कोई जनता को क्या लूटे कोई दुखियों पर क्या टूटे कोई भी लाख प्रचार करे सच्चा बनकर झूठे-झूठे अनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों से छीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम "
-गोपाल सिंह नेपाली
' स्वाधीन कलम'
(अंक 51- वर्ष 5)
इस अंक में- संकलन-माँ तुझे नमन। कविता आज और अभीः डॉ. आर्यकुमार हर्षवर्धन, सुबोध श्रीवास्तव, रश्मि सरन, आदिल रशीद, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, शैल अग्रवाल। कविता धरोहरः नागार्जुन। माह के कविः अशोक पाण्डेय। माह विशेषः रामधारी सिंह 'दिनकर'। बाल कविताः साहिर लुधियानवी।
एक ऐतिहासिक वर्ष की तरह आकार ले रहा है वर्ष 2011, 1 मई ही नहीं , आरंभ से ही इस वर्ष का हर दिन ही एक नए आंदोलन, नए परिवर्तन की मांग करता हुआ जगा है ...वह भी किसी देश विशेष या स्थान पर नहीं, करीब-करीब पूरे विश्व में ही। मानो एक आंधी-सी उठ चली हो-'अब और नहीं की'... विचारों की, मांगो की, जागरुकता की, जिससे बहुत कुछ जीर्ण-शीर्ण अनुपयुक्त स्वतः बहता-टूटता-सा, छंटता जा रहा है...क्योंकि एक नहीं, दो नहीं हजारों झूठ खुलकर सामने आ रहे हैं...झूठे-सच्चे, तरह-तरह के झूठ। जिनमें व्यक्तिगत और सामूहिक संस्थाओं और सत्ताओं के कई वे घिनौने झूठ भी शामिल हैं ...जिन्हें बड़ी ही कुशलता से आज तक ताकत के ताने-बाने में बुन और छुपा कर तिलिस्म की तरह पेश किया जाता रहा है, भोले-भाले आम आदमी के आगे ही नहीं, घाघ सत्ता के गलियारों तक में। चोर-चोर मौसेरे भाई, आदि कहावतें यूँ ही तो नहीं बन गईं।
पहले फूट डालना फिर आतंक फैलाना आज भी उतने ही सशक्त और कामयाब हथकंडे हैं ताकत के, जितने कि 400-500 साल पहले थे क्योंकि आइना आजभी तो दूसरों को ही दिखाया जाता है, खुद अपनी असली शक्ल या आइना देखने की हिम्मत कम के पास ही है, पर सुधार खुद से , अपने घर से हो तभी तो कारगार हो पाता है, यह भी एक महत्वपूर्ण सच है। सभी यह जानते हैं पर कर पाने का साहस बिरले ही कर पाते हैं।
परंपरा हो या परिपाटी, संस्था और समूह, जितने पुराने होंगे, उतनी ही उनमें कमजोरियों की गुंजाइश भी। पेड़-पौधे तक तभी फलते-फूलते हैं जब उन्हें काटते-छांटते रहा जाए। चालक हो या संचालक, समर्थ स्वार्थियों की सिद्धि के नए-नए रास्ते भी तो खोलती है लगातार की सुविधा और पहचान । नियंत्रण और आंख हर कार्यकर्ता या नेता की गतिविधी पर होनी चाहिए। सत्ता उछृंखलता और ताकत का पर्याय नहीं। सवाल पूछने वाला न हो या बिल्ली बाहर हो तो चूहों का खेल स्वाभाविक है। ताकत के विभिन्न और भृष्ट रूप भी एक तरह के सामाजिक चूहे ही हैं, खुला छोड़ दो इन्हें तो इनका स्वभाव हो जाता है सेँध लगाना और जहां से भी मिले कुतरकर भूख ही नहीं, अपनी लत और नशे तक को साधना।
