युवा विशेषांक में चाहते तो हम भी यौवन की, फूलों की...उमंग और सपनों की, प्रेम-प्यार की बातें कर सकते थे पर क्या सिर्फ यह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपाने जैसा नहीं! माना ये भाव, ये शब्द तरुणाई के पर्याय हैं पर मानवता की डाली पर खिले फूल आज अधिकांशतः वक्त से पहले ही कुंभलाए क्यों नजर आने लगते हैं... खुशबू दबी-दबी क्यों रह जाती है...क्या कमी रह जाती है देख-रेख या खाद-पानी में, इनके पर्यावरण में और अंततः यह जिम्मेदारी किस पर आती है? वाकई में कितना स्वतंत्र है आज का युवा...समाज, देश और विश्व की बात छोड़ें, निजी फैसले तक में? कुछ ये ऐसे बुनियादी सवाल हैं जिनके लिए थमना और सोचना हितकर है समाज ही नहीं विश्व के लिए भी। चाहे देश हो, समाज हो या फिर मात्र एक परिवार, हम सभी जानते हैं कि युवा न सिर्फ भविष्य के सूत्रधार और रचयिता हैं, जीवनशैली, मूल्य ...सोच और संस्कृति, हर परम्परा, खुद हमारे अपने अस्तित्व तक के संवाहक भी! सच पूछो तो वक्त की अनन्त धारा में इन्ही के सहारे तो मनुष्य टिका रह पाया है। ...नाव, पतवार माझी सभी कुछ यही तो हैं, फिर इन्ही की इतनी अवहेलना और दमन क्यों ! सदियों से यह होता आ रहा है; वाकई में आश्चर्य की ही बात है...तिसपर से मजा यह कि हर वृद्ध कभी युवा था, उन्ही समस्याओं और उलझनों से गुजरा था, जिनसे कि उसके सामने खड़ा युवा गुजर रहा है...भलीभांति वह जानता और समझता है कि यदि उसे अपनी समझ पर भरोसा है तो, युवाओं को अपनी शक्ति पर। फिर भी ' सास भी कभी बहू थी' कि तरह ही, सारी भावनाओं, सारी समझ को किनारे रख, यंत्रवत् वही गलतियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराई जाती हैं। वही टकराव और आघात-प्रतिघात होते रहते हैं । कभी इसे पीढ़ियों का अन्तर, तो कभी पीढ़ियों का संघर्ष कहा जाता रहा है, परन्तु इस अंतर को दूर करने की, संघर्ष को मिटाने की शायद ही कभी पूरी तरह से ईमानदार कोशिश की जाती हो।
'कौन इतना सिर दर्द ले', एक वजह यह भी हो सकती है, पर भूलना नही चाहिए कि जब यही आक्रोष और विद्रोह लावा बनकर फूटता है तो कितना अधिक विनाषक... कितना बड़ा सिरदर्द बन सकता है। हर पीढ़ी कहती आई है कि आज का युवा भ्रमित है...पर इस भ्रम की जिम्मेदारी कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी को तो लेनी ही होगी! क्या इसके पीछे मन में छुपा असुरक्षित भविष्य का भय तो नहीं... खुद उसका और परिवार का तनावमय और संघर्षमय वातावारण तो नहीं? जीवन की विषमताओं से जूझते, और अर्थिक सफलता की आंधी दौड़ में भागते मां-बाप के पास बच्चों के लिए वक्त की कमी तो नहीं, जो बचपन में ही व्यक्तित्व में चन्द धतूरे बो देती है? व्यस्त पति-पत्नी के छोटे आधुनिक परिवारों में अपनों का पूर्णतः अभाव तो नहीं ? आज कुछ ही भाग्यशाली ऐसे बच्चे होंगे जिन्हे (मां-बाप नहीं तो दादा-दादी तो हैं, उनकी बात सुनने को) एक ऐसा सुरक्षित और आश्वस्त शैशव मिल पाता हो! समाज ही नहीं परिवारों का ढांचा भी तो कमजोर पड़ता दिख रहा है और हर छोटी-बड़ी फूंक पर ताश के घर जैसा हिलने लग जाता है।
चन्द सफल व्यक्तित्व और परिवारों की बात छोड़ दें, तो आंकड़ों के अनुसार भारत की 86 प्रतिशत जनता आज भी, इतनी आर्थिक प्रगति के बाद भी, जीवन की बुनियादी जरूरतों ' रोटी, कपड़ा और मकान ' से ही जूझ रही है, मंहगी कीमतों और भ्रष्ट जननायकों से त्रसित है।
हर क्षेत्र में, हर कुर्सी पर ' जब तक जमे रह सको, जमे रहो ,' मानो एक परंपरा-सी हो गयी है। क्या इसमें दोनों पीढ़ियों का स्वार्थ आड़े आ जाता है? क्या वजह है कि पिछली पीढ़ी अपनी ही अगली पीढ़ी पर पूरी तरह से विश्वास और भरोसा नहीं कर पाती, उनकी काबलियत को पहचान नहीं पाती? कहीं यह मात्र ताकत (छोटी या बड़ी..परिवार, समाज , देश जहां भी) की लिप्सा तो नहीं, जो मरते दम तक रोके रहती है, चाहे जिम्मेदारियों निभ पाएं या नहीं और तब असंतुष्ट व्यक्ति जब देर-सबेर अपने गन्तव्य तक पहुंचता है तो वह भी वही करने पर मजबूर हो जाता है जो उसके बड़ों ने किया था?... कब टूट पाएगा यह कुचक्र...यह कुर्सियों की आपाधापी?
जहां नीव ( बढ़ते बच्चों या आनेवाली पीढ़ियों ) और छत ( परिपक्व पीढ़ी) दोनों की ही देखभाल न हो पाए, या भ्रमित और कमजोर हो तो मात्र सशक्त दीवारों की सामर्थ कहां कि एक सुरक्षित और सुचारु...आरामदेह घर बना पाएं ! समाज में युवाओं के कई कर्तव्य और जिम्मेदारी हैं, तो कुछ बुजुर्गों की भी। अक्सर ही जोशीला और नादान कहकर युवाओं की हर बात, हर मांग को बिना सुने ही ठुकरा दिया जाता है। एक स्वस्थ समाज में युवाओं का सहारा होना चाहिए। लाठी सिर्फ लाठी होती है, उसका उपयोग सिर फोड़ने के लिए होगा या सहारा लेकर चलने के लिए, यह उपयोगकर्ता पर ही निर्भर करता है। यह बात ज्ञान और ताकत पर जितनी लागू होती है, उतनी ही युवाओं पर भी । न सिर्फ युवाओं को पिछली पीढ़ियों का सारा ज्ञान और अनुभव उपलब्ध है, अपितु यौवन की स्फूर्ति और बल है इनके पास। फिर क्यों अधिकांशतः स्थिति और परिस्थितियां इतके विपरीत ही रहती है...क्यों इनकी प्रगति के मार्ग जबतक रख पाएं अवरुद्ध ही रखे जाते हैं। पढ़-लिखकर भी भटकन और बेकारी ही मिले, यह बात युवाओं के लिए ही नहीं, समाज के...देश के...यहां तक कि विश्व के स्वास्थ तक के लिए भी हानिकारक और असंतोषजनक है । इस युवा शक्ति का सही मार्गदर्शन और समाज में सही और संतोषजनक समन्वय, यह परिवार की जिम्मेदारी तो है ही पूरे मानव-समाज की भी।
क्या कभी सोचा है हमने कि क्या वजह है कि भविष्य को तलाशते युवा अपने स्रोत को पीछे छोड़ नदी-से इतनी दूर क्यों चले जाते हैं कि लौटना संभव ही नहीं हो पाता ... पलटकर देखना तक नहीं चाहते वे? ...कहीं कुछ तो ऐसा है जिसके लिए संघर्ष जरूरी हो जाता है, अपनों से कटना जरूरी हो जाता है? कहीं हमारी पूरी प्रणाली, पूरी सोच में ही तो बेइन्तिहां स्वार्थ नहीं भर गया, जहां हर व्यक्ति अपने को इतना अकेला और असुरक्षित महसूस करता है कि खुद से इतर सोच ही नहीं पाता... भूले-भटके जो सोचता भी है, तो जीवन की दौड़ में जिम्मेदारियों के बोझ से दबा पीछे खड़ा रह जाता है...बेवकूफ समझा जाता है... उपहास व तिरस्कार का पात्र बनता है? ये चन्द कुछ ऐसे नैतिक और सामाजिक सवाल हैं जिनके हल हमें ढूंढने ही होंगे। जब तक यह सामंजस्य नही होगा कोई लड़ाई, कोई अपराध, किसी असंतोष से मानवता छुटकारा नहीं पा सकती... न लाठी बरसाकर और ना ही श्रवण कुमार और मर्यादा पुरुषोत्तम राम जैसे पुत्रों का दृष्टांत देकर। इरादों की सच्चाई और खुलासा, आज भी स्वास्थ के लिए उतने ही जरूरी है, जितने कि ताजा हवा, पानी, धूप या पौष्टिक भोजन। प्रायः अविश्वास से ही हर दुरूहता और विघटन का जन्म होता है, जैसे कि निश्चल विश्वास से सृजन और जीवन का ! हाल ही में एक कविता पढ़ी थी, उद्ध्रत करना चाहूंगी। जो कहना चाह रही हूं शायद और स्पष्ट हो पाए। जैसे वृद्धावस्था सहारा मांगती है, युवाओं को भी पंख और खुला आकाश चाहिए ही संभावनाओं और आकांक्षाओं के विस्तार के लिए, सामर्थ या परों की ताकत मापने और जानने के लिए और उनके लिए नेपथ्य में नहीं, मंच और मुख्य सभागार में जगह बनाना समाज की जिम्मेदारी है, समाज के कर्णधारों की जिम्मेदारी है। परिवार के बुजुर्गों का दायित्व है। कर्तव्य और प्यार के नाम पर ही चौबीसों घंटे बांधकर नहीं रखा जाना चाहिए उन्हें। पिंजरों में तो पक्षी तक खुश नहीं रह पाते ;
आदमी ने ईजाद किया पिंजरा पंखों से पहले और अब पिंजरों में गाते हैं पंख गीत स्वतन्त्र उड़ान का
जबकि पिंजरों के सामने गाते हैं पंखहीन पिंजरों के न्याय के गीत
पक्षी और पिंजरा गा सकते हैं एक साथ लेकिन उड़ नहीं सकते
उड़ सकते हैं एक साथ सिर्फ़ पंख और आकाश ही
-विचिस्लाव कुप्रियानफ़ ( अनुवादःअनिल जनविजय)
बात सिर्फ इतनी ही है कि प्यार और अपनेपन के साथ; दिशा मार्ग तो हो, पर उन्मुक्त उड़ान और राहें चुनने की पूरी स्वतंत्रता भी। जीवन और गीत, दोनों तभी कर्णप्रिय हो सकते हैं। हर उम्र की अपनी समस्याएँ होती हैं, सामंजस्य होते हैं, इनसे निबटकर ही तो आदमी कर्तव्य निभा पाता है। अस्वस्थ मन किसी के काम का नहीं...न व्यक्ति के, न परिवार के और ना ही समाज के ।
कहीं यही कारण तो नहीं कि आज पूरा पारिवारिक और सामाजिक ढांचा ही चरमरा रहा है। बूढ़े मां बाप तो अवसादग्रस्त और असंतुष्ट हैं ही, खुद युवा भी दिशा हीन और भ्रमित है...क्रुद्ध और असंतुष्ट हैं। एकतरफ बेकारी और दूसरी तरफ धोखाधड़ी... जीवन में उपयुक्त नौकरी या मौकों की कमी ने युवाओं का धैर्य तोड़ रखा है और उनके मन में वर्षों से चले आ रहे सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों तक पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं। आज सदियों से चली आ रही ( कम-से-कम भारतीय संस्कृति में तो अवश्य) विवाह संस्था और संयुक्त परिवार जैसी सोचों पर भी युवाओं की आस्था डगमगा रही है, पर दांत में फंसे तिनके से ये कुछ ऐसे आपद संशय और सवाल हैं, जिन्हें हर संभव समझना और दूर करना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी और प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी सद्भाव और सामंजस्य यात्रा का एक छोटा-सा पग है लेखनी का यह अंक, उम्मीद है आप सब( युवा और वृद्ध) साथ-साथ हैं और एक दूसरे को सुन व समझ रहे हैं... साथ निभा रहे हैं।...
