" आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा - तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा।"
-जयशंकर प्रसाद
(अँक 26)
लेखनी-अप्रैल-2009
इस अँक में- नारी-मनःअनामिका। कविता धरोहरः अमृता प्रीतम। माह की कवियत्रीः निर्मला सिंह। कविता आज और अभीःसुनील कुमार, इन्दु जैन, शीला सिद्धांतकर, राग तैलंग, शुभा, शैल अग्रवाल, इला प्रसाद।बाल कविताःशैल अग्रवाल।
मंथनःचंद्रकांता। कहानीः विनोद साव । शेष अशेषः भाग 19। दो लघुकथाएँ यू.एस. आनंद। स्मृति शेषःरचना श्रीवास्तव। परिचर्चाः वीरेन्द्र सिंह। साक्षात्कारःविनोद सुरोलिया। हास्य व्यंग्यःगोपाल चतुर्वेदी। पर्यटनः दिनेश ध्यानी। बाल कहानीः प्रदीप अग्रवाल। व खबरों से भरपूर विविधा।
विचार जब पद्धति बन जाएँ तो खतरनाक स्थिति है और नारी के साथ तो जाने कब से यही होता आया है....समाज के रवैये में भी और खुद उसकी अपनी नजर में भी । उगते सपनों की घास और झुकते चांद की परछांई बेहद नशीली होती है और पुरुष ने ऐसा रोपा है अपनी सुविधानुसार दोनों के बीच कि आजतक धान-सी फल-फूल रही है और खुश भी है। सदियों से चला आता समाज का दोयम दर्जें का रवैया न सिर्फ उसे हर क्षेत्र में बेड़ियां पहनाकर जकड़ रहा है, खुद वह भी तो नियति मानकर स्वीकार चुकी है स्थिति को। पुरुष की हर उच्छृंखलता को ममतामयी मां सी आंचल से पोंछने वाली नारी वाकई में लड़े तो किससे लड़े! नारी विमर्श तो वह साझा चूल्हा है जिसपर सबके लिए प्यार की खिचड़ी पकाना ही सीख और देख पाई है वह। अगर ऐसा न कर पाए तो दादी नानियों की कई-कई पीढ़ियों से दगाबाजी-करती भी तो महसूस करती है वह। उसका चूल्हा ठंडा तो रह सकता है पर जलेगा तो स्वादिष्ट पकवान ही उगलेगा।
जीने के दो ही मार्ग छोड़े गए हैं उसके लिए , या तो किसी सशक्त पुरुष की छतनारी छाया में जा बैठे या फिर किसीकी न होकर सबका ही मनोरंजन और कौतुक बन जाए। उसे भी तो कहीं न कहीं शायद आदत पड़ चुकी है इस सबकी, तभी तो सदैव ललायित रहती है, प्रशंसा की मात्र एक दृष्टि के लिए। बढती सौंदर्य प्रसाधनों की बिक्री गवाह है इस बात की कि उसे भी सजी-धजी गुड़िया बनकर रहना पसंद है। अपने शरीर...रूप के औजार की ताकत जानती है वह। क्या क्या नहीं करती या कर गुजरती प्रसन्न करने को ... खुद को भूलकर, अपने अस्तित्व को भुलाकर। भांति भांति के श्रंगार, पकवान, तरह-तरह के आयोजन...सभी कुछ। और बदले में अधिकाशतः प्रताडना व लांछन या फिर वही अग्नि-परीक्षा। अतिशयोक्ति नहीं होगी यदि कहा जाए कि बढ़ती भौतिकवादिता के साथ आज नारी मनोरंजन और विज्ञापन का साधन मात्र बनकर ही तो रह गई है, तस्बीरों सी या तो घरों की दीवारों पर लटक गई है या फिर पब्लिक हाउसेज और दफ्तरों में सेन्टर पीस बनी फिरकनी सी नाच रही है। किसी दूसरे के हाथ में रखे रिमोट से संचालित होकर स्वाधीनता की खुशफहमी का शिकार है। गलती से कुछ कर गुजरे, कोई मुकाम हासिल कर ले तो प्रसंशा की जगह परिहास ही ज्यादा आता है हिस्से में। 'औरत होकर इतना कर गई'- यही सुनने को मिलेगा। क्या उदास, बेबस और अबला जैसे शब्दों से अलंकृत यह नारी घर से बाहर वाकई में निकल पाई है ? कोई-न-कोई छतरी अवश्य तनी रहती है सिर पर वरना भांति भांति की नजरों की धूप ही पर्याप्त है सुखाने और गिराने के लिए । शायद यही वजह है कि समानाधिकार जैसे मुद्दे इसके पक्ष में उछाले तो आए दिन ही जाते हैं पर मात्र एक गरम तवे पर छन्नाती बूंद से पलभर में तुरंत ही सूख भी जाते हैं। आजभी ऐसे देश मिल जाएँगे जहां बच्चियां आजीवन ड्योढ़ी नहीं लांघती। जिस घर में पैदा हुईं, उसी में बच्चे संभालती अर्थी पर चढ़कर ही बाहर आ पाती हैं।
अधिकार भी तो देने से नहीं, लेने से मिलता है। जबतक नारी खुद शिक्षित और जागरूक नहीं होगी , अपनी जाति अपने समाज का, खुद का ही हनन और शोषण करना नहीं छोड़ेगी , नारी विकास और समानाधिकार की बातें बेमानी ही रहेंगी। भवानी प्रसाद मिश्र के शब्दों में कहूं तो,
पृथ्वी ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़ भूचाल बेलते हैं घर सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर।
रोज़ सुबह सूरज में एक नया उचकुन लगाकर एक नई धाह फेंककर मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी। पृथ्वी– जो खुद एक लोई है सूरज के हाथों में रख दी गई है, पूरी की पूरी ही सामने कि लो, इसे बेलो, पकाओ जैसे मधुमक्खियाँ अपने पंखों की छाँह में पकाती हैं शहद।
सारा शहर चुप है धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन। बुझ चुकी है आखिरी चूल्हे की राख भी और मैं अपने ही वजूद की आँच के आगे औचक हड़बड़ी में खुद को ही सानती खुद को ही गूँधती हुई बार-बार खुश हूँ कि रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।
मौसियां
वे बारिश में धूप की तरह आती हैं — थोड़े समय के लिए और अचानक हाथ के बुने स्वेटर, इंद्रधनुष, तिल के लड्डू और सधोर की साड़ी लेकर वे आती हैं झूला झुलाने पहली मितली की ख़बर पाकर और गर्भ सहलाकर लेती हैं अन्तरिम रपट गृहचक्र, बिस्तर और खुदरा उदासियों की
झाड़ती हैं जाले, संभालती हैं बक्से मेहनत से सुलझाती हैं भीतर तक उलझे बाल कर देती हैं चोटी-पाटी और डाँटती भी जाती हैं कि री पगली तू किस धुन में रहती है कि बालों की गाँठें भी तुझसे ठीक से निकलती नहीं
बालों के बहाने वे गाँठें सुलझाती हैं जीवन की करती हैं परिहास, सुनाती हैं किस्से और फिर हँसती-हँसाती दबी-सधी आवाज़ में बताती जाती हैं –– चटनी-अचार-मूंगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध चटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्खे –– सारी उन तकलीफ़ों के जिन पर ध्यान भी नहीं जाता औरों का
आँखों के नीचे धीरे-धीरे जिसके पसर जाते हैं साये और गर्भ से रिसते हैं महीनों चुपचाप –– ख़ून के आँसू-से चालीस के आसपास के अकेलेपन के उन काले-कत्थई चकत्तों का मौसियों के वैद्यक में एक ही इलाज है –– हँसी और कालीपूजा और पूरे मोहल्ले की अम्मागीरी
बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी लेती गई खेत से कोड़कर अपने जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें –– जैसे मौसीपन, बुआपन, चाचीपंथी, अम्मागीरी मग्न सारे भुवन की।
एक औरत का पहला राजकीय प्रवास
वह होटल के कमरे में दाख़िल हुई अपने अकेलेपन से उसने बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया
कमरे में अंधेरा था घुप्प अंधेरा था कुएँ का उसके भीतर भी !
सारी दीवारें टटोली अंधेरे में लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था पूरा खुला था दरवाज़ा बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था सामने से गुजरा जो ‘बेयरा’ तो आर्त्तभाव से उसे देखा उसने उलझन समझी और बाहर खड़े-ही-खड़े दरवाजा बंद कर दिया
जैसे ही दरवाजा बंद हुआ बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल ! “भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता ?” उसने सोचा
डनलप पर लेटी चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं–- रीढ़ के भीतर ! तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत ? सात गलीचों के भीतर भी उसको चुभ जाता है कोई मटरदाना आदिम स्मृतियों का ?
पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था पर उसने बांची टेलीफोन तालिका और जानना चाहा अंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक ख़र्चा
फिर, अपने सब डॉलर ख़र्च करके उसने किए तीन अलग-अलग कॉल
सबसे पहले अपने बच्चे से कहा–- “हैलो-हैलो, बेटे–- पैकिंग के वक्त… सूटकेस में ही तुम ऊंघ गए थे कैसे… सबसे ज़्यादा याद आ रही है तुम्हारी तुम हो मेरे सबसे प्यारे !”
अंतिम दो पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहीं आफिस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय से फिर, चौके में चिन्तित, बर्तन खटकाती अपनी माँ से
… अब उसकी हुई गिरफ़्तारी पेशी हुई ख़ुदा के सामने कि इसी एक ज़ुबाँ से उसने तीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा –- “सबसे ज्यादा तुम हो प्यारे !” यह तो सरासर है धोखा सबसे ज्यादा माने सबसे ज्यादा !
लेकिन, ख़ुदा ने कलम रख दी और कहा–- “औरत है, उसने यह ग़लत नहीं कहा !”
स्त्रियां
पढ़ा गया हमको जैसे पढ़ा जाता है काग़ज बच्चों की फटी कॉपियों का ‘चनाजोरगरम’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले
देखा गया हमको जैसे कि कुफ्त हो उनींदे देखी जाती है कलाई घड़ी अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद
सुना गया हमको यों ही उड़ते मन से जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने सस्ते कैसेटों पर ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में
भोगा गया हमको बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह एक दिन हमने कहा –– हम भी इंसान हैं हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद नौकरी का पहला विज्ञापन
देखो तो ऐसे जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है बहुत दूर जलती हुई आग
सुनो, हमें अनहद की तरह और समझो जैसे समझी जाती है नई-नई सीखी हुई भाषा
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई एक अदृश्य टहनी से टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें चीखती हुई चीं-चीं ‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं –– किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली-फैलीं अगरधत्त जंगल लताएं ! खाती-पीती, सुख से ऊबी और बेकार-बेचैन, अवारा महिलाओं का ही शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं’ (कनखियाँ इशारे, फिर कनखी) बाक़ी कहानी बस कनखी है हे परमपिताओ, परमपुरुषो –– बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो
बेजगह
अपनी जगह से गिर कर कहीं के नहीं रहते केश, औरतें और नाखून" - अन्वय करते थे किसी श्लोक का ऐसे हमारे संस्कृत टीचर! और मारे डर के जम जाती थीं हम लड़कियाँ अपनी जगह पर!
जगह? जगह क्या होती है? यह, वैसे, जान लिया था हमने अपनी पहली कक्षा में ही! याद था हमें एक-एक अक्षर आरंभिक पाठों का- "राम, पाठशाला जा! राधा, खाना पका! राम, आ बताशा खा! राधा, झाडू लगा! भैया अब सोएगा, जा कर बिस्तर बिछा! अहा, नया घर है! राम, देख यह तेरा कमरा है! 'और मेरा?' 'ओ पगली, लड़कियाँ हवा, धूप, मिट्टी होती हैं उनका कोई घर नहीं होता!"
जिनका कोई घर नहीं होता- उनकी होती है भला कौन-सी जगह? कौन-सी जगह होती है ऐसी जो छूट जाने पर औरत हो जाती है
कटे हुए नाखूनों, कंघी में फँस कर बाहर आए केशों-सी एकदम से बुहार दी जाने वाली?
घर छूटे, दर छूटे, छूट गए लोग-बाग, कुछ प्रश्न पीछे पड़े थे, वे भी छूटे! छूटती गई जगहें
लेकिन कभी तो नेलकटर या कंघियों में फँसे पड़े होने का एहसास नहीं हुआ!
परंपरा से छूट कर बस यह लगता है- किसी बड़े क्लासिक से पासकोर्स बीए के प्रश्नपत्र पर छिटकी छोटी-सी पंक्ति हूँ - चाहती नहीं लेकिन कोई करने बैठे मेरी व्याख्या सप्रसंग!
सारे संदर्भों के पार मुश्किल से उड़ कर पहुँची हूँ, ऐसे ही समझी-पढ़ी जाऊँ जैसे तुकाराम का कोई अधूरा अभंग!
