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                                  सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                             लेखनी- जून-2013








                                       

                                      " मै अपलक इन नयनों से
                                        निरखा करता उस छवि को 
                                          प्रतिभा डाली भर लाता
                                        कर देता दान सुकवि को। "


                                              -जयशंकर प्रसाद~


                                         रचना और रचना धर्मिता !


                                              ( सृजन विशेषांक)


                                               (वर्ष 7- अंक 76)





 कविता धरोहरः सोहनलाल द्विवेदी। गीत और ग़ज़लः कुँवर बेचैन। माह विशेषःधूमिल, महेश चन्द्र द्विवेदी, अवधेश निगम, दिनकर, टैगोर, मुकेश सहाय, रामअवतार त्यागी, सुशील कुमार, कार्ल मार्क्स, पद्मा मिश्रा, गायत्री गुप्ता । कविता आज और अभीः सौरव रॉय, सुबोध श्रीवास्तव, खुर्शीद हयात, दीप्ति शर्मा, नीलोत्पल, शैल अग्रवाल। माह के कविः अशोक बाजपेयी। बाल कविताः भवानी प्रसाद मिश्र।


विचारः सुशील कुमार।  कविता में इन दिनों: ओम निश्चल। मंथनः अज्ञेय, श्री लाल शुक्ल। विमर्शः लक्ष्मीमल सिंघवी। परिचर्चाः शैल अग्रवाल। कहानी धरोहरः गजानन माधव मुक्तिबोध। कहानी समकालीनः दिव्या माथुर। कहानी समकालीनः सुधा भार्गव। धारावाहिकः शैल अग्रवाल। लघुकथाः सुभाष नीरव । रूबरुः विजेन्द्र शर्मा। संस्मरणः पद्मा मिश्रा।  चौपालः विजयकुमार शिंदे। समीक्षाः दिलीप भाटिया। दृष्चिकोणः शैल अग्रवाल। रागरंगः सीता राम गुप्ता। रपटः अजीत रॉय।  चांदपरियाँ और तितलीः जानकारी- गोवर्धन यादव। 



 माह की साहित्यिक खबरें और गतिविधियाँ लिए विविधा और वीथिका में अपने विचारोत्तेजक आलेख-  काला धन किसे कहें-वेदप्रताप वैदिक ।


            अगले माह के विषय की सूचना और विवरण 'अबाउट अस' पृष्ठ पर है।

                                परिकल्पना, संचालन व संपादनः शैल अग्रवाल
              
                       संपर्क सूत्रl: editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

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                                                                                                               अपनी बात

कला सिर्फ कला के लिए है या फिर इसमें सत्यं शिवं सुन्दरम् तीनों का समावेश जरूरी है? क्या है रचना धर्मिता या एक अच्छी रचना?  कैसे यह निर्णय लें हम? क्यों कलम उठती है..क्या प्रेरित करता है कवि को, कहीं यह भी मात्र एक व्यापार, आदत या लत तो नहीं ! संस्कृत में कहा गया है कि ' शब्दार्थो सहितो काव्यम्।' शब्दों के अर्थ पर तो जोर है ही, सहित पर भी ध्यान रहता  है साहित्य में। शब्दों का अर्थ के बिना अस्तित्व ही नहीं, मात्र ध्वनियां हैं यह। फिर क्या है जो इन शब्दों को साहित्य बना देता है? आचार्य कुंतक ने बड़ी सुंदर व्याख्या की है इसकी- जहाँ शब्दों और अर्थ में सौंदर्य की होड़ लग जाए, वही साहित्य है। वहीं कालीदास कहते हैं कि जहाँ मोती में धागे से पिरे हों शब्द और अर्थ।


 वेदव्यास, पाणिनी और भृतहरि से लेकर कबीर, तुलसी और आजके कई मनीषि, विचारक और सहृदय कवियों ने साहित्य और कला की भिन्न-भिन्न मीमांसा व विवेचना की हैं, आनंद के साथ उपयोगिता  के महत्व को भी रेखांकित किया है। माना कि नवीनता आकर्षण का प्रमुख आधार है पर नया रचने की धुन में यह भी नहीं भूल जाना चाहिए कि जैसे मात्र खुशबू और रूप से भूख नहीं मिटती आहार में पौष्टिक और उपयोगी तत्व का होना जरूरी है, अच्छे साहित्य की भी यही शर्त है ।


कोई भी साहित्य कोरे आदर्श या सृजन उत्तेजना पर ही जीवित नहीं रह सकता ...कालजयी साहित्य या कला जीवन का सबसे खूबसूरत इंद्रधनुष है तो विचारों का प्राण तत्व भी । देहु शिवा यह शक्ति मुझे, सत्कर्मन से कभी न डरूँ - सिंह ललकार से कितने वीर जागे और कितने गीदड़ भागे, बहुत पुरानी बात नहीं। शब्दों की ताकत शस्त्र से ज्यादा है तभी तो हमारे ग्रन्थों में शब्द को बृह्म कहा गया है।


संपूर्ण आनंद जिसमें मिले हम उस साहित्य या कला के महत्व को भी नहीं नकार सकते। साहित्य या कला वह बगिया है जहाँ भांतिभांति के रूप और गुण के पुष्प खिलते व झरते हैं,( सृजन मानव का नैसर्गिक गुण है) सबकी अपनी महक, अपना आकर्षण है पर वक्त के गुलदस्ते में वही सजेगा जिसमें कुछ विशेष होगा।


श्रीलाल शुक्ल ने अपने एक आलेख में लिखा था कि साहित्य खरा सोना हो यही जरूरी नहीं, उसे कभी लोहा तो कभी मिट्टी भी होना ही पड़ता है। बात बिल्कुल खरी और सच्ची है। साहित्य और कला का उद्देश्य सृजन द्वारा आनंद देना और लेना तो है ही, कटनी-छटनी करते हुए जीवन बगिया में धूप रौशनी और हवा पानी की दिशा दिखाना, ताकि वह फलफूल सके, भी इसका एक अनकहा दायित्व या प्रमुख आकर्षण है।  

हम एक क्रूर और कठिन समय में जी रहे हैं। सीरिया, अफगानिस्तान, कौन्गो, कश्मीर ...दुनिया के कई-कई कोने युद्ध की विभीषिकाओं से धधक रहे हैं। कहीं पड़ोसी किसी की जमीन हड़पने को तैयार है तो कहीं पूरी-की-पूरी जाति।...कहीं-कहीं तो मात्र धरती के अंदर छुपे खनिज पदार्थों के लिए ही वहाँ के निवासियों को अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं...अब जब मानवता का इस तेजी से ह्रास हो रहा है करुणा, उदारता और सहिष्णुता की समाज से अपेक्षा करना और भी कठिनतम् होता जा रहा है। लालच और ईर्षा का दैत्य सबकुछ निगल चुका है ऐसे में साहित्य का दायित्व और भी दुरुह है। धर्मवीर भारती ने एक लेख में लिखा था-

‘ जिन आदर्शों को, जिन मूल्यों को, मानव नियति की जिन प्रक्रियाओं को साहित्य में उठाया गया वे बहुत कुछ ऐसी प्रवृत्तियों को प्रतिबिंबित करती हैं, जिनका उद्गम हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की विभिन्न धाराओं, उपधाराओं में पाया जा सकता है। .........लेकिन देखते ही देखते वह त्याग, तपस्या, निष्ठा, आत्मदान, सेवा, सत्य पर आग्रह, विराट के आत्मसात और यदि तुम्हारी पुकार पर कोई नहीं आता तब अकेले चलो की टेर की जाज्वल्यमान परंपरा कैसे अकस्मात एक रिक्तता, ह्रासोन्मुखता, भयग्रस्तता, पलायन, दिग्भ्रम और करुणोत्पादक विवेकहीनता में बदल गई। ... संघर्ष के जमाने में सृजन का जो प्रभामंडल था, जिसकी अभिव्यक्ति साहित्य में होती थी, वह जाने कहाँ खो गया.....।'

आज के इस भटकते और भ्रष्ट युग में चेष्टा उसी खोए हुए को वापस लाने की होनी चाहिए। साहित्य का एक सशक्त शस्त्र जागृति भी है। बिना किसी राजनीति, वाद या धारा के साहित्य ने अंधेरे युगों में क्रांति और शांति दोनों का ही बिगुल बजाया है। महज आनंद ही नहीं...रिसते और धधकते मनों को सौहाद्र और शीतलता भी दी है और कोई भी प्रयास छोटा या तुच्छ नहीं, बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है और हर ईंट का महत्व होता है किसी इमारत में जैसे कि हर शब्द का एक इबादत में...

सृजन बिना किसी वाद-विवाद के आधार है प्रकृति और पुरुष दोनों का ही। चित्रकार, मूर्तिकार, संगीतकार, जाने कितने कलाकार हैं जो सृजन का आनंद लेते और देते आए हैं पर साथ ही चारो तरफ फैली यह प्रकति माधुरी...भांतिभांति के फलफूल, नदी, झरने, पहाण, उड़ते बादल, चंदा तारे यह सारी जो सृष्टि सृजन है, हम इसे चाहे कितना ही दूषित करें , लूटे-खसूटें, न यह सुख देना बन्द करती न ही अपना कर्तव्य और उपयोगिता... कला का सौंदर्य ही यह है कि बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के वह सही दिशा और उद्देश्य की ओर ले जा सकती है...मारने वाले से बचाने वाला ज्यादा बलवान है , प्रस्थापित करे।

कोशिश तो हमारी भी यही रही है कि आपतक सकारात्मक उर्जा ही पहुँचे। सत्य और शिव की इस अथक खोज में सौंदर्य और सुरुचि से सजी विश्व की नवीनतम रचनाओं को आप तक लाया जाए...क्या नया गढ़ा और सोचा जा रहा है, से आपको रूबरु कराया जाए। पर सृजन के उन पलों में किस मन-स्थिति में होता है रचनाकार, क्या सोचता है वह , किन पीड़ा और आनंद से गुजरता है वह कला की इस प्रसव वेदना में ...क्या रिश्ता है कलाकार कला और समाज का, यह सब जानना भी उतना ही जरूरी है कलाकार, साहित्य और समाज के  लिए जितना कि  उसकी कृति को। उसकी सोच, पर्तिमान सब आसपास और जीवन से ही तो आते हैं। इसलिए इसी त्रिकोण को समझने की कोशिश की है हमने इस अंक में ।


प्रक्रिया में नया, पुराना  बहुत कुछ संजोया है। उम्मीद है अंक आपको पसंद आएगा। सवाल जितने पुराने हैं , जवाब , अनुभव और सृजन उतने ही नूतन व विविध; क्योंकि जीवन स्थिर नहीं , निरंतरता के साथ-साथ परिवर्तन ही जीवन का आधार है।


हमारा सौभाग्य है कि हमेशा की तरह कई नए कवि और लेखक अपने रुचिकर विचार और प्रतिमानों के साथ लेखनी परिवार से जुड़े हैं और जुड़ते रहेंगे। सभी का स्वागत करते हुए प्रार्थना और दिली इच्छा है कि हमारा आपसी स्नेह और सौहाद्र ऐसे ही बना रहे।

आप सभी पाठकों से भी एक निवेदन है- आपकी प्रतिक्रियाएं हमारा मार्गदर्शन करती हैं, उत्साह वर्धन करती हैं। वे भी उतनी ही मूल्यवान हैं जितनी कि रचनाएं, आग्रह के साथ पुनः याद दिलाती हूँ, भेजने में कंजूसी या आलस न किया करें। अगले अंक तक के लिए नमस्कार के साथ,

                                                                                                -शैल अग्रवाल

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                                                                                                                कविता धरोहर
                                                                                                            -सोहनलाल द्विवेदी

आज वासन्ती उषा है


आज कण-कण कनक कुंदन
आज तृण-तृण हरित चंदन
आज क्षण-क्षण चरण वंदन
विनय अनुनय लालसा है
आज वासन्ती उषा है
अलि रचो छंद
आज आई मधुर बेला
अब करो मत निठुर खेला
मिलन का हो मधुर मेला
आज अधरों में तृषा है
आज वासंती उषा है
अलि रचो छंद
मधु के मधु ऋतु के सौरभ के
उल्लास भरे अवनी नभ के
जड़-जीवन का हिम पिघल चले
हो स्वर्ण भरा प्रतिचरण मंद
अलि रचो छंद













प्रकृति-सन्देश


पर्वत कहता शीश उठाकर,
तुम भी ऊँचे बन जाओ।
सागर कहता है लहराकर,
मन में गहराई लाओ।

समझ रहे हो क्या कहती हैं
उठ-उठ गिर-गिर तरल तरंग
भर लो भर लो अपने दिल में
मीठी-मीठी मृदुल उमंग!

पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो
कितना ही हो सिर पर भार,
नभ कहता है फैलो इतना
ढक लो तुम सारा संसार!











 रे मन


प्रबल झंझावत में तू
बन अचल हिमवान रे मन।

हो बनी गम्भीर रजनी,
सूझती हो न अवनी,
ढल न अस्ताचल अतल में
बन सुवर्ण विहान रे मन।

उठ रही हो सिन्धु लहरी
हो न मिलती थाह गहरी
नील नीरधि का अकेला
बन सुभग जलयान रे मन।

कमल कलियाँ संकुचित हो,
रश्मियाँ भी बिछलती हो,
तू तुषार गुहा गहन में
बन मधुप की तान रे मन।

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                                                                                                                गीत और ग़ज़ल
                                                                                                                 -कुँवर बेचैन

अधर-अधर को ढूँढ रही है


अधर-अधर को ढूँढ रही है
ये भोली मुस्कान

जैसे कोई महानगर में ढूँढे नया मकान


नयन-गेह से निकले आँसू
ऐसे डरे-डरे
भीड़ भरा चौराहा जैसे

कोई पार करे

मन है एक, हजारों जिसमें

बैठे हैं तूफान
जैसे एक कक्ष के घर में रुकें कई मेहमान


साँसों के पीछे बैठे हैं

नये-नये खतरे
जैसे लगें जेब के पीछे

कई जेब-कतरे

 

तन-मन में रहती है हरदम
कोई नयी थकान

जैसे रहे पिता के घर पर विधवा सुता जवान











ओ बासंती पवन


बहुत दिनों के बाद
खिड़कियाँ खोली हैं
ओ बासंती पवन, हमारे घर आना!

जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जाले सारे कमरों में

बहुत दिनों के बाद
साँकलें डोली हैं
ओ बासंती पवन, हमारे घर आना!

एक थकन-सी थी नव भाव-तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में

बहुत दिनों के बाद
खुशबुएँ घोली हैं
ओ बासंती पवन, हमारे घर आना!

पतझर ही पतझर था, मन के मधुवन में
गहरा सन्नाटा-सा था अंतर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में

बहुत दिनों के बाद
चिरइयाँ बोली हैं
ओ बासंती पवन, हमारे घर आना!












खुद को नज़र के सामने


खुद को नज़र के सामने ला कर ग़ज़ल कहो
इस दिल में कोई दर्द बिठा कर गज़ल कहो

अब तक तो तुमने मैक़दों पै ही ग़ज़ल कही
होंठों से अब यह जाम हटा कर गज़ल कहो

दिन में भी दूर-दूर तलक रोशनी नहीं
... अब तुम ही अपने दिल को जला कर गज़ल कहो

पूरी ही ग़ज़ल दिल की इबादत है दोस्तों!
अश्कों में ज़रा तुम भी नहा कर गज़ल कहो

दिल में न अगर आए तुम्हारे कोई 'कुंअर'
तो तुम ही किसी के दिल में समा कर ग़ज़ल कहो

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माह विशेष

KAVI AUR KAVITA

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                                                                                                                          विचार


                                                                                                                     सुशील कुमार


कविता का गद्य-रूप और भावबोध: कुछ विचार


यह गंभीरता से विचारने का वक्त आ चला  है कि वे कौन-कौन से कारक हैं जिसने कविता को आमजन से दूर कर दिया है जहाँ संचार-तकनीक की नित्य फैलती इस मायावी दुनिया में कविता की जगह निरंतर सिकुड़ती जा रही है। हालाकि यह विचार भी अर्धसत्य ही है क्योंकि वास्तव में यदि कविता का संसार लघुतर हो रहा होता तो फिर रोज़ इतनी कवितायें क्यों लिखी जातीं?  आखिर कौन लिख रहा इन्हें और पढ़ कौन रहा ? इतना तो अवश्य  है कि कविता में जो बोझिलता, उबाऊपन और नीरसता के जो अक़्स आये हैं उससे पाठकों में वह चाव  नहीं रहा जो आज से दो-तीन दशक पहले हुआ करता था। इस कारण कविता जितनी तेजी से आज लिखी - पढ़ी जाती है उतनी ही गति से विस्मृत भी हो जाती हैं। खुद कवियों तक को अपनी कवितायें याद नहीं रहती। मैं बात मंच पर गाने वाली कविता की नहीं कर रहा। पर निराला, जयशंकर प्रसाद, दिनकर, महादेवी,  पंत, मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियाँ हमारे जेहन में आज भी गाहे-ब-गाहे आ जाती है। इसके क्या कारण है? क्या आज कविता अपने मूल स्वभाव से विलग हो गयी है? क्या हमने अपनी बुद्धि-विस्तार में कविता की भावपरायणता को इतना दरकिनार कर दिया है?  विचार-बोध के प्राबल्य से रची कविता में वह लोच क्यों नहीं आ पा रही जो पहले की कविता में हुआ करती थी?
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मध्यकालीन भक्ति-साहित्य को कुछ लेखक-पाठक हिन्दी काव्य का स्वर्ण-युग मानने से कतराते हैं और अपनी बात के समर्थन में यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि धर्म-अध्यात्म इस देश की जड़ में है, यह यहाँ की परम्परा का उत्स रहा है। यही कारण है कि सूर-कबीर-तुलसी-जायसी साहित्य के पुरोधा-कवि हो गये।आगे वे कहते हैं कि  जिन घरों में कोई साहित्यिक माहौल नहीं, वहां भी तुलसी की चौपाईयाँ और कबीर के सबद गाये जाते हैं। उनका यह भी कहना है कि अगर उन्होंने कालजयी साहित्य का सृजन किया होता तो आज के दौर में उनकी कृतियां भी अपेक्षाकृत क्यों कम पढ़ी जाने लगी हैं।
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अंतर्जाल पर आम तौर पर जो कवितायें लिखी जा रही हैं वह मध्यमवर्गीय बुर्जुआ सोच की तस्वीर की ही है। उनका मानना है कि अगर साहित्य में सार्वजनीनता और सार्वदेशिकता की बात होती है तो उसमें सब सम्मलित होता है यानी कि रूपवादी भाव और मध्यमवर्गीय सोच से बुनी-रची कवितायें भी साहित्य का प्रधान अंग होना चाहिये और उसको भी उतना ही दर्जा मिलना चाहिये। सोवियत-युनियन के विघटन के बाद मार्क्स-वाम सत्ताधीशों का जिस तरह से पतन हुआ और वहां के गणराज्य अलग होकर पूँजीवाद के हिमायती हो गये, रूस जैसे देश जी- आठ ग्रुप में शामिल हो गये और पूँजीवाद के समर्थक देश बन गये, उसके बाद तो जन- सामान्य में भी यह विचार तेजी से घर कर गया कि वाम विचार-धारा का इतिश्री हो चुका है। जनवादी लेखकों के गिरते चरित्र का हवाला देकर अब वे लोग कविता या कहें पूरे साहित्य को उसी दिशा में घसीट कर ले जाने का उपक्रम कर रहे हैं जिस दिशा में उनकी सोच और संस्कृति अग्रसर हो रही हैं। यहां बाजारवाद गहरी चोट पड़ रही है और लोग लोकधर्मिता और जनचेतना को बाज़ार का बलि बना देने पर आमादा हैं।
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कुछ समय पहले आज की गद्य-कविता के स्वरूप को लेकर प्रसिद्ध कथाकार संजीव जी ने कई जेनुईन सवाल उठाये थे और जयपुर की कविता पत्रिका "कृति-ओर" में इस पर लम्बी बहस चल पड़ी थी। यह ठीक है कि आज जितनी भी कविता लिखी जा रहीं है, उसे काव्य- रूप-विधान की दृष्टि से जाँच-परखकर कविता को परिभाषित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जरूरी है कि कविता को हर सूरत में कविता ही बना रहना चाहिये। वह गद्य के वेश में भी कविता रहे, यह उसकी पहली शर्त होनी चाहिये। निराला ने जब पुराने छंद का बंधन तोड़कर, गद्यात्मक वाक्यों से बने हुए मुक्त-छंद को अपनाया था, तब उन्होंने अपने तरह से, उसके लिये छोटे-छोटे , क्रियाशील और सिद्ध वाक्यों की संरचना को काम में लेकर एक नयी राह खोली थी। उन्होंने उसे मुक्त करते हुए भी उसे "कवित्त" छंद की लय को उसकी रूप संरचना में बनाये रखा था। उसके बाद दूसरे और तीसरे तारसप्तक के कवियों ने भी कविता में प्रगीत के अनुशासन को बनाये रखा। इसी तरह सप्तकों के बाहर के कविगण नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल,  मुक्तिबोध, त्रिलोचन, विजेन्द्र,  एकान्त श्रीवास्तव इत्यादि कवियों ने भी कविता की लय पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया। परन्तु कविता में अराजकता की प्रवृति तबसे अधिक लक्षित होने लगी जबसे आलोचना में आचार्य  रामचन्द्र शुक्ल के बाद कविता के रूप संबंधी प्रश्नों पर गंभीरता और सावधानी नहीं बरती गयी। इसकी फलश्रुति यह हुई कि अकविता का मौहाल बनने लगा और कविता के नाम पर एक तरह की उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित किया जाने लगा। फलत: कविता के रूप में लद्धड़ गद्य-रूप की कविता सामने आने लगी। कविता में प्रगीतात्मकता और बिम्बग्रहण का तिरस्कार किया गया। नामवर सिंह जैसे नामचीन आलोचकों ने कविता के नये प्रतिमान में भी पाश्चात्य शैली की कविता का अनुसमर्थन कर तत्कालीन भारतीय चित्त के श्रेष्ठ कवियों यथा त्रिलोचन, नागार्जुन जैसे कवियों की अपेक्षा रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा जैसे मँझोले कवियों की काव्य-व्यंजना को पाठकों के समक्ष प्रभावशाली ढंग से परोसा। नजीतन, कविता अपनी रूपाभा खोकर पूरी तरह गद्यात्मक और स्मृतिहीनता की जद में आने लगी। पर ये कवितायें जब दृश्य में देर तक टिक न पायीं तो फिर कविता के क्षितिज पर कई कवि उदित हुए जिनकी लोकधर्मिता और इन्द्रियबोधात्मकता के कारण उनकी कविता महत्वपूर्ण मानी गयीं।
                 जहाँ तक कविता की स्मृति का प्रश्न है तो यह बात सही नहीं कि सारी गद्य कविता लयविहीन और नीरस है। कविता अब श्रव्य होने के बजाय ज्यादातर पाठ्य हो गयी है। स्मृतिपरकता कविता की कसौटी नहीं हो सकती। श्रुति परम्परा में तो लोगों ने पूरे वेद को ही कंठाग्र कर लिया था।पर वह सब काव्य की परिधि में नहीं आता। हमारे कवियों ने मुक्तक और प्रबंध काव्य के साथ -साथ गीति-काव्यों की भी रचना की। आधुनिक युग में भारतेन्दु, प्रसाद और निराला इसके प्रमाण हैं। जहाँ तक गीत का सवाल है, वह कविता से स्वतंत्र विधा है। हमें छंद से आज भी परहेज नहीं,  कोई लिखता है तो अच्छी बात है। पर आज जीवन जितना व्यापक, जटिल और कठोर हो गया है और यथार्थ जितना दुरुह कि पूरे जीवन के स्पंदन और रंग को छंदयुक्त कविता में समेट पाना संभव नहीं। ध्यान देने वाली बात है कि छंद योजना के अंदर भी पहले विद्रोह हुए थे और कवियों ने परम्परागत छंद-योजना की जगह भावानुकूल छंद-योजना योजना को अपनाया था। यह तो युग के भीतर जो स्पंदन है उसकी पुकार है कि कविता का स्वरूप क्या होगा और उसी से वह तय भी होता है। तभी तो एक समय रामधारी सिंह "दिनकर’ जैसे कवि ने सायास छंद-योजना की अपेक्षा भावानुकूल छंद-योजना पर बल दिया। इसी कारण परम्परा-प्राप्त छंदों के स्थान पर नये छंदों के निमार्ण की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने लिखा कि-
“अब वे ही छंद कवियों के भीतर से नवीन अनुभूतियों को बाहर निकाल सकेंगे जिसमें संगीत कम, सुस्थिरता अधिक होगी, जो उड़ान की अपेक्षा चिन्तन के उपयुक्त होंगे।क्योंकि हमारी मनोदशाएँ परिवर्तित हो रही हैं और इन मनोदशाओं की अभिव्यक्ति वे छंद नहीं कर सकेंगे जो पहले से चले आ रहे हैं।”क्योंकि वे मानते थे कि-“कविता के नये माध्यम यानी नये ढाँचे और नये छंद कविता की नवीनता के प्रमाण होते हैं। उनसे युगमानस की जड़ता टूटती है, उनसे यह आभास मिलता है कि काव्याकाश में नया नक्षत्र उदित हो रहा है। जब कविता पुराने छंदों की भूमि से नये छंदों के भीतर पाँव धरती है, तभी यह अनुभूति जगने लगती है कि कविता वहीं तक सीमित नहीं है जहाँ तक हम उसे समझते आये हैं बल्कि और भी नयी भूमियाँ है जहाँ कवि के चरण पर सकते हैं। नये छंदों से नयी भावदशा पकड़ी जाती है। नये छंदो से नयी आयु प्राप्त होती है।”
                       इसी प्रकार वर्तमान में कविता की आवश्यकता मुक्तछंद में ही पूरी हो सकती है क्योंकि जीवनानुभव की संपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये कविता के गद्य-रूप को छोड़कर किसी अन्य रूप का वरण करना कदाचित संभव नहीं। पर आवश्यकता है उसके गद्य-रूप को सँवारने की। इसके लिये कविता में ‘लय’ के अभ्यास की महती आवश्यकता है। वही कविता का प्राण है जो कविता को कविता बनाये रख सकता है अन्यथा राजेन्द्र यादव जैसे अलेखक-अकवि ‘चिल-पों’( हल्ला-गुल्ला) मचायेंगे ही कि यह युग कविता से मुक्त होने का युग है। लय तो सारी सृष्टि में भी वर्तमान है।लय के बिना जीवन भी नहीं। स्वाँस-प्रस्वाँस में भी लय और संगति है।पर दीगर है कि  कविता में यह लय चार कारकों से आती है-1) बिम्ब-ग्रहण 2) प्रगीतात्मकता 3) इंद्रियबोध और 4)सघन जीवनानुभव|
                अर्थ-ग्रहण कविता को सपाट और नीरस बनाता है। बिम्ब-ग्रहण का अभिप्राय है वस्तु पर प्रत्यारोपित विचार की जगह वह भाव जो कवि की कल्पना-शक्ति को भाव-लोक में मूर्तिमान कर दे। यानी वस्तु के भौतिक विश्लेषण के बजाय उसकी आंतरिक भावमयता को कवि आत्मसात करे जो वस्तु में न होकर कवि की अपनी अर्जित संपत्ति हो जाती है। प्रगीतात्मकता से गद्य का विन्यास कविता के विन्यास में बदलता है। उसी प्रकार कवि का इन्द्रियबोध तब प्रखर होता है जब वह सिर्फ़ मन से काम नहीं लेता बल्कि कवि का हृदय और ईश्वर की दी हुई समस्त इन्द्रियाँ यथा आवश्कतानुसार आँख, कान, नाक़, जीभ, त्वचा सब सृजनकाल में समान रूप से सक्रिय हों। आजकल कमरे में बंद होकर जो किताबी कवितायें लिखी जाती हैं उनमें इनका नितांत अभाव होता है। पर यह लक्ष्य करने वाली बात है कि सघन जीवनानुभव व्यष्टि को समष्टि से जोड़ता है, उसे व्यक्तिपरक आत्मबद्धता से मुक्त कर उसकी रचना का आयाम को वृहत्तर और गहराई प्रदान करता है और उसकी रचना का समाजीकरण भी करता है जिससे रचना में युग-बोध के गुण प्रकट होते हैं।
                 आप पायेंगे कि भक्ति काल की रचनाओं में ये तत्व समस्त रूप से पूरी शिष्टता और प्रभूता से विद्यमान हैं जो युगमानस की जड़ता को तोड़ने में सहायक हुए और वह युग कविता का स्वर्णिम युग कहलाया, न कि धार्मिक मतांधता के कारण। मध्ययुगीन भक्तिकाल के काव्य की साहित्यिक अर्थवत्ता का मतलब भी सिर्फ़ उसकी पारिभाषिक विवेचना ( literal translation)  से नहीं समझा जाना चाहिये, बल्कि इसका संबंध उसकी भावमयता से है जिसके केन्द्र में मानव का हृदय है न कि खाली  मन और विचार का उद्वेग । इसी सुदीर्घ भाव-परम्परा की भूमि पर कविता के आत्म-पक्ष का संधान होना चाहिये न कि पाश्चात्यायातित उन विचारों की पृष्ठभूमि में जहाँ न हमारी तरह समृद्ध लोक है न कला वर्ना लोक का अर्थ फोक बनकर रह जायेगा और कविता भी दिनानुदिन लोक से अलग होती चली जायेगी। 

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                                                                                                        कविता आज और अभी
                                                                                                               दो कविताएं

चप्पल से लिपटी चाहतें


चाहता हूँ
एक पुरानी डायरी
कविता लिखने के लिए
एक कोरा काग़ज़
चित्र बनाने के लिए
एक शांत कोना
पृथ्वी का
गुनगुनाने के लिए |

चाहता हूँ
नीली – कत्थई नक्शे से निकल
हरी ज़मीन पर रहूँ |
चाहता हूँ
भीतर के वेताल को
निकाल फेकूं |
खरीदना है मुझे
मोल भाव करके
आलू प्याज़ बैंगन
अर्थशास्त्र पढ़ने से पहले |
चाहता हूँ कई अनंत यात्राओं को
पूरा करना |
बादल को सूखने से बचाना चाहता हूँ |
गेहूं को भूख से बचाना चाहता हूँ
और कपास को नंगा होने से |
रोटी कपड़े और मकान को
स्पंज बनने से बचाना चाहता हूँ |
इन अनथकी यात्राओं के बीच
मुझे कीचड़ से निकलकर
जाना है नौकरी मांगने…||














क्रांति कन्या


वो क्रन्तिकारी थी
मतवारी थी
चली जा रही थी
इन्कलाब के गाने गाते
और हम खुद की आज़ादी के सपनों संग
उसके पीछे चले जाते

यही लड़की समा गयी थी
अंधे की आँखों में
लंगड़े की नसों में
जब येरुसलेम में उसने हमें छूआ
और इस सुनहरी शाम का अंत
उस दर्दनाक क्रूस पर हुआ |

वो क्रन्तिकारी थी
मतवारी थी
चली जा रही थी
इन्कलाब के गाने गाते
और हम खुद की आज़ादी के सपनों संग
उसके पीछे चले जाते

तिरंगे में लिपटी
ये लड़की
गयी थी डांडी
हमने नमक बनाया
और इसी नमक का क़र्ज़ चुकाने को
किसी ने उसे मार गिराया |

वो क्रन्तिकारी थी
मतवारी थी
चली जा रही थी
इन्कलाब के गाने गाते
और हम खुद की आज़ादी के सपनों संग
उसके पीछे चले जाते

इसी लड़की के गीतों को
नए शहर के लोगों ने गाया
उसी देश के शासक ने
विएतनाम को जलाया
और किताबें भरी आज़ादी के गीतों से
और अगले दिन आकाश को खाली सा पाया |

इस क्रान्ति कन्या के बच्चे
जो कौवे की तरह जन्मे थे
अनाथ कहलाये
स्कूल गए
पर धूप नहीं पहुंची
सपने देखे -
आज़ादी नहीं
भूतों के !
सुनसान सड़कों पर
‘माँ-माँ’ चिल्लाकर सो गए
भूखे पेट
बगल से ट्रेन गुज़री
और ऐसे ही किसी दिन
इन बच्चों ने अपने यूनिफॉर्म को जला दिया |

उस दिन मैं भी नहीं समझ पाया
जब उस लड़की ने
मेरे जूते के फीते बांधे थे
और कान में प्यार से कहा था-
“संभल कर चलना
गिरना मत ||”


सौरव रॉय










तुम


तुम,
उदास मरुस्थल में
जल की
मोती सी चमकती
इक बूंद जैसी
जो सभी अभाव/ दर्द
विस्मृत कर देती है।














याद


रात,
जब थककर
हाथों के तकिए पे
सिर रखकर
सपनों के बिस्तर में
सो जाती है-
मेरे सिरहाने
बिना अलसाये
देर तक जागती है
याद तुम्हारी..!


-सुबोध श्रीवास्तव 




















आज फिर से...


आज फिर से
एक नई कविता लिखी जायेगी
आज फिर से
मंच सजेगा
भों पों बजेगा
और ड़ुगडुगी भी बजाई जायेगी
तुम सब फिर इकट्ठा हो जाओगे
बंद मुट्ठियाँ खुलेंगी
फिर हथेलियों में सिमट जाएंगीं
बहते हुये पसीनों में
... जिंदगी बर्फ की तरह पिघलती जायेगी
" सवा सेर गेहूँ " का शंकर
आज फिर हमें आवाज़ देगा -----
तो चलो न फिर से
खेतों में हम सब
नया बीज बोते हैं
चलो न फिर से हम
किसी मिट्टी के चूल्हे पर
उबलते अदहन का
बासमती चावल बन जाते हैं .















निर्वाण


तुम्हारी सिसकियाँ
मेरे साथ
चलने की ज़िद
क्यों करती हैं
यशोधरा !?
पीपल की छाँव में
पहले जैसा
सुकून अब कहाँ ?
हर तरफ
सूखती हुई जड़ों की चीखें हैं
फिजाओं में एक शोर है
और शान्ति , अशांति के भेस में हर तरफ मौजूद !
वक़्त की पीठ पर है धूप की चादर
और आसमान पर सलीब .
अच्छा हुआ
तुम्हें नींद आ गई यशोधरा !
सतह -ए -आब पर
तैरती हैं अब बरहना निगाहें .

निर्वाण का अर्थ
अब के मौसम में बदल गया
ओ मेरी यशोधरा !


-खुर्शीद हयात














 इच्छाएँ


अक्सर खाक होकर भी
पनपती हैं इच्छाएँ
जो अन्दर ही
खोज लेती हैं राह
और कभी अपने
छुपने की जगहें भी














ख़ामोशी


मांग करने लायक
कुछ नहीं बचा
मेरे अंदर
ना ख्याल , ना ही
कोई जज्बात
बस ख़ामोशी है
हर तरफ अथाह ख़ामोशी
वो शांत हैं
वहाँ ऊपर
आकाश के मौन में
फिर भी आंधी, बारिश
धूप ,छाँव  में
अहसास करता है
खुद के होने का
उसके होने पर भी
नहीं सुन पाती मैं
वो मौन ध्वनि
आँधी में उड़ते
उन पत्तों में भी नहीं
बारिस की बूंदों में भी नहीं
मुझे नहीं सुनाई देती
बस महसूस होता है
जैसे मेरी ये ख़ामोशी
आकाश के मौन में
अब विलीन हो चली है ।



- दीप्ति शर्मा















मैं कितना कुछ...


मैं कितना कुछ जानता था अपने भ्रम में .....
हर वाक्य कि समाप्ति पर
मैं खामोश खड़ा देखता
मेरे पास नहीं रहे अब वे सिलसिले
जिन्हें मैं कहना चाहता हूं

मैं कितना कुछ नहीं जानता














बिजली के नंगे तारों पर


बिजली के नंगे तारों पर उतरती चिडि़याएं
नहीं कहती वे डरी हुई हैं
एक पेड़ से दूसरे पेड़ छलांग लगाता बंदर
नहीं जानता फ़ासला कितना है पेडों के दरमिय़ान

लेकिन आदमी कहता है, टोकता है ख़ुद को
उसे याद नहीं
पिछली बार जब वह दोहराता जा रहा था
अपनी गलतियां, जुबानें, तज़ुर्बें



वह चूकता हैं, धंसता हैं
वह हारकर खड़ा होता है
उसे याद नहीं रहता
उसकी शुरूआत पिछले किए गए
तमाम की शुरूआत नहीं है
अब उसे फिर से बसाने हैं
अपने गतिशील रास्तें


    -नीलोत्पल














भविष्य


संबंध और सुरक्षा का
गहरा नाता है
जैसे जीव का
भूख-प्यास
प्यार और परछाँई-से
नहीं जानते या
पहचानते जो                                                                                                                             यह सच्चाई


कैसे समझेंगे
कर्तव्य और त्याग को
उपयोगिता
और सफलता पर ही
जीने वाले  !











वह


उसकी आत्मा
हवा में उड़ती
जंगल-जंगल दौड़ती
पहाणों की ऊंची
चोटी चढ़ आती                                                                                                                 


और वह
बैठी रहती वहीं
खिड़की के नीचे
उसी कुरसी पर
धूप , बरखा और
बरफ की आंधी में
जैसे पत्थर का बुद्धा
उसके बगीचे में

बूंद-बूंद रिसते रहते
शब्द तो कभी उनके अर्थ
सूखे पत्तों से
छू जाते उसे
तो कभी ढक देते धूल से

सबने कहा
मर जाएगी निमोनिया से
मगर जिन्दा रही वह

फिर एकदिन
बहुत सारे महकते फूल
उग आए वहाँ
चांद तारों से भरे कमरे में
और बांट लिया खुद को उसने 
थोड़ा-थोड़ा सब में।

-शैल अग्रवाल

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                                                                                        कविता में इन दिनों: अशोक बाजपेयी
                                                                                                          -ओम निश्‍चल

अशोक वाजपेयी ने अब तक की कविता यात्रा में सिद्ध किया  है कि वे साहित्‍य की रणभूमि में किसी मासूमियत के साथ नही, बल्‍कि एक कुशल योद्धा की तरह अपनी जिदों, अपने स्‍वप्‍नों, अपनी प्रार्थनाओं, अपनी प्रतिश्रुतियों के साथ कविता का स्‍पेस बचाने के लिए कार्यरत हैं और इधर उन्‍होंने उन कोनो अँतरो पर भी निगाह डाली है जो कहीं न कहीं उनकी कविता के क्षेत्रफल को सामाजिक गुणवत्‍ता से जोड़ते हैं। उत्‍तरवर्ती अशोक वाजपेयी ने यदि अब समाजधर्मी कवि के रूप में अपनी भूमिकाऍं पहचानी हैं तो यह स्‍वागतयोग्य है। वैसे भी निज कवित्‍त के वशीभूत उनका कवि-चित्‍त अब तक तो अपनी ही दुनिया में रमता-विचरता रहा है।

 

इस स्‍तंभ के अंतर्गत नंद किशोर आचार्य,  अरुण कमल,  वर्तिका नंदा, भगवत रावत , विनोद कुमार शुक्‍ल , ओम भारती , प्रतापराव कदम, संजय कुंदन, तजिन्‍दर सिंह लूथरा, पुष्‍पिता अवस्‍थी, ज्ञानेन्‍द्रपति व नरेश सक्‍सेना के बाद प्रस्‍तुत है साहित्‍य अकादेमी, दयावती कवि शेखर पुरस्‍कार और अनेक प्रतिष्‍ठित सम्‍मानों से विभूषित कवि अशोक वाजपेयी के हाल ही में प्रकाशित नए कविता संग्रह ' कहीं कोई दरवाज़ा ' पर डॉ.ओम निश्‍चल का आलेख। 




कहीं कोई दरवाज़ा

अशोक वाजपेयी

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्‍ली

मूल्‍य 250रुपये                 


कविता में एक गहरी सॉंस



विता क्‍या उम्‍मीद का कोई गवाक्ष है जिसके खुलने की प्रतीक्षा कवि को सदैव रहती है। वह तेजी से बंद होते दरवाजों और बढ़ते अंधेरे के बीच इस भरोसे पर कायम रहता है कि शायद कविता की दस्‍तक से कोई दरवाज़ा खुले। इसी कोशिश का परिणाम है अशोक वाजपेयी का नया कविता संग्रह कहीं कोई दरवाज़ा। फ्रांस के एक शहर नान्‍त के नीरव एकांत और लोआर नदी के सान्‍निध्‍य में लिखी गई ये कविताएं अशोक वाजपेयी के उत्‍तरजीवन की उत्‍तरदायी अभिव्‍यक्‍ति के रूप में सामने हैं। 2009 से 2012 तक के समय में दर्ज इन कविताओं में मेरा ध्‍यान सबसे पहले जिस कविता पर ठिठकता है वह है 'जागै अरु रोवै'। यह कबीर की एक पदावली है जिसमें वे कहते हैं, 'दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै'। यानी इस संसार के दुख से द्रवित कवि जाग रहा है, बाकी सब सो रहे हैं। इस अहरह सोते संसार को देख कर ही कबीर ने कहा होगा कि केवल दुखिया दास कबीर जाग रहा है जब कि बाकी सब खा-पीकर तान कर सो रहे हैं। आखिर कवि ही क्‍यों जागता है, इन सोये हुओं को कोई जगतगति क्‍यों नहीं व्‍यापती, कोई विलाप इनकी नींदों में दखल क्‍यों नहीं देता? केवल जाग रहा कवि ही क्‍यों इस विलाप को सुनता और द्रवित होता रहता है?