पर, अकेले-अकेले पेट भरने से पहले किसी के लिए भी एक बात याद रखने लायक है कि भूखा जानवर ही नहीं, भूखा मनुष्य भी आक्रमण करता है। आत्म संरक्षण का यही अंतिम उपाय है। वैदिक समाजशास्त्र बुरा नहीं था जहां पहला निवाला निगलने के पहले गैया और कुत्ते दोनों के लिए ही रोटी निकाली जाती थी। गैया और कुत्ते को तो छोड़ो, कौवे तक को नहीं भूला जाता था। समाज के तराजू को संतुलित रखने के लिए जब भूखे को खाना खिलाना या सीधा देना, पूजा और तीर्थयात्रा से ज्यादा पुण्यकारी माना जाता था। जब राजे-महाराजे ही नहीं, व्यापारी वर्ग भी अपने मुनाफे का दस प्रतिशत समाज या धरमखाते में डालते थे। भले ही मानव द्वारा निर्मित यह समाज, उसके लिए और उसकी सुविधा व सेवा के लिए बनाया गया था , पर सही तरह से संचालित हो...इसके लिए मालिक ही नहीं, रक्षक और सेवक का तृप्त और संतुष्ट होना आवश्यक है। सही कहा जाए तो मालिक की अपनी भूख से भी पहले जरूरी है, तभी यह कई परतों वाला समाज बिना बखिया उधड़े सुचारु और संतुष्ट चल सकता है। यही वजह है कि कितने भी हम आगे बढ़ लें, तरक्की कर लें, 'जय जवान व जय किसान' के नारे का महत्व कम नहीं होगा। ना ही श्रमिक वर्ग और हरिजनों के सामाजिक योगदान के महत्व का। जो हमारी गंदगी साफ करने को मेहतर बने उन्हें दुत्कार और घृणा नहीं, यथोचित सम्मान व सुविधा मिलनी चाहिए। खून भी तभीतक जीवनदायी और पोषक होता है जब तक हृदय से जुड़ा रहे। नाम हम समाजवाद या मजदूरवाद जो भी दें, बात वही आपसी रिश्तों की ही है, समवेदना और सहानुभूति की है।
भृष्टाचार ना तो शब्द नया है और ना ही आचरण। सुविधा और सफलता के लिए इसका उपयोग औजार की तरह सदियों से होता आया है। नया है तो अब इसके प्रति हमारा रवैया। कभी यह आक्रामक था फिर सामान्य और सहज हुआ, इसे सहने की आदत डाल ली अधिकांश ने। परन्तु आज निश्चित रूप से पूरा विश्व ही निर्णय और निर्मूलन की मांग करता दिख रहा है। ऐसा कर पाएँगे या नहीं, गुत्थी वक्त ही संभवतः सुलझा पाए। हां, हर विवेकी डरता अवश्य हैं कि कहीं बस उत्तेजना में जीते इस युग का यह एक और नया मनोरंजन मात्र तो नहीं, या इसके भी अच्छे परिणाम निकल सकते हैं? मनचाहा बदलाव आ सकता हैं समाज में इस तोड़-फोड़ और विद्रोह से ? क्या आम आदमी के पास संघर्ष की सामर्थ है...सामर्थ तो छोड़ो , क्या साहस है...राह में आती तकलीफों से जूझने का...हौसला बनाए रखने का...या बस हम जंगल में फैली आग के दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी चपेट में पूरा विश्व एक तेज हवा के झोंके के साथ आ गया है?