साहित्य के केन्द्र में मनुष्य और उसकी व्यथा-कथा, उसके संघर्ष, स्वप्न और उम्मीदें रहती हैं। यहाँ स्त्री को अलग खांचे में रखकर उसपर विचार करना संभव नहीं क्योंकि वह व्यवस्था के हर अनुषंग से जुड़ी है। लेकिन यह सच है कि पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज में उसकी समस्याएँ बेशुमार हैं, महिला रचनाकार उन समस्याओं की तह तक जाकर, स्त्रीयों की पीड़ा को स्वर दे रही हैं और उनके आक्रोशी तेवर की स्वीकृति भी। भारत में ही नहीं समूचे विश्व में, हर युग में नारी शोषण का शिकार रही, पूँजीवादी युग में तो वह वस्तु ही बन गई। इसी स्थिति की, प्रतिक्रिया स्वरूप फ़ेमिनिज्म की आवाज उठी।सोमेन द् बोआर ने कहा, ' धर्म और सामाजिक रूढ़ियों ने स्त्री को दोयम दर्जा दिया है। ' पाश्चात्य देशों में नारियों ने पुरुष और विवाह संस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाई। परंतु भारत में स्त्री-विमर्श घर-परिवार को तोड़ने नहीं जोड़ने की बात करता है। इस विमर्श में केट मिलेट का ' सेक्सुअल पॉलिटिक्स ', मार्गेड मीड और एलिन शू माकर की विचारधारा नहीं, जो पुरुष सत्ता का विकल्प ढूँढती है। यहाँ स्त्री पुरुष के समकक्ष रहकर एक साझे का सम्मानजनक जीवन जीना चाहती है। समाज में स्वस्थ सहभागिता पर स्त्री जोर दे रही है। मार्क्स ने स्त्री को सर्वहारा के खाते में दे उसकी दशा का वर्णन किया, आज कुछ बुद्धिजीवी, दलित और स्त्री को अलग वर्ग में डालकर उसकी पीड़ा को स्वर दे रहे हैं। यों हमारे पुरुष लेखकों ने भी स्त्री-विमर्श पर रचनाएँ की हैं। भगवती चरण वर्मा, यशपाल, प्रेमचन्द से लेकर सुरेन्द्र वर्मा, कृष्ण वलदेव वैद आदि ने भी स्त्री-स्वातंत्र्य के प्रश्न अपने-अपने ढंग से उठाए हैं, पर जिस शिद्दत से महिला रचनाकारों ने स्त्री के पारिवारिक-सामाजिक उत्पीड़न को संवेदी और आक्रोशी तेवर दिए हैं, वह स्त्री के मानस की अनकही पीड़ा का महा आख्यान है। कृष्णा सोबती का उपन्यास मित्रों मरजानी हो या दिलोदानिश, यहाँ स्त्री देवी नहीं, हाड़-मांस की प्राणी है, वह अपनी इच्छाओं और स्वप्नों को साकार करना चाहती है। पीली आँधी हो या कठगुलाब, यहाँ स्त्री पारिवारिक रूढ़ नीतियों और शोषण के विरुद्ध सशक्त संघर्ष करती है। आँवा की नायिका स्त्री को मात्र देह मानने से इंकार ही नहीं करती, स्त्री-विरोधी पुरुष मानसिकता का डटकर प्रतिरोध भी करती है। मन्नू भंडारी, नासिरा शर्मा, मृणाल पांडे, सिम्मी हर्षिता, मैत्रेयी पुष्पा, कमल कुमार, सूर्यबाला आदि अनेक लेखिकाएँ साहित्य में स्त्री-अस्मिता से जुड़े गंभीर प्रश्न उठा रही हैं।
स्त्री-विमर्श के झंडे मैने नहीं गाड़े, पर मेरे उपन्यासों और अधिकांश कहानियों की रीढ़ स्त्रियां हैं। मैने समय और समाज के बदलते परिवेश में, व्यवस्था के भिन्न पक्षों के बीच रखकर स्त्री के संघर्षों, अधिकारों, शोषण और विद्रोहों का परीक्षण किया है। मैं महाश्वेता की तरह मानती हूँ कि लेखिकाओं को ' स्त्रीवाद की बहसों में उलझने के बजाय स्त्री को ज़मीनी सच्चाइयों के साथ देखना जरूरी है। ' आज स्त्री-लेखन का मुद्दा एक रणक्षेत्र बनता जा रहा है। कुछ बुद्धिजीवी नारीवाद का झंडा उठाते हैं, कुछ स्त्रीवाद शब्द को परिवार के लिए खतरा मानते हैं, दोनों मेरे विचारों में गैर -जरूरी हैं।
आज के इस भूमंडलीकरण और वीडियो व इंटरनेट के दौर में, जब उपभोक्तावादी रुझानों ने स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री को एक वस्तु ही बना डाला है, मुझे लगता है हमें नए सिरे से स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों पर विचार करने की जरूरत है। स्त्रियों को आत्ममंथन की जरूरत है कि वह कैसी स्त्री बनना चाहती हैं? दूसरी ओर यह भी विचारणीय स्थिति है कि प्रगति कई सोपान पार करने के बाद भी हम एक अँधेरे युग में जी रहे हैं, जहाँ आज भी पारिवारिक शोषण, बलात्कार, दहेज-दहन और स्त्री-उत्पीड़न की घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं। आतंकवाद ने स्त्री को कई स्तरों पर शोषित-प्रताड़ित किया है। मैने अर्थांतर उपन्यास के माध्यम से, तथाकथित संस्कारशील घरों में घुटते दांपत्य और अस्तित्वहीनता की यंत्रणा सहती स्त्री के अंतर्द्वंद्व ही नहीं दिखाए, बल्कि रूढ़ नैतिकता और पुरुष अहं का परीक्षण करती ' कम्मो' की सहज जीवन जीने की आकांक्षा को नए अर्थ देने की कोशिश को भी बल दिया है। अँतिम साक्ष्य उपन्यास में जहां ' बीजी ' की आस्थाओं का करुण अंत है, वहीं मीना मौसी की, टूटे परिवारों को जोड़ती अक्खड़ जिजीविषा भी है। मेरी स्त्री समर्थ होने की कोशिशों में संघर्षशील है, पर वह पुरुष को कहीं भी अस्वीकार नहीं करती, बस, बराबर में एक सम्मानपूर्ण जगह चाहती है। बाकी सब खैरियत है उपन्यास की नायिका पारुल घर-परिवार के लिए त्याग करती अपनी इच्छाओं और स्वप्नों का होम करती है, परन्तु उसकी बेटी ऋचा, माँ के त्याग को अर्थ की तुला में हल्का पड़ते देख उस त्याग की निरर्थकता महसूस करती और कराती है।
यहां वितस्ता बहती है, उपन्यास हो या ऐलान गली ज़िन्दा है, स्त्रियां मेरे उपन्यासों की शक्ति हैं। कहीं-कहीं व्यवस्था की जकड़नों में फँसी होने के बावजूद वे जंजीरें तोड़ने के लिए संघर्ष करती हैं ताकि जीवन भयमुक्त हो और उसे गरिमा मिले। मेरी स्त्री जननी है, घर-परिवार की धुरी , उसे सम्मानसे जीने का अधिकार है, अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए वह लड़ाई लड़ती है, गलत का विरोध कर आवाज उठाती है । यहां विस्तता बहती है की गौरी हो या ऐलान गली...की रत्नी, अपनी आकांक्षाओं को जीने का हौसला रखती हैं। अपने-अपने कोणार्क की कुनी, कोणार्क और जगन्नाथ धाम की परंपराओं को बंद आँखों नहीं स्वीकारतीं, बल्कि समय-संदर्भों के साथ सही-ग़लत का निर्णय लेकर अपनी दिशा आप तय कर लेती हैं। जीवन के सच की तलाश करतीं मेरी स्त्रियां, घर-परिवार को तोड़ती नहीं, जोड़ने की कोशिश करती हैं, पर अपने आत्मसम्मान और अधिकारों से समझौता नहीं करतीं। कथा सतीसर के ढाँचे में स्त्रियां प्राणतत्व बनकर आई हैं। रामकुमार कृषक के शब्दों में, ' इस वृहद् उपन्यास में स्त्री पात्र ही चरित्र संवेदना को सर्वाधिक झकझोरते हैं। आकस्मिक नहीं कि चंद्रकांता इनके दुःख से गहरे जुड़ी है। ' आतंकवाद ने स्त्री पर दुहरी मार कर दी है। वह शरीर और मन से शोषित होती है, पर घर-परिवार तब भी उसे अपराधी ही समझकर तिरस्कृत करते हैं। लेकिन कथा सतीसर की नसीम हो या ' आवाज़ ' कहानी की विनी, वे आतंकवादियों से बलात्कृत होने पर खुद को न दोषी मानती हैं और न अपराधबोध पालती हैं। बल्कि तन-मन के अत्याचार उनमें अन्यायियों के प्रति घृणा और प्रतिरोध की भावना जगाते हैं। मेरे जाने अनावस्यक भय से स्त्री को मुक्त होना है, पर मानवीय गरिमा और पारिवारिक सौहाद्र के लिए भीतर के कोमल स्त्रोत भीबनाए रखने हैं। कथा सतीसर की नीलम हो या राज्ञा , प्रतिकूल परिस्थितिओं में अपनी इयता बनाए रख मानवीय दृढ़ता का उद्घोष करती हैं, नारेबाजी नहीं करतीं। मैने ' कात्या ' के रूप में लौह-स्त्री की छवि गढ़ी है , जो आपत्तियों-विपत्तियों की आँधी में डटी रहने का साहस रखती हैं। राज्ञा के रूप में टूटकर खड़ी होती स्त्री की द्वंद्व भरी कथा है जो मन को द्रवित भी करती है और संघर्ष की प्रेरणा भी देती है। मैने स्त्रियों के दुःख भी बयान किए, उनसे मुक्त होने के लिए की गई कोशिशों का स्वागत भी किया। मन के स्त्रोत सूखने नहीं दिए। स्त्री की संवेदना के स्त्रोत यदि सूख जाएँगे तो जीवन बंजर हो जाएगा। यों तो आज भी तेजी से यंत्र होते मनुष्य को बचाने के लिए संवेदना को बचाना जरूरी है, स्त्री पर यह दायित्व कुछ अधिक ही है।
स्त्री विमर्श की चिंतन परम्परा : महादेवी वर्मा की ' श्रंखला की कड़ियों ' के विशेष सन्दर्भ में
साहित्य रचना के लिये आवश्यक सृजन और निर्माण शक्ति की विभूति ले नारी-पुरूष की तुलना में काव्य के अधिक समीप आती है क्योंकि भावनाओं की कोमलता और अभिव्यक्ति की कलात्मकता, दोनों ही नारी स्वभाव के प्रबल पक्ष हैं। एक ओर जहाँ शक्ति और शासन प्रिय पुरूष ने अधिकार, संघर्ष और भौतिक सफलताओं में ही जीवन का मूल्यांकन किया, वहाँ स्त्री ने समर्पण, सेवा और त्याग में अपने जीवन की सार्थकता मानी। सूक्ष्म भावना के प्रति जितनी पकड़ स्त्री लेखन में मिलती है उतनी पुरूष लेखन में नहीं, इतिहास इस तथ्य का साक्षी रहा है कि स्त्रियों के द्वारा रचित ऋग्वेद की ऋचाएं, पुरूषों द्वारा बनाई हुई कविताओं से किसी भी प्रकार कम नहीं है यह दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि अनुभूति और भावनाओं की प्रतिमूर्ति होते हुये भी, सृजन की प्रतीक होते हुये भी भारतीय नारी साहित्य सृजन में प्रधान तो क्या यथेष्ठ भाग भी न ले सकी। अपनी व्यथा कथा को भारतीय महिलाओं को केन्द्र में स्थापित कर महादेवी वर्मा ने अपने अनुभवों का सहारा लेकर उसको जागृत करने का प्रयास किया है। महादेवी भारतीय नारी की सदियों से चली आ रही पुरातन परम्पराओं को तोड़कर आगे आने को प्रेरित करती थीं। आपका मानना था कि ''नारियां पुरूषों से प्रतिद्वन्दी के रूप में नहीं अपितु सहयोगी के रूप में प्रतिस्पर्धा करके आगे आयें।`` महादेवी वर्मा नारी देह के प्रदर्शन की वस्तु समझे जाने को निकृष्ट मानती थीं। वरिष्ठ और विख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने अपनी नवीन पुस्तक अनभै सांचा में नारी चेतना की भारतीय परम्परा पर विचार करते हुये महादेवी वर्मा के संदर्भ में लिखा है - ''इस सदी के पूर्वार्द्ध में, जब भारत में तो क्या पश्चिम में भी साहित्य की स्वतंत्र स्त्री दृष्टि पर कोई खास बहस नहीं हो रही थी तब महादेवी वर्मा ने कहा था पुरूष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है परन्तु अधिक सत्य नहीं, विकृति के अधिक निकट पहुँच सकता है परन्तु यथार्थ के अधिक समीप नहीं।`` वास्तव में देखा जाए तो बीसवीं सदी के अन्तिम दशक के केन्द्र में रहे 'स्त्री विमर्श` में विवाद का विषय रहा है कि स्त्री विमर्श का सुरक्षित क्षेत्र है या लेखक होने के नाते पुरूष की भागीदारी की संभावना भी वहाँ है। ''स्त्री के अनुभव की प्रामाणिकता की बात जहाँ महादेवी वर्मा शृंखला की कड़ियाँ में करती हंै।``(१) वहीं जान स्टुअर्ट मिल पुरूष के स्त्री विषयक ज्ञान को स्त्री अनुभवों के अभाव में अधूरा मानते हैं।``(२) जहाँ एक ओर पंकज विष्ट लेखन के सम्बन्ध में स्त्री-पुरूष भेद को खत्म करने वाली बात को पुरूष मानसिकता व वर्चस्व को बनाए रखने की साजिश से जोड़ते हैं।``(३) वहीं स्टीफन हीथ पुरूष के स्त्रीत्व वाद को अन्तत: एक मर्दाना काम ही मानते हैं।``(४) दूसरी ओर स्त्री का स्त्री के लिए लेखन आत्म कथाओं की आत्म प्रवंचनाओं से जुड़ता है।``(५) स्त्री का स्त्री विषय तक सीमित हो जाना तथा स्त्री लेखन को दोयम दर्जे का लेखन समझे जाने के खतरे भी कम नहीं हैं।``(६) राजशेखर भी काव्य मीमांसा में स्त्री और पुरूष के रचना संसार को अलग-अलग खांचों में बांटने से इंकार करते हैं - पुरूषवत योषितो पि कवी भवेयु: न स्त्रैणा पौरूष वा विभागमय पेक्ष में।।``(७) इण्डिया टुडे की साहित्य वार्षिकी १९९७ में स्त्री लेखन के अधिकार क्षेत्र के बारे में लम्बी बहस सुरक्षित है। जहाँ अधिकांश स्त्री रचनाकारों ने सिद्धात: स्वीकार किया था कि स्त्री विषय स्थिति पर फोकस्ड रचना को स्वीकारा जायेगा क्योंकि वह स्त्री के सोचने का नहीं स्त्री पर सोचने का विषय भी है।``(८) वहीं कालरिज का मानना है कि ज्ञान पुरूषवाची है और संवेदना स्त्रीवाची। इन दोनों तत्वों के मिश्रण से ही सर्जना के क्षण उत्पन्न होते हैं।``(९) स्त्री की स्थिति पर फोकस्ड समस्त लेखन में स्त्री-दृष्टि महत्वपूर्ण है जो दोनों स्त्री या पुरूष की भी हो सकती है क्योंकि स्त्री दृष्टि सहजात दशा न होकर अर्जित स्थिति है। स्त्रियां मानव पुरूष दृष्टि से अपने संसार को देख सकती हैं और पुरूष स्त्री की स्थिति का भोक्ता न भी बन सके उसका अधिवक्ता तो बन ही सकता है।``(१०) स्त्री की तरह पढ़ना, स्त्री की तरह अनुभव करना लेखक अपनी बारीक संवेदना शक्ति से संभव बना सकता है जिसे कई बार भोक्ता पकड़ नहीं पाता। चित्रकार अर्पिता सिंह रचना के मूल्यांकन के समय पुरूष और स्त्री रचनाकार की रचना के लिये भिन्न-भिन्न सौन्दर्यबोध की आवश्यकता से इंकार करती हैं।