खुश हूँ मै बहुत आज मेरे क़दमों तले है ये जहाँ आज क्यों? क्यों की मै आपने देश जा रहा हूँ २० साल का था जब आया था यहाँ आज २० साल बाद जा रहा हूँ मै अपने देश जा रहा हूँ ख़ुद को झकझोरता हूँ टिकट को बार बार देखता हूँ फ़िर भी यकीं नही कर पा रहा हूँ क्या सच मै अपने देश जा रहा हूँ पगला मन मयूर बिन पंख उड़ रहा है अपनो से मिलने की चाह मे बेचैन हो रहा है इस अटैची मे बंद है उनकी फर्माहिशे,चाहतें मेरी खुशियाँ और आहटें बस यही समान अपने संग लिए जा रहा हूँ मे अपने देश जा रहा हूँ जहाज से नीचे देखा तो गाडियाँ और बत्तियाँ छोटे होते जा रहे थे और मै बड़ा होता जा रहा था जहाज की गति तो मालूम नही पर मन बहुत तीव्र गति से भाग रहा था सोच रहा था माँ ने क्या क्या बनाया होगा बाबू जी कैसे मिलेंगे भाई क्या कहेंगे दोस्तों के क्या हाल होंगे एसे ही बहुत से ख्यालों मे उलझा मन देश की गलियों मे दौड़ने लगा ऐ मेरे देश मै आ रहा हूँ देश से मिल के लगा सब कुछ बदल गया है तभी चाय और पकौडों की महक से लगा की कुछ तो है जिस को अब भी मै पहचानता हूँ घर पहुँचा देखा के ये तो पूरा सजा था आपनो से भरा था पिता ने बढ़ के गले लगाया भाइयों ने प्यार जताया माँ ने ,दुआओं का खजाना लुटाया फ़िर ध्यान से घर देखा तो रह गया हैरान घर बन गया था अलीशन कर रहे थे नौकर हर काम ठाठ देख यहाँ के खुश हो रहा था पर मन ही मन अपने बारे मे भी सोच रहा था पैसे कमाने की धुन मे दिन रात काम करता रहा रातों को जगता दिन मे पढता रहा हो बुखार या बदन मे दर्द गरम दिन हो या रातें सर्द मुझे तो सिर्फ़ काम करना था माँ बाबु जी को पैसे जो भेजना था फेर के सिर पे हाथ माँ बोली क्या सोच रहे हो खाना तो खा नही रहे हो मेरी पसंद का सब कुछ बना था मुझ को हर कोई बड़े प्यार से खिला रहा था बातें इनकी प्यार भरी दिल मे उतर गई सूखी थीं जो अंखियाँ वो आज छलक गई सच मे आपनो के बीच आ गया हूँ सोचता रहा रात भर क्यों न यंही बस जाऊँ रहूँ इसी घर मे काम मे भाइयों का हाथ बटाऊं सुन के मेरी बात सभी खुश हो जायेंगे बढ़के मुझको गले लगायेंगे सुबह खुशी खुशी , जब सब को आपना निर्णय बताया भाइयों के चेहरे पे तो , हवाईयां उड़ता पाया पिता को थूक निगलता पाया अरे ये क्या किस्सा है इस जायजाद मे तुम्हारा कहाँ कोई हिस्सा है ये घर,खेत, जमीं हमने आपनी मेहनत से बनाया है पैसे जो भेजे थे आप ने माँ बाबु जी की सेवा मे लगाया है हर कोई उठ के वहां से चला गया मे अकेला बैठा रह्गाया बातों से उनकी हैरान हो रहा हूँ क्या सच मै अपनो के बीच आगया हूँ माँ तुम ही कहो क्या कुछ ग़लत कहा था इस घर मे एक कोना और जमीं का एक टुकडा ही तो माँगा था क्या मेरा अब इतना भी अधिकार नही तुम सभी के साथ मेरा रहना किसी को स्वीकार नही चुप थी माँ आंसू उसके बहते रहे मेरे हर सवाल का जवाब देते रहे आज मै वापस जा रहा हूँ भरे हाथ आया था , खाली दामन जा रहा हूँ छोड़ने कोई बाहर तक भी ना आया माँ ने दुआओं का आँचल फ़िर लहराया यही थे वो आपने जिनके लिए मै देश आया था हाँ मै अपने देश आया था -रचना श्रीवास्तव
य़ुवा, युवक, नौजवान, यंग आदि समानार्थी शब्द हैं, जिनका प्रयोग दैनिक जिन्दगी और दैनिक तथा साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाओं के लेखों, संगोष्ठियों के आयोजन पर होता है। इन लेखों, व्याख्यानों में युवा के प्रति चिन्ता होती है। उसकी दशा-दिशा पर प्रकाश डाला जाता है। सुझाव दिए जाते हैं। यह लेख भी उसी श्रंखला का अँग है। युवा वास्तव में वैश्विक-मंच पर भावी भविष्य हैं; जिनके माध्यम से, प्रतिभा से देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में समान रूप से विकास किया जा सकता है। वे देश-विदेश के भावी प्रधानमंत्री, उद्योगपति, वैज्ञानिक, यांत्रिक, कलाकार आदि हैं। भविष्य इनपर आँखें गढ़ाए रखता है-भावी संभावनाओं की संपूर्ति के लिए। वास्तव में युवा-प्रतिभा तथा शक्ति में असीम विकास की संभावनाएं विध्यमान रहती हैं। उनमें ' कर गुजरने ' की तीव्र लालसा होती है और उसी लालसा और इच्छा से प्रेरित होकर बड़े-से-बड़े कार्य कर देते हैं, जिनकी कल्पना तक नहीं कर पाते हैं। उन्ही की प्रतिभा और ' कर गुजरने ' की उत्कट इच्छा से वैश्विक-धरातल पर सभी क्षेत्रों में विकास हुआ है, हो रहा है और होता रहेगा। ऐसे विशिष्ट वर्ग के संबंध में सोचना-विचारना और चिंता करना नितांत आवश्यक है।
आज के परिवेश में विश्व के छोटे-बड़े, विकसित-अविकसित तथा अर्धविकसित देश विकास करने की प्रति स्पर्धा में लगे हुए हैं। जो विकसित हैं वे और विकास करना चाहते हैं; जो अविकसित हैं वे अर्धविकसित की श्रेणी में आना चाहते हैं तथा अर्धविकसित विकसित की श्रेणी में। इन किसी की प्यास/पिपासा तृप्त नहीं हुई है। यह पिपासा तृप्त होनी भी नहीं चाहिए; इसलिए भी अगर पिपासा तृप्त हो जाएगीतो भावी विकास और अनुसंधान समाप्त हो जाएंगेतथा हम उन तथ्यों, तत्वों, स्वरूपों आदि को आलोक में नहीं ला पाएंगे ; जिन्हें आलोक में लाने की आवश्यकता है। इसका मूलाधार युवाओं की ज्ञान-प्रतिभा, शारीरिक शक्ति, आत्मविश्वास पारदर्शिता आदि हो सकती है। इतिहास-पुराण आदि के पिछले पन्ने पलटने पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जैसा कुछ कहा गया भी है कि जितने विश्व में महान कीर्तिस्तंभ स्थापित हुए हैं, उनके पीछे युवा-शक्ति ही थी। भारतीय मनीषी और योद्धाओं में कृष्ण, अर्जुन, गौतम बुद्ध, एकलव्य, विवेकानन्द, शंकराचार्य, चाणक्य, चंद्रगुप्त, अशोक, अकबर, टीपू सुल्तान, झांसी की रानी, नूरजहां, झलकारी बाई हुईँ और हुए हैं। विश्व में वाशिंगटन, न्यूटन, मेडम क्यूरी, गोर्की, चेखव, आदि नव युवाओं ने कीर्तिमान स्थापित किए थे। उन्हें उनकी प्रतिभा के कारण आज भी स्मरण किया जाता है और किया जाता रहेगा। इन विबूतियों ने अपने महान कार्यों से इतिहास के पन्नों को उज्ज्वलता प्रदान की थी; जिससे देश-विदेश के मस्तक को ऊँचा करने के साथ, विश्व-मानवता का सिर ऊँचा किया था। युवा-प्रतिभा और शक्ति में वह उर्जा है, जो वृद्धावस्था में नहीं पाई जाती है। इसीलिए उन पर घर-परिवार, कुटुम्ब, नगर, प्रांत, देश आदि के निवासियों की नजर रहती है, जिस प्रकार चातक की स्वाति पर।
वर्तमान में युवाओं की इस भौतिकवादी चमक-दमक, चकाचौंध में क्या स्थिति-मनःस्थिति है? इसका सिंहावलोकन करना, उस पर गंभीरता से सोचना-विचारना और उसके अनुसार उसके संबंध में व्यवहार करना आज का महत्वपूर्ण विषय है। आज के देश-विदेश के चिंतक, विचारक, समाजशास्त्री, मनोवेत्ता आदि अपने-अपने ढंग से, प्रयोग आदि कर रहे हैं और उसको ग्रंथ, लेख-आलेख, व्याख्यान आदि से व्यक्त कर रहे हैं। उस पर ही संक्षेप में मैं अपने निजी विचारों को--महनीय विचारकों के विचारों, युवाओं के क्रिया-कलाप, सोच और आधुनिक परिवेश को केन्द्र में रखकर-कह रहा हूं। यह विचार न तो किसी राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रेरित हैं और न ही पूर्वाग्रह से प्रभावित।
भारतवर्ष युवा-शक्ति का धनी देश है। कल भी था, आज भी है तथा कल भी रहेगा। कल भारत युवा-शक्ति संपन्न था--इस एक आधार से भी भारत को 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। फलतः विदेशी आताताइयों की दृष्टि भारत वर्ष पर थी और उनने मौका लगते ही युवा-शक्ति का प्रयोग कर भारतवर्ष का शोषण भी किया था। इतिहास इसका साक्षात् गवाह है। स्वतंत्रता से पूर्व भारतवर्ष की दशा शोषण के कारण पूर्णतः विकृत हो गयी थी, दयनीय हो गयी थी। इससे देश-विदेश के जन सुपरिचित हैं।
आजादी के बाद देश की युवा-शक्ति ने पुनः विकास किया है और विश्व में अपनी प्रतिभा का परचम फहराना प्रारंभ कर दिया है। इसके अनेकशः साक्ष्य हैं, जिन्होंने विश्व-मंच पर अपने कीर्ति-स्तंभ स्थापित किए हैं जैसे--कल्पना चावला, बछेन्द्री पाल, बॉबी जिन्दल, राकेश शर्मा, आनन्द, सानिया मिर्जा आदि अनेकशः। भारतीय हिन्दी साहित्यकारों में- ऊषा प्रियंवदा, मन्नू भंडारी, मेहरून्निसा परवेज, कमलेश्वर, राकेश, शिवप्रसाद सिंह, रेणु आदि हैं; जिन्होंने स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
देश में शिक्षा का प्रसार, औद्योगिक विकास, वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रसार पर विशेष बल, स्वतंत्रता बाद देश को विकसित करने के लिए दिया गया। इसके लिए देश की युवा प्रतिभाओं ने देश को विकसित करने के लिए ज्ञानार्जन किया, किंतु मुद्रा राक्षस की मायावी चमक-दम ने इन्हें एब्रौड जाने के लिए आकर्षित किया। इस आकर्षण से प्रेरित होकर युवा-प्रतिभाओं ने तेजी से विदेश जाना प्रारंभ किया।इसके लिए विदेशी राष्ट्रों ने उन्हें अपने देश की उन्नति और प्रगति के लिए भौतिक लाभ देने प्रारंभ किये। इसके माध्यम से विदेशी राष्ट्रों ने भारतीय युवा-शक्ति का भरपूर उपयोग लाभार्जन के लिए किया। साथ ही उन्होंने उन राष्ठ्रों की नागरिकता प्राप्त कर ली। इस संदर्भ एवं प्रसंग में यह कहना चाहूंगा कि स्वतंत्रता के पहले बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के विपन्न भारतीय युवा रोटी-रोजी के लिए ब्रिटिश जलयानों( पानी के जहाज) पर चढ़कर सूरीनाम, मारीशस आदि स्थानों पर गये थे और उन्होंने तन-मन, बुद्धि-विवेक, शारीरिक बल तछा मानसिक प्रतिभा से उन स्थानों की सूरत ही बदल दी थी, वर्तमान में वे वहीं के हो गये हैं। वे विवशता और अनिच्छा से गये थे, किन्तु स्वतंत्रता के उपरांत युवा-प्रतिभा स्वेच्छा से बाहर जा रही है। दोनों स्थितियों में भारतकीय-युवाओं का लक्ष्य रहा है धनार्जन करना पर दोनों में यह समानता होने पर भी एक अन्तर था-वह यह-स्वतंत्रता पूर्व युवाओं ने जैसा कहा जा चुका है-विवशता, अनिच्छाकिंतु जीवन-यापन के लिए घर-परिवार छोड़ा था। घर छोड़ने के बाद भी उनमें घर लौटने की छटपटाहट रही थी: किंतु किंतु स्वातंत्र्योत्तर भारतवर्ष की जनता अकूत धनार्जन के लिए विदेश जा रही है।
भारतीय युवाओं के विदेश जाने के पार्श्व में उच्च शिक्षा प्राप्त करना भी रहा है। नई-से-नई तकनीक, वैज्ञानिक, औद्योगिक शिक्षा, तथा ज्ञानार्जन के लिए भारतीय युवा बाहर जा रहे हैं। भारतवर्ष में अभी प्रयोगशालाओं का वैसा विकास नहीं हुआ है, जैसा उन्नतिशील देशों में पाया जाता है। इसलिए और इसके लिए भारतीय युवा विदेश गमन कर रहे हैं। शिक्षा-ग्रहण करने के उपरांत उन्हें वहां सम्पूर्ण सुख-सुविधाओं के साथ ऊंचे वेतनमान अथवा अच्छी धनराशि का कान्ट्रेक्ट मिल जाता है। फलत- वे और उनकी भावी संतानें वहीं की हो जाती हैं। यह भारतवर्ष के लिए शुभ-संकेत नहीं है। परिशीलन से ज्ञात होता है कि यह भारतीय युवाओं की दिशा-दशा की एक तस्बीर है; जिसे प्रत्येक भारतीय नागरिक एहसास कर रहा है। आँकड़ों से भी पुष्टि होती है कि स्वतंत्रता के बाद बहुत बड़ी संख्या में भारतीय युवक विदेशों में जाकर स्थाई रूप से बस गये हैं। यह 'जाना' रुका नहीं है, अस्तु और भी श्रेष्ठ युवा प्रतिभाओं की विदेश जाने की संभावना बनी हुई है।
भारतीय युवा-प्रतिभा की एक अन्य तस्बीर कुंठा, हताशा घुटन आदि के माध्यम से दिखाई देती है। भारतीय युवाओं के बहुसंख्यक तबके की, पढ़ने और कुछ करने की तीव्रतर इच्छा है, किंतु उनके पास साधनों का अबाव है।इन साधनों में सबसे बड़ा साधन धन की कमी है, जिसके कारण वे अच्छे स्कूल, कालेज से शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते हैं। उन्हें नहीं सीख पाते हैं, जिन्हें सीखकर वे अपनी प्रतिभा का सही उपयोग ' कुछ नया-से-नया करने में' कर सकते हैं। पर देखा यह गया है कि कुछ कर दिखाने की प्रतिभा रखने वाले यह युवक धनाभाव की मार से कुछ कर नहीं पाते हैं। उनकी दशा उस पौधे के समान होती है, जो पानी के अभाव और तेज ताप से, समय से पहले मुरझाकर सूख जाते हैं। इससे वे मन-ही-मन कुंठित होते हैं। हताशा का अनुभव करते हैं। वे भीतर-ही-भीतर बर्फ के टुकड़े के समान गलने लगते हैं। असहनीय स्थिति में वे अर्धविक्षिप्त हो जाते हैं, पागल हो जाते हैं और अंत में आत्महत्या कर लेते हैं। इस कार्य के क्रियान्वन के पीछे घर के ताने और उपेक्षा भाव भी होता है। यह स्थिति न बनने पर दूसरी स्थिति बन जाती है। वे पथभ्रष्ट होकर अनैतिक कार्य जैसे छीना-झपटी, चोरी-चपाटी आदि करने लगते हैं। इस स्थिति का प्रकाशन दैनिक समाचार-पत्रों में रोज ही देखने को मिलता है। कहने का आसय यह है कि सही दिशा न मिलने पर युवाओं की दशा इस स्थिति तक पहुंच गई है। इसका जिम्मेदार कौन है? यह सोचना और उसका निदान करना समाज-सेवियों बुद्धिजीवियों, राजनेताओं का कार्य है।
युवा-प्रतिभा के हनन और पतनोन्मुख होने का एक और कारण यह भी है। सर्वविदित है और मनोवेत्ताओं का कहना है तथा मानना है -प्रत्येक व्यक्ति की रुचि भिन्न होती है, बिल्कुल पांचों उंगलियों के समान भिन्न, एक दम भिन्न एवं उनका कार्य भी भिन्न होता है, किन्तु इस भिन्नता के बाद पांचों मिलकर विकास, उत्थान या पतन का काम करती हैं। समाज में ही देखा गया है और आसानी से देखा जा सकता है -बच्चा होने के पूर्व से ही तथा बच्चा होने के बाद माता-पिता अपनी-अपनी इच्छानुसार बच्चे को बनाने का मन बना लेते हैं और उसे उसी रूप में देखने के लिए उसी प्रकार के विषय पढ़ाने की योजना बनाते हैं। माता-पिता की भिन्न रुचि होने पर बच्चे को बनाने में पहला द्वन्द्व माता-पिता में चलता है। बड़े होने पर बच्चे की रुचि एवं इच्छा माता-पिता की आकांक्षा से अलग होने पर दूसरा द्वन्द्व त्रिकोणात्मक माता-पिता-बच्चे में चलता है। इस स्थिति में बच्चे के मौलिक प्रतिभा के विकास में अवरोध उत्पन्न होता है। अगर बच्चे की इच्छानुकूल कार्य नहीं होता तो बच्चा माता-पिता के लादे गये विचार का विरोध करता है तथा बच्चे द्वारा चयनित विषय को पढ़ने पर, माता-पिता का विरोध, उलाहना उसके मौलिक विकास में बाधक होता है। इससे बच्चे की मौलिक प्रतिभा समाप्त हो जाती है। इस दृश्य को बनाने के पीछे त्रिकोणात्मक या त्रिआयामी भिन्न दृष्टि ही होती है। इस स्थिति से भारतीय युवा-शक्ति और युवा प्रतिभा जूझ रही है।
तकनीकी, औद्योगिक, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक, जैविक, वानस्पतिक, यांत्रिक, जलीय, नाभिकीय आदि अनेकानेक क्षेत्रों में नये-नये अनुसंधान हो रहे हैं। उनका गहन, सूक्ष्मतम ज्ञानार्जन के लिए अनेक विषयगत शाखाएँ-प्रशाखाएँ हो गयी हैं, जिनका सूक्ष्मतम अध्ययन कराया जाता है। इनमें विशेषता प्राप्त करने के लिए युवा-प्रतिभाओं में प्रतिस्पर्धा है। स्थान कम हैं युवा-प्रतिभाओं की संख्या अधिक। प्रतिस्पर्धा के इस युग में युवाओं में कैरियर बनाने की भावना, उनके सीने के केन्द्र में होती है, वास्तव में होनी भी चाहिए; जिससे ' कुछ होने' का विचार साकार होना संभव है। भारतीय युवा संबंध में सक्षम है, वह निरंतर विषय की शाखाओं की प्रशाखाओं में , विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए, प्रतिस्पर्धा में प्रतिस्पर्धी के रूप में शामिल हो रहा है। कहा जा चुका है, इसके पीछे कैरियर बनाने और कुछ कर गुजरने की भावना उन्हें प्रेरित कर रही है। यह भावना युवक के हित में होकर, देश हित में भी है और मानवता के हित में भी। यह युवा-प्रतिभा की दिशा और दशा अनेकानेक आयामों को विकसित करने में उपयोगी होगी।
कुल मिलाकर यहां युवा-प्रतिभा की दशा-दिशा के संबंध में संक्षिप्त में विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त भी दशा-दिशा के और आयाम हो सकते हैं; जिन पर युवा प्रतिभा का विकास किया जा सकता है और उपयोग में अभिवृद्धि। देश के विकास और मानवता की रक्षा के लिए युवा शक्ति का विशेष महत्व है।
मूत और गोबर की सारी गंध उठाए हवा बैल के सूजे कंधे से टकराए खाल उतारी हुई भेड़-सी पसरी छाया नीम पेड़ की। डॉय-डॉय करते डॉगर के सींगों में आकाश फँसा है।
दरवाज़े पर बँधी बुढ़िया ताला जैसी लटक रही है। (कोई था जो चला गया है) किसी बाज पंजों से छूटा ज़मीन पर पड़ा झोपड़ा जैसे सहमा हुआ कबूतर दीवारों पर आएँ-जाएँ चमड़ा जलने की नीली, निर्जल छायाएँ।
चीखों के दायरे समेटे ये अकाल के चिह्न अकेले मनहूसी के साथ खड़े हैं खेतों में चाकू के ढेले। अब क्या हो, जैसी लाचारी अंदर ही अंदर घुन कर दे वह बीमारी।
इस उदास गुमशुदा जगह में जो सफ़ेद है, मृत्युग्रस्त है
जो छाया है, सिर्फ़ रात है जीवित है वह - जो बूढ़ा है या अधेड़ है और हरा है - हरा यहाँ पर सिर्फ़ पेड़ है
चेहरा-चेहरा डर लगता है घर बाहर अवसाद है लगता है यह गाँव नरक का भोजपुरी अनुवाद है।
संसद से सड़क तक
मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
घर में वापसी मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिये हैं।
पिता की आँखें... लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं। बेटी की आँखें... मंदिर में दीवट पर जलते घी के दो दिये हैं।
पत्नी की आँखें, आँखें नहीं हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं। वैसे हम स्वजन हैं, करीब हैं बीच की दीवार के दोनों ओर क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं। रिश्ते हैं, लेकिन खुलते नहीं हैं। और हम अपने खून में इतना भी लोहा नहीं पाते कि हम उससे एक ताली बनाते और भाषा के भुन्नासी ताले को खोलते रिश्तों को सोचते हुए आपस मे प्यार से बोलते
कहते कि ये पिता हैं यह प्यारी माँ है, यह मेरी बेटी है पत्नी को थोड़ा अलग करते...तू मेरी हमबिस्तर नहीं...मेरी हमसफ़र है
हम थोड़ा जोखिम उठाते दीवार पर हाथ रखते और कहते... यह मेरा घर है
रोटी और संसद
एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता हूं-- 'यह तीसरा आदमी कौन है ?' मेरे देश की संसद मौन है।
खेवली
वहाँ न जंगल है न जनतंत्र भाषा और गूँगेपन के बीच कोई दूरी नहीं है। एक ठंडी और गाँठदार अंगुली माथा टटोलती है। सोच में डूबे हुए चेहरों और वहां दरकी हुई ज़मीन में कोई फ़र्क नहीं हैं।
वहाँ कोई सपना नहीं है। न भेड़िये का डर। बच्चों को सुलाकर औरतें खेत पर चली गई हैं। खाये जाने लायक कुछ भी शेष नहीं है। वहाँ सब कुछ सदाचार की तरह सपाट और ईमानदारी की तरह असफल है।
हाय! इसके बाद करम जले भाइयों के लिए जीने का कौन-सा उपाय शेष रह जाता है, यदि भूख पहले प्रदर्शन हो और बाद में दर्शन बन जाय। और अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि सच को भी सबूत के बिना बचा पाना मुश्किल है।
सिलसिला
हवा गरम है और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का इंतज़ार कर रहा है कठुआये हुए चेहरों की रौनक वापस लाने के लिए उठो और हरियाली पर हमला करो जड़ों से कहो कि अंधेरे में बेहिसाब दौड़ने के बजाय पेड़ों की तरफदारी के लिए ज़मीन से बाहर निकल पड़े बिना इस डर के कि जंगल सूख जाएगा यह सही है कि नारों को नयी शाख नहीं मिलेगी और न आरा मशीन को नींद की फुरसत लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं इससे इतना तो होगा ही कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा और मेज़ को अपनी मेज कह सकोगे।
धूमिल की अन्तिम कविता
शब्द किस तरह कविता बनते हैं इसे देखो अक्षरों के बीच गिरे हुए आदमी को पढ़ो क्या तुमने सुना कि यह लोहे की आवाज़ है या मिट्टी में गिरे हुए खून का रंग।
लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो घोडे से पूछो जिसके मुंह में लगाम है।
अकेले टहालते हुए नीमा को लगा कि अंधेरा बड़ी तेजी से घिर रहा है। हवा में हल्की सी ठंड थी। ऐसी कि ख्यालों से ज़रा बाहर ध्यान जाए तो शरीर में सिहरन सी दौड़ जाए। फुटपाथ सुनसान सा था। सड़क पर ट्रैफिक ज्यादा तो नहीं पर तेज़ था। हर दो तीन मिनट पर एक तेज़ गाड़ी उसे तेज़ी से पार करती थी । अपनी ठीक ठाक रफतार के बावजूद नीमा को लगा कि वह पीछे छूटती जा रही है बिलकुल पीछे अकेले टहलने का यह क्रम नया नहीं है पर अकेलेपन से जो तारतम्य हो जाना चाहिए था वह अभी हुआ नहीं है। वह एक अजीब से दौर से गुज़र रही है। अजीब सा इसलिए क्यों कि जगह, परिस्थितियाँ और लोग - कुछ भी उसकी पकड़ में नहीं है। सब कुछ हवा में तैरता हुआ सा और पाँव अपनी ज़मीन पर नहीं। परदेस में बिलकुल अकेली सी है। इसीलिए इस रास्ते पर सब कुछ उसकी पहचान का होते हुए भी अजनबी सा है। सच पूछो तो शायद यही इस देश की पहचान है। लोग- भाषा - जगहें - परिस्थितियाँ सब कुछ पहचाना हुआ सा फिर भी सब कुछ अनजाना सा!