जंगल में शेर और बकरी दोनों को ही साथ-साथ जीवित और खुश रख पाना, किसी के लिए आसान नहीं, ईश्वर तक के लिए नहीं ? जो देख पा रहा है , कुछ करने की गुंजाइश रखता है या तो संतों की चादर ओढ़कर, चुप बैठने पर मजबूर हो जाता है या अपदस्थ नायक की तरह फिसलती राहों पर भीड़ में भी नितांत अकेला है। कभी गोली खाता है तो कभी सूली पर चढ़ा दिया जाता है।
आदमी तो आदमी प्रकृति तक सामना नहीं कर पा रही इस बदलाव के चक्रवात का। उसका मिजाज तक वक्र चल पड़ा है एक लम्बे समय से और अब तो दुर्घटनाओं और इस बेचैनी की आदत-सी पड़ती जा रही है। अभी जापान की आणविक दुर्घटना के बादल छट भी नहीं पाए थे कि अलकायदा की धमकियों ने डराना शुरु कर दिया है। हम हैं कि आग में घी डालने के अलावा कुछ और कर ही नहीं पाते...कभी विश्व के खतम होने की भविष्यवाणी कर बैठते हैं, तो कभी किसी कुख्यात की धमकियों से काल्पनिक चिन्ताओं में पड़ जाते हैं । एक से एक दहलाने और डराने वाली खबरें ही रहती हैं हमारे पास क्योंकि वही बिकती हैं...धन्धा चलाती हैं। ...ऐसे में आप ही बताएं कैसे कोई कलम स्वाधीन और साहसी रह पाएगी , जब उसे पकड़ने वाले अधिकांश हाथ आज भी तो कांप ही रहे हैं ।... भूखे और भयभीत हैं। दोनों ही स्थितियां अस्वस्थ और चिंताजनक हैं स्वस्थ समाज के दिवा-स्वप्न देखने वालों के लिए। जन साधारण के स्वास्थ के लिए। भूख की फिसलन पहले आदमी को गिराती है, फिर भृष्टाचार और भय जैसी कमजोरियों को जन्म देती है। कायर भयभीत भी है और विद्रोही भी। भृष्ट राहों पर चलना या रुकना स्वभाव ही नहीं, शिक्षा और माहौल की भी तो बात है । बदलाव और आंदोलन दोनों की ही पहली और आखिरी सीढ़ी जबतक व्यक्ति स्वयं नहीं बनेगा, किसी भी बदलाव की अपेक्षा बेमानी है। जब आदमी स्वभाव से स्वाधीन नहीं, तो कलम या आचरण से भी नहीं हो सकता। सिर्फ कहने या अलग करके दिखाने मात्र से कोई बात शुरू या समाप्त नहीं हो जाती। सामर्थ के साथ-साथ धैर्य और साहस के साथ परिणाम तक ले जाने की गुंजाइश भी होनी ही चाहिए और तब भी सफलता मिलेगी ही, जरूरी तो नहीं। हर संभावना और असफलता के लिए तैयार होकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। मर्फी के कानून की मानें तो परिणाम प्रायः अप्रत्याशित और नियंत्रण से परे ही होते हैं। बात जितनी बिगड़ सकती है, पहले बिगड़ती है, चाहे भृष्टाचार की हो या अत्य़ाचार की ...क्योंकि बात एक की नहीं, हजारों की है, कइयों से जुड़ी है।
ऐसे में क्या बनता है साहित्य का दायित्व...मात्र दर्पण बने रह जाना या टूटने का भय छोड़, आगे बढ़ना। किरच-किरच हो हर गलत राह पर चलते पैरों को लहूलुहान कर देना। पीर देना और रोकना...अक्सर ही सोचती हूँ क्या है समाज के प्रति साहित्य का कर्तव्य और क्या है इसकी उपयोगिता? ... क्या साहित्य मात्र एक दर्पण है, औजार है या शुद्ध आनंद ?.शेक्सपियर और कालीदास की मानें तो..मां, सखी, प्रेयसी और अपनी तरफ से सोचूँ तो सखा और शिक्षक। मई के महीने की गरमी नहीं, कई रिसते-पसीजते सवालों की उमस ज्यादा बेचैन कर रही है इसबार लेखनी को।
सब कुछ साफ साफ खुलासा तो है दुनिया के आगे, पर सुलझने की बजाय और उलझाता हुआ...कई कई नए तार और सुरागों को साथ लिए हुए। लड़ाईयां उत्तेजना के बल पर नहीं धैर्य और संयम से, विवेकपूर्ण साहस से ही जीती जा सकती हैं और यही तो है साहित्य का कर्तव्य व जिम्मेदारी...आनंद के साथ विवेक देना।