``(११) वास्तव में देखा जाये तो स्त्री साहित्य शक्ति के वरण की स्वतंत्रता और स्वायत्ता का साहित्य है। जहाँ प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना की गयी है। समता, स्वतंत्रता, सौहार्द, वर्गहीन मानवतावाद के सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। ''स्त्री साहित्य के मूल में ऐसे जीवन मूल्य हैं जो पूरी मानव जाति के हित में हैं। आज के इस अपसंस्कृति के समय में जब जीवन विरोधी अमानवीय स्पर्धा और हिंसा पंख पसार रही है। स्त्री साहित्य एक उदार भाव से संवेदनशीलता और संतुलन बुद्धि से युक्त होकर सम्बन्धों की उष्मा, साहचर्य, प्रेम और सद्भाव का साहित्य रच रही है। आज के चरित्रहीन समाज, भ्रष्ट राजनीति, लालच का अर्थनीतियों, हिंसा की विकृतियों के विरूद्ध पूरी मानव जाति के पक्ष में खड़ी स्त्री विहंगम दृष्टि से अपने समय और समाज को देख परख रही है। अपने मूल में नारी-विमर्श एक विचार धारा मात्र नहीं रह जाता व एक जीवन दृष्टि और पद्धति का संयोजन बन जाता है। विघटन की प्रक्रिया में मानवीय संवेदनाओं का हृस हो रहा है। मानव मन के जटिल ताने-बाने में सब कुछ सफेद या स्याह नहीं होता। स्त्री साहित्य आज उन्हीं जटिल मानवीय रिश्तों और स्थितियों की अपेक्षा जीवन को समग्रता में देखता-परखता है; इसलिए स्त्री साहित्य में आज के विखण्डित, मनुष्य की सही पहचान होती है। अपने गुणों से, धर्मपालन, सात्विक भावों, सदाशयता और आचरण की शुद्धता में स्त्री पुरूष से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। वह अधिक सहृदय धैर्यवान, धर्मपरायण, त्यागमयी, ममतापूर्ण और नैतिक है जबकि पुरूष स्वार्थी, आत्मलिप्त भोग और लोभ में आसक्त, अधिक ऐन्द्रिय और स्थूल वृत्तियों वाला जड़ प्राणी है जो अपनी सत्ता के आधिपत्य के लिये नित नए षड़यंत्र रचता है। जड़ मूल्यों के कारण पुरूष वर्चस्व स्त्री को आहत करता रहा और अपनी श्रेष्ठता का दंभ भरता रहा।``(१२) महादेवी वर्मा का नारी चिंतन लेखन नारी की वेदना और आत्म पीड़ा की अभिव्यक्ति के साथ नारी स्वातंत्र्य पर भी जोर देता है। महादेवी जब स्त्री स्वतंत्रता की बात करती हैं तब सवाल यह उठता है कि वे कैसी स्वतंत्रता चाहती हैं स्त्री की ? स्त्री की स्वतंत्रता की चाह परिवार को तोड़ने की चाह नहीं हो सकती, उसे जोड़ने की होनी चाहिये। जोड़ने के इस कार्य में पुरूष की भागीदारी उतनी ही है जितनी स्त्री की है। संवैधानिक रूप में स्त्री बिल्कुल पुरूष के बराबर है। लेकिन वास्तविक जीवन में ? प्रश्न चिन्ह् लगा हुआ है। स्त्री-मुक्ति पर बात करने का, स्त्री की मुक्ति-कामना करने का मतलब परिवार से अलग होना या पति से अलग होना नहीं है। विवाह-संस्था को बनाये रखने में स्त्री-पुरूष दोनों का समान दायित्व है। माता-पिता के रूप में, पति-पत्नी के रूप में। जीवन की सार्थकता तभी सम्भव है, जहाँ स्त्री और पुरूष एक दूसरे के साथ मिलकर सहयोग दें, परस्पर आत्म सम्मान के साथ जिएं। वर्तमान परिवेश में ऐसा सहयोग कहीं-कहीं धूमिल सा हो गया है।``(१३) इस तथ्य को एक उदाहरण द्वारा महादेवी वर्मा लिखती हैं कि बचपन से ही भिक्षुणी बनने की कामना की थी, परन्तु जब सिलोन से आए प्रख्यात महास्थिवर ने काष्ठ पट आँखों के सामने रखकर उनसे बात की तो उनकी प्रतिक्रिया थी ''यह सब मुझे विचित्र तो लगा ही, क्रोध भी आया। जो गुरू अपने शिष्य को सीधे देख सकने की भी शक्ति नहीं रखता उसका शिष्यत्व स्वीकार करना हास्यास्पद ही नहीं, अपमानजनक भी है। मेरा मन विद्रोह कर उठा और मैं तुरन्त उठकर चली आयी।``(१४) महादेवी वर्मा के स्त्री चिंतन में वे सब आशंकायें बताई गई हैं जो भूमण्डलीकरण के इस दौर में घट रही है। स्त्री-श्रम को विश्व-स्तर पर लगातार मामूली सिद्ध किया जा रहा है। हायर एण्ड फायर वाला सिद्धान्त स्त्री-श्रमिकों पर सबसे पहले लागू किया जा रहा है। इस तरह के अस्थायी अर्थोपार्जन से उसकी जीवन-स्थितियां भी बद से बदतर हुई हैं। महादेवी वर्मा जी स्त्री मुक्त को अर्थ से जोड़ते हुये कहती हैं कि ''यदि उन्हें अर्थ-सम्बन्धी वे सुविधाएं प्राप्त हो सकें जो पुरूषों को मिलती आ रही हैं तो न उनका जीवन उनके निष्ठुर कुटुम्बियों के लिये भार बन सकेगा और न वे गलित अंग के समान समाज से निकालकर फेंकी जा सकेंगी, प्रत्युत वे अपने शून्य क्षणों को देश के सामाजिक तथा राजनीतिक उत्कर्ष के प्रयत्नों से भरकर सुखी रह सकेंगी।``(१५) स्त्री के अर्थ-स्वातन्त्र्य का प्रश्न नामक निबन्ध में महादेवी का कहना है कि ''आधुनिक परिस्थितियों में स्त्री की जीवन धारा ने जिस दिशा को अपना लक्ष्य बनाया है उनमें पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता ही सबसे गहरे रंगों में चित्रित है। स्त्री ने इतने युगों के अनुभवों से जान लिया है कि उसे सामाजिक प्रामाणिक प्राणी बने रहने के लिये केवल दान की ही आवश्यकता नहीं है, आदान की भी है, जिसके बिना उसका जीवन जीवन नहीं कहा जा सकता। वह आत्म-निवेदित वीतराग तपस्विनी ही नहीं, अनुरागमयी पत्नी और त्यागमयी माता के रूप में मानवी भी है और रहेगी। ऐसी स्थिति में उसे वे सभी सुविधाएं, वे सभी मधुर-कटु भावनाएं चाहिए जो जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकती हैं।``(१६) नारी के सामाजिक अधिकारों की ओर पैरवी करते हुए महादेवी का मानना है कि जो बंधन पुरूषों की स्वेच्छा चारिता के लिए इतने शिथिल होते हैं कि उन्हें बंधन का अनुभव ही नहीं होता वे ही बंधन स्त्रियों को परावलम्बिनी दासता में इस प्रकार कस देते हैं कि उनकी सारी जीवनी-शक्ति शुष्क और जीवन नीरस हो जाता है। समस्त सामाजिक नियम मनुष्य की नैतिक उन्नति तथा उसके सर्वतोन्मुखी विकास के लिए आविष्कृत किये गये हैं। जब वे ही मनुष्य के विकास में बाधा डालने लगते हैं तब उनकी उपयोगिता ही नहीं रह जाती। ...... हमारी अनेक रूढ़ियां सामाजिक और वैयक्तिक विकास में सहायक न बनकर उनके मार्ग में नित्य नवीन बाधाएं खड़ी करती रहती हैं। अनेक व्यवस्थाएं जिन्हें हमने आपत्ति-धर्म मात्र समझकर स्वीकार कर लिया था, अब भी हमारे जीवन को छाया में अंकुरित और धूप से दूर रखे जाने वाले पौधे के समान शीर्ण बनाकर विकसित ही नहीं होने देती। अत: उसी शीत और विकास-शून्य छाया में पलकर हमारी सन्तान भी निस्तेज तथा उत्साहहीन बनती जा रही हैं। इस दशा में हमारा मिथ्या परम्परा की दुहाई देते रहना केवल व्यक्तियों के लिये नहीं वरन् समाज और राष्ट्र के लिये भी घातक सिद्ध होगा।``(१७) नारी अधिकारों पर अपनी बात को स्पष्ट करते हुए महादेवी वर्मा का कहना है कि ''हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय; न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरूषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नही बन सकेंगी। हमारी जागृत और साधन सम्पन्न बहनें इस दिशा में विशेष महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी इसमें सन्देह नहीं।``(१८) नारी के आन्तरिक एवं बाह्य शक्ति पर बल देते हुए महादेवी इस तथ्य को स्वीकार करती हैं कि अब नारी ने सभी क्षेत्रों में अपना सम्मानजनक स्थान बना लिया है परन्तु अपनी कुछ स्वभावगत कमजोरियों के कारण वे पुरूषों से पीछे रह जाती हैं ....... ''नारी में परिस्थितियों के अनुसार अपने बाह्य जीवन को ढाल लेने की जितनी सहज प्रवृत्ति है, अपने स्वभावगत गुण न छोड़ने की आन्तरिक प्रेरणा उससे कम नहीं - इसी से भारतीय नारी, भारतीय पुरूष से अधिक सतर्कता के साथ अपनी विशेषताओं की रक्षा कर सकी है, पुरूष के समान अपनी व्यथा भूलने के लिए वह कादम्बिनी नहीं मांगती, उल्लास के स्पन्दन के लिए लालसा का ताण्डव नहीं चाहती क्योंकि दु:ख को वह जीवन की शक्ति-परीक्षा के रूप में ग्रहण कर सकती है और सुख को कर्तव्य में प्राप्त कर लेने की क्षमता रखती है। कोई ऐसा त्याग, कोई ऐसा बलिदान और कोई ऐसी साधना नहीं जिसे वह अपने साध्य तक पहुँचने के लिए सहज भाव से नहीं स्वीकार करती रही। हमारी राष्ट्रीय जागृति इसे प्रमाणित कर चुकी है कि अवसर मिलने पर गृह के कोने की दुर्बल बन्दिनी स्वच्छन्द वातावरण में बल-प्राप्त पुरूष से शक्ति में कम नहीं।``(१९) नारी को घर से बाहर आकर जगत के मर्म को समझने के प्रति महादेवी वर्मा का स्पष्ट मत है कि ''जब तक हम अपने यहाँ गृहणियों को बाहर आकर इस क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता न देंगे तब तक हमारी शिक्षा में व्याप्त विष बढ़ता ही जायेगा। केवल गार्हस्थ-शास्त्र या सन्तान-पालन विषयक पुस्तकें पढ़कर कोई किशोरी गृह से प्रेम करना नहीं सीख जाती, इस संस्कार को दृढ़ करने के लिए ऐसी स्त्रियों के सजीव उदाहरण की आवश्यकता है, जो आकाश के मुक्त वातावरण में स्वच्छन्द भाव से अधिक ऊँचाई तक उड़ने की शक्ति रखकर भी बसेरे को प्यार करने वाले पक्षी के समान कार्य क्षेत्र में स्वतन्त्र परन्तु घर के आकर्षण से बंधी हों।``(२०) पुरूष प्रधान समाज की जड़ मानसिकता पर प्रहार करते हुए महादेवी का मानना है कि ''प्राय: पुरूष यह कहते सुने जाते हैं कि बहुत पढ़ी-लिखी या कानून जानने वाली स्त्री से विवाह करते उन्हें भय लगता है। जब एक निरक्षर स्त्री बड़े से बड़े विद्वान से, कानून का एक शब्द न जानने वाली वकील या बैरिस्टर से और किसी रोग का नाम भी न बता सकने वाली बड़े से बड़े डाक्टर से विवाह करते भयभीत नहीं होती तो पुरूष ही अपने समान बुद्धिमान तथा विद्वान स्त्री से विवाह करने में क्यों भयभीत होता है। इस प्रश्न का उत्तर पुरूष के उस स्वार्थ में मिलेगा जो स्त्री से अन्ध भक्ति तथा मूक अनुशरण चाहता है। विद्या-बुद्धि में जो उसके समान होगी, वह अपने अधिकार के विषय में किसी दिन भी प्रश्न कर ही सकती है, सन्तोषजनक उत्तर न पाने पर विद्रोह भी कर सकती है। अत: पुरूष क्यों ऐसी स्त्री को संगिनी बनाकर अपने साम्राज्य की शांति भंग करे। जब कभी किसी कारण से वह ऐसी जीवन-संगिनी चुन भी लेता है तो सब प्रकार के कोमल कठोर साधनों से उसे अपनी छाया मात्र बनाकर रखना चाहता है, जो प्राय: सम्भव नहीं होता।``(२१) स्त्री स्वतंत्रता की वकालत करते हुए महादेवी वर्मा का स्पष्ट मानना है कि ''स्त्री को किसी भी क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता देने के लिये पुरूष के विशेष त्याग की आवश्यकता होगी। पुरूष अब तक जिस वातावरण में साँस लेता रहा है वह स्त्री को ही दो रूपों में बढ़ने दे सकता है, माता और पत्नी। पत्नी जब घर से बाहर भी अपना कार्य-क्षेत्र रक्खेगी तो पुरूष को उसे और प्रकार की स्वतंत्रता देनी होगी, जिसकी घर में आवश्यकता नहीं पड़ती। उसे आने-जाने की, अन्य व्यक्तियों से मिलने-जुलने की तथा उसी क्षेत्र में कार्य करने वालों से सहयोग लेने-देने की आवश्यकताएं प्राय: पड़ती रहेगी। ऐसी दशा में पुरूष यदि उदार न हुआ और प्रत्येक कार्य को उसने संकीर्ण और संदिग्ध दृष्टि से देखा तो जीवन असहाय हो उठेगा। वास्तव में स्त्री की स्थिति के विषय में कुछ भी निश्चित होने के पहले पुरूष को अपनी स्थिति निश्चित कर लेनी होगी। समय अपनी परिवर्तनशील गति में उसके देवत्व और स्त्री के दासत्व को बहा ही ले गया है, अब या तो दोनों को विकासशील मनुष्य बनना होगा या केवल यंत्र।``(२२) निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि महादेवी जी की रचनाओं में स्त्री जीवन पर नारी लेखिका की सहानुभूति मात्र ही नहीं है वरन एक गम्भीर समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी है। आपने लक्ष्य किया है कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना नारी स्वतंत्र नहीं हो सकती। अपनी वर्तमान स्थिति के विरूद्ध जब तक वह स्वयं विद्रोही तेवर के साथ खड़ी नहीं होती तब तक उसका उद्धार सम्भव नहीं है इसके पीछे महादेवी जी का मानना हैं कि भारत में ही नहीं सम्पूर्ण दुनिया में नारी आदिम काल से शोषित और उत्पीड़ित रही है। आपने सीता की अग्नि-परीक्षा के लिए राम को क्षमा नहीं किया। महादेवी जी ने नारी की वेदना उसकी आकुल छटपटाहट, उसकी पराधीनता को शब्दबद्ध करते हुये उसकी गरिमा को रेखांकित किया है। महादेवी जी ने न केवल नारी विद्रोह का समर्थन किया बल्कि स्वयं भी बाल-विवाह के बंधन को उस जमाने में तोड़ा था जब किसी भी लड़की का ऐसा निर्णय लेना एक अद्भुत साहस की बात थी। महादेवी जी को मात्र 'नीर-भरी दु:ख की बदली` की लेखिका नहीं मानना चाहिए। शंृखला की कड़ियाँ हिन्दी स्त्री वादी लेखन का अप्रतिम उदाहरण है क्योंकि शृंखला की प्रत्येक कड़ियाँ स्त्री गुलामी की कड़ियाँ हैं। प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने श्रंखला की कड़ियाँ का महत्व बताते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि नारीवादी और अन्य लेखिकाएं भी श्रंखला की कड़ियाँ के महत्व से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। वे सिमोन द बुआ की किताब पढ़ती हैं लेकिन महादेवी वर्मा की श्रंखला की कड़ियाँ नहीं क्योंकि वह हिन्दी में लिखी गई हैं। फ्रेन्च या अंग्रेजी में नहीं।``(२३) सन्दर्भ ग्रन्थ सूची १. महादेवी वर्मा - श्रंखला की कड़ियाँ, पृ. ६८ २. विद्रोही स्त्री - जॉन स्टुअर्ट मिल, जर्मेन ग्रीयर की पुस्तक में उद्घृत, पृ. १५ ३. हंस - सम्पादकीय - पंकज विष्ट, जनवरी १९९९, पृ. ७ ४. मेन इन फेमिनिज्म - स्त्री देह के विमर्श, सुधीश पचौरी, पृ. १८२ ५. कथादेश - ओमा शर्मा द्वारा राजेन्द्र यादव से लिया गया साक्षात्कार, १९९९ ६. अमर उजाला, १२ सितम्बर १९९९, डॉ. नामवर सिंह का वक्तव्य ७. काव्य मीमांसा - राजशेखर ८. इण्डिया टुडे साहित्य वार्षिकी, १९९७, स्त्री विमर्श पर परिचर्चा ९. कॉलरिज १०. पुत्राधिकार बनाम उत्तराधिकार की भूमिका से - अरविन्द जैन ११. हंस, मार्च २००१, भूमण्डलीकरण विशेषांक - अर्पिता सिंह का साक्षात्कार १२. हिन्दी अनुशीलन, जून २००४, पृ. ३८-३९ १३. स्त्री का यथार्थ - डॉ. के. एम. मालती - हिन्दुस्तानी जबान, अप्रैल-जून, २००७ १४. ज्ञानोदय-महीयसी महादेवी - गंगाप्रसाद पाण्डेय, अप्रैल १९६२, पृ. २५७ १५. महादेवी रचना संचयन - सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी - शृंखला की कड़ियाँ, पृ. ३४३ १६. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - श्रंखला की कड़ियाँ, पृ. २७२-२७३ १७. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - श्रंखला की कड़ियाँ, पृ. २४४ १८. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - श्रंखला की कड़ियाँ, पृ. २४६ १९. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - श्रंखला की कड़ियाँ, पृ. २४८ २०. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - श्रंखला की कड़ियाँ - निबन्ध - घर और बाहर, पृ. २५७ २१. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - श्रंखला की कड़ियाँ, घर और बाहर, पृ. २६० २२. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - श्रंखला की कड़ियाँ, घर और बाहर, पृ. २६४ २३. अनभै सांचा - प्रो. मैनेजर पाण्डेय, पृ. १९० सम्पर्क - वरिष्ठ प्रवक्ता, हिन्दी विभाग, डी० वी० कालेज, उरई (जालौन) २८५००१ उ० प्र०