ऐसा इसलिए कि कवि अपने को 'परिभू स्‍वयंभू भाव' से इस भावजगत का रचयिता मानता है। कविता जीवन के हर क्रिया व्‍यापार को निकट से अवलोकती है। वही है जो आकाश-धरती को गले मिलते, हरी घास को छूते वृक्ष, पीले फूल कुतरती चिड़िया, प्रेमपत्र लिखती लड़की, एक निरीह बच्‍चे पर बंदूक दागते सैनिक, सूनी आंखों से ताकते बूढ़े, किसी प्राचीन भवन की  खिसकती ईंट, अचानक सड़क पर निकल पड़े बच्‍चे तथा यहां तक कि मौन के कगार पर लड़खड़ाते हुए शब्‍दों तक को निहारती है, उनके पास जाती है। कहीं कोई दरवाज़ा पढते हुए हम इसी कवि-चिंता में शरीक हो उठते हैं। उसके शब्‍दों में कविता एक अविरल विलाप है जिसमें सब कुछ के बीतने रीतने का संताप ध्‍वनित होता है। अशोक वाजपेयी को ऐश्‍वर्य और वैभव का कवि मान कर भले ही देखा जाता रहा हो, पर वैभवसंपन्‍न कवि के रचे संसार में भी आखिरकार सत्‍य की ही दुंदुभि बजती है। आखिरकार ऐसा कवि भी इसी नतीजे पर पहुंचता है कि वैभव आखिरकार ध्‍वस्‍त होता है, बेशक उसकी आकांक्षा कभी नहीं मरती। इन कविताओं में कवि की आस्‍था फिर शब्‍दों के प्रति सबल हुई है और जीवन को देखने-समझने के लिए नए व मौलिक बिम्‍बों के उपार्जन में वह सतत अग्रसर हुआ है। तभी वह पहली ही कविता टोकनी में कहता है: 'दुख रखने की जगहें धीरे-धीरे कम हो रही हैं।'  अशोक वाजपेयी भले ही दुख-दारिद्र्य के पसरे अँधेरे को उतनी प्रामाणिकता से न उकेर पाएँ पर उनके प्रेक्षणों की ताजगी पर प्रश्‍नचिह्न नहीं लगाया  जा सकता। उनके कुछ अवलोकनों को बानगी के तौर पर देखा जा सकता है। जब तक तेज धूप, हवा या बारिश न हो, लोग छाते लेकर नहीं निकलते। ऐसा हो तो लगता है छाते ही छाते सड़क पर चल रहे हैं। कवि कहता है ऐसा न हो तो किसी को याद भी नहीं रहता कि छाता कहां दुबका पड़ा है। इसी तरह पिता के जूते जो यों ही रखे रखे कहीं एक दिन बिला जाते हैं, हमें याद भी नहीं रहता।

शब्‍द को लेकर अशोक वाजपेयी ने यहॉं बहुधा विचार किया है। नेरूदा, पॉज और ब्रेख्‍त ने भी शब्‍द को लेकर कई कविताऍं लिखी हैं। काव्‍यानुभूति जब शब्‍दों में परकायाप्रवेश करती है तो वह कितनी सार्थक हो उठती है।  कवि के अनुभव कोष से जुड़ कर शब्‍द दर शब्‍द विरल और बहुवस्‍तुस्‍पर्शी हो उठता है। इन्‍हीं शब्‍दों से कवि अपना शास्‍त्र रचता है। यही शब्‍द हैं जिन्‍हें बरतने के बारे में अपनी पुस्‍तक 'शब्‍द' में सार्त्र लेखक को सावधान करते हैं। अशोक वाजपेयी जैसे इन पुरखे पुरनियों की इस शास्‍त्र गाथा से सुपरिचित हों। वे लिखते हैं: 'इस तरह लिखता हूँ/ जैसे भाषा से नहीं, कालकोष से उठाता हूँ शब्‍द/ इस तरह लिखता हूँ/जैसे सब कुछ थमने के पहले/ कुछ ठिठका हुआ है/ शब्‍द-सा, काल-सा, वृक्ष-सा, हरीतिमा-सा।' प्रकृति के प्रति कवि की प्रणति ही है जो वह एक हरी पत्‍ती को कविता का आदि शब्‍द घोषित करता है और एक पक्षी को प्रकृति की विनयपत्रिका का पहला पद्य मानता है। वह चहचहाते पक्षियों को अपने शब्‍दों के घोंसले में कुछ देर सुस्‍ताने के लिए न्‍योतना चाहता है, उसकी इच्‍छा है कि वह अपनी कविता की दहलीज़ से ईश्‍वर की अहरह बरसती करुणा को पुकारे। क्‍योंकि वह जानता है सचाई को सिर्फ कविता में सुना या पुकारा जा सकता है।

किसी भी बड़े कवि का यह लक्षण है कि वह न केवल कवियों के उत्‍तराधिकार को बरतता है बल्‍कि अगली पीढी के लिए उत्‍तराधिकार छोड़ भी जाता है। कविता ही जैसे कवि की लिखित वसीयत हो।  'अपने हाथों से उठाओ पृथ्‍वी' अशोक वाजपेयी के इस संग्रह की कुछ चुनिंदा कविताओं में एक है जिसमें हमारे पुरखे कवियों की आकांक्षा-सी ध्‍वनित होती है। उनका संदेश ध्वनित होता है। सब कुछ 'एष:आदेश: एष:उपदेश:' वाले भाव में। इस जराजीर्ण पृथ्‍वी को फिर से रचने-संवारने के लिए यह जैसे एक बूढे होते कवि की अनन्‍य इच्‍छा हो। 'अपने हाथो से उठाओ पृथ्‍वी' कह कर वह छह महाद्वीपों में बँटी हुई पृथ्‍वी के घायलों, बेघरबारों, अकारण मारे जाने वालों का जायज़ा लेता हुआ मनुष्‍यों से कहता है, 'इसे अपने हाथो से उठा कर महसूस करो। महसूस करो कि असमय सूख रही नदियों, अकालनग्‍न होते पर्वतों के बावजूद इसकी वत्‍सलता कभी चुकने वाली नही है । अभी भी यह तुम्‍हारे गुनाहों को विस्‍मृति के क्षमादानों में फेंकती जा रही है।' कवि के इस कथन को उसी के शब्‍दों में:

अपने हाथों से उठाओ पृथ्‍वी
क्‍योंकि उसके पास ऑंसुओं का पैतृक नमक है
क्‍योंकि उसके पास गान की सघन मधुरिमा है
क्‍योंकि वह अब भी गीली मिट्टी का लोंदा है
जिसे तुम अपने हाथों से
सूर्य की तरह उज्‍ज्‍वल और उत्‍तप्‍त
आकाश की तरह असीम
गढ़ सकते हो

कौन कह सकता है कि यह ऐश्‍वर्य और आभिजात्‍य में डूबे किसी कवि का एकालाप है। बल्‍कि यह जीती-जागती मनुष्‍यता से उसका संवाद है। प्रार्थना हालांकि अशोक वाजपेयी की कविता में बहुधा व्‍यहृत शब्‍द है पर यहॉं वह चाहता है कि कविता को एक प्रार्थना की तरह ही नहीं, एक चेतावनी की तरह सुना जाए। याद रहे कुँवर नारायण ने ध्‍वस्‍त पारिस्‍थितिकी की चिंता व्‍यक्‍त करते हुए एक कविता में लिखा था: बचाना है नदियों को नाला हो जाने से। यह कविता किसी खुशफहमी में नहीं रहती कि ऐसा हो ही जाने वाला है। तभी तो कवि अगली ही कविता में यह कहना नहीं भूलता कि यह समझ में आना मुश्‍किल है कि इस सदी के खून-रँगे हाथों में अधमरा अंत:करण  हमने नहीं किसी और ने थमाया है और हम सिर्फ दूर बैठे तमाशाई हैं। (तेजी से क्‍यों?) फिर भी कवि इस आशा से मुखरित हो उठता है कि ' इस छंदहीन पल में/फिर भी एक टूटी-बिखरी लय/लपेटती है दृश्‍य को/कुछ हमें अंतिम आश्‍वासन दे रहा है।' (शुरुआत की अँधेरी शाम)

बरसों से पार्थिवता के उपासक मान लिए गए और देह को बहुविध गाने वाले कवि के रूप में विश्रुत अशोक वाजपेयी के यहॉं तरोताज़ा और अभी-अभी नहा कर पैदा हुए निर्माल्‍य की तरह बिम्‍बों की अनेक लड़ियॉ भी दीख पड़ती हैं जो यों तो पहले से ही उनके काव्‍यात्मक व्‍यवहार का हिस्‍सा रहे हैं पर 'दुख चिट्ठीरसा है' में जिनकी सघनता स्‍पष्‍ट दीख पड़ती है और 'कहीं कोई दरवाज़ा' में भी जिसकी विवृति कम नहीं है। लगतार मित्रहीनता वाले इस समय को देखते हुए वे एक ऐसे मित्रहीन आकाश की परिकल्‍पना करते हैं जिसकी खिड़की बंद कर लेने और मित्रों से अलविदा कहने के बाद मटमैली मेज पर पड़े कागजों पर बहुत दिनों तक कुछ लिख पाना मुमकिन नहीं होता। वे लगातार शब्‍दों के कम पड़ते जाने से चिंतित होते हैं, और बहुत कुछ के न सुने जाने से भी। इस कोलाहल में जैसे सच्‍चे शब्‍दों की समाई ही न हो। 'क्‍या यही बचता है अंत में ?' वे पूछते हैं। इस निर्मम दुनिया के घात-प्रतिघातों से कवि भी आखिर कहां अछूता रह पाता है, बल्‍कि वह कहीं ज्‍यादा ही भुगतता है। तभी तो वह कहता है: 'हमारी कथा अद्वितीय नहीं है: सबके साथ यही होता है---फिर भी हमें यह दुख है कि हमारे साथ ऐसा क्‍यों हुआ।'

'मंडला के रास्‍ते कुछ कविताऍं' 'कौन जानता है' से 'पलाश के अंतिम दिन हैं' पर खत्‍म होती हैं। पर इस संग्रह का उर्वर प्रदेश है 'नान्‍त' खंड की कविताएं। नान्‍त जैसे कि जिसका अंत न होता हो। ये कविताऍं अपने आशयों में जीवित-पुनर्जीवित होने की अमरता से आक्रांत लगती हैं। फ्रांस के एक छोटे से शहर के एकांत में शब्‍दों के बीच के मौन की पुकार सुनते हुए ध्‍यानस्‍थ अशोक वाजपेयी की कवि-कल्‍पना जैसे कि एकांत में ही पल्‍लवित और पुष्‍पित होती है। लिहाजा 'विनय गीत', 'यह जो', या 'खुले नैन मैं हँस हँस देखूँ' जैसी प्रेम कविताओं में उनका विनयी रूप दीख पड़ता है, जबकि अन्‍यत्र वे प्रेम में एकाधिकारवादी होते आए हैं। 'इतनी भर' कविता में वे लिखते हैं—'दुनिया इतनी भर बचेगी /जितनी एक बच्‍चे की किलकारी में बस सके।' काश कि ऐसा हो पाता। यह शायद उत्‍तर जीवन की सिद्धि है कि कवि के शब्‍दों से स्‍वस्‍तिवाचन की गंध आती है। 'करो प्रार्थना' को ही लें, तो कवि कहता है, 'करो प्रार्थना कि हरी पत्‍तियॉं कुछ दिन और हरी रहें/पक्षियों की आयु कुछ लंबी हो। प्रार्थना करो कि शब्‍दों पर भरोसा बना रहे।' पर उम्‍मीदों के रोशन स्‍पेस में वे बार-बार निराशा से भी घिरे नज़र आते हैं। पूछने का मन होता है कि क्षणभंगुरता के सार्वभौम सच को जानते हुए भी भला वे इस बोध से द्रवित क्‍यों रहते हैं कि ‘सब कुछ वही है, वही रहेगा: फिर हम ही क्‍यों बीत जाऍंगे?’ आखिर सबकी मुक्‍ति के लिए की गयी प्रार्थना उन्‍हें एक निराश प्रार्थना में बदलती हुई क्‍यों लगती है? जबकि वहीं कहीं से कोई दरवाज़ा खुलने की आहट भी आती है। उन्‍हें रह रह कर ,यह  क्‍यों लगता है कि पृथ्‍वी वसुंधरा है भग्‍नहृदयों, पापों, विलापों और ऑंसुओं की। इस खंड में कुछ गद्य कविताऍं भी हैं। नदियों का मेला, सब चल रहे हैं, कोई पहरा दे रहा है, लोग प्रतीक्षा करते हैं, जब-जब । पर अपने गद्यात्‍मक विन्‍यास के अलावा वे अन्‍य कविताओं से अलग नहीं हैं।

इस संग्रह में अशोक वाजपेयी फिर प्रकृति के करीब जाते हैं। नदी, धरती, हवा, आकाश के स्‍पंदन को निकट से सुनते हैं। नदी कुछ कहती रहती है में वे नदी को यह कहते हुए सुनते हैं: 'मैं नदी नहीं एक स्‍पंदित संसार हूँ/ मैं एक अहरह लिखा जा रहा प्रेमपत्र हूँ.../मैं हूँ एक प्रार्थना सजल।' वे कबीर की सुपरिचित पदावलियों से अपनी कविताऍं बुनते हैं। खुल गए गगन-किवाड़, अधर मँड़ैया छावै, ताते अन्‍चिन्‍हार मैं चीन्‍हा, जागै अरु रौवै ऐसी ही कविताऍं हैं। किन्‍तु शब्‍दों को लेकर इतने उत्‍तरदायी ढंग से पेश आते हुए भी अंत में वे फिर संशयी-से दिखते हैं और कहते हैं: 'हमारी भाषा में अहंकार भले न हो/विनय भी नहीं था/हम गहरे पैठने से बचते रहे/ और शब्‍द-सतह पर ही तैरते रहे/ हमारे पास धीरज तो बहुत था/ पर सचाई देख पाने की ताब नहीं।'(इतना वक्‍त कहॉं था!) यह जानते हुए भी कि वक्‍त लोगों को घूरे पर फेंक देता है, वैभव आखिकार ध्‍वस्‍त होता है, वक्‍त के अभाव का मलाल क्‍योंकर? शब्‍दों की दुनिया का यह नागरिक अपने कवि-वैभव के चरम पर पहुंच कर भी यदि 'कहॉं से उठाऊँ शब्‍द'' के असमंजस से घिरा है तो यह उसकी नेकनीयती है कि वह शब्‍द को उसकी पर्याप्‍त संगति में रखना चाहता है। ब्रह्मांड में चलती अमानवीय लीलाओं को देख वह हताशा से परेशान होता है क्‍योंकि कविता ही अपने समय की सबसे सच्‍ची गवाही है और कवि को शब्‍दों को उसके सही परिप्रेक्ष्‍य में चीन्‍हना, ऑंकना और बरतना होता है। कहीं कोई दरवाज़ा अशोक वाजपेयी के कृतित्‍व का निश्‍चय एक सार्थक मोड़ है; उन्‍हीं के शब्‍दों को उधार लेकर कहें तो यह उस दरवाजे़ की तरह है जो जितनी बार खुलता है उतनी बार गहरी सॉंस लेता ।


जी-/506 ए, उत्‍तम नगर, नई दिल्‍ली-110059 
फोन: 09696718182,  मेल: omnishchal@gmail.com

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                                                                                                                  माह के कवि
                                                                                                             - अशोक बाजपेयी

इतनी भर


दुनिया इतनी भर बची है
जितनी एक कविता में आया जाए.

 
दुनिया इतनी भर है अब
जितनी एक उपन्यास में समा  जाए.


दुनिया इतनी भर बाकी है
जितनी एक बच्चे की किलकारी में विहँस सके.


दुनिया इतनी भर बचेगी
जितनी एक खाए फल के छिलके में हिलगी रह सके.


दनिया उससे बहुत कम निकली
जितना उसके सपने में हम समझे थे.

नान्त २६ मई २०१२














खुले नैन मैं हँस-हँस देखूं’


खुले नैन से पुकार रहा हूं
कह रहा हूं:
हरी घास से
कि पास आओ,
गगन-किवाड़ से
कि पास आओ,
नदी से, प्रपात से,
पर्वतों की ऊंचाई से
पठार के धीरज से,

 
प्रेम से, शब्दों से
अक्लांत उदारता से
अधलिखी प्रार्थना से
अनलिखी कविताओं से,

 
अपने रहस्यों को
सख्ती से छुपाये हुए
पृथ्वी से—

 
खुले नैन मैं हँस-हँस कर देखते हुए
सिर्फ इतना ही तो कह रहा हूं:
पास आओ.

१६ जून २०१२ नान्त














कोई नहीं सुनता


कोई नहीं सुनता पुकार--
सुनती है कान खड़े कर
सीढियों पर चौकन्नी खड़ी बिल्ली,
जिसे ठीक से पता नहीं कि
डर कर भाग जाना चाहिए या
ठिठककर एकटक उस ओर देखना चाहिए।

कोई नहीं सुनता चीख़--
सुनती है खिड़की के बाहर
हरियाये पेड़ पर अचानक आ गई नीली चिड़िया,
जिसे पता नहीं कि यह चीख़ है
या कि आवाज़ों के तुमुल में से एक और आवाज़।

कोई नहीं सुनता प्रार्थना--
सुनती है अपने पालने में लेटी दुधमुंही बच्ची,
जो आदिम अंधेरे से निकलकर उजाले में आने पर
इतनी भौंचक है
कि उसके लिए अभी आवाज़
होने, न होने के बीच का सुनसान है।














धूप


धूप में इतनी खिलखिलाती हरियाली
चिड़ियों की ऐसी चहचहाहट
क्या धूप ऐसे ही गाती है
जब थोड़ा-सा अलसाकर
वापस आती है!

२ जून २०१२ नान्त

















जागै अरु रोवै’


खाकर वे सो रहे हैं
जागकर हम रो रहे हैं.

 
क्या यह तय था
कि ज्यादातर सोयें
कि कुछ ही जागें और रोएं?

 
सोनेवालों में से कुछ की नींद में
क्या कभी कोई सपने नहीं जागते,
कोई विलाप नहीं उभरता?

 
कविता सब कुछ के बीतने पर
अविरल विलाप है---
पर जो हँस-खेल कर
अपने दिन बिताना चाहते हैं
वे क्योंकर इस विलाप पर ध्यान दें.

१६  जून २०१२ नान्त

















इतने सारे रास्ते


नदी.
नदी पर लंबा पुल.
नदी-किनारे लंबा रास्ता.
नदी में पानी के कई रास्ते.
बीच-बीच में उड़ते कई पक्षी
बनाते अधर में अपने रास्ते चिन्हहीन.

 
रास्तों पर लोग, पशु-पक्षी, कीड़े.
सब कहीं न कहीं जाते हुए—
कुछ यों ही भटकते हुए:
हमारे पास पाने-गंवाने के लिए
कितने रास्ते हैं!

१४ जून २०१२ नान्त

















सब कुछ बीत जाता है


सब कुछ बीत जाता है—
समय और सपने,
पीठ का दर्द और
दांतों के बीच फंसे रेशे की अकुलाहट,
बिना सवारी
दूर तक खींचे गए सूटकेस का थकाऊ बोझ,
हरियाली से घिरकर
सघन हुआ उल्लास, पंखुरी पंखुरी खुलती देह—
सब कुछ बीत जाता है.

 
सुबह की चिड़िया की तरह
स्मृति फुदकती है
इधर से उधर
तेजी से याद आती और धूमिल पड़ती
छबियों पर---
कोने में अनबुहारे पड़ा
सपनों का कचरा,
अंतःकरण पर छब गया कीचड़—
सब कुछ बीत जाता है.

 
शाम की आखिरी ट्रेनों के बाद
सुनसान पड़े प्लेटफॉर्म पर
हम खड़े रहते हैं
बिना जाने कि अब रैनबसेरा कहां होगा?
सब कुछ बीत जाता है—
सुनसान भी, शाम भी, रैनबसेरा भी.

२२ मई २०१२ नान्त














थोड़ा-सा


अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी –

जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नम्बर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,
जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुँचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता –

वही थोड़ा-सा आदमी –
जो धोखा खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,
जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिये
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता,

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,

वही थोड़ा-सा आदमी –
जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीज़ों का गोदाम होने से बचाता है,
जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता.

वही थोड़ा-सा आदमी
जिसे ख़बर है कि
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आँगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण

वही थोड़ा-सा आदमी –
अगर बच सका तो
वही बचेगा.














गाढे अंधेरे में


इस गाढे अंधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है :
हत्यारों का बढता हुआ हुजूम,
उनकी ख़ूंख़्वार आंखें,
उसके तेज़ धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
हमारे पास अंधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है
और न हमारी आंखों को अंधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।
यह अजब अंधेरा है
जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है
और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढे अंधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है :
क्या कभी-कभार कोई अंधेरा समय रोशनी











 


यह विलाप नहीं है


यह विलाप नहीं है
एक नीरव प्रार्थना है
जो किसी देवता को संबोधित नहीं है :
उसमें कोई शब्द भी नहीं है कातर या व्याकुल,
वह एक दिग्हीन चीख़ है
किसी पक्षी की जो दूरदेस से लौटने पर पाता है
कि तिनका-तिनका जोड़कर बनाया उसका घोंसला
आंधी उड़ा ले गई है।

यह प्रार्थना है
जिसमें खारे पानी के क़तरे हैं
अपनी हर बूंद में बिलखते हुए
जिन्हें पता है कि उन्हें
अब अनदेखे और अकेले ही सूख जाना है।
यह सारी नमी को सोखते हुए
सब कुछ को ठूंठ में बदलने पर विलाप है।

यह ध्वस्त मंदिर के पिछवाड़े पड़े मलबे में दबी
भग्न मूर्ति के ऊपर रेंगती दीमकों की क़तार का विन्यास है :
यह चिथड़ों की तरह
तेज़ हवा में फड़फड़ाते
दुख के अवाक होते जाते शब्दों का बीहड़ संगीत है।
संसार में जहां कहीं भी आंसू झर रहा है
सिसकी या चीख़ है
वे सभी वही इस प्रार्थना की इबारत हैं।
यह विलाप नहीं है।

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                                                                                                                              मथन


  क्या है साहित्यकार की प्रतिबद्धिता समाज के प्रति और क्या है साहित्य,  आपके गुनन और मनन के लिए प्रस्तुत हैं  मंथन में दो दृष्टिकोण अपने समय के दो दिग्गज अज्ञेय और ऋीलाल शुक्ल द्वारा,                                                                                                                   





साहित्यकार और सामाजिक प्रतिबद्धता


  -- अज्ञेय


साहित्यकार की सामाजिक प्रतिबद्धता का सवाल, मुझे लगता है, पुराना पड़ गया है। मैं सोचना चाहता था कि यह उन सनातन प्रश्नों में से एक है जो कभी पुराने नहीं पड़ते और जिसका जवाब हर साहित्यकार को अपने जीवनानुभव में बल्कि अपने-आप में और अपने ज्ञान के आधार पर खोजना पड़ता है; लेकिन जिस रूप में और जिस अर्थ में यह प्रश्न सनातन होता वह रूप और वह अर्थ आज इस प्रश्न का नहीं रहा है। आज अधिकतर लोग इस सवाल के दो अधूरे उत्तर पा चुके हैं, जो दोनों ही अपने अधूरेपन के कारण और उस अधूरेपन में मिल जाने वाली निर्भ्रान्तता के आभास के कारण खतरनाक हैं।

एक उत्तर यह है कि क्यों कि मेरी निष्ठा अपने प्रति है और साहित्य के प्रति है, और यह निष्ठा साधना का एक रूप होने के कारण दूसरे किसी का उस में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है, इस लिए सामाजिक प्रतिबद्धता का कोई मतलब नहीं है, कोई प्रासंगिकता नहीं है। निःसन्देह एक अर्थ में और एक परिधि में ( या यों भी कह सकते हैं कि एक परिधि के बाहर व्यापक क्षेत्र में ) यह बात सही है; लेकिन कहां सही है, इस की ठीक पहचान न होने से यह निष्कर्ष साहित्यकार को एक अँधेरी सुरंग के मुँह पर लाकर खड़ा कर देता है जिसके आगे केवल बढ़ता हुआ अँधेरा है। उस अँधेरे में हाथ-पैर पटकने का (या चीखने का भी) एक उपयोग हो सकता है और व्यक्ति के विकास में योग भी हो सकता है। लेकिन वह रास्ता साहित्यकार का रास्ता नहीं है। जो लेखक इस उत्तर से संतुष्ट है उस ने सम्प्रेषण के अनिवार्य लक्ष्य से अपने को काट लिया है। साहित्यकार के लिए दूसरे तक पहुँचना जरूरी है, बल्कि दूसरे तक पहुँचना ही उस का लक्ष्य है और वही उस के कर्म को अर्थ और संगति देता है; और वह दूसरा उस सुरंग के भीतर नहीं है।

दूसरा उत्तर यह है कि साहित्यकार समाज की उपज है, समाज में होता है और इस अर्थ में समाज का देनदार है। उसे समाज के लक्ष्यों में योग देना चाहिए और समाज की प्रगति के साथ प्रतिबद्ध होना चाहिए। यह उत्तर भी अपनी सीमा में ठीक है; लेकिन इस में विकृति वहां है जहाँ यह मान लिया जाता है कि जो सामाजिक लक्ष्य है और प्रगति की जो दिशा है उस का निर्धारण साहित्यकार को अपने विवेक से नहीं करना है बल्कि उसका संकेत, उस का आदेश उस को दूसरों से मिलने वाला है—ऐसे दूसरों से जो अपने को ही समाज मानते हैं, कम-से-कम इस अर्थ में कि सामाजिक प्रगति का निर्धारण करने का अधिकार वह अपना मानते हैं और साहित्यकार के विवेक को इस मामले में स्वतंत्र मानने को तैयार नहीं हैं। अर्धात् सामाजिक प्रतिबद्धता वहाँ उन निर्धारकों के लक्ष्यों के साथ प्रतिबद्द हो जाती है। अँधेरी गुफा का रूपक यहाँ लागू नहीं होता। लेकिन दूसरों के लक्ष्यों के साथ प्रतिबद्धता साहित्यकार के लिए एक मानसिक गुलामी का स्वीकरण है जो इस लिए और भी घातक है कि लक्ष्य निर्धारण करने वाले इन दूसरों का उद्देश्य साहित्यिक नहीं है, सांस्कृतिक भी नहीं है, आर्थिक अथवा प्रशासनिक व्यवस्था को छोड़ कर किसी दूसरे अर्थ में ’ सामाजिक ’ भी नहीं है। यह हो सकता है कि उन के आर्थिक लक्ष्य अच्छे हों और देश की आर्थिक समृद्धि के लिए उपयुक्त हों ; यह भी हो सकता है कि उन के प्रशासनिक उद्देश्य देश में शान्ति-व्यवस्था और स्थायित्व लाने वाले अथवा अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को सुधारने वाले हों। लेकिन दो सच्चाइयों को किसी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकताः पहली यह कि जो प्रतिबद्धता चाही गयी है वह सामाजिक नहीं है बल्कि चाहने वाले दल अथवा समुदाय अथवा समाज के साथ बँधी हुई है (यानी इसी अत्यंत सीमित अर्थ में ’ सामाजिक है), और उसी की सत्ता को बनाए रखने के लिए है। यानी अगर वह दल या समाज सत्ताधीन है तो वह प्रतिबद्धता यथास्थिति के पक्ष में है, और अगर वह बाहर है और सत्ताकामी है तो वह प्रतिबद्धता यथास्थिति के विरुद्ध है और ’ क्रान्तिकारी’ है। लेकिन दोनों स्थितियों में है वह सत्ता के लक्ष्य की अधीनता ही।

दूसरी सच्चाई यह है कि प्रतिबद्धता की इस अवधारणा में साहित्यकार के विवेक के लिए कोई गुंजाइश नहीं रखी गई है। साधारण नागरिक के , अथवा नागरिक होने के नाते साहित्यकार के लिए यह अनिवार्य हो कि वह सत्ता से अपने सम्बंध के बारे में निर्णय करे, लेकिन क्या साहित्यकार की हैसियत से साहित्यकार के लिए ऐसी प्रतिबद्धता अनिवार्य है। और अगर है भी तो इस परिणाम पर साहित्यकार को अपने स्वाधीन विवेक से पहुँचना है या कि कोई दूसरा ( चाहे अपने को समाज कह कर ही) उस से वह माँग करने का अधिकार रखता है कि तुम्हें हमारे साथ प्रतिबद्ध होना होगा ?

मैं जब साहित्यकार हूँ तब सँप्रेषण का तो एक व्रत ही मैने ले लिया है। यह मेरा उत्तराधिकार है कि मैं दूसरे तक पहुँचूँ , दूसरे तक वह मूल्यबोध पहुँचाऊँ जिन के बारे में मेरा सहज विवेक मुझे आश्वस्त करता है कि ये मूल्य उस पूरे समाज के जीवन को अधिक गहरा, समर्थ, समृद्ध और अर्थवान बना सकते हैं। इन मूल्यों के सम्प्रेषण का, उन की चेतना जगाने का, मेरा अक्षुण्ण अधिकार और अपरिहार्य कर्तव्य ही मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता है; और यह प्रतिबद्धता किसी भी वर्ग, दल, समूह अथवा प्रतिष्ठान के हित अथवा सत्ता से निरपेक्ष है।

इस बात को मैं यों भी कह सकता हूँ कि साहित्यकार के नाते मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता जिस समाज के साथ है वह मुझ में है और मेरी अपेक्षा में ही अस्तित्व रखता है, ठीक वैसे ही जैसे कि मैं उस समाज में हूँ और उस की अपेक्षा में ही बना रह सकता हूँ।

इस बात का संदर्भ शायद स्पष्ट करने की आवश्यकता हो। साहित्य एक सम्प्रेषण है तो वह सम्प्रेषण की प्रक्रिया का एक माध्यम भी है। इस वाक्य को लोग आसानी से इस लिए स्वीकार कर लेंगे कि वे सोचेंगे कि भाषा की बात हो रही है, क्यों कि यही तो सम्प्रेषण का माध्यम है। लेकिन असल में बात भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक सम्प्रेषण की बात मुख्यतया भाषा के बारे में है ही नहीं। साहित्यिक सम्प्रेषण का माध्यम वह समाज है जिस में सम्प्रेषण की यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

इस माध्यम की ओर आज किसी का ध्यान नहीं है। समाज, सामाजिक परिवेश, सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक प्रतिबद्धता की इतनी चर्चा के बीच यह बात अनदेखी रह जाती है कि समाज सम्प्रेषण का माध्यम हैऔर समाज को इस माध्यम के रूप में देखे-समझे बिना न साहित्य को समझा जा सकता है, न साहित्यिक रचना प्रक्रिया को, न समाज में साहित्यकार की स्थि को। स्वयं भाषा का और साहित्य विधाओं का विकास भी बहुत दूर तक इस पर निर्भर करता है कि सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में समाज कहाँ और कैसे बदल रहा है। समाज केवल आर्थिक सम्बन्धों के एक जाल का नाम नहीं है। आर्थिक सम्बन्ध जितना महत्व रखते हैं, कम-से-कम उतना ही महत्व संवेदना के जाल का भी है और इस बात का भी महत्व है कि विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न संवेदन अतिरिक्त सजग हो उठते हैं या कि उनकी सजगता सीमित हो जाती है। हिन्दी का आलोचक ही नहीं, प्रतिबद्धता की बहस में लगा साहित्यकार भी मानो इस बात को भूल जाता है कि , रचना क्यों कि सम्प्रेषण से अलग नहीं है, इस लिए लगातार इस सम्प्रेषण माध्यम (अर्थात् समाज) की स्थिति के बारे में सजग रहना और उसी के अनुरूप अपनी भाषा को ढालना, विधाओं के अपने उपयोग को परिवर्तित करना और इस या उस संवेदन या संवेदन-पुंज को उभारना या अधिक संयमित करना साहित्यकार का सहज और स्वाभाविक कर्म है। रचना परिस्थिति में से उपजती है; और परिस्थिति सब से पहले उस सम्प्रेषण माध्यम की स्थिति है जिस में रचना हुई है और जिस के बीच तथा जिसके द्वारा वह दूसरे तक पहुँचेगी। संप्रेषण का यह देश-कालगत सन्दर्भ समाज का संवेद्य रूप है। अगर इस अर्थ में समाज साहित्यकार में और साहित्यकार समाज में नहीं है तो उस के चिन्तन के आर्थिक अथवा ऐतिहासिक आधार अर्थशास्त्री अथवा इतिहासकार की दृष्टि में कितने भी सही हों, वह समाज के साथ जुड़ा नहीं है।यह तो हो सकता है कि उस समाज की मेरी अर्थात् किसी भी लेखक की पहचान अचूक न हो या अधूरी हो। जिस हद तक ऐसा होगा उस हद तक मेरा ( अर्थात् किसी भी लेखक का) साहित्य भी निर्बल, कम प्रभावशाली और कम टिकाऊ होगा। यह भी हो सकता है कि मेरी प्रत्यभिज्ञा को अधिक विशद करने में दूसरों का सहयोग भी हो सके, दूसरों के मार्ग-निर्देश में मैं अपना रास्ता अधिक अच्छी तरह पहचान सकूं। लेकिन यह मेरा रास्ता तभी होगा जब मेरी पहचान में यह मेरा रास्ता हो। अगर वह मुझे स्वयं अपना रास्ता नहीं दीखता तो केवल प्रतिबद्धता के नाम पर उस पर बढ़े चलना, जहां तक सर्जना का प्रश्न है, अन्धेन नीयमाना इव अन्धाः वाली स्थिति स्वीकार करना होगा। और मैं समझता हूँ कि इस मामले में उपनिषद् की बात एकदम सही है कि अविध्या जिस अंधकार-लोक में गिराती है, विध्या उससे भी अधिक दुर्भेध्य अन्धकार में गिरा सकती है। समाज की सही पहचान के बिना, और अपने विवेक की आग में उसे शोधे बिना, तो तथाकथित सामाजिक प्रतिबद्धता होगी। वह साहित्यकार के साथ समाज को भी अँधेरे गर्त की ओर खींच ले जाएगी। सारे संसार का और स्वयं हमारे देश का भी, अधिक लम्बा नहीं, पिछले दशक का ही इतिहास इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि प्रतिबद्धता सत्तासीन दल के साथ हो अथवा सत्ताकामी दल के साथ, वह एक विशेष प्रकार की अवसरवादिता का ही दूसरा नाम है;वह सामाजिक प्रतिबद्धता तो नहीं ही है। और साहित्यकार अवसरवादी नहीं है, वह मूल्यनिष्ठ हो कर समाज के साथ प्रगाढ़ रूप से प्रतिबद्ध है।  


( अज्ञेय के निबंध संग्रह रचना और परिधि से साभार)





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साहित्य के लिये मेरी कसौटी


        -श्रीलाल शुक्ल



जो साहित्य का आनन्द लेना चाहते हैं उन्हें मेरी साहित्यिक कसौटी स्वीकार हो या नहीं, पर उनके लिये अच्छे और बुरे में किये बिना साहित्य पढ़ना उत्कृष्ट कोटि के साहित्यिक अनुभवों से अपने को वंचित कर देना है। व्यक्तिगत रूप से रोचक और बढ़िया कोटि के घटिया साहित्य का सामना होते ही मैं रामचरितमानस या वाल्मीकीय रामायण जैसे पुराने ऊबाऊ साहित्य की ओर पलायन करने को ज्यादा सुखद और सुरक्षित समझता हूं।

प्रत्यक्षत: प्रभावशील हो सकता है और अपने पूरे तामझाम के साथ ऊपर से ऐसा दीख सकता है जैसा कि उसका समान्तर असली साहित्य। पर ऐसा साहित्य हमारे लिये अनुभव-संसार में कुछ जोड़ नहीं सकता, वह सिर्फ़ हमें कुछ देर के लिये उत्तेजित कर सकता है। बढिया किस्म के घटिया साहित्य का एक अच्छा नमूना, बकौल जार्ज आर्वेल, रडयार्ड किपलिंग की कवितायें हैं और हिंदी में बकौल मेरे, रीतिकालीन काव्य का लगभग दो तिहाई हिस्सा है। आधुनिक हिंदी साहित्य में भी कथा-साहित्य और कविताओं का एक बड़ा भारी हिस्सा ऐसा मिलेगा जो अत्यंत शुद्ध किंतु निष्प्राण भाषा में बड़े सजग शिल्प के साथ लिखा जा रहा है। पर वह भाषा और शिल्प की पात-गोभी भर है। ऐसे साहित्य को सौम्यता से बरदास्त करना तो ठीक है, पर उसका चस्का नहीं लगना चाहिये।

बढिया किस्म का घटिया साहित्य वह है जो हमें अनुभव की गहराइयों में जाने से रोकता है, हमारे चिरपरिचित अनुभूति-जगत में ही ऊपर की सतह खुरचकर हरी-भरी फ़सलें उगाने की कोशिश करता है, हमारी उदात्त संवेदनाओं को पनपने का मौका नहीं देता, बहुचर्चित आदर्शों को स्वत: सिद्ध और स्थायी मानवीय मूल्य बनाकर प्रतिष्ठित करना चाहता है और यथार्थ के विभिन्न आयामों को न उघाड़कर यथार्थ की साहित्य में जो पिटी हुई रूढियां बन रही हैं, उन्हीं को हम पर आरोपित करता है। यह साहित्य हमारे सतही अनुभवों को बार-बार दुहराकर हमारी भावुकता का फ़ायदा उठाता है और हमारे भावनात्मक व्यक्तित्व को एक भी इंच ऊपर नहीं खिसकने देता। इस सारे घटियापन के बावजूद इसमें भाषा नाटकीय रूप से आकर्षक हो और तथाकथित मापदंडों से अत्यंत साहित्यिक हो, सृजनात्मक न होते हुये भी वह प्रांजल और छद्म रूप से काव्यमय हो, ऐसा साहित्य शिल्प की दृष्टि से भी संपन्न और