यहाँ घर बनाने कोई नहीं आया है। सबको लौट जाना है एक दिन। इस फुटपाथ के चौकोर टाइलों की तरह, जो हर चलने वाले के साथ हैं पर किसी के साथ नहीं। जो दूर तक चले गए हैं पर अपनी-अपनी सीमाओं में कैद हैं। जो आपस में जुड़े हुए हैं फिर भी अलग अलग हैं। जो यहाँ इस धरती का हिस्सा तो हैं पर हर साल बदल दिए जाते हैं।
नीमा ने झुका हुआ सिर उठाया हाथेलियों को आपस में रगड़ कर गरम किया और कोट की जेब में डाल कर लापरवाही से एक लंबी नज़र दौड़ाई। क्रीक के किनारे इस फुटपाथ पर सब कुछ महीनों से उसके साथ है, फिर यह अचानक पीछे छूट जाने का अहसास क्यों? और पीछे छूटना किस चीज़ से? क्या वह अकेलेपन से डर गई है या उसे समीर की याद सता रही है या उसके जीवन के कुछ मानदण्ड थे जो अकेला पाकर उसे डराने चले आए हैं या फिर यह समय का वह मोड़ है जहाँ उसे कुछ नया कर गुज़रना है और वह नया क्या है इसका पता न होना एक खालीपन का अहसास भरे जा रहा है उसमें।
हवा रूक गई थी। हाथों में नमी सी लगी तो नीमा ने हाथ कोट से बाहर निकाल लिए। गले में एक रेशमी स्कार्फ डाल लिया था चलते समय उसने। सर्दी उतनी नहीं थी। यह तो बस नीले कोट को थोड़ा सा रंगीन करने करने के लिए यों ही पहन लिया था। देहरादून की सर्दियों में स्कार्फ का जो मतलब होता है वो शारजाह की सर्दियों में नहीं होता। पर नीमा ना तो देहरादून से अलग हो पाई है ना ही शारजाह में मिल पाई है इसलिए सबकुछ मिलाजुला सा अनाप-शनाप सा होता ही रहता है। नीमा ने गले का स्कार्फ ढीला किया और कोट की जेब में रख लिया। कोट के बटन खोल दिए तो मौसम फिर से खुशनुसा सा लगने लगा। समंदर की हवा बालों में से होते हुए कंधे पर उड़ने लगी।
सड़क के उस पार दो बेडरूम वाले लग्जरी फ्लैट्स की भीमकाय बिल्डिंग है। इसमें नीचे स्वीमिंग पूल है, जिम है और स्पोर्टस् क्लब भी, अच्छी खासी होटलनुमा आंतरिक सज्जा है, और वैसा ही दरबान भी। इस बिल्डिंग में तीन भारतीय परिवारों को जानती है नीमा। शारजाह आते समय सबसे पहले उसका परिचय इन्हीं परिवारों से हुआ था। इनमें से चित्रा उत्तर भारतीय है। देहरादून में उसके पति शरत की पोस्टिंग समीर के साथ ही थी। वे लोग रहते भी एक ही मुहल्ले में थे। इसलिए पुरानी जान-पहचान भी है। उम्र में भी नीमा के बराबर ही होगी पर वह पिछले पाँच साल से शारजाह में है। नीमा को लगा था चित्रा से उसकी अच्छी बननी चाहिए।
आठ बजे जब समीर अफिस के लिए निकल गया तब नीमा ने चित्रा को फोन किया था और पूछा था क्या कल जल्दी सुबह क्रीक पर चलेगी टहलने। चित्रा ने अलसाते हुए जवाब दिया था,
"यार अब मैं सुबह जल्दी नहीं उठती। यह देहरादून थोड़ी है। सुबह कुछ काम नहीं रहता यहाँ। शरत सुबह खुद चाय बना कर पी लेते हैं और आफिस चले जाते हैं। लंच वहीं लेते हैं। जल्दी उठ कर क्या करूँ? मैं नौ साढ़े नौ तक उठ जाती हूँ। फिर आराम से दस ग्यारह बजे तक टीवी के सामने बैठ कर चाय पीती हूँ। बारह बजे हम सब लेडीज़ किसी एक के यहाँ इकठ्ठे होते हैं ताश के लिए। दो बजे तक अच्छा गेट टुगैदर रहता है। तेरा दिल करे तो तू भी आ जा।"
"कमाल है! कितने उत्साह के साथ हम निकलते थे देहरादून में राजपुर रोड पर सुबह की सैर के लिए और सूर्योदय के सुन्दर दृश्य को संजोए वापस लौटते थे। सब कुछ भूल गई?" नीमा ने पूछा था।
"भूली नहीं हूँ यार हर जगह की अपनी अपनी लाइफ होती है, यहाँ सोते-सोते काफी देर हो जाती है। ख़ास तौर से वीक एंड में। डिनर या पार्टीज़ चलती ही रहती हैं।"
नीमा को ताश में कोई रूचि नहीं फिर भी उसने सोचा नए लोगों से मुलाकात का यह बहाना अच्छा रहेगा और वह पहुँच गई थी चित्रा के घर बारह बज के दस मिनट पर कोई छे महिलाएं होंगी ताश मंडली में अपने अपने ड्रिंक्स के साथ। चित्रा समझ गई थी नीमा इस माहौल में नई नवाड़ी है और वह क्या पीना पसंद करेगी पूछने के लिए कमरे के दूसरी ओर बने किचेन तक ले गई थी। नीमा ने अपने पुराने बेतकल्लुफी लहज़े में कहा था, "यार यह तो अपने गले से उतरने के पहले ही बाहर आ जाएगा। कुछ ऐसा है जो शांति से अंदर चला जाए?" चित्रा हंस पड़ी थी और कोक में दो आइसक्यूब डाल कर उसको थमा दिया था।
औपचारिक परिचय के बाद वे सब बातों में लग गयीं। चालीस ग्राम के गोल्ड बार के आज के दाम से लेकर कलाबत्तू की साड़ियों तक और डेबियर के हीरों से मिकुरा मोतियों तक उनकी बातों के एक सौ एक विषयों में से कुछ नीमा की समझ में आए थे कुछ नहीं भी समझ में आए थे पर इतना ज़रूर समझ में आ गया था कि ना तो ' टेली लाइफ' और ' एमिरेट्स वुमेन' की प्रतियों से सजे चित्रा के बुक शेल्फ में नीमा को वहाँ रोक सकने लायक कुछ था न वाइन से भरे क्रिस्टल के गिलासों और ताश के पत्तों से भरी चीनी फिलिग्री की मेज में।
नीमा को लगा था कि अजीब अजीब सी गंध भरे चित्रा के इस कांच से बंद वातानुकूलित चौखाने में उसका दम घुट जाएगा। न जाने कैसे भी दो बजे तक का समय गुज़रा था और सारी औपचारिकताएं निभा कर नीमा अपने घर वापस आगई थी। बाद में किसी न किसी काम से वहाँ जाना तो हुआ पर उस चौखाने में नीमा समा नहीं पाई।
हवा शायद कुछ तेज़ थी। नीमा ने कोट के बटन फिर से बंद कर लिए। काफी रास्ता तय हो चुका था। एक तरफ क्रीक के किनारे-किनारे यह लम्बा फुटपाथ बना है टहलने वालों की सुविधा के लिए और सड़क के दूसरी ओर कई तरह की बहुमंज़िली इमारतें हैं। अलग अलग तरह के छोटे और बड़े बंगलों के झुंड भी हैं। इन्हें विला कहते हैं यहाँ पर। थोड़ी- थोड़ी दूर पर सड़कें अंदर की ओर जाती हैं और अलग- अलग मुहल्लों की ओर रास्ता बनाती हैं।
सड़क के दूसरी ओर दूसरा मोड़ दिखाई देने लगा था।
यहाँ से बड़े विला शुरू होते हैं। जिसमें ज्यादातर यूरोपीय या अमेरिकी लोग बसते हैं। समीर ने इस जगह का नाम 'अंधेर नगरी' रखा था। इसकी एक ख़ास वजह थी। तमाम बड़ी इमारतों के बावजूद रोशनी काफी कम रहती थी इन घरों में। अरबियों की तरह ये अपनी ' बाउन्ड्री वाल' पर सारे लैंप जला कर नहीं रखते।
"उन्हें बिजली की किफायत पसंद है", नीमा ने कहा था एक बार।
"नहीं साले सब फ्रस्ट्रेटेड प्राणी हैं, समीर बोला था, "इनकी बिजली का खर्च तो अरबी ही उठाते होंगे। ये तो भीतर के किसी अंधेरे कमरे में दारू पीते औंधे पड़े होंगे।"
बड़े बड़े घरों में अकेले रहते हुए बहुत ही कम गोरे लोगों के परिवार साथ में हैं। मौसम अच्छा हो तो अक्सर इन्हें दुबई के पबों में वीकएंड पर सैलानी महिला मित्र मिल जाते हैं, और गुरू शुक्र को इन बड़े बंगलों के बगीचो में अलाव और बारबेक्यू का धुआँ दिख जाता है। गुरु-शुक्र सप्ताहांत होते हैं अरबी दुनिया में। सप्ताह के बाकी दिनों यहाँ ज्यादातर अंधेरा ही छाया रहता है। अंधेर नगरी का यह अंधेरा भी नीमा की चहलकदमी का एक हिस्सा है।
वैसे तो इस शहर की बहुत सी चीज़ों में हिस्सेदारी है नीमा की। पर वे हिस्से अजीब तरह के चौखानों में बंद में हैं फुटपाथ के चौखानों की तरह। एक चौखना नीमा का कम्प्यूटर भी है। जो देश, भाषा और जाति की तमाम लकीरें के पार कर गया है बहुत बार।
नीमा अच्छी तरह पहचानती है यहाँ से भीतर जाने वाली सड़क के बाद चौथे बंगले में मार्क रहता है। मार्क मक्लीन जो बोआविस्ता के नाम से आई सी क्यू पर मिल गया था एक दिन। जैसा उसने अपने घर का परिचय दिया, वही हरे रंग का गेट, हल्के गुलाबी बोगेनविला का फूलों से भरा हुआ घना झाड़। वही सफेद फोर व्हील ड्राइव मित्सुबिशी पजेरो एस एच जे ६३६३, जिससे इस घर को अच्छी तरह पहचाना जा सकता है। मार्क इंजीनियर है एक तेल कंपनी में। उसकी पुर्तगाली पत्नी अर्कीटेक्ट है, जो ज्यादातर पुर्तगाल में ही रहना पसंद करती है। भाषा की समस्या की वजह से उसे यहाँ काम करने में दिक्कत होती है।
"नैनी ने कभी ठीक सी अंग्रेज़ी नहीं सीखी, एक बार मार्क ने बताया था, "शायद इसलिए कि मेरी पुर्तगीज़ काफी अच्छी है और ब्रिटेन में शादी के बाद कभी रहना हुआ ही नहीं।" उसकी पत्नी का नाम नैनी है।
मार्क से नीमा की मुलाकात आई सी क्यू पर हुई थी। फिर दोस्ती सी हो गई। कम्प्यूटर पर ही। घंटों बातें की। दक्षिण अफ्रीका के जंगलों के बारे में, प्राइवेट आर्मी के बारे में और माइथोलोजी के बारे में।
"क्या आपने भारतीय माइथोलोजी पढी है," नीमा ने एक बार बात खिड़की पर पूछा था।
नहीं, मेरी रुचि रोमन माइथोलोजी में थी। ज्यादातर वही पढ़ी। मुझे देवताओं के चरित्र बड़े रोचक लगते हैं, मार्क ने जवाब लिखा था।
"भारतीय माइथोलोजी पढ़ने की कोशिश नहीं की, हाँलाँकि ग्रीक माइथोलोजी भी काफी पढ़ी हैं। कई देवी देवता एक से हैं दोनों में और कुछ अलग। जो एक से हैं उनमें भी कुछ भिन्नताएं हैं। मार्क ने बताया था।
"पर मुझे किसी भारतीय से भारतीय माइथोलोजी के बारे में जानकर खुशी होगी, " मार्क ने आगे जोड़ा था। बस फिर क्या था बात चल निकली थी- अथीना, ओडिन और ज्युपिटर से लेकर आदिशक्ति, कार्तिकेय और बृहस्पति तक घंटों लंबी बातों में दोनों ने किसी किताब से कहीं ज्यादा जानकारी हासिल कर ली थी शायद।
एक बार उसने सफेद पजेरो एस एच जे ६३६३ को इस घर के सामने स्र्कते देखा था और लगा था कि उसमें से कोई अंग्रेज बाहर आएगा पर उसमें से कोई भारतीय या पाकिस्तानी बाहर आया था। उसने मोबाइल से बात की थी, थोड़ी देर गेट के बाहर इंतज़ार किया था, शायद रिमोट संचालित दरवाज़ा किसी ने अंदर से खोला था और पजेरो अंदर चली गई थी।
ठीक, नीमा को याद आया, कल ही बात करते हुए मार्क ने बताया था कि रात को रेगिस्तान में सफर करते हुए उसकी गाड़ी रेत में फँस गई थी। न उसके पास मोबाइल था और न कोई साथी, अभी सीज़न नहीं शुरू हुआ था और रेगिस्तान भी सुनसान था। उसे अकेले अपनी गाड़ी रेत से बाहर निकालते ४ घंटे लगे थे और शायद गाड़ी में कुछ भारी नुक्स भी आ गए थे।
"क्या गाड़ी गैराज में छोड़ दी," नीमा ने पूछा था।
"नहीं, इतना समय नहीं था सुबह मेरे पास। कार को बाहर पार्क कर के मैकेनिक को फोन कर दिया था वह आफिस आ कर चाभी ले गया था। काम जारी होगा।" मार्क ने बताया था।
शायद मैकेनिक कार पहुँचाने आया होगा। नीमा ने सोचा था या हो सकता है कोई भारतीय मित्र हो जो मिलने आया हो।
"क्या आपके भारतीय मित्र हैं?" उस दिन नीमा ने पूछा था।
"मित्र... मित्र शब्द मेरे लिए बहुत ख़ास है...अपने रिश्तेदारों से भी ज्यादा...अपने भाई से भी ज्यादा...मैंने बहुत ही कम दोस्त पाए अपनी ज़िन्दगी़ में, मार्क ने बहुत धीरे धीरे टाइप किया था।
"ऐसे तो मेरे आफिस में बहुत से भारतीय लोग काम करते हैं। वे सब मेरे मित्र हैं पर मैं किसी के घर कभी नहीं जाता। कभी बुलाएँ तो भी नहीं। भारतीय लोग धार्मिक होते हैं। वे परिवार के साथ रहते हैं। मुझे भारतीय मैनरिज्म वगैरह का कुछ पता नहीं। साफ कहूँ तो कुछ अनकम्फर्टेबल सा लगता रहता है। मैने कभी कोशिश नहीं की किसी भारतीय से दोस्ती की। वेसे मुझे भारतीय खाना पसंद है अगर उसमें मिर्च न हो। मुझे नान भी पसंद है पर मैं भारतीय लोगों की तरह हाथ से नान नहीं खा सकता मैं क्लमज़ी लगूँगा अगर कोशिश करूँ तो। और हाँ म़ुझे एनिसीड की महक पसंद नहीं"
दोनों ने बहुत सारे एल ओ एल बनाए थे इस विवरण के बाद...एल ओ एल यानी "लाफ आउट लाउडली" यह भी उसने कंप्यूटर पर बात करते हुए ही सीखा था और यह भी कि चौखाने सिर्फ नीमा की ज़िन्दगी़ में ही नहीं हैं। ये इस देश के घट-घट में बसे हुए हैं। फर्श के चौखाने, छत के चौखाने और अलग- अलग देशों की अलग- अलग संस्कृतियों के चौखाने।
हर चौखाने के बीच सीमेंट एक दूसरे के बीच की दूरी को भरती तो है फिर भी वे दोनों अलग-अलग ही बने रहते हैं। शायद यही इस देश की पहचान है, शायद यही इस देश की संस्कृति है, शायद यही इस देश की खूबसूरती भी है। पर इस खूबसूरती को जानने के लिए अजनबीपन के जिस इंद्रजाल को तोड़ना पड़ता है उसे तोड़ने का समय और हिम्मत यहाँ बहुत कम लोगों के पास हैं। नीमा के पास भी नहीं। नीमा ने मार्क को कभी नहीं बताया कि वह भी शारजाह में ही रहती है। उसने अपने 'इन्फो' में भारत का पता भरा हुआ था। कुछ झूठ कभी-कभी सुविधाजनक रहते हैं।
पीली पटि्टयों वाली सड़क पार करने की जगह आ गई थी। नीमा ने इधर उधर ठीक से देखा और सड़क पार कर के दूसरी ओर आ गई। इस तरफ फुटपाथ के चौखाने आयताकार हैं। वर्गाकार चौखाने एक कदम में खत्म हो जाते हैं पर आयताकार चौखाने दो कदम तक साथ रहते हैं। हर दूरी ठीक-ठीक नापी हुई है नीमा के कदमों ने और यह भी कि कंप्यूटर की दोस्ती इन फुटपाथ के चौखानों की तरह एक या दो कदमों में ही खत्म हो जाती है। मार्क की दोस्ती भी कब खत्म हो गई नीमा को पता नहीं चला था।
