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                                                                                                        लहर-लहर किनारे   

       

                                                                                                     - शैल अग्रवाल

                               नेपल्स

जहाज किनारे आ लगा था और तीस साल पुरानी यादों का मेला लिए नेपल्स आंखों के आगे था। नेपल्स इटली का एक बेहद खूबसूरत शहर... बेहद रम्य और उपजाऊ एरिया, जो औलिव और अंगूरों की वाइन के साथ-साथ अपने प्राकृतिक सौंदर्य व अमीरों के क्रीडा-स्थल की तरह भी विख्यात है । गाइड की मानें तो,  ‘ पर अब वह बात नहीं। अपराधों से जर्जर है यह इलाका। पहले जहाँ सिर्फ अमीर ही आते थे अब सभी तरह के पर्यटक आते हैं ; जो अच्छा भी है और नहीं भी। इनमें बढ़ोत्तरी के साथ, बुरा नहीं मानना, आपलोगों की बात नहीं कर रहा आप तो यूरोप के ही हो, पर पूर्वीय देशों से आए पर्यटक पैसा कम खर्च करते हैं और तस्करी अधिक। चोरी, लूटमार आदि के  छोटे अपराधों के अलावा चरस गांजा अदि के अपराधों में भी बढ़ोत्तरी हुई है, जो पहले नहीं थी ।‘

खुद में डूबा वह बोले जा रहा था- ‘ वैसे तो पूरी दुनिया ही एक कठिन दौर से गुजर रही है।‘ सही कह रहा था वह..वाकई में एक आर्थिक सामंजस्य के दौर से गुजर रही है दुनिया। चुप रहना ही उचित समझा परन्तु उसका स्वाभिमान और परेशानी दोनों ही कुछ-कुछ समझ में आ रही थी और वह एक कहावत भी कि एक मछली सारे तलाब को गंदा कर देती है।

हमारे पास घूमने के कई अच्छे विकल्प थे। हम कैप्री आइलैंड के ब्लूग्रोटो जा सकते थे जहाँ के साफ पानी के रंगरूप की तुलना चमकते नीलम से की जाती है और जिसे देखकर शेक्सपियर ने सोलहवीं शताब्दि में लिखा था कि यही वो दुनिया का स्वर्ग है, जहाँ एडम और ईव विचरते थे। शेक्स्पियर ने नेपल्स के बारे में कहा कि वह आजीवन खुशी-खुशी जी और मर सकते थे इस नैसर्गिक रूप और छटा की गोदी में। पर वहाँ जाने के लिए पूरा एक दिन चाहिए था और हमारे पास एक पूरा दिन भी नहीं, बस सात आठ घंटे ही थे, फिर कुछ और नहीं घूम पाते।


पिछले दस दिनों से समुद्र में ही तो घूम रहे थे और कैप्री आइलैंड व ब्लू ग्रोटो पहले भी देख ही चुके थे, समय के अभाव की वजह से वहाँ न जाकर-( यूँ तो पौम्पे भी देखा हुआ था परन्तु यात्रा यूरोप के ऐतिहासिक स्थलों को देखने व दिखाने के इरादे से ही ली गई थी) तय किया कि पहले सौरेन्टो और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर अमीरों का क्रीडास्थल अमाल्फी क्षेत्र का समुद्र किनारे-किनारे का एरिया कार से घूमेंगे और सोरेटो व पौसिटानो शहर में रुकते हुए ऐतिहासिक खंडहर पौम्पे, जो कि ज्वालामुखी की राख में 1500 साल दबा रहा था, वहाँ,चलेंगे।  

सोरैन्टो और पौसिटानो इस क्षेत्र के दो बेहद खूबसूरत शहर हैं, हमने पहले यहीं जाने का मन बनाया। पौसिटानो तक जाते-जाते प्रकृति और मानव दोनों का ही वैभव पूर्णतः अभिभूत करता है।