घटिया साहित्य दो किस्म का होता है। एक तो घटिया किस्म का घटिया साहित्य। उसके बारे में सभी लोग जानते हैं। दूसरा होता बढिया किस्म का घटिया साहित्य। उसके बारे में पाठक को चौकन्ना रहना चाहिये। इस कोटि का साहित्य पता नहीं कब बढिया बनकर पाठक की रुचि को बिगाड़ दे और उसे स्वाभाविक रूप से उत्तम साहित्य में रुचि लेने से रोक दे।

घटिया साहित्य का जिक्र करते हुये हमें यह भी न भूलना चाहिये कि आज प्रिंटिंग, प्रकाशन, पुस्कतक-व्यवसाय, साहित्य, शिक्षा -उसके पूर्णकालिक शिक्षक और पूर्णकालिक छात्र-इन सबने मिलकर साहित्य लिखने और लिखाने तथा साहित्य पढ़ने और पढ़ाने को हमारी सभ्यता का एक अनिवार्य अंग बना दिया है। इसलिये साहित्य की उपज भी व्यापक और व्यवसायिक तौर पर हो रही है। ऐसी स्थिति में घटिया साहित्य का उत्पादन प्रेस के ईजाद के बाद की घटना है। घटिया प्रतिभायें हमेशा से घटिया साहित्य निकालती आई हैं, सिर्फ़ आज उनके विस्तार और प्रसार की सुविधायें संभावनायें ज्यादा हो गयी हैं। इसलिये साहित्य के पाठकों को सावधान करने के लिये अंत में एक और बात कहना जरूरी समझता हूं।

ऊबाऊ साहित्य, और उसी के साथ, जिंदगी में भी बोरडम के मामले में मैं बर्टेंड रसल की शागिर्दी करना चाहूंगा। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ’द कान्क्वेस्ट ऑफ़ है्प्पीनेस’ में उन्होंने समझाया है कि जिंदगी में बोरडम या ऊब से घबराना या कतराना नहीं चाहिये, क्योंकि ऊब भी भरी-पूरी जिंदगी का अनिवार्य अंग है और उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिये। साहित्य का उदाहरण देते हुये उन्होंने उत्कृ्ट कोटि के क्लासिकी ग्रंथों का हवाला दिया है जो कई अंशों में प्रचलित लोक-रुचि में ऊबाऊ होते हुये भी असामान्य साहित्यिक अनुभव सृजित करने की सामर्थ्य रखते हैं। इसलिये समझ की बात यही होगी कि हम घटिया साहित्य से कभी-कभी मन बहलाव करते हुये भी , और उसे साहित्यिक दुनिया की अनिवार्य संक्रामक स्थिति मानते हुये भी, उत्कृष्ट साहित्य के बारे में अपनी धारणा बिगडने न दें। यानी,किसी फ़िल्मी तारिका के अभिनय की प्रसंशा करने के कारण ही यह जरूरी नहीं कि हम अपनी पत्नी के प्रति अपने प्रेम और आदर में कमी कर दें।

तभी जिसे उत्कृष्ट साहित्य समझा गया है, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा आज की रुचि के अनुसार उबाऊ, यानी ’डल’ और ’बोरिंग’ है। फ़ारसाइथ और मारियो प्यूजो के सनसनीखेज उपन्यासों को पढ़ने वाले टॉलस्टाय, दोस्तोयेव्स्की या टामस मान को बोरिग या उबाऊ समझ सकते हैं। जिसे पुराना क्लासिकी साहित्य कहते हैं, उसे शुद्ध आनंद के लिये पढ़ना अब अनेक शुद्ध साहित्यप्रेमियों के लिये भी भारी पड़ता है। एडवर्ड एल्बी और जॉन आस्बर्न की ’कॉंय कॉंय कॉंय’ शैली वाले नाटकों के आगे शेक्सपियर को साहित्यिक आनंद के निमित्त पढ़नेवालों की कमी हो सकती है। कालिदास के ’अभिज्ञान शाकुन्तलम’ को न पढ़कर बहुत से लोग ’आषाढ़ का एक दिन’ पढ़ना ज्यादा रुचिकर समझ सकते हैं, पर इससे समय-समय पर बदलने वाली लोकरुचि का भले ही आभास हो जाये, क्लासिकी साहित्य ने मानवीय अनुभवों और उसकी संवेदनाओं को जिस सीमा तक और जिस स्तर पर संपन्न किया है, उसे आसानी से नहीं भूला जा सकता।

साहित्य को इस निगाह से देखने का एक अर्थ यह भी होता है कि मेरे लिये साहित्य का रोचक और सरस होना जरूरी नहीं है। हो सकता है कि मेरी यह बात बहुतों को अटपटी जान पड़े, क्योंकि मेरे बहुत से पाठक स्वयं मेरे साहित्य को उसकी रोचकता के लिये ही पढ़ते हैं। रोचकता और सरसता, एक तो पढ़ने वाले की रुचि और उसकी रस-संबंधी अवधारणा का ही विस्तार है, दूसरे उत्कृष्ट साहित्य हमेशा रोचक हो, यह लाजिमी नहीं है। गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी का संपर्क, हो सकता है, किसी को किसी दिलकश अभिनेत्री या फ़िल्मी कमेडियन की सोहबत की भांति रोचक न लगे, तब भी मानवजाति की प्रगति में ये दोनों जिंदगी के जिन मूल्यों को इंगित करते हैं, उसे शायद समझाना जरूरी नहीं है।



तरह-तरह के लोगों से मिलते हुये मैं बहुतों को बरदास्त भले ही कर लूं पर वास्तविक खुशी उन्हीं से मिलकर होती है मेरे अनुभव-संसार को विस्तार देते हों, मेरी संवेदना की जमी परतों को खोलकर उसकी गहराइयों में उतरने के लिये मुझे प्रेरित करते हों। यही बात मैं साहित्य पर भी लागू करता हूं। अगर कोई साहित्य मेरे अनुभवों में कोई नया आयाम नहीं जोड़ता, परिचित स्थितियों के बीच मेरी मानसिक उदासीनता को तोड़कर संवेदना की नई गहराइयों में जाकर मुझे नहीं छोड़ता तो मैं उसे बरदास्त भर कर सकता हूं उससे आगे मेरे लिये वह कुछ नहीं है।

अब तक मैं साहित्य और जिंदगी की समान स्थितियों का काफ़ी उल्लेख कर चुका हूं और इसका एक कारण है। वह यह कि साहित्य मेरे लिये जिंदगी का एक अनिवार्य अंग है, ठीक उसी तरह जैसे जिंदगी मेरे लिये साहित्य का एक अनिवार्य अंग है, और यहीं अच्छे साहित्य की परख के विषय में मेरी एक मान्यता परिभाषित हो जाती है।

उपमा, रूपकों और कहावतों के जाल से निकलकर मैं शुरू में ही बता दूं कि मैं साहित्य से हमेशा कोई बहुत बड़ी उम्मीद या असाधारण अपेक्षा नहीं करता, ठीक उसी तरह जैसे की जिंदगी की असाधारण संभावनाओं को समझते हुये भी मैं सीधी-सादी जिंदगी की कद्र करता हूं। साहित्य की कोई भी कृति मेरे लिये ऐसी चुनौती नहीं है जो या तो मुझे झकझोर दे या मैं खुद जिसे अपनी आलोचनात्मक बुद्धि से झकझोर दूं, ठीक वैसे ही जैसे हर एक मोड़ पर मिलने वाला इंसान मेरे लिये कोई ऐसा प्रतिद्वंदी नहीं है जिससे या तो मैं लाजिमी तौर पर परास्त हो जाउं या खुद उसे परास्त कर दूं। तब तक वह खुद अपने को दुश्मन न घोषित कर दे,हर इंसान किसी न किसी बिंदु पर मेरा साथी है; वैसे ही जब तक कोई साहित्यिक कृति खुद अपनी असाहित्यिक विकृति के सहारे मुझे विमुख न कर दे, वह कहीं न कहीं मेरी आत्मस्वीकृति का अंग है।

जब कोई साहित्य की परख के लिये कसौटी की बात उठाता है तो यह मानकर चलता है कि साहित्य को खरे सोने जैसा होना चाहिये। पर साहित्य में खरे सोने की तलाश करते हुये भी मैं हमेशा अपने को दो बातों की याद दिलाता रहता हूं: एक यह कि जिंदगी में खरा होना ही सब कुछ नहीं है, कभी लोहे की भी जरूरत होती है, और कभी-कभी मिट्टी की भी। और दूसरी मशहूर कहावत में पहले ही कही जा चुकी है कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।        


(श्रीलाल शुक्लआकाशवाणी लखनऊ से 1983 में प्रसारित श्रीलाल शुक्ल-जीवन ही जीवन से साभार ) 

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                                                                                                                      विमर्ष


                                                                                                            -लक्ष्मीमल सिंघवी


  जनतंत्र और साहित्य


कई दशाब्दियों पूर्व बड़ी गरम चर्चा चली साहित्य और राज्याश्रय के अंतर्विरोध पर और धुरी हीनता नाम का पदार्थ साहित्य की आलोचना से आ जुड़ा। आजकल वह चर्चा ठंडी हो चली है। अब चर्चा गरम है कि साहित्य सेकुलर हो, दलित हो, स्त्री विमर्श और जाने क्या-क्या हो। मेरे मित्र स्व. वासुदेव गोस्वामी ' साहित्य-संगीत-कला विहीनः साक्षात्पशुपुच्छविषानहीनः' की विनोदपूर्ण व्याख्या करते थे। कहते थे कि आदमी अगर साहित्य-संगीत-कला से युक्त नहीं है तो बिना सींग-पूँछ के पशु है, साहित्य-संगीत-कला से युक्त है सींग-पूँछवाला पशु है। सींग या सिंह का संबंध एक ओर श्रृंगार से है, दूसरी ओर आदि वाद्य सिंगी या सिंगा से है। पूँछ का संबंध चित्रकला की तूलिका से है और साहित्य तो साक्षात गऊ है ही। पंडितों ने उसे कामधेनु भी कहा है। गऊ शब्द 'गम'  अर्थात जाना धातु से बना है, इसलिए वह स्वभाव से ही चार चरणवाला है। वह गतिशील है, कोई प्रगतिशील कहना चाहे तो प्रगतिशील कह ले, वह है बड़ा सीधा-सादा पशु, बड़ा पालतू। खूँटे से बाँध दो तो बँध जाए। अपने ढंग से तब चलता है जब छुट्टा छूट जाए। वैसे अपनी स्वतंत्रता में प्रतिरोध बर्दाश्त नहीं करता, उकसाने पर मरखना भी हो जाता है। ज्यादा नहीं, बस आतंकित भर करने को। हाँ, यह बात जरूर है कि इस मामले में बड़ा संवेदनशील होता है कि उसका जो इलाका है उसमें अगर कोई आता है तो मरने-मारने पर उतारू हो जाता है।


इस समय विचार का मुद्दा यह है कि साहित्य का जनतंत्र से क्या नाता है या उलटकर कहें तो जनतंत्र का साहित्य से क्या लेना-देना है। जनतंत्र के लिए जो तीन अभिलक्षण चाहिए, उनमें पहला है कि चुनाव हो और चुनाव में राजा-रंक सभी भागीदार हों, दूसरा कि उसमें असहमति की छूट हो, लेकिन तीसरा कि निर्णय बहुमत के आधार पर हो।


साहित्य इस मामले में तो जनतांत्रिक है कि वह सबको संबोधित है, प्राणिमात्र के सुख-दुःख के साथ उसकी साझेदारी है और साझेदारी को प्रेषित करना ही उसका धर्म है;  लेकिन मूल्यांकन मत-संग्रह द्वारा नहीं होता। लोकप्रियता की दृष्टि से या आजकल के परिप्रेक्ष्य में बिक्री की दृष्टि से बहुत सी उत्तम रचनाएँ अपने समय में लोकप्रिय नहीं होतीं और न उनकी बिक्री ही अधिक होती है। पर कालांतर में वे ही सामान्य-से-सामान्य व्यक्ति के कंठ में बस जाती हैं और उनकी गूंज बिना किसी प्रचार के दूर-दूर तक फागुन-चैत महीने के अरधान की तरह फैल जाती है। साहित्य लिखनेवाले को एक भी पारखी मिल जाता है तो अपने को कृतार्थ समझता है और पारखी न भी मिले, सहृदय श्रोता भी मिल जाये तो उसका संप्रेषण सार्थक हो जाता है।


साहित्य  और जनतंत्र की प्रक्रिया में एक अंतर और भी है। जनतंत्र चलता तो है सहमति के आधार पर. पर असहमति को बर्दाश्त करता चलता है। साहित्य ठीक उलटे, असहमति पर ही चलता है। असहमति ही एक तरह से साहित्य के लिए इकसावा होती है;  पर उसका उद्देश्य लोगों को अपनी और खींचना होता है।


जनतंत्र सर्वहित का संकल्प ही नहीं लेता, उस संकल्प की पूर्ति न कर पाए तो वह सत्ता को अस्वीकार भी कर देता है। साहित्य मुखर रूप से संकल्प भी नहीं लेता और पूर्ति तो अकेले उससे होती नहीं। पूर्ति तो उस समाज से होती है, जो साहित्य के संस्कार से दीपित हुआ है। अगर समाज साहित्य से प्रभावित होकर भी तटस्थ रह जाता है तो साहित्य ऐसे में कुछ विशेष कर नहीं पाता। साहित्य अनुभाविता पैदा करता है, कर्ता नहीं। यदि करता भी है तो प्रत्यक्ष नहीं। यह दूसरी बात है कि आल्हा-ऊदल सुनकर दो गाँव में लाठी  चल गई हो और इस आधार पर उसे युद्ध का कारण मान लिया गया हो। दरअसल आल्हा-ऊदल के नाते सोया हुआ प्रतिशोध भाव जगता है और उसका परिणाम लठैती की जोर-अजमाइश के रूप में सामने आ जाता है। यह भी हो सकता है कि नए प्रणय-प्रसंग में कुछ दोहे, कुछ शेर और अब तो फिल्मी गीत भी कुछ उद्दीपन कर देते हों ;   पर वहाँ भी साहित्य भला बुरा एक बहाना भर होता है। एक सीमा तक जनतंत्र भी बहुत कुछ नहीं कर पाता, करने की बात ही करता रहता है। जनतंत्र जितना ही स्वतंत्र होता है उतना ही कायदे-कानूनों का परतंत्र होता है। इसलिए जनतंत्र की गति धीमी होती है, उसके दावे जरूर बड़े तेज होते हैं। साहित्य तो कोई दावा ही नहीं करता। केवल वैसा ही दावा करता है जो अपने को मंत्र मान रहा हो। तुलसीदास-कबीरदास ने तो दावा नहीं किया था, न प्रसाद ने किया था, लेकिन ऐसे समझदार लोग जरूर हुए जिन्होंने तुलसी के दोहे-चौपाइयों को विभिन्न अनुष्ठानों के लिए मंत्र मान लिया। काशी के ही एक अध्यापक ' कामायनी' की पंक्तियों को ताबीज में रखकर देते थे और उससे तिजला ज्वर ठीक करते थे। कुछ साहित्यकार भी ऐसे होते हैं जो साबर मंत्र ही लिखते हैं--' अनमिल आखर अरथ न जाके।' ऐसी किसी रचना पर ही सम्मति देते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि यह साबर मंत्र है। साहित्य में न तो ' अनमिल आखऱ ' हो सकता है, न ' आखर'  अरथहीन हो सकता है। आखर का अर्थ के साथ मिलना आवश्यक ही नहीं, परम आवश्यक है। जनतंत्र में सत्ता का प्रायः जन से अनमिल भाव ही रहता है। ऐसी सत्ता टिकाऊ भी नहीं होती।


साहित्य की एक भूमिका बड़ी जबर्दस्त है। वह जनतंत्र की भावना को जगाए रखता है, क्योंकि साहित्य का प्राण है असहमति। बाणभट्ट ने ' हर्षचरित '  में लिखा हर्ष आश्रयदाता थे ; लेकिन उसमें जहाँ वह प्रसंग आता है जहाँ हर्ष की सेना राज्यश्री को ढूँढ़ने और मौखरि राजधानी पर आक्रमण  करने वाली सेना का पीछा करने निकली है। वहाँ पर बाणभट्ट का चित्त उद्विग्न हो जाता है, क्योंकि सेना विंध्य के उपांत ग्रामों की फसल कुचलती हुई जा रही है। उनका उद्वेग कई रूपों में प्रकट होता है। बच्चे दूर से सैनिकों को चिढ़ाकर भाग रहे हैं। एक अध्यापक निर्भय होकर सामने आता है--कैसा राजा, जिसकी सेना किसानों की फसल बरबाद कर रही है। सबसे करुण प्रसंग तब आता है जब कुछ खरगोश झाड़ियों से  प्रयाण करती हुई सेना की पगचाप सुन कुतुहलवश बाहर निकलते हैं और सैनिकों के पदत्राणों से कुचले जाकर चिंदी-चिंदी बिखर जाते हैं। इस निर्ममता का बहुत ही द्रावक वर्णन बाणभट्ट ने किया है।  मुझे ऐसा लगता है कि '  हर्षचरित '   को इसीलिए बाणभट्ट ने अधूरा छोड़ दिया था। संभवतः राज्याश्रय को भी इसीलिए वे आगे सहन नहीं कर पाए। रीतिकाल के भी बहुत सारे कवि हैं, जो राज्याश्रय में रहकर भी राज्याश्रय को ठुकराते रहे। साहित्यकार किसी का मनसबदार बनकर रहना नहीं गवारा कर सकता। वह इसलिए जनतंत्र में एक कारक घटक बनता है, प्रतिरोध को शक्ति देता है--सत्ता के प्रतिरोध की शक्ति ; साहस के साथ खड़े होने का निर्भय भाव देता है।


परन्तु जनतंत्र क्या साहित्य का मूल्य ठीकठाक आँकता है ? आँक पाता है ? यह प्रश्न उठता है और इसका उत्तर ठीक-ठीक मिलता नहीं। दिखावे के रूप में तो उसे आदर मिलता है। अमेरिका का राष्ट्रपति रॉबर्ट फ्रास्ट को शपथ ग्रहण के समय आदरपूर्वक बुलाता है। जवाहरलाल नेहरू उसकी--


'  हरियाली सुहानी है, रुको नहीं


मीलों जाना है, वादे निभाने हैं।'   


कविता की पंक्तियाँ दुहराते रहते थे। गांधी जी के लिए तो मानस सबकुछ था,  '  रघुपति राघव  राजाराम '   के बल पर वे ब्रिटिश  शासन को चुनौती देते रहते थे। स्वतंत्रता के संघर्ष में बंकिमचंद्र चटोपाध्याय को  '  आनंदमठ '  और उसमें आया  हुआ  '  वंदे मातरम ' गीत आंदोलन में प्राण फूंकता था। यह सब सही है, पर क्या साहित्य ' सिंहासन खाली करो कि जनता आती है '   तक ही सीमित है अथवा जहाँ कविता का विषय राजनीति न हो, राजनीति का कर्णधार न हो, सृष्टि का सौंदर्य हो, सृष्टि की विसंगति की व्यथा हो,  देवदास के जंगलों के कागज की लुगदी में रूपांतरित होने की कथा हो, हिम शिखरों के हिम के पिघलते जाने की व्यथा हो, ऐसे विषय का प्रभाव जनतंत्र पर पड़ता है कि नहीं पड़ता है? पड़ता भी हो तो, स्थूल अर्थों की कतरनें पेश करने वाले लोगों की जय हो! ऐसी बातें सिंहासन तक पहुंचती नहीं हैं। इसलिए जनतंत्र में संस्कृति का गहरा अर्थ तिरोहित रह जाता है, केवल कुछ साज-बाज, रंग-रोगन और लटक-मटक संस्कृति के पर्याय बनने लगते हैं। गाहे-बगाहे राजनेताओं के फतबे भी सुनने को मिलते हैं कि साहित्य ऐसा लिखिए,  वैसा लिखिए और इसी में जनतंत्र की तस्बीर बोंदी हो जाती है। वैसे ही जैसे किसी फिल्म को बनाते समय पैसा देनेवाले सेठ का देर तक अच्छा फिल्मांकन देखते-देखते धैर्य छूट जाता है, चिल्ला उठता है--अब तो कोई गाना गवाओ--भले ही  प्रसंग चिता पर सुलाए जाते शव का हो। सेठ को शव से भी गाना चाहिए। इस तरह के प्रसंग या तो भाँड़ पैदा करते हैं या विदूषक। यह सुनिश्चित करना कि किसी साहित्य की आवाज जनतंत्र के नियामकों के पास पहुँचे, आसान नहीं है। आवाज पहुँचने में किसी-न-किसी का बुरा बनने का डर है और तंत्र कोई भी हो, आदमी बुरा बनना नहीं चाहता। इसलिए आवाज पहुँचाने वाले की जरूरत न रहे, ऐसे जनतंत्र की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। नौकरशाही ने सुरक्षा का ऐसा आडंबर रच रखा है कि एक प्राचीर खड़ी हो गई है जिसका  ' जनता दरबारों ' से भी टूटना नहीं हो पाता। जनता दरबार खुद एक तरह के ओट बन जाते हैं--आत्ममुग्धता के।


ऐसी परिस्थिति में साहित्य की भूमिका बड़ा कठिन हो जाती है। उसे कुछ कहना भी है और कुछ नहीं भी कहना है। कुछ कहने के लिए छोड़ देना है, चुप रहना है। आपदकाल में एक भविष्यद्रष्टा आलेचक ने भविष्यवाणी की थी कि अब वक्त आ गया है कि लोग चिरई-चिरूँग के बारे में बात करेंगे, राजनीति के बारे में सीधी बात नहीं करेंगे। उन्होंने मान लिया कि चिरई-चुरूँग, पेड़-पौधे की बात करना साहित्य के लिए मानो बड़ी छोटी बात हो। सर्वभोजी जीवन पद्धति में भी भोज्य के रूप में ही सही, चिरई-चुरूँग और पेड़-पौधों की जरूरत तो है ही।  उनके आरक्षण की भी चिंता है; पर साहित्य में यह काम गोया बहुत घटिया है। वैसे उनकी भविष्यवाणी के बावजूद बहुत कुछ वैसा लिखा जाता रहा है जो उसके विपरीत था। उसी काल में भाई ने '  त्रिकाल-संध्या' '   लिखीलेकिन बहुत सारे कवि रचनाकार चुपे थे या उसे अनदेखा करके कुछ ऐसा लिख रहे थे जो अन्याय का प्रतिरूप दिखाकर उसका सामना करने के तौर-तरीके बता रहे थे। ङमारी समझ में ऐसा ही साहित्य जीता है। तुलसीदास ने अकबर और जहाँगीर का नाम नहीं लिया, कबीरदास ने सिकंदर लोदी का नाम नहीं लिया, कुँभदास ने अकबर का नाम नहीं लिया। इन उपेक्षाओं में बहुत बड़ी शक्ति थी और इसलिए ये उपेक्षाएँ सर्वभाव से भावित मनुष्य की अपेक्षाएँ पूरी करने में अधिक सहायक हुईँ।


जो जनतंत्र ऐसे साहित्य का महत्व समझता है और जितना समझता है उतना ही बडा जनतंत्र बनता है।  जनतंत्र और साहित्य के बीत एक ऐसा ही रिश्ता एक स्वस्थ रिश्ता है। ऐसा खुला पर बेनाम रिश्ता ही रिश्ता है। न नजदीकी अच्छी है, न दूरी अच्छी है।


जनतंत्र यदि अपना हित चाहता है और साहित्य का भी हित चाहता है तो उसे साहित्य को हकीकी रिश्तेदाक नहीं बनाना चाहिए। साहित्यकार के राजनीतिक विचार हो सकते हैं , पर राजनीतिक विचार का साहित्य नहीं होता। साहित्य विचार देता है और जनतंत्र से भी यह अपेक्षा है कि वह साहित्य को विचार न दे--साहित्य से विचार ले और अपने विचार में संशोधन भी आमंत्रित करे। दोनों के बीच में इतनी औपचारिक दूरी होगी तो हित्य जनतंत्र की प्रक्रिया को सक्रिय कर सकेगा। जनतंत्र की प्रक्रिया में पहले ही लिखा जा चुका है कि असहमति एक आवश्यक घटक है, वह अआसहमति सबसे स्वस्थ रूप में, बिना किसी उपद्रव के साहित्य से आती है। साहित्य जनतंत्र से यही अपेक्षा रखता है कि वह खुल करके साँस ले सकता है, वैसे जनतंत्र का जहाँ दम घुटता है वहाँ भी साहित्य मौन भी रहता है तो उसका मौन कम मुखर नहीं रहता। साहित्य जनतंत्र का पहरेदार नहीं है। जैसा कि पत्रकारिता होने का दावा करती है। साहित्य केवल संभावनाओं का संकेत है। कोई आदेश-निर्देश या परामर्श नहीं है। वह एक गहन विमर्श है और ऐसा विमर्श है जिसमें अपने को भी बख्शा नहीं जाता। ऐसा साहित्य ही समय की सजगता रखता हुआ भी अपने समय का अतिक्रमण करता है।  

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                                                                                                                  परिचर्चा


                                                                                                        -शैल अग्रवाल

रचना और रचनाकार


कलाकार से अक्सर ही एक सवाल पूछा जाता है, ' क्यों लिखते हो, क्यों सृजन करते हो, तुम्हारा दृष्टिकोण क्या है--ध्येय क्या है आदि आदि---? ' और अक्सर ही खुद की पड़ताल करता  वह उलझन में पड़ जाता है क्योंकि अक्सर ही उसे खुद भी पता नही होता कि वह सृजन क्यों कर रहा है? अब आलोचक चाहे जैसे भी परखे, पल-पल साथ निभाती यह सृजन वेदना  उसके लिए मात्र सुन्दर ही नहीं, एक शगल और मनोरंजन ही नही, शिव और सच भी बन चुकी होती है---वैसे भी कोई लड़ाई तभी तो लड़ी जाती है, जब कुछ बचाने या बदलने की चाह और जरूरत हो।  लगन की यह तीव्रता या अनिवार्यता बाध्य करती है उसे कि बाहरी परिस्थितियों और दबाव के रहते भी वह अंतर्मन को सुने और कुछ सकारात्मक करे। यही उर्जा और बेचैनी, पल पल उसे संरक्षण या शिव की तरफ खींचती है--- संरचना और संरक्षण: यही तो सृष्टि की अनिवार्यता हैं । ये वे पल हैं जब दर्द ही उसकी दवा है (गालिब)। और यही वजह है कि अक्सर कुरूप से कुरूप और दुरूह पल में भी वह प्रकृति का सारा सौंदर्य अपनी कृति में समेट पाता है,या समेटने की सामर्थ रखता है। 

सृजन करना और बस करते ही जाना, यही उसकी आदत--- सांसों-सी एक जरूरत बन चुकी होती है उसके अंत्तर्मन का यह एकांत ही उसकी सारी सृष्टि है---पूजा-स्थली है , यहीं बैठकर तो वह खुदको अपने और रचयिता के करीब पाता है और जमाने की छान-बीन और सीख , उसकी सोच को सुलझाने के बजाय, अक्सर ही, कुछ और ही उलझा कर रख देती है। उसके मन की तहों में रोपित विचार भी तो खुद ही जनमते हैं और खुद ही पल्लवित भी होते है; जब भी वह इस नैसर्गिक प्रक्रिया को रोककर  नियम और तौर तरीकों का अनुसरण करने बैठा , तो सृजन का वह पल कहीं पीछे छूट गया और मलय सी चंचल वह खुशबू  तुरंत ही तिरोहित भी हो गई और जांच पड़ताल के बोझ तले दबी बीज-रूपी कृति जाने किन अंधेरों में जा झुपी।  


'धोया निचोड़ा और सुखाया
फिर मन के किसी अंधेरे कोने में
उगने को मैं छोड़ आया
हाँ, यही तो लिखा था
बारबार ही पढ़ा था
हरे भरे बगीचे
जीने के सौ तरीके
नाम की उस किताब में---- '

 जो बाहर से परख और निरख रहा है ---निर्णय ले रहा है वह आलोचक या पाठक है, स्वयं कलाकार नही। पाठक या आलोचक के लिए एक दृष्टिकोण--एक नीति जरूरी है , क्योंकि उसे एक लाइन खींचनी होती है , एक आलोचनात्मक परख नीति अपनानी पड़ती है, जहां से खड़े होकर वह देखता है कि कृति रेखा के नीचे है या ऊपर--या फिर किस दायरे में आएगी---पर इस उद्देश्य या नीति के भी तो कई-कई दृष्टिकोण हो सकते हैं; जैसे कि सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक वगैरह,वगैरह। कलाकार के बस की यह बातें नहीं--क्योंकि सृजन और सृजन ही उसका उद्देश्य भी है और दृष्टिकोण भी--- समय के उस बिन्दु में वह तो पूरी तरह से बस सृजन प्रक्रिया में ही डूबा होता है---इसके आगे पीछे देखने की न उसे फुरसत है और ना ही सुध। 

वैसे भी कलाकार अधिकांशत: अपनी परिस्थितियों का ही तो परिणाम होता है , परिस्थितियां---जिन्हे बदलने या सुधारने या फिर बांटने की चाह उसे बेचैन कर रही होती हैं। उसकी कला उसके आस-पास व्याप्त इसी संघर्ष का ही फल है । कलाकार के अंतस को आसानी से संतुष्ट होना या संतुलित होना नहीं आ पाता क्योंकि सोच और चाह की धधकती चिनगारियां उसे स्थिर नहीं रहने दे सकतीं। यह अस्थिरता और बेचैनी कुछ और नही , बस बाहर से घेरती समस्याओं का एक आन्तरिक प्रतिबिम्ब है---- इसी से बचने के लिए तो कभी वह पलायन वादी सृजन करता है --- कोलाहल की अवनी छोड़ निर्जन में जाना चाहता है, जहां सागर की लहरियां तक निश्छल प्रेम कथा सुना रही हों, (जयशंकर प्रसाद --कविता--ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे धीरे), तो कभी असंतुष्ट होकर ललकारता है--खुद को भी और अपनी परिस्थियों को भी। और कभी-कभी तो शिव मंगल सिंह सुमन की तरह यह तक कहने की हिम्मत रखता है कि ' तूफानों की ओर घुमा दे माझी तू निज पतवार, आज हृदय और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार।' --क्योंकि इसी हलचल और कोलाहल से उबरना और उबारना यही और मात्र यही वह चाहता है।

जब साहित्य या कला  प्राय: इसी मौलिक संघर्ष का नतीजा हैं--- अंतस् और बाह्य का सामंजस्य, एक अनवरत् तलाश हैं, तो अधिकांशत: इसी संघर्ष या खोज में उलझा भी रह जाता है वह। वेद कुरान और गीता रामायण से लेकर आजतक की हर छोटी बड़ी कृति उसके इसी मन्थन का सार हैं । हाँ कुछ शान्त और संतुष्ट पल जरूर अपवाद की तरह उसके जीवन में भी आते हैं, जिन्हे अपने उलझे वक्त से चुराकर  कलाकार स्वान्त: सुखाय सृजन करता है ,अपनी उर्जा को समेटनता है,खुद को समझाता-सुलझाता और स्थिर करता है--परन्तु उसकी वह संपूर्णत्व की खोज तो जारी ही रहती है पानी के अन्दर पैठकर भी, और किनारे पर बैठकर भी। 

मुख्यत: कुछ बदलना, कुछ बांटना, कुछ सीखना और कुछ सिखाना---यानी कि परिवर्तन या क्रान्ति, इसी जुझारु सोच का नाम साहित्य और कला है। जब कला जीवन और प्रकृति दोनों के ही संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है और फल भी तो इसकी साधना-रत कलाकार कैसे चुप बैठ सकता है ? वह अनिवार्य रूप से गतिमान है। यह तनाव  उसे चाहकर भी स्थिर नही होने देगा। इसी दबाव के नीचे, सामंजस्य ढूँढता ही तो वह कल्पना लोक में आ छुपा है। उसकी यह गति उसे आगे की ओर ले जा रही है या पीछे की ओर यह वह नही जानता। वह तो बस इस गति की गूंज अनुगूंज को पकड़ने में---समझने में ही लगा हुआ है। निर्णय लेने का काम--- प्रगति, अधोगति या प्रतिगति की जांच, यह सब काम आलोचक और पाठक के हैं । सृजन बिन्दु पर बैठा वह कलाकार पूरे विवेक के होते हुए भी दोनों काम निष्पक्षता से नहीं कर सकता , फिर उससे यह पूछना कि तू सृजन क्यों करता है, बिल्कुल वैसा ही होगा जैसे कि मझली से पूछा जाए कि वह हमेशा  पानी में ही क्यों रहती है---या फिर तैरने या डूबने से पहले उसने पानी की थाह ली भी थी या नही... !  


एक बात और, यदि मन एक यंत्र है और जीवन यंत्रवत् चलता है तो आज इसकी गति का...इसकी अंतर्रचना का नित नया ज्ञान हमारे लिए नित नए संकट और उलझनें भी तो खड़ी कर रहा है। जितना अधिक हम अंतर्मन को उलीच कर सतह पर लाने का प्रयास करते हैं, उतनी ही आंखों के आगे भीड़ लगती चली जाती है.और सतह का विस्तार होता चला जाता है- प्रिय अप्रिय हर तरह की उलीच से और इस सबके नीचे  दबा अंतर्मन दूर होता चला जाता है...अनचीन्हा और अनजान हो जाता है। बिल्कुल वैसा ही विरोधाभास है यह जैसे कि कोई जीने के लिए रोटी कमाने निकलें और कमाई की भागदौड़ में रोटी खाना ही भूल जाए ;               



हम बार-बार गहरे उतरे---  
कितना गहरे!-- पर--
जब-जब जो कुछ भी लाये
उस से बस 
 और सतह पर भीड़ बढ़ गयी ।


सतहें--सतहें--
सब फेंक रही हैं लौट-लौट
वह काँच
जिसे हम भर न रख सके
प्याले में।


छिछली, उथली, घनी चौंध के साथ 
घूमते हैं हम
अपने रचे हुये
मायावी जाल में


    -अज्ञेय


कवि या साहित्यकार के लिये इस परिस्थिति को अनदेखा कर पाना संभव नहीं है और देखकर स्वीकार कर पाना और भी असंभव। जितना ही वह दिखता है, उतना ही उसे भेद कर और गहराई में जाने का प्रयत्न करने लग जाता है वह। और तब उसकी संवेदना और चेतना दोनों ही दो भागों में बट जाती हैं। आहत और विभाजित हो जाता है। गहराई के विरोध को हल करता वह अंतर्मन के ताने-बाने में उलझ जाता है और बाहर सतह पर अपने इस प्रयत्न को कैसे व्यवस्थित करे...बिना भीड़ लगाए और बिना भटके, यह रचनाशीलता की समस्या उससे कठिन समर्पण और संयम मांगने लग जाती है । पर क्या निषिद्ध से दूर रह पाना, वांछित को छोड़ पाना....सपनों को समाज के सांचे में ढाल कर,  यथार्थ की कूंचि से रंग पाना हमेशा  ही संभव  है? शायद नहीं...न तो एडम और ईव के समय में था जो निषिद्ध फल को चखने की सजा में स्वर्ग से निष्काषित हुए थे और ना ही उनके उत्तराधिकारियों के लिए आज भी। आज के इस समाज में भी तो वे, अपना वही खोया-स्वर्ग तलाशते, आदर्श और लालच की पगडंडियों पर लहूलुहान, वैसे ही भ्रमित हैं। आज भी तो ये उत्तराधिकारी,  वर्जनाओं के दुरूह जंगल में भटकते उन्ही अपराधों की सजा भुगते जा रहे  हैं।


पर आश्चर्य तो यह है कि कभी शेखी बघारते तो कभी ग्लानि की अतुल गहरायों में डूबते भ्रमित-मन का यह असंतोष ; कुंठा का कारण बनती ये इच्छाएँ  और ये सपने ही वास्तव में जीवन का सबसे बड़ा संबल भी हैं और गति व प्रेरणा भी। जीवन के कुरुक्षेत्र में कभी यह अर्जुन बनी हमें हताश् हथियार डालने को मजबूर करती हैं तो कभी कृष्ण-सी खुद ही  रास्ता भी  दिखलाती हैं। बिना इनके तो हम मात्र एक पंखहीन पक्षी है, जिसने खुला आकाश कभी देखा ही नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि अराजकता और भ़ष्टता को, मानव-मन की कमजोरियों को गरिमा-मंडित करना चाह रही हूँ , अर्थ बस इतना ही है कि कोई भी निर्णय लेने से पहले, भला या बुरा घोषित करने से पहले...स्वर्ग से निष्कासित करने से पहले, परिस्थितियों और उनके दबाव, जाल व षडयंत्र ...तत्कालीन मजबूरियों को जरूर समझ लेना चाहिए।...क्या आज भी हम कई शतक पहले के उसी समाज में जीएंगे या जीना चाहेंगे जब आदमी सब कुछ घोट कर अंदर रख लेता था क्योंकि इसी में उसकी भलाई थी, यही समाज का चलन था..अकेले-अकेले ही सब  सहने पर मजबूर था वह, क्योंकि-


रहिमन मन की व्यथा, मन ही राखो गोय / सुन इठलहियैं लोग सब, बांट सके न कोय   ।


पर आज तो हमें कहना-सुनना ही नहीं, समझना और बांटना तक आ गया है। हम सभ्य और शिक्षित हो चले हैं... सहज होना  आ गया है हमें, क्योंकि इस पृथ्वी के ही नहीं चांद सूरज, पूरे बृह्मांड के रहस्यों को जान चुके हैं हम! जब जीवन और इसके आसपास की जटिलता व कृतिमता दोनों का ही आभास ले लिया है हमने.और.इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं हम जहां दूरियों का कोई अर्थ ही नहीं , तब फिर यह तलाश....यह दूरियां और भटकन क्यों? 