यूरोप में जोर पकड़ता श्रम-दिवस समारोह हुआ . . . सामंतशाही और ताकत के खिलाफ चन्द सरफिरों का सामूहिक प्रदर्शन और दुराग्रह देखा . . . जैसे नक्कार खाने में तूती की आवाज . . . और आहिस्ता-आहिस्ता आवाजें ऊँची करता उन्हें दबाता-रौंदता जातिवाद...प्रिंस विलियम और केट मिडल्टन की हाल ही में हुई शादी की खुशियों के बाद भी तो असेतोष पूर्ववत् ही था। चक्र तो आज भी वही है । चलता है और चलता ही रहेगा। साथ-साथ एक चक्रव्यूह और भी तो है, जिसे अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह बात दूसरी है कि अभिमन्यु-सा आम आदमी का परिणाम आज भी पूर्ववत् ही न सिर्फ पूर्व निर्धारित है, सर्व विदित भी है। आज भी वह सुधार की प्रार्थनाएं करता ज्यादा दिखता है अपितु उन्हें अनुभव करने के।
हर श्रम दिवस पर जितनी विभिन्न और नई प्रदर्शन तख्तियाँ देखने को मिलती हैं उतने ही विभिन्न व नए संदेश भी। जिन्हें देखकर गालिब मियाँ की बेचारगी तो याद आती ही है –जिसमें उन्होंने हजारों ऐसी ख्वाइशों का जिक्र किया था , जिसकी हर ख्वाइश के जिक्र मात्र से उनका दम निकलने लग जाता था, परिस्थिति की लाचारगी पर सूखी हंसी और कोफ्त भी शायद।...
इन माँगो और प्रदर्शनों की सूची हरसाल बढ़ती ही जा रही है। अब बात सिर्फ पूँजीवाद तक ही सीमित नहीं रह गई, वरन् हर तरह के असंतुष्ट पहलू जुड़ते जा रहे हैं इस दिन के साथ। भीड़ आकर्षित करते हैं लोग जुलूस, नारे और घेराबन्दी के जरिए। तरह तरह की प्लेकाड्र्स पर लिखी शिकायतें और चेतावनी के साथ। शहर-शहर में उमड़ते ये हजारो लोग। बाँध की दीवारों से सतर्क चुपचाप खड़े पुलिस कर्मचारी। श्रमिक दिवस की तरह शुरू होनेवाली यह पहली मई की तारीख अब सामूहिक असंतोष और प्रदर्शनी का विकल्प-सा बनती जा रही है। चारो तरफ तरह-तरह के मुद्दे हैं . . . विश्व व्यापार का नियंत्रीकरण व एकीकरण, पर अपने मुनाफे के साथ . . . निशस्त्रीकरण, पर्यावरण नियंत्रण व सुधार पर निजी सुविधा ज्यों-की-त्यों । तात्पर्य यह है कि किसी भी जनहित निर्णय में लोग अपनी-अपनी शिकायतों और अंदेशों के साथ धरना देकर बैठने लगे हैं लोग . . . कहना तो इन्हें बहुत कुछ है, परन्तु सिर्फ शान्ति के साथ। फिर भी लाठी चार्ज होता ही है। अश्रु-गैस छोड़ी जाती है। दुकानें लुटती हैं और कहीं-कहीं तो लोग मरते भी है। और एक बार फिरसे वे अच्छे-बुरे सारे सन्देश गन्तव्य तक पहुँचने के पहले ही ताकत और विद्रोह की लड़ाई में पैरो तले रूँदकर ही रह जाते हैं । रोमांचक खबरे बनकर हवा में उड़ जाते हैं अगले वर्ष पुनः जनमने के लिए . . . श्रम और प्यार दिवस मनाने का यह सिलसिला बस एक सिलसिला ही तो है, जो कभी धुँआ छोड़ जाता है तो कभी धमाका।
सिड़नी हो चाहे बर्लिन हो, पैरिस हो या लंदन...कराची, कंधार, मिश्र या बैंकाक, समस्या वही पुरानी और जानी-पहचानी-सी ही तो है...शासन और शोषण की। चंद की सुविधा के लिए हजारों के नियंत्रण और अभाव की। स्वार्थ और लालच की। पर बूँद-बूँद मिलकर ही तो लहरों का रूप लेती हैं और अगर कहीं लहरें मिल जाएँ तब तो किनारों का संयम तक टूट सकता है, टूटेगा ही . . . ! बात बारबार सिद्ध हो रही है और अच्छी तरह से हो रही है।
इस बार बस इतना ही। एकबार फिर फैसला आपका अपना ही है। हम सभी वयस्क और जिम्मेदार नागरिक हैं आज के इस विकसित विश्व समाज के...प्रश्नों के साथ-साथ जबाव भी हमें अपने अंदर ही मिलेंगे। चलते चलते मनन के लिए छोड़ रही हूँ बच्चन जी की यह कविता, जो बात को बेहद खूबसूरती और संवेदना के साथ स्पष्ट करती है...