यों तो रोज़- रोज़ एक सा काम करते हुए ऊब सी होने लगती है पर एक दिन यहाँ टहलने न आए तो नीमा को यह जगह याद आने लगती है। यह चौखानों से जड़ा साफ सुथरा फर्श जिसपर वह टहल रही है, क्रीक पर दूर तक फैली हुई नरम घास का कालीन, लाइन से जड़े काले सुनहरे लैंप पोस्टों की दोहरी कतारें, उनसे बिखरते दूधिया प्रकाश के घेरे, जहाँ तहाँ टिकीं आइस्क्रीम की वैन, दूर दूर पर बने छोटे छोटे फास्ट फूड के रेस्त्रां, रॉट आयरन की काली बेंचें और दूर पर पत्थरों की बनी मेहराब। मेहराब के पार रेत, रेत पर बड़े- बड़े काले पत्थरों का ढेर और उसपर लहरें मारता समंदर समंदर के किनारे बसा अजमान कैंपेंस्की होटल और इधर उधर टहलते उसके सैलानी सब कुछ उसकी शामों का हिस्सा बन चुके हैं। सभी कुछ अपना सा है। अजीब सी बात यह है कि यह हिस्सा कितना उसका है कितना नहीं, इसकी कोई पहचान नहीं। दोनों के बीच कोई संवाद नहीं, सिर्फ एक चुप सी है, एक अजीब सा मौन, यही एक मौन दोनों के संबंधों का आधार है।
सिर्फ इमारतें या प्रकृति ही नहीं तमाम सारे लोग जो यहाँ नीमा की तरह शाम बिताने आते हैं नीमा के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसा अचानक नहीं हो गया है एक साल से ज्यादा समय लगा है नीमा को इन्हें अपनाने में। ऐसा भी नहीं है कि इस एक साल में कुछ बदला नहीं, लोग बदले हैं, उसके देखते- देखते यह जगह रंगो रोगन से सजी- धजी जगमग हो गई है। चहल पहल भी काफी बढ़ गई है।
यहीं एक दिन थिलोका मिली थी उसे। नीमा क्रीक पर बिछी एक बेंच पर सुस्ता रही थी। अचानक किसी श्रीलंकन सी दिखने वाली लड़की ने पास बैठते हुए पूछा था कि क्या उसे घर के काम के लिए किसी 'मेड' की जरूरत है?
एक पल को नीमा झिझकी थी। पता नहीं कौन है? कैसी है? कहीं यह किसी चोर उचक्कों के गैंग से तो नहीं? फिर लगा यहाँ पर ऐसे लोगों के खिलाफ कड़े कानून हैं। नीमा कहीं बाहर काम नहीं करती है वह इस पर निगाह रख सकती है और सच पूछो तो नीमा भी अभी भारतीय तौर तरीकों से मुक्त नहीं हो पाई है। सिंक में पड़े बर्तन उसे काटने को दौड़ते हैं। एक दिन पोंछा न लगे तो नंगे पैरों में गर्द किरकती है। जिस विला में वह रहती है उसमें झाड़ू-पोंछा करना उसकी हिम्मत से बाहर की बात है। कुछ थोड़ी सी बातें कर के नीमा ने उसे अपने घर का पता व फोन नम्बर दे दिया था। 'मेड' ने अपना नाम लिली बताया था और वह अंग्रेज़ी बोलती थी।
अगले दिन ठीक समय से लिली आ गई थी। घर की कौन सी चीज़ किस तरह साफ करनी है, किस चीज़ को साफ करने में किस साबुन का इस्तेमाल करना है, किस ब्रांड के पोछे अच्छे होते हैं और कौन से लिक्विड से 'करी' के दाग अच्छी तरह साफ हो जाते हैं इस सबके विषय में उसकी जानकारी का कोई जवाब नहीं था। दो घंटो में ही उसने ऐसे- ऐसे नुस्खे चुटकियों में थमा दिए थे जिन पर शोध करते हुए नीमा दो साल में भी पारंगत नहीं हो पाई थी। उसकी सफाई और दमख़म देख कर नीमा परम प्रसन्न थी।
इतने में दरवाज़े की घंटी बजी। नीमा ने देखा कोई तीस बरस की उम्र का आदमी सामने खड़ा था। उसकी कार में दो सिंहली लड़कियाँ पीछे और एक सामने पहले से थीं। मेरी प्रश्नवाचक संदेहास्पद मुद्रा देख कर उसने हिन्दी में पूछा, "शकीला है?"
"शकीला कौन?" मैने आश्चर्य से पूछा।
लिली दौड़ कर बाहर आ गई। अपने सैंडल्स पहनते हुए सिंहली भाषा में उस आदमी से बातें करने लगी। कार में बैठी लड़कियों ने उसे हाथ हिलाया, फिर शुरू हो गई उनकी टपर टपर अपनी भाषा में। पीछे वाली लड़कियों ने खिसक कर लिली के लिए जगह बनाई और वह झट से बैठ कर फुर्र हो गई।
नीमा की समझ में आ चुका था कि ये सब ठीक लोग नहीं। दरवाज़ा बंद किया और सोच लिया कि लिली जब अगली बार आएगी उसको दरवाज़े से ही लौटा देना है, किसी हेल्प की उसे ज़रूरत नहीं। साफ सुथरा चमचमाता हुआ घर मुँह चिढ़ाने लगा था पर चौबीस घंटे बीतते न बीतते नीमा का गुस्सा शांत हो गया। सोचने लगी, एकदम से भावुकतापूर्ण निर्णय लेना ठीक नहीं। क्यों न धैर्य के साथ पूछा जाय। लिली के घर का पता लेले और पासपोर्ट के बारे में पूछ ले कि उसके पास है या नहीं। इतनी जानकारी ही काफी होगी यह पता करने के लिए कि वह कौन है क्या करती है।
एक दिन बाद जब लिली ने घंटी बजाई नीमा ने दरवाज़ा खोला और धीरे से कहा, "लिली, तुम्हारे कितने नाम हैं? "
"ओह मैडम मुझे लगा था कि उस दिन आप हैरान हो गई होंगी। मै बताती हूँ आपको सारी बात आप तो समझदार लगती हैं...लगता है आप पाकिस्तानी हैं...अगर कोई क्रिश्चियन आपके घर में काम करे तो आपको ऐतराज़ तो नहीं?" उसने पूछा।
"नहीं हिन्दू, मुस्लिम या क्रिश्चियन से मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता पर मैं पाकिस्तानी नहीं हिन्दुस्तानी हूँ।"
"आप हिन्दुस्तानी है? उसने आश्चर्य से पूछा "आप पाकिस्तानियों की तरह उर्दू बोलती हैं, बिन्दी भी नहीं लगातीं और आप मलयालम भी नहीं समझतीं?"
"मैं बिन्दी लगाती हूँ पर मैने कोई कड़े नियम नहीं बना रखे हैं इस बारे में। कभी भूल गई तो नहीं भी लगाई और मलयालम दक्षिण भारतीय भाषा है जो मुझे नहीं आती। मैं उत्तर भारतीय हूँ। उत्तर भारत में यही भाषा बोली जाती है।" लगता था जितना संदेह मुझे उसके बारे में था उससे कहीं ज्यादा संदेह उसे मेरे बारे में मेरे पहनावे और रहन सहन को लेकर था।
"अच्छा अच्छा", उसने मुस्कराते हुए कहा लगता था उसे बात समझ में आ रही है और फिर वह अपने बारे में बताने लगी,
"मेरा नाम थिलोका है। मेरे पासपोर्ट में भी यही नाम है। मेरे माता पिता बौद्ध थे बाद में धर्म परिवर्तन कर के क्रिश्चियन हो गए। अब हम इसी धर्म का पालन करते हैं पर धर्म अलग- अलग होने से क्या होता है? आखिर हर धर्म एक ही बात तो सिखाता है। यहाँ एक अजीब सा रिवाज़ है। किसीको अपने देश की 'मेड' चाहिए किसी को अपने धर्म की। जब मैने आपको क्रीक पर देखा तो आप पैंन्ट कोट पहने थीं मुझे लगा कि आप क्रिश्चियन होंगी इसलिए मैने अपना नाम लिली बता दिया और अंग्रेज़ी में बात की।
"जो उस दिन कार ड्राइव कर रहा था वह मेरे पति का छोटा भाई है। उसने आपको सलवार कुर्ते में देखा तो समझा कि आप पाकिस्तानी हैं इसलिए उसने मेरा नाम शकीला बताया और उर्दू में बात की। हम कई रिश्तेदार यहाँ हैं। हममें से जो भी बेकार होता है वो हम सबके लिए ड्राइविंग कर लेता है। मैं पिछले बीस सालों से शारजाह में हूँ। इतने दिनों में उर्दू, इंगलिश, अरबी, मलयालम और सिंहली भाषाएं बोलने लगी हूँ। जब मैं पाकिस्तानी घरों में काम करती हूँ तो अपना नाम शकीला रख लेती हूँ। हिन्दुस्तानी घरों में त्रिलोका बता देती हूँ। मुझे अरबी घरों में काम करना अच्छा नहीं लगता। वहाँ काम बहुत होता है और कभी खत्म नहीं होता।"
कितने सारे चौखानों के बारे में जानती है थिलोका, नीमा ने सोचा था। इतने सारे चौखानों से गुज़रते हुए इस दुनिया के समंदर के कितने ज्वार भाटे झेले होंगे इसने। किस तरह अपनी मेहराबें बनाई होंगी इसने। किस तरह सीमेंट जमाई होगी अपने चारों ओर फैले हर चौखाने के अनुसार अपने को समायोजित करते हुए।
आगे के मोड़ पर बड़े नीले वाले बोर्ड से नीमा को अपने घर की ओर मुड़ना था। बस दो मिनट का समय और, नीमा ने सोचा। उसके बाद दस मिनट लगते हैं नीमा को घर तक पहुँचने में। आठ बजे तक वह घर में होगी। यह समय समीर के आने का है। आठ से दस तक या तो टीवी देखेगी या फिर रात के खाने के लिए कुछ पका लेगी। टहलने से निकलने के पहले समीर का फोन आया था। सात बजे उसकी मीटिंग है और बाद में डिनर। शायद लौटने में देर होगी। मीटिंग खतम करने के बाद आठ से साढ़े आठ के बीच फोन करने को कहा था उसने।
"मुड मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के" किसी कार का स्टीरियो काफी तेज़ आवाज़ में बज रहा था। किसी भारतीय की कार होगी नीमा ने सोचा। अचानक तेज़ हार्न और ब्रेक की आवाज़ के साथ कार पास आकर रूकी तो नीमा चौंक सी गई। पलट कर देखा, समीर था।
"हेइ मान गए? क्या पकड़ा है? समीर क्लास छोड़ कर भागे हुए विद्यार्थी के मूड में था, "चलो ' दिल्ली दरबार' में मलाई कोफ्ते, बटर चिकन और गार्लिक नान खाते हैं।" खाना समीर की सबसे बड़ी कमज़ोरी है। खासतौर से मुगलई।
"आज इतनी जल्दी? और आज तो तुम्हारा डिनर था न?" नीमा ने आश्चर्य से पूछा हाँलाँकि यह जबरदस्त ट्रीट थी उसके लिए भी। पिछले एक महीने से दोनो कहीं बाहर खाने नहीं गए। "हाँ, आज मन नहीं हुआ डिनर तक रूकने का। रोज़-रोज़ के किब्बेह, तबूलेह और हमूस वगैरह वगैरह एक हज़ार अरबी डिशेज़ से मेरा दिल भर गया। आज पुदीने की चटनी याद आ रही है मिर्ची वाली।"
समीर का जीने का अपना तरीका है वह हज़ारों चौखाने पार कर के वापस लौट आता है अपने चौखाने पर। शायद हर भारतीय का यही तरीका है वे या तो अपने चौखाने पार नहीं करते, या हज़ारों चौखाने पार करते हुए अपने चौखानों पर वापस लौट आते हैं। शायद इसीलिए चौखानों की भीड़ में वे खोते नहीं। बार बार मिल जाते हैं।
नीमा ने मुस्कुरा कर कार का दरवाज़ा खोला और अंदर बैठ गई। समीर ने वाल्यूम धीमा कर दिया। अंदर मंद संगीत जारी था, ``मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के,'' बाहर फुटपाथ के चौखाने तेज़ी से पीछे छूटते जा रहे थे।
भारत से लौटते ही, चंद महीनों के अंदर ही मनुश्री सरकार मनुश्री अब्राहम तो बन गयी थी, जैसा कि वह चाहती थी, परन्तु जीवन इतनी तेज़ी से और इतना बदल जाएगा, यह वह शादी के बाद ही जान पाई। मात्र एक नादान और विद्रोही युवती नहीं, किताबों में मुंह छुपाए, दीन-दुनिया से बेखबर जोशीली विद्यार्थिनी ही नहीं, अब जोनुस की पत्नी और केसर की मां थी मनु... एक कुशल गृहस्थिन, ममतामयी मां और सफल आर्कीटेक्ट की जिम्मेदारियां भी थीं उन उल्लासित कंधों पर और मात्र यहीं आकर उन युवा पंखों की उडान नहीं थमती थी , जीवन आज भी वैसा ही रोचक और भांति-भांति की गतिविधियों से भरपूर ही था मनु के लिए। जोनुस की हर संस्था, हर आंदोलन, हर रुचि में तनमन से साथ थी मनु और इन सबसे परे भी एक और निजी शौक था उसका , जो रात के अंधेरे में, निपट एकाकी पलों में फलफूल रहा था...लिखने-पढ़ने और सफेद-सपाट कागजों में रंग भरने का शौक। अब तो यदा-कदा स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में उसके इक्के-दुक्के लेख, नाटक और चित्र आदि छपने व दिखने भी लगे थे मनु के। सरल-से व्यक्तित्व को एक बहुरंगी आयाम तो दे ही रहा था उसका यह शौक , एक नयी और दुरूह...रहस्यमय पहचान भी स्थापित किए जा रहा था उसकी ...शौक जो निजी डायरी से शुरु हुआ था और बाबा को लिखे पत्रों के रूप में मनु की दैनिक जरूरत बना था कभी, आज अतरंग मीत था एकाकी पलों का। दादी के पूजा घर की तरह , मां के उबलते तो कभी महकते चौके की तरह।
तो आखिर वतन से दूर, अपनों से दूर, एक छोटा सा घरौंदा सजा ही लिया था अम्मा-बाबा की लाडली और अल्हड़-सी दिखती मनु ने...सही शब्दों में कहें तो, कल तक जो पहाड़ी झरना थी, अब अपनी ही रौ में बहती शान्त नदी बन चुकी थी...यादों की गीली मिट्टी, कंकड़ पत्थर सभी से निपटती, आगे बढ़ती मनु नए-नए किनारे पार कर रही थी । बस एक ही मलाल था उसे ... यहां इंगलैंड में रहते हुए भी, जोनुस के साथ शादी करने के बाद भी, मां को, दादी के साथ और खुद को, एक छत के नीचे बाबा के साथ...अपने पूरे परिवार को एक ही घर में नहीं रख पायी थी मनु। आशीर्वाद देने तक बाबा उसके घर, केसर के जन्म के पूरे दो साल बाद ही आ पाए थे। कितना रोई थी बूढ़े झुकी कमर के बाबा को देखकर। पिछले चन्द सालों में ही उम्र से बहुत आगे निकल गए थे बाबा। ...अब उन्हें अपने पास ही रखेगी, आंखों के आगे और जीवन की हर सुख सुख-सुविधाओं के बीच-- भर आए मन को संभालते हुए खड़े-खड़े ही निश्चय कर डाला था मनु ने...तुरंत ही, वहीं और उसी पल।
“ ' जिन्हें प्यार करते हो, उन्हें अपने से दूर मत जाने दो।' यही कहते थे न आप! फिर यह दूरी क्यों बाबा? अब में आपको कहीं वापस जाने नहीं दूंगी।”
एकबार फिर सवाल नहीं पूछा था, बच्चों सी मचल पड़ी थी मनु बाबा के आगे और अचानक ही बच्चों की तरह घेर लिए गए शेखर सरकार को गहरे कहीं रास आया था मनु का यह आग्रह...अप्रत्याशित वह बचपना। बहुत अच्छा लगा था उन्हें अपनी खोई मनु को वापस पाकर और तब दूरियों की असह्य दीवारें, खुद-ब-खुद चरमराकर ढह गई थी दोनों के बीच से।
“ और मेरी मां का क्या होगा, मनु? अकेली, अकेली कहां रहेगी वह ?“ वैसे ही घबराकर , पांच साल के बच्चे की तरह मचल-मचलकर पूछा था उन्होंने भी।
“ओह, दादी ! यहीं बुला लेंगे उन्हें हम। “, अगले पल ही रुंधे गले से एलान कर दिया था मनु ने।
और फिर तुरंत ही दादी को बुला भी लिया था उसने, अपने पास, वहीं इंगलैंड में।
“ देखना, अब कैसे खुश-खुश साथ-साथ ही रहेंगे हमसब ...क्यों हैं न पापा ? वैसे भी यहां पर तो सभी मां-बाप ज्यादातर बेटियों के पास ही रहते हैं। ” खुशियों के सातवें आकाश तक पेग लेती मनु बारबार चहकी जा रही थी अम्मा-बाबा और दादी के आगे।
“ नहीं। कुलीन भारतीय परिवारों में ऐसा नहीं होता !”