शायद आज भी हमें अपने उसी खोए स्वर्ग की तलाश है...स्वर्ग जो हमारे अपने अंदर है और आज भी जिस पर ताला लगा है; हमारी खोखली मान्यताओं का, भ्रान्तियों का, हमारे देखने और समझने के जटिल अन्दाज का। और ताली को भी तो खुद हमने ही कहीं दूर फेंक दिया है , या फिर इतना डरते हैं इसकी हिफाजत को लेकर कि बहुत ही सावधानी से रखकर भूल गये हैं । 


कैसे भी समझना चाहें, कैसे भी देखें, एक बात तो निश्चित है कि यदि सपने देखना मानव-मन की कमजोरी है तो तलाश मजबूरी। किसी को नाम की तलाश है तो किसी को काम की, कोई शान्ति ढूँढ रहा है तो कोई मनमीत। जो है वह नहीं चाहिए, जो नहीं है , उसी की चाह...उसी के सपने और असाध्य की साधना शायद मानव स्वभाव की सबसे बड़ी कमजोरी है.। इसीलिए जीवन एक अनंत तलाश भी है और अनंत प्यास भी। हर जीवन में किसी न किसी चीज की कमी है। कोई पूर्णतः संतुष्ट नहीं, हर जीवन में एक भटकन है, चाहे वह खुशी के उपवन में सैर कर रहा हो या दुख की नदी में डूबता, पार करने की कोशिश में हो। जब संतुष्ट न रह पाना ही  मानव का स्वभाव है तो फिर ऐसे विचलित और अस्थिर मन को कैसे थिर किया जा सकता है , वह भी मात्र चन्द सपनों या शब्दों के सहारे?  क्या जिम्मेदारी है एक कवि या कलाकार की...वह भी तो अन्य की तरह इन्ही कमजोरियों से गढ़ा-रचा गया है? अज्ञेय जी ने बड़े ही मर्म भरे शब्दों में कवि की इस द्वन्द्वात्मक स्थिति का वर्णन किया है ;


“ मुझे तीन दो शब्द
कि मैं कविता कह पाऊँ।
एक शब्द वहः
जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ।
दूसराः जिसे कह सकूँ
किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।
और तीसरा खरा धातु
जिसको पाकर पूछूँ
न बिना इसके भी काम चलेगा?
और मौन रह जाऊँ
मुझे तीन दो शब्द
कि मैं कविता कह पाऊँ।“


शब्द, जो साक्षात बृह्म हैं,  सामाजिक, नैतिक और वैयक्तिक सवेदना के कटु यथार्थ को जीत-भोगते कवि या साहित्यकार की सबसे बड़ी कमजोरी भी तो हैं। ये उसकी छलना या  प्रवंचना ही नहीं, उपलब्धि  और साधना है। वह अपने शब्दों में  संधि व संतुलन ढूंढते ही  सारी उम्र निकाल देता है। हर पीड़ा, हर परेशानी को भूल, कच्ची मिट्टी सा गुंथता-तिरकता उसका अंतस खुद को भी गढ़ता-संवारता रह जाता है और अपने आसपास को भी। 


प्रस्तुत है लेखनी का यह अंक -मानव मन के कुछ ऐसे ही हठी सपने ...अदम्य आकांक्षाओं और जीत-हार भरी, सच्ची-झूठी अनगिनित तलाशों पर। ...संक्षेप में कहूँ तो जीवन के उन सभी विश्वास और मान्यताओं पर, जो आजीवन बांधे रखती हैं, सच से भी ज्यादा सच हो जती हैं...  इतना बड़ा सच कि उसके लिए व्यक्ति अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। स्वर्ग छोड़ आता है। फिर जिसे वापस ढूंढते रहने में , उस कसक या दर्द को  जीते बाकी सारी उम्र निकाल देता है।


प्यार, नफरत, लगन , विश्वास कोई भी नाम दें हम इनका, यही तो अंतर्मन के वे स्तंभ हैं जिनके सहारे बड़े-बड़े पुल तैयार किये जाते हैं और अदना-सा  आदमी  भी दुनिया जीत आता है या जीतने के ख्वाब देखता है...इतना विश्वास रहता है उसे इनपर, इनकी सच्चाई पर कि खुद तक को कुर्बान कर देता है। इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों सेः हिटलर, नैपोलियन, गांधी, राम, कृष्ण... वास्तव में वे सब, बाद में जिन्हें बेइन्तिहां नफरत या प्यार और कभी-कभी तो पूजा और देवत्व तक मिला, इसी दीवानगी, इसी साधना के परिणाम हैं। नकरात्मक परिस्थितियों में तो ऐसी दीवानगी  प्रायः क्षणिक उत्तेजना या विशेष दबाव या मानसिक और अवचेतन ग्रन्थियों का परिणाम हो सकती है, परन्तु सामाजिक संदर्भ में यह सृजन की वह  सकारात्मक चेतना है जो गीता और कुरान बनाती है, राम और कृष्ण को जन्म देती है। संयम व श्रम...अप्रतिम साहस और विश्वास  बिना यह संभव नहीं।  ऐसा बस उन्ही के साथ संभव हुआ है जो  जीवन में या अपनी धुन में अति का भी अतिक्रमण कर गये हैं., बात फिर चाहे आत्म संयम की हो या आत्मपतन की; सच कहें तो इस दीवानगी...इस लगन, इन सपनों के बिना कुछ विशेष कर पाना या  हो पाना संभव ही  नहीं; देव-दैत्य....नायक-खलनायक ...प्रेमी-पापी, कुछ भी नहीं।...

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                                                                                                                   कहानी धरोहर


                                                                                                          गजानन माधव मुक्तिबोध

बृह्म राक्षस का शिष्य

उस महाभव्य भवन की आठवीं मंजिल के जीने से सातवीं मंजिल के जीने की सूनी-सूनी सीढ़ियों पर उतरते हुए, उस विद्यार्थी का चेहरा भीतर से किसी प्रकाश से लाल हो रहा था।

वह चमत्कार उसे प्रभावित नहीं कर रहा था, जो उसने हाल-हाल में देखा। तीन कमरे पार करता हुआ वह विशाल वज्रबाहु हाथ उसकी आँखों के सामने फिर से खिंच जाता। उस हाथ की पवित्रता ही उसके खयाल में जाती किन्तु वह चमत्कार, चमत्कार के रूप में उसे प्रभावित नहीं करता था। उस चमत्कार के पीछे ऐसा कुछ है, जिसमें वह घुल रहा है, लगातार घुलता जा रहा है। वह 'कुछ' क्या एक महापण्डित की जिन्दगी का सत्य नहीं है? नहीं, वही है! वही है!

पाँचवी मंजिल से चौथी मंजिल पर उतरते हुए, ब्रह्मचारी विद्यार्थी, उस प्राचीन भव्य भवन की सूनी-सूनी सीढ़ियों पर यह श्लोक गाने लगता है। मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभव: श्यामास्तमालद्रुमै: - इस भवन से ठीक बारह वर्ष के बाद यह विद्यार्थी बाहर निकला है। उसके गुरू ने जाते समय, राधा-माधव की यमुना-कूल-क्रीड़ा में घर भूली हुई राधा को बुला रहे नन्द के भाव प्रकट किये हैं। गुरू ने एक साथ शृंगार और वात्सल्य का बोध विद्यार्थी को करवाया। विद्याध्ययन के बाद, अब उसे पिता के चरण छूना है। पिताजी! पिताजी! माँ! माँ! यह ध्वनि उसके हृदय से फूट निकली।

किन्तु ज्यों-ज्यों वह छन्द सूने भवन में गूँजता, घूमता गया त्यों-त्यों विद्यार्थी के हृदय में अपने गुरू की तसवीर और भी तीव्रता से चमकने लगी।

भाग्यवान है वह जिसे ऐसा गुरू मिले!

जब वह चिड़ियों के घोंसलों और बर्रों के छत्तों-भरे सूने ऊँचे सिंहाद्वार के बाहर निकला तो एकाएक राह से गुजरते हुए लोग 'भूत' 'भूत' कह कर भाग खड़े हुए। आज तक उस भवन में कोई नहीं गया था। लोगों की धारणा थी कि वहाँ एक ब्रह्मराक्षस रहता है।

बारह साल और कुछ दिन पहले --

सड़क पर दोपहर के दो बजे, एक देहाती लड़का, भूखा-प्यासा अपने सूखे होठों पर जीभ फेरता हुआ, उसी बगल वाले ऊँचे सेमल के वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था। हवा के झोकों से, फूलों के फलों का रेशमी कपास हवा में तैरता हुआ, दूर-दूर तक और इधर-उधर बिखर रहा था। उसके माथे पर फिक्रें गँुथ-बिंध रही थीं। उसने पास में पड़ी हुई एक मोटी इंर्ट सिरहाने रखी और पेड़-तले लेट गया।

धीरे-धीरे, उसकी विचार-मग्नता को तोड़ते हुए कान के पास उसे कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी। उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की। वे कौन थे?

उनमें से एक कह रहा था, "अरे, वह भट्ट। नितान्त मूर्ख है और दम्भी भी। मैंने जब उसे ईशावास्योपनिषद् की कुछ पंक्तियों का अर्थ पूछा, तो वह बौखला उठा। इस काशी में कैसे-कैसे दम्भी इकठ्ठे हुए हैं?

वार्तालाप सुनकर वह लेटा हुआ लड़का खट से उठ बैठा। उसका चेहरा धूल और पसीने से म्लान और मलिन हो गया था, भूख और प्यास से निर्जीव।

वह एकदम, बात करनेवालों के पास खड़ा हुआ। हाथ जोड़े, माथा जमीन पर टेका। चेहरे पर आश्चर्य और प्रार्थना के दयनीय भाव! कहने लगा, ' हे विद्वानों! मैं मूर्ख हँू। अपढ़ देहाती हँू किन्तु ज्ञान-प्राप्ति की महत्वाकांक्षा रखता हँू। हे महाभागो! आप विद्यार्थी प्रतीत होते हैं। मुझे विद्वान गुरू के घर की राह बताओ।'
पेड़-तले बैठे हुए दो बटुक विद्यार्थी उस देहाती को देखकर हँसने लगे; पूछा -
'कहाँ से आया है?'
'दक्षिण के एक देहात से! पढ़ने-लिखने से मैंने बैर किया तो विद्वान् पिताजी ने घर से निकाल दिया। तब मैंने पक्का निश्चय कर लिया कि काशी जाकर विद्याध्ययन करूँगा। जंगल-जंगल घूमता, राह पूछता, मैं आज ही काशी पहँुचा हँू। कृपा करके गुरू का दर्शन कराइए।'
अब दोनों विद्यार्थी जोर-जोर से हँसने लगे। उनमें-से एक, जो विदूषक था, कहने लगा --
'देख बे सामने सिंहद्वार है। उसमें घुस जा, तुझे गुरू मिल जायेगा।' कह कर वह ठठाकर हँस पड़ा।

आशा न थी कि गुरू बिलकुल सामने ही है। देहाती लड़के ने अपना डेरा-डण्डा सँभाला और बिना प्रणाम किये तेजी से कदम बढ़ाता हुआ भवन में दाखिल हो गया।
दूसरे बटुक ने पहले से पूछा, 'तुमने अच्छा किया उसे वहाँ भेज कर?' उसके हृदय में खेद था और पाप की भावना।
दूसरा बटुक चुप था। उसने अपने किये पर खिन्न होकर सिर्फ इतना ही कहा, 'आखिर ब्रह्मराक्षस का रहस्य भी तो मालूम हो।'

सिंहद्वार की लाल-लाल बरें गँू-गँू करती उसे चारों ओर से काटने के लिए दौड़ी; लेकिन ज्यों ही उसने उसे पार कर लिया तो सूरज की धूप में चमकनेवाली भूरी घास से भरे, विशाल, सूने आँगन के आस-पास, चारों ओर उसे बरामदे दिखाई दिये -- विशाल, भव्य और सूने बरामदे जिनकी छतों में फानूस लटक रहे थे। लगता था कि जैसे अभी-अभी उन्हें कोई साफ करके गया हो! लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

आँगन से दीखनेवाली तीसरी मंजिल की छज्जेवाली मँुडेरे पर एक बिल्ली सावधानी से चलती हुई दिखाई दे रही थी। उसे एक जीना भी दिखाई दिया, लम्बा-चौड़ा, साफ-सुथरा। उसकी सीढ़ियाँ ताजे गोबर से पुती हुई थीं। उसकी महक नाक में घुस रही थी। सीढ़ियों पर उसके चलने की आवाज गँूजती; पर कहीं, कुछ नहीं!
वह आगे-आगे चढ़ता-बढ़ता गया। दूसरी मंजिल के छज्जे मिले जो बीच के आँगन के चारों ओर फैले हुए थे। उनमें सफेद चादर लगी ग यिाँ दूर-दूर तक बिछी हुई थीं। एक ओर मृदंग, तबला, सितार आदि अनेक वाद्य-यन्त्र करीने से रखे हुए थे। रंग-बिरंगे फानूस लटक रहे थे और कहीं अगरबत्तियाँ जल रही थीं।

इतनी प्रबन्ध-व्यवस्था के बाद भी उसे कहीं मनुष्य के दर्शन नहीं हुए। और न कोई पैरों की आवाजें सुनाई दीं, सिवाय अपनी पग-ध्वनि के। उसने सोचा शायद ऊपर कोई होगा।

उसने तीसरी मंजिल पर जाकर देखा। फिर वही सफेद-सफेद ग यिाँ, फिर वही फानूस, फिर वही अगरबत्तियाँ। वही खाली-खालीपन, वही सूनापन, वही विशालता, वही भव्यता और वही 'मनुष्य-हीनता।'

अब उस देहाती के दिल में से आह निकली। यह क्या? यह कहाँ फँस गया; लेकिन इतनी व्यवस्था है तो कहीं कोई और जरूर होगा। इस खयाल से उसका डर कम हुआ और वह बरामदे में से गुजरता हुआ अगले जीने पर चढ़ने लगा।

इन बरामदों में कोई सजावट नहीं थी। सिर्फ दरियाँ बिछी हुई थीं। कुछ तैल-चित्र टँगे थे। खिड़कियाँ खुली हुई थीं जिनमें-से सूरज की पीली किरणें आ रही थीं। दूर ही से खिड़की के बाहर जो नजर जाती तो बाहर का हरा-भरा ऊँचा-नीचा, माल-तलैयों, पेड़ों-पहाड़ों वाला नजारा देखकर पता चलता कि यह मंजिल कितनी ऊँची हैं और कितनी निर्जन।

अब वह देहाती लड़का भयभीत हो गया। यह विशालता और निर्जनता उसे आतंकित करने लगी। वह डरने लगा। लेकिन वह इतना ऊपर आ गया था कि नीचे देखने ही से आँखों में चक्कर आ जाता। उसने ऊपर देखा तो सिर्फ एक ही मंजिल शेष थी। उसने अगले जीने से ऊपर की मंजिल चढ़ना तय किया।

डण्डा कन्धे पर रखे और गठरी खोंसे वह लड़का धीरे-धीरे अगली मंजिल का जीना चढ़ने लगा। उसके पैरों की आवाज उसी से जाने क्या फुसलाती और उसकी रीढ़
की हड्डी में-से सर्द संवेदनाएँ गुजरने लगतीं।

जीन खत्म हुआ तो फिर एक भव्य बरामदा मिला, लिपा-पुता और अगरू-गन्ध से महकता हुआ। सभी ओर मृगासन, व्याघ्रासन बिछे हुए। एक ओर योजनों विस्तार-दृश्य देखती, खिड़की के पास देव-पूजा में संलग्न-मन मँुदी आँखोंवाले ऋषि-मनीषि कश्मीर की कीमती शाल ओढ़े ध्यानस्थ बैठे।

लड़के को हर्ष हुआ। उसने दरवाजे पर मत्था टेका। आनन्द के आँसू आँखों में खिल उठे। उसे स्वर्ग मिल गया।

'ध्यान-मुद्रा' भंग नहीं हुई तो मन-ही-मन माने हुए गुरू को प्रणाम कर लड़का जीने की सर्वोच्च सीढ़ी पर लेट गया। तुरन्त ही उसे नींद आ गयी। वह गहरे सपनों में खो गया। थकित शरीर और सन्तुष्ट मन ने उसकी इच्छाओं को मूर्त-रूप दिया। वह विद्वान् बन कर देहात में अपने पिता के पास वापस पहँुच गया है। उनके चरणों को पकड़े, उन्हें अपने आँसुओं से तर कर रहा है और आर्द्र-हृदय हो कर कह रहा है, 'पिताजी! मैं विद्वान बन कर आ गया, मुझे और सिखाइए। मुझे राह बताइए। पिताजी! पिताजी! और माँ अंचल से अपनी आँखें पोंछती हुई, पुत्र के ज्ञान-गौरव से भर कर, उसे अपने हाथ से खींचती हुई गोद में भर रही है। साश्रुमुख पिता का वात्सल्य-भरा हाथ उसके शीश पर आशीर्वाद का छत्र बन कर फैला हुआ है।

वह देहाती लड़का चल पड़ा और देखा कि उस 'तेजस्वी ब्राह्मण' का दैदिप्यमान चेहरा, जो अभी-अभी मृदु और कोमल होकर उस पर किरनें बिखेर रहा था, कठोर और अजनबी होता जा रहा है।

ब्राह्मण ने कठोर होकर कहा, 'तुमने यहाँ आने का कैसे साहस किया? यहाँ कैसे आये?'
लड़के ने मत्था टेका, 'भगवन्! मैं मूढ़ हूँ, निरक्षर हूँ, ज्ञानार्जन करने के लिए आया हूँ।'
ब्राह्मण कुछ हँसा। उसकी आवाज धीमी हो गयी किन्तु दृढ़ता वही रही। सूखापन और कठोरता वही।
'तूने निश्चय कर लिया है?'
'जी!'
'नहीं, तुझे निश्चय की आदत नहीं है; एक बार और सोच ले! जा फिलहाल नहा-धो उस कमरे में, वहाँ जाकर भोजन कर लेट, सोच-विचार! कल मुझ से मिलना।'

दूसरे दिन प्रत्युष काल में लड़का गुरू से पूर्व जागृत हुआ। नहाया-धोया। गुरू की पूजा की थाली सजायी और आज्ञाकारी शिष्य की भांति आदेश की प्रतीक्षा करने लगा। उसके शरीर में अब एक नयी चेतना आ गयी थी। नेत्र प्रकाशमान थे।

विशालबाहु पृथु-वक्ष तेजस्वी ललाटवाले अपने गुरू की चर्या देखकर लड़का भावुक-रूप से मुग्ध हो गया था। वह छोटे-से-छोटा होना चाहता था कि जिससे लालची चींटी की भाँति जमीन पर पड़ा, मिट्टी में मिला, ज्ञान की शक्कर का एक-एक कण साफ देख सके और तुरन्त पकड़ सके!
गुरू ने संशयपूर्ण दृष्टि से देख उसे डपट कर पूछा; 'सोच-विचार लिया?'
'जी!' की डरी हुई आवाज!
कुछ सोच कर गुरू ने कहा, 'नहीं, तुझे निश्चय करने की आदत नहीं है। एक बार पढ़ाई शुरू करने पर तुम बारह वर्ष तक फिर यहाँ से निकल नहीं सकते।
सोच-विचार लो। अच्छा, मेरे साथ एक बजे भोजन करना, अलग नहीं!'
और गुरू व्याघ्रासन पर बैठकर पूजा-अर्चा में लीन हो गये। इस प्रकार दो दिन और बीत गये। लड़के ने अपना एक कार्यक्रम बना लिय था, जिसके अनुसार वह काम करता रहा। उसे प्रतीत हुआ कि गुरू उससे सन्तुष्ट हैं।
एक दिन गुरू ने पूछा, 'तुमने तय कर लिया है कि बारह वर्ष तक तुम इस भवन के बाहर पग नहीं रखोगे?'
नतमस्तक हो कर लड़के ने कहा, 'जी!'
गुरू को थोड़ी हँसी आयी, शायद उसकी मूर्खता पर या अपनी मूर्खता पर, कहा नहीं जा सकता। उन्हें लगा कि क्या इस निरे निरक्षर के आँखें नहीं है? क्या यहाँ का वातावरण सचमुच अच्छा मालूम होता है? उन्होंने अपने शिष्य के मुख का ध्यान से अवलोकन किया। एक सीधा, भोला-भाला निरक्षर बालमुख! चेहरे पर निष्कपट, निश्छल ज्योति!

अपने चेहरे पर गुरू की गड़ी हुई दृष्टि से किंचित विचलित होकर शिष्य ने अपनी निरक्षर बुद्धिवाला मस्तक और नीचा कर लिया।

गुरू का हृदय पिघला! उन्होंने दिल दहलाने वाली आवाज से, जो काफी धीमी थी, कहा, ' देख! बारह वर्ष के भीतर तू वेद, संगीत, शास्त्र, पुराण, आयुर्वेद, साहित्य, गणित आदि-आदि समस्त शास्त्र और कलाओं में पारंगत हो जावेगा। केवल भवन त्याग कर तुझे बाहर जाने की अनुज्ञा नहीं मिलेगी। ला, वह आसन। वहाँ बैठ।'

और इस प्रकार गुरू ने पूजा-पाठ के स्थान के समीप एक कुशासन पर अपने शिष्य को बैठा, परम्परा के अनुसार पहले शब्द-रूपावली से उसका विद्याध्ययन प्रारम्भ कराया।
गुरू ने मृदुता ने कहा, -- 'बोलो बेटे --
राम:, रामौ, रामा:
और इस बाल-विद्यार्थी की अस्फुट हृदय की वाणी उस भयानक नि:संग, शून्य, निर्जन, वीरान भवन में गँूज-गँूज उठती।
सारा भवन गाने लगा --
'राम: रामौ रामा: -- प्रथमा!'

धीरे-धीरे उसका अध्ययन ' सिद्धान्तकौमुदी' तक आया और फिर अनेक विद्याओं को आत्मसात् कर, वर्ष एक-के-बाद-एक बीतने लगे। नियमित आहार-विहार और संयम के फलस्वरूप विद्यार्थी की देह पुष्ट हो गयी और आँखों में नवीन तारूण्य की चमक प्रस्फुटित हो उठी। लड़का, जो देहाती था अब गुरू से संस्कृत में वार्तालाप भी करने लगा।

केवल एक ही बात वह आज तक नहीं जान सका। उसने कभी जानने का प्रयत्न नहीं किया। वह यह कि इस भव्य-भवन में गुरू के समीप इस छोटी-सी दुनिया में यदि और कोई व्यक्ति नहीं है तो सारा मामला चलता कैसे है? निश्चित समय पर दोनों गुरू-शिष्य भोजन करते। सुव्यवस्थित रूप से उन्हें सादा किन्तु सुचारू भोजन मिलता। इस आठवीं मंज़िल से उतर सातवीं मंज़िल तक उनमें से कोई कभी नहीं गया। दोनों भोजन के समय अनेक विवादग्रस्त प्रश्नों पर चर्चा करते। यहाँ इस आठवीं मंज़िल पर एक नयी दुनिया बस गयी।

जब गुरू उसे कोई छन्द सिखलाते और जब विद्यार्थी मन्दाक्रान्ता या शदूलिवार्क्रीड़ित गाने लगता तो एकाएक उस भवन में हलके-हलके मृदंग और वीणा बज उठती और वह वीरान, निर्जन, शून्य भवन वह छन्द गा उठता।

एक दिन गुरू ने शिष्य से कहा, 'बेटा! आज से तेरा अध्ययन समाप्त हो गया है। आज ही तुझे घर जाना है। आज बारहवें वर्ष की अन्तिम तिथि है। स्नान-सन्ध्यादि से निवृत्त हो कर आओ और अपना अन्तिम पाठ लो।'

पाठ के समय गुरू और शिष्य दोनों उदास थे। दोनों गम्भीर। उनका हृदय भर रहा था। पाठ के अनन्तर यथाविधि भोजन के लिए बैठे।

दूसरे कक्ष में वे भोजन के लिए बैठे थे। गुरू और शिष्य दोनों अपनी अन्तिम बातचीत के लिए स्वयं को तैयार करते हुए कौर मँुह में डालने ही वाले थे कि गुरू ने कहा, 'बेटे, खिचड़ी में घी नहीं डाला है?'
शिष्य उठने ही वाला था कि गुरू ने कहा, 'नहीं, नहीं, उठो मत!' और उन्होंने अपना हाथ इतना बढ़ा दिया कि वह कक्ष पार जाता हुआ, अन्य कक्ष में प्रवेश कर क्षण के भीतर, घी की चमचमाती लुटिया लेकर शिष्य की खिचड़ी में घी उड़ेलने लगा। शिष्य काँप कर स्तम्भित रह गया। वह गुरू के कोमल वृद्ध मुख को कठोरता से देखने लगा कि यह कौन है? मानव है या दानव? उसने आज तक गुरू के व्यवहार में कोई अप्राकृतिक चमत्कार नहीं देखा था। वह भयभीत, स्तम्भित रह गया।

गुरू ने दु:खपूर्ण कोमलता से कहा, ' शिष्य! स्पष्ट कर दँू कि मैं ब्रह्मराक्षस हूँ किन्तु फिर भी तुम्हारा गुरू हूँ। मुझे तुम्हारा स्नेह चाहिए। अपने मानव-जीवन में मैंने विश्व की समस्त विद्या को मथ डाला किन्तु दुर्भाग्य से कोई योग्य शिष्य न मिल पाया कि जिसे मैं समस्त ज्ञान दे पाता। इसीलिए मेरी आत्मा इस संसार में अटकी रह गयी और मैं ब्रह्मराक्षस के रूप में यहाँ विराजमान रहा।'
'तुम आये, मैंने तुम्हें बार-बार कहा, लौट जाओ। कदाचित् तुममें ज्ञान के लिए आवश्यक श्रम और संयम न हो किन्तु मैंने तुम्हारी जीवन-गाथा सुनी। विद्या से वैर रखने के कारण, पिता-द्वारा अनेक ताड़नाओं के बावजूद तुम गँवार रहे और बाद में माता-पिता-द्वारा निकाल दिये जाने पर तुम्हारे व्यथित अहंकार ने तुम्हें ज्ञान-लोक का पथ खोज निकालने की ओर प्रवृत्त किया। मैं प्रवृत्तिवादी हूँ, साधु नहीं। सैंकड़ों मील जंगल की बाधाएँ पार कर तुम काशी आये। तुम्हारे चेहरे पर जिज्ञासा का आलोक था। मैंने अज्ञान से तुम्हारी मुक्ति की। तुमने मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरी आत्मा को मुक्ति दिला दी। ज्ञान का पाया हुआ उत्तदायित्व मैंने पूरा किया। अब मेरा यह उत्तरदायित्व तुम पर आ गया है। जब तक मेरा दिया तुम किसी और को न दोगे तब तक तुम्हारी मुक्ति नहीं।'

' शिष्य, आओ, मुझे विदा दो।'
'अपने पिताजी और माँजी को प्रणाम कहना।'

शिष्य ने साश्रुमुख ज्यों ही चरणों पर मस्तक रखा आशीर्वाद का अन्तिम कर-स्पर्श पाया और ज्यों ही सिर ऊपर उठाया तो वहाँ से वह ब्रह्मराक्षस तिरोधान हो गया।

वह भयानक वीरान, निर्जन बरामदा सूना था। शिष्य ने ब्रह्मराक्षस गुरू का व्याघ्रासन लिया और उनका सिखाया पाठ मन-ही-मन गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गया।

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                                                                                                                कहानी समकालीन


                                                                                                                   - दिव्या माथुर

                                            2050

ऋचा की आंखों में उच्च वर्ग का सा इस्पात उतर आया, एकबारगी उसे लगा कि वह भी इस्पात में ढल सकती है गंवार लोग ही रोते हैं, उच्च वर्ग के लोगों के सपाट चेहरों पर कभी देखा है किसी ने कोई उल्लास अथवा उदासी! यह लौह युग है, यंत्रों और तंत्रों से संचालित यहां भावनाओं का क्या अर्थ? कितने लोग बचे हैं जो ज़रा-ज़रा सी बात पर उद्वेलित हो जाते हैं, जिनकी भावनाएं उछल-उछल कर छलक उठती हैं? ऋचा अपनी भावुकता पर नियंत्रण रखना चाहती है, किंतु इस्पात तरल होकर बहने लगता है; कभी कभी तो वह अपने को सम्भाल तक नहीं पाती।   

‘मुझे एक बच्चा चाहिए। अपना बच्चा, जीता जागता, जिसे मैं छाती से लगा सकूं, अपना दूध पिला सकूं।’ ऋचा के इन जज़्बाती दौरों से वेद तिलमिला गया था, उसे डर था कि यदि समाज सुरक्षा परिषद को ऋचा के दौरों की भनक भी लग गई तो उनके आवेदन पर एक बड़ा सा प्रश्न चिन्ह लग कर रह जाएगा। 

’ऋचा, अपने को सम्भालो, तुम तो हमारे लिए एक और मुसीबत खड़ी कर दोगी। बच्चे की इजाज़त मिलना तो दूर, कहीं हम अपने वैवाहिक जीवन से भी न हाथ धो बैठें।’  वेद ने प्लास्टिक का बड़ा सा गुड्डा उसकी गोदी में डालते हुए कहा।

‘मैं क्या बच्चा हूं वेद, जो तुम मुझे इस गुड्डे से बहला रहे हो?’ गुड्डे को वापिस वेद पर फेंकते हुए ऋचा चीख़ी और बिस्तर में घुसकर उसने लिहाफ़ से अपने को अच्छे से लपेट लिया। परेशान और पशेमान वेद उसके सिरहाने बैठ गया।

‘तो तुम्हीं बताओ, ऋचा, कि हम क्या करें? क्या मेरा मन नहीं चाहता कि मैं पिता बनूं? मां इतनी बीमार हैं किंतु फिर भी उन्होंने दादी बनने की आशा नहीं छोड़ी है।’

‘मैं क्या करूं वेद? मैं अपने ऊपर बिल्कुल अंकुश नहीं रख पा रही।’ बेबस ऋचा ने लिहाफ़ में से सिर निकाल कर कहा।

‘तुम तो जानती हो, ऋचा, कि हमारे जैसे हज़ारों लोग हैं जिनके आवेदन पत्र कूड़ेदान में फ़ेंक दिये जाते हैं, कम से कम हमारा आवेदन रद्द नहीं किया गया है, हिम्मत रखो।’ भरे मन से वेद ने कहा हालांकि वह जानता था कि समाज सुरक्षा परिषद से उम्मीद करना बेकार था। उसे फिर से पढ़ाई रटाई शुरु करना असम्भव लग रहा था। इस महंगाई में टयुशन के पैसे निकालना क्या आसान था? यदि परिषद के बचत खाते में से वह पैसे निकाल ले तो बच्चे के लिए उनका आवेदन रद्द किया जा सकता था। 

‘सुनो ऋचा, यदि तुम एक बड़े आई-क्यू वाले के साथ शादी कर लो तो बच्चा पैदा करने के लिए तुम्हें झट इज़ाज़त मिल जाएगी।’ वेद बड़ी संजीदगी के साथ बोला; वह ऋचा की ख़ुशी के लिए कुछ भी करने को तैय्यार था।

ऋचा के बदन में मानो आग लग गई। वह थोड़ी देर तक चुप बैठी ग़ुस्से में उसे घूरती रही; फिर एकाएक उसकी आंखें चमकने लगीं।

‘वेद, क्यों न हम दोनों किन्हीं ऐसे दो लोगों से शादी कर लें, जो टैस्ट पास कर चुके हों? हमारे जैसे सैंकड़ों जोड़े होंगे जिनमें से एक में कुछ कमी होगी। बच्चे पैदा करने के बाद हम सब वापिस अपने-अपने घर लौट आएंगे। मज़े में दो जोड़ों की प्राबलम साल्व्ड।’ वह बिस्तर पर ख़ुशी से उछलने लगी मानों उसे कोई ख़ज़ाना मिल गया हो।

ऋचा, कुछ तो सोच के बोला करो।’

‘यह सम्भव है। इस तंत्र से लड़ने का बस ये ही एक लूप-होल है। यू आर मारवेलस, वेद।’ ऋचा वेद को चूमते हुए बोली।

‘तुम्हारा मतलब है कि हम एक दूसरे से तलाक लें, अपने लिए ‘हाई आई-क्यू’  वाले साथी ढूंढें, झूठा विवाह रचाएं, समाज सुरक्षा परिषद की इज़ाज़त मिल जाए तो बच्चे पैदा करें, तलाक लें और फिर से शादी करके वापिस अपने-अपने घरों में लौट आएं।’

‘ऐण्ड लिव हैपिली ऐवर आफ़्टर, सिम्पल।’ वह बिस्तर पर खड़ी होकर नाचने लगी। वेद ने उसे यूं देखा कि जैसे वह पागल हो गई थी।

‘तुम्हें लगता है कि सुरक्षा परिषद चुपचाप बैठी तुम्हें ये सब करने देगी।’

‘क्यों नहीं? माना कि हमें बहुत ही सावधानी बरतनी पड़ेगी। कानों कान किसी को ख़बर नहीं होनी चाहिए, मां तक को नहीं!’ वह अपने होंठों पर उंगली रखते हुए बोली।

‘यू नो ऋचा, यू आर क्रेज़ी,’ हवा में हाथ लहराता वेद खड़ा हो गया।

‘हां, मैं बच्चे के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं, तुम बोलो, हिम्मत है?’ आंखों में आंखे डालते हुए ऋचा ने वेद से पूछा. उसके चेहरे पर एक-एक भाव पढ़ा जा सकता था। वह और सुरक्षा परिषद से टक्कर लेगी? एक मिनट में वे उसे ताड़ जाएंगे।

‘तुम सोच रहे हो कि हम सच पर पर्दा नहीं डाल पाएंगे। हैं ना?’

‘तुम्ही कह रही थीं कि हम हाड़-मांस के लोग इस्पात के नहीं बन पाएंगे।

‘प्रैक्टिस से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। आंखे ख़ाली कर लो, चेहरे के भावों को छिपा लो, अब बताओ मैं क्या सोच रही हूं?’ ऋचा ने अपने चेहरे को सपाट करते हुए वेद से पूछा।

‘यही कि तुम बहुत कुछ छिपाने की कोशिश कर रही हो, तुम्हारी आंखों में चित्र जल्दी-जल्दी पलट रहे हैं, तुम्हारी यह भोली-भाली अदा वे झट ताड़ जाएंगे। हम दोनों ही नहीं, चारों के चारों जेल में बैठे होंगे।’

ग़ुस्से में एक बार फिर ऋचा बिस्तर में घुस गई और वेद उसे समझाने लगा कि उसकी योजना व्यावहारिक नहीं थी।

’ऋचा, हम सबके डी एन ए परिषद के पास सुरक्षित हैं। प्रैगनैंट औरतों पर अधिकारी ढेरों टैस्टस करते हैं. उनके पास आधुनिक तकनीकें हैं, उन्हें साफ़ पता चल जाएगा कि नवजात बच्चा किस जोड़े का है।’

‘वेद, यू आर पैरानौइड। हमारे पास कोई और चारा नहीं है। मैं कल परिषद के पास जा ही रही हूं. यदि अधिकारी हमारे आवेदनपत्र पर पुनः विचार करने को राज़ी नहीं होते तो वादा करो, वेद, कि हम कल शाम को ही अपनी एक गुप्त वेबसाइट खोल लेंगे. देखना, कैसे रातों-रात सैंकड़ों लाचार जोड़े हमसे आ जुड़ेंगे।’

‘इस झगड़े में पड़ने से तो अच्छा है कि हम स्पर्म-बैंक की सहायता स्वीकार कर लें।’ वेद के दिल और दिमाग़ में एक ज़ोरदार बहस चल रही थी कि ऋचा की इस सनक में उसका साथ दे कि नहीं। 

‘तुम भी क्या बात करते हो, वेद, तुम्हीं ने तो कहा था कि स्पर्म से पैदा हुए बच्चे अपने थोड़े ही होंगे। वे गोरे लगेंगे।’ ऋचा तड़ाक से बोल उठी! 

‘आंखों और बालों का रंग, क़द काठी तो हम चुन ही सकते हैं।’

‘और वे चाहे मेरे गर्भ में किसी का भी स्पर्म इंजैक्ट कर दें।’

‘ऋचा, तुम जानती हो कि सौ फ़ीसदी ऐसा नहीं होता. और फिर बच्चे में तुम्हारे भी तो जींस होंगे।’ वेद ने उसे समझाने का प्रयत्न किया। 

‘इस बात की तुम कोई गारंटी दे सकते हो क्या?’ ऋचा वेद के साथ विवाद की मनोस्थिति में नहीं थी।

परिषद चाहती थी कि उनके स्पर्म बैंक का उपयोग अधिक से अधिक हो। अधिकतर एशियन जोड़े स्पर्म-प्रैगनैंसी के ख़िलाफ़ थे। परिषद ऋचा को मुफ़्त में स्पर्म देने के लिए भी तैय्यार थी पर तब वेद को लगा था कि जब उसका स्पर्म अच्छा ख़ासा स्वस्थ था तो वे विदेशी स्पर्म क्यों ख़रीदें?