नया अनुभव
मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक कविता लिखना चाहता हूँ। चिड़िया नें मुझ से पूछा, 'तुम्हारे शब्दों में मेरे परों की रंगीनी है?' मैंने कहा, 'नहीं'। 'तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?' 'नहीं।' 'तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?' 'नहीं।' 'जान है?' 'नहीं।' 'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?' मैनें कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है' चिड़िया बोली, 'प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?' एक अनुभव हुआ नया।
कहीं कहीं से झाँकता है अब भी नीला आकाश . पेड़ों के झुरमुट तले, अब भी कहीं कहीं दिखती है गहराती छाँव साफ़ आसमां पर अब भी चमकते हैं मोती.
सड़क के कोने में, पीली रौशनी में नहाई, आज भी खड़ी है कोई छोटी सी गुमटी . जो दिलाती है याद मेरे पुराने शहर की .
छोटा सा, तन्हा सा, वृक्षों से हरा भरा . जिसके घर की छतों से कभी बरसात में उड़ कर आती थी खपरैल की भीनी खुशबू, और चौखट पर खिले बेतरतीब से फूलों पर इठलाती तितली मेरी खिड़की से हो कर गुज़र जाती थी .
ढेर सी भारी गाड़ियाँ तब नहीं रौन्धती थी इसकी सड़कों को . बेहद तीखा शोर नहीं गूंजता था तब हवाओं में इसकी . फैली नहीं थी धुंध, मैली नहीं थी इसकी रूह
धूल से सने , गलियों में खेलते थे बच्चे खूब करते धमा चौकड़ी खूब होता था शोर . वह अल्हड सा बालपन न चोटों की परवाह, न खाने का होश . कहाँ जाती थी साँझ ? कब होती थी भोर ?
अब किताबों के बोझ तले दबा हुआ सा बचपन दिशा हीन सी हांफती जवानी भागती बुढ़ापे की ओर.
मेरा शहर अब बदल गया है . वो शाम का लाल आसमान ऊँची इमारतों से ढक गया है . गुम हो गए हैं तारे, चाँद कहीं खो गया है. खिडकियों पर जाम शीशों से टकराता मदमस्त सावन अब तन नहीं भिगोता है .
रंगों में घुली शाम ने तुमसे क्या कभी कुछ कहा है ? धीमे धीमे ढलते सूरज के पिघलते गुरूर ने तुम्हें कब छुआ है ? दिखा क्या स्याह धुआं जब दीपक कोई बुझा है ? नाउम्मीदी के अंधेरों से निकल घने दरख्तों से झाँकती सहर ने क्या कभी तुम्हारा मन रौशन किया है ?
तुम ने जीवन कहाँ जिया है ?
- रश्मि सरन
ओ आदमी...