उसने चलती ट्रेन से चढ़ने की कोशिश की थी। उसके सिर पर एक टोकरा था जो भारी रहा होगा। यह चढ़ते समय उसके शरीर के एक ओर झूल जाने से लगा था। अपने एक हाथ से वह टोकरा पकड़े हुये थी। अपना दूसरा हाथ डिब्बे में लगे हैंडल की ओर उसने जब बढ़ाया था तब एक पल के लिए वह डिब्बे के किनारे लटकती सी जान पड़ी थी। उस समय उससे आँखें मिली थीं। आँखों की अपनी एक भाषा होती है जो जरूरत पड़ने पर अपनी बात कह जाया करती है।
अनायास ही मेरे दोनों हाथ बढ़ गए थे और लपककर उसके टोकरे को मैने पकड़ लिया था। इससे थोड़ी निश्चिंतता उसमें आ गई और उसके दूसरे हाथ ने भी टोकरा छोड़कर दरवाजे के दूसरी ओर बने हैण्डल को पकड़ लिया था। अब उसके दोनों हाथों में दरवाजे में लगे हैणडल थे।
दूसरे ही क्षण टोकरा सहित उसका समूचा शरीर डिब्बे के भीतर आ गया था। अब उसकी आँखों में हल्की मुस्कान थी। मुस्कान की भी अपनी भाषा होती है। उसकी मुस्कान में थोढ़ी कृतज्ञता थी।
इस कृतज्ञता के अतिरिक्त और भी जो बात थी वह एक पल के लिए सुन्दर लगी थी। यह शायद आँखों में आ गई मुस्कान के कारण थी। किसी का चेहरा-मोहरा चाहे जैसा भी हो, लेकिन जब आँखों में मुस्कान उतर जाती है तो रूप अपने आप निखर आता है।
किसी की आँखों की मुस्कान से जब भी सामना होता है तब न पूरा शरीर दिखलाई पड़ता है न ही शरीर के ऊपर का चेहरा। तब केवल आँखें ही दिखलाई देती हैं और आँखों के भीतर बिजली की तरह कौंध उठने वाली सुन्दरता का एक विराट रूप। यह शायद आँखों की अपनी भाषा के कारण है।
" वाल्टेयर छूट गई, लेकिन मैं चढ़ गई। " उसके स्वर में थोड़ा पछतावा था। पर इस पछतावे के बाद भी उसकी आँखों में वह हल्की मुस्कान उभर उठी।
मुस्कान केवल उसकी आँखों में आती थी पर ऐसे लगता जैसे वह पूरे चेहरे में फैल गई हो। जबकि चेहरे में मुस्कान से कोई सिकुड़न नहीं होती थी। फिर भी पूरा चेहरा मुस्कुराता लगता था सिर्फ आँखों में आ गई मुस्कान के सहारे।
उसकी मुस्कान इस मायने में भी अलग थी कि वह किसी सुविधाभोगी चेहरे से नहीं बल्कि संघर्षमयी जिजीविषाओं के बीच से कहीं फूटी थी। एक मेहनतकश रूप उसकी सुन्दरता बढ़ा गया था।
उसने एक बार झुककर सिर पर रखे टोकरे को सिर के ठीक बीचोबीच करते हुए उसे व्यवस्थित किया था। उस समय उसके टोकरे के भीतर रखे हुए केले दिखलाई दिए थे। ज्यादातर पीले और कुछ हरे केले थे।
डिब्बा एक जनरल बोगी था, जिसमें बैठे मुसाफिरों में इतनी विविधता थी कि वह डिब्बा अपने आप में एक छोटी बस्ती की तरह लग रहा था। किसी गाँव के भीतर दिख जाने वाली एक छोटी बस्ती की तरह। उसमें उस टोकरी वाली महिला के घुस जाने के बाद मानो वह बस्ती एक हाट में तब्दील हो गई हो। अब उसमें रखे केले के भावताव होने लगे थे। कहीं-कहीं उसके केले बिकने लगे थे। वह डिब्बे में सवार मुसाफिरों के पास से गुजरती फिर जिससे उसकी नजरें मिलतीं वह उससे केले खरीद ही लेता था।वह जब भी किसी के सामने खड़ी होती तो हर ग्राहक के सामने उसके केले होते और आँखों में उतर आयी उसकी मुस्कान। कहा नहीं जा सकता था कि केले अपने स्वाद के कारण बिकरहे थे या आँखों में उतर आयी उसकी मुस्कान के कारण।
" वाल्टेयर मिल जाती तो मेरे पूरे केले बिक जाते।" उसने शायद मुझसे कहा होगा क्योंकि यह कहते हुए वह मेरी बगल में आ बैठी थी।
मेरे और उसके बीच एक टोकरे का फासला था। औरत को यह फासला पसंद है। वह जहां भी होती है थोड़ा फासला बनाकर रखती है। थोड़ा सा फासला बन जाने से उसे सुविधा होती है।
फिलहाल हम दोनों के बीच रखा टोकरा न केवल एक फासले को तय कर रहा था बल्कि एक ओट का भी काम कर रहा था। औरत को थोड़ी-सी ओट भी पसंद है। चाहे वह दीवार की ओट हो या पेड़ की या किसी पत्थर या सामान की ओट हो। इस ओट में वह सुविधा और संरक्षण का अनुभव करती है।
पति भी हर औरत के लिए एक ओट का काम करता है। घर से बाहर जाने वाली स्त्री पति से ओट का काम लेती है। वह पति की ओट में चलती है। पति की ओट न मिलने से वह किसी दूसरी ओट का सहारा लेती है तब वह ओट दीवार या पेड़ या पत्थर कुछ भी हो सकता है। जैसे मेरे और उसके बीच इस टोकरे की ओट थी।
टोकरे की इस ओट में वह बड़ी सुविधा महसूस कर रही थी। टोकरा उसके बदन को दो भागों में बाँटे हुए था। सीट के नीचे उसके दोनोंपाँव झूल रहे थे जो उसके सुविधाजनक स्थिति में होने का प्रमाण था।
टोकरे के ऊपर उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा दिख रहा था जिसमें उसकी कमर के आसपास उसकी साड़ी का पहनावा, जिसमें उसकी नाभि या लपेटी हुई करधनजो कुछ भी रहा हो वह सब टोकरे की ओट में छिपा हुआ था। उस हिस्से के छिपे होने से वह बेतकल्लुफ लग रही थी।
अपनी बगल में आ जाने के बाद जब मैने उसे पहली बार देखा तब उसका बायाँ हाथ उसके दाहिने हाथ की भुजा को पकड़े हुए था। अपने दाहिने हाथ की हथेली पर उसने अपनी ठुड्डी और गाल को टिका रखा था। वह तिरछी आँखों से मेरी ओर देख रही थी। शायद उसे सीधा देखने के बदले में तिरछा देखने में ज्यादा सहूलियत हो रही थी।
तिरछा देखने के कारण उसकी आँखें अपेक्षाकृत बड़ी और आकर्षक लग रही थीं। जैसे किसी फोटोग्राफर ने फोटो खींचते समय उससे कहा हो " थोड़ा तिरझा देखिये।"
मुझे लगा कि वह केले बेचने के बाद मेरी बगल में शायद इसलिए आकर बैठ गई हो क्योंकि उसे छूटती ट्रेन पर चढ़ते समय मैंने ही थोड़ा सहारा दिया था।
" बाल्टेयर मिल जाती तो मेरे पूरे केले बिक जाते। लेकिन मैं बैठ गई हूँ।" उसने यह वाक्य दुबारा कहा था।
" कहाँ से आती हो? " मैने केवल औपचारिकता के लिए पूछा था जिसका उसके लिए कोई औचित्य नहीं था।
उसने किसी गाँव का नाम बताया जो मेरे प्रश्न का केवल उत्तर था और जिसका मेरे लिए कोई औचित्य नहीं था।
" सवेरे घर का कामधाम निपटाकर केला बेचने निकल जाती हूँ। अँधेरा होने पर वापस घर पहुँचती हूँ। तब जाकर खाना बनाती हूँ। दूसरे दिन से फिर केले का टोकरा लेकर निकल जाती हूँ।" उसने अपने रोज का काम बतलाया जो दो तीन वाक्यों में तो पूरा हो गया पर जिसे निपटाने में उसे कितना मरना-खपना होता होगा, यह कल्पना सिहरा देने वाली थी।
मैने उसकी आँखों से दृष्टि हटाकर अबकी बार उसे ध्यान से देखा। वह अपनी मटमैली साड़ी और प्लास्टिक की पतली चप्पल में भी सुघड़ स्त्री लग रही थी। अभाव ने उसके शरीर में थोड़ी झोल पैदा कर दी थी वरना एक समय वह सुन्दर तन्वगी नारी रही होगी।
" चार बेटियाँ जनमी हूँ। बड़ी का ब्याह हो गया है। तीन बेटियाँ साथ हैं। खाली बेटियाँ जनने वाली औरत को उसका आदमी पसंद नहीं करता।" उसने मुझे अपनी ओर देखते पाकर बोलना जारी रखा था-" औरत की जात चाहे जितना मरे खटे उसके काम का कोई मोल नहीं होता।" बोलते समय उसकी तिरछी आँखें कभी-कभी सीधी हो जाती थीं जैसे बीच में वे विश्राम पाना चाहती हों।
उसकी आँखों के नीचे झाँई थीं जो समुचित आहार या विटामिन की कमी के कारण हुई होंगी। पर आँखों में उतर जाने वाली मुस्कान बरकरार थी। मानो मुस्कानके लिए किसी विटामिन की दरकार न थी। उसके लिए उसकी जिजीविषा ही काफी थीऔर उसकी मुस्कान उसकी जीवट जिजीविषा के बीच से कहीं फूटी थी।
" आदमी?" मुझे नहीं मालूम मेरे होठ कभी हिले थे पर मेरे कानों ने इस शब्द को सुना था।
" दारू पीता है और कभी हम लोगों की मार कुटाई करता है।" उसने कम शब्दों में कहा था जैसे उसके आदमी का बस इतना ही काम है।
" सब किस्मत का खेल है भैया।" उसके मुँह से भैया पहली बार निकला था। यह किसी रिश्ते से जुड़ा शब्द कम केवल बोलने के अभ्यासक्रम में आया था, " बाप रेलवे में नौकरी में था। माँ के मर जाने के बाद उसने दूसरी औरत रख ली। दूसरी औरत ने बाप को मारकर उसकी नौकरी हथिया ली और अब दूसरा आदमी बनकर राज कर रही है।"
" बाप के मरने के बाद नौकरी तुम्हें भी तो मिल सकती थी।"
" आजकल नौकरी देते समय रूप-रंग को भी तो देखते हैं।" उसने ऐसे कहा जैसे नौकरी में भरती का यह भी कोई तकनीकी पक्ष हो।
वह टोकरा उठाकर खड़ी हो गई थी तब मुझे पता चला कि ट्रेन की रफ्तार धीमी हो गई है। उसने नीचे झुककर टोकरे को अपने सिर पर आदतन व्यवस्थित किया और बोल पड़ी-" भगवान, चाहे कुछ भी बना दे पर औरत की जात न बनाये।"
यह बोलते समय भी उसकी आँखों में वही मुस्कान उतर आई थी जो छूटती ट्रेन में चढ़ते समय थी। उसके अंतिम शब्द किसी गाली के समान लगे जो मर्दों को दिए गए हों।
भाग-19 हारना तो शेखर सरकार को भी नहीं आया। कुछ नहीं थे वे सिवाय इस नित्य के संघर्ष के, जैसे कि कुछ नहीं है यह जीवन--- आज और अभी--- अथक कर्म और निरंतर की एक आस के। फिर यह उदासी और थकान क्यों--कपड़े की गुड़िया से शिथिल पड़े हाथ-पैरों को गरमाहट देने के लिए एकबार फिरसे कोट के अंदर समेट लिया शेखर सरकार ने और उदास आँखों से शून्य में देखने लगे।
अपनी ही धुन के पक्के शेखर सरकार दस साल, यहाँ इस जू में, जानवरों के बीच रहते हुए भी, कुछ भी तो नहीं सीख पाए थे उन से। उनकी तरह बुद्धिमान और वीत-रागी नहीं हो पाए थे, क्योंकि पक्षी नहीं थे वह कि हर रिश्ते को भूल जाते --जानवर भी नहीं थे कि किसी बात या समस्या का कोई असर ही नहीं पड़ता उनके ऊपर। आदमी थे वह... और आदमी को तो भगवान ने मन-मस्तिष्क, हजार यादें--- अनगिनित इच्छाएँ और भले बुरे का यह विवेक देकर हमेशा के लिए ही निरीह और पूरी तरह से बेचारा कर रखा है?
‘ क्यों होते हैं जिन्दगी में इतने दाव पेंच---क्यों हम भी इन पशु पक्षियों की तरह एक सीधी सरल सपाट ज़िंदगी नहीं जी पाते हम, हर याद, हर बंधन से दूर ? ---बहुत कुछ सीखना है मुझे तुम लोगों से--संयम, सहनशक्ति सभी कुछ।‘
रैंगटैंग के सूने कटघरे में उदास बैठे शेखर सरकार के आँसू अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अपने ही बनाए बंधनों में झटपटाते शेखर सरकार और, और कसते ही चले गए---समुन्दर की छाती की तरह अंदर उठते उस ज्वालामुखी से उनका सीना फटा जा रहा था, परंतु सतह पर अभी भी वह पूरी तरह से शांत और संयमित ही थे। हर संभव दर्द और आँसू को, बरसों से अंदर ही तो समेट रखा था उन्होंने भी, परंतु सुनामी लहरों सा कही आज पहले ही उफान में तहस-नहस हो बह तो नही चला यह? डूब चुके थे वे दुख और पश्चात्ताप की क्रूर बाढ़ में और तटपर बसे काकी माँ के गाँव की तरह ही अब उनके पास भी बचाने को, अपना कहने को कुछ भी नहीं बचा था----
बाहर वालों का हर लाँछन और आरोप तो वह सह जाते पर अपनों के दुःख और तिरस्कार...अपने ही मन की इस प्रवंचना से कैसे उबरें, नहीं जान पा रहे थे वह। श्रीमना, पिनाकी और मनुश्री--- उनके अपने नन्हे संसार का एक ऐसा त्रिकोण, लाख चाहते हुए भी, जिसे कभी सही अंश, सही कोण पर जोड़ ही नहीं पाए थे वह, बस उलझे ही रह गए थे आजीवन इस सरल सी दिखती गुत्थी में। परिवार के हर सदस्य की उलझन को सुलझाना चाहते थे वह...अभिन्न हिस्सा बनकर बेहद करीब रहना चाहते थे वे सबके पर अपनी और उनकी ताक़त व कमजोरियां, सही रुझान को जाने बग़ैर ही, किसी ख़ास गणित, गुणा-भाग के या फिर क्या सुलझाना है...किसे सुलझाना है खुद को या बाहर की दुनिया को, यह तक जाने बग़ैर ही कैसे संभव था यह!- उन्हें तो बस एक हिम्मती सिपाही की तरह मोर्चे पर डटे रहना ही आता था--- आँधी-पानी या तूफ़ान की परवाह किए बग़ैर, बूढ़े थके हाथों से हथियार डाले बग़ैर ही आजतक बस इन्तजार ही तो करते रहे हैं वह...इन्तजार सामने वाले के विवेक का...इन्तजार हर मन में छुपी अच्छाई का। एक ही इलाज था हर समस्या का उनके पास--- एक ही हथियार था हर लड़ाई के लिए-- संपूर्ण निष्ठा और निरंतर की अथक ईमानदार कोशिश।
अपनों को साथ लेकर चलने और स्वस्थ जीवन जीने के लिए, शरीर और मन की तरह ही, हर सुख दुख हमेशा बाँटते ही रहना चाहिए--यही सीखा था उन्हंने अपने लम्बे और परिवार के प्रति समर्पित जीवन से। यही और बस यही एक तरीक़ा था, जिसके सहारे कोई बोझ उन्हें कभी बोझ नहीं लगा था और वह अपना मानसिक संतुलन बनाए रख पाए थे, परंतु आज न तो दुख दर्द बांटने और समझने के लिए कोई साथ था और ना ही किसी को उनकी जरूरत ही थी, माँ और मनु को भी नही, फिर कहाँ से ला पाते वह प्यार और लगन के अपने सशक्त हथियार और कवच शेखर सरकार?