युवक-युवतियों को गर्भ-निरोधक गोलियां बचपन से ही उपलब्ध थीं पर फिर भी उनका प्रयोग आम नहीं था। परिषद ने लोगों के मन में ऐसा डर बैठा दिया था कि जब तक वे बच्चे के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध न हों, गर्भ धारण न किया जाए। बहुत सी बीमारियां आज भी लाइलाज थीं। एक्ज़ीमे से ग्रस्त व्यक्ति को कड़ी निगरानी के अन्दर बच्चा पैदा करने की इज़ाज़त इस शर्त पर मिल सकती थी कि दम्पति पूरा ख़र्चा उठाएंगे, जो केवल पैसे वालों के बस की ही बात थी, जिन्हें अन्य कई नियमों का भी पालन करना होगा। पहले गर्भ को गिरवाना होगा और दूसरे गर्भ के दौरान शोधकर्ता की हर आज्ञा का पालन करना होगा।

वेद रिसर्च-सैंटर में काम करता था, जहां मिश्रित जोड़ों और उनके बच्चों पर रिसर्च की जा रही थी। पाकिस्तानी और अफ़्रीकी मूल के जोड़ों पर प्रतिबन्ध लगाने के नियमों पर विचारों के आदान-प्रदान के लिए आज सुबह एक मीटिंग बुलाई गई थी, जिसकी वजह से वह ऋचा के साथ परिषद के दफ़्तर जाने में असमर्थ था। 

सुबह-सुबह ऋचा ख़ूब ज़ोर-शोर से तैय्यार हुई। ज़री वाली फ़िरोज़ी नई कुर्ती, टाइट जींस और कानों में चांदी के लम्बे-लम्बे बुन्दों से सजी-धजी ऋचा परिषद के दफ़्तर में बड़ी उम्मीद से बैठी थी जैसे कि वह अधिकारियों को अपनी स्मार्टनैस और सकारात्मकता से ही रिझा लेगी; सरकार और समाज सुरक्षा परिषद ठीक ही तो चाहतीं थीं कि इस देश के हर व्यक्ति और हर चीज़ को उत्तम, श्रेष्ठ और पूर्ण होना चाहिए।

मौसम ख़ुशगवार था और होता भी क्यों नहीं। बादल और बारिश अब मौसम-विभाग के हाथ में जो थे। बारिश का प्रयोजन अधिकतर रात को ही होता था ताकि लोगों की दिनचर्या में कोई बाधा न आए। कतारों में बनी समरूप क्यारियों में उत्तम श्रेणी के फूल खिले थे। पेड़ों की ऊंचाई, चौड़ाई और घनता सब एकरूप थी। मजाल था कि एक पेड़ अगले पेड़ से थोड़ा सा ऊंचा हो या घास का एक तिनका ज़रा सा सिर उठा ले। मखमली सड़कों पर लगता था कि लोग कार में नहीं, उड़नखटोले में सफ़र कर रहे हों। ऋचा के कदम बहकने लगे और अचानक वह एक बहुत ही पुराना गीत गुनगुना उठी, ‘मौसम है आशिकाना।’

दूर से आती हुई बस देखी तो बिना गंतव्य स्थान देखे ऋचा भाग कर उसमें जा बैठी। परिषद भवन के दो अड्डे पहले ही जब बस को रद्द कर दिया गया तो ऋचा को बहुत ग़ुस्सा आया; दूसरी बस लेने पर उसके 20 पाउंड और ठुक जाएंगे जबकि वह एक एक पाउंड दांतों से पकड़ कर ख़र्च कर रही थी. परिवहन विभाग और परिषद के सभी भवनों के पास लोगों की पहचान के चिप्स थे। कोई ब्लैक-लिस्टेड व्यक्ति कहीं कदम भी रख दे तो सीधे पुलिस को ख़बर लग जाती थी।   

अपने को किसी तरह संयत करती हुई ऋचा परिषद भवन में घुसी तो उसका मूड यकायक बदल गया। शायद इस मनहूस इमारत में ही कुछ था जो उम्मीदवारों की सकारात्मकता को दबोच लेता था। जैसे ही वह निर्धारित किओस्क पर पहुंची, उसने देखा कि एक जोड़ी नीली निर्दयी आंखें उसे घूर रही थीं। ऋचा को लगा कि इस गोरे से कोई आशा रखना बेकार था किंतु फिर भी वह मुस्कराती रही।

‘महाशय, आप तो जानते ही हैं कि मेरे पति ने जी तोड़ मेहनत की है, उनका आई क्यू भी अब बढ़कर पांच हो गया है।’ भोली सी सूरत बनाकर ऋचा अपनी पलकें झपकाती हुई अच्छी अंग्रेज़ी में बोली।

‘इससे तो यही सिद्ध होता है कि उसका दिमाग़ इससे अधिक दबाव नहीं झेल सकता।’ पार्षद ने अपनी नज़रें फ़ाइल पर गड़ा लीं।

‘पर महाशय, उनके व्यक्तित्व में कोई कमी नहीं है और वह बहुत हैंडसम हैं। फिर मेरा आई-क्यू भी तो सात है।’ ऋचा को लगा कि न चाहते हुए भी वह गिड़गिड़ा उठी थी।  

‘आप मेरा और अपना दोनों का समय बर्बाद कर रही हैं, आप मुझे अधिक परेशान करेंगी तो मुझे आपके दस्तावेज़ पर ‘अविवेकी’ की मोहर लगानी पड़ेगी, फिर आपको इस इमारत में पांव रखने की भी अनुमति नहीं दी जाएगी।’ पार्षद ने उसे निर्दयता से झिड़का।

‘महाशय, क्या कोई सूरत नहीं है?’ भयभीत ऋचा ने एक अंतिम प्रयत्न किया।

‘नहीं, यदि कानून में कोई ढील दी गई तो हम आपको सूचित कर देंगे।’

‘ऐसे जीवन से तो मर जाना ही बेहतर है!’ ऋचा की आंखें भर आईं। 

‘आत्महत्या-परामर्श परिषद अगली इमारत में है, वहां से आपको रजिस्ट्रेशन फ़ार्म मिल जाएगा।’  इस्पात-कवचित पार्षद की शीशे जैसी आंखें ऋचा के पीछे खड़े एक गोरे जोड़े की ओर घूम गईं। ऋचा का समय समाप्त हो गया था।

‘ब्लडी रेसिस्ट,’ ऋचा ने गाली देकर अपनी भड़ास निकालनी चाही पर उसका सीना जैसे एक चट्टान हो गया था। उसने जल्दी से बाहर आकर ख़ुली हवा में सांस ली तो उसे कुछ राहत मिली। कैसे बेग़ैरत हो गए हैं ये पार्षद? किसी की भावनाओं से क्या ऐसे खेला जाता है? एक बच्चा पैदा करने के लिए वह भीख मांगती फिर रही है; पैदा उसे करना है, देखभाल उसे करनी है, तो ये कौन होते हैं निर्णय लेने वाले? आत्महत्या के लिए भी उसे इनकी इज़ाज़त चाहिए। अभी इन सीढ़ियों से गिर कर कोई आत्महत्या कर ले तो क्या कर लेगी परिषद? वेद का जीना हराम कर देगी और क्या; उसके दूर-दूर के रिश्तेदारों के दस्तावेज़ों में ये बात दर्ज कर दी जाएगी कि ऋचा के दिमाग़ में खलल था और अच्छा ही हुआ कि उसे बच्चा पैदा करने की इज़ाज़त नहीं दी गई। वैसे भी इन ठिगनी और चौड़ी सीढ़ियों से गिरकर तो किसी की हड्डी भी नहीं टूटेगी। हाल ही में सरकार ने एसिसट्ड-सुइसाइड्स की उम्र घटाकर 75 साल कर दी थी, जो पहले अस्सी हुआ करती थी। मरने के लिए भी उसे पैंतालीस साल इंतज़ार करना होगा.

‘अरे ऋचा, तुम अभी तक इस परिषद के चक्कर लगा रही हो?’ मीना और उसका पति मनोहर बाहर सीढ़ियों पर ही खड़े थे। डेढ़ साल पहले उन्हें एक बच्चा पैदा करने की इज़ाज़त दी गई थी। तो क्या वे एक और बच्चे की तैय्यारी में हैं। ऋचा ने मन ही मन में सोचा कि कुछ लोग कितने भाग्यवान होते हैं।  

‘कुछ नहीं मीना, इस बार भी वेद का आई-क्यू पांच ही रहा और उन्हें फिर फ़ेल कर दिया गया।’

‘डेढ़ साल पहले तो परिषद ने मनोहर को पचास प्रतिशत अंकों पर ही पास कर दिया था!’

‘यू वर लक्की, अब औसत बढ़ा दी गई है।’ ऋचा ने कहा।

‘उन्होंने शायद वेद की चार्मिंग पर्सैनिलिटि के नम्बर नहीं जोड़े होंगे।’

‘जोड़े थे पर काउंसिल के हिसाब से मैं मामूली शक्ल-सूरत की हूं न।’ ऋचा ने सोचा कि वेद के सामने मीना को तो शायद वह बदसूरत ही लगती होगी।

‘मनोहर की बहन रीना को तो तुम जानती ही हो, उसकी शक्ल सूरत भी मामूली है पर उसे तो फट से पास कर दिया गया था।’

भई वह एक गोरे की बीवी है, जो परिषद में ऐक्चुयरी है।’ मनोहर बड़े गर्व के साथ बोला।

‘मैंने सुना है कि रीना ने लगी-लगाई नौकरी छोड़ दी!’ ऋचा ने बात बढ़ाते हुए पूछा।  

‘बेचारी क्या करती? आजकल बच्चों को होमवर्क करवाने के लिए एक फ़ुल-टाइम बंदा चाहिए।’ मनोहर बोला।

‘उसका बेटा विक्रम ज़रा मैथ्स में पिछड़ गया था तो स्कूल से मैमो आ गया कि यदि उसका औसत 60% से कम हुआ तो उसे परिवार-परिषद अपनी देखरेख में ले लेगी।’

‘बच्चे पैदा करने की परमिशन मिल भी जाए तो ज़िन्दगी कौन सी ख़ुश्गवार हो जाती है, ऋचा। मीना ने एक लम्बी सांस भरी।

‘हेनरी की तनख़्वाह पर घर चलाना मुश्किल हो रहा है पर कोई करे तो क्या करे? ‘हाई आई-क्यू’ होते हुए भी रीना घर पर बैठी है।’ मनोहर ने कहा।

‘ख़ैर, तुम बताओ कैसी हो? वेद कहां हैं?’

‘सुबह उन्हें दफ़्तर में कोई ज़रूरी काम था। कह रहे थे दफ़्तर से आधी छुट्टी लेकर मुझे यहीं मिलेंगे, और तुम सुनाओ, तुम यहां कैसे?’

मीना यकायक सिसकने लगी; आलिंगन में लेकर मनोहर उसे चुप कराने लगा।

‘आपको शायद नहीं मालूम, अर्जुन नार्मल नहीं हुआ था। पैदा होते ही परिवार परिषद ने उस पर रिसर्च करनी शुरु कर दी कि इतनी सावधानी के बावजूद ऐसा कैसे हुआ।’ अनजाने में ऋचा ने उनके ज़ख़्म हरे कर दिए थे। 

‘हे भगवान!’ ऋचा की आंखों में भी पानी भर आया। इन दोनों के दुख के सामने उसे अपना दुख कहीं बौना लगा।

‘हमने सोचा था कि हम टैस्ट तो पास कर ही चुके हैं, हमें दूसरे बच्चे की इज़ाज़त के लिए अधिक इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा लेकिन अब एक ऐबनौर्मल बच्चे के मां-बाप होने के नाते हमें ढेर सारे और टैस्ट कराने होंगे।’ मनोहर ने बताया।

‘जैसा भी था हमारा अर्जुन, हम पाल लेते।  हमें तो वह बिल्कुल एबनौर्मल नहीं दिखता था। अब तो परिषद हमें बस टाल रही है।’ मीना फिर सिसक उठी।

‘चलो छोड़ो, हमने वादा किया था कि जो हो गया हम उसकी बाबत नहीं सोचेंगे।’ 

‘सौरी डार्लिंग।’ एक दूसरे को सांतवना देते हुए मीना और मनोहर दोनों उदास हो उठे।  

‘यह लो वेद भी आ पहुंचे, चलो कहीं बैठकर चाय पीते हैं,’ ऋचा ने बात बदलते हुए कहा।

‘लगता है कि सदियों के बाद मिले हों। कहां रहे तुम लोग?’ मीना और मनोहर को देखकर वेद बड़ा ख़ुश हुआ। ऋचा ने वेद को संक्षेप में उनकी कहानी सुनाई। 

‘ये सरकार क्या अपनी मर्ज़ी से कुछ भी कर सकती है? आज हम अपनी मर्ज़ी से बच्चे नहीं कर सकते, कल ये कहेंगे कि हम कब उठें, कब बैठें, यह तानाशाही कब तक चलेगी?’ वेद ग़ुस्से और बेबसी से बोला।  

‘वेद, ज़रा धीरे बोल, कोई सुन लेगा तो तुझे यहीं पर धर लिया जाएगा।’ मनोहर ने इधर-उधर देखते हुए कहा।

‘हां ऋचा, सुना है सड़कों पर हुए माइक्रोफ़ोन और कैमरे लगे हैं, जो सब देखते सुनते हैं।’ मीना बोली।

‘हमने चाहा था कि मर जाएं तो वो भी न हुआ।’ ऋचा हताश होती हुई बोली।

‘सचमुच, बाबा आदम की यह ग़ज़ल कितनी फ़िट बैठती है आज कल के हमारे हालात पर. चल सुना दे, ऋचा, तेरा गीत सुनकर दिल को कुछ तो सुकून मिलेगा।’

‘मूड नहीं है, मीना. आज जब मैंने पार्षद से कहा कि इस जीवन से तो अच्छा है कि आत्महत्या कर ली जाए तो जानते हो, वेद, उसने मुझे क्या जवाब दिया?’

‘ऋचा, तुम कहीं पागल तो नहीं हो गईं? तुमने पार्षद से कुछ उल्टा सीधा तो नहीं कह दिया?’ ऋचा के कन्धों को झकझोरते हुए वेद ने पूछा।

‘हां, मैं पागल हो गई हूं या हो जाऊंगी। जानते हो, उस सड़े ब्लडी बास्टर्ड ने मुझे क्या जवाब दिया? उसने कहा कि आत्महत्या-परामर्श परिषद अगली इमारत में है, वहां से आपको रजिस्ट्रेशन फ़ार्म मिल जाएगा।’ ऋचा की आंखों के घमंडी आंसू अब भी बहने को तैय्यार नहीं थे; ग़ुस्से से उसका बदन गैस भरे ग़ुब्बारे की तरह हिल रहा था।

‘गुड ग़ौड, अब तक तो उसने आपकी फ़ाइल पर ‘सुसाइडल’ का नोट लगाकर ऊपर पहुंचा दिया होगा।’ मनोहर बोला।

‘अब वे तुम्हें बच्चे पैदा करने की इज़ाज़त हरगिज़ नहीं देंगे।’  

‘वैसे भी मुझे इनसे कोई उम्मीद नहीं थी, मीना। तुम नहीं जानतीं कि टयूशन के लिए हमने कैसे-कैसे बचत की, वेद ने उत्तर रट रट कर दिन रात एक कर दिए और फिर भी उसे फ़ेल कर दिया गया।’ ऋचा ने निराश होते हुए कहा तो चिंतित वेद उसे आलिंगन में लेकर सांत्वना देने का प्रयत्न करने लगा।      

‘मैंने तो सोचा था कि वेद इतना हैंडसम है कि उसे तो 100% मार्क्स तो यूं ही मिल जाएंगे।’ शायद ऋचा के मामूली नैन-नक्श वेद की अर्ज़ी पर शनि से भारी पड़ रहे थे। 

ऋचा को याद आया जब उसने वेद के साथ पहली बार चहकते हुए परिवार-परिषद भवन में क़दम रखा था। उसे विश्वास था कि अधिकारी उन्हें देखते ही फट से बच्चा पैदा करने की इज़ाज़त दे देंगे। वेद का मनमोहक और कसरती बदन देख कर लोग उसे ठिठक के खड़े निहारते रह जाते थे। वह स्वयं भी ख़ूबसूरत न सही, लेकिन आकर्षक थी और पढ़ाई-लिखाई में हमेशा अव्वल आती थी; उसे अपने ऊपर गर्व हुआ करता था।

परिषद ने उनसे ढेर सारे दस्तावेज़ मांगे थे – वंशक्रम, शिक्षा, व्यक्तित्व (जिसमें आई क्यू भी शामिल था), स्वास्थ्य, पेशा, घर, आमदनी, आपसी पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्ध। इन दस्तावेज़ों को भरते हुए उनकी हालत पतली हो गई थी। पहले टैस्ट में वेद का ‘आई क्यू’ तीन था। ऋचा ने सोचा कि चलो कोई बात नहीं, व्यवसाई वेद को आई-क्यू के लिए तैय्यार किया जा सकता था किंतु वह तो टयूशन के नाम पर ही बिदक गया था। ऋचा और वेद की मां कितनी मुश्किल से वेद को पटड़ी पर वापिस लाई थीं। दूसरे टैस्ट में उसका ‘आई क्यू’ बढ़कर पांच हो गया था किंतु इस साल परिषद ने औसत और बढ़ा दी थी। सिर्फ़ एक नम्बर से वह फ़ेल कर दिया गया था।    

‘रईसज़ादों को धड़ाधड़ बच्चे पैदा करने की छूट है। इन्हें तो बस ब्लू-ब्लड ही चाहिए, बाकी जाओ जहन्नुम में।’ मन ही मन मीना सोच रही थी कि परिषद ने वेद और ऋचा के पुराने आवास और रहन सहन के भी नम्बर काटे होंगे।

मीना और मनोहर का अपना आवास एक पौश इलाके में था, जहां के घर अल्ट्रा मौडर्न थे। घर अपने निवासियों, परिवार के सदस्यों और मित्रों को पहचानते थे। घर के बाहर या अन्दर कदम रखते ही बिजली, गैस, पानी आदि स्वयं ही स्विच औन और औफ़ हो जाते थे। कुकर के पास जाओ तो चूल्हा जलने लगता था और पतीला हटाते ही औफ़ हो जाता था। शाम होते ही पर्दे बन्द हो जाते और सुबह खुल जाते। ऋचा के घर में तो वही बीसवीं सदी के यन्त्र थे; जो ज़ोर ज़ोर से ताली बजाने पर काम करते थे. उन्हीं के पड़ौस में बसा मीना का भाई अपनी पोलिश पत्नी के साथ पोलैंड जा बसा था, जहां उनके एक या दो नहीं; पूरे चार बच्चे थे।

‘ये लोग तो खुल्लमखुल्ला कह रहे हैं कि अपने देश वापिस चले जाओ।’ 

‘यही नहीं, यदि कोई वापिस जाना चाहे तो वे एक लाख पाउंड देने को भी तैयार हैं।’ मीना ने कहा।  

ऋचा को याद आया कि जब वह ग़लती से जच्चा-बच्चा भवन में पहुंच गई थी जहां पचासियों जोड़े चहक रहे थे. जहाज़-नुमा सोफों में धंसी हुई गर्भवति युवतियों के चेहरे ख़ुशी से चमक रहे थे। एक गोरे के अधीन बहुत से अश्वेत कर्मचारी उनकी सेवा को आतुर इधर-उधर दौड़ रहे थे। ऋचा को लगा कि जैसे वह सपना देख रही हो। जब वेद और वह मां-बाप बनेंगे तो उनकी भी इतनी ख़ातिर होगी। यकायक उसे लगा कि लोग उसे घूर रहे थे।

‘मैडम, आप शायद ग़लत जगह आ गईं हैं।’ एक सेवक ने आकर उसे परिषद-भवन का रास्ता बताया था।

‘सुना है ऋचा, जब बच्चों की संख्या कम हो जाती है तो ये बाकी के आवेदकों को थोड़ी ढील दे देते हैं, तू हिम्मत नहीं हार।’ मीना ने सोच में डूबी ऋचा का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहा।

‘जब कभी यह छूट मिलेगी न मीना तो हमारी उम्र ज़्यादा हो गई होगी!

‘ऋचाजी, एक बात कहूं, आप बुरा तो नहीं मानेंगी?’ मनोहर अचकचाता सा बोला। ऋचा ने ‘न’ में सिर हिलाया।

‘बच्चा चाहिए तो तुझे तो एक दम टिपटौप होना पड़ेगा।’ मनोहर की जगह मीना बोल उठी थी। इतना सज-धज के बावजूद मनोहर और मीना को ऋचा ख़ूबसूरत और स्मार्ट नहीं दिख रही थी; शायद इसी प्रघात से ऋचा सीढ़ी पर ही ढेर हो गई।

‘अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे।’ मीना ने उसके पास ही बैठते हुए कहा।  

‘ऋचाजी, अगर आप अपनी नाक पर उगा ये मस्सा कटवा दें तो शायद आपकी पर्सनैलिटी के कुछ प्वाइंट्स बढ़ जाएं...ये बस एक आइडिया है।’ झिझकते हुए मनोहर ने कह तो दिया पर उसकी उलझन और बढ़ गई।   

‘ऋचा, यह ठीक कह रहे हैं। हमें तो इसकी आदत है पर जो तुझे पहली बार देखता है न, यह मस्सा उसके हलक...यह हमें लगता है, हां।’ मीना ने मनोहर की ओर इशारा करते हुए कुछ यूं कहा कि यह उन दोनों की ही राय थी।   

‘यह एक बड़ा ख़र्चा है मीना, कर भी लूं तो क्या ज़रूरी है कि हमारे कुछ प्वाइंट्स बढ़ जाएंगे।’ कहीं वेद और मीना झेंप न जाएं, ऋचा चुप रही. प्वाइंट्स तो वेद के कम थे, उसके मस्से से प्वाइंट्स का क्या सम्बन्ध था?

‘ऋचाजी, प्लास्टिक सर्जरी करवाने के लिए सरकार सहायता देती है।’

‘अच्छा, फिर तो मैं इस मस्से को हटवाने के बारे में सोच सकती हूं।’

‘नहीं, यह मस्सा तो ऋचा के चेहरे का एक अहम फ़ीचर है, मुझे अच्छा लगता है।’ वेद भी इस बात को और तूल देना नहीं चाहता था.  
‘आपकी मर्ज़ी पर आप चाहे जो भी करना, सुसाइड सैंटर के बारे में कभी भूले से भी नहीं सोचना। मेरे एक दोस्त ने इमोशनल होकर फ़ार्म भर दिया था, उसके शरीर पर वे तब तक परीक्षण करते रहे जब तक उसका दिमाग़ बिल्कुल ख़राब नहीं हो गया।’

‘हां ऋचा, उसका शरीर सूख के कांटा हो गया है। कभी हंसता है तो कभी रोता है और कभी बेसुरी आवाज़ में गा-गा कर पूरे साइकाएट्रिक वार्ड की नींद हराम करता है।’ मीना ने जोड़ा।  

‘और आत्महत्या की इज़ाज़त उसे अभी भी नहीं मिली, कहते हैं कि क्यू बहुत लम्बी है।’ मनोहर बोला।

‘क्यू-व्यू की बात नहीं है, उन्हें तो मुफ़्त में शरीर चाहिए अपनी रिसर्च के लिए।’  वेद ने कहा।

‘सुनो, मुझे लगता है कि आपके पीछे खड़ा वह आदमी हमारी बातें सुन रहा है।’ घबराई हुई मीना फुसफुसाई।

‘तुम तो मीना हर एक पर शक करने लगी हो।’ वेद ने उसे टालते हुए कहा हालांकि वह भी चौकन्ना हो गया था।

‘नहीं, मैं सच कह रही हूं, पहले वह ऊपर की सीढ़ी पर था, अब आपके पीछे है, अपने चेहरे के आगे अख़बार फैलाए वह हमारी ही बातें सुन रहा है।’  

‘चल वेद, हम लोग बाहर कैफ़े में जाकर चाय पीते हैं। छुट्टी पर हैं न आप दोनों?’ डरे हुए से वे सब कैफ़े में आ बैठे। न जाने कोई उनके पीछे ही न लगा दिया गया हो। कुछ भी सम्भव था। देश में किस्म-किस्म की बातें फ़ैली हुई थीं। चाय और केक और्डर करने के बाद उन्होंने एक सरसरी नज़र से कैफ़े का मुआयना किया कि कहीं कोई कैमरा या माइक न छिपा हो और फिर एक सुरक्षित सा कोना ढूंढ कर वे एक मेज़ पर आ बैठे।

‘मुझे एक तरकीब सूझी है।’ वेद फ़ुसफ़ुसाया तो ऋचा ने उसे ऐसे देखा कि वह अब कौन सी नई बात कहने जा रहा था। वेद जब कभी मुंह खोलता तो उससे काम की बात कम ही निकलती थी। ऋचा ने सोचा कि मनोहर और मीना कैसे एकस्वर होकर बोलते थे। वे एक दूसरे की बात का कभी खंडन नहीं करते।

‘काउंसिल बहुत चालाक है, उसे लोगों के सारे मंसूबों के बारे में पता है।’ मनोहर ने किंचित मुस्कुराते हुए कुछ यूं कहा कि जैसे वेद को कोई निराली बात सूझ ही नहीं सकती थी।

‘हां, एक नए नियम के अनुसार यह भी ज़रूरी हो गया है कि पति-पत्नी दोनों ही कंडोम पहन कर सम्भोग करें। लोग यह नहीं कह सकते कि कंडोम फट गया था और ‘बाइ एक्सीडैंट’ कोई प्रैगनैंट हो गया।’ मीना ने भी कुछ यूं कहा कि जैसे उसे पता था कि वेद के दिमाग़ में क्या तरकीब थी।

‘हां, और यदि कोई ‘बाइ एक्सीडैंट’ प्रैगनैंट हो भी जाए तो पन्द्रह हफ़्तों के अन्दर उसे अपना एबौर्शन करवाना पड़ेगा।’ मनोहर ने वेद के अगले सवाल का जवाब भी दे दिया था।

वेटर चाय लेकर आ गया था, सब चुपचाप अपनी अपनी प्लेटों में केक रखने लगे और चाय बनाने लगे।  

‘अरे, तुमने आज पेपर्स में देखा, हाउस औफ़ लौर्ड्स के तीन रिश्वतख़ोर पार्षद पर्मिट दिलवाने के चक्कर में पकड़े गए!’ ऋचा ने बात बदलते हुए कहा।

‘इन्हें तो कोर्ट में ले जाने का भी कोई फ़ायदा नहीं है, हम टैक्स-पेयर्स के धन से ही वे मुकदमा लड़ेंगे और अपने विशेषाधिकार के बल पर छूट भी जाएंगे!’ मीना ने झुंझलाते हुए कहा।

‘मेरा दोस्त पीटर कह रहा था कि परिषद रेसिस्टस पार्षदों से भरी पड़ी है।’ मनोहर ने कहा।

‘क्यों न हो, ब्रिटिश नैशनल पार्टी के लोग ही तो चला रहे हैं सरकार और परिषद।’ वेद बोला।

‘फिर तो मिल गया हमें पर्मिट।’ ऋचा पूरी तरह हताश हो चुकी थी।  

‘हाउस औफ़ लौर्ड्स में कैसे-कैसे बदसूरत लोग भरे पड़े है, उनका आई-क्यू क्या हमारे से ज़्यादा होगा? उन्हें तो धड़ाधड़ पर्मिट मिल जाते हैं।’ मीना ने कहा।  

‘प्राइम मिनिस्टर नैश ने कहा तो है कि अब सबके लिए एक ही नियम लागू होगा...’ वेद बोला।

‘ये बातें सिर्फ़ इलैक्शन जीतने के लिए ही हैं।’ मनोहर ने वेद की बाट काट दी।

‘आई-क्यू, पैसा और एक बड़ा सा घर होने के बावजूद लोगों को बच्चा करने का हक नहीं है और इन बदसूरत ब्लू-ब्लड वालों को कोई रोक-टोक नहीं है!’ मीना ने कहा।  

‘इनके लिए तो 20% कोटा आरक्षित है!’ मनोहर ने कहा।

‘श श श... सुनो, हमारे पीछे रखे हुए इस बड़े से पौधे में क्या तुम्हें तार दिखाई दे रहे हैं? हो सकता है कि हमारी बातें रिकार्ड की जा रही हों।’ डरी हुई मीना इधर-उधर देखते हुए बोली।

‘मीना, तुम तो सचमुच बहुत ही डरपोक हो, ये क्रिसमस लाइट्स हैं। वैसे भी हम हिन्दी में बात कर रहे हैं, उन्हें क्या समझ आएगा?’

‘ओह तो तुम समझते हो कि समाज सुरक्षा परिषद में कोई हिन्दी नहीं बोलता?’ मीना ने हाथ मटकाते हुए पूछा तो एकाएक सब चुप हो गए।  

‘वहां हमारे लोग भरे पड़े हैं। काम करवाने के लिए तो हम इंटैलिजैंट हैं, लेकिन बच्चे पैदा करने के लिए इन्हें हमारी आई-क्यू कम लगती है!’ ऋचा ने कहा।

‘अच्छा चलो, यहां भी कब तक बैठा जा सकता है। लोगों को शक हो सकता है कि इतनी देर से चार लोग क्या बात कर रहे हैं।’ वेद ने कहा।  

‘थोड़ी देर बस स्टौप पर बैठकर बात करते हैं।’ वेद ने सुझाया। 

‘वहां तो कैमरे भी लगे हैं।’ ऋचा ने उसकी बात काटते हुए कहा।  

‘किसी पब में चलें? शोर-शराबे में हमारी बातें किसी को सुनाई नहीं देंगी!’ मनोहर ने कहा और सब सामने वाले ‘अगली डकलिंग’ में जा बैठे।

‘लंच का समय होने जा रहा है, चलो फ़िश ऐण्ड चिप्स खाते हैं।’ 

‘बीयर तो ले नहीं पाएंगे, कैलोरीज़ ज़्यादा हो जाएंगी।’

‘और्डर करके देखते हैं,’ मनोहर का मन बीयर पीने का था। क्रैडिट कार्ड रिफ़्यूज़ नहीं किया गया लेकिन वेटर ने उन्हें एक स्लिप पकड़ा दी; उन्हें सावधान किया गया था कि वे बीयर, फ़िश और चिप्स ले सकते थे इस शर्त पर कि वे सब एक घंटा दौड़ लगाएंगे अथवा आधा घंटा तैरेंगे। उन सब ने हस्ताक्षर कर दिए. लोगों की सेहत के मामले में परिषद बहुत कठोर थी। सिगरेट, शराब या मोटापे से ग्रस्त मरीज़ों को अपने इलाज का पूरा ख़र्चा उठाना पड़ता था। इसके अलावा ट्रेन, बस और हवाइ जहाज़ से यात्रा करने के लिए भाड़ा भी अधिक देना पड़ता था।

‘भोजन और्डर करके वे बाहर लगे बैंचों पर जा बैठे। एक उड़ती सी दृष्टि इधर-उधर डाल कर उन्हें लगा कि यहां बात की जा सकती थी। 

जब तक उनका दाना-पानी आया, आस-पास के दफ़तरों से लोग भी लंच के लिए पब में आ बैठे और चर्चा चल पड़ी एक मिस जेड स्मिथ की, जिसने एक विधवा का ढोंग रचकर काउंसिल के स्पर्म बैंक से एक बड़े वैज्ञानिक हैनरी विलियम्स के स्पर्म से गर्भ धारण कर लिया था। हर तरफ़ शोर मचा था कि काउंसिल के किसी अधिकारी की सहायता के बिना ऐसा होना सम्भव नहीं था। ख़ैर, जब तक ये बाद सामने आई, जेड पांच महीने के गर्भ से थी और उसका गर्भ गिराना ख़तरे से खाली नहीं था। इस हालत में उसे कोर्ट में खींचना और भी दंगा फ़साद खड़ा कर सकता था।

एक दूसरा समूह जैक पैटर्सन की बात कर रहा था, जिसने बेहोशी की दवा शराब में पिलाकर करोला लाइल से बलात्कार किया था। करोला ने यह बात छै महीनों तक छिपाए रखी। जब परिषद को इस बात की सूचना मिली तो उन्होंने जैक को हिरासत में ले लिया किंतु करोला उस पर मुकदमा दायर करने के लिए तैय्यार न थी। पैदा होते ही करोला के बेटे को परिषद ने अपने कब्ज़े में ले लिया और एक उदाहरण के तौर पर जैक को रिसर्च-सैंटर में कैद कर दिया गया ताकि अन्य लोग यह न सोचें कि ऐसी ढील से फ़ायदा उठाया जा सकता था।

‘राइट टु हैव बेबीस चैरिटि’ ने विरोध किया तो उनके सदस्यों पर परिषद ने कितने ज़ुल्म ढाए। उनके नेता टोनी वुड का तो आज तक कुछ पता नहीं चला।’

‘इस अत्याचार का अंत कैसे हो?’ ऋचा बोली।

‘अत्याचार! वे तो समझते हैं कि वे देश की भावी पीढ़ी को परफ़ैक्ट बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं और हम जैसे लोग उनके आड़े आ रहे हैं।’ मीना ने कहा।

‘उनके मैंनिफ़ैस्टो में साफ़ लिखा है कि 2050 तक कोई ग़रीब नहीं होगा और न ही कोई बीमार और बेकार।’

‘वाट अबाउट ख़ुशी? और फिर ज़रूरी तो नहीं कि तमाम हिदायतों के बाद बच्चे ख़ूबसूरत, स्वस्थ और ब्रेनी ही होंगे। क्या गारेंटी है?’ ऋचा ने कहा।   

‘जो बच्चे परफ़ैक्ट नहीं होते, जैसे कि हमारा अर्जुन .....’ मीना फिर सिसकने लगी। तभी एक हूवर तश्तरी आई और उनके पैरों के आस पास सफ़ाई करती निकल गई। चुप होकर सबने अपने पांव ऊपर उठा लिए! हो सकता है कि इस छोटे से हूवर में कैमरा और रिकोर्डिंग मशीन फ़िट हो!

‘आपने नोट किया, ऋचाजी, कि सड़कों पर अब एक भी सफ़ाई कर्मचारी नहीं नज़र आता, सारा काम इन रोबौट्स के ज़रिये हो रहा है।’ मनोहर बोला।

‘हां, शहर के बाहर इन्होंने जो किबुट्ज़ बनाए हैं, वहां अक्षम, अपूर्ण और बदसूरत लोगों से रातों रात सफ़ाई करवाई जाती है ताकि इनका शहर दिन में परफ़ैक्ट दिखे।’ ऋचा ने बताया।

‘सुना है कि मैनुअल लेबर के लिए भारी और मज़बूत बदन वाली एक दब्बु कौम पैदा की जाएगी, जिसका दिमाग़ कमज़ोर होगा ताकि चौबीसों घंटे इन्हें रगड़ा जा सके।’

‘और तुमने स्थानीय अख़बार में पढ़ा ही होगा कि लोगों की सहूलियत के लिए परिषद ने कैंसल राइज़ में एक आत्महत्या सहायता योजना’ का केन्द्र खोला है।’

‘हां, हार्ल्स्डन के आस पास के इलाकों में जहां आत्महत्या की डिमांड कहीं ज़्यादा है, सुरक्षा परिषद ने दो नए केन्द्र खोलने का प्रस्ताव रखा है।’  

‘पूरे लन्दन में तीन केन्द्र क्या भाड़ झोंकेगें जब कि सुरक्षा परिषद चाहती है कि सुईसाइडल लोगों को जल्दी से जल्दी सहायता दी जाए।’

‘सुना है कि जो लोग कोशिश करके हार जाते हैं या पकड़े जाते हैं, उन्हें क्यू में और भी पीछे धकेल दिया जाता है।’

‘ऐसा क्यों, ऐसे लोगों को तो सहायता की अधिक ज़रूरत है।’ वेद ने पूछा

‘वे अपने साधन ऐसे लोगों पर क्यों बर्बाद करेंगे जो अपने निश्चय पर टिके भी नहीं रह सकते?’  

‘वैसे भी सुरक्षा परिषद डरपोक हिन्दुओं को घास नहीं डालती। हम लोग आत्महत्या को पाप जो मानते हैं?’ ऋचा ने बताया। 

‘ये केन्द्र केवल उन लोगों के लिए हैं जिनकी अर्ज़ी मंज़ूर हो गई हो। नए आवेदनों के लिए सुरक्षा परिषद के भवन में ही जाना पड़ेगा।’ 

‘मैं तो कहता हूं कि वापिस अपने देश चलें।’ वेद ने अपना वही पुराना राग छेड़ दिया।

‘सब कुछ बेचकर भी हम इतना पैसा नहीं जुटा पाएंगे कि इंडिया जाकर सैटल हो सकें।’ मनोहर बोला।

‘रिपैट्रिएशन के लिए भारत सरकार अब हर आदमी का पांच मिलियन मांग रही है। चलो वह भी किसी तरह दे दो, पर फिर एक घर भी तो चाहिए और जानते हो दिल्ली, मुम्बई में घरों की कीमतें क्या हैं और वो भी हम जैसे ‘फ़ौरन रिटरंड के लिए?’ मीना ने पूछा।  

‘हां, यहां से जाकर हम किसी ऐसी वैसी जगह तो रह नहीं सकते। एक अच्छी कौलोनी में एक अच्छा अपार्टमैंट लेकर ठीक ठाक ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए हमारे पास काफ़ी पैसा होना चाहिए।’ मनोहर बोला।

‘अगर हम चारों मिलकर अपना पैसा पूल करें तो ये सम्भव हो सकता है।’ वेद ने कहा।

‘दो बच्चे पैदा करके हम उन्हें आसानी से पाल पोस भी सकते है!’ ऋचा को आशा की एक छोटी सी किरण नज़र आई।

लेकिन पहले ठीक से सोच लो कि कितने दिन चलेगा हमारा यह भाईचारा। चारों एक दूसरे के कन्धों पर चौबीस घंटे चढ़े रहेंगे तो हमें जो आदत हो गई है एक ‘प्राइवेसी’ की, वह कैसे निभेगी?’ मीना ने कहा।

‘मैंने तो सुना है कि भारत सरकार भी इंग्लैंड के तरीके आज़माने की तैय्यारी में लगी है। लोगसभा में जम के बहस चल रही है कि झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वालों को बच्चे पैदा करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।’ मनोहर बोला।

‘ठीक ही तो है; बाकी के देशों की पूर्णता की इस दौड़ में कहीं हमारी पीढ़ियां गंवार ही न कहलाएं।’ वेद ने कहा।

‘ये हिटलरशाही कहां जाकर रुकेगी? धरती पर स्वर्ग उतारने चले हैं जबकि लोगों के दिलों में करोड़ों नर्क पल रहे हैं।’ ऋचा ने कहा। 

एकाएक बाहर खलबली मच गई। कहीं पास से ही नारों की आवाज़ें सुनकर कई लोग बाहर निकल आए। परिषद भवन के सामने ही एक जमघट लगा था। कोई पचास एक लोग झंडे और पोस्टर्स लिए नारे लगा रहे थे, ‘डाउन विद जौन नैश।’ जौन नैश समाज सुरक्षा परिषद का निदेशक था, जिसने बच्चे पैदा करने और गोद लेने के नियमों को इतना सख़्त कर दिया था कि लोग तिलमिला उठे थे।

‘चलिए अब उठते हैं, कहीं किसी को शक हो गया कि हम कोई साज़िश कर रहे हैं तो जो थोड़ा बहुत मौका है वह भी हाथ से निकल जाएगा।’ मनोहर बोला।

‘चलो इनके साथ मिलकर हम भी शोर मचाते हैं, कोई तो सुनेगा हमारी आवाज़।’ ऋचा ने कहा तो बाकी के सब अनिश्चित से उसे देखने लगे।

‘अरे छोड़ो, ये गोरे तो छूट जाएंगे, हम बेकार में धर लिए जाएंगे।’ मनोहर बोला।

‘ऋचा, तुम्हें पता है न कि विद्याधरन पर पुलिस ने कितने अत्याचार किए, उसने तो बस वेबसाइट के ज़रिये ही आवाज़ उठाई थी।’ मीना ने मनोहर का समर्थन करते हुए कहा। 

‘मुझे तो लगता है कि बिना हमारे कड़े विरोध के कुछ नहीं होगा और इनकी तानाशाही बद से बद्तर होती चली जाएगी।’ ऋचा ने बुझे मन से कहा।

‘वैसे इन गोरों की भी दाद देनी चाहिए कि ये हमारे लिए जोखिम उठा रहे हैं। एक हम है कि कायरों से छिपे बैठे हैं।’ वेद ने कहा तो ऋचा ने बड़े स्नेह से उसे देखा कि पहली बार उसके पति ने उसका समर्थन किया था।

‘ये गोरे केवल शोर मचाते हैं और बहस करते हैं पर आख़िर में होता वही है जो सरकार चाहती है।’ मनोहर अपनी बात पर अड़ा रहा।

‘इन गोरों ने ही गांधी जी का सन्देश दुनिया भर में पहुंचाया था और फिर सारा देश उनके पीछे हो लिया था। यह शर्म की बात है कि हम अपनी आवाज़ को तब तक दबाए रखते हैं जब तक कि कोई बड़ी हस्ती आकर उसे नहीं ललकारे।’ ऋचा ने कहा तो इस बार मीना ने भी सिर हिलाकर उसका समर्थन किया।

‘यह भारत नहीं है और यहां हमारी संख्या केवन दो प्रतिशत है।’ मनोहर ने सबको सावधान करना चाहा।  

‘वही तो, अगर हम इन थोड़े से गोरों का साथ दें तो इस तानाशाही के ख़िलाफ़ हम ये जंग जीत सकते हैं।’ ऋचा अपने को रोक नहीं पा रही थी।

‘एक बार फिर सोच लो; बच्चे के लिए हमारा आवेदन कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा।’ मनोहर ने उन्हें रोकने की एक आख़िरी कोशिश की।

‘तो तुम्हें अब भी आशा है कि हमारे आवेदन उनकी फ़ाइलों में हैं? जिस तरह से परिषद के अधिकारी ने आज मुझे सुइसाइड-केन्द्र का पता बताया, मैं तभी जान गई थी कि हमारे आवेदन पर कोई ऐक्शन नहीं लिया जाएगा।’

‘तो चलो, ज़िन्दगी में अब बचा ही क्या है?’ मीना ने ऋचा का हाथ पकड़ लिया और वे चल दीं।  मनोहर और वेद भी उनके पीछे हो लिए।

जल्दी ही उनके हाथों में भी झंडे और पोस्टर्स पकड़ा दिए गए। भीड़ की आवाज़ में एक नया जोश लक्षित था। 

जल्दी ही पुलिस आ पहुंची। अपनी गाड़ियों में बैठे बैठे ही उन्होंने पिचकारियों से प्रतिवादियों पर अश्रु गैस की बौछार कर दी। आंखे मिचमिचाते हुए लोगों को खदेड़कर पुलिस वैन में बैठा दिया गया।

जलती हुई आंखों से जब कुछ साफ़ दिखने लगा तो इन चारों ने देखा कि उनके अलावा सिर्फ़ एक अफ़्रीकन औरत ही थी जिसे गिरफ़्तार किया गया था. उसे मुस्कराते हुए देख वे चारों भी मुस्कुराने लगे। 

 

20 मई 2010

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                                                                                                              कहानी समकालीन


                                                                                                                 -सुधा भार्गव

                               अज्ञात डगर

सोनाली के दोनों बेटे उससे बहुत दूर भारत से बाहर थे |

पति नीलकांत की बीमारी के कारण छोटे बेटे को आस्ट्रेलिया से भारत आना पड़ा |बड़ा बेटा विदेश में ही रहा | उसकी नौकरी ऎसी थी कि बीच -बीच में वह स्वदेश जाता रहता था |इससे माँ बाप को बहुत संतोष था |दुर्भाग्य से चार साल बाद ही नीलकांत की मृत्यु हो गई |छोटे बेटे का मन भारत से उछ्टने लगा और चाहें जब शुरू हो जाता --मैं तो टोरेन्टो (कनाडा) )चला जाऊंगा ,मैं तो सिंगापुर जाऊंगा |जरा भी न सोचता कि उसकी बातों से माँ के ऊपर क्या बीतती होगी--|

माँ ने कहा भी -बेटा तू चला जायेगा तो मैं कहाँ जाऊंगी ?