सौरेंटो और पौसिटानो खूबसूरत शहर तो थे ही पर वहाँ तक पहुंचने का रास्ता उससे भी खूबसूरत और रोमांचक। रम्य प्रकृति की गोद में बैठी अमाल्फी की तरफ जाती सांप-सी रेंगती पहाड़ियों को काटकर बनाई गई घुमावदार सड़कें, अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और उसपर से मानवीय साहस व प्रकृति-प्रेम में डूबा, अद्भुत तकनीकी नमूना। विस्मित थे हम। कैसे खोदी गई होंगी वे सड़कें और बनाई गई होंगी वे चोटियों पर लटकी भव्य अट्टालिकाएँ व होटल। मोह रहे थे आँखों के आगे से गुजरते वे दृश्य। मानवीय इन्जीनियरिंग का लोहा मानते हम मन और कैमरे दोनों में ही उन प्राकृतिक दृश्यों को संजोते जा रहे थे।

पौसिटानों के किनारे सभी मंहगी डिजाइनर दुकानें थीं, जहाँ एक-से-एक असंभव से दामों पर चीजें बिक रही थीं। अच्छा था कि ज्यादा वक्त नहीं था हमारे पास वरना जाने क्या-क्या खरीदकर पछताना पड़ता कि क्यों खरीदा क्षणिक उन्माद में।

हमने मशहूर इटैलियन आसक्रीम, पीजा और वाइन के साथ समुद्र पर चल रहे अद्भुत जेट डाइव के खेल का भी आनंद लिया जिसमें छोटे जहाजों को तेजी से पानी के तल के एकदम करीब ले जाकर सैलानियों को अद्भुत रोमांच का अनुभव कराया जाता है। अभी हम घूम ही रहे थे कि उन पतली-पतली गलियों में पचासों की भीड़ लिए एक शवयात्रा का जुलूस आ गया। फटाफट दुकानदारों ने अपने शटर गिराकर दुकानें बंद कर लीं, पूछने पर पता चला कि भीड़भाड़ में लूटपाट का खतरा रहता है। हम भी कुछ मिनटों के लिए चंद अन्य ग्राहकों के साथ एक दुकान के अंदर बंद हो गए थे। ' तो यहाँ यूरोप में भी भारत जैसा ही हाल है! ' , सोचकर होठों पर खुद-ब-खुद यूरोप की शान और वैभव को ललकारती-सी मुस्कान आ गई। इटली तो वैसे भी चोर उचक्कों के लिए मशहूर है। याद आ गई 1977 की बात जब हमारा बैग होटल के बाहर पेवमेंट से गायब हो गया था।

धूप अबतक सिर चढकर बोलने लगी थी। और वैन की ए.सी. बेहद सुखद और आमंत्रित  करती-सी लगने लगी। हम आननफानन वैन में थे और चल पड़े पौम्पे की तरफ। डेढ़ दो घंटे की उस ठंडी आरामदेह ड्राइव में चाहकर भी आँखें खुली रख पाना मुश्किल हो रहा था पर कुछ छूटे न, इसलिए जबर्दस्ती खुदको जगाए रखने की कोशिश जारी रखी ।

कभी नीचे वह 100, 200 फीट की खाइयाँ डरातीं तो कभी पर्वतों की श्रंखला और नीलम सा समुद्र मन मोह लेता। ऐसे ही सोते जगते, चलती कार से ही फोटो खींचते हम पौम्पे पहुंच गए। 

सामने खड़ा वसुवियस का सक्रिय ज्वालामुखी आज भी वातावरण को एक रहस्यमय गंभीरता देने में सक्षम था। याद आ गई वह वसूवियस ज्वालामुखी की पहली ट्रिप जब हमारे पास वक्त की पाबंदी नहीं थी और तीनों छोटे बच्चों के साथ जब उस धधकते लावा फेंकते ज्वालामुखी के क्रेटर तक पहुँची थी तो बच्चों की सुरक्षा को लेकर मन-हीमन  बेहद भयभीत थी। पतिदेव कुछ नहीं होगा, कुछ नहीं होगा  कहते उसके बिल्कुल ही करीब ले गए थे और पर्यटक धधकते गढ्ढे में झांक रहे थे। हिम्मत करके आगे बढ़ी और दृश्य को बस आंखों में भरकर तुरंत ही पलट ली। माँ का मन था न मानलो ज्वालामुखी अचानक उग्र हो उठे तो तीनों बच्चों को तुरंत सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना आसान तो नहीं था। कहने को तो सब सुरक्षित था परन्तु प्रकृति के रहस्य को समझना, अप्रत्याशित कोप से बचना आसान भी तो नहीं। स्मृति मात्र से रोमांच हो आया। आज भी वही वसूवियस सामने था पर वास्तविकता में हमसे मीलों दूर । 

