यह दौर अब भी जारी है| यूनियन कार्बाइड हो या डाऊ केमिकल्स हो या परमाणु हर्जाना हो, हर मौके पर हमारे नेता गोरी चमड़ी के आगे घुटने टेक देते हैं|

                आखिर इसका कारण क्या है ? हमारी केंद्र और राज्य की सरकारों ने वारेन एंडरसन को भगाने में मदद क्यों की ? कीटनाशक कारखाने को मनुष्यनाशक क्यों बनने दिया ? 20 हजार मृतकों और एक लाख आहतों के लिए सिर्फ 15 हजार और पांच हजार रू. प्रति व्यक्ति मुआवजा स्वीकार क्यों किया गया ? उस कारखाने के नए मालिक डाऊ केमिकल्स को शेष जहरीले कचरे को साफ करने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया गया ? इन सब सवालों का जवाब एक ही है कि भारत अब भी अपनी दिमागी गुलामी से मुक्त नहीं हुआ है| 

         सबसे पहला सवाल तो यही है कि यूनियन कार्बाइड जैसे कारखाने भारत में लगते ही कैसे हैं ? कोई भी तकनीक, कोई भी दवा, कोई भी जीवन-शैली पश्चिम में चल पड़ी तो हमें उसे आंख मींचकर अपना लेते हैं| हम यह क्यों नहीं सोचते कि यह नई चीज़ हमारे कितनी अनुकूल है| जिस कारखाने की गैस इतनी जहरीली है कि जिससे हजारों-लाखों लोग मर जाएं, उससे बने कीटनाशक यदि हमारी फसलों पर छिड़के जाएंगे तो कीड़े-मकोड़े तो तुरंत मरेंगे लेकिन क्या उससे मनुष्यों के मरने का भी अदृश्य और धीमा इंतजाम नहीं होगा ? इसी प्रकार हमारी सरकारें आजकल परमाणु-ऊर्जा के पीछे हाथ धोकर पड़ी हुई हैं| वे किसी भी क़ीमत पर उसे भारत लाकर उससे बिजली पैदा करना चाहती हैं| बिजली पैदा करने के बाकी सभी तरीके अब बेकार लगने लगे हैं| यह बेहद खर्चीली और खतरनाक तकनीक यदि किसी दिन कुपित हो गई तो एक ही रात में सैकड़ों भोपाल हो जाएंगे| रूस के चेर्नोबिल और न्यूयार्क के थ्रीमाइललाँग आइलेंड में हुए परमाणु रिसाव तो किसी बड़ी भयावह फिल्म का एक छोटा-सा ट्रेलर भर हैं| यदि हमारी परमाणु भटि्रठयों में कभी रिसाव हो गया तो पता नहीं कितने शहर और गांव या प्रांत के प्रांत साफ हो जाएंगे|

                इतनी भयावह तकनीकों को भारत लाने के पहले क्या हमारी तैयारी ठीक-ठाक होती है ? बिल्कुल नहीं| परमाणु-बिजली और जहरीले कीटनाशकों की बात जाने दें, हमारे देश में जितनी मौतें रेल और कारों से होती हैं, दुनिया में कहीं नहीं होतीं| अकेले मुंबई शहर में पिछले पांच साल में रेल-दुर्घटनाओं में 20706 लोग मारे गए| भोपाल में तो उस रात सिर्फ 3800 लोग मारे गए थे और 20 हजार का आंकड़ा तो कई वर्षों का है| यदि पूरे देश पर नज़र दौड़ाएँ तो लगेगा कि भारत में हर साल एक न एक भोपाल होता ही रहता है| इस भोपाल का कारण कोई आसमानी-सुलतानी नहीं है, बल्कि इंसानी है| इंसानी लापरवाही है| इसे रोकने का तगड़ा इंतजाम भारत में कहीं नहीं है| यूनियन कार्बाइड के टैंक 610 और 611 को फूटना ही है, उनमें से गैस रिसेगी ही यह पहले से पता था, फिर भी कोई सावधानी नहीं बरती गई| इस लापरवाही के लिए सिर्फ यूनियन कार्बाइड ही जिम्मेदार नहीं है, हमारी सरकारें भी पूरी तरह जिम्मेदार हैं| यूनियन कार्बाइड का कारखाना किसी देश का दूतावास नहीं है कि उसे भारत के क्षेत्रधिकार से बाहर मान लिया जाए| भोपाल की मौतों के लिए जितनी जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड है, उतनी ही भारत सरकार भी है| जैसे रेल और कार-दुर्घटनाओं के कारण इस देश में कोई फांसी पर नहीं लटकता, वैसे ही वारेन एंडरसन भी निकल भागता है|