कम ज़िद्दी नहीं थे मनु के पापा शेखर सरकार भी। पापा के आदर्श और संस्कारों के आगे हारकर, मनु ने न चाहते हुए भी, ज़िद छोड़ दी थी-“ अच्छा तो मैं और जोनुस रोज़ मिलने तो आ सकते हैं न आपलोगों से?” आधी रुंआसी मनु जबाव में बस इतना ही पूछ पायी थी।
और तब “क्यों नहीं !“ आगे बढ़कर मनु का माथा चूमते हुए, पापा, दादी और मां, तीनों ने ही साथ-साथ हंसकर गले लगा लिया था उसे।
मनु के पास, बग़ल वाला ही घर लिया गया। इस तरह से वे बेटी के पास भी थे और उसकी घर-गृहस्थी से दूर भी...सच कहो तो एक सही और आरामदेह दूरी पर। मनु आश्वस्त थी, अब सबकुछ ठीक रहेगा। बहुत खुश रह पाएगी वह अपने समूचे परिवार के साथ। अचानक ही, सारी समस्याओं का सही समाधान मिल गया था उसे। पर उसे क्या पता था कि रेशम-सी कोमल और सरल ये रिश्तों की डोरियां मात्र एक हवा के झोंके तक से उलझ जाया करती हैं...कि इन्हें सुलझा पाना इतना आसान भी नहीं। इनके पेंच तो अक्सर बेपनाह प्यार और परवाह से भी इतने चिकने हो जाते हैं कि फिसल-फिसल कर ही कस जाते हैं... कि कोई छोर ही हाथ नहीं आ पाता फिर तो उन उलझी डोरियों का।
जिन्दगी अगर एक रंगरूप और गंध का गुलदस्ता होती, तो हर मन चाहे ढंग से सजा-संवार लेती मनु। अगर घटनाओं का एक बिखरा कोलाज होती, तो भी मनोहारी तस्बीर-सा कबका जोड़ लेती वह। परंतु उनकी जिन्दगी तो अब उस धुंधले पानी जैसी हो चुकी थी, जिसे इच्छाओं के विविध रंगों में डूबी तूलिका ने बेहद मटमैला और बदरंग कर दिया था और किसी भी रंग को पहचानना, शोखी और चटकता के साथ अलग कर पाना अब संभव ही नहीं था...मनु के लिए भी नहीं। फिर भी मनु हारी नहीं थी। बाबा और दादी की ही तरह उसकी भी सुख-शान्ति की, सामंजस्य की खोज अभी भी जारी ही थी। थकने पर, निराश होने पर...भावनाओं के अनियंत्रित बहा लेजाने वाले आवेग पर, बहती जरूर थी, पर उखड़ती नहीं थी मनु। अपनी अभिन्न सहेली कलम और तूलिका के साथ, कल्पना की अद्बुत नौका में बैठकर, विवेक और संयम के नए-नए पहाड़ और जंगलों का भ्रमण कर आती थी वह, किसी एक मनचाहे धरातल पर थमकर खुली सांस और नयी उर्जा ले आती थी वहीं से ।
मनु जानती थी कि मां मनु के बिना नहीं रह सकतीं, और बाबा दादी के। दादी और मां का क्या रिश्ता था, मनु ठीक से आजतक नहीं समझ पाई। दादी मां को बहुत प्यार करती थीं और अपनी प्यारी-से-प्यारी, अच्छी-से-अच्छी चीज भी हंस-हंस कर न्योछावर कर देती थीं उनपर। दिन भर उन्हें सजाते संवारते न थकती थीं। मां भी अक्सर ही दादी के लिए तोहफे खरीदतीं, घंटों हंस-हंसकर बातें करतीं, सलाह मशवरे सभी करतीं, बस, दादी के साथ बाबा को बातें करते, हंसते-बैठते देख, मां को न जाने क्या हो जाता...शेरनी-सी बिफर जातीं...सारा विवेक किनारे रख, गरम तवे पर गिरी बूंद-सी छन्ना जातीं। और फिर तब घर में रोज नए नाटक...कलह और उपद्रव होते।
मनु अच्छी तरह से जान गई थी कि बाबा के घर में, मन के शब्दकोष में परिवार और रिश्तों के संदर्भ में ‘अलग ‘ शब्द का कहीं कोई अर्थ या अस्तित्व ही नहीं था कभी। काश् मां भी समझ पातीं, बाबा के इस निष्काम अनुराग और एकनिष्ठ मातृभक्ति को! मनु हैरान थी, जीवन की कड़ी-से-कड़ी गुत्थी को चुटकियों में खोल देने वाली मां इस स्पष्ट से रहस्य को भी कैसे समझ और सुलझा नहीं पाईं कभी !
अपनी कुशल संयोजना ही नहीं, परिवार की पूरी प्रणाली, सारा भविष्य... सभी कुछ तो टूटा-बिखरा दिखने लगता था अक्सर ही आर्कीटेक्ट और सावधान मनु को।
और तब सब समेटने और सहेजने के प्रयास में अक्सर ही सोचने पर मजबूर हो जाया करती थी मनु... क्या यही होगा भविष्य और हमारी नयी पहचान यहां इस नए और अपरिचित देश में... निराशावादी नहीं थी, फिर भीचाहे अनचाहे ध्यान कई कई अवांछनी घटनाओं की तरफ चला ही जाता था उसका...कभी घर के अन्दर तो कभी घर के बाहर। ऐसा ही एक दृश्य था वह जिसकी तरफ फिरफिर के ध्यान चला ही जा रहा था उसका। कुछ ही दिन पहले, बरमिंघम की ब्रौड स्ट्ट पर उस रात ही तो देखा था उसने यह सब, जब वह देर रात गये दमयन्ती खुराना के साथ जेनी के घर से वापस लौट रही थी। इजराइल और पैलेस्टाइन से दो परिवार आए थे, जो अनचाही उस लड़ाई में यूं ही फंस गए थे और कई -कई प्रियजनों को खोने के बाद अब सबके आगे अपने विचार और संस्मरण रख रहे थे...इन लड़ाइयों की निरर्थकता और तबाही...दर्द को सुना रहे थे।
मनसा, वाचा और कर्मणा तीनों से ही लगातार सचेत और उद्वेलित कर रहा थीं उसे उस दिन की वे सारी घटनाएं । भुलाए भी तो कुछ नहीं भूल पा रही थी वह, न तो वह जो जेनी के घर में सुना और जाना था न वह जो उस रात ब्रौड-स्ट्रीट पर दिखा था।
शहर के बीचोबीच पांच तारा होटलों से घिरा शहर का यह वह हिस्सा है, जहां कनाल बहती है और जिसे युवा बरमिंघम का वेनिस, कहते ही नहीं, मानते भी हैं। अक्सर ही शाम के घिरते धुंधलके के साथ शहर का ही नहीं, अच्छी-बुरी, हर तरह की गतिविधियों का केन्द्र बन जाता है यह हिस्सा।सारी रौनक, भीड़भाड मानो यहीं सिमट आती है। सीढ़ियां उतरते ही कनाल में बहती नावें और नावों में मनोरंजन के साधन और ऊपर एक तरफ रेस्तरां, पब, डिस्कथीक, कसीनो, थिएटर... मेले वाली बिग व्हील, वह भी नयोन लाइट से जगमग, तो दूसरी तरफ लाइब्रेरी, म्यूजियम, सिनेमा और तरह तरह की दुकानों का जाल... सभीकुछ तो है मन बहलाने के लिए यहां पर। यही वजह है कि शाम होते-होते ही युवाओं की भीड़ लगनी शुरु हो जाती है इस सड़क पर। शराब के नशे में धुत, कभी-कभी तो प्यार की वे मासूम चहलकदमियां मार-पीट और झगड़े तक भी पहुंच जाती हैं और कहीं आसपास नशीली दवाओं व अन्य संबन्धित अपराधों के अड्डे तो नहीं, पुलिस इस फिराक में पूरी-पूरी रात गश्त लगाती रह जाती है इर्दगिर्द ही।
आए दिन ही चोरी की कार और मोटर बाइकों की रेस वह भी नाबालिग किशोरों द्वारा, आम खबरें हैं यहां पर...दूसरे शब्दों में कहें तो युवा उत्तेजना का केन्द्र बन जाता है शाम होते ही शहर का यह हिस्सा। ऐसे उन्मादी वातारण में ठंड और भीड़भाड़ सबसे बेखबर, वे चारों एशियन लड़कियां बीयर की छलकती बोतल से एक दूसरे को नहलाती, एक दूसरे के शरीर के साथ फुटबॉल की तरह खेलतीं, करीब-करीब आधी निर्वस्त्र हो, बेमतलब ही सड़क पर इधर से उधर दौड़ रही थीं, वह भी घटाघोप अंधेरी, आधी रात में। कौन सा नज़ारा ज्यादा भद्दा और अश्लील था, किशोरियों का यूं नग्न प्रदर्शन या फिर स्ट्रीट लैंप के नीचे खड़े उन सिगरेट पीते लड़कों का फूहड़ता से उन्हें देख-देखकर नशे में हंसना और फब्तियां कसना, मनु के लिए कहना मुश्किल था। वैसे भी आम बातें हैं ये सब यहां पर... बहुत कुछ ऐसा ही अक्सर दिखता रहता है इन सड़कों पर, जिसे एशिया या पारंपरिक भारतीय परिवारों में, असभ्य और असंस्कृत...फूहड़ ही समझा जाएगा। परन्तु यूरोप के यौनमुक्त समाज में दैनिक दिनचर्या है यह सब तो। पुलों के नीचे के परछाइयों के काले धब्बों में, अंधेरी सड़कों पर और कारों के अन्दर, कहीं भी..।.यही नहीं, कभी-कभी तो दिन की तेज रौशनी में भी... ऐसा ही, या फिर इससे भी ज्यादा असह्य। फिर मनु को इतना खराब क्यों लग रहा है? ...क्या सिर्फ इसलिए कि वे चेहरे उसके अपने जैसे थे और उनकी पहचान के साथ खुद उसकी अपनी पहचान जुड़ी हुई थी...और कुछ हो न हो, उसका और उनका रंग एक था । जो भी हो एक बात तो निश्चित थी कि केसर को इन प्रभावों से बचाना ही होगा ...पर कैसे दूर रख पाएगी अपनी नन्हू को इस देश में पाल-पोस और बड़ा करके वह इन अभद्र और फूहड़ प्रभावों से? बचने का आखिर क्या रास्ता है ! चारो तरफ से ही तो घेरे रहते हैं ... देश के वातावरण में ही रचे बसे हैं यह तो। टेलिविजन, सिनेमा, स्कूल... यानी घर-बाहर कुछ भी तो अछूता नहीं , फिर अब कैसे रोक और समझा पाएगी वह उसे...कैसे बता पाएगी कि हर बात गलती करके ही नही सीखी जाती, कुछ बातें बड़ों के और समाज के अनुभवों से निकाले गए निष्कर्षों पर भी आधारित होती है, उन्हें बस वैसे ही चुपचाप मान और उतार लेना चाहिए आचरण में। जीवन और समाज की आचार संहिता बनी ये बातें, उन्हें सूत्रों की तरह मान कर ही चलने में व्यक्ति और समाज की भलाई है। जैसे कि दो और दो चार ही होते हैं चाहे जोड़ो, या फिर गुणा करो, ध्रुव सत्य हैं ये जीवन के...ज्यादा उलट-फेर की तो कुछ बस जीरो-सा ही हाथ लग पाता है। ...जबसे मां बनी है कैसी-कैसी बड़ी-बड़ी बातें सोचने लगी है वह। अबतो कभी-कभी खुद ही विश्वास नहीं होता कि मात्र चौबीस साल की ही है, या वही मनु है जो जीवन को सिर्फ अपनी ही शर्तों पर जीना जानती थी ! मां बनना भी कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। अचानक ही अभिवावक, शिक्षक और सखा तीनों ही बनना पड़ता है! मनु ने एक ठंडी सांस ली और अगले पल ही उसे अपने सवालों का जवाब मिल गया...वैसे ही शायद जैसे कि मां-बाप ने उसे कभी रोका और समझाया था; नीर-क्षीर का विवेक देकर... एक अडिग आत्मविश्वास देकर...उसकी सबसे प्यारी और अभिन्न सहेली बनकर। हजार सुख-सुविधाओं के बावजूद भी बहुत कुछ ऐसा था इस देश में, जो दांत में फंसे तिनके-सा, अक्सर ही बेहद बेचैन कर दिया करता था मनु को। सप्ताहान्त, यानी कि शुक्रवार शाम थी वह...शुक्रवार जब काम खतम हो जाता है और मौज-मस्ती व धूमधाम शुरु हो जाती है। अपने अन्य यूरोपियन साथियों की तरह वह भी तो एक गोष्ठी से ही लौट रही थी। साथ बैठी मिस खुराना भी सोच में डूबी हुई दिखीं मनु को ...मिस खुराना जिनकी बेटी गीता मनु की ही हमउम्र थी, परन्तु उम्र के इस लम्बे फर्क के बाद भी बहुत कुछ था दमयन्ती खुराना के स्वभाव में जो मनु को बेहद ही जाना पहचाना सा लगता था, उनकी वह स्वाभाविक व्यवहार कुशलता और व्यवहारिकता भी और नारी सुलभ कोमलता भी। मनु जान चुकी थी कि उसी की तरह किसी से हार नहीं मानतीं मिस खुराना, न किसी व्यक्ति से और ना ही किसी परिस्थिति से। विध्यार्थी दिनों में ही एक गलत व्यक्ति की मीठी-मीठी बातों में आकर वह बाहुपाश में तो जकड़ गई थीं परन्तु उस एक गलती के बाद समाज के डर से कोई दूसरी गलती पलटकर नहीं की थी उन्होंने। गर्भपात वगैरह कुछ भी नहीं, बस, बिन ब्याही मां बनी, दो-महीने की गीता को गोदी में उठाए अकेली ही कूद पड़ी थीं जीवन के कुरुक्षेत्र में। आज एक जानी मानी वित्त-प्रौफेसर की तरह अच्छा खासा नाम है उनका और यहां इंगलैंड में पिछले 27 साल से सर उठाकर एक इज्जत की जिन्दगी जी रही हैं वह। बहुत कुछ करती आई हैं खाली वक्त में भी। दीन-दुखियों और अभागों के लिए...समाज के उस तबके के लिए जो अनपढ़ और अपाहिज हैं या जिन्हें जीवन और समाज ने ठुकरा दिया है...फिर चाहे वे भटकते बच्चे हों, तिरस्कृत बूढ़े हों, या अपने ही घर-परिवार में आहत स्त्रियां। यही थोथी मान्यताओं को ललकारती जीवन प्रणाली और किसी से भी हार न मानने वाला स्वाभिमानी और दबंग व्यक्तिव ही तो बहुत अच्छा लगता था मनु को उनका। मन के किसी दबे कोने में मनु खुद भी तो उन्ही जैसा बनना चाहती थी। बहुत खुछ सीखा है मनु ने उनसे और अभी भी लगातार सीख ही रही है...जीवन कैसे जिया जाए बिना किसी विषाद या उलझन के और खुद को सुलझाकर इस लायक कैसे बनाया जाए कि दूसरों की भी थोड़ी बहुत मदद की जा सके। कला और संगीत में भी बेहद रुचि थी दमयन्ती खुराना की। मनु और जोनुस की तरह ही उन्हें भी बहुत पसंद था आए दिन कोई न कोई कला और संगीत का आयोजन करना। वह कनाल पर बजड़े में घूमना और सितार पर राग तोड़ी और मालकोंस सुनना, वह भी स्थानीय कलाकारों से, एक अजब पुलक से भर रहा था मनु को। यहां भी ऐसा संभव है, कला की इन उंचाइयों को छू रहे हैं युवा, यह सोच उसके चेहरे को ही नहीं आत्मा को भी गर्व से दीप्त कर रही थी। बस उनका एक गीता के लालन-पालन का ढर्रा जरूर खटकता था मनु की आँखों में। चंदा में लगे कलंक-सा उनके जीवन का एक यही तो वह हिस्सा था जिसे पूरी तरह से स्वस्थ और सुचारु नहीं ऱख पायी थीं दमयन्ती खुराना।