अपनी ही बेचारगी में जकड़े शेखर सरकार सब कुछ भूल जाना चाहते थे। भूल जाना चाहते थे कि जिस मनु पर उन्होंने खुद को, अपने जीवन तक को वार दिया था, जिसके अलावा उनकी कोई सोच--कोई आराम ही नहीं था-- जिसके सामने अंत:स्थल तक मोम सा पिघल उठता था उनका, उसी ने आज उन्हें इतना जड़ और पाषाण कर दिया है कि भूख प्यास, सरदी गरमी ही नहीं, जीने की इच्छा तक चिटक गई है उनके सुन्न पड़ते शरीर से। हाँ हज़ार तकलीफ़ों और अनगिनित नाराज़गियों के बाद भी, मन की हठी और भ्रमित आस ही ऐसी थी, जो उस अमानुषीय वीराने में भी, उनके हठी और निष्ठुर प्राणों-सी ही, इंतज़ार कर रही थी मनु का। पलपल झटपटाते शेखर सरकार चाहकर भी तोड़ नहीं पा रहे थे अजगर से फैले उस नेह और आस्था के जाल को, जो अब संघर्ष भरे ज़ीवन से भी ज़्यादा दुःखदायी और असह्र हो चला था उनके लिए।
इच्छाओं और अहसासों के इस अभेद चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए, जीने के लिए, खुद अपने लिए, उन्हें इतना तो जान ही लेना चाहिए था, कि मन की दीवार पर लटकी सूखे फूलों की माला और तस्बीर न उन्हें अब कोई सुख दे पाएगी और ना ही वह पुरानी ख़ुशबू। कोई फायदा नहीं इन्हें यूँ सीने से लगाए रखने से।
चाहे कितना ही मुड़-मुड़कर देखो, डूब तक जाओ उसमें, शून्य सा अतीत तो बस एक शून्य ही है---- उनके अपने अम्माँ और बाबा की तरह, रेशे रेशे हवा में तिरोहित---असमर्थ और अपाहिज---गुज़रा और बेजान ? ख़ुशियों की डोर तो, बस अभी, इस आज के हाथ ही होती है और फिर इस आज से रूठकर, कैसे ख़ुश रह सकते थे वे ? ख़ुश रहना तो दूर की बात, जी तक नहीं सकते थे वे तो। यही तो पलपल की-- एक एक साँस की गाथा लिखता है--- अच्छा बुरा जैसा भी हो, आने वाले कल का इतिहास रचता है। सूत्रधार कहो या प्रेरणा जीवन में हमेशा यह आज ही तो रहा है और इसकी ज़रूरतें ही तो रहती हैं जीवन के केन्द्र में? यही तो सपना बनकर आँखों में बैठता है और बाध्य करता है उठने और कर्म करने के लिए। अब और रूठे नहीं रह सकते थे वे इस आज से, परंतु मनु उन्हें मनाने और समझाने भी तो नहीं आई अभीतक ---बाक़ी सब तो झेल जाते जीवट शेखर सरकार, निपट लेते हर समस्या से---एक यही, और बस यही बात उनके ह्मदय में अड़ी, अपाहिज और निर्जीव किए जा रही थी उन्हे।
एक गहरी साँस ली उन्होंने और उस दम घोटू, उदास अँधेरे से बाहर निकलने के लिए, खुद को उलझाने की एक और असफल कोशिश में बाहर खुले आसमान की तरफ देखने लगे वह, परन्तु बाहर भी तो उनके मन-सा ही बीहड़ अंधेरा फैला हुआ था। बेहद काले और डरावने बादल उमड़ रहे थे, बादल जिनका आजतक कभी कोई आकार ही नही बनपाया, कोई रूप नहीं---बस एक बदनुमा धब्बे से बेमतलब ही इधर-उधर जो उमड़ते- घुमड़ते घूमते रहते हैं---- एक धुँध भरा आसमान अपनी आंखों में लिए। वे अंधे बादल आज तो मानो उनकी बगल में ही उतर आए थे। उनकी जिन्दगी को घुप अंधेरा करने की मानो ठान ली थी उन्होंने। ‘ जब इनका मन चाहे, जहाँ इनका मन चाहे आए जाएं--- बरसना तक नहीं आता इन्हें तो’ शेखर सरकार ने सोचा और मुंह फेरकर दूसरी तरफ करवट ले ली। रात थी या सुबह यह हिसाब तो जाने कबका भूल चुके थे शेखर सरकार।
आँखें खुलते ही रौशनी की बुझती किरण के साथ देखा शेखर सरकार ने कि सामने तरतीब से कटी नरम घास में पीले फूलों वाली कड़ी कूच घास निकल आई थी और आँखों को ही नहीं, उनके मन को भी चीरे जा रही थी। आकाश में भी बिंब-प्रतिबिंब सूरज तिल तिल डूब चुका था और अब तो उसका वह चकाचौंध करता हुआ तेज, वह स्वर्णिम अरुणिमा, कुछ भी नहीं बची थी वहाँ पर। प्रकाश की जगह अब घुप सियाह अँधेरे ने ले ली थी---ऐसा अँधेरा जिसमें संसार दिखता तो है परंतु नींद में सोया-सोया और खोया-सा। जागृति और चेतना के बग़ैर बेहद ही धुंधला और अस्पष्ट।
इस अँधेरे से निकाल पाना संभव नहीं था अब उनके लिए। एक बार फिर अँधेरे में ही, शेखर सरकार की थकी आँखें उस ममतामई चिड़िया और नन्हे बच्चे को ढूँढ़ने लगीं, परंतु अन्य पक्षियों की तरह ही, वह भी जाने कहाँ चली गई थी। सोए सन्नाटे की उस एकाग्र तन्मयता में जब खुद अपना हाथ तक ठीक से दिखलाई नहीं देता तो फिर चिड़िया और उसके बच्चे को बूढ़ी आँखें कहाँ से और कैसे ढूँढ़ पातीं? अँधेरे और अकेलेपन से बचने के लिए, इधर-उधर हाथ घुमाते हुए, एक फाँस ज़रूर चुभो ली थी उन्होंने अपनी ठंड से ऐंठी और सूजी हथेली में। दर्द की चिलक से परेशान शेखर सरकार ने हाथ को दाँतों से दबा लिया। अनायास ही मुँह से एक चीख निकली और नीरव रात के सन्नाटे में जंगल के सोते पक्षी तक फड़फड़ा उठे। ऐसे ही चुपचाप सब कुछ सहते, गुनते बुनते, गुमसुम और उदास वह एक और रात गुजार ही दी थी शेखर सरकार ने आखिर, और एकबार फिर से पूरा-पूरा दिन वापस निकल आया। मन के अन्दर उठते ज्वार भाटा में बेचैन उनका मन हिलोरें लेता रहा परन्तु सामने पंक्तिबद्ध खड़े देवदार के पेड़ों की परछाँइयाँ ओढ़े चिड़ियाघर की वे बेफिक्र सड़कें बस सोती ही रहीं। भटकते, रेशे-रेशे होते बादलों की भटकन और तड़प दोनों को ही महसूस कर पा रहे थे शेखर सरकार अब खुद अपने अन्दर भी। ---यह आज जो अमर और अटल बना भरमाता और डराता रहता है हमें---यह आज जिसे हम इतना महत्व देते हैं, हमारी गिरफ़्त में ही जो नहीं आ पाता, पानी की तरह देखते देखते बह भी तो जाता है तुरंत ही! फिर इस एक नादान आज और अभी की उलझन को लेकर इतना विचलित क्यों हो गए हैं वह आखिर! शेखर सरकार अब धीमे-धीमे सिर हिला हिला कर लगातार खुद से ही बातें किए जा रहे थे।
सबकुछ जानते समझते हुए भी, कुछ भी तो अनदेखा नहीं कर पा रहे थे शेखर सरकार--ना ही गुज़रे कल को और ना ही मुँह बाए, चारो तरफ़ से घेरे और जकड़े खड़े भयावह इस आज को। मानाकि पचास साल के अपने लम्बे जीवन में जान गए थे वह कि ऐंठता, इतराता यह लघु आज ही नहीं, जीवन भी पलक झपकते ही गुज़रा कल बन जाता है, पर समस्या यह नही थी शेखर सरकार की, परेशान थे वह अपने मोह--- अपनों से दूर न रह पाने की चाह से...अपनी उस अक्खड़ प्रवत्ति से जो अब उन्हें कहीं भी, किसीके भी साथ भी आराम नहीं दे पा रही थी--परेशान थे वह इस तथ्य से कि क्यों वह भी औरों की तरह, सब कुछ भूलकर खुद को बाहर नही खींच पा रहे हैं निराशा की इन गहरी गर्तों से? परेशान थे वह नियति की छलिया आंख-मिचौली से। जब भी किसी सुख, आदत या अपने के बिना जीना सीख लेते हैं वह, तो क्यों अतीत के अँधेरों से निकलकर वही एक नए रूप में, नया सपना बनकर जनम ले लेता है उनके आगे फिर से उन्हे भटकाने और भरमाने के लिए--क्यों दूर नही हो पाते वह किसी से---त्याग नही पाते कुछ भी---मोह या यह संसार--प्यार और रोष कुछ भी नहीं? ठंडे बहते आंसुओं को पोंछकर एकबार फिर हृदय विदारक और गूंजती आवाज में गाना शुरू कर चुके थे शेखर सरकार।
" तूफानों की ओर घुमा दे माँझी तू निज पतवार/ आज ह्मदय और सिंधु में साथ उठआ है ज्वार। "
सधी-सुरीली स्वर लहरियां हवा पर सवार जाने किन-किन पेड़ों की फुनगियो से जा उलझीं, और अब उन्हें सिहरा और पुलका रही थीं। अब तो यह भी कहना मुश्किल था कि उनकी वह आत्मा तक बिंधी स्वरलहरी उन्हें उर्जा दे रहे थे या पीड़ा। हां, डूबकर गाते शेखर सरकार जरूर उस कुँहासे भरी सुबह में एक योगी, एक साधक से ही एकचित्त दिख रहे थे। बचपन में पढ़ी किसी विख्यात कवि की वह कविता शेखर सरकार ने पहले कभी भी इतनी अधिक समझ के साथ, महसूस कर-करके इतनी तन्मयता से नहीं गाई थी।
"यह असीम निज सीमा जाने, सागर भी तो यह पहचाने
माटी के पुतले मानव ने कभी न मानी हार। "
वह सबको प्यार करते थे परन्तु उन्हें प्यार करने वाला कोई नही था। आज की चुनौतियों की रस्सा कसी में फँसे शेखर सरकार को कभी वक्त ही नही मिल पाया था कि खुद के बारे में सोच तक पाते--किसी आने वाले कल के सपने देखने की भी फुरसत कभी नहीं मिली थी उन्हे। अपनी अंधी आस में शायद वह समझ ही नहीं पाए थे, कि जुड़ने के लिए टूटना भी उतना ही ज़रूरी होता है और टूटकर ही कुछ जुड़ पाता है। फिर उनके अंदर तो यह क्रम निरंतर ही था---बहती नदी सा, भटकाते इस नेह सा...
पूरी तरह से अँतर्मुखी हो चुके शेखर सरकार कब जानते थे कि जागती आंखों के ही नहीं कभी-कभी बन्द आँखों द्वारा तक देखे सपने सच हो जाते हैं... कि अब कुछ और ज्यादा सोचने या हताश होने की ज़रूरत नहीं उन्हे। मनु समझ चुकी थी सब ...उनका दर्द भी और उनका टूटता-बिखरता मन भी। लौट आई थी वह अपने बाबा के पास। माफ़ कर चुकी थी उन्हें भी और उनकी सारी कमज़ोरियों को भी। ले लिए थे उसने सारे हथियार उनके लहूलुहान और थके बूढ़े हाथों से हमेशा के लिए ।--- अब कुछ और नहीं टूटने देगी वह। अंदर-अँदर ही चल रही घमासान से, निरंतर चल रहे इस असह्य अपराध बोध से मुक्त करने जा रही थी वह हमेशा के लिए अपने बेहद कमजोर और लाचार बाबा को आज।
यही नहीं, मनु को तो यह भी विश्वास हो चला था कि इस हालत में भी बाबा की हताश और बन्द आँखें अन्दर ही अन्दर राहत ढूँढती, मनु और केसर के साथ ही तो खेल रही होंगी ... एकबार फिर पीछे छूटे घर परिवार की उन्ही कंटीली और उलझी बगिया को ही तो सजा-संवार और निखार रही होंगी।
बाहर सड़क पर कहीं-कहीं अभी भी पतली-सी पाले की परतें देखी जा सकती थी। नमक छिड़कने वाली गाड़ियों ने रातभर लगातार सड़कों पर नमक छिड़का था आती-जाती कारों को फिसलन और दुर्घटनाओं से बचाने के लिए। मनु हंस पड़ी... ढूँढ लेगी वह भी कोई ऐसा ही नमक मन के किसी गहरे छुपे कोने को कुरेद छीलकर... । मना लेगी अपने बाबा को...। एक बात तो पक्की है कि अब तो वह अपने साथ ही लेकर घर लौटेगी अपने बाबा को। पर क्या पहचान भी पाएंगे बाबा उसे...क्या होंगे इस हालत और मनःस्थिति में वह? क्यों नहीं! उसके अपने बाबा हैं आखिर; आखिरी सांस तक लड़ेंगे, हिम्मत तो नहीं ही हारेंगे, ना ही वह उन्हें हारने और टूटने देगी। सोचते-सोचते मनु आंसू पोंछकर हंस पड़ी। उन्ही की तो बेटी है वह भी आखिर ।.. फिर भगवान इतना निर्दयी तो नहीं ही हो सकता... जरूर ही बाबा को ठीक ही रखेगा वह । मन-ही-मन जाने क्या-क्या गुनती-बुनती, किस-किस देवी-देवता को मनाती मनु अब बस उस अगले मोड़ की रुकी लाल बत्ती के बदलने का इन्तजार कर रही थी, जिसे पार करते ही वह जानती थी कि सामने डडली जू ही होगा। किससे मिलना चाहेंगे बाबा पहले? किससे मिलवाना चाहिए पहले उसे बाबा को, केसर से या विश्वास से...मनु का दिल अब लगातार दौड़ती टैक्सी के इन्जन से भी ज्यादा तेजी से दौड़ रहा था... तरह-तरह के ख्यालों को गुनता-बुनता आज और कल में भटक रहा था।
अगले पल ही मनु के सपने देखती आंखों को पूर्णविराम-सा देता आखिरी वह मोड़ आ ही गया, जिसका वह पिछले कई घंटों से इन्तजार कर रही थी। पर ठीक उस प्रतीक्षित चौमुहानी के बिल्कुल पहले, करीब-करीब जू के सामने पहुंची उसकी टैक्सी को रोक दिया गया। चारो तरफ से घेर कर पुलिस ने उस सड़क को बन्द कर दिया था। किसी भी वाहन को और आगे जू के प्रवेश द्वार तक जाने की इजाजत नहीं थी। मनु के आकुल मन के लिए यह एक नया और असह्य धक्का था। अब और विलंब नहीं सह पाएगी वह। सरदार जी को पैसे देकर टैक्सी उसने वहीं पर छोड़ दी और पैदल ही जू तक जाने के लिए दैड़ पड़ी। उसकी भी तो मनाही थी, पर। जू के मुख्य द्वार के पास ही एक संदिग्ध पार्सल मिला था सुबह-सुबह .. कुछ भी हो सकता है ... बम भी! अब ऐसे में नागरिकों की सुरक्षा के हित में आवश्यक है कि जबतक पूरी तरह से जांच पड़ताल न हो जाए, किसीको भी नजदीक न जाने दिया जाए। पुलिस औफिसर ने उसे समझाना चाहा।
‘जबसे अमेरिका के ट्विन टावर उड़े हैं। कहीं भी चैन नहीं। अगर कोई गलती या लापरवाही से कूड़ा भी लपेटकर छोड़ दे या भूल जाए तो आपलोग तो उसे भी बम ही समझ बैठते हो।‘
मनु हांफती-सी गुर्रा रही थी। जानती थी वह कि जो कुछ कह रही है, कितना असंगत और मिथ्या है। और यह भी कि जो कड़ी सुरक्षा है चारो तरफ, वह उसी जैसे आम नागरिकों की भलाई के लिए ही है, पर इतने पास आकर भी बाबा से नहीं मिल पाना ...मात्र इस एक सोच से ही अपना सारा विवेक खो चुकी थी अब धीर-गंभीर मनु। पिछले बारह घंटों में जैसे-तैसे अंगारों पर चलकर ही तो बाबा के पास तक पहुंच पाई थी वह। अब और दूरी कैसे बर्दाश्त कर पाती, भला। एक-एक मिनट का बहुत मतलब होता है गंभीर और नाजुक परिस्थितियों में। उसका धैर्य सच में जबाव दे चुका था। आधी रोती और आधी चीखती-सी आवाज में उसने जब पुलिस वालों के आगे बाबा की हालत की गंभीरता को समझाया तो एक सहृदय औफिसर को उसकी सारी बात समझ में आ ही गई और उसकी दारुण पुकार से पिघलकर वह मनु को अपनी पुलिस कार में बिठाकर सुरक्षित बाबा के पास तक छोड़ भी आया। वैसे भी शेखर सरकार की हालत पूरे वेस्ट मिडलैंड में किसीसे छुपी नहीं रह गई थी और अब तो सभी चिंतित भी थे उनके लिए!