                एंडरसन के पलायन पर जैसी शर्मनाक तू-तू-मैं-मैं हमारे यहां हो रही है, वैसी क्या किसी लोकतंत्र् में होती है ? अगर भारत की जगह जापान होता तो कई कलंकित नेता या उन मृत नेताओं के रिश्तेदार आत्महत्या कर लेते| हमारे यहां बेशर्मी का बोलबाला है| हमारे नेताओं को दिसंबर के उस पहले सप्ताह में तय करना था कि किसका कष्ट ज्यादा बड़ा है, एंडरसन का या लाखों भोपालियों का ? उन्होंने अपने पत्ते एंडरसन के पक्ष में डाल दिए ? आखिर क्यों ? क्या इसलिए नहीं कि भोपाल में मरनेवालों के जीवन की क़ीमत कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं थी और एंडरसन गौरांग शक्ति और श्रेष्ठता का प्रतीक था| हमारे भद्रलोक के तार अब भी पश्चिम से जुड़े हैं| दिमागी गुलामी ज्यों की त्यों बरकरार है| यदि एंडरसन गिरफ्तार हुआ रहता तो उसे फांसी पर चढ़ाया जाता या नहीं, लेकिन यह जरूर होता कि यूनियन कार्बाइड को 15 हजार रू. प्रति व्यक्ति नहीं, कम से कम 15 लाख रू. प्रति व्यक्ति मुआवज़ा देने के लिए मजबूर होना पड़ता| यह मुआवज़ा भी मामूली ही होता, क्योंकि अभी मेक्सिकों की खाड़ी में जो तेल रिसाव चल रहा है, उसके कारण मरनेवाले दर्जन भर लोगों को करोड़ों रू. प्रति व्यक्ति के हिसाब से मुआवज़ा मिलनेवाला है| असली बात यह है कि औसत हिंदुस्तानी की जान बहुत सस्ती है| यही हादसा भोपाल में अगर श्यामला हिल्स और दिल्ली में रायसीना हिल्स के पास हो जाता तो नक्शा ही कुछ दूसरा होता| ये नेताओं के मोहल्ले हैं| भोपाल में वह गरीब-गुरबों का मोहल्ला था| ये लोग बेजुबान और बेअसर हैं| जिंदगी में तो वे जानवरों की तरह गुजर करते हैं, मौत में भी हमने उन्हें जानवर बना दिया है| यही हमारा लोकतंत्र् है| हमारी अदालतें काफी ठीक-ठाक हैं लेकिन जब गरीब और बेजुबान का मामला हो तो उनकी निर्ममता देखने लायक होती है| सामूहिक हत्या को कार-दुर्घटना-जैसा रूप देनेवाली हमारी सबसे बड़ी अदालत को क्या कहा जाए ? क्या ये अदालतें हमारे प्रधानमंत्र्ियों के हत्यारों के प्रति भी वैसी ही लापरवाही दिखा सकती थीं, जैसी कि उन्होंने 20 हजार भोपालियों की हत्या के प्रति दिखाई है ? पता नहीं, हमारी सरकारों और अदालतों पर डॉलर का चाबुक कितना चला लेकिन यह तर्क बिल्कुल बोदा है कि अमेरिकी पूंजी भारत से पलायन न कर जाए, इस डर के मारे ही हमारी सरकारों ने एंडरसन को अपना दामाद बना लिया| पता नहीं, हम क्या करेंगे, इस विदेशी पूंजी का ? जो विदेशी पंूजी हमारे नागरिकों को कीड़ा-मकोड़ा बनाती हो, उसे हम दूर से ही नमस्कार क्यों नहीं करते ? यह ठीक है कि जो मर गए, वे लौटनेवाले नहीं और यह भी साफ है कि जो भुगत रहे हैं, उन्हें कोई राहत मिलनेवाली नहीं है लेकिन चिंता यही है कि हमारी सरकारें और अदालतें अब भी चेती क्यों नहीं ?

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                                                                                                                                चांद परियां और तितली


बादशाह और माली

फारस देश का बादशाह नौशेरवाँ अपनी न्यायप्रियता के लिये बहुत प्रसिद्ध हो गया था। वह बहुत दानी भी था। एक दिन वह अपने मन्त्रियों के साथ घूमने निकला। उसने देखा कि एक बगीचे में एक बहुत बूढ़ा माली अखरोट के पेड़ लगा रहा है। बादशाह उस बगीचे में गया। उसने माली से पूछा-‘तुम यहाँ नौकर हो या यह तुम्हारा ही बगीचा है? ’

माली-‘ मैं नौकरी नहीं करता। यह बगीचा मेरे ही बाप-दादों का लगाया है।  ‘

बादशाह-‘ तुम ये अखरोट के पेड़ लगा रहे हो । क्या तुम समझते हो कि इनके फल खाने के लिए तुम जीवित रहोगे ? ‘

अखरोट का पेड़ लगाने के बीस बरस बाद फलता है, यह बात प्रसिद्ध है। बूढ़े माली ने बादशाह की बात सुनकर कहा-‘ मैं अबतक दूसरे के लगाये पेड़ों के बहुत फल खा चुका हूँ। इसलिए मुझे भी दूसरों के लिए पेड़ लगाने चाहिये। अपने खाने की ही आशा से पेड़ लगाना तो स्वार्थपरता है।‘

बादशाह माली के उत्तर से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उसे पुरस्कार में दो अशर्फियां दीं।                                              








अब यह चिड़िया कहां रहेगी








आंधी आई जोर-शोर से

डाली टूटी है झकोर से

उड़ा घोंसला बेचारी का

किससे अपनी बात कहेगी

अब यह चिड़िया कहां रहेगी?

घर में पेड़ कहां से लाएं

कैसे यह घोंसला बनाएं

कैसे अंडे पूटे जोड़ें

किससे यह सब बात कहेगी

अब यह चिड़िया कहां रहेगी?

    -महादेवी वर्मा