तीन बज चुके थे परन्तु अभी भी चटकती धूप में संकरे रास्तों पर जड़ी ईंटें हीरे सी चमक रही थीं और कहीं भी दिखाई देती जरा-सी छत या छाँव रुकने को ललायित कर रही थी, ऐसे में हमारा पसीना पोंछते हुए आगे बढ़ते जाना ऐतिहासिक जिज्ञासा और सैलानी जुनून का ही परिचायक था।

कैसे भी आइसक्रीम के सहारे खुद को ठंडा करते हम आगे बढ़ चले। गाइड एक अवकाश प्राप्त प्रोफेसर और लेखक था जिसे अपने देश और सभ्यता पर न सिर्फ नाज था अपितु  विषय का गहन अध्ययन भी, और हमारी स्वाभाविक विद्यार्थीनुमा जिज्ञासा के लिए हर प्रश्न का उत्तर था उसके पास ।

हजारों साल पहले रोमन सभ्यता विकास और ऐश्वर्य के जिस चरण तक पहुँची थी उसका दस्तावेज तो हैं ही यह पौम्पे के खंडहर, प्रकृति की ताकत और रहस्यमय स्वभाव को भी भलीभांति दर्शाते हैं।

रोमन बाथ की चित्रात्मक नक्काशी व भव्य स्टेडियम व कौलेसियम, अपोलो का मन्दिर, बाजार व चौक, सभी आज भी अतीत के शोर-शराबे और जीवन का आभास देने में पूर्णतः सक्षम थे। सालों तक ज्वालामुखी की ऱाख के नीचे दफन इटली का पौम्पे शहर पूरा-का-पूरा खोदकर बाहर निकाला गया है और यह आज भी प्राचीन रोमन सभ्यता का सबसे विस्तृत और विशाल खंडहरनुमा संग्रहालय है, जिसे दूर दूर से हजारों सैलानी रोज ही देखने आते हैं। बर्तन भांडों के साथ कुछ लेटे बैठे आदमी और वह मशहूर कुत्ता सब राख में जमकर सदा के लिए उस युग और आपदा के परिचायक हैं, जिन्हें बेहद प्यार और परवाह के साथ स्थानीय पर्यटन विभाग ने संजो रखा है।

अतीत की यह धरोहर कहूँ या यादगार, अभी 150 साल पहले ही पुनः अविष्कृत हुआ है यह शहर अपनी सारी इमारतों के खंडहर, और ईंट जड़ी सड़कों और भव्य सभागार, मंदिर और बाजारों के आधे अधूरे अवशेषों के साथ। सभ्यता के ये चिन्ह...क्षणभंगुर मानव अवशेषों का सबसे बड़ा आकाश के नीचे फैला संग्रहालय है। एक सीख है आज की दंभी सभ्यता के लिए ।

पीछे खड़ा धधकता ज्वालामुखी वसुवियस आज भी डेढ़ हजार साल पहले हुए विनाश के उस ताण्डव की याद को जीवित रखने में समर्थ है। शहर की गली-गली और घरघर को डुबोती, मौत की गोद में सुलाती वह गरम लावा की नदी सबकुछ बहा ले गई थी। बसे हर प्राणी, चपेट में आए पशु पक्षी सभी को जीते जी राख के प्लास्टर में डुबोकर विशाल संग्रहालय के नमूनों के रूप में तब्दील कर दिया था इसने...अतीत की गोद से निकला पूरे शहर और सभ्यता का जीता-जागता कब्रिस्तान... राख की कास्ट में सदा के लिए सुरक्षित वह कुत्ता , औरत मर्द आदि अपनी पीड़ा में कैद अब सदा के लिए एक कलाकृति एक यादगार धरोहर हैं। मन अनचाहे ही उदास हुआ जा रहा था।

इसे आज मानवीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर का दर्जा प्राप्त है और ऐतिहासविद के साथ-साथ पर्यटकों का भी एक मुख्य आकर्षण केन्द्र है यह। पसीने और विस्मय में नहाए हम जब उन तपती यादों के भंवर से निकले तो मन और शरीर दोनों को ही शीतलता की बेहद जरूरत थी, जो कि जहाज  भरपूरता और पूरे राग-रंग के साथ हमारा इंतजार कर रही थी ।...