तुम, बहुत टींसते हो मुझे ओ चीथड़ों से ढंके गंदे से आदमी। मैं, जब भी महसूसता हूं तुम्हें एहसास होता है कि भीड़ में खोए शहर में आधुनिक सभ्यता के बीच दम तोड़ती मर्यादाओं में बाकी हैं कुछ सांसें। खत्म नहीं हुई अब भी याद रखने की परम्परा- अस्तित्व के लिए जूझता पूर्वजों का सत्य, आंखों के पनीलेपन और खुद के जि़न्दा होने के मायने।
-सुबोध श्रीवास्तव
योमें मजदूर (मजदूर दिवस)
खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए आज के दिन ही हलफ इसका उठाया जाए जब के मजदूर को हक उसका दिलाया जाए योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए
ख़ुदकुशी के लिये कोई तो सबब होता है कोई मर जाता है एहसास ये तब होता है भूक और प्यास का रिश्ता भी अजब होता है जब किसी भूके को भर पेट खिलाया जाए योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए
अस्ल ले लेते हैं और ब्याज भी ले लेते हैं कल भी ले लेते थे और आज भी ले लेते हैं दो निवालों के लिए लाज भी ले लेते हैं जब के हैवानों को इंसान बनाया जाये योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए
बे गुनाहों की सजाएं न खरीदीं जाएँ चंद सिक्कों में दुआएं न खरीदी जाएँ दूध के बदले में माएं ना खरीदी जाएँ मोल ममता का यहाँ जब न लगाया जाये योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए
अदलो आदिल कोई मजदूरों की खातिर आये उनके हक के लिए कोई तो मुनाजिर आये पल दो पल के लिए फिर से कोई साहिर आये याद जब फ़र्ज़ अदीबों को दिलाया जाये योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए
-आदिल रशीद
अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा..
अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा जब वो पहुंचेगा बुलंदी पे तो घट जाएगा
अपने किरदार को तू इतना भी मशकूक न कर वर्ना कंकर की तरह से दाल से छट जाएगा
जिसकी पेशानी तकद्दुस का पता देती है जाने कब उस के ख्यालों से कपट जाएगा
उसके बढ़ते हुए क़दमों पे कोई तन्ज़ न कर सरफिरा है वो, उसी वक़्त पलट जाएगा
क्या ज़रूरी है के ताने रहो तलवार सदा मसअला घर का है बातों से निपट जाएगा
आसमानों से परे यूँ तो है वुसअत उसकी तुम बुलाओगे तो कुजे में सिमट जाएगा
-आदिल रशीद
बेबाक यह
बेचैन आंखों की प्रतीक्षा ने सहलाया है फिर उन्ही छालों को बचाने चाहे हैं वही खरगोश फुदकते रहते जो कंटीली झुरमुटों में टहलते देखे हमने जहाँ शेर और बाघ
रौशनी के ये कण-कण धूल भरे अंधेरे तक को संग समेटे कहते हैं जिसे संकल्प आमरण अनशन ही क्यों अब... अतीत बस अति तो नही हमारा इत् भरा
गुजरे कल की आने वाले कल के नाम पीली ही सही, भूली-बिसरी है यह पाती भृष्टाचार के लाल फीतों से सजी-धजी आज भी सहेज रखी है जाने कितनों ने रंग वही पनीला क्यों आज भी भूखे ख्वाबों का...
बावरी वो बयार उमड़ी तो थी दूर कहीं आकाश के उस छोर से जाने किस छोर तक धधकती आग-सी चौक-चौराहे पार करती पर आ चुकी है अब तुमतक, मुझतक, सब तक
इक कारवां सा यह गुबार बह चला, रोको, आंधियों से कहो ना बहें बदहवास, थमें, जरा रुकें, जड़ से ना उखाड़ें हमें बारबार...
सर लुढकाती, तूफान मचाती बह चली फिर बेबाक यह खुदपे ...मुझपे...तुमपे...सबपे नाराज और मुश्किल यह बड़ी, अब भी है यह हैरान...!!