जू के बाहर दर्शकों की लाइन लगनी शुरू हो चुकी थी। मनु की उतावली आंखें मन-ही-मन अब पहचाने रास्तों के एक-एक मोड़ और गलियों को पार किए जा रही थी। बस, वह चिड़ियाघर का अगला चौराहा पार करते ही, अगले कुछ मिनटों में ही वह बाबा के साथ होगी। कितने खुश होंगे बाबा उसे और केसर को यूँ अचानक ही सामने पा कर। अभी वह सोच-सोचकर पूरी तरह से पुलक भी नहीं पाई थी कि अगले पल ही एक काली परछांई पसीने की बूंदें बनकर उसके तड़कते माथे पर फैल आई। क्या माफ कर दिया होगा बाबा ने उसे? पर्स से रूमाल निकाल कर मनु ने तुरंत ही अपने हर भय और संशय को पोंछ डाला।
इन्तजार की वे असह्र घड़ियां आखिर खतम हो ही गयीं। बाबा को अब स्पष्ट देख पा रही थी मनु। ठीक उसके सामने समाधि-सी लगाए बाबा बैठे थे उसी पिंजरे के अन्दर, जिसमें उनका प्रिय बूढ़ा रैंगटैंग रोरी रहा करता था कभी। मनु ठीक-ठीक देख और समझ पा रही थी बाबा के दर्द को... अकेलेपन और अभाव को...बाबा के विक्षिप्त मन और इसके दर्द को। साथ-साथ इस बात को भी कि बाबा को अपने जानवरों से परिवार के सदस्यों जैसा ही तो प्यार रहा है। रोरी में तो मानो सखा...भाई, अजन्मा बेटा सब कुछ ही पा लिया था उन्होंने। मन की हर बात कहते थे वे उससे और वह भी तो बाबा की हर बात ऐसे ध्यान से सुनता था मानो सबकुछ ही जानता और समझता ही हो। एक मीत...सखा था वह उनका। आनन-फानन एक ही दिन के पेट के दर्द में रोरी चला गया था... दादी के जाने के मात्र हफ्ते भर बाद ही। अभी दादी की मौत से उबर भी नहीं पाए थे बाबा कि रोरी की मौत के साथ यह दूसरा सदमा सहना पड़ा था उन्हे। आसान तो नहीं होता यूँ एक के बाद एक चोट सहते जाना और खुद को पूर्णतः शांत और संयत रख पाना। फिर खुद उसका अपना यह कठोर और गैरजिम्मेदाराना रवैया बाबा के प्रति, यह कितना सहायक रहा होगा बाबा के इस विध्वंस में! सोचना तो था उसे कि कितने सुकुमार, कितने सहृदय, कितने असहाय हैं उसके बाबा इन परिस्थितियों में! मनु अच्छी तरह से जानती थी, यूँ सबसे कटकर अकेले रह पाना, कभी भी आसान नहीं रहा है बाबा के लिए। बाबा क्यों इतने उदास, इतने विक्षिप्त हुए, मनु अब सब कुछ साफ-साफ समझ और देख पा रही थी। देख पा रही थी कि कैसे कोहास और अंधड़ के उस मौसम में जब पशु-पक्षी तक अपने अपने घरौंदे में जा छुपे थे, बाबा के पास अपना कहने को, सहारा देने को, आसपास क्या दूरदूर तक कोई नही था।
---पता नही बाबा उसकी तरफ देख भी पाएँगे या नहीं, और अगर देख भी लें तो क्या इतने स्वस्थ हैं कि उसे और केसर को पहचानेंगे भी? पूरी तरह से टूटी-बिखरी हताश मनु बाबा को एकटक देखे जा रही थी, पलक झपकाए बिना, जरा भी हिले डुले बगैर ही...अपनी एक उसी जगह पर जमी थमी-सी, मानो तैराक छलांग लगाने से पहले पानी की गहराई माप रहा हो।
पिछले कई महीनों से चल रहा आठो प्रहर का चखचख आज अदालत में तलाक की अर्जी मंजूर होने के साथ ही समाप्त हो गया। रवि ने राहत की साँस लेते हुए इधर-उधर नजरें दौड़ाई। दूर अदालत के कोने में खड़ी नीलिमा उसे दीख गई। वह निर्निमेष ढंग से उसे ही निहार रही थी। वही नीलिमा जो कुछ समय पहले तक उसकी व्याहता पत्नी थी और जिसके साथ उसने अग्नि को साक्षी मानकर जीने-मरने की कसमें खाई थी, अब एक अपरिचित महिला के रूप में अनिश्चित भविष्य की गठरी लिये चौराहे पर खड़ी हो गई थी। रवि को हृदय के एक कोने में कुछ रिसता-सा महसूस हुआ। किन्तु गर्दन झटककर उसने अपनी उभरती भावनाओं को काबू में किया और फिर तेज किन्तु सधे कदमों से अदालत की सीढ़ियाँ उरतने लगा। ''सुनिए`` अंतिम सीढ़ी पर पहुँचे रवि के पैरों पर मानो ब्रेक लग गये। वह ठिठक कर जहाँ का तहाँ खड़ा हो गया। ऊपर की सीढ़ियों पर पल्लू थामे नीलिमा खड़ी थी। ''अब भी कुछ कहने-सुनने को बाँकी रह गया है क्या? झुँझलाते हुए पूछा रवि ने। उसे भय लग रहा था कि नीलिमा कहीं माँ के पुराने गहनों की चर्चा न कर बैठे। इसीलिए वह जल्दी-से-जल्दी उससे पिंड छुड़ाकर भाग जाना चाहता था। ''आपकी दवा का कोर्स पूरा होने में नौ दिन और बाँकी रह गये हैं, उसे पूरा कर लीजिएगा`` संयत स्वर में वाक्य समाप्त कर नीलिमा वापस लौट गई। रवि सन्नाटे में घिरा उसे देखता ही रह गया।
दृष्टिकोण
मरणासन्न पिता के इलाज में उपेक्षा बरतते देख माँ ने बेटे के हृदय को टटोला ''अब लगता है, तुम्हारे पिता की आखिरी घड़ी आ गई है बेटे। इसलिए इनके इलाज में अब हमें कोई कोर-कसर नहीं रखनी चाहिए। कम-से-कम यह मलाल तो नहीं रह जाए कि हमने इनके लिए कुछ नहीं किया। न हो तो इनके जमा पाँच हजार रुपये को ही.....`` माँ की आवाज रूँध सी गई। हमसे जो कुछ बन पड़ रहा है, हम तो कर ही रहे हैं माँ। जहाँ तक पिताजी के रुपयों की बात है, उसे हमें इनके श्राद्धकर्म के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। क्योंकि श्राद्धकर्म में जरा-सी ढील रह जाने से लोग यह कहने से भी नहीं चूकेंगे कि अपने दधीचि पिता के लिए बेटे ने कुछ नहीं किया।
.......ट्रिन ट्रिन .............ट्रिन फ़ोन की घंटी लगातार बजती जा रही थी पर फ़ोन भी मै ही उठाऊँ .घर मे कोई सुनता ही नही जैसे . सारे काम मुझे ही करने पड़ते है खाना बना रही हूँ तो फ़ोन तो जनाब उठा ही सकते है पर नही कम्प्यूटर छोड़ के कहाँ फ़ोन उठायेंगे। घंटी लगातार बजती जा रही है ".उफ़ दीपक तुम फ़ोन क्यों नही उठाते ".कहते हुए मैने फ़ोन उठा लिया। हेलो कौन ""बेटा माँ बोल रही हूँ अभिषेक की शादी तय हो गई है २७ नवम्बर को है " "कौन सी माँ लखनऊ वाली या मुम्बई वाली " "अरे बेटा मुम्बई वाली ही हुई है "तुम सब को जरूर आना है जरा जल्दी आना " "अरे माँ क्या बात करती हो अभी की शादी और हम न आयें एसा कैसे हो सकता है हम जरूर आएंगे " कह के फ़ोन रख दिया . "दीपक सुनते तो अभिषेक की शादी २७ नवम्बर को है टिकट अभी से ले लो नही तो मिलेंगे नही " अरे भाई की शादी है तो खुशी देखो इनकी हूँ ! ................जाना तो पड़ेगा ही सारी खुदाई एक तरफ़ जोरू का भाई एक तरफ़ ."और हँसने लगे ये मैने तुनक के कहा "नजर न लगाओ जी मेरी खुशी को हाँ नही तो" खाना खा के ये तो रिया के साथ सो गए .पर मारे खुशी के मेरी आंखों मे नीद कहाँ थी .क्या करूंगी क्या खरीदना है .मीना की बेटी को भी तो मैने नही देखा था अरे मेरी बहन अभी उसकी बेटी हुई है उफ़ इतनी सारी खुशियाँ हम ३ बहने और एक भाई है .मेरी शादी हो गई मेरी बेटी रिया मीना की शादी हो गई उसकी बेटी रोमा और अब भाई अभिषेक बस अब मोना रह जायेगी .पता नही मै ये सब क्यों सोच रही हूँ या किसी को बता रही हूँ मालूम नही मारे खुशी के पता नही क्या क्या कर रही हूँ .सोचते सोचते सो गई . सुबह जा के ये टिकट भी ले आए .वेटिंग मिला ख़ैर दीपक ने कहा की कन्फर्म हो जाएगा . फ़िर तो शुरू हो गया खरीदारी का सिलसिला मोना के लिए .मीना के लिए , बेटी रोमा के लिए आपने लिए भी सभी के लिए मै खरीदारी कर के लाती जाती और बड़े प्यार से रखती जाती वहां से फर्माहिशें भी आती रहती और मै पूरा करती रही .दीपक की एक बात बहुत अच्छी थी की ये किसी भी बात को मना नही करते थे .बलकी पूरा सहयोग देते थे
फ़िर आ गई जाने की तारीख .दीपक को बाद मे आना था इनको अभिषेक से दिल्ली मे मिलना था फ़िर दोनों को साथ आना था अभिषेक अमेरिका से आरहा था न इसी लिए दीपक ने हम को ट्रेन मे बैठा दिया .जम्मू मेल से हम लखनऊ रवाना हो गए . शाम को ३ बजे चल के दुसरे दिन १२ बजे तक पहुचना था लखनऊ .पर ट्रेन थोडी लेट हो गई तो २ बजे पहुचे. माँ पापा लेने आए थे .घर पहुच के थोड़ा आराम कर ने लगे पर मोना को सबर कहाँ था "बोली "दीदी मै समान खोल लूँ देखूं तो क्या क्या आया है" "उफ़ अभी रुक जा "माँ बोली पर कहाँ सुनना था उसे समान खोल के सभी चीजे देख डाली उस को सब बहुत पसंद आया था .मीना का समान और रोमा का समान अलग कर के रख दिया और आपना ले जा के अलमारी मे रख दिया . फ़िर माँ कहने लगी बेटा मेने लिस्ट बना ली है बेटे की शादी है सब को कुछ न कुछ देना होगा तो कितनी साड़ी लेनी है कितने सूट बच्चों के कपड़े जेंस्ट के सभी कुछ इस लिस्ट मे है कल चल के ले आया जाएगा .ओके माँ .तभी मोना आ के बोली " दीदी देखो मीना दीदी तुम्हारे लिए क्या क्या लाई है ." "अरे बाबा रे इतना सारा समान "हाँ जानती हो दीदी ने कुछ समान इग्लैंड से ख़रीदा है और कुछ स्युटजरलैडं से " "बहुत अच्छा समान है .चलो जब बात होगी तो बोलूंगी ."मैने कहा
शाम को मीना से बात की रोमा के बारे मे इतनी बाते बताई की मिलने को मन हो आया उसने कहा की "रोमा के होने की खुशी मे पूजा है फ़िर पार्टी है सब को आना है " "अरे भाई मे तो नही आ पाऊँगी माँ पापा भी नही तुम तो जानती हो न कितना काम है बस रोमा आएगी" .तो बोली "ठीक है पर रोमा को जरूर भेजना .ओके हाँ सुनो दीदी तुम मेरी भी तैयारी कर देना साडी लेलेना और ब्लाउज माँ के नाप का सिलवाना रोमा के होने मे बहुत मोटी हो गई हूँ न इसी लिए " ".जी सरकार और कोई हुक्म मेने मजाक किया ". "अरे दीदी तुम भी न ओके दीदी चलो रखते हैं रोमा रो रहो रही है "" ".अच्छा जी बाय" कह के फ़ोन रख दिया फ़ोन रखने के बाद याद आया की अरे लो समान के बारे मे तो कुछ कहा नही . फ़िर सोचा की चलो अब तो आ ही रही है तब बात होगी .माँ ने रिसेप्शन के लिए क्या शानदार जगह ली थी .देख के मन खुश हो गया .खाने का मीनू क्या होगा हम ने मिल के डिसाइड किया .पापा ने ड़ी जे भी बुला रखा था .बहुत मजा आने वाला था.सभी का मुम्बई जाने के लिए ट्रेन मे बुकिंग हो चुकी थी बस मीना का छोड़ के क्यों की मीना बोली की वो रोमा को लेके प्लेन से जायेगी उन का प्लेन का टिकट भी आ चुका था .
"मोना यार क्या कर रही हो जल्दी से सामन रखो मीना के घर जाना है न " "हाँ रख रही हूँ दीदी " " माँ अभी फल तो आया ही नही" मोन बोली "अरे मोना वंही से लेलेना " माँ ने कहा " पर माँ ट्रेन तो सुबह पहुच जायेगी और एक बार जब घर चले गए तो फल लेने कहाँ जा पाएंगे .फल तो यंही से ले जाना होगा" . ""अच्छा बाबा जाओ पापा के साथ जा के ले आओ "माँ झुंझला के बोली बाहर बरसात हो रही थी पानी काफी तेज था पर जाना तो था ही .रेनकोट पहन के पापा और मोना चले गए फल लेने .चलो माँ हम और बाकी का समान रखते हैं '[ मै ने कहा हम ने मीना के घर ले जाने वाला सारा समान रख दिया. थोडी देर मे मोना और पापा भी आगये .फल की टोकरी पे रंग बिरंगे कागज लगा के उस को सुंदर बना दिया गया जब सब हो गया तो पापा ने कहा "चलो अब सोते है मै सुबह मोना को छोड़ आऊंगा ." अगले दिन सुबह मोना चली गई .हम शादी की छोटी मोटी तैयारी मे लग गए . शाम को माँ के साथ जा के सभी को देने वाला सब समान ले आए .पूरे घर मे समान ही समान दिख रहा था माँ बोली "स्नेह सब सामन ठीक से रख दो .अभी तक मीना होती सब रख दिया होता "मीना को सफ़ाई बहुत पसंद थी वो सब कुछ बहुत अचछे तरीके से रखती थी .माँ उस पे बहुत भरोसा करती थी . . मोना ने गोरखपुर पहुँच के फ़ोन किया की वो आराम से पहुँच गई है .और बोली की रात मे आँखों देखा हाल सुनायेगी हाँ जरूर कह के मैने फ़ोन रख दिया . पूरा दिन रिया की देख भाल मे और काम मे कहाँ बीत गया पता नही चला .शाम को मोना का फोन फ़िर से आया बोली " मोना रिपोर्टिग यहाँ का माहौल बहुत अच्छा है मीना दीदी ने पीले रंग की साड़ी पहनी है बहुत सुंदर लग रही है रोमा तो परी लग रही है .हम सभी होटल जा रहे है जहाँ से फंक्शन होना है .यहाँ होटल मे बहुत लोग आयें है बहुत अच्छा लग रहा है बीच मे एक पालना लगा है जो फूलों से सजा है उस पे अभी रोमा को लिटा दिया गया है रोमा खूब हाथ पैर चला रही है बहुत खुश है " ."अच्छा रिपोर्टर जी अब बस करें हम को सब पता चल गया अब ये बताओ की सब को समान कैसा लगा " " बहुत ही अच्छा लगा .अच्छा चलो मोना डाट रही है फोन रखती हूँ .ओके बाय " माँ ने पूछा "सब ठीक है न "हाँ माँ सब ठीक है मै ने कहा फ़िर अगले ही दिन मोना आ गई बोली को मीना ३ दिन बाद आयेगी .ठीक है माँ बोली २७ की तो शादी ही है और २३ को तिलक यानि की वो २२ को आयेगी चलो ठीक है हम सब तैयारी कर लेंगे . भाई दीपक के साथ दिल्ली मे था .दीपक ने बताया की दोनों मिल के खूब समान खरीद रहे हैं कल आजयेंगे हम सभी सुबह का इंतजार करने लगे दोपहर का खाना खा ही रहे थे की फ़ोन आया मोना ने फ़ोन उठाया कुछ बात की और रख दिया हम ने पूछा क्या हुआ बोली की मीना की तबियत ख़राब है उसे ले के हॉस्पिटल गए है क्या हुआ माँ ने पूछा :"बोली की जिजू बोल रहे है की ब्लड प्रेशर कुछ लो है तो डॉक्टर को दिखाने लेजा रहे है .अब तो सभी थोड़ा परेशान हो गए ख़ैर किसी तरह से सभी ने खाना खत्म किया . मोना ने बताया की जिजू थोडी देर मे फ़ोन करेंगे .फ़ोन आया तो पता चला की डाक्टर ने कहा है की कोई परेशानी की बात नही है दवा देके भेज दिया है .चिन्ता थोडी कम हुई
हम सभी आपना समान रख रहे थे जो हम को बारात मे ले जाना था .माँ हम को डाल का समान समझा रही थी .देखो स्नेह ये सिंघोरा है ये परछनी है ये माथ ढक्की की साडी है ये सेट है " "उफ़! माँ कितनी बार समझाओगी मै समझ गई हूँ "पर माँ को विशवास कहाँ था माँ बोली " मै जानती हूँ तुम बिलिली हो (ये शब्द शायद माँ का आविष्कार था इस का मतलब था की जो ठीक से ध्यान से काम न करे) मीना आ जाती तो उसको ही सब समझाती " अच्छा माँ और हम सब हँसने लगे "ओ के माँ मीना जब आ जायेगी तो उस को भी बता देना ठीक है न "सामन रखते रखते बहुत रात हो गई .हम सोने लगे थे की फिर फ़ोन आया .मीना को फ़िर अस्पताल ले गए हैं .मैने पूछा आखिर हुआ क्या है तो कोई ठीक से बता ही नही रहा था मन परेशान होने लगा ..उसका यू बार बार अस्पताल जाना कुछ ठीक नही लग रहा था .पर दिल को बहलाने के लिया सोचा हलकी फुलकी तबियत ख़राब होगी सब ठीक हो जाएगा . सुबह भाई दीपक के साथ आगया खूब सारा समान ले के अमेरिका से भी हम तीनों के लिए बहुत सारी चीजें लायाथा .सब कुछ ३ लाया था .समान देख रहे थे तो मेने कहा अभिषेक जानते हो मीना की तबियत ठीक नही है उस को अस्पताल ले गए हैं " तो अभिषेक बोला "अरे दीदी परेशान क्यों होती हो .आ जायेगी ठीक हो जायेगी ".