" क्या सोच रही हो इतनी तन्मयता से, बत्ती तो कबकी हरी हो चुकी?" मिसेज खुराना ने चौराहे पर अटकी मनु को याद दिलाया। पीछे लाइन में खड़े असंतुष्ट ड्राइवरों के हॉर्न तक नहीं सुनाई दे रहे थे उसे ...जाने कितनी गहरी डूब चुकी थी वह अपने ख़यालों के भंवर में।
" कुछ भी तो नहीं !" एक अटपटी-सी झेंप भरी मुस्कुराहट के साथ मनु ने कार वापस स्टार्ट कर ली थी।
" गीता कैसी है? इधर काफी दिनों से दिखी नहीं ! "
" पूछो मत मनु, कहीं आना जाना ही नहीं चाहती। बस, वह भली और उसका टी.वी.। न जाने आजकल के नौजवानों को क्या हो गया है, या तो रोड रोमियो हैं या काउच पोटैटो...कभी-कभी तो बहुत चिंता होने लगती है मुझे उसकी ! " मिसेज खुराना ने एक बेहद ठंडी सांस लेते हुए मनु की तरफ देखा, परन्तु मनु तो वापस अपने ही विचारों में डूब चुकी थी।
'...बच्चों को स्वतंत्रता तो देनी चाहिए और आत्मविश्वास भी, परन्तु उनके साथ चलकर परछांई की तरह...जब भी जरूरत हो उनके लिए मौजूद होकर, वरना सब बेमानी हो जाता है। मिस खुराना की व्यस्त जिन्दगी में इंगलैंड की हजारों दूसरी माओं की तरह ही सबके लिए...हर संस्था, हर दावत, हर काम के लिए तो वक्त था, पर बेटी गीता के लिए नहीं। पूरा-का-पूरा समाज भरा पड़ा है यहां ऐसे ही अनगिनित डरे-भटके, एकाकी बच्चों से जिनके पास दुनिया भर के खिलौने और सुख सुविधाएँ तो हैं, मां-बाप नहीं। चाहे कुछ भी हो जाए, वह ऐसी दूरियां नहीं आने देगी अपने और केसर के बीच। पर, अभी तो केसर बहुत छोटी है। दो ही महीने की ही तो है। उम्र पड़ी है इन इन समस्याओं से गुजरने और समाधान ढूँढने के लिए...फिर क्यों इतनी परेशान हो रही है वह अभी से ? बेटी की बिल्कुल ही एक हिन्दुस्तानी अम्मा बन चुकी है वह भी! ' , अपनी बाबरी सोच पर हंसे बिना नहीं रह सकी मनु। परन्तु समस्याओं ने तो मानो मनु का दामन न छोड़ने की कसम खा ली थी, अभी वह सहेली ज़ारा की समस्या से कैसे निपटा जाए, यह तक नहीं सोच पायी थी कि एक और नयी उलझन आन खड़ी थी आगे।
चिठ्ठियों के अन्य पुलिंदे के साथ सुबह-सुबह ही तो डाकिया डाल गया था उसकी चौखट पर। ..
फिर वही मारपीट, हत्या, बलात्कार...। तंग आ गया हूँ इन समाचार पत्रों से। कभी-कभी तो सुबह-सुबह अच्छी खबर दे दिया करें। अजी सुनते हो ! ये देखो, अखबार में आपके गांव में मारपीट का समाचार छपा है। जरा पता करो अपने घर का तो कोई घायल नहीं हुआ? हुँह! ये घरवाले भी कोई सूचना नहीं देते, इसके लिए भी अखबारों पर निर्भर रहना पड़ता है । कहते हुए वे फोन बूथ की तरफ चल पड़े।
2)
पेप्सी-कोला, हाय-हाय ! बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खूनी हैं ! बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत छोड़ो ! के नारों के साथ नौजवानों का जुलूस आगे बढ़ा जा रहा था। चौराहे पर मीडिया के लोगों को देखकर वे और तेजी से नारे लगाने लगे। जब मीडिया के लोग कवरेज करके चले गये तो उनमें से एक बोल पड़ा ' अरे यार! गला सूख रहा है कुछ ठंडा-वंडा मिलेगा कि फ्री में ही नारे लगवाओगे। ' देखते ही देखते नारे लगाते नौजवान बगल के रेस्टोरेंट में घुस गये। पेप्सी कोला की बोतलें अब गले में तरावट ला रही थीं।
किसी शहर में एक नौजवान रहता था, जो तबियत का गुस्सैल था और ताकत में अपनी सानी नहीं रखता था। एक दिन वह बाजार से जा रहा था, तो उसने देखा कि सड़क के किनारे खड़ा एक बुजुर्ग शख्स उसकी ओर देखकर बिला वजह हंस रहा है। गुस्सैल तबियत के जवान को यह हरकत पसन्द न आयी। उसने बूढ़े को दो चार गालियां दीं और आगे बढ़ गया। इस पर वह बुजुर्ग कुछ न बोला, खामोश खड़ा रहा। दूसरे दिन बाजार में नौजवान ने फिर उसी बुजुर्ग को देखा, जो उसकी तरफ देखकर उसी तरह मुस्कुरा रहा था। नौजवान को ताज्जुब के साथ गुस्सा भी आया और उसने गालियों के साथ दो चार हाथ भी बुजुर्ग को रसीद कर दिए। बुजुर्ग कुछ न बोला, सहन करता रहा। तीसरे दिन फिर वही हुआ। नौजवान ने इसबार जमकर पिटाई की। बुढ्ढे ने मार सहन की और मुस्कुराता रहा।
चौथे दिन जब फिर नौजवान ने बुढ्ढे को अपनी ओर उसी प्यार से ताकते देखा, तो इस बार बजा. गुस्सा होने के वह नरमी से पेश आया। उसने कहा --ऐ भले आदमी, तुम बड़े नेक और शरीफ बुजुर्घ हो, जो बारबार मेरे हाथों से पिटने के बाद भी मुहब्बत से पेश आ रहे हो। ताज्जुब नहीं , अगर तुम कोई गांधीवादी हो क्योंकि सहनशक्ति की इतनी ताक उन लोगों में ही देखी जाती है। बताओ मैं तुम्हारी क्या खिदमत कर सकता हूँ? तुमने मुझ पर गहरा असर डाला है और मैं तुम्हारी हर खिदमत को राजी हूँ।"
बुजुर्ग बोला--" ऐ नौजवान, मैं चुनाव में खड़ा हूं और तेरा वोट चाहता हूं। इसलिए मैं हर रोज तेरी तरफ उम्मीद भरी निगाहों से ताकता हूं और तेरा गुस्सा पी जाता हूं। तू मुझे वोट दे और इस काबिल बना कि असेम्बली में जा सकूं।"
नौजवान ने वादा किया कि वह वोट देगा ।
कुछ दिन बाद चुनाव हुए और गुस्सैल नौजवान ने उस बुजुर्ग को वोट दिया।
बुजुर्ग जीत गया और असेम्बली का मेम्बर बन गया, जल्दी से मन्त्री भी। मगर मंत्री बनने के दूसरे ही दिन पुलिस उस गुस्सैल नौजवान को ढूंढती मोहल्ले में आयी और उसे पकड़कर ले गयी। उस पर जुर्म था कि वह शान्त नागरिकों पर मारपीट करता है और उससे शहर के अमन क़ानून को ख़तरा है।
नौजवान हाथ मलकर पछताने लगा ---अफ़सोस मैने उस बूढ़े पर तब क्यों भरोसा किया, जब वह वोट मांग रहा था। मुझे समझना चाहिए था कि जो शख्स़ गुस्से को पीकर दाँत निकालता रहता है, वह ज़रूर मौके की ताक में है। शरद जोशी सहिष्णु
किसी शहर में एक नौजवान रहता था, जो तबियत का गुस्सैल था और ताकत में अपनी सानी नहीं रखता था। एक दिन वह बाजार से जा रहा था, तो उसने देखा कि सड़क के किनारे खड़ा एक बुजुर्ग शख्स उसकी ओर देखकर बिला वजह हंस रहा है। गुस्सैल तबियत के जवान को यह हरकत पसन्द न आयी। उसने बूढ़े को दो चार गालियां दीं और आगे बढ़ गया। इस पर वह बुजुर्ग कुछ न बोला, खामोश खड़ा रहा। दूसरे दिन बाजार में नौजवान ने फिर उसी बुजुर्ग को देखा, जो उसकी तरफ देखकर उसी तरह मुस्कुरा रहा था। नौजवान को ताज्जुब के साथ गुस्सा भी आया और उसने गालियों के साथ दो चार हाथ भी बुजुर्ग को रसीद कर दिए। बुजुर्ग कुछ न बोला, सहन करता रहा। तीसरे दिन फिर वही हुआ। नौजवान ने इसबार जमकर पिटाई की। बुढ्ढे ने मार सहन की और मुस्कुराता रहा।
चौथे दिन जब फिर नौजवान ने बुढ्ढे को अपनी ओर उसी प्यार से ताकते देखा, तो इस बार बजा. गुस्सा होने के वह नरमी से पेश आया। उसने कहा --ऐ भले आदमी, तुम बड़े नेक और शरीफ बुजुर्घ हो, जो बारबार मेरे हाथों से पिटने के बाद भी मुहब्बत से पेश आ रहे हो। ताज्जुब नहीं , अगर तुम कोई गांधीवादी हो क्योंकि सहनशक्ति की इतनी ताक उन लोगों में ही देखी जाती है। बताओ मैं तुम्हारी क्या खिदमत कर सकता हूँ? तुमने मुझ पर गहरा असर डाला है और मैं तुम्हारी हर खिदमत को राजी हूँ।"
बुजुर्ग बोला--" ऐ नौजवान, मैं चुनाव में खड़ा हूं और तेरा वोट चाहता हूं। इसलिए मैं हर रोज तेरी तरफ उम्मीद भरी निगाहों से ताकता हूं और तेरा गुस्सा पी जाता हूं। तू मुझे वोट दे और इस काबिल बना कि असेम्बली में जा सकूं।"
नौजवान ने वादा किया कि वह वोट देगा ।
कुछ दिन बाद चुनाव हुए और गुस्सैल नौजवान ने उस बुजुर्ग को वोट दिया।
बुजुर्ग जीत गया और असेम्बली का मेम्बर बन गया, जल्दी से मन्त्री भी। मगर मंत्री बनने के दूसरे ही दिन पुलिस उस गुस्सैल नौजवान को ढूंढती मोहल्ले में आयी और उसे पकड़कर ले गयी। उस पर जुर्म था कि वह शान्त नागरिकों पर मारपीट करता है और उससे शहर के अमन क़ानून को ख़तरा है।
नौजवान हाथ मलकर पछताने लगा ---अफ़सोस मैने उस बूढ़े पर तब क्यों भरोसा किया, जब वह वोट मांग रहा था। मुझे समझना चाहिए था कि जो शख्स़ गुस्से को पीकर दाँत निकालता रहता है, वह ज़रूर मौके की ताक में है।
धर्मवीर भारती ने 'अँधायुग' जैसी कालजयी रचना का सृजन किया है। साथ ही उन्होंने मिथकों के आधार पर 'कनुप्रिया ' में राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंगों को आधुनिक प्रासंगिकता दी है। वे अनेक वर्षों तक साहित्य सृजन में लगे रहे और 'गुनाहों का देवता ' जैसा प्रसिद्ध उपन्यास भी लिखा। आपतकाल में लिखी उनकी कविता 'मुनादी' आज तक प्रासंगिक है।
क्यो याद किया जाए...
(धर्मवीर भारती)
जिस दिन को बड़े दिन और ईसा मसीह के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है, संयोग से इसी दिन 25 दिसंबर, 1926 को एक अद्वितीय प्रतिभा, मानव मूल्य के प्रबल समर्थक और विलक्षण रचनाकार का जन्म इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में हुआ। एक साथ कई रूपों में हिंदी को समृद्ध करने वाले इस व्यक्तित्व का नाम है-धर्मवीर भारती।
जब साहित्य के क्षेत्र में भारती जी का पदार्पण हुआ, तब हिन्दी साहित्य संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। एक ओर छायावाद अपने अंतिम चरण पर था, दूसरी ओर प्रगतिवादी आंदोलन का परचम लहरा रहा था। भारतीजी किसी खेमे या वाद से बंधकर जीने वाले व्यक्ति न थे। भारतीजी अद्वितीय प्रतिभा से युक्त विलक्षण रचनाकार थे, उन्होंने साहित्य की अधिकांश विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। वे एक साथ कई रचनाओं को आयाम देते हैं, उनमें कवि, कथाकार, निबंधकार, समीक्षक और कुशल संपादक होने के असाधारण गुण विद्यमान थे। भारती जी ने अनेक प्रभावपूर्ण गीतों और भीतर से प्रेम उमंग जगाने वाली कविताओं की रचना की। उनका सम्पूर्ण साहित्य एक तरह से प्रेम की अमर गाथा ही कहता है। उनके अपूर्व गीतों और कविताओं का ( संयोग श्रंगारमयी) 'ठंडा लोहा' (1952) कविता-संग्रह है। यह प्रेम की वासनामयी ऐंद्रिकता से दूर प्रेम के पवित्र रूप का दस्तावेज है। वास्तव में 'ठंडा लोहा ' अपने मीठे और मार्मिक शब्दों की चोट से रोम-रोम को सिहरा देता है। भारतीजी का पावन प्रेम प्रेयसी को भागवत तक कह देता है-
' रख दिए तुमने नजर में
बादलों को साधकर,
आज माथे पर सरल
संगीत से निर्मित अधर;
आरती के दीपकों की
झिलमिलाती छाँव में,
बाँसुरी रखी हो ज्यों
भागवत के पृष्ठ पर । '
भारती के दूसरे काव्य-संग्रह ' सातगीत वर्ष ' (1959) में उनकी सात वर्ष की कविताएँ संकलित हैं। इनमें प्रणय की जुदाई की मार्मिक अनुभूतियाँ ही कविता के आकार में भारती की कलम से उतरी हैं।इन दोनों संकलनों में कुछ जनवादी कविताएं भी संकलित हैं, जहां भारती का व्यक्तित्व व्यष्टिपरक दिखाई पड़ता है।
अंधा युग' (1964) भारती जी की एक अनन्य काव्य नाट्य कृति है, जिसने भारती जी को साहित्य जगत् में अपार कीर्ति दिलाई एवं रंगमंच की दृष्टि से अत्यंत सफल साबिक हुई। ' अंधा युग ' का मूल कथ्य द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न विडंबनाओं और त्रासदी को प्रकट करना है। लेखक ने पौराणिकता को आधार बनाया है जो आधुनिक संदर्भों में खरी उतरती है। इसमें युद्ध के कारणों तथा विभीषिका को दर्शाया है, जो आज भी प्रासंगिक ही है। भारती जी ने इस नाट्य कृति के माध्यम से द्वितीय विश्वयुद्ध से उपजे मानवीय मूल्य के संकट और मूल्यांधता पर कुठाराघात करते हुए कहा है-
'और विजय क्या है ?