-मेरे साथ |

मजे की बात --बेटा तो कहकर भूल जाता पर माँ की मन :स्थिति डावांडोल हो उठती |

उस दिन बड़ा बेटा न्यू जर्सीसे आया हुआ था |दोनों के सामने वह बोली --

-तुम दोनों बाहर रहोगे तो न मैं बड़े के पास रहूँगी न छोटे के पास ,भारत में मेरे नाते -रिश्तेदार और दोस्त भी हैं |रहूँगी भारत और तुम लागों से समय -समय पर मिलने आऊंगी |

-ओह माँ !चिंता न करो |हमें क्या आपकी चिंता नहीं है ?दोनों आगे -पीछे बोले |

कुछ दिनों को वह शांत हो गई मगर जब सुना छोटे ने अमेरिका जाने का निश्चय कर लिया है ,वह हड़बड़ा उठी -

-बेटा अपने उज्जवल भविष्य के लिए तुम अमेरिका जा रहे हो ---- जानकर खुश हूँ पर मेरी बात याद है न !निश्चय करके जाना मैं कहाँ रहूँगी ?

-सब निश्चित हो जायेगा | |मैं पता लगा रहा हूँ |मेरे कई मित्र हैं जिनके माँ -बाप भारत में ही रहते हैं ,आराम से रहते हैं और जब चाहे बच्चों से मिलने चले जाते हैं |

-यही तो मैं चाहती हूँ |

-मैं भी तो यही चाहता हूँ माँ !

ज्यों -ज्यों बेटे के जाने के दिन नजदीक आने लगे माँ का दिल तेजी से धडकने लगा |जाने के एक हफ्ते पहले दिन छिपे बेटा बोला -

-माँ मेरे साथ चलो !

-कहाँ ?

-चलो तो !

बेटे ने माँ का हाथ पकड़ा और घर से बाहर हो गया |

वृद्धाश्रम के आगे कार झटके से रुकी ,सोनल को तो लगा उसके ह्रदय की गति रुकी-- बस रुकी--!कल्पना से परे-- !

अध्यक्ष ने बहुत गर्म जोशी से हाथ मिलाया और उन्हें आश्रम दिखाते हुए बोला-यहाँ दो तरह के कमरे हैं |एक वे जो अनुदान के सहारे चलते हैं और दूसरे वे जिनका खर्चा रहने वाले खुद उठाते हैं|इनको कमरे के साथ शौचालय,छोटा सा ड्राइंग रूम व रसोईघर भी होता है|जरुरत पड़ने पर सेविकाएँ भी रहती हैं |

-कितना खर्चा देना पड़ता है ?बेटे ने पूछा |

-करीब १५ हजार प्रतिमास |

-इतना ज्यादा--- !सोनल चौंक पड़ी |

-ओह माँ हमें खर्चा नहीं देखना अपनी सुविधा देखनी है |एक तरह से ये वरिष्ठ नागरिकों की सुविधा का ध्यान रखते हुए साफ सुथरे बनाये गये है और आधुनिक उपकरणों से भी सुसज्जित हैं |आपको यह कमरा कैसा लगा ?

-अच्छा लगा मगर ---|

- मगर -वगर कुछ नहीं !बाद में बातें कर लेंगे --|

बेटे ने एक चैक काट कर अध्यक्ष महोदय के हाथ में थाम दिया |

सोनल भनभनाती हुई कार में जा बैठी--- बिना मुझसे पूछे--- मेरे ही भविष्य का-निश्चय |

माँ का हाथ अपने हाथ में लेते हए बेटा स्नेहसिक्त शब्दों में बोला --माँ नाराज न हो |मैंने एक साल के लिए आश्रम में पैसा जमा कर दिया है |आप को वहाँ रहना पसंद न आया तो उसे छोड़ देना| वैसे वहाँ न कोई बिल जमा करने का झंझट न नौकरानी का सिरदर्द !अच्छा अस्पतान- अच्छी डाक्टर. अच्छी से अच्छी देखभाल !

-मेरा यहाँ मन कैसे लगेगा ?

-आपको यहाँ कौन सा बारह महीने रहना है|दीदी- भैया और मेरे पास रहने के बाद मुश्किल से ३-४ माह बचेंगे|

- अरे मैं अपने भाई बहनों के साथ भी तो रहूँगी |

-हाँ !हाँ मामा लोगों के पास भी रह लेना | वैसे यहाँ भी----- आपका मन खूब लगेगा |समय -समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं जिसमें भाग लेकर आश्रम के लोग अपने शौक पूरे करते हैं |अपना हुनर दिखाकर अजीब सी संतुष्टि होती है -यह तो आप मुझसे ज्यादा समझती हैं सितार वादक जो ठहरीं |

-अब तू अपनी बात मनमाने के लिए मेरी चापलूसी मत कर |

-आप हैं ही ऐसी !यहाँ भी आपके हमउम्र आपका लोहा मानने लगेंगे |

सोनल के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान उभरी पर दूसरे ही पल बोझिल सी हो उठी -

-मेरे मकान का क्या होगा जिसमें मैं रहती हूँ ?
-उसे छोड़ने की तो बात ही नहीं |जरूरत का समान यहाँ ले आना ,बाक़ी-- एक कमरे में बंद कर देंगे और उसे किराये पर चढ़ा देंगे |

-मुझे नहीं चढ़ाना किराये पर --झंझट है |

-झंझट काहे का --मैं करूंगा सब कुछ |फिर माँ समझने की कोशिश करो --उससे करीब २५हजार रूपये किराया आएगा |आश्रम और आपका खर्चा भी निकाल आएगा |पैसे से पैसा कमाया जाय तो क्या हर्ज है |

कुछ देर के लिए दोनों के बीच मौन आलती -पालती मार कर बैठ गया |

बेटा खामोश था -वह अपनी राय जबरदस्ती माँ पर थोपना नहीं चाहता था,माँ चुप थी -बेटे की बात समझ तो गई पर कदम अनजानी राह की ओर बढ़ने से इंकार कर रहे थे |थक चुकी थी वह शरीर से भी और दिमाग से भी |सोनल को समय चाहिए था निर्णय लेने के लिए |अभी तक मिलकर निर्णय लिए जाते थे| सहारे की आदत पड़ चुकी थी |लेकिन जबसे सहारा देनेवाले ने मुँह मोड़ लिया उसे अपना दिमाग ज्यादा खर्च करना पड़ता था | जब कंगाल हो जाती तो बिस्तर पर कटे वृक्ष की भांति जा पड़ती |

आज भी वही हुआ |घर पहुंचते ही वह शयनागार में घुस गई |दूसरे क्या सोचेंगे !चिंता नहीं थी |चिंता थी अपने कल की |

आधी रात तक करवटें बदलती रही |
आँखें मूँदने का प्रयत्न करती मगर उनमें प्रश्न -उत्तर के मध्य छिड़ता महाभारत नजर आता |कब नींद ने आ दबोचा पता नहीं |चिड़ियों की चीं-चीं से वह भोर ही उठ गई | आदत के अनुसार खुली हवा में बरामदे में जा खड़ी हुई|सवेरा तो रोज होता था लेकिन आज का सवेरापन कुछ नया -नया लगा| इस नयेपन में स्नान करते ही सोनल के कदम नई डगर की ओर स्वत : बढ़ने लगे |

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                                                                                                                      धारावाहिक


                                                                                                                 -शैल अग्रवाल

मिट्टी

(भाग एक)

डाली से टूटे पत्ते-सी भटकती दिशा दस वर्ष ब्रिटेन में बिताकर लौटी थी भारत और अब तीन वर्ष में ही सब छोड़-छाड़कर फिर ब्रिटेन वापस... आश्चर्य था दिशा को आंधी-सी परिस्थितियों पर भी और अपनी अक्षमता पर भी !

मां-सा ही कर्ज था धरती का सीने पर।...बड़े-बड़े सपने और उमंग...आँखों में रचने और बसने, फिर उसी मिट्टी में चुपचाप मिटने के बड़े-बड़े इरादे, पर वक्त के तूफान और नसीब ने रुपने नहीं दिया कहीं। माहौल तो कहीं धरती रास नहीं आई उसे । नतीजा कि टूटी या हारी तो नहीं, बदल जरूर गई सोच की एक ही धुरी पर घूमती दिशा ।

वापस उसी ओर तो लौट रही है वह, जिस धरती पर फैली अथाह विलासिता में दम घुटता था उसका। जिससे घबराकर भागी थी कभी वह । रास नहीं आ रही थी उसे ब्रिटेन की शोर और शराब भरी संस्कृति। बच्चों को इस माहौल में बड़ा करके क्या संस्कृति दे पाएगी विरासत में..यही सोच कर लौटी थी भारत। पर भारत भी तो कितना बदल गया था पिछले दस सालों में !

और आज उसी अराजक जीवन शैली को सुधारकर, जीने लायक बनाने, अपनाने का पक्का इरादा लेकर लौटी है वह ब्रिटेन, अपने (गलत) नए भारत को पीछे छोड़कर।

‘ अपना और पराया भी तो मन की ही एक भूल-भुलैया है अबतक भलीभांति जान और सीख चुकी थी दिशा। अपनों का बेगानापन झेल जाना सबके बस की बात भी तो नहीं ! चाहे तो क्या नहीं कर सकता आदमी। फिर चारा भी तो नहीं था कोई और उसके पास...जब पैसे की संस्कृति ही सर्वोपरि संस्कृति है, तो कैसे उसे ही मिट्टी समझने की भूल कर बैठी थी वह?...वैभव की गोद में पली बढ़ी थी, पैसे का अभाव नहीं देखा था, शायद इसलिए- पर वह बचपन के दिन थे, बड़ों की दुनिया में न तो भोलापन है और ना ही वह स्नेह।‘

दिशा के होठ व्यंग्य में खिंचे और फिर तुरंत ही अवसाद और आत्मवंचना के बोझ तले गिर भी गए।

सब कुछ कितना सुचारु चल रहा था... गौरव का कैरियर , बच्चों की पढ़ाई और पैसा...पैसा तो मानो झमाझम बरस रहा था; ‘ पगली थी न ! ‘  कोरों पर छलकी नमी को पोंछते हुए दिशा ने सोचा- और कोई होता तो जी भर-भरकर सोखता, डूब जाता सुख वर्षा में। परन्तु दिशा को तो बस एक ही रट थी-भारत लौटना है।

‘ व्यर्थ ही दुखी हो रही है वह, मान-अपमान और कर्तव्य आदि के इन कांटों के जहर से कौन बच पाया है ! मर्यादा पुरुषोत्तम राम तक नहीं। फिर वही धरती-आसमान ही तो हैं चारो तरफ, मान लो, तो सभी अपने ही हैं, यहाँ भी।‘

नींद से बोझिल आँखों पर हाल ही में खरीदा मंहगा धूप का चश्मा वापस लगा लिया उसने। थकी आँखों को सुख मिल रहा था और पीछे छूटी यादें भी धुंधला-सी गई थीं।

एयर पोर्ट से बाहर आते-आते घुप अंधेरा घिर आया था चारो तरफ। आनन-फानन चश्मे को उतारकर पर्स में रख लिया। घड़ी देखी तो शाम के पांच ही बजे थे, बस। परन्तु अंधेरा मानो रात के दस-बजे जैसा गहरा आया था। दिशा के मुंह से बरबस ही ठंडी सांस निकल गई- ‘यही तो खराबी है यहाँ ! जाड़ों में दिन कितने छोटे होते हैं। ’- पति की तरफ देखते हुए शिकायत-सी की उसने।

‘ छोड़ो यह मौसम और अंधेरे की बातें ’, गौरव ने तुरंत ही मुस्कुराकर उसकी और अपनी निराश होती सोच को संभाल लिया। रास्ते भर रोशनी की वह जगर-मगर देख-देखकर दिशा ने भी खुद को आखिर समझा ही लिया, ’जीवन की एक नई और प्रेरक दिशा है यह। अंधेरे से नहीं , रोशनी से भरी हुई।’

मोटर वे पर कार सरसर दौड़ती चली जा रही थी और कार के अंदर वही पसंदीदा कबीर के दोहे चल रहे थे –जाने कबसे वही कैसेट पड़ा होगा कार में, पर कबीर और जगजीत इससे अच्छा और क्या हो सकता था- दिशा को भी शिकायत नहीं थी।

बच्चे के अगली बार कार में बैठते ही बदला जाएगा यह कैसेट। अभी तो थके सो रहे हैं दोनों । तब लेडी गागा या कुछ और बजेगा, जिसे दिशा बदल देती है तुरंत ही। सगीत की रुचि ही नहीं और भी बहुत कुछ है जिसमें दिशा की सोच पिछड़ती जा रही है। बीटल्स और कारपेंटर तक तो ठीक था, या वह जिसने गाया था एवरी ब्रेथ यू टेक ...और वह आबा वगैरह भी ...ऐसी बात नहीं, कि पश्चिमी संगीत पसंद नहीं, पर कुछ तो अर्थ हो, कहीं ! बारबरा स्ट्राइसन , फ्रैंक सिनाट्रा, बौब माली.... यादों में बेवजह चलती नामों की फहरिश्त को परे धकेलकर दिशा ने वौल्यूम थोड़ा-सा बढ़ा दिया। अब जगजीत की सोजोभरी स्वर लहरियाँ पूरी कार में गूंज रही थीं- माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूँगी तोय...धीरे-धीरे रे मना...धीरे धीरे सब होय ... दोहे थे कि एक-के-बाद-एक मन में उतरे जा रहे थे।

गौरव ने कनखियों से देखा कि वही परिचित संतोषमय स्मित और आभा फैल गई थी दिशा के चेहरे पर  - वह भी तो यही सोच रहा था- बस थोड़ी सी लगन और कुछ मन की नमी ही तो चाहिए इंसान को। इसके साथ गढ़ लो, तो यही मिट्टी इंसान ही नहीं देवी-देवता, पूरा संसार तक रच देती है। फिर वह और दिशा,  वे दोनों खुद भी तो धीरे-धीरे के ही अनुयायी है । दिशा तो पक्का रास आने पर ही कुछ करती है। हड़बड़ी में कुछ भी करना पसंद ही नहीं उसे। और जो पसंद नहीं, बेवसी में भले ही करवा लो, वरना सोच-समझकर ही जिया है जीवन दोनों ने। मन ने इच्छाओं के विस्तृत आकाश को बाँहों में भरने की कोशिश भले ही की हो, पर पैरों के नीचे की मिट्टी से कभी नाता नहीं टूटा उनका।

और यही तो सबसे बड़ी दुविधा व मुसीबत थी ।

ये धरती और आकाश जो खुद आपस तक में नहीं मिल पाते, उन्हें कैसे मिल जाते , वह भी इतनी आसानी से? क्षितिज के सतरंगी भुलावे में छोड़कर अक्सर वक्त आगे बढ़ जाता। मन की उड़ान से यथार्थ का मेल इस दुनिया में तो नहीं ही संभव। एक उत्तर तो दूसरा दक्षिण ही रहेगा-यह भी जान चुके थे वे।

पता नहीं थकान थी या फिर भावों का आवेग गौरव बेहद भावुक हुआ जा रहा था...इतना कि विचारों को शब्दों में पिरोए तो कविता ही बन जाए- आदमी ही नहीं , इस दुनिया की फिदरत् भी तो है यह ‘ मिट्टी’। पास जाओ, माथे से लगाओ तो आँखों में किरके . पैरों से रूंदो तो बिबाइयाँ तक फाड़ डाले। रचने-बसने का यह हुनर कहीं और कभी भी आसान नहीं, देश हो चाहे परदेश ... फिर इंगलैंड की मिट्टी भी तो मिट्टी ही है ...बदलती कैसे !

सारी थकान सपनों की उस भूल-भुलैया में पीछे छूटती जा रही थी। मन कार से भी तेज रफ्तार से भाग रहा था । बातों-बातों में किसी बुजुर्ग ने कहा था –‘ यूँ भटकने से कोई फायदा नहीं। जमीन खरीद लो, बांध लेगी। ठहर जाओगे। मिट्टी बांधती है इन्सान को।‘

बात गहरे तक कहीं छू गई थी। और बसा लिया उन्होंने भी घर...भले ही सात समुन्दर पार, दूर इस देश में ही सही। बारह-तेरह साल से ब्रिटेन और भारत के बीच लगातार भटकती दिशा आखिर अपने घर ही तो लौट रही थी।...

 ***

दूधिया चांदनी में पन्ने-सा जगमगाता तरतीब से कटा हरा लॉन और बीचोबीच में असंख्य फूलों से लदा-फंदा चेरीब्लौजम का खूबसूरत पेड़...खुशियाँ फूलों लदी टहनियों–सी बाहें फैलाए खड़ी थीं स्वागत में। थके शरीर और बल्लियों उछलते मन से थके-उनींदे बच्चों की उंगली पकड़े दिशा ज्यों ही कार से उतरी, संतोष की एक लहर अंदर तक स्फूर्त कर गई ।

बड़े तीन ट्रक भर सामान को मात्र तीन अटैचियों में कैसे सहेजा था भारत छोड़ते वक्त, दिशा का दुखता मन ही जानता था। अपनों के अलावा बहुत कुछ और भी था जो वह पीछे छोड़ आई थी, फिर भी खुश थी आधी-अधूरी दिशा। गौरव की आंखें भी एक अकथ संतोष से दीप्त थीं। कार से उतरते ही दोनों के मन में उमड़ता स्नेह और उत्साह का आवेग एक साथ ही शब्दों में बह आया - ‘वेलकम होम ‘!

दिशा ने भी भरपूर महसूस किया उस सुख और संतोष को। गौरव के चेहरे पर फैली हर्षोल्लसित चांदनी में सब कुछ और अधिक निखर और संवर चुका था। हाथों का हलका कोमल स्पर्श मानो सांत्वना दे रहा था, ‘ अब तुम्हे और नहीं भटकाउँगा दिशा ! ‘

ट्रेनिंग के नाम पर करीब-करीब हर साल बदलती नौकरी के साथ-साथ कई शहर और घर बदले थे उसने और हर घर को उतने ही जोश और उत्साह से अपना बनाती थी दिशा। पर जबतक सजाती-संवारती और रहने लायक बनाती, घर बदलने का वक्त आ जाता और फिर शुरु हो जाती वही पुरानी नई जगह, नए शहर, नए अस्पताल के डाक्टरों के फ्लैट में से एक फ्लैट को अपना बनाने की जी तोड़ मेहनत। नए शहर में नया स्कूल और अपने व बच्चों के लिए नए परिचय व मित्र ढूँढने और बनाने की...खुद को व्यवस्थित करने की एक अंतहीन प्रक्रिया। एक सिलसिला...जिसमें स्वाति की बूंदों सी लम्बी प्रतीक्षा और भटकन के बाद ही चन्द सुख के पल मोती-से रच-बस पाते। एक अंतहीन भागदौड़, बेहद व्यवस्थित और मशीनी जिन्दगी।...सारी सुख-सुविधा के बावजूद मन और आत्मा से जुड़ नहीं पा रही थी वह इस माटी से। चाहत भी तो वक्त मांगती हैं। वक्त जो यादें देता है..सुख-दुख बांटता है। पर, यहाँ पश्चिम में किसी के पास वक्त ही तो नहीं। पल भर में ही माटी हवा पानी परिवेश सबको आत्मसात कर लेने वाली दिशा के लिए पलपल घर बदलना सुखद नहीं था। मन में एक कसक रह जाती । अपने देश , अपने घर , अपनों के बीच रहने की बेचैनी परेशान करती रहती उसे।

पर गई भी तो लौट ही तो आई थकी-हारी और टूटी हुई । ....क्या मिला आखिर ...क्या दे पाई वह किसी को !  जरूरतें कम कीं तो अपेक्षाएं बढ़ गईं और अपेक्षाओं की तरफ मुंह किया तो मन तक कसैला हो गया। कम-से-कम अपनों की व्यवहारिक और सुविधाजनक उपेक्षा, मान-अपमान के दंश और उलाहनों के अवांछित हस्तक्षेप और अंकुश तो नहीं, यहाँ। वह तो बर्दाश्त भी कर जाती पर गौरव का अपमान न सहा गया, वह भी अपनों द्वारा। अब तो यही घर है, और यही देश है उसका अपना देश ... पक्का मन बनाकर ही लौटे हैं दोनों।

भविष्य के लिए बहुत सी योजनाएँ थीं- ऐसे ही तो नहीं बसते घर ...खून..पसीना पूरी जिन्दगी, सब मांग लेते हैं ये। वो भयानक सपना अब भी हर रात ही उसका पीछा करता था जिसमें तीनों बच्चों के साथ उन दोनों की गले से कटी पांच लाशें बिस्तर पर पड़ी दिखाई देती हैं उसे। पसीने में डूबी हांफती-सी उठ बैठती है वह। पूछने पर भी कुछ नहीं बता पाती वह। हर बात तो नहीं बांटी जा सकती, गौरव से भी नहीं !

‘कोरी भावुकता में बच्चों का भविष्य नहीं बिगाड़ा जा सकता ! इस परिस्थिति से उबरना ही होगा।‘

रात के दो बज चुके थे। सिर में उठती आवाजों को चुपचाप दबाकर सो गई दिशा।

बच्चे ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी और कर्तव्य थे अब उसके और जीवन-दिशा भी। मात्र चार दीवारें ही नहीं, कभी-कभी तो प्यार, संस्कार, समझ और लगन के साथ मेहनत व धैर्य की नींव पर भी नहीं टिक पाते  घर-परिवार ! दिशा को अब और भटकन नहीं चाहिए थी। सुदृढ़ संस्कारों पर ही खड़ा करना था उसे अपना घर, ऐसा घर जिसकी दीवारें कोई हिला न सके, न वक्त की आंधी और ना ही आपस का वैमनस्य या स्पर्धा।

सुबह उठते ही, आवश्यक और अनावश्यक कार्यों की एक लम्बी फहरिश्त थी आँखों के आगे और मन की पुलक आकाश छू रही थी। पति काम पर थे और खुद वह बच्चों को स्कूल पहुंचाकर लौटी ही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई। कौन होगा  सुबह-सुबह...सोच तक पाए कि सामने फूलों का गुच्छा और स्वागत का केक लिए, पड़ोसन मुस्कुरा रही थी ।

‘हलो, मेरा नाम बैटी है...बैटी बेट्स और मैं सामने चार नंबर के मकान में रहती हूँ। ज्यादा वक्त नहीं बर्वाद करूंगी तुम्हारा। तुम हमारे मोहल्ले में नई आई हो न, सोचा खुद जाकर स्वागत कर लूँ। हिलमिल लूँ तुमसे। यह केक मैंने खुद आज सुबह ही बनाया है। ‘

‘ ओह..अच्छा ! ...मैं दिशा...दिशा राजन। नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं। आओ, अंदर आओ।‘  

फूलों का गुच्छा और केक मेज पर रखते हुए दिशा ने भी आगन्तुक मेहमान का पुरजोर स्वागत किया। पूरी तरह से अभिभूत थी दिशा इस आकस्मिक स्वागत और नेह-अभिवादन से।

‘ कौफी और टी...? ‘

‘ कौफी प्लीज।‘

बैटी ने भी अबतक खिड़की के पास रखी आरामकुर्सी पर खुदको पूर्णतः व्यवस्थित कर लिया था।

कौफी, बिस्कुट और ड्राई फ्रूट्स लेकर लौटी तो देखा मेहमान चित्रो को बड़े ध्यान से देख रही थी।

‘ तो तुम एक चित्रकार हो डिशा !’

‘...इन अंग्रेजों की भी एक खासियत है ‘देन और देयर ‘ में तो ‘द‘ कह लेंगे पर अगर हिन्दुस्तानी नाम में ‘द‘ आता है तो ‘ड‘ ही बुलाएंगे।‘ अपने लिए ‘डिशा ‘ नाम एक अंग्रेज के मुंह से ‘ डिश‘ की तरह ही इस्तेमाल किया हुआ और झूठन भरा लगा उसे।

‘ डिशा नहीं, दिशा है मेरा नाम ... इट मीन्स डायरेक्शन- राइट डायरेक्शन, इन कौन्टैक्स औफ ए नेम। ‘

तुरंत ही मुस्कुराकर उसे सुधारा दिशा ने।

‘ ओह तो तुम भाषा और शब्दों में भी रुचि रखती हो । वेरी प्रिम एंड प्रौपर टाइप।‘

बैटी जी खोलकर हंस रही थी अब...एक सहज और उन्मुक्त हंसी।

‘मैं एक बूचर की बीबी, फार्मर की बेटी ... हममें यह नफासत और नजाकत नहीं। ना ही हमारे यहाँ नामों को रखते वक्त अर्थों को इतना महत्व दिया जाता है। मेरी बातों, तौर-तरीकों का बुरा मत मानना। वैसे, मन से बुरे नहीं होते हम मिट्टी से जुड़े व्यवहारिक लोग।‘

मन से सौंदर्य और कला की पुजारी दिशा को वह बेडौल और गुलाबी गालों वाली अपनी पड़ोसन जाने क्यों भाषण देती भी अच्छी और आत्मीय लग रही थी।

‘ हाँ-हाँ क्यों नहीं। यह मिट्टी ही तो है जो हमें जनमती और समेटती है फिर बुरे कैसे हो सकते हैं मिट्टी से जुड़े लोग। ‘-दिशा आदतन एक दार्शनिक-सा ही जबाव ही दे पाई उसे, बिना जाने या समझे कि बात की गहराई तक पहुँची भी है या नहीं उसकी पड़ोसन, पर शाम की दावत का निमंत्रण जाते-जाते अवश्य दे गई थी वह उसे।

‘आज हेलोइन नाइट है। कुछ दोस्तों को बुलाया है । तुम भी गौरव के साथ आने की कोशिश करना। अच्छा लगेगा तुम्हें और इसी बहाने कुछ नए स्थानीय लोगों से भी मिल सकोगी। अब मैं ज्यादा नहीं रुकूंगी। कोई जरूरत हो तो बेझिझक आवाज देना सामने ही रहती हूँ। आदमी ही आदमी के काम आता है। ‘

अपना कार्ड पकड़ा दिया था जाते-जाते बैटी ने, जिसपर उसका नाम, पता, टेलिफोन नं. सबकुछ लिखा हुआ था। इतनी आदमियत है इस देश में अभी, दिशा के लिए यह एक सुखद आश्चर्य था।

‘हाँ हाँ क्यों नहीं। आभार, बैटी। याद रखूंगी मैं तुम्हारे शाम के इस आमंत्रण को और यदि सब ठीक रहा तो आऊँगी भी अवश्य।‘ कार्ड को संभाल कर रखते हुए दिशा ने भी खुशी-खुशी जबाव दिया।

माना, गंभीर और अपने में रहने वाली थी दिशा, परन्तु पड़ोसिन की निश्चल और कृतज्ञ आंखों का संदेश उस तक पहुंच चुका था। दिशा ने देखा फूलों के साथ एक खूबसूरत-सा कार्ड भी था जिसपर सुनहरे शब्दों में ‘वेलकम होम‘ लिखा हुआ था। शब्दों के अर्थ बड़े ही उत्साह के साथ स्वागत कर रहे थे उसका। अब वह मुहल्ला थोड़ा-थोड़ा अपना-सा लग रहा था उसे। ललक भरी आँखों ने मोहल्ले से परिचित होना शुरु कर दिया। हर घर एक-सा था और हर घर से ही सम्पन्नता का आभास मिल रहा था। दो-दो कारें और आगे पीछे बगीचे, उच्च मध्यवर्गीय परिवारों का मोहल्ला था वह। पर इंगलैंड के जैसे घरों में उनके मित्र रहते थे , वैसा मोहल्ला नहीं था वह। भारत लौटने की रट में उन सबसे थोड़ा पीछे छूट गई थी दिशा। धीरे-धीरे रे मना...कार में सुने कबीर फिर उसके होठों पर थे।

***

शाम को जब बच्चों से निपटकर, सुरक्षा की सारी हिदायतें और नैनी को घर व बच्चे सौंपकर सामने वाली बैटी के घर पहुंची तो पाया कि घर मेहमानों से भरा हुआ था। बैटी ने देखते ही न सिर्फ बांहें फैलाकर स्वागत किया बल्कि उसी गर्म जोशी से एक-एक मेहमान से मिलवाया भी – ‘ मीट माई फ्रैंड दिशा एंड गौरव , दे हैव जस्ट मूव्ड इन द नेबरहुड इन नंबर सेवन।‘

हंसी-कहकहों के बीच दिशा ने भी अपने लायक जगह ढूँढ ही ली और व्यवस्थित कर लिया खुद को उसी शोर-शराबे के बीच। शराब और दावतों का दौर एकबार फिरसे शुरु हो चुका था जीवन में। पर इसबार भागेगी नहीं इस सभ्यता से। टिकेगी, तैरकर किनारे पर पहुँचना सीखेगी, जैसे कि तूफानों में टिका जाता है। फिर तो पल भर में ही सब पहचाने-से थे। उन्ही की तरह युवा, उत्साही और महत्वाकांक्षी। बीयर और सिगरेट के उड़ते धुंए के बीच उसने देखा कि कुछ ऐसे भी थे जो शराब या सिगरेट नहीं पी रहे थे। उनके हाथों में औरेंज जूस या फिर किसी अन्य सौफ्ट ड्रिंक के ही ग्लास थे।

ऐसा ही एक जोड़ा था पौलीना और एलेन का। शहदी रंग के सुनहरे बाल और हरी महकती आंखें... कुछ ऐसा था दंपति में कि दिशा वहीं बगल में खिंची-सी जाकर बैठ गई। उन्होंने भी थोड़ा खिसककर जगह बना दी उन दोनों के लिए और हाथ मिलाकर अपना परिचय दिया। वेल्स से थे वे। बातों-बातों में पता चला कि पिछले दस साल से वे भी उसी मोहल्ले में अगली सड़क पर ही रहते थे और पति-पत्नी दोनों ही स्थानीय स्कूल में पढ़ाते थे- एलेन गणित और पौलीना इंगलिश। क्वेकर धर्म को मानते थे वे पर  हिन्दू धर्म और हिन्दुस्तान के बारे में भी बहुत कुछ पता था उन्हें , कई बार भारत घूम आए थे। ताजमहल , कुतुबमीनार से लेकर बनारस के घाट तक, सभी घूमे हुए थे उनके। 

फिर तो बातों का जो सिलसिला चला, पता ही नहीं चल पाया उसे।

टौम जोन्स अपनी रौकिंग आवाज में फुल वौल्यूम पर गा रहा था और थिरकते, कहकहे लगाते युगलों के खाली गिलास तुरंत ही भर दिए जाते थे। कुछ तो लगता था आपा भी भूल चुके थे । पैरों के साथ-साथ हाथों और निगाहों ने भी बहकना शुरु कर दिया था। अचानक वह अपरिचित आया और हाथ मिलाने के लिए बढ़े हाथ को बेहद गर्मजोशी से होठों तक ले जाते हुए बोला, ‘ मे आई जौइन यू?’

‘ यस, यस। व्हाइ नोट ! ‘  जवाब देती, सकुचाती दिशा इसके पहले कि दुहरे इरादों को समझे, संभले, खींचकर गोदी में बिठा लिया था उसने दिशा को । अब वह हंस रहा था। ‘ कम औन डार्लिंग, नो नीड टु मेक ए स्पेश फौर मी। यू कैन सिट इन माइ लैप।‘

बेहूदगी असह्य थी। दिशा एक झटके में उठ खड़ी हुई। एलेन ने परे धकेला उसे। ‘लीव हर अलोन।‘

अब वह दिशा को तसल्ली दे रहा था- ‘ ही इज टोटली ड्रंक, इग्नोर हिम।‘

‘ नो आइ एम नौट।‘ जाते-जाते दिशा की तरफ आँख मारी उसने। अभी भी शैतान उसके सिर पर सवार था।

‘आइ औलवेज वान्टेड ए डौक्स वाइफ टु सिट इन माइ लैप। देन शी इज सच ए प्रिटी एक्जौटिक यंग बर्ड।‘

दिशा के कान तक लाल हो उठे थे अपमान से। वहाँ रुक पाना अब संभव नहीं था। इतने में गौरव भी वापस आ पहुंचे।

‘ क्या हुआ दिशा, विचलित क्यों हो ?’

‘ कुछ नहीं।‘  इतना ही कह पाई दिशा- ‘ अब हमें चलना चाहिए।‘

खींचती-सी दिशा बाहर आई तो एलेन और पौलीना भी साथ थे।

‘ बुरा मत मानना। यह सब नौर्मल है यहाँ पार्टियों में। वह बस भूल गया था कि तुम भारतीय हो और पाश्चात्य इन तौर-तरीकों से परिचित नहीं हो, या पसंद नहीं करतीं। ’ 

 ..दिशा की समझ में नहीं आया कि क्या जबाव दे, झुकी नजरों से कहा, ‘ समझ रही हूँ मैं। आदत डालने की कोशिश करूंगी, इन बेहूदगियों को सहने की भी और इनसे निपटने की भी। सी यू अगेन सम टाइम ‘ कहते हुए एक गुमसुम-सी विदा ली उसने कार में बैठे ऐलेन और पौलीना से और बिजली की तेजी से अपने घर की ओर मुड़ गई ..

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                                                                                                                    दो लघुकथाएँ


                                                                                                                     -सुभाष नीरव





इन्सानियत का धर्म

उनका सिंहासन खतरे में था। उसकी रक्षा तो उन्हें करनी ही थी। हर हाल में, हर कीमत पर। वे जानते थे कि लोग धर्म के नाम पर जान की बाजी लगा देने को हर समय तैयार रहते हैं। बस, उनका एक ही इशारा काफ़ी है। और उन्होंने सिंहासन बचाने के लिए यही किया भी।


काली रात के सन्नाटे में विधर्मियों का सफाया कर अगली सुबह लोग उनकी और उनके सिंहासन की जय-जयकार कर रहे थे। तभी, किसी ने उनके कान में फुसफुसाकर कुछ कहा। सुनते ही उनके चेहरे का रंग बदल गया। वे दल-बल समेत अस्पताल की ओर भागे। विधर्मियों के एक दल ने उनके बेटे पर जानलेवा हमला किया था। उनकी भृकुटियाँ तन गईं। वे क्रोध में कांपने लगे। इस हमले का जवाब देने के बारे में सोचने लगे। तभी, अस्पतालवालों से उन्हें मालूम हुआ कि उनके बेटे को ज़ख्मी हालत में अस्पताल पहुँचाने वाला और अपना खून देकर उसकी जान बचाने वाला, दोनों ही विधर्मी थे!
















अपने घर जाओ न अंकल !

शहर में कर्फ्यू लगा था। लोग अपने-अपने घरों में दुबके बैठे थे। गलियाँ और सड़कें सुनसान पड़ी थीं। तभी, नौ-दस बरस के दो बच्चे न जाने कब अपने घरवालों से आँख बचाकर घर से बाहर निकलकर सड़क पर खेलने लगे। दूर तक खाली पड़ी सुनसान सड़क पर खेलने में उन्हें मजा आ रहा था। रिक्शा, सायकिल, स्कूटर, मोटर कार आदि का कोई भय नहीं था।

तभी, गश्त कर रहे सिपाही ने उन्हें देखा और डांटते हुए बोला-

''ऐ बच्चो ! भागो यहाँ से... जाओ अपने घरों में...''

बच्चे अपना खेल रोक कर खड़े हो गए और सिपाही की ओर फटी आँखों से देखने लगे। हिम्मत कर उनमें से एक बच्चा बोला- ''सड़क तो खाली पड़ी है, हमें खेलने दो न, अंकल ?''

''नहीं, सड़क पर नहीं खेल सकते तुम। तुम्हें मालूम नहीं, शहर में कर्फ्यू लगा है ?''

''वो क्या होता है, अंकल ?'' कमर पर हाथ रखे सहमे-से खड़े दूसरे बच्चे ने पूछा।

''कर्फ्यू में घर से बाहर निकलने वाले को बन्दूक की गोली मार दी जाती है, समझे।''

गोली के नाम पर दोनों बच्चे सहम गए। एकाएक उनमें से एक अपने चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों पर टिकाकर आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए बेहद मासूमियत से बोला, ''तुम भी तो घर से बाहर सड़क पर घूम रहे हो।...तुम्हें भी तो कोई गोली मार सकता है... तुम भी अपने घर जाओ न अंकल !''

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                                                                                                                           रुबरु


                                                                                                                    -विजेन्द्र शर्मा


ग़ज़ल इस्मत बचाए फिर रही है....... कई शाइर है बेचारी के पीछे ....

इसमें कोई शक़ नहीं कि अदब की जितनी भी विधाएं हैं उनमे सबसे मक़बूल ( प्रसिद्ध ) कोई विधा है तो वो है ग़ज़ल ! दो मिसरों में पूरी सदी की दास्तान बयान करने की सिफ़त ख़ुदा ने सिर्फ़ और सिर्फ़ ग़ज़ल को अता की है ! यही वज्ह है कि जिसे देखो वही ग़ज़ल पे अपने हुनर की आज़माइश कर रहा है ! ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल कहने के लिए शाइर को उर्दू रस्मुल-ख़त (लिपि) आना ज़रूरी है मगर ग़ज़ल से सम्बंधित जो बुनियादी बातें है वे तो ग़ज़ल कहने वाले को पता होनी चाहिए ! ऐसे बहुत से शाइर है जो उर्दू रस्मुल-ख़त नहीं जानते पर उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें कही हैं और उनके क़लाम की उर्दू वालों ने भी पज़ीराई की है ! यहाँ एक बात ये भी कहना चाहूँगा कि अगर किसी ने ठान लिया है कि मैंने ग़ज़ल कहनी है तो उसे उर्दू रस्मुल-ख़त ज़रूर सीखना चाहिए क्यूंकि ग़ज़ल से मुतालिक बहुत सी ऐसी नाज़ुक चीज़ें हैं जिनके भीतर तक बिना उर्दू को जाने पहुंचना बड़ा दुश्वारतरीन है !

शाइरी ज़िंदगी जीने का एक सलीक़ा है और शे’र कहने की पहली शर्त है शाइर की तबीयत शाइराना होना ! कुछ ग़ज़लकार अदब के नक़्शे पे अपने होने का ज़बरदस्ती अहसास करवाना चाहते है उनकी ना तो तबीयत शाइराना है ना ही उनके मिज़ाज की सूरत किसी भी ज़ाविये (कोण) से  ग़ज़ल से मिलती है !