दिल बहुत घबडा रहा था तो फ़िर फ़ोन किया तो आशीष ने बताया की उस के पैर मे बहुत दरद है मैने कहा अरे उसके शरीर मे जहर फैल रहा है एसा दर्द तभी होता है पर वो बोला पता नही क्या हुआ है ठीक से बताया नही गोरखपुर मे जब तबियत ठीक नही हुई तो उस को ले के लखनऊ आने की बात हुई अब कहाँ की तैयारी कहाँ की पैकिंग. सब धरे के घरे रह गए .सब को मीना की चिंता लग गई थी अब तो बस घड़ी घड़ी फोन हो रहा था .पता चला की उस को साँस लेने मे परेशानी हो रही है उस को ऑक्सीजन लगाया गया है .सब की मुस्कान न जाने कहाँ खो गई अचानक मेरे घर मे अजीब सी खामोशी छा गई थी हर कोई परेशां था पर एक दूसरे को दिलासा दे रहा था सब ठीक हो जाए गा कह रहा था .हम को लगा की किसी तरह से बस लखनऊ आजाये तो ठीक हो जाए गी . लखनऊ आते आते रात के ३ बज गए थे मेरी बहन २ दिन गोरखपुर मे आपनी बीमारी से लड़ती रही अभी तक भी किसीने ये नही बताया की उस को हुआ क्या है.पी जी ई (संजय गाँधी नाम है )मे उस को लेजाया गया वहां डाक्टर ने उस की ओर देखा तक नही बहुत कहने पर तो उस को ऐडमिट किया गया पर दवा के नाम पे कुछ नही दिया गया . डाक्टर क्या एसे होते है भगवन बेकार मे ही लोग उन्हें कहते है सारे डाक्टर एक ९० साल के स्वामी जी मे लगे थे इस २५ साल की लड़की की उनको कोई चिनता नही थी .जिस ने अभी आपने बच्ची को जी भर के खिलाया भी नही .उस स्वामी की सेवा मे लगे है जिनका जीवन लगभग पूरा हो गया है .ये तो है हमारा देश के आम आदमी की हालत . मुझे तो अस्पताल नही ले जाया गया .क्यों की मेरी छोटी बेटी थी मीना की बेटी रोमा जो मात्र २५ दिन की थी मुझे दे दिया गया ओर कहा गया की इसने ३ दिन से माँ का दूध नही पिया है .मेरी तो आंखों से पानी बहने लगा ये कैसा भाग्य है इस मासूम का .मेने रोमा को ढूध पिलाना बंद किया क्यों की वो तो उपर का भी पी सकती थी .मै रिया को दूध पिलाने लगी वो इस तरह पी रही थी की ,मनो कभी मिला ही न हो . अस्पताल मे टेस्ट पे टेस्ट होते रहे .बहन मेरी होश मे थी सब देख रही थी और शायद समझ भी रही थी .सुबह नर्स ने आके दीपक को एक पर्ची दी बोली "ये इंजेक्शन ले आओ "ये पर्ची उस को डाक्टर ने रात मे २ बजे दी थी पर वो अब दे रही थी .अभिषेक तो कुछ बोला नही पर दीपक को गुस्सा आया उसने कहा आप को रात मे ही देनी चाहिए थी न ."तो कहती है" आप लाते कंहा से "इतना लापरवाह इन्सान कैसे हो सकता है ..थोडी ही देर मे डाक्टर आ के बोली की ये बहुत सीरियस है आप इस को ले जायें इस को सप्टीसीनीया हो गया है .मेरी बहन सब सुन रही थी क्या बीती होगी उसपे फ़िर भी वो दीपक से पूछती है" भइया क्या कह रहें हैं की मै बहुत सीरियस हूँ अब बचूंगी नही "दीपक दिल कडा कर के बोला नही नही तुम ठीक हो जाओगी ." "भइया मुझे बचा लीजिये मे मरना नही चाहती मेरी बेटी को मेरी बहुत जरूरत है उसका क्या होगा " "अरे एसामत कहो तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी "" संजय गाँधी से डिस्चार्ज कर दिया गया पर अम्बुलेंस कोई नही दी .उस के लिए भी बहुत बहस हुई तो जा के अम्बुलेंस मिली .दिन का टाइम सड़क पे बहुत भीड़ थी किसी तरह से के जी ऍम सी पहुंचे अभिषेक और दीपक .वहां पे डाक्टर ने ठीक से देखा पर बोला की बहुत देर हो गई है .आप ३ घंटे पहले भी ले आते तो शायद हम बचा लेते और सच मे बहुत देर हो गई थी मीना ने वहाँ पे आखिरी बार उलटी की और अपने पति की ओर देखते हुए दुनिया से चली गई .हमारी तो दुनिया उजाड़ गई उस के घर वालों ने कुछ बताया नही क्या गोरखपुर मे डाक्टर ने कुछ बताया नही होगा .पर क्या कहें ..हम ने जो कभी सपने मे भी नही सोचा था वो हो चुका था .हमारी बहन जो घर मे सब को प्यारी थी हम को छोड़ के जा चुकी थी ,मै किसी तरह से अस्पताल पहुँची मीना को देख लगा अभी उठ जाएगी मोना तो उस को देखने भी नही गई कहने लगी की मीना दीदी को वो जिन्दा ही याद रखना चाहती है . उसी मीना दीदी को जिस को उसने आखिरी बार गेट पे हाथ हिलाते देखा था उस मीना दीदी को जो पार्टी मे बहुत खुश थी उस मीना दीदी को जो आपनी बेटी की हँसी पे वारी जारही थी उसी मीना दीदी को आपनी यादों मे रखना चाहती है मीना को गले लगाया तो लगा की डाक्टर ग़लत कह रहे है ये जीवित है अभी. क्यों की शरीर गरम था मै चीखी दीपक देखो ये बच जायेगी ये जिन्दा है पिलीस डाक्टर से कहो न पिलीस .............. .. मेरे माँ बाप जो आपने इकलौते बेटे की शादी खुशियाँ मानना चाहते थे वो आज बेटी के जाने का शोक मना रहे थे माँ तो बस यही बोल रही थी "स्नेह अब क्या होगा ?मेरी बच्ची मेरी बच्ची chali गई भगवान ने इतनी बड़ी न इंसाफी क्यों की ?उठाना ही था तो मुझे उठा लिया होता " गाड़ी आ गई .पर मोना तो जाके दूर खड़ी आपने कार मे बैठ गई थी .मै कभी आपनी मीना को इस हाल मे देखूंगी सोचा नही था .कितनी मासूम दिख रही थी लगता था सो रही है .हाँ सो ही तो रही थी पर कभी न उठने वाली नींद मे मीना के ससुराल वाले उस को ले के चले गए (आज भी उस के शरीर को ले के चले गए लिखना मुश्किल लग रहा है ) हम घर आगये .घर मे सारे मेहमान आचुके थे क्यों की कल ही तो तिलक आनी थी . फ़ोन की घंटे बजी इस घंटी से एक अजीब सा डर लगने लगता .फ़ोन उठाया तो अभिषेक की ससुराल से था उन को मना किया गया . सारा रिज़र्वेशन कैन्सिल करवाया गया .हमारे चाचा चाची और जो भी बाकि आयेथे सभी को अपने अपने धर जाने की जल्दी थी मेरी बहन के जाने का दुःख तो किसी को नही था बस दुःख था तो मुम्बई न जा पाने का .चाचा बोले "चलो अब काहे को समय खोटी करना घर का काम करें "चाची बोली "खेत सूख रहा होगा चलो चलते है ".मै हैरान ये रिश्तेदार है सुख के साथी मेरी माँ रो रो के उनको रुकने को कह रही थी और वो ......... ख़ैर किसी के रहने न रहने से क्या फर्क पड़ना था जो भी दुःख था हमारा था जो पीडा थी हमारी थी दुःख के कांटे जो चारों ओर इस घर मे उग आए थे उस की चुभन तो अब हम सब को सहनी थी अब मै मीना से कभी नही कह पाऊँगी कि उसका लाया समान बहुत अच्छा था .गुलमोहर की जो छाँव मै जम्मू से ले के चली थी वो अमलताश मे परिवर्तित हो चुकी थी .उसी के तले बैठ मै बस ये ही सोच रही थी आखिर ऐसा मेरे ही साथ क्यों ?
अंग्रेजों की गुलामी के दौर में जिस ने हाथ में झंडा ले कर आजादी के लिए संघर्ष किया हो वह देश की पीड़ा को समझ सकता है, जस्टिस मोहनलाल श्रीमाल उन्ही में से एक हैं जो कानून के जानकार ही नहीं बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। यद्यपि उन के जीवन का ज्यादातर समय राजस्थान और सिक्किम की अदालतों में गुजरा है पर वहां उन की उपलब्धियों को भुलाया नहीं जा सकता। थोड़े में कहें तो एक व्यक्ति से समाज जितनी अपेक्षाएँ रखता है उसे श्रीमाल जी ने अपने जीवन में पूरा किया है।
राजस्थान में न्यायमूर्ति मोहन लाल श्रीमाल फौजदारी मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं, प्रस्तुत हैं प्रदेश में बढ़ते महिला अत्याचार को ले कर उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंशः
राजस्थान में महिलाओं को डाकड़ (डाइन) कह कर उत्पीड़ित करने की कुप्रथा बरसों से चली आ रही है, इस के पीछे केवल अंधविश्वास है या कोई साजिश?
निसंतान महिलाओं की जायदाद को हड़पने के लिए शातिर दिमाग के लोग उसे डाइन कहना शुरु कर देते हैं ताकि वह परिवार और समाज में अपनी आवाज न उठा सके। राजनीति में महिलाओं को अब जो आरक्षण मिला है उस का खमियाजा भी उसे डाइन के रूप में चुकाना पड़ रहा है। महिला सरपंच ओमली ने इसीलिए डाइन होने का दुख भोगा था क्योंकि वह राजनीति में आगे बढ़ना चाहती थी, जो उस के विरोधियों को फूटी आंख नहीं सुहाता था।
हाल ही में राजस्थान महिला आयोग ने डाइन प्रथा को रोकने के लिए राज्य सरकार को एक प्रारूप बना कर भेजा है जिस में कठोर सजा के प्रावधान की सिफारिश की गई है। आप की राय में क्या कठोर कानून से डाइन प्रथा पर अंकुश लग पाएगा?
छुआछूत, बालविवाह, मृत्यु भोज तथा दहेज को रोकने के लिए कानून बने हुए हैं पर आजतक इन पर रोक नहीं लग पाई है। कानून से ज्यादा जनता को शिक्षित व जागरूक बनाने की जरूरत है। केवल कानून बना देने से समस्या का हल नहीं होगा। राजस्थान के गाँवों में लोग आज भी डाइन, चुड़ैल या भूतनी जैसे अंधविश्वासों के जाल में जकड़े हुए हैं। एक अभियान चला कर उन में यह भावना पैदा करने की जरूरत है कि आज के विज्ञान के युग में डाइन, चुड़ैल तथा भूतनी का कोई अस्तित्व नहीं है।
राजस्थान में भ्रूण हत्याओं के कारण लिंगानुपात काफी गड़बड़ा गया है। रोज भ्रूण हत्याएँ हो रही हैं, फिर भी पुलिस के रोजनामे में एक भी भ्रूण हत्या का मामला दर्ज नहीं है। प्रदेश में बिगड़ते लिंगानुपात को कैसे सुधारा जा सकता है ? इस पर आपकी क्या राय है ?
राजस्थान में गर्भ में लड़कियों को मारने की कुप्रथा बरसों से चली आ रही है, जिस ने अब एक महामारी का रूप धारण कर लिया है। यह सच है कि लड़कियों को मार कर हम विकास की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते। भ्रूण हत्या अगर इसी तरह जारी रही तो आने वाले दिनों में इसकी भयावहता की कल्पना नहीं की जा सकती।
छेड़छाड़ की बढ़ती हुई घटनाओं को किस प्रकार रोका जा सकता है?
समाज का सामूहिक दायित्व बनता है कि वह इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए आगे आए। आज किसी दूसरे की बेटी छेड़छाड़ की शिकार हो रही है तो कल आपकी बेटी को भी इसी हादसे से गुजरना पड़ सकता है। लड़कियों में आत्मविश्वास की भावना पैदा करने के लिए अभियान छेड़ना चाहिए, ताकि वे मजनुओं से दो-दो हाथ कर सकें। चरित्र निर्माण की शिक्षा स्कूली स्तर पर होनी चाहिए।
मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार जैसी हृदयविदारक घटनाओं के पीछे अपराधी की क्या मानसिकता होती है?
इस राक्षसी मानसिकता के पीछे अपराधी की यह सोच होती है कि अबोध बच्चियां उन्हें पहचान नहीं पाएँगी, जिस के चलते उसे अदालत में सजा नहीं मिल पाएगी। ऐसे अपराध के मामलों की तुरंत सुनवाई कर अपराधी को कठोर दंड दिया जाना चाहिए।
महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा के लिए अधिनियम 200 पारित हो चुका है, फिर भी महिलाओं पर घरेलू हिंसा का दायरा बढ़ता ही जा रहा है, इसे किस प्रकार रोका जा सकता है?
घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानून बन चुका है। उसे सही रूप में अमली जामा पहनाए जाने की जरूरत है। सबसे ज्यादा इस बात की जरूरत है कि महिलाएँ स्वयं आगे बढ़ कर घरेलू हिंसा का विरोध करें। उन्हें इस भ्रम से भी बाहर आने की जरूरत है कि मार में भी प्यार छिपा होता है, तभी हिंसा का बढ़ता दायरा रोका जा सकता है।
हमारे मोहल्ले में इधर ' ब्यूटी ' पर बड़ा जोर है। लड़के नीलीकाली जीन्स पहन कर इठलाते हैं तो लड़कियां भी कम नहीं हैं। कुछ पर मांबाप का पुराना मिजाज यानी शलवारकमीज हावी है तो कुछ पैंटटाप में सजी महल्ला मौडल हैं। इतना यकीनन कहा जा सकता है कि उनके लिए साड़ी एक दकियानूसी लिबास है। क्यों न हो, आखिर जमाना आदमी औरत की बराबरी का है। जब आदमी धोती पहनते थे तब औरतों की शोभा साड़ी थी। अब युवाओं की पहचान अलग है। सबेरे-सबेरे पार्क में कई नौजवान चड्ढीबनियाइन में दौड़ते नजर आते हैं। लड़कियां कभी सहमी-शरमाई रहती होंगी जैसे छुईमुई हैं। इधर वह फख्र से सिर उठा कर चलती हैं। बराबरी का यह आलम शादी की खरीद-फरोख्त और दहेज की सौदेबाजी तक तो जारी रहता ही रहता है। इतना ही नहीं, हमें यकीन है कि हमारे मोहल्ले की कुंआरी कन्याएँ अपने को लड़कों से ' सुपीरियर ' भी समझें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है। वह बिना शक आकर्षण का केन्द्र हैं। एक कन्या घर से निकलती है तो कम से कम 3-4 लड़के उस के अगल-बगल ' मार्च ' करते हैं, जैसे वह महज लड़की न हो कर सुरक्षागारद से घिरी शहर की विधायक है। यह दीगर है कि विधायक चुनाव के अलावा कभी पदयात्रा नहीं करता है। बस, हर बार नई गाड़ी में सवार हो कर कभी-कभार महल्लों में पधारता है। महल्ले के माहौल में एक और सुखद परिवर्तन आया है। कभी लड़के लड़कियों की सुन्दरता के मौन प्रशंसक थे।
कोई सुंदरी दिखी तो दिल पर हाथ रखे खड़े रहते कि अंदर की धड़कन नियंत्रण में रहे, तूफान न बने। समय के साथ तहजीब ने तरक्की की तो वह मुखर हो उठे और फब्तियां कसने लगे। उधर से फब्ती का दिलकश तीर चलता, इधर लड़की कानों पर हाथ रखती। उस के गाल कुछ-कुछ लाल हो उठते। उस की चाल में कुछ तेजी आती। वह सिर झटकती, चोटी को लहरा कर नाराजगी जताती और नाक की सीध में चलती चली जाती।
अब लड़कों का सौंदर्यबोध ऐसा जागा है कि चुप्पी नामुमकिन है। फब्तियां पुरानी पड़ गई हैं। आज के तुरंता युग में नई कौन खोजे? उस में समय और अकल दोनों की दरकार है।
लिहाजा लड़की घर से बाहर आई नहीं कि उस के इस्तकबाल में सीटियां गूंजती हैं। सीटियां भी ऐसीवैसी नहीं हैं। उन में देश जैसी विविधता है। कोई लंबी है, कोई छोटी है। कहीं शास्त्रीय गायन का आलम है तो कहीं द्रुत की झंकार है। किसी सीटी में कोयल की कूक है तो किसी में पपीहे की हूक। कहीं शहनाई का व्याकुल दर्द है तो कहीं बांसुरी की मिठास। कहीं झंझावत की कानफोड़ू कर्कश तेजी है तो कहींचलती रेलगाड़ी की सनसनाहट।
लगता है, लड़कियां भी प्रगति के इस बदलते वातावरण की आदी हो चली हैं। अब वह अपने आसपास के सीटी श्रोत की ओर उत्सुकता से देखती हैं, जैसे यह जानने की कोशिश में हों कि किस की सीटी कैसी है। किस सीटी बजाने वाले की शक्ल पर मुसल्सल 12 बजे हैं, किस के चेहरे पर भोर की चमक है। कौन कायर स्वयं को साहसी साबित करने के लिए विवश हो सीटी के प्रयोग में लगा है, कौन शोहदा आदतन सीटी के रोग से ग्रस्त है। कौन गोलगोल मुंह कर के शौकिया सीटी की रियाज कर रहा है, कौन पेशेवर मुंह में उंगली डाल कर सीटी की गोली चला रहा है।
चाय की दुकान पर खड़े महल्ले के बड़े बुजुर्ग नाकभौं सिकोड़ते हैं। यह कसरत वह इतनी बार और इतने अरसे से कर रहे हैं कि चिड़चिड़ाहट में मिला आक्रोश, उन की स्थाई मुद्रा बन चुका है। उन में से कुछ के चेहरे पर हसरतभरी खामोशी है। लड़कीलड़कों की यह आजाद छेड़छाड़ उनके यौवन में कहां थी? अब तो पतझड़ है। यह सोच कर वह कुछ बेचैन हो उठते हैं। ऐसा खुशनुमा बदलाव, काश, उम्र के उन के बसंती पड़ाव में आए होते।
वह यह भी भांप रहे हैं कि सीटियों की विविधता और प्रबलता, लड़कियों की सुंदरता के अनुपात में घटती-बढ़ती रहती है। जैसे सीटी सिर्फ सीटी नहीं, सुंदरता की कसौटी है। कइयों की समवेत टिप्पणी गूंजती है, “ हमें तो डर है कि नैतिकता के दिन अब लद गए हैं। मुल्क का रसातल में जाना तय है।“
कई वृद्ध बड़बड़ाते हैं कि उन्हें बुलाया गया तब भी वह ऐसे घटिया आयोजन में शरीक नहीं होंगे। कई चुप रहते हैं कि कोई उन्हें बुलाए तो, अपने नए डेंचर और धांसू विग से वह ऐसी लाइट मारेंगे कि जवान देखते रह जाएं। हसरत का हाथी कितना लटेगा, लट के भी जवानों पर भारी पड़ेगा।
शाम का झुटपुटा है। पार्क जेनरेटर की रोशनी से जगमग है। लाउडस्पीकर पर रीमिक्स के गाने बज रहे हैं। एक सुन्दरता के सस्ते प्रसाधन बनाने वाली देसी कंपनी सुंदरता प्रतियोगिता की प्रायोजक है। स्थानीय विधायक, छात्राओं के कालिज की प्राचार्य और जानेमाने रईस बांके सेठ निर्णायक मंडल के सदस्य हैं। लड़कियों को अपनी मनचाही पोशाक पहनने की छूट है।
वह मंच पर एकएक कर आती हैं और वैसे ही मटकमटक कर चलती हैं जैसा उन्होंने मिस इंडिया के सजीव टीवी प्रसारण के दौरान देखा है। प्रत्येक के प्रवेश पर बधाई और प्रशंसा की सीटियां गूंजती हैं। लाउडस्पीकर के गाने रुकते हैं। विधायकजी तालियों के साथ स्टेज पर तशरीफ लाते हैं और मिस महल्ला के नाम की घोषणा करते हैं।
“सब से ज्यादा सीटियां सोनी को मिलीं और वही हमारी विजेता हैं,“ इतना कह कर उन्होंने कागज और पन्नी का चमचमाता ताज सोनी के सिर पर रखा और फिर चालू हो गए।
“ उन्हें मेनका सौंदर्य प्रसाधन के सौजन्य से सेठ बांके ‘ गिफ्ट हैंपर ‘ भेंट करेंगे। मित्रों, मैं आप से कहना चाहता हूं कि देश के विकास में सौंदर्य का बड़ा योगदान है। जब महिलाएं सुंदर होंगी तभी देश सुंदर कहलाएगा। तभी विदेशी पर्यटक पधारेंगे। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। चलिए, तो निश्चय करें कि शहर की सारी महिलाएं हमारे मेनका सौंदर्य प्रसाधन का इस्तेमाल करेंगी, धन्यवाद। “
सोनी मंच पर आ कर औस्कर समारोह की फिल्मी अभिनेत्री की स्टाइल में सिसकीफफकी। उस ने ताज उतार कर चूमा और अपने परिवार, मातापिता और मित्रों तथा घर के टौमी पिल्लू को इस गौरव का भागीदार बनाया।
सीटियां फिर बजीं तो बजती ही रहीं। हमें विश्वास हो गया कि जैसे फीता इंचफुट नापता है वैसे ही सीटी सौंदर्य। हमें भरोसा है कि मंच पर कहीं टौमी पिल्लू भी आ जाता तो सीटियां ऐसे ही बजती रहतीं। कुछ सीटी के लतियल हैं। उन्हें बिना सीटी बजाए चैन नहीं पड़ता है।
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं और प्रकृति के नजदीकियों को अनुभव करने के साथ-साथ रोमांचकारी दृश्यों से रूबरू होना चाहते हैं तो हम आपको न्यौता देते हैं मध्य हिमालय की गोद में जिला नैनीताल जिले की हसीन वादियों में स्थित जिम कार्बेट नेशनल पार्क आने का। यहां आकर आपको आत्मिक सुकून तो मिलेगा ही, साथ कई अनुभवों की बानगी एक साथ देखने को मिलेगी और हम यकीन से कह सकते हैं कि जब आप यहां से वापस जा रहे होंगे तो मन में यह जरूर विचार करेंगे कि जल्दी ही दुबारा एक बार यहां जरूर आयेंगे। हिमालय की गोद में बसे इस प्राणी उद्यान में आप जंगली जानवरों से, सैकड़ों प्रजाति की दुर्लभ चिड़ियों, घड़ियाल तथा हिरनों व जंगली हाथियों से रूबरू तो होंगे ही यहां बह रही रामगंगा नदी भी आपको जीवन में निरन्तरता का संदेश देती नजर आयेगी वहीं पहाड़ों गिरते झरने यहां के शांत वातावरण और प्राकृतिक सौन्दर्य पर चार चांद लगाते हुए जगह-जगह नजर आ जायेंगे। पास ही में रामगंगा नदी के बीचोंबीच एक उच्च शिखर पर स्थित गर्जिया माता का पौराणिक मंदिर दूर से ही नतमस्तक होने को विवश कर देता है। यह वही स्थान है जहां वे गढ़वाल तथा कुआऊँ की पहाड़ियां शुरू होती हैं। कार्बेट पार्क में अन्य जीव जन्तुओं के साथ ही आप जंगल के राजा शेर तथा हाथियों व बाघों से भी मुखातिब हो सकते हैं। यहां रॉयल बंगाल टाइगर से भी आपकी भेंट हो सकती है। कार्बेट पार्क में जंगल के बासिंदों के लिए यहां का वातारण काफी महफूज माना जाता है यही कारण है हाल की के वर्षों में ही दुर्लभप्राय: गिद्ध, बाघों तथा कई प्रकार के पक्षियों की संख्या में इजाफा देखा गया है। यहां लगभग ११५ बाघ हैं तथा दर्जनों गिद्धों को भी यहां उड़ान भरते देखा गया है। गौरैया, मोर तथा अन्य दुर्लभ पंछी भी यहां हाल ही में अपना वंश बढ़ा रहे हैं।
भारत के वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों में से एक कार्बेट पार्क का नामकरण ब्रिटिश मूल के भारत में जन्मे प्रसिद्ध शिकारी तथा फोटोग्राफर जिम कार्बेट के नाम पर सन् १९७३ में किया गया। इससे पहले सन् १९३६ में जब इस पार्क की स्थापना की गई तब इसका नाम हैली नेशनल पार्क रखा गया था। यह पार्क भारत का पहला प्राणी उद्यानों में से एक है। कार्बेट पार्क रामनगर से १५ किलोमीटर उत्तर पश्चिम में ढिकाला से शुरू होकर पश्चिम दक्षिण में कोटद्वार, दुगड्ड़ा तक फैला हुआ है।
कार्बेट पार्क लगभग १२०० वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ प्राणी उद्यान है। इसके अन्दर कई गांव तथा बस्तियों थी लेकिन आये दिन वन्यप्राणियों के जीवन में हो रहे खलल तथा शेर व बाधों आदि से लोगों को हो रही हानि के कारण प्रशासन यहां से लोगों को विस्थापित कर रहा है। पार्क में घने जंगलों से भी आपको सावधान रहना होगा ही साथ ही पानी के तालाब में उतरना हो तो जरा सावधानी से उतरें यहां घात लगाये बैठे घड़ियाल कहीं आपको नुकसान न पहुॅंचा पायें। यहां की हरियाली तथा कल-कल कर बहते नदी नाले आपको बरबस आकर्षित करते हैं।
यहां आकर आपको पहाड़ों के जन जीवन को भी नजदीक से देखने और महसूस करने का मौका मिलेगा ही बिना पहाड़ों में गाड़ी चलाने का जोखिम लिये ही आप पहाड़ों की सैर कर सकेंगे क्योंकि पहाड़ यहीं से शुरू होते हैं। कार्बेट पार्क में दुर्लभ प्राणियों के अतिरिक्त सैकड़ों प्रजाति की वनस्पतियां तथा पेड़ आदि भी मौजूद हैं।
कार्बेट पार्क आने के लिए यहां का नजदीकी स्टेशन रामनगर होते हुए आना होगा। रामनगर तक आप रेल तथा सड़क मार्ग द्वारा आसानी से आ सकते हैं। दूसरी ओर हवाई मार्ग द्वारा आप फूलबाग, पंतनगर तक आ सकते हैं यहां वे कार्बेट पार्क ५० किलोमीटर है जो कि सड़क से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से सड़क मार्ग से मात्र २७५ किलोमीटर दूरी पर कार्बेट पार्क है। यह पार्क देश के सभी मुख्य शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। यहां आप अपने वाहन से भी आ सकते हैं। खासकर दिल्ली से सुबह चलकर अपने वाहन से आप मात्र पांच-छ: घंटे में रामनगर पहुंच सकते हैं। रामनगर से कार्बेट पार्क मात्र पन्द्रह किलोमीटर दूरी पर है, जो कि सममतल सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। कार्बेट पार्क पूर्व में रामनगर से पश्चिम में कोटद्वार तक फैला हुआ है।
यहां कार्बेट पार्क मुख्य गेट तक मोटर द्वारा आया जा सकता है। आप यहां रामनगर से अपने वाहन या निगम की बस या रामनगर से ही प्राइवेट वाहन से भी आ सकते हैं। पार्क के अन्दर आपको अपनी गाड़ी ले जाने की अनुमति आसानी से नही मिल सकती है। यहां पर वन विभाग की जीपें तथा हाथियों से भी आप पार्क के अन्दर घूम सकते हैं। पार्क के अन्दर गाईड़ के ही निर्देशों पर चलें क्यों कि यहां पार्क खुला हुआ है और जंगली जानवर अक्सर खुले में ही घूमते हैं इसलिए जरा सी असवाधानी जान को सांसत में ड़ाल सकती है। यहां ठहरने के लिए पार्क के अन्दर ही वनविभाग के गेस्ट हाउस हैं लेकिन उनकी बुकिंग पूर्व में कराना जरूरी है। आप दिनभर पार्क की सैर करके शाम को रात्रि विश्राम के लिए रामनगर में भी रूक सकते हैं। रामनगर यों तो छोटा सा शहर है लेकिन आधुनिक सुविधाओं तथा ठहरने के लिए आपकों अच्छे होटल उचित किराये पर मिल सकते हैं। यहां आप घर जैसा महसूस कर सकते हैं। गढ़वाल तथा कुमाऊं का प्रवेश द्वार होने के कारण यहां पहाड़ी जनजीवन को भी आप करीब से देख सकते हैं।
कार्बेट पार्क आने के बाद आप यहां फिंशिंग सफारी तथा वर्ल्ड सफारी का आनन्द भी उठा सकते हैं यहां ऊंचाई से उड़ान भरती सैकड़ों चिड़ियों को आप एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी की ओर जाते हुए देख सकते हैं। रात में यहां जानवरों की भांति-भांति की आवाजें तथा कलरव आपको सुनने को मिलता है।
कार्बेट पार्क १५ नवम्बर से १५ जून तक ही खुला रहता है उसके बाद १६ जून से १४ नवम्बर तक पार्क मुख्यत: बन्द ही रहता है। क्योंकि यहां बरसात के मौसम में भयंकर बारिश होती है जिससे यहां आना खतरे से खाली नही है। बरसात शुरू होने के कारण पार्क बन्द कर दिया जाता है। यहां आते समय आप हल्के उनी वस्त्र तथा कुछ जीवनरक्षक दवाईयां अपने साथ लेकर जरूर आयें। यहां जंगली इलाका होने के कारण कोई भी चीज आसानी से नही मिल सकती है लेकिन रामनगर में आपको हर प्रकार की सुविधा तथा साधन मिल जायेंगे।
एक बार खरगोश एवं कछुए में दौड़ हुई और हम सभी जानते हैं कि कछुआ जीत गया और खरगोश हार गया। कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई, खरगोश को बहुत ग्लानि हुई कि मैने समय रहते अपनी क्षमताओं का सही प्रयोग नहीं किया और मैं अति विश्वास की वजह से पराजित हुआ। उसने कछुए से बात की और एक बार पुनः कछुए को प्रतियोगिता के लिए आमंत्रित किया। इस बार अपनी क्षमताओं का सही समय से प्रयोग करते हुए खरगोश दौड़ जीत गया किन्तु कछुआ भी कम न था ऊसने खरगोश से कहा कि बन्धु मैं और तुम एक और निर्णायक दौड़ में हिस्सा लेंगे और मार्ग मैं निर्धारित करूँगा। इस बार कछुए ने ऐसा मार्ग निर्धारित किया जिसमें बीच में नदी पड़ती थी। खरगोश तेजी से दौड़ता हुआ नदी तक पहुँच गया किन्तु नदी पार कर आगे न जा सका तथा कछुआ जब नदी किनारे पहुँचा तो वहाँ खरगोश को बेबस खड़ा देखकर मुस्कुराया और शान से नदी पार कर निर्धारित लक्ष्य तक पहुँच कर दौड़ जीत गया। दोनों ही बहुत समझदार थे और एक दूसरे की क्षमताओं को पहचान चुके थे। दोनों में आपस में गहरी मित्रता हो गयी। अब खरगोश कछुए को अपनी पीठ पर बैठाकर थल पर और कछुआ खरगोश को अपनी पीठ पर बैठाकर जल पर खूब भ्रमण कराते थे।
बच्चों इस कहानी का निष्कर्ष है कि हम यदि कोई कार्य अपनी क्षमता पहचानते हुए आपसी सामंजस्य और टीम भावना से करते हैं तो निश्चित ही सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होंगे।