एक लंबा और धीमा
और तिल-तिल कर फलीभूत
होने वाला आत्मघात। '
पौराणिक चरित्रों में राधा का उत्तरपक्ष प्रायः उपेक्षित ही रहा है, यह बात भारतीयों को कई वर्षों तक सालती रही, जिसकी परिणति उन्होंने 'कनुप्रिया ' (1959) में की। भारती जी की वह कृति प्रणय भावना से आपूरित है, इसमें राधा अपने प्रेमी कृष्ण से वियुक्त होने के कारण दुःखी है साथ ही इतिहास में चर्चित न हो पाने के कारण व्यथित है। वह अपने अस्तित्व के रूप में कहती है-
' सखी को तुमने बांहों में गूंथा,
पर उसे इतिहास में गूंथने से
क्यों हिचक गए प्रभु '
भारती जी एक सफल कवि ही नहीं, ऊँचे दर्जे के कथाकार भी हैं। वे उपन्यास को अभिव्यक्ति का सशक्त और व्यापक माध्यम मानते हैं। उनकी अन्यतम प्रसिद्धि का एक प्रमुख कारण ' गुनाहों का देवता ' (1949) उपन्यास रहा है। भारती जी ने इस उपन्यास में जीवन की द्वैतता-काम और प्रेम की कुंठाओँ का मनोवैज्ञानिक रूप से सफल चित्रण किया है। यह मूलतऋ रोमांटिक प्रेमकथा है। भारतीजी की सशक्त लेखनी क्षमता का परिचय उनका दूसरा उपन्यास 'सूरज का सातवां घोड़ा ' (1952) कराता है, जो मध्यम वर्गीय यथार्थ, प्रेम, चेतना, कुंठाओँ और त्रासदी का जीता-जागता प्रमाण है। यह उपन्यास भी प्रेम भावना का संवाहक है, परन्तु इसमें मध्यमवर्गीय जीवन प्रणाली और उसके यथार्थ को भारतीजी ने बखूबी दर्शाया है।
जहां भारतीजी एक सफलतम उपन्यासकार के रूप में सहित्येतिहास में दर्ज हुए, उससे पहले एक सशक्त कहानीकार भी हैं। अगर उऩकी किसी रचना को प्रथमतः प्रकाशन का श्रेय प्राप्त हुआ है तो वह कहानी ही थी। उनके कहानी-संग्रह ' मुर्दों का गांव ' (1946), ' स्वर्ग और पृथ्वी ' (1949) ' चांद और टूटे हुए लोग ' (1955), 'बंद गली का आखिरी मकान ' (1969) है। भारती जी की कहानियां ' गुलकी बन्नो ', ' सावित्री नं. दो ', ' यह मेरे लिए नहीं ' और ' बंद गली का आकिरी मकान सर्वश्रेष्ठकहानियां हैं, जो विश्व की किसी भी भाषा की श्रेष्ठ कहानियों में स्थान पा सकती हैं।
विविध प्रकार के निबंधों और समीक्षा से भी उनकी मौलिकता और प्रतिभा द़ष्टि का परिचय मिलता है। उनके निबंध संग्रह ' ठेले पर हिमालय ' (1958) ' पश्यन्ती ' (1969), ' कहनी-अनकही ' (1970), ' कुछ चेहरे और चिंतन ' (1995), और ' शब्दिता ' (1997) हैं। भारतीजी की दो समीक्षा कृतियां-' प्रगतिवादःएक समीक्षा ( 1949), 'मानव मूल्य और साहित्य ' (1960) हैं। इन्ही का एक एकांकी संग्रह ' नदी प्यासी थी ' (1954) भी है।
इसके अलावा भारतीजी ने युद्ध-यात्रा (1972) और ' मुक्त क्षेत्रेः युद्ध क्षेत्रे ' (1973) शीर्षक से रिपोर्ताज लिखे हैं जिनमें बाँग्लादेश की व 1972 के युद्ध का आँखों देखा हाल है। भारतीजी पहले ऐसे सिविलियन और पत्रकार थे जो युद्ध के मोर्चे पर इतने अंदर तक गये।
भारती जी के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं में एक महत्वपूर्ण और विशेष पहलू कुशल और निर्भीक संपादक का रहा है। उन्होंने 1960 से 1986 (26 वर्षों) तक ' धर्मयुग' के माध्यम से पत्रकारिकता की सेवा की। वे आजीवन अपने कर्म को महत्वदेते रहे। उनकी सेवा को देखते हुए भारत सरकार व अन्य राज्य सरकारों ने 1972 में पद्मश्री, 1988 में सर्वश्रेष्ठ नाटककार, 1989 में राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान, 1989 में ही भारत-भारती, 1990 में महाराष्ट्र गौरव , 1994 में व्यास सम्मान से सम्मानित किया था। इसी तरह कई पुरष्कार और सम्मानों से उन्हें नवाजा गया। 'धर्मयुग' की सेवा-मुक्ति के पश्चात् भारतीजी के स्वास्थ में गिरावट आती रही, अंततः 4 सितंबर 1997 की रात्रि को उनका स्वर्गवास हुआ।
वास्तव में धर्मवीर भारती हिंदी से जुड़ा एक ऐसा प्रतिष्ठित नाम है, जिसकी अनुगूंज कई वर्षों से सुनाई दे रही है। भारतीजी मौलिक सोच, अप्रतिम प्रतिभा और विलक्षण अभिव्यक्ति क्षमता का मणि-कांचन योग और अपने ठंग के अनोखे, अलबेले रचनाकार थे।
क्यों याद किया जाए धर्मवीर भारती को? क्योंकि 'गुनाहों का देवता' परिवर्तन के दौर से गुजर रहे भारत का युवा है जिसे पता नहीं कि आदर्श और आकर्षण के बीच की रेखा कितनी धुंधली या साफ है। क्योंकि 'अंधायुग' भारत की विरासत है, जो एक समाज के रूप में कुरुक्षेत्र में भी उसे उद्वेलित करती है और औपनिवेशिक अस्तित्व के साथ महायुद्ध की त्रासदी को भुगतने की पीड़ा को भी अभिव्यक्त करती है। क्योंकि ' सूरज का सातवां घोड़ा ' मध्यवर्गीय आस है कि दुनिया भले ही यूं ही चलती रहे और नारी कभी घऱ में बंद खिड़की से झांककर आकाश के छोटे से टुकड़े से प्यार करती कभी किताबों के साथ सपने देखती है और कभी बिना किसी ओट के खुद को बचाती अंततः समझौते ही करती चली जाए, लेकिन फिर भी उम्मीद की एक किरण है, आगे कहीं रोशनी है। यह कारण ही काफी है धर्मवीर भारती को याद करने के लिए।
भावों को दें उचित आकार साँचे में मन के चीन और जापान में भाषा, संस्कृति, कला तथा जीवन के कई अन्य क्षेत्रों में इतनी अधिक समानता पायी जाती है जिसके कारण इन दोनों देशों का नाम प्राय: साथ-साथ लिया जाता है। इन दोनों देशों की एक विशेषता ये भी है कि इन दोनों देशों में उपहार के तौर पर तरबूज भेंट करने की भी प्रथा है और वो भी चौकोर तरबूज। चौकोर तरबूजों की यहाँ खूब माँग रहती है अत: चीन और जापान के किसान चौकोर तरबूज उगाने पर विशेष ध्यान देते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या खेतों में चौकोर तरबूज उगाए जा सकते हैं? वास्तव में प्राकृतिक रूप से तरबूज चौकोर नहीं होते। तरबूज तो सामान्यत: गोल, अण्डाकार या इन दोनों आकारों से मिलते-जुलते आकार के ही हो सकते हैं लेकिन यहाँ के किसान तरबूजों को चौकोर बनाने के लिए एक पात्र विशेष का सहारा लेते हैं। यह पात्र चौकोर या घनाकार होता है जिसे छोटे फल पर लगा देते हैं। फल जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है वह अपने ऊपर लगे पात्र या खोल का आकार ग्रहण करता जाता है। फल के परिपक्व होने पर पात्र को खोल कर अलग कर दिया जाता है। और इस प्रकार मनचाहे आकार का फल तैयार कर लेते हैं। इंर्टें बनाने के लिए भी साँचों का प्रयोग किया जाता है। साँचों में गीली मिट्टी भरकर उसे निकाल लेते हैं और सूखने पर भट्ठों में पका लेते हैं। इस प्रकार निर्मित इंर्ट तैयार होने के बाद टूट तो सकती है पर उसके आकार को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। जैसा साँचा बिल्वुफल वैसी ही इंर्ट। मिट्टी, पीओपी, लुगदी, मोम अथवा विभिन्न धतुओं और अन्य माध्यमों से मूर्तियाँ या खिलौने बनाने के लिए भी इन सामग्रियों को साँचों में डालकर मनचाहे आकार की प्रतिमा प्राप्त की जा सकती है। दीपावली पर बनी मोमबत्तियाँ हों अथवा चीनी से बने खिलौने साँचों के अभाव में इनको बनाना असंभव ही है। विभिन्न प्रकार की कैंडी, चॉकलेट, आइसक्रीम तथा केक-पेस्ट्री आदि के आकर्षक नमूने बनाने के लिए भी साँचों का खूब प्रयोग किया जाता है। साँचे का अर्थ है मनचाहा आकार। यही बात हमारे व्यक्तित्व तथा परिवेश के निर्माण के संबंध में भी उतनी ही सही है। बाह्य व्यक्तित्व हो अथवा आंतरिक व्यक्तित्व, व्यक्तित्व को सही आकार देने के लिए व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए भी हमें एक साँचे की जरूरत होती है और वह साँचा है व्यक्ति का मन। मन हमारे विचारों का उद्गम स्थल है और मन में उठने वाले विचार ही हमारे व्यक्तित्व और परिवेश का निर्माण करते हैं। हमारा भौतिक शरीर, हमारा स्वास्थ्य, हमारी भौतिक सुख-समृद्धि के साधन, हमारे संबंध तथा हमारे आध्यात्मिक विकास की दिशा सब हमारे विचारों अथवा भावों से ही निर्धारित होता है। जैसे भाव वैसी दशा। हमारा वर्तमान हमारे पिछले भावों अथवा विचार प्रक्रिया का परिणाम ही तो है और आज की विचार प्रक्रिया हमारे आने वाले कल को तथा आगामी हर पल को अवश्य ही प्रभावित करेगी, हमारे भविष्य का निर्माण करेगी। जब एक किसान तरबूज जैसी स्वल्पचेतन या अचेतन वस्तु को मनचाहा आकार दे सकता है। एक कुम्हार निर्जीव मिट्टी को अपेक्षित आकृति प्रदान कर सकता है अथवा एक शिल्पी ठोस धतु को पिघलाकर पुन: पुन: मनमाफिक आकार की प्रतिमा निर्मित कर सकता है तो फिर मनुष्य अपने विचारों या भावों को मनचाहा आकार क्यों नहीं दे सकता? विचारों को आकर्षक और उपयोगी बनाकर अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास क्यों नहीं कर सकता? अवश्य कर सकता है। एक मनुष्य ही तो है जो अपने विचारों से क्रांति ला सकता है, इस समस्त भूमण्डल को परिवर्तित कर सकता है। हर क्रांति, हर परिवर्तन विचारों के द्वारा ही संभव हैं। हर सुधार, हर पुनरुत्थान के पीछे कोई विचार ही तो कार्य करता है। कहा गया है कि ''मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध्मोक्षयो" अर्थात् मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। इसके लिए मन के उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है। मनुष्य अपने मन की शक्ति द्वारा अपने विचारों को आकर्षक और उपयोगी बना सकता है उन्हें मनचाहा आकार दे सकता है। नकारात्मक भावों को त्यागकर सकारात्मक भावों को प्रश्रय दे सकता है। विचारों का उद्गम और नियंत्रण स्थल हमारा मन है और यहीं विचार आकार ग्रहण करते हैं। मन की एक विशेष अवस्था में ही विचार शीघ्र और अपेक्षित आकार ग्रहण कर पाता है और मन की वह अवस्था अभ्यास द्वारा प्राप्त की जा सकती है। ध्यान यही तो है। मन की वह अवस्था है ध्यान जब मन सर्वाध्कि ग्रहणशील होता है। इस अवस्था में जो भी विचार मन को छूता है अथवा मन में जो प्रतिमा बनती है फौरन वह विचार या प्रतिमा भौतिक जगत में वास्तविकता में परिवर्तित हो जाती है। पारस पत्थर लोहे को स्वर्ण में परिवर्तित कर देता है लेकिन मन रूपी पारस पत्थर मात्र विचार को भौतिक जगत की वास्तविकता में परिवर्तित करने में सक्षम है। इस प्रकार मन में उठने वाले विचारों का सीध असर हमारे शरीर मस्तिष्क और बाह्य जगत पर पड़ता है। यदि विचार बुरे हैं, नकारात्मक और निराशावादी हैं तो उनका वैसा ही प्रभाव हम पर होगा इसलिए मन को सदैव सकारात्मक व उपयोगी विचारों से ओतप्रोत रखना अनिवार्य है। लेकिन क्या ये इतना सरल है? मन को नियंत्रित कर विचार प्रक्रिया को सकारात्मक दिशा देना यद्यपि बहुत सरल नहीं है लेकिन असंभव कदापि नहीं। अभ्यास से सब कुछ संभव हो सकेगा। मन में सकारात्मक विचारों को ला सकें, चाहे प्रयास करवेफ जबरदस्ती ही ला सकें यही जरूरी है। इस सकारात्मक विचार प्रक्रिया के प्रवाह से जीवन के हर क्षेत्र अवश्य ही लाभांवित होंगे। यह भी कहा गया है कि ''संकल्पविकल्पात्मवंफ मन:`` अर्थात् मन संकल्प और विकल्प स्वरूप है अत: विकल्प अथवा अनावश्यक संकल्पों या संकल्प वेफ विरोधी भावों का पूर्ण त्याग कर दीजिए। इसी में आवश्यक या अपेक्षित संकल्प की पूर्णता निहित है और इसवेफ लिए अपेक्षित है मन रूपी साँचा। मन ही वह यंत्रा है जो भावों का परिष्कार भी करता है और परिष्कृत भावों को वास्तविकता में बदल कर हमारा जीवन सुखमय बना देता है। संभवत: इसी की पुष्टि कर रहे हैं ये दो शेर : अपने मन में डूब कर पा जा सुरागे-जिंदगी, तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन। -अल्लामा 'इकबाल इन्सां के वास्ते साँचे तो न ढालेगी हयात, इन्सां को आप ही हर साँचे में ढलना होगा। -कैफ़ी आजमी
लगता है दुनिया के सभी खूबसूरत और आकर्षक शहर किसी-न-किसी नदी के किनारे ही बसे हैं,चाहे वह लंदन हो या वैनिस, या फिर अपनी वाराणसी ही। ऐसे ही नदी के किनारे बसे, दो बेहद खूबसूरत शहरों को घूमने का हाल ही में अवसर मिला- पैरिस और बुडापेस्ट। बुडापेस्ट की बात हम किसी अन्य अंक में करेंगे आज युवा-दिलों की धड़कन पैरिस की सैर करते हैं। इसकी ही यादों में भीगते-घूमते हैं---चन्द शब्द चित्र बनाते और संवारते हैं साथ-साथ मिल-बैठकर।
सेन नदी के किनारे बसा खूबसूरत पैरिस शहर सपने देखता नहीं, सपने जीता है। वैभव और रुचि- परिष्कृता में दुनिया में अग्रणी माने जानेवाले इस शहर में करीब-करीब सभी कुछ सुन्दर और संचनीय है। लगता है जैसे सभी कुछ तो है इनके पास---रुचि, धन-दौलत और बहुत सारा आत्मविश्वास...सभी कुछ। ये जो भी सपना देखते हैं, करीब-करीब सच कर लेना जानते हैं। इनके डिस्नी वर्ड में काल्पनिक के साथ सचमुच की परियां और राजकुमार भी घूमते दिख जाते हैं अक्सर ही।