शाइरी की ज़ुबान में शे’र लिखे नहीं कहे जाते हैं ! इस तरह के नकली शाइरों की ज़बराना लिखी ग़ज़लें नए लोगों को ग़ज़ल से दूर कर रही है ! इन दिनों अदब के हर हलके में चाटुकारों की तादाद बढती जा रही है और ठीक उसी अनुपात में नए–नए ग़ज़लकार भी!

शकील जमाली की ताज़ा  ग़ज़ल का एक शे’र मुझे बरबस याद आ रहा है .. इस शे’र को सुनने के बाद ही ये मज़मून लिखने का मन हुआ :--

ग़ज़ल इस्मत बचाए फिर रही है

कई शाइर है बेचारी के पीछे ....

ग़ज़ल का अपना एक अरूज़ (व्याकरण/छंद-शास्त्र  ) होता है ! अरूज़ वो कसौटी है जिस पे ग़ज़ल परखी जाती है ! यहाँ मेरा मक़सद ग़ज़ल का अरूज़ सिखाना नहीं है मगर कुछ बुनियादी चीज़ें है जो ये तथाकथित सुख़नवर ना तो जानते हैं और ना ही जानना चाहतें हैं ! अल्लाह करे ये छोटी–छोटी बाते तो कम से कम शाइरी के साथ खिलवाड़ करने वालों के ज़हन में आ जाए !

ग़ज़ल के पैकर (स्वरुप) को देखें तो ग़ज़ल और नज़्म (कविता ) में बड़ा फर्क ये है कि ग़ज़ल का हर शे’र अपना अलग मफ़हूम (अर्थ) रखता है जबकि कविता शुरू से लेकर हर्फ़े आख़िर (अंतिम शब्द )  तक एक उन्वान (शीर्षक ) के इर्द-गिर्द ही रहती है !

ग़ज़ल कुछ शे’रों के समूह से बनती है ! “शे’र” लफ़्ज़ का मतलब है जानना  या किसी शै (चीज़ ) से वाकिफ़ होना ! एक शे’र में दो पंक्तियाँ होती हैं ! एक पंक्ति को मिसरा कहते है और  दो मिसरे मिलकर एक शे’र की तामीर (निर्माण )  करते हैं ! किसी शे’र के पहले मिसरे को “मिसरा ए उला” और दूसरे मिसरे को “मिसरा ए सानी” कहते हैं !किसी भी शे’र के दोनों मिसरों में रब्त (सम्बन्ध ) होना बहुत ज़रूरी है इसके बिना शे’र खारिज माना जाता है !

बहर  वो तराज़ू है जिसपे ग़ज़ल का वज़न तौला जाता है इसे वज़न भी कहते हैं ! बहर में शे’र कहना उतना आसान नहीं है जितना आजकल के कुछ फोटोस्टेट  शाइर समझते हैं ! मोटे तौर पे उन्नीस बहरें प्रचलन में हैं ! बहर को कुछ लोग मीटर भी कहते है ! जो शाइर बहर में शे’र नहीं कहते उन्हें बे-बहरा शाइर कहा जाता है और हमारे अहद का अलमिया (विडंबना ) ये है कि रोज़ ब रोज़ ऐसे शाइर बढ़ते जा रहें हैं ! बहर को समझना एक दिन का काम नहीं है और ना ही सिर्फ़ किताबें पढ़कर बहर की पटरी पे शाइरी की रेल चलाई जा सकती है ! बहर का मुआमला या तो शाइरी के प्रति जुनून से समझ में आता है या फिर बहर की समझ  कुछ शाइरों को ख़ुदा ने बतौर तोहफ़ा अता की है !

रदीफ़ :--शाइरी में हुस्न और ख़यालात में फैलाव के लिए ग़ज़ल में रदीफ़ रखा जाता है ! ग़ज़ल को लय में सजाने में रदीफ़ का अहम् रोल होता है ! मिसाल के तौर पे  मलिकज़ादा “जावेद” साहब का ये मतला और शे’र देखें :--

मुझे सच्चाई की आदत बहुत है !

मगर इस राह में दिक्कत बहुत है !!

किसी फूटपाथ से मुझको ख़रीदो !

मेरी शो रूम में क़ीमत बहुत है !!

इस ग़ज़ल में “बहुत है” रदीफ़ है जो बाद में ग़ज़ल के हर शे’र के दूसरे मिसरे यानी मिसरा ए सानी में बार – बार आता है

क़ाफ़िया :-- क़ाफ़िया ग़ज़ल का मत्वपूर्ण हिस्सा है बिना क़ाफ़िए के ग़ज़ल मुकम्मल नहीं हो सकती ! शे’र कहने से पहले शाइर के ज़हन में ख़याल आता है और  फिर वो उसे शाइरी बनाने के लिए  रदीफ़,क़ाफ़िए तलाश करता है ! क़ाफ़िए का इंतेखाब (चुनाव )शाइर को बड़ा सोच–समझ कर करना चाहिए ! ग़लत क़ाफ़िए का इस्तेमाल शाइर की मखौल उड़वा देता हैं ! राहत इन्दौरी का ये मतला और  शे’र देखें :--

अपने अहसास को पतवार भी कर सकता है !

हौसला हो तो नदी पार भी कर सकता है !!

जागते रहिये,  की  आवाज़ लगाने वाला !

लूटने वाले को होशियार भी कर सकता है !!

इसमें पतवार,पार,होशियार क़ाफ़िए हैं और “ भी कर सकता है”

रदीफ़ है !जिस शे’र में दोनों मिसरों में क़ाफ़िया आता हो उसे मतला कहते हैं ! किसी ग़ज़ल की आगे की राह मतला ही तय करता है ! मतले में शाइर जो क़ाफ़िए बाँध देता है  फिर उसी के अनुसार उसे आगे के शे’रों में क़ाफ़िए रखने पड़ते हैं ! जैसे किसी शाइर ने मतले में किनारों , बहारों का क़ाफ़िया बांधा है तो वह शाइर पाबन्द हो गया है कि आगे के शे’रों में आरों का ही क़ाफ़िया लगाए ना कि ओ का क़ाफ़िया  जैसे पहाड़ों , ख़यालों का क़ाफ़िया ! हिंदी ग़ज़ल के बड़े शाइर  दुष्यंत कुमार ने भी अपनी ग़ज़लात में ग़लत क़ाफ़िए बांधे और तनक़ीद कारों को बोलने का मौका दिया ! दुष्यंत कुमार की एक बड़ी मशहूर ग़ज़ल है :----

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए !

कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए !!

वे मुतमईन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता !

मैं बेक़रार हूँ आवाज़  में  असर  के लिए !!

इस ग़ज़ल के मतले में “घर” के साथ “शहर” का क़ाफ़िया जायज़ नहीं है ,दुष्यंत साहब जैसे शाइर ने फिर अगले शे’र में “असर” का क़ाफ़िया लगाया उसके बाद इसी ग़ज़ल में उन्होंने “नज़र” ,”बहर” ,”गुलमोहर” और “सफ़र” के क़ाफ़िए बांधे ! इस पूरी ग़ज़ल में शहर और बहर के क़ाफ़िए का इस्तेमाल दोषपूर्ण है ! दुष्यंत कुमार की इसके लिए बड़ी आलोचना भी हुई !

ग़लत क़ाफ़िए को शे’र में बरतना शाइर की मुआफ नहीं करने वाली ग़लती है ! ये सब बातें यूँ ही नहीं आती हैं इसके लिए अच्छा मुताला (अध्ययन) होना ज़रूरी है मगर लोगों को पढ़ने का तो वक़्त ही नहीं है बस क़लम और काग़ज़ पर कहर बरपा के सिर्फ़ छपने का शौक़ है ! स्वयंभू ग़ज़लकारों के अख़बारात और रिसालों में छपने की  इस हवस ने सबसे ज़ियादा नुक़सान शाइरी का किया है !

वापिस ग़ज़ल  पे आता हूँ .. शाइर अपने जिस उपनाम से जाना जाता है उसे ”तख़ल्लुस” कहते हैं और अपने तख़ल्लुस का जिस शे’र में शाइर इस्तेमाल करता  है वो शे’र  “मक़ता” कहलाता है !

मासूम परिंदों को आता ही नहीं “निकहत” !

आगाज़ से घबराना ,अंजाम से डर जाना !!

ये मक़ता डॉ.नसीम “निकहत” साहिबा का है, शाइरा ने इस शे’र में अपने तख़ल्लुस का इस्तेमाल किया है सो ये मक़ता हुआ !

ग़ज़ल से त-अल्लुक़  रखने वाली  जिन बातों का मैंने ज़िक्र किया, अपने ख़यालात को ग़ज़ल बनाने के लिए सिर्फ इतना जान लेना ही काफ़ी नहीं है ! ग़ज़ल कहने के लायक बनने  के लिए और भी बहुत से क़ायदे-क़ानून /ऐब - हुनर हैं जिन्हें एक शाइर को सीखना चाहिए !

शाइरी में कुछ ऐब है जिन्हें  शुरू – शुरू में हर शाइर नज़रंदाज़ करता है !ये ऐब अच्छे –भले शे’र और शाइर  को तनक़ीद वालों (आलोचकों ) के कटघरे में खड़ा कर देतें हैं !

शतुरगुरबा ऐब ..शतुर माने ऊंट और गुरबा माने बिल्ली यानी ऊंट –बिल्ली को एक साथ ले आना इस ऐब को जन्म देता है! ग़फ़लत में शाइर ये ग़लती कर जाता है ! जैसे पहले मिसरे में “आप” का इस्तेमाल हो और दूसरे में “तुम” का प्रयोग करे या यूँ कहें कि संबोधन में समानता ना हो तो शतुरगुरबा ऐब हो जाता है !

ग़ज़ल में कभी “ना” लफ़्ज़ का इस्तेमाल नहीं होता इसकी जगह सिर्फ़ “न” का ही प्रयोग किया जाता है ,”ना” का इस्तेमाल सिर्फ़ उस जगह किया जाता है जहां “ना“हाँ की सूरत में हो जैसे भाई पवन दीक्षित का ये शे’र :-

पारसाई न काम आई ना !

और कर ले शराब से तौबा !!

ज़म :-- कई बार शाइर ऐसा मिसरा लगा देते है जिसका अर्थ बहुत बेहूदा निकलता है ,या शाइर से  ऐसे लफ़्ज़ का अनजाने में इस्तेमाल हो जाता है  जिसके  मआनी फिर शाइरी की तहज़ीब से  मेल नहीं खाते ! ज़म के ऐब से शाइर को बचना चाहिए !

कई बार शाइर बहर के चक्कर में अब, ये, तो,भी,वो आदि लफ़्ज़ बिना वज्ह शे’र में डाल देता है जबकि कहन में उस लफ़्ज़ की कोई ज़रूरत नहीं होती ! शाइर को भर्ती के लफ़्ज़ों के इस्तेमाल से भी बचना चाहिए ! जहां तक शाइरी में ऐब का सवाल है और भी बहुत से ऐब है जिन्हें एक शाइर अध्ययन और मश्क़ कर- कर के अपने कहन से दूर कर सकता है !

शाइरी में ऐब इतने ढूंढें जा सकते है कि जिनकी गिनती करना मुश्किल है मगर जहां तक हुनर का सवाल है वो सिर्फ़ एक ही है और वो है “बात कहने का सलीक़ा” ! अपने ख़याल को काग़ज़ पे सलीक़े से उतारना आ जाए तो समझो उस शाइर को शाइरी का सबसे बड़ा हुनर आ गया है ! एक सलीक़ामंद शाइर बेजान मफ़हूम और गिरे पड़े लफ़्ज़ों को भी अपने इसी हुनर से ख़ूबसूरत शे’र में तब्दील कर सकता है ! ज़ोया साहब के ये मिसरे मेरी इस बात की पुरज़ोर वकालत कर सकते हैं :-

कट रही है ज़िंदगी रोते हुए !

और वो भी आपके होते हुए !!

इसी तरह शमीम बीकानेरी साहब का एक मतला और शे’र बतौर मिसाल अपनी बात को और पुख्ता करने के लिए पेश करता हूँ :--

रातों  के  सूनेपन  से  घबरायें क्या !

ख़्वाब आँखों से पूछते हैं, हम आयें क्या !!

बेवा का सा हुस्न है दुनिया का यारों !मांग इसकी सिन्दूर से हम भर जायें क्या !! 

मामूली से नज़र आने वाले लफ़्ज़ों को इस तरह के मेयारी  शे’रों की माला में मोती सा पिरो देने का कमाल एक दिन में नहीं आता इसके लिए बहुत तपस्या करनी पड़ती है,शाइरी की इबादत करनी पड़ती है और अपने बुज़ुर्गों के पाँव दबाने पड़ते हैं ! मुनव्वर राना ने यूँ ही थोड़ी कहा है :-

ख़ुद से चलकर नहीं ये तर्ज़े-सुख़न आया है !

पाँव दाबे हैं बुज़ुर्गों के तो फ़न आया है !!

ग़ज़ल कहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है आपके पास एक ख़ूबसूरत ख़याल का होना ! उसके बाद उस ख़याल को मिसरों में ढालने के लिए उसी मेयार के लफ़्ज़ भी होंने चाहिए ! लफ़्ज़ अकेले शाइरी में नहीं ढल सकते इसके लिए एक शाइर के पास अहसासात की दौलत होना बहुत ज़रूरी है !एक शाइर के पास अल्फ़ाज़ का ख़ज़ाना भी  इतना समृद्ध होना चाहिए कि उसके ज़हन में अगर कोई ख़याल आये तो उसे लफ़्ज़ों के अकाल के चलते मायूस ना लौटना पड़े !

ग़ज़ल का एक-एक शे’र शाइर से मश्क़ (मेहनत) माँगता है ! किसी शाइर का सिर्फ़ एक मिसरा सुनकर इस बात को बा-आसानी कहा जा सकता है कि इन साहब को शे’र कहने की सलाहियत है या नहीं !

एक और अहम् चीज़ शाइरी को संवारती है वो है इस्ल्लाह (सलाह-मशविरा ) ! कुछ ऐसे ग़ज़लकार हैं जो अपनी तख़लीक़ को ही सब कुछ समझते हैं ! किसी जानकार से सलाह लेना उन्हें अपनी अना के क़द को छोटा करने जैसा लगता है !  शाइरी में इन दिनों उस्ताद–शागिर्द की रिवायत का कम हो जाना भी शाइरी के मेयार के गिरने की एक बड़ी वज्ह है !

जिस शाइर में आईना देखने का हौसला है ,अपने क़लाम पे  हुई सच्ची तनक़ीद (समीक्षा ) को सुनने का मादा है तो उस शाइर का मुस्तक़बिल यक़ीनन सुनहरा है ! जो तथाकथित शाइर बिना मशकक़त किये बस छपने के फितूर में क़लम घिसे जा रहे हैं वे ग़ज़ल और पाठकों के साथ – साथ ख़ुद को भी धोखा दे रहें हैं !

छपास के शौक़ीनों ने ग़ज़लों के साथ–साथ दोहों पर भी कोई कम ज़ुल्म नहीं ढायें हैं ! दोहे का अरूज़ भी ग़ज़ल जैसा ही है ,ग़ज़ल उन्नीस बहरों में कही जाती है दोहे की बस एक ही बहर होती है ! सरगम सरगम सारगम,सरगम सरगम सार!

 ग़ज़ल कहने के लिए कम से कम आठ – दस क़ाफ़िए आपके ज़हन में होने चाहियें मगर दोहे में तो सिर्फ़ दो ही क़ाफ़ियों की ज़रूरत होती है तो भी अपने आप को मंझा हुआ दोहाकार कहने वाले ऐसे –ऐसे दोहे लिख रहें है जिनके बरते हुए क़ाफ़िए आपस में ही झगड़ते रहते हैं ! ऐसे दोहों से त्रस्त होकर मैंने एक दोहा लिखा था :---

दोहे में दो क़ाफ़िए , दोनों ही बे-मेल !

ना आवे जो खेलना ,क्यूँ खेलो वो खेल !!

ग़ज़ल के शे’र और दोहे छंद की मर्यादा में कहे जाते है! बिना बहर और छंद के इल्म के इन दोनों विधाओं पे हाथ आज़माना सिर्फ़ अपनी हंसी उड़वाना है ! ग़ज़ल के सर से दुपट्टा उतारने वाले ये क्यूँ नहीं समझते कि पाठक इतने बेवकूफ़ नहीं है जितना वे समझते हैं ! एक अलमिया ये भी है कि बहुत से जानकार लोग सब कुछ जानते हुए भी इनकी ग़ज़लों की तारीफ़ कर देते हैं जिससे इन नक़ली सुख़नवरों का हौसला और बढ़ जाता है ! अपने ज़ाती मरासिम (सम्बन्ध) बनाए रखने के लिए कुछ मोतबर शाइर भी ग़ज़ल के श्रंगार से छेड़- छाड़ करने वालों की शान में जब कसीदे पढ़ते है तो ऐसे अदीब (साहित्यकार) भी मुझे  ग़ज़ल के दुश्मन नज़र आते है !

मैं जानता हूँ ये मज़मून बहुत से लोगों के सीने पे सांप की तरह रेंगेगा मगर ये कड़वी बातें मैंने शाइरी के हित में ही लिखी हैं ! ग़ज़ल से बे-इन्तेहा मुहब्बत ने मुझे ये सब लिखने की हिम्मत दी है ! मैं जानता हूँ ज़ाती तौर पे मुझे इसका नुक़सान भी होगा , कुछ अदब के मुहाफ़िज़ नाराज़ भी हो जायेंगे खैर ये सच बोलने के इनआम हैं ! जब पहली मरतबा ये पुरस्कार मुझे मिला तो ये पंक्तियाँ  ख़ुद ब ख़ुद हो गयी थी  :--

इक सच बोला और फिर , देखा ऐसा हाल !

कुछ ने नज़रें फेर लीं , कुछ की आँखें लाल !!

ग़ज़ल का ये बड़प्पन है कि वो उनको भी अपना समझ लेती है जो उसके साथ चलने की तो छोडिये साथ खड़े होने के भी क़ाबिल नहीं हैं ! अपने आपको शाइर समझने वाले ग़ज़ल के ख़िदमतगारों से मेरी गुज़ारिश है कि ग़ज़ल कहने से पहले इसे कहने का हक़ रखने के लायक बने ! ग़ज़ल कहने से पहले उसके तमाम पेचो-ख़म के बारे में जाने ! शाइरों का काम आबरू ए ग़ज़ल की हिफ़ाज़त करना है ना कि ग़ज़ल को बे-लिबास करना ! केवल तुक मिलाने से सुख़नवर होने का सुख नहीं मिलता  जहां तक तुकबंदी का सवाल है तुकबंदी तो लखनऊ ,दिल्ली और लाहौर के तांगे वाले भी इन शाइरों से अच्छी कर लेते है ! ग़ज़ल से बिना मुहब्बत किये उसकी मांग भरने की ख़्वाहिश रखने वाले इन अदीबों से एक और इसरार (निवेदन) कि छपने और झूठी शुहरत के चस्के में ऐसा कुछ ना लिखें  जिससे जन्नत में आराम फरमा रही  मीर ओ ग़ालिब की रूहों का चैन और सुकून छीन जाए और यहाँ ज़मीन पे ग़ज़ल का दामन उनके आंसुओं  से तर हो जाए !

परवरदिगार से ग़ज़ल के हक़ में यही दुआ करता हूँ  कि ख़ुद को शाइर समझने का वहम पालने वाले ग़ज़ल को बेवा ना समझें ,ग़ज़ल कहने से पहले उसे कहने की सलाहियत, अपने जुनून, अपनी मेहनत, अपनी साधना से हासिल करें ताकि ग़ज़ल भी अदब के बाज़ार में इठलाती हुई चल सके और ख़ाकसार को अपने दिल पे ग़ज़ल की पीड़ा का टनों बोझ लेकर किसी शाइर को जो तथाकथित ग़ज़लकार कहना पड़ता है वो फिर से ना कहना पड़े ! आख़िर में तश्ना कानपुरी के इसी मतले के साथ इजाज़त चाहता हूँ ...

एक भी  शे’र अगर हो जाए !

अपने होने की ख़बर हो जाए !!

आमीन..!

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                                                                                                                      संस्मरण 

 

                                                                                                                   - पद्मा मिश्रा


                                  सागर तट पर ----

मानव मन यायावरी है ..धरती के सुन्दर रूपों को देखने -आत्मसात करने की तीव्र इच्छा उसे यात्राओं के लिए प्रेरित करती है इस बार मेरे परिवार ने जगन्नाथ पुरी जाने का कार्यक्रम बनाया ,वहां टाटा स्टील  बनाये गए होली डे होम्स --गार्डन रिसोर्ट ''में हमने दो कमरे बुक करवाए ,टिकट लिया और अपने गन्तव्य की ओर पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से निकल पड़े ...रात भर का सफर था -सुबह सूरज की किरणों ने ऐतिहासिक नगरी पुरी में हमारा स्वागत किया --ऑटो से गार्डन रिसोर्ट पहुंचे जहा प्रबंधक दास जी ने हमारी अगवानी की -अपने कमरों मेंस्नान कर हम  तैयार हो ही रहे थे कि चाय आ गई ..चाय ने हमारी यात्रा की सारी थकन मिटा दी -हमारे पास समय ही ..समय था और --.समुन्द्र का गहरा आकर्षण था मन में अतः सबसे पहले निकटवर्ती सागर तट पर जाने की योजना बनी -पैदल ही चलते हुए हमने जैसे ही बालुकामय धरती को छुआ -मन रोमांच से भर गया ..सामने ही अहंकार से भरा हुआ सागर गर्जना करता हुआ दिखाई दिया --जब उसकी लहरें पुरी के पावन तट को स्पर्श करतीं थीं तो लगा जैसे ईश प्रभाव से नतमस्तक हो ,पराजित होकर वापस  लौट जा रही थीं ...लहरों का बार बार तट से टकराना ..शांत हो जाना और पुनः चलायमान हो उत्तुंग ऊंचाइयों को छू  लेना ..शंकराचार्य के कथन की याद दिला रहा था ---''पुनरपि जनमं .पुनरपि  मरणं ...''--आज इस तट पर बैठे बैठे मन हर्ष -उल्लास और आध्यात्म की त्रिवेणी में गोते खा रहा है --मानो विशाल सागर एक हृदय की तरह है -जो अपने आगोश में पूरे संसार को भी समाहित कर लेने की क्षमता रखता है ..तभी एक चंचल लहर आकर मेरे पांवो को भिंगो गई ..जिसकी कुछ बूँदें सिर पर पड़ीं -मन तृप्त हो उठा ..जैसे भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद मिला हो ...आस पास कुछ मल्लाहों -मछुआरों के बच्चे लहरों से  खेल रहे थे ...छोटे छोटे सीप -शंख पकड़ कर वे हमें दिखाते और खरीदने का भी  आग्रह कर रहे थे ....उत्तुंग लहरों पर अठखेलियाँ हुए सागर के बेटे बहुत दूर निकल गए हैं,-हवा तेजी से बहरही है   -- तन मन को झकझोरती हुई ...शीतलता अंतर्मन को छू रही है ..दिन में जो सूरज आग बरसा रहा था - अब शांत  हो समुन्दर के विशाल आगोश में समां रहा है .. मै अपने परिवार के सदस्यों के साथ सागर तट पर घंटो बैठी रही ,-खूब तस्वीरें खींची ,लहरों को छू करजीवन  के क्रमवत  परिवर्तन को  महसूस  किया  मैंने  -- ....आज पुरी के पावन तट  बैठे हुए भगवान  जगन्नाथ के भक्ति भाव व् उपासना का बोध भी जाग रहा है ,-- मानो जीवन के सागर तट पर  को मन की आस्था और विश्वासों को नमन -समर्पण करता मन -विनत है ---उस विशाल पारावार के सम्मुख --जैसे सागर की विशालता और महाप्रभु की भक्तिमयता ,एकाकार हो गई है .अभी अभी हाथों में तरह तरह के मोतियों की मालाएं लिए एक युवक गुजर गया ..मैंने उसे बुलाया नहीं फिर भी वह वापस लौटा -पूछा --''माला  लेंगी मैडम ?..मेरे न कहने की प्रतीक्षा किये बिना --''ये मोती देखिये !..चार सौ लगा दूंगा  ''..मुझे हंसी आ गई ,सागर से निकले सच्चे मोतियों की कीमत सिर्फ चार सौ कैसे ?''...वह चला गया --अँधेरा हो गया था ..लहरें अब उग्र होती जा रही थीं भयावह अँधेरे में सफ़ेद लहरों का क्रम भयभीत भी करता है और रोमांच भी पैदा करता है ..अंततः हम वहां से उठे और धीरे धीरे पैदल चलते हुए गार्डन रिसोर्ट आ पहुंचे ,आठ बजे खाना खा कर ..बातें करते हमें गहरी नींद आ गई ....
दूसरे दिन सुबह एक सुकून भरी शांति महसूस हो रही थी ,हम सब स्फूर्ति व् उत्साह से भरे हुए ...जल्दी जल्दी तैयार होने में व्यस्त हो गये थे ,टाटा स्टील के गार्डन रिसोर्ट की यह पहली सुबह बहुत सुहावनी थी --चाय हमारे कमरे में ही आ गई थी ,.....फिर हम एक आध्यात्म भाव .-भावनाओं और भक्ति से भरे भगवान जगन्नाथ के दर्शनों की यात्रा पर चल पड़े ,-चौक पर पहुँचते ही एक युवा पांडा जी हमारे साथ हो लिए ,अनचाहे ही उनसे बात करनी पड़ी ..फिर वे हमें अच्छी तरह दर्शन  करवा देने के लिए राजी हुए ,प्रसाद आदि सारी व्यवस्था सम्पन्न होने तक वे हमारे साथ रहे मन्दिर में प्रवेश से पूर्व हमे अपनी चप्पलें ,मोबाईल ,कैमरा आदि वस्तुएं जमा कर देनी पड़ीं जिसका शुल्क भी दिया गया ---द्वार पर ही भगवान जगन्नाथ बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह विद्यमान थे जनके बारे में पंडा जी ने बताया --''ये मुसलमानों के दर्शनार्थ राखी गई हैं -यहाँ सिर्फ हिन्दू ही प्रवेश कर सकते हैं ''---हम अनेक सोपानो को पार कर मुख्य द्वार से अंदर गए ...धुप ..दीप -आरती व् प्रार्थना के मन्त्रों से पूरा मन्दिर परिसर गुंजायमान था ..घी और धुप की सुगंध सर्वत्र व्याप्त हो रही थी मंदिर की प्राचीन दीवारों पर वास्तु कला ,एवं प्राचीन वैभव का अनूठा सौन्दर्य मोहित कर रहा था ..सामने स्थित रत्न सिंहासन पर जगन्नाथ महाप्रभु ,बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ विराजमान थीं ..साथ ही सुदर्शन चक्र भी ..नीचे महा लक्ष्मीऔर सरस्वती की मूर्तियाँ थीं ..भगवान के मस्तक पर हीरे की चमक दूर से ही आकर्षित कर रही थी मन्दिर के भीतरी अंतर्कक्ष में यद्यपि
अँधेरा  था  परन्तु जलते हुए सैकड़ों दीपों और आरती की ज्योति से प्रकाश जगमगा रहा था .लोबान और अगरु की गंध पुरे वातावरण को भावमय बनाती हुई --रहस्यमयता की सृष्टि कर रही थी , -मेरी  बेटी ऋचा यहाँ पहली बार आई थी, हम सब मंत्र मुग्ध थे ...मन्दिर परिसर में भगवान शिव ,हनुमान ,पार्वती ,लक्ष्मी ,सरस्वती आदि अनेक देवी देवताओं के मन्दिर थे जिनमे दर्शन हेतु जाने पर उनमे बैठे हुए पुजारियों की चतुराई की मै तो कायल हो गई हमने जैसे भगवान के सामने सिर झुकाया --तुरंत कुछ फूल -प्सिंदूर ,चूड़ी आदि थमाकर दक्षिणा और मुल्य की मांग करने लगते थे ,---थोडा बुरा जरुर लगा अब ये अनचाहे कैसी दक्षिणा ?पर वही नारी सुलभ भावुकता --कि सुहाग के सिंदूर और चूड़ियों पर क्या बहस ?उन्हें पैसे दे दिए ..पर बाकी के मन्दिरों में  हमने बाहर से ही नमन किया -मन्दिर की प्रदक्षिणा करते समय मन बार बार पुकार उठता था --''जगन्नाथ स्वामी -नयन पथ गामी -भवतु में ''...हमारी परिक्रमा पूरी हुई -सामने एक उड़िया भक्तों का समूह भजन गायन कर रहा था ..भाषा न समझते हुए भी भजन हमे हृदय में छू रहा था .सच ही खा है प्यार और भावनाओं की कोई भाषा नहीं होती वह तो बस ह्रदय ..नेत्रों ..मुस्कान के द्वारा अभिव्यक्त होती है ...--''भज गोविन्दम ..भज गोविन्दम ...गोविन्दम भज मूढ़ मते ''..गाती हुई कुछ महिलाएं नृत्य कर रही थीं -भावना और भक्ति का अद्भुत समन्वय था .-अपूर्व दृश्य था ...जो हमे अपने साथ बहाए लिए जा रहा था .
हमने तीन रूपये का टिकट लिया और भगवान को चढाये जाने वाले महाप्रसाद की रसोई देखने चल पड़े ..जहाँ सात सौ चूल्हों पर आठ सौ कुशल रसोइये भगवान का भोग तैयार करते हैं ,ये सारा प्रसाद मिटटी की सात सौ हंडियों में पकाया जाता है ,जिसे 'अटका' कहते हैं .एक दिन प्रयोग में ली गयी हांड़ी दूसरे दिन काम में नहीं लाई  जाती ..लगभग दो सौ सेवक सब्जियों ,फलों ,नारियल को काटते हैं ,मसलों की काट छंट और पिसाई करते हैं ..छप्पन प्रकार के व्यंजन भोग के लिए बनते हैं --,दाल चावल,सब्जी,मीठी पूरी ,खाजा,लड्डू ,पड़ा ,बूंदी,चिउड़ा ,नारियल ,धी से तैयार पदार्थ -माखन, मिसरी आदि का महा प्रसाद बनता है ,हमको भी कुछ तैयार प्रसाद मिला जिसे हमने आदर से ग्रहण किया .
बाहर आकर पुनः पाँव धोये  और अपना कैमरा ,मोबाईल वापस लेकर ऑटो रिक्सा से रिसोर्ट पहुंचे ..शरीर थकान से चूर था ..भूख भी लग रही थी --गर्मी की तपन ने हमें झुलसा दिया था ..स्नान किया फिर नीचे डाइनिंग एरिया में खाने के लिए गए ..खाना स्वादिष्ट था -गर्म चावल ,दाल ,दो सब्जियां पापड़ ,सलाद ,चटनी .अंचार --हमारी भूख में यह भोजन अमृतोपम लगा ....
शाम पांच बजे ---
हमने दो पहर  में अपने कमरे में ही आराम करने का निर्णय लिया और शाम की चाय के बाद पुनः पैदल ही समुद्र तट की और निकल पड़े ..आज आसमान पर भी बादल थे और सागर की सफेद लहरें भी पहले से अधिक शीतल और चंचल लगीं .... ,धरती व् आकाश जैसे एक हो गये थे ..तस्वीरों में सारे दृश्यों को ..प्रकृति के पल पल बदलते रूप को हम कैद करते गए सब कुछ वर्णनातीत ..शब्दातीत ...सागर में नदियों का मिलना ...लहरों में बदलना ..और बार बार तट को छू कर खिलखिलाते हुए लौट जाना ...ये सब मेरे कवि मन को अभिभूत कर रहा था .--सृजन की कामना जाग उठी --वहीँ बालू पर बैठ कर एक कविता लिखी --''कह उठा सागर -समर्पण हूँ तुम्हारा ,तुम हमेशा ही मेरे अहसास में हो ''.......आस पास नई पीढ़ी के कुछ युवा आपत्तिजनक तस्वीरें खिंचवा रहे थे ,हमारे अनुशासित -अभिभावक मन को कुछ बुरा लग रहा था ..लेकिन --''सबकी अपनी दुनिया है ''यह मान कर हम मौन रहे .....मैंने भी अपने पति ,व् बेटी तथा पारिवारिक सदस्यों के साथ तस्वीरें लीं ..इसी भने अपनों के संग साथ को भी स्मृतियों में संजो लिया ....वहीँ रेत पर बैठे हुए जिन्दगी की आपाधापी से दूर ..तमाम तनावों -उलझनों से दूर ..अपने जीवन साथी के साथ बैठे हुए ये गीत बार बार याद आ रहा है --''वक्त की कैद में जिन्दगी है मगर --चंद घड़ियाँ यही हैं ..जो आजाद हैं ,इनको खोकर कभी ...उम्र भर ना तरसते रहें ''........मेरे आस पास लोगों का मेल लगा है ..तरह  तरह के लोग ..कुछ सजे हुए ऊंट और घोड़े भी नजर आ रहे हैं ,छोटे छोटे बच्चे उन पर सवारी करते हुए खूब शोर मचाते अभी अभी निकल गए हैं ....ठंडी हवा पूर्ववत बह रही है ....अँधेरा बढ़ रहा था ..और लहरें उग्र होती जा रही थीं ,पर मन वहां से लौटना ही नहीं चाहता था ,...पर लौटना तो था ही ........
तीसरा दिन ----
आज का दिन पॅकेज टूर के लिए नियत था ..विडिओ कोच से हमे कोणार्क और लिंगराज मन्दिरों की यात्रा पर निकलना था ,बस आरामदायक थी ,...बस के चलते ही शीतल हवा आह्लादित कर गई .गाइड ने माइक सम्भाला और अगले पड़ावों के लिए आवश्यक दिशा निर्देश देना प्रारम्भ किया .बस का नाम तिरुपति था अतः हम सभी सहयात्रियों को वह ''तिरुपति परिवार ''कह कर सम्बोधित कर रहा था .उन्होंने चंद्रभागा और कोणार्क के विषय में ऐतिहासिक और रोचक जानकारियां दीं ....थोड़ी देर बाद ही हमारी बस चंद्रभागा पर रुकी ..सागर की स्वच्छ फेनिल उत्तुंग लहरों को देख कर मन मुग्ध हो गया ...हम भींगते रहे थे देर तक ..आने की इच्छा ही नहीं हो रही थी ,..लेकिन हमारे गाइड ने मात्र सात मि ० का समय दिया था ...बस आगे की ओर चल पड़ी थी ..असीम हरियाली ..घने आम ,ताड़ व् नारियल के पेड़ों से घिरे रस्ते पर हमारी बस तेजी से आगे बढ़ रही थी --दिन चढ़ने के साथ साथ सूर्य की गर्मी भी बढ़ रही थी ,..हम कोणार्क के मार्गों की सुन्दरता को निहारते हुए वहां की प्रशासनिक व्यवस्था की तारीफ के लिए मजबूर हो गये थे .साफ ..स्वच्छ और लम्बी सुंदर सड़कें ...जहाँ तहां डस्टबिन ..तरह तरह की सुंदर कलाकृतियों में दिखाई दिए ...हरे भरे पेड़ों को काट छंट कर --कहीं लेटी  हुई युवती ..कहीं हिरन ..तो कहीं बगीचे का रूप दिया गया था ..चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस मुस्तैदी से तैनात थी ...मै सुदूर झारखंड की पथरीली दुनिया से निकल कर ..किसी स्वप्न में विचरण कर रही थी .....कोणार्क आ गया था .हम बस से उतरे --गाइड ने हमे टिकट थमाया और तिरुपति परिवार उनके साथ हो गया ,...गाइड के द्वारा बताई गई कहानियां ऐतिहासिक कम ..काल्पनिक ज्यादा लग रही थीं ..हम इतिहास से परिचित थे ..अतः अपनी इच्छानुसार घूमते रहे ..तस्वीरें लीं ..उन पत्थरों ..खंडहरों की ऐतिहासिकता ,साम्राज्य के उत्थान पतन, प्रेम हर्ष व् विषाद का जीवंत प्रमाण उपस्थित कर रही थीं ...सूर्य के रथ की कल्पना कर बनाया गया मन्दिर समय के थपेड़ों और कुछ ही वर्षों पूर्व आये तूफान नष्ट भ्रष्ट हो गया था .पर उनके अवशेष किसी रहस्यमयी दुनिया में ले जा रहे  थे --यहाँ पूजा नहीं होती ..कुछ मूर्तियाँ -कला कृतियाँ ढह  गई हैं ..पर सुंदर हरे भरे पेड़ों ..बगीचों की हरियाली मोहित कर रही थी,सामने शीतल जल कीधारा प्राकृतिक रूप से लोगों की प्यास बुझा रही थी . हमने वहां बिताये एक एक पल को कैमरे में कैद किया अंततः भूख मिटने के लिए बाहर आये -कुछ होटल थे जहाँ शाकाहारी भोजन की व्यवस्था थी ..पर हम सबने इस थका देने वाली यात्रा में भोजन न करके फल ,नारियल पानी ,जूस आदि से भूख शांत करने का निर्णय लिया ..गाइड द्वारा दिए गए डेढ़ घंटे का समय पूरा हो गया था ,--हम वापस बस की ओर लौटे -..बस भुवनेश्वर के रास्तों पर दौड़ रही थी ..अगला पड़ाव था लिंगराज मन्दिर ..वहां ऊंचाई पर स्थित मन्दिर तक पहुँचने के लिए गर्म तपती सीढियों से जाना था ..मै बुरी तरह थक गई थी ..ऋचा ,मिश्र जी और मेरे रिश्तेदार वहां के लिए चल पड़े पर मै नहीं गई ,बस में ही बैठी रही ...थोड़ी देर बाद झुलसते पांवों से थके हारे यात्री वापस लौटने लगे ,मेरे परिवार के सदस्य भी गर्मी से परेशान वापस आये ..नंगे पांवों से दौड़ते हुए ----हमारी यात्रा पुनः आरम्भ हुई --धौला गिरि आ रहा था .....कलिंग युद्ध की विभीषिका और मारे गये सैनिकों और आम नागरिकों की नृशंस हत्याओं से सम्राट अशोक का हृदय विदीर्ण हो गया था ..पश्चात्ताप की ज्वाला में जलते सम्राट ने बौद्ध धर्म की शरण ली ,बुद्ध के शांतिमय उपदेशों ने उन्हें सही राह दिखाई और उन मारे गए सैनिकों की स्मृति में यह शांति- स्तूप बनवाया था जिसके ऊपरी हिस्सों में धर्म  अर्थ मोक्ष धृति क्षमा दम  ,असतेय  और करुणा  के प्रतीक चिह्न बने हुए थे ,शांति और क्षमा के साकार रूप को देख हृदय बुद्ध की करुणा के प्रति नतमस्तक हो उठा ... सीढियों पर चढ़ते हुए मन में प्रार्थनाएं गूंज रही थी -''बुद्धम शरणम गच्छामि --धम्मम शरणम गच्छामि --संघम शरणम गच्छामि ''....उपर पहुँच कर जन्म -उपदेश और निर्वाण प्राप्ति तक बुद्ध के अनेक स्वरूपों के दर्शन किये --कामिनी नदी ,और युद्ध के मैदान के अवशेषों की तस्वीरें ली गई ..अंततः वापस लौटते हुए मन में अपूर्व शांति का अनुभव हो रहा था .
प्यास लगी थी -छोटी छोटी दुकानों में बिकता  स्थानीय मिनरल वाटर तो मिल रहा था ,पर वह स्वच्छ नहीं था ,हमने वहीँ परिसर से बहते साफ जल को बोतलों में भर लिया ,.बस आगे की यात्रा पर चल पड़ी  ....अगला ऐतिहासिक पड़ाव था --उदयगिरी और खंड गिरी की गुफाएं ,जो जैन साधुओं के उपासना स्थल थे .जहाँ तपस्या करते हुए आध्यात्म और भक्ति के गूंजते मन्त्रों का अहसास और उसकी प्राचीनता अभी भी मौजूद थी .सब कुछ नष्ट भ्रष्ट ,जीर्ण परन्तु एक कहानी कहता हुआ -सारा परिवेश ......कुछ बन्दर भी दिखे जो हर आने जाने वाले पर्यटक से  हाथ मिलाते द्वारा दिए चने और केले खा रहे थे ,--सबका मनोरंजन भी हो रहा था .--पीपल वृक्ष की छाया में हमारे सहयात्री बैठे थकन मिटा रहे थे --हमने भी चिप्स के पैकेट खोल लिए ,पानी पीकर गर्मी की चुभन कम हुई ....बस आगे की ओर चल पड़ी ,इस बार हमारा गन्तव्य था --''नंदन कानन -- यानि पक्षियों -दुर्लभ प्रजाति के  जानवरों का बसेरा --चिड़ियाघर ''..नंदन कानन एक लोकप्रिय प्राकृतिक स्थल है जहाँ दुर्लभ हिंस्र ,और पक्षियों की अनेक जातियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में सुरक्षित रखा जाता है .वहां पहुँच कर हमारे गाइड ने हमे प्रवेश टिकट और कैमरा आदि ले जाने का अनुमति पत्र थमाया ..प्रवेश द्वार पर सबकी जाँच हुई ---आगे का दृश्य सचमुच नंदन कानन सा ही लुभावना ,हरीतिमा से भरपूर ,...शांत वातावरण में किसी तपोवन सा प्रतीत हुआ वहां घूमते हुए विष्णु गुप्त के ''पंचतंत्र ''.. की याद आई ...निर्भय हो पिंजरों में घूमते हुए शेरो की गर्जना जहाँ भयभीत कर रही थी ..वहीँ हिरनों के झुण्ड और लगभग सौ की संख्या में उनके शावकों ने मनमोह लिया ...वे खेल रहे थे और अपनी छोटी छोटी काली  आँखों से ह्मे निहार रहे थे ,जिनमे स्वर्ण मृग ,कृष्ण मृग ,बारहसिंगे और चीतल भी थे ...कुछ आगे जाकर मगरमच्छों की एक पूरी फौज ही मिली -छोटे बड़े मगर मच्छ ,भयानक -तीखे दांतों वाले जबड़े खोले --तो कहीं शांत सोये पड़े थे .भालू ,चिम्पैंजी ,और दरियाई घोडा भी अपने करिश्माई अंदाज में दिखे ...कुछ पिंजरों में सांपों की कई प्रजातियाँ थीं ,,करैत कोबरा और विश्व प्रसिद्द एनाकोंडा भी हमने देखा .........हमारी बस के प्रस्थान करने का समय हो चुका था , हम भी घूमते हुए थक कर चूर थे ...बस वापस पुरी  के रास्तों पर लौट रही थी --आस पास की हरियाली ,छायादार वृक्षों से गुजरते हुए तथा शहर की सुन्दरता को निहारते हुए हम पुरी पहुंचे ----रिसोर्ट तक पहुँचते रात हो गई थी-- तन मन थक कर चूर था ...रात का खाना खा कर गहरी नींद आई .
आखिरी दिन ---
सुबह सुबह ही मेरे पारिवारिक रिश्तेदार नहा धो कर तैयार होकर पुनः दर्शनों के लिए मन्दिर जा रहे थे -ऋचा भी साथ गई --रिसोर्ट में मै और मेरे पति  -ही रह गए थे हमने भी पहले सामान की पैकिंग की फिर नहा कर ठंडी हवा में सागर तट की ओर चल पड़े ... अब सागर को अलविदा कहने की बारी  थी ...तट पर बैठे रहे देर तक ,तस्वीरेंलीं ,..लहरों के साथ मन की भावनाएं भी बहती रहीं --लौटते हुए कुछ प्रसाद और छोटे छोटे उपहार भी लिए अपने मित्रों के लिए .....आज रात ९ बजे की ट्रेन थी .
..हम पुरुषोत्तम से जमशेदपुर वापस लौट रहे थे ..पर अपना मन सागर की लहरों -महाप्रभु को सौँप कर पर बार बार  यहाँ आने की कामना के साथ .....मेरी यह यात्रा आजीवन चिर स्मरणीय बनी रहेगी ''...

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                                                                                                                           चौपाल


                                                                                                                 - डॉ.विजय शिंदे


    अंतर्प्रेरणा और अभिव्यक्ति


साहित्य समाज से जुडा है और समाज के सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों का साहित्य के भीतर प्रकटीकरण होता है। आज साहित्य अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन है जो हम प्रत्यक्ष वाणी द्वारा व्यक्त नहीं कर सकते हैं वह साहित्य के द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। समय गुजरने के बाद उसे पढ़ सकते हैं, अगर पिछला लिखा हुआ गलत लग रहा है तो दुरुस्त कर, परिवर्तन कर पक्का बना लेते हैं। अंततः उसे प्रकाशनार्थ भेज देते हैं। और यह प्रकाशन छोटे-छोटे आलेखों से लेकर बडे-बडे उपन्यास, प्रबंध तक का होता है। साहित्य की तमाम विधाओं में विश्व के सारे भाषाओं के लेखक भरपूर लेखन कर रहे हैं। प्रश्न उठता है क्यों लेखन कर रहे हैं? कौन पढ़ रहा है? पर इतिहास के भीतर की हजारों घटनाएं बता देती हैं कि साहित्य से समाजक्रांतियां हो चुकी हैं। लिखित सामग्री से प्रेरित होकर समाज जागृत हो चुका है और अपने आजादी की लडाई भी जीत चुका है, जीत रहा है। किताबें पुरानी होने के बावजूद भी उनमें छीपा विचारधन पाठकों को आकर्षित करता है और अपने जिंदगी को किताबी विचारधन से रंगा देता है। जिंदगी बनने के बाद जब वह अपना मूल्यांकन करने लगता है तब उसे पता चलता है कि इस किताब, विचार, वाक्य, कविता, कहानी, उपन्यास... लेखक, कवि ने... मेरे जीवन पर प्रभाव डाला है; अतः आज मैं इस मकाम पर हूं। अर्थात् अपने लिखे-कहे से किसी की जिंदगी बनती है तो क्यों नहीं लिखे!

 

        लेखक के मन में हजारों सवाल, हजारों अंतर्प्रेरणाएं होती हैं जो कागज पर उतरने के लिए, अभिव्यक्त होने के लिए उमड़ रही होती हैं। जैसे ही उचित मौका मिलता है तब लबालब होकर अपने भीतर छीपी बातें तूफान के साथ प्रकट होती है, कागजों पर। समीक्षा जगत् के भीतर इसे प्रेरणा, प्रतिभा, दैवी शक्ति चाहे जो भी कुछ नाम दिया हो पर यह प्रकट होना अद्भुत ही होता है। जब अभिव्यक्ति का दौर शुरू होता है तब प्रसिद्धि, पैसा... जैसे अधम हेतु उसके पास फटकते भी नहीं। लेखकों को मानो किसी भूत ने झपट लिया हो, वैसी ही अपनी धून, अपनी फकिरी में देश, दुनिया को भूलकर अपने अस्तित्व को भूलाकर ईश्वरीय ताकत से समा बांध लेता है। मूलयवान कृति को जन्म देता है, उसे पढ़ता है और चकित भी होता है। उसे भी विश्वास नहीं होता कि मैंने यह लिखा है, मैं ऐसे भी लिख सकता हूं! धून से जब वह बाहर आकर कृति को देखना शुरू करता है तब वह सामान्य आदमी होता है, और सामान्य आदमी की नजर से देखना शुरू करता है तब चकित होना भी लाजमी है। कागज रूप में जो भी उसके सामने मूल्यवान लिखित चीजें पडी होती है वह उसकी नहीं तो समाज की मल्कियत होती है। उसे देख समाज तक पहुंचाने की छटपटाहट भी शुरू होती है। लेखकों द्वारा लिखा हुआ समाज के लिए खाद होता है, समाज के हर हिस्से, कोने-कोने और इंसानों के रोम-रोम को सिंचित करने की ताकत भी उसमें होती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति के भीतर बैठे एक लेखक का अभिव्यक्त होना मानव हीत में है।

 

आधुनिक जमाने के भीतर प्रकटीकरण के कई साधन हैं, उन्हे आजमाकर उनके भीतर की उमड़-घूमड़ बाहर निकलनी चाहिए; अपनी भाषा, अपनी वाणी और अपनी अभिव्यक्ति शैली में। आज-कल कोई भी भाषा, वाणी और अभिव्यक्ति शैली अछूत नहीं है। आप कहते जाए सुनने के लिए लाखों की भीड़ खडी है। आज नहीं तो कल आपको सुना जाएगा, पढा जाएगा। लेखकों के मन में भी यहीं होता है, अतः अंतर्प्रेरणाओं का प्रकटीकरण होता है, उसे बांधा जाता है और प्रसिद्ध भी किया जाता है। भारत की विविध भाषाओं के लेखकों का लेखन कमाई का धंधा नहीं है, कुछ प्रतिशत छोडे तो बाकी सारे लेखकों का जीने का आधार दूसरा है और लेखन केवल समाजहीत और आत्माभिव्यक्ति को लेकर करते हैं। विश्व की दूसरी व्यावसायिक भाषाओं की जैसे- अंग्रेजी की स्थिति अलग है। वहां लेखन व्यवसाय है पर जब अभिव्यक्ति का दौर चल रहा होता है तब देशी क्या विदेशी क्या सारे लेखक अपने आत्मा को आजाद छोड़कर उसके झौकों पर सवांर होते हैं वह जहां लेकर जाएंगे वही जाते हैं। फिर रचना की पूर्णता के बाद कलापक्षीय ढांचे, शैली, भाषाई सौंदर्य... व्यावसायिक दृष्टिकोण से थोडे बहुत परिवर्तन होते हैं। पर मूलतः अभिव्यक्ति के समय किसी भी लेखक के मन को निजी स्वार्थ छूता भी नहीं है।

 

अपने आस-पास छोटी-छोटी बातों में भी सौंदर्य का खजाना होता है। पर जिंदगी की भाग-दौड़ में हमारी कृत्रिमता उस खजाने को खो देती है। यंत्र बने हम रोजमर्रा की जिंदगी जी लेते हैं। यहीं कोई लेखक हमें पकड़कर, हमारे कान खींचकर अगर दिखा रहा है तो इससे अच्छा क्या है? हम बाजार में खडे हैं और चारों तरफ भीड़, शोर, जल्दबाजी शुरू है आवाजें एक-दूसरे में घूलमिल रही हैं पर इसी भीड़ में कहीं कोने में, रास्ते के किनार खडे होकर भीड़ के पैर, आवाज और चेहरों को देखना किसी सुंदर सपने से कम नहीं। पर आपके पास भीड़ से अलग होने की क्षमता होनी चाहिए। उसी तरिके से लेखक भीड़ का ही हिस्सा होता है पर उसके पास भीड़ से अलग कोने में, किनारे पर खडा होकर निरीक्षण की, परख करने की ताकत होती है। वह ईश्वर से प्राप्त समय-दर-समय और प्रखर और सूक्ष्म और धारधार बनती है और नव-नवीन साहित्यिक कृतियों को समाज के सामने सजा देती है। लेखकों द्वारा सजाएं कई कृतियों का मिठास भरा पक्वान दुनिया चाव से खाए, अपने जीवन को गति दें। जिस साहित्य से गति मिलेगी नहीं उसकी उपेक्षा ना करें। उपेक्षा किसी लेखक की हत्या हो सकती है। हत्या और खून के अपराध से बचने के लिए दूसरों की इज्जत-सम्मान करना बहुत जरूरी है। कोई चिल्लाकर आपको बार-बार बता रहा है तो सुनना भी कर्तव्य है। अपने घर में छोटा बच्चा भी अगर हमें कुछ बता रहा है और हम उसे अनसुना कर रहे हैं तो वह अपने मुंह को अपनी ओर खिंचकर, हाथ को पकड़कर, नजदीक आकर, पीठ पर चढ़कर, बालों को पकड़कर, साडी के पल्लू को पकड़कर... ध्यानाकर्षित करता है और अपनी बात हम तक पहुंचा देता है। वहीं ‘इनोसंट’ भाव लेखक में है, समाज के कंधों पर खिलकर पोषित हो रहे हैं और सुनने वाले कई हैं तो लेखक की अंतर्प्रेरणाएं जागृत होती ही है और लिखा भी जाता है।

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                                                                                                                      समीक्षा


                                                                                                               - दिलीप भाटिया
                                                                                                                रावतभाटा 323307


अम्माँ-पापा (काव्य-संकलन): लेखिका माला वर्मा, हाजीनगर 743135: प्रकाशक-रोशनाई प्रकाशन काँचरापाडा 743145: पृष्ठ 296: मूल्य रू. 200
 


यत्र तत्र सर्वत्र प्रकाशित होती रहने वाली माला वर्मा की ग्यारहवीं पुस्तक, दूसरे कविता संग्रह के रूप में 101 काव्य फूलों का गुलदस्ता लेकर साहित्य जगत में आई है। इन्टरनेट टी.वी. मोबाइल ई-मेल, फेसबुक, ब्लाग पर कृत्रिम जिन्दगी की धूप के बीच एक निर्मल पवित्र शीतल सुखद हवा का झोंका तन मन को छांह भरी शीतलता देता है, यह काव्य संकलन इन कविताओं को पढ़ते हुए अम्मा, पापा, भाई, भाभी, पीहर, गांव, प्रकृति स्मरण होते चले जाते हैं। अम्मा पर कई कविताऐं हैं एवं पापा पर भी एवं इन्हें पढ़ते हुए आंखे छलक पडती हैं। माला दी की कविताऐं सामयिक, संवेदनशील हैं। प्रकृति व समाज के कई दृश्य हैं। ईश्वर को भी कठघरे में खड़ा किया गया है। विशेषकर हर पाठिका इस संकलन को पढकर पीहर के वातावरण में पंहुच जाऐगी।
 प्रभावशाली शैली में सृजित ये कविताऐं अंतर्मन को छू लेेती हैं। ईश्वर से प्रश्न है क्या तुम्हारे परिवार में मृृत्यु नही होती ? कई रचनाओं में जीवन दर्शन भी है, यथा, होते हैं पिता एक वटवृक्ष, जो बीत गई सो बात गई, अब तक जो कुछ भी हुआ बहुत अच्छा ही हुआ, सबका तो दिन नियत कर रखा है तुमने, कब किसकी होने वाली है मौत, अच्छे कर्मो वाले ही पाते हैं दुःख सदा, हम जैसा करते हैं वैसा ही इस जग में भरते हैं, मन मेरे थोडा धीरज रखो, मर गए जो ज्ञानी ध्यानी वे अब नहीं लौट कर आने वाले, दया और प्यार से बढ़कर दूजा कुछ भी नही इस भू पर, इत्यादि।
 चिन्तन-मनन-मंथन हेतु बहुत कुछ भरा है। इन कविताओं में दुख-दर्द, पीड़ा-आंसू के साथ यह संदेश भी है कि जीवन से हारना नहीं है। एक सकारात्मक सोच है, प्रकृति के दृश्य मनोहारी हैं। पीहर का अपनापन, भाभी का पत्र, पति की व्यस्तता, घर, देश, नीड़, नदी सभी पहलू हैं। निराश लड़की को आशा का संदेश है, घर परिवार का महत्त्व है।
 मुद्रण गुणवत्तापूर्ण है। मूल्य कुछ अधिक सा लगता है। मध्यम वर्ग का पाठक इसे पुस्तकालय से लेकर ही पद पाएगा। प्रूफ की अशुद्धियां नगण्य सी हैं। कुल मिलाकर, संभव हो तो, संकलन घरेलू पुस्तकालय का सदस्य बनाया जा सकता है एवं अपनों में बांटा जा सकता है।
 इन्टरनेट मोबाइल फेसबुक की थकान ऊब दूर करने के लिए यह पुस्तक मन मस्तिष्क के लिए एक टॉनिक है।
 माला दी को इस संकलन हेतु साधुवाद, अभिजीत, रश्यिप्रिया के साथ दिलीप भी अगले संकलन की प्रतीक्षा करेगा। इति. -

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                                                                                                                         दृष्टिकोण



 


                                                                                                                      - शैल अग्रवाल





कविताः क्यों और कैसे


आज के इस यांत्रिक युग में जब सब कुछ जाना और समझा जा सकता है। हर चीज का संधि विच्छेद किया जा सकता है तो फिर कविता ही क्यों नहीं। क्या प्रेरित करता है इस रचनात्मक प्रक्रिया को? कहते हैं कि 'क्षिति जल पावक गगन समीरा्रपंचतत्व का अधम शरीरा' और जब शरीर के ये पाँचों तत्वों में से एक भी प्रभावित या उद्वेलित हो बाहरी तत्वों से जा मिलता है तो रचना प्रकरण शुरू हो जाता है – इस टूटन और बिखराव से ही सृजनात्मक ऊर्जा आती है। हॉकिन्स जब अपनी सृष्टि–संरचना के पहले बिग–बैंग थ्योरी को बता रहे थे तो शायद यही समझा रहे थे।

जब शरीर इन पाँच तत्वों से बनता है तो साहित्य या कला क्यों नहीं – आखिर वह भी तो हमारी चेतना या अंतस् का घर है। वहीं पर तो मन रमता है। रूप रंग हो या सूर–सागर, या प्यार और सहानुभूति का तरल स्पर्श, या फिर अवहेलना की चाबुक, सब हमें पलपल बदलते – तोड़ते और जोड़ते रहते हैं। जब तन–मन पानी–पानी होगा तो आँसू और मुस्कान बनकर बहेगा ही। चिनगारी की तरह तीव्र और जलता हुआ जब कोई विचार–व्यवहार प्यार या तिरस्कार अंतस् झुलसाएगा तो धुएँ के बादल उठेंगे ही। हवापर चढ़ी तरह-तरह की गंध और दुर्गंध मानस उद्वेलित करेंगी तो प्रतिक्रिया तो होगी ही। अब यह अलग बात है कि नाक सिकोड़कर हो या एक तृप्त मुस्कान के साथ और हम इसे चाहे कला कहें या प्रतिक्रिया –– शायद सुगढ़ता और सुरूचि से व्यक्त होकर अभिव्यक्ति ही कला का रूप ले लेती है।

धरती की तरह फैलती जरूरतों और जीवन को कल्पना के नए–नए रंगों की, नए बीजों की हमेशा ही जरूरत होती है और यह रूप–रंग, यह उड़ान मिलती है धरती को अपने उपर फैली असीम की छाया से। बात बिल्कुल सीधी और सरल है – अनुभूति जितनी और अभिभूत करने वाली होगी –– देर–सबेर अभिव्यक्ति उतनी ही तीव्र और सधन। चाहें फिर वह शब्दों में हो, रंगों में या फिर चपल अंग–अंग की थिरकन में। यह सब आदि काल से ही होता आ रहा है। विधाता की इस सृष्टि में साँस लेने और जीवन की अन्य जरूरतों की तरह यह भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया हैं जो हमारे लिए सुख का ही नहीं मानसिक उपचार का भी काम करती है – वरना हमें गुफाओं में कला के नमूने ना मिल पाते। लोकगीतों और लाकोक्तियों में वह तलवार की धार और फूलों की कोमलता न मिल पाती। अगर सब कुछ पढ़–लिखकर या उपाधियों से ही अर्जित होता तो कबीर और वाल्मीकि हमें कैसे मिल पाते ––

जब बादल सा उमड़–घुमड़कर कुछ मन–मस्तिष्क पर छा जाता है। बिजली–सा नस–नस में कड़कता और बूँद बूँद, हरपल आँखों और होठों से टपकता है तो यही उन्मन, अस्थिर तड़प रचना को जन्म देती है। और अगर यह आकस्मिक रसायनिक आंदोलन बाहर ना आ पाए तो हमें अस्वस्थ भी कर सकता है। भावनाओं के इस नियंत्रित निष्कास को ही शायद अरस्तू ने कैथारसिस का नाम दिया और गालिब भी शायद यही कह रहे थे जब उन्होंने दर्द को ही दिलकी दवा कहा। इस तरह हम कुछ हद तक कह सकते हैं कि जीवन हो या साहित्य, शायद विघटन का ही दूसरा नाम सृजन है।

इसीलिए अच्छी रचना कभी बनाई नहीं जाती खुद ही बनती है। यह बात दूसरी है कि बाहर आने की शीघ्रता में वह अस्त–व्यस्त या लस्त–पस्त हो जाए और कभी–कभी उसे हलके से सहारे की जरूरत पड़े –– वैसे ही जैसे बिखरे मोतियों को माला बनाकर पहनने के लिए रेशम के धागों की। बनी–सँवरी वस्तु चकाचौंध करती है पर जो मन या मस्तिष्क में उतरे वही साथ चलती है। आत्मसात होती है। जैसे प्रयास के बाद मिला सुख, सुख नहीं बस तृप्ति देता है वैसे ही प्रयास से लिखी कविता या तस्वीर चमत्कृत तो करती है अभिभूत या द्रवित नहीं। पर उसे हेय या तुच्छ नहीं कहा जा सकता क्योंकि जो भी मन या मस्तिष्क तक पहुँच पाए – प्रभावित कर पाए वह सशक्त तो है ही। पर समय की कसौटी पर खरी उतरने वाली रचना तो शायद अंतरंग संगिनी सी होती है और ऐसे साथी सौभाग्य से यदाकदा ही मिल पाते हैं – सुगन्ध और बयार की तरह उन्हें सहेज पाना भी उतना आसान नहीं।

हम खुदको रचियता मानें या न मानें पर सृजन और संयोजन जीवन का हर पल करता है। कलाकार बस उसे एकाग्रता के साथ सहेज सकता है – बाँधकर हमारे लिए प्रस्तुत कर सकता है ––एक सुन्दर सजे सहज और नए आकार में। अर्थात कला में सच्चाई, सहजता और एकाग्रता के साथ नवीनता भी चाहिए ही, इसीसे विविधता आती है। वैसे यह विविधता भी मौलिक रचनाओं में स्वतः ही आ जाती है क्योंकि उसमें कलाकार खुद प्रतिबिम्बित होता है। जैसे वही नमक मिर्च होने पर भी स्वाद हाथ का होता है – भावनाओं का होता है, मसालों का नहीं।

बात सब वही हैं पर किसने कही और कब कही, पूरा अर्थ बदल जाते हैं। जब प्यासा 'पानी दो' कहकर पानी माँगे तो शायद देने वाले से देर हो जाए पर जब वह कहेगा प्यास से मर रहा हूँ तो देने वाला दौड़कर पानी लाएगा। इसी एकाग्र तीव्र आँच की उष्मा मिली मुझे हार्डी और शरद में। लहरों की उथल पुथल और सुन्दरता टैगोर प्रसाद गालिब अज्ञेय भारती नीरज व अमृता प्रीतम में। धरती आकाश की सी गहराई और ऊँचाई, संसार को खुद में समेट लेने की शक्ति कबीर, सुर और तुलसी में। हवा के झोंकों सी ताजगी और तूफान खयाम, कनफ्यूसस टॉलस्टॉय और ह्यूगो में। सूची अंतहीन है क्योंकि जीवन से ही कला साहित्य और उसके रचयिया भी विविध और अंतहीन हैं। हर सदी में, हर समाज में अच्छा लिखने वाले होते हैं क्योंकि अभी भी भगवान ने हृदय और मस्तिष्क बनाने बन्द नहीं किए। ईमानदारी और सच्चाई से कही या रची हर बात सशक्त ही होती है और अगर उसके साथ रचयिता का अंतस् कोमल और तरल हो तो सौजन्य और सजलता भी आ जाती है। सद्भाव भी आ मिले तो कला सत्यं शिवं सुन्दरम् हो अनहद नाद सी चतुर्दिक गूँज उठती है।

वह आत्मा का धनी और मन का अक्खड़, फकीर शायद सच ही कह रहा था जब उसने लिखा था – ' जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।' फिर देर किस बातकी तीव्रता से महसूस किए हर पल को आप भी ईमानदारी से बाँधने की कोशिश करते रहिए क्या पता आपमें भी कहीं टैगोर और प्रसाद छुपे हों। पिकासो या टर्नर हों।

बस इतना याद रखिए कि अच्छे कलाकार के लिए अपने ही नहीं दूसरों के भी सुख–दुख को, अपने आसपास को, जीना, महसूस करना और फिर थमकर सोचना – उस शाश्वत सच को ढूँढ़ना एक नितान्त जरूरत है तभी तो हर मन उससे जुड़ पाएगा। शिक्षा और संयम छंद और लय तो दे सकते हैं पर रंग–रूप चाह और आहसे ही आते हैं वाहवाह से नहीं। परेशान नहीं होइए अगर आपको सबकुछ नहीं आता – आपने बहुत कुछ नहीं पढ़ा है – सबकुछ तो कोई भी नहीं समेट पाया है –– सागर भी नहीं ––
सागर की तहमें कब डूबी सूरज–सी हर बात
लहर–लहर का शोर और रेत–रेत की प्यास।

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                                                                                                                         रागरंग


                                                                                                                 -सीताराम गुप्ता





लेखन : एक ध्यानस्थ जीवन पद्धति


जिस प्रकार गायन-वादन, नृत्य-अभिनय, चित्राकला, मूर्तिकला तथा अन्य ललित कलाओं और लोक कलाओं के अभ्यास से एकाग्रता का विकास होता है उसी तरह लेखन से भी एकाग्रता तथा ध्यान के लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। इस दृष्टि से लेखन एक उपचार पद्धति या थैरेपी से कम नहीं है।
लेखन क्या है?
 लेखन से तात्पर्य मौलिक सृजन से है। लेखन दरअसल हमारे मन में समाए हुए विचारों की लिखित अभिव्यक्ति ही तो है। हमारे मन में अनेक प्रकार के विचार समाए होते हैं। कुछ विचार अच्छे तो कुछ बुरे। कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक। कभी हम आशावादी होते हैं तो कभी निराशावादी। इन परस्पर विरोधी विचारों में संघर्ष चलता रहता है और ये घनीभूत होकर मन पर बोझ बन जाते हैं। यदि इस बोझ को हल्का नहीं करेंगे तो विभिन्न प्रकार के तनावों का शिकार हो जाएँगे। लेखन के माध्यम से मन में बोझ बने विचारों को प्रकट कर हम मुक्त हो जाते हैं। लेखन अभिव्यक्ति के माध्यम के साथ-साथ तनाव मुक्ति का साधन भी है।
लेखन एक उपचार पद्धति कैसे है?
 लेखन क्योंकि तनावमुक्ति का माध्यम है अत: यह रोगों से भी रक्षा करता है। जब हम लंबे समय तक तनावग्रस्त रहते हैं तो उससे अनेक साइकोसोमेटिक बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। तनावमुक्त रहकर हम इन मनोदैहिक व्याधियों से मुक्ति पा लेते हैं। लेखन स्वयं में एक उपचार पद्धति है। लेखन के दौरान हम अत्यंत शांत-स्थिर अवस्था में होते हैं जो एक प्रकार से ध्यान की अवस्था ही है। ऐसी अवस्था में हमें मेडिटेशन के लाभ स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं और मेडिटेशन तो स्वयं एक उपचारक तकनीक या पद्धति है।
क्या लेखन को नियंत्रित करके उपचार में मदद ली जा सकती है?
 जैसे मलिन जल के स्थिर हो जाने पर जल धीरे-धीरे स्वच्छ हो जाता है उसी प्रकार शांत स्थिर चित्त भी धीरे-धीरे प्रसन्न हो जाता है और यहाँ मनुष्य अपने मूल स्वरूप में लौट आता है। मनुष्य का मूल स्वरूप या स्वभाव है आनंद। यहाँ यदि हमें लगता है कि हमारे मन में विकारों का संग्रह हो गया है तो लेखन द्वारा न केवल उन्हें बाहर निकाला जा सकता है अपितु सकारात्मक लेखन द्वारा विकारों को संस्कारों में परिवर्तित किया जा सकता है। कैसे? समस्याओं या विकारों का उपचार क्या है? विकारों का रूपांतरण करके हम न केवल सकारात्मक लेखन करते हैं अपितु इन सकारात्मक विचारों या सुझावों की संस्कार के रूप में हमारे मन में कंडीशनिंग भी हो जाती है जो हमारे रूपांतरण और उन्नति का सबसे अच्छा मार्ग और उपाय है। यहाँ लेखन द्वारा सकारात्मक विचारों की रीकंडीशनिंग हो जाती है।
क्या लेखन द्वारा दूसरों के उपचार में मदद ली जा सकती है?
 किसी व्यक्ति की दमित भावनाओं अथवा उसके मन में दबे हुए विचारों को अच्छी प्रकार समझने के लिए लेखन की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। कोई रोगी या दुखी व्यक्ति जब अपने मनोभावों को कागज पर उतारता है तो कुछ तो इस प्रयास में ही वह मुक्त अनुभव करता है और उसके मनोभावों का विश्लेषण कर चिकित्सक या मनोचिकित्सक भी उसे उचित परामर्श दे सकता है। जो व्यक्ति अपने मनोभावों को व्यक्त नहीं कर सकता या करना नहीं जानता वह सबसे बड़ा रोगी है और उसका निदान ;डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट दोनों ही मुश्किल हैं।
मनोभावों की अभिव्यक्ति तो मौखिक रूप से भी की जा सकती है फिर लिखित अभिव्यक्ति पर ही जोर क्यों?
 लेखन मौखिक अभिव्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि लिखने में व्यक्ति को पर्याप्त चिंतन का समय मिलता है। इस समय व्यक्ति सेल्पफ-रियलाइजेशन का प्रयास करता है और इससे अच्छी तो कोई उपचार पद्धति हो ही नहीं सकती। आत्मनिरीक्षण या आत्मावलोकन के उपरांत व्यक्ति स्वयं को बिल्वुफल यथार्थ स्थिति में प्रस्तुत करता है अत: निदान और उपचार दोनों सरलता से किये जा सकते हैं।
क्या हर व्यक्ति एक लेखक की तरह स्वयं को सही-सही अभिव्यक्त कर सकता है?
 हर व्यक्ति एक अच्छा लेखक नहीं हो सकता लेकिन प्रयास करने पर और पर्याप्त अभ्यास के बाद हर व्यक्ति स्वयं को व्यक्त करने में सक्षम हो जाता है। कई बार जीवन में ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जिन्हें हम दूसरों को बता नहीं पाते। स्थान और पात्रा बदल कर यदि हम उस घटना को लेखन यथा कहानी, लघुकथा आदि का रूप दे दें तो निश्चित रूप से उस घटना के दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं।
लेखन के किन-किन रूपों या विधओं से उपचार में मदद मिलती है?
 उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, संस्मरण, रेखाचित्रा, जीवनी, आत्मकथा, लघुकथा अथवा अन्य कोई भी विध क्यों न हो यदि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आप लेखन से जुड़े हैं तो हर प्रकार का लेखन आपको उपचार के लाभ देगा ही। मौलिक लेखन के अलावा पुस्तक का नाट्यांतरण से अथवा लिप्यांतरण या भाषांतरण हो कार्य के साथ-साथ आपका उपचार करने में भी सक्षम हैं। इससे न केवल लिखने वाले की एकाग्रता का विकास होता है अपितु सर्जनात्मकता का आनंद भी मिलता है। इससे आपके तनाव और चिंता के स्तर में कमी आती है जिससे आपकी रोगावरोधक क्षमता विकसित होकर आपको स्वस्थ बनाए रखने में सहायक है।
 कई व्यक्ति रात को सोने से पूर्व  जरूरी पत्रादि लिखते हैं और कुछ डायरी इत्यादि लिखते हैं। डायरी लिखने का अर्थ है दिनभर की या पिछली घटनाओं का चिंतन और विश्लेषण प्रस्तुत करना। तकनीकी भाषा में इसे रेट्रोस्पेक्शन कह सकते हैं। यह मौखिक हो या लिखित इसमें ध्यान के तत्त्व समाहित होते हैं। ध्यान व्यक्ति को आराम देता हे, उसे स्वस्थ करता है, तनाव को कम करता है। सारे दिन के काम के बाद यदि नींद आने में बाधा आ रही हो तो सोने से पूर्व इस विधि अर्थात् रेट्रोस्पेक्शन से उपचार किया जा सकता है। ये सब लेखन के ही विविध रूप हैं। इन विभिन्न विधियों द्वारा स्वयं को तनावमुक्त कर उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त करें।

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रपट

CANNS FILM FESTIVAL


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                                                                                                           चांद परियाँ और तितली


आसमान में उडती परियां.

 बच्चों,


आपने कभी आसमान में उडती हुई परियों को देखा है?                                                                



प्रश्न सुनते ही आप कह उठेंगे कि परियां-वरियां नाम की कोई चीज होती ही नहीं है. या फ़िर यह कहेंगे कि किसी सीरियल में, हमने उसे आसमान से उतरते देखा है. उसके हाथ में एक जादू की छडी होती है और वह पलक झपकते ही कहानी के हीरो की मदद करती है, अथवा उसके लिए कोई उपहार लेकर आती है. वह मुस्कुराते हुए प्रकट है और फ़िर गायब भी हो जाती है.                                                          


यह बात सच है कि अब तक कोई परी देखी नहीं गई है. परी होने की कल्पना भर की गई है. मेरा अपना मत है कि आकाश में उडती सुन्दर सी किसी तितली को देखकर, परी होने की कल्पना की गई होगी. हम जिस परी की बात करने जा रहे हैं, वह किसी खूबसूरत परी से कम नहीं है. उस परी का नाम है-रंग-बिरंगी तितलियाँ. ये तितलियां, हवा में बलखाती-उडती हुई कभी इस डाल पर, तो कभी उस डाल पर, खिले सुवासित फ़ूलों पर जा बैठती है और उसका रस पीकर उड जाती है.                                 


वातावरण में लगातार आ रहे बदलाव तथा कीटनाशक दवाओं के प्रयोग के चलते यह खूबसूरत जीव दुनिया के पटल से लगभग गायब हो रहा है. अन्यथा बारिश की पहली फ़ुवार के साथ, आप अनेक प्रकार की रंगबिरंगी तितलियों को, हवा में तैरती देख सकते थे. खैर न अब वे दिन है और न तितलियां. पर जो भी है, वे गजब की हैं. हवा में मटकते इन जीवों के पंखों से तो नजरें हटाये नहीं हटती. बडा गजब का चुंबकीय आकर्षण होता है इनके परों में. प्रकृति ने पूरे मनोयोग से -,बडॆ सलीके से, धैर्यपूर्वक इनके पंखों पर चित्रकारी की है .उनके पंखों पर कहीं एक-एक आँख बनी है, तो कहीं दो या फ़िर इससे भी ज्यादा. 


तितलियों के परों पर बनी इन्हीं आँखों के आधार पर इनके नाम रखे गए हैं.  केसरिया रंग की  तितली पर बनी, दो बडी-बडी आँखें देखकर उसको नाम दे दिया गया- पीकाक पेंसी, नीली तितली को नाम दिया गया “ब्लू पेंसी,”, किसी को कामन लाइम, किसी को टेल्ड या काली तितली को कामन-क्रो आदि-आदि. हजारों प्रकार की तितलियां पाई जाती है, जिनके नाम रखने में  कई परेशानियां खडी हो सकती है. तितलियों का नामकरण शायद हमने नहीं किया. जो भी नाम मिलते हैं,वे सब अंग्रेजी में ही मिलते हैं. स्पस्ट है कि हमने कभी भी इस बात को लेकर गंभीरता से नहीं सोचा. बस तितली देखकर खुश होते रहे, जबकि पश्चिम के लोगों ने,इन नन्हे जीवों के प्रति अपनी दिलचस्पी दिखलायी, उनके जीवन-चक्र के बारे में पूरी जानकारियां इकठ्ठी की, इनके नाम रखे और इनके संरक्षण के लिए उपाय खोजे और उनके संग्रहालय तक बना डाले. फ़्लोरिडा म्युजियम के नाम से विख्यात एक संग्रहालय है. इसके साथ ही इंगलैंड सहित करीब बत्तीस देशों ने इस नन्हें जीवों के लिए वर्षावन आदि बनाए,जहां यह जीव पलता-बढता और अंत में म्युजियम में सुरक्षित रख दिया जाता है.


यहां हम कुछ तितलियों के बारे में, उनके जीवन चक्र के बारे में संक्षिप्त में जानकारी हासिल करते चलें. तितली जिसे हम अंग्रेजी में बटरफ़्लाई कहते है, कीट वर्ग का सामान्य सा प्राणी है. यह सब जगह पाया जाता है. ठोस आहार न लेकर यह फ़ूलॊं का रस पीती है. इनका दिमाक अन्य कीटॊं से ज्यादा तेज गति से चलता है. कोस्टारिका में तेरह सौ प्रकार की तितलियां पाई गई है. विश्व में सबसे तेज गति से उडने वाली तितली का नाम”मोनार्क” है, जो एक घंटॆ में सतरह मील तक उड सकती है. सबसे बडी तितली “जायंट वर्डविंग” है. इसके पंखों का फ़ैलाव करीब बारह इंच होता है.तितली  के शरीर के मुख्य तीन भाग होते हैं. (१) सिर (२) वक्ष (३) और तीसरा दो जोडी पंख. इनके छः पैर होते है. प्रत्येक पैर में तीन जोड होते है, सिर पर दो जोडी आँख, मुँह में घडी की स्प्रिंग की तरह “प्रोवोसिस” नामक खोखली सूंडनुमा जीभ होती है. फ़ूलों पर बैठकर ये इसी से फ़ूलों का रस चूसकर पीती है. इनका जीवन ज्यादा लंबा नहीं होता है. यह एक लिंगी प्राणी है. नर और मादा अलग-अलग होते हैं. मादा पितली पत्तॊं के नीचे अपने अंडॆ देती है. कुछ समय बाद ये लार्वा ( कैटर्पिलर)में बदल जाते है. कुछ समय पश्चात लार्वा एक खोल के रुप मे बदल जाता है जिसे “प्यूमा” कहा जाता है. और अन्त में यह तितली के रुप में ढलकर आसमान में उडने लगती हैं।


                                                                                                            ( क्रमशः)


                                                                                                          -गोवर्धन यादव








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साल शुरु हो....


साल शुरू हो !

साल शुरू हो दूध दही से
साल खत्म हो शक्कर घी से

पिपरमैंट, बिस्कुट मिसरी से
रहें लबालव दोनों खीसे
मस्त रहें सड़कों पर खेलें
ऊधम करें मचाएँ हल्ला
रहें सुखी भीतर से जी से।

साँझ, रात, दोपहर, सवेरा
सबमें हो मस्ती का डेरा
कातें सूत बनाएँ कपड़े
दुनिया में क्यों डरें किसी से

पंछी गीत सुनाये हमको
बादल बिजली भाये हमको
करें दोस्ती पेड़ फूल से
लहर लहर से नदी नदी से

आगे पीछे ऊपर नीचे
रहें हँसी की रेखा खींचे
पास पड़ोस गाँव घर बस्ती
प्यार ढेर भर करें सभी से।

-भवानी प्रसाद मिश्र