टेम्स के किनारे बसा लंदन जहां एक कौलोनियल शान और छहराव लिए हुए है, पैरिस में चारो तरफ एक चंचल सुन्दरी-सा खुलापन और ताजगी है। अंगूर सा रस और पकी वाइन-सा उन्माद है। जगह-जगह गिटारों पर गाते युवा, चित्र बनाते कलाकार वातावरण में एक अकथ रूमानियत ला देते हैं, तो चारो तरफ छितरे सैलानी एक उत्साह। चाहे आप इनके भव्य महलों में घूम रहे हों या विशाल संग्रहालयों में एक संपन्नता और आनन्द का आभास मुखर रहता है। यहां के खिले गुलाबी मौसम का भी इसमें एक बड़ा हाथ हो सकता है पर पैरिस आज भी यौवन और रोमांस का शहर...कला और फैशन की राजधानी माना जाता है। चारो तरफ घूमते तस्बीरों से सुन्दर चेहरे सीधे किसी कैटवॉक से आए दिखते हैं और उसी नज़ाकत से बगल से निकल भी जाते हैं---शैनेल और रिवेगौश की खुशबू में मन को संग-संग लपेटते-झटकते। बाँधे रखना इन्हें भी अच्छी तरह से आता है...बात चाहे फ्रेंच शिफौन की हो, या फिर फ्रांस के इत्रों की। वैसे भी यह स्कार्फ और हैटों का शहर है। साड़ी की तरह इनके भी इस छोटे-से टुकड़े में भी बहुत जादू है। जिस कलात्मक ढंग से इसे यहां बांधा जाता है, एक-से-एक प्लेन जेन को मिनटों में ही मडोना बना देता है यह। रूप और यौवन दोनों के ही प्रदर्शन में यहां किसी को कोई झिझक नहीं, फिर वह लूडो या मौलिनारूज़ के किसी शो की कैन-कैन डान्सर हों या फिर शॉजेलिजा में शॉपिंग करती आधुनिक युवतियां। और तारीफ यह है कि इस प्रदर्शन में भी न जाने क्यों एक सुरुचिपूर्ण कला ही नजर आती है देखने वाले को, नग्न भोंडापन नहीं। कई बार तो एक सादे पंख या पत्ते से ही बड़े कलात्मक रूप से ये अपने को संवार भी लेती हैं और ढक भी। मंत्र-मुग्ध-सा देखने वाला बस देखता ही रह जाता है और यहां के युवा व प्रौढ़ दोनों ही अश्लीलता और फौंडेपन के आरोप से बचे, इतराते, मस्ती बिखेरते घूमते रहते हैं।
कला प्रेमियों के लिए तो यह शहर किसी भी खजाने से कम नहीं। मोनालिसा की मुस्कान के जादू से भला कौन बच पाया है। यहां के प्रसिद्ध म्यूजियम और चित्रघरों की तो बात ही छोड़िए, सड़कों और नावों में घूमते हुए भी एक-से-एक सुन्दर मूर्तियों और कलाकारी के नमूने पुलों के नीचे, खम्बों पर, चारो तरफ देखे जा सकते हैं। नदी के किनारे घूमते हुए तो ऐसा लगता है मानो सड़क पर नहीं, किसी म्यूजियम के अन्दर ही घूम रहे हैं। ग्रीक और रोमन असर बहुत स्पष्ट है। सुन्दर कलाकृतियों के बीच ब्रिटिश बुलडॉग श्रीमान चर्चिल जी को देखकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। नीचे लिखा था कि फ्रांस इनका आभारी है और साथ में थे वे प्रेरणादायक शब्द भी, ' हम कभी आत्म-समर्पण नहीं करेंगे।' चरित्र की यही वफादारी और दृढ़ता थी, जिसकी वजह से यहां के लोगों ने इन्हें बुलडॉग की उपाधि दी थी।
एफिल टावर पर चढ़ते ही शहर का जो दृश्य सर्वाधिक मन मोहता है, वह है इनका प्रकृति प्रेम और हरे भरे लॉन व ऊँची-ऊँची अठखेलियां लेते फब्बारे। असलियत में तो पूरा पेरिस ही प्रेमियों और कलाकारों का एक नाजुक और जीवंत शहर लगता है। दिनरात कला और संस्कृति की अनूठी खुशबू से महकता-गमकता।
पैरिस के मशहूर नाइट क्लबों में जाए बगैर पैरिस की घुमाई पूरी नहीं होती। संयोग की ही बात है कि हाल ही में भारत से (वह भी वाराणसी से) आए स्वजनों के साथ पैरिस के एक बेहद नामी और फैशनेबल नाइट क्लब में बैठे हम वही अपने पौराणिक सफेद एरावत हाथी और उसपर सवार कमल से प्रकट लक्ष्मी जी को देख रहे थे-बोनिहेम नामक उस रंगारंग, भड़कीले और मादक कार्यक्रम में बेहद लचीली कलाबाज और अर्धनग्न लड़कियों के साथ नाचते गणपति भी थे, वह भी एक नहीं दर्जनों---पर मुझे यह परेशानी और शर्म क्यों महसूस हो रही थी? खुद ही तो टिकट खरीदकर, पैसे देकर आयी थी ! और फिर सब कुछ ही तो बहुत ही कलात्मक, सुरुचिपूर्ण था, क्लब की ख्याति के पूर्णतः अनुकूल। तीस साल पहले इसी क्लब में देखे कार्यक्रम की बेहिसाब तारीफ भी तो मैने ही की थी...और सबको लेकर भी आयी ...और अगर भारतीय संवेदना को भूलकर, एक यूरोपियन की तरह सोचूं तो कार्यक्रम कला और मनोरंजन की दृष्टि से अति सफल और अभूतपूर्व ही तो था। रंगारंग था। साज-सज्जा, कला और रुचि में अग्रणीय और अद्वितीय होने के साथ-साथ भव्य और मनोरंजन से भरपूर था।
पर मन था कि कुछ समझ ही नहीं रहा था-भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथा-वह भी पैरिस के फैशनेबल शो-केस नाइट क्लब में ---एक गर्व की बात होनी चाहिए थी हमारे लिए---वैसे भी तो पूरे विश्व को हम अपनी संस्कृति के बारे में बताना चाहते हैं---यदि हम प्रचलित होंगे तो थोड़ा बहुत दुरुपयोग तो होगा ही। क्यों इस मशहूर नाइट क्लब ने इतना विचलित कर दिया है, उलझन में क्यों हूं?... आखिर यही तो हम चाहते हैं कि विश्वीकरण के इस व्यापारिक आधुनिक समाज में खूब सारी विदेशी मुद्रा और भरपूर ख्याति मिले हमें। भारत और भारतीय कला विश्व के आगे आए, पर शायद इस कीमत पर और इस रूप में नहीं---देवी लक्ष्मी वह भी अर्ध नग्न केन-केन गर्ल्स के साथ गरिमाहीन कूदती हुई---दर्जनों गणेश, मात्र एक विचित्र अलंकरण बने हुए आगे पीछे घूमते हुए? अभी अपनी सोच को सुलझा तक पाऊं की वेट्रेस ट्रे भरकर बेचने के लिए चीजें ले आई । कौतुक भरी आंखों से मैने देखा कि तरह-तरह के सुविनियर पर छपी हमारी तस्बीरें एक दूसरे को आंखें मार रही थीं। बचपन के वे दिन याद आ गये जब हम ऐसी स्केल खरीदा करते थे जिनपर शेर
शो के अंत में एक बार फिर सारी नेक-नीयती और खैर-खयाली को पर्स में समेटे, एक अच्छे , सभ्य और सहिष्णु ( साहसहीन) भारतीय की तरह बिना कोई आपत्ति उठाए, आयोजकों से शिकायत किए बगैर ही शैम्पेन और पैरिस के नशे में धुत् हम अन्य यूरोपियन्स की तरह ही, ताली बजाते---यादों के सुविनियर उठाते, चुपचाप वापस लौट आये। मन में उठते असंतोष का जिक्र तक नहीं हुआ।
लौटते-लौटते रात के ग्यारह बज गये थे। जगमग नियोन लाइट्स के बीच उस पांचतारा होटल के मंहगे रेस्टोरैंट में बैठी देख रही थी कि परीशियन्स और टूरिस्ट दोनों ही अपने गर्म और मुलायम बिस्तर में जाने से पहले, कैसे हंस-हंस कर भरे पेट का जायका बदल रहे थे और वहीं पास में परछांई-सा खड़ा वह चुपचाप लोगों की बची झूठन में से अपने खाने लायक सामान बीने जा रहा था। काउन्टर से ढेर सारे टिशू नैपकिन्स भी उठा लिए थे उसने...रात के खाने के साथ-साथ सोने का भी तो इन्तजाम करना था उसे।
इन भव्य इमारतों के शहर में भी सैकड़ों लोग स्टेशन और पुलों के नीचे सोते दिख जाते हैं। हर महानगरी की तरह यहां भी सड़क सड़क पर सोने वालों की कमी नहीं, फ़र्क बस इतना ही है कि इनमें से कई के बगल में गिटार या पेन्ट ब्रश दिख जाएंगे---रोल्ड स्केच दिख जाएंगे। हर देश की तरह यहां भी किसी को ये दिखाई नहीं देते---आर्टिस्ट बनकर जीना शायद कहीं भी और कभी भी आसान नहीं !
सफेद सुरमई बादलों के कालीन पर जहाज हमें लेकर घर की तरफ वापस दौड़ रहा था पर मन बारबार पीछे की ओर ही लपका जा रहा था। झरने-सी चंचल, चिड़ियों-सी मुखरित और नदी-सी बहती पिछले चन्द दिनों की अनगिनत यादें बिखरी पड़ी थीं चारो तरफ। कहीं कुछ छूट न जाए, आहिस्ता-आहिस्ता सब सम्भाल और समेट लेना चाहती हूँ। कितना संभव हुआ नहीं जानती, क्योंकि यह तो बिल्कुल उस पैरिस के डिस्नीलैंड की इंडियाना जोन्स की राइड जैसी ही कठिन बात है। उस राइड में भी बिठाया तो सीधे ही जाता है पर हम उलटे चलते हैं। तेजी से घूमते चक्कर खाते और गुरुत्वाकर्षण के साथ-साथ दीन-दुनिया सब भूल जाते हैं। समय और दिशा तक का ध्यान नहीं रख पाते। पीछे की तरफ झुकते हैं तो आगे को गिरते हैं और आगे झुककर संतुलित होने का प्रयास करते हैं, तो पीछे लुढ़क जाते हैं। पर मजा यह है कि एक अजब आल्हादित भय से रोमांचित, हम कितनी ही कसमें क्यों न खाएं कि अब ऐसी हिम्मत दोबारा नहीं करेंगे, अगले ही पल बच्चों सी ललक लिए फिर एक और नयी राइड पर जा बैठते हैं---तेजी से उलटे-सीधे घूमते। इस पैरिस शहर की लत भी कुछ ऐसी ही है...किसी न किसी बहाने सैलानी पहुंच ही जाता है...कभी जीवन का कोई विशेष उत्सव मनाने तो कभी प्रियजनों को घुमाने और जबसे डिस्नीवर्ड खुला है, पैरिस से दूर रह पाना इतना आसान नहीं। परिवार के नन्हे-नन्हे वी.आई. पी. आपको वापस उंगली पकड़ कर ले ही आते हैं । और एकबार पहुंच जाओ, तो स्पेस- माउन्टेन पर बैठे उन चीखते-चिल्लाते, सीटी बजाते लोगों के हुजूम में बैठकर यह तो नहीं सोचा जाता कि हम यहां पर क्या कर रहे हैं-या क्यों आए...यह उम्र तो नहीं यह सब करने की! जब चारो तरफ बहता खुशी और आवेग का रेला इतना जबर्दस्त हो तो क्या फर्क पड़ता है उम्र पांच की है या पचपन की...।
अन्वी अपने स्कूल से ,टीचर से अपने फ्रेंड्स से बहुत प्यार करती है .और सभी उस को बहुत प्यार करते हैं .एक दिन वो जब स्कूल से घर आई तो बहुत खुश थी। "माँ जानती हो मेरे स्कूल मे नाटक होने वाला है सिन्डरैला। जानती हो माँ मुझे सिन्डरैला बनना है . और मै जानती हूँ की मुझे जरूर यही रोल मिलेगा "अन्वी ने कहा। पूरे दिन अन्वी बस नाटक की ही बात करती रही। न जाने क्या क्या तैयारी करती रही । क्या ड्रेस पहनेगी ये भी सोच लिया था। दूसरे दिन जब वो स्कूल से .घर आई तो बहुत बहुत दुखी थी । . मेने पूछा "क्या हुआ अन्वी मुहँ क्यों लटका हुआ है इतना दुखी क्यों हो ?" "माँ जानती ही मुझे फेरी गौड़ मदर का रोल मिला है। मुझे नही करना। मुझे तो बस सिन्डरैला ही बनना है, बस। " अन्वी ने गुस्से और दुःख से कहा . देखो बेटा नाटक किसी एक व्यक्ति से तो हो नही सकता इस मे कई पात्र होते हैं और सभी की भूमिका बराबर की महत्वपूण होती है । वैसे ही तुम्हारी भूमिका भी सिन्डरैला जितनी ही अच्छी है" .मेने समझाने की कोशिश की । "नही माँ सिन्डरैला को जयादा सुंदर बनना है। सभी उस को देखिंगे। कोई मुझे नही देखेगा। मुझे नही करनी। "और अन्वी रोने लगी मैने उस को चुप करते हुए कहा "देखो यदि तुम आपना काम अच्छे से करोगी तो सभी तुम को देखिंगे भी और तुम्हारी तारीफ भी करेंगे। .अच्छा सुनो जानती हो मेरे साथ भी एसा हुआ था एक बार। राम बनवास पे एक नाटक हो रहा था। राम जी की कहानी मैने तुम को सुनाई है न। अन्वी ने हाँ मे सिर हिलाया । वो मेरी बात बहुत धयान से सुन रही थी। उस मे कैकेई का रोल मुख्य था । मै वही रोल करना चाहती थी पर मुझे मिला मन्थरा का रोल । जानती हो न मन्थरा को । अन्वी ने फ़िर हाँ मे सिर हिलाया। मै तुम्हारी ही तरह बहुत दुखी थी। बहुत रोई भी थी .पर क्या करती या तो नाटक न करती या फ़िर मै मन्थरा बनना स्वकार कर लेती। .उस बार कहा गया था की जो सबसे अच्छा अभिनय (एक्टिंग )करेगा उस को गोल्ड मेडल मिलेगा। मै बहुत दुखी थी। तुम्हारी नानी मुझे समझा रही थी और मै समझ नही पा रही थी। दूसरे दिन तुम्हारी नानी एक गाना गा रही थी पूरा गाना ठीक गाती पर एक जगह कुछ अजीब तरह से गा रही थी। मै बोली "माँ ये क्या कर रही हो ठीक से गाओ पूरा गाना ख़राब हो रहा है । तो जानती हो तुमहारी नानी क्या बोली, बोली की देखो बेटा जिस तरह से गाने मे एक सुर ग़लत हुआ तो पूरा गाना ख़राब हो गया, उसी तरह से नाटक मे यदि एक भी पात्र ग़लत करे, आपना डायलौग ग़लत बोले तो पूरा नाटक ख़राब हो जाता है। जिस तरह गाने मे हर सुर महत्व रखता है उसी तरह नाटक मे हर पात्र महतवपूरण. होता है। तुम चाहे छोटे से रोल मे हो या बड़े रोल मे, अच्छी तरह से करो तो लोग तुमहारी तारीफ जरूर करेंगे । तुम्हारी नानी की ये बात मुझको समझ आगई .और मैने मंथरा का रोल ले लिया। मैने मन से और मेहनत से मंथरा का रोल किया। सभी को मेरा काम बहुत पसंद आया और जानती हो गोल्ड मेडल मुझे मिला। " अन्वी आ के मेरे गले लग गई बोली "माँ मै समझ गई मै फेरी गौड़ मदर ही बनूंगी और खूब मन से आपना काम करुँगी।" अन्वी ने फ़िर बहुत मेहनत की और जब उसका नाटक हुआ सब ने उसकी एक्टिंग की बहुत तारीफ की। उस को स्टेज पे बुला के प्रिंस्पल ने उस की प्रशंसा की । अन्वी ने मुझे देखा और मुस्कुरा दी ।
तो बच्चों इस कहानी से ये शिक्षा मिलती है की कोइभी काम छोटा बड़ा नही होता हर चीज आपनी जगह महतवपूरण होती है। हम काम छोटा करे या बड़ा, मन लगा के और मेहनत से करना चाहिए ।
चांद पे होता घर मेरा तो
चांद पे होता घर मेरा तो खूब मजे मै करता माँ पापा की डाट से भी सदा बचा मै रहता परियों के संग बातें करता मटक मटक के चलता तारों मे छुप छुप के मै आँख मिचोली खेलता बादलों की कर सवारी दुनिया की सैर करता जो जी चाहता वो सब मै करता किसी से कभी न डरता आती माँ की याद कभी तो झट नीचे आ जाता