-शैल अग्रवाल
चीखो
चीखो- पहले से भी ज्यादा तेज आवाज़ में। तुम्हें, चीखना भी चाहिये क्योंकि तुम्हारी आवाज़ पहले की तरह भूख और गरीबी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती न ही भेद सकती है छाती अंधी व्यवस्था की। हां, तुम्हारी चीख कुछ देर के लिए कम कर सकती है तुम्हारे- हरे घावों की तपकन।
-सुबोध श्रीवास्तव
ख़ुदा
'गर तुम ईश्वर को अल्लाह कहो तो मैं तुम्हें इन्सां मानूंगी. 'गर तुम ख़ुदा को ईश कहो तो मैं तुमको इन्सां मानूंगी. 'गर तुम काबा को मंदिर और मंदिर को मस्जिद मानोगे तो मैं तुमको इन्सां मानूंगी.
'गर सारे अंतर भुला तुम सबको बराबर समझो, तो मैं तुमको इन्सां मानूंगी . 'गर तुम स्वयं में मुझे और मुझमे स्वयं को ढूँढ सको तो मैं तुमको इन्सां मानूंगी .
पर ऐसा है नहीं क्योंकि तुम्हारा मैं मेरे अहम से बड़ा है तुमने ख़ुद को ज़्यादा और मुझको कम माना है. स्वयं को आत्मा और मुझको तन माना है . तन जो नश्वर है, और आत्मा तो अजेय है. ऐसी आत्मा- जो अपने ही शोर में डूबी है . बंद है इसके कान, और देख नहीं सकती है . स्वयं के लिए जीती, और स्वयं के लिए मरती है ! नहीं दिखता इसको किसी और का दर्द . सुनाई नहीं देती आवाज़ जो करहाती है . बहुत दुर्बल है ये. खटखटाता है कोई द्वार, पट खोल नहीं पाती है. सुप्त, निष्प्राण और दीन है. मांगने पर न्याय की भीख , दुआ भी नहीं दे पाती है. हृदय के घाव तो दूर आंसू कोई पोछ नहीं पाती है. ऐसी निष्प्राण आत्मा को 'गर तुम जिंदा कर सको तो मै तुमको इन्सां मानूंगी . सही और गलत की पहचान करा सको तो मै तुमको इन्सां मानूंगी. अंधेरो में रुंधे फूल खिला सको तो मै तुमको इन्सां मानूंगी.
धर्म और जाति नहीं, भाई और दोस्त नहीं, बैर और वफ़ा नहीं, किसी दोष से दूषित किये बगैर, 'गर एक साफ़ आईने की तरह सिर्फ इन्सां को पहचान सको तो मै तुमको ख़ुदा मानूंगी.
-रश्मि सरन
फुग्गा
होने का और न होने का दुःख सालता है दुनिया को अपने आप को और कहीं अपनी अटकी सांसों को भी . .
क्यों कि जब मेला खतम होता है तो अधपिचके फुग्गे से पङे गुब्बारों को कौन छूता है उन के छूटे रंगों से कौन आहत होता है . .
बैरंग से पङे वे फुग्गे बस एक लताङ के अपेक्षित रह जाते हैं . . . ।
-सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’.
अनहद
शब्द जठर में हैं शब्द श्मशान में हैं शब्दों का एक संसार लीला रचाते हुए पार कर रहा है जन्म जन्मान्तर कालांतर है शब्दों की यात्रा मन्वन्तरों में पनपता है शब्दों की सभ्यता। मैं शब्दों को साधता हूँ शब्द कभी मुझसे लड़ते हैं शब्द कभी मेरे खिलाफ उद्घोषित करते हैं युद्ध कभी मेरे तुणीर में भी संजोकर रख लेता हूँ मैं चुने हुए शब्द मेरे शत्रुओं के खिलाफ भी प्रत्यंचा में हैं मेरे शब्द भेदी शब्द।
पानी की धार में हैं जो शब्द हवा के झोंकों में हैं जो शब्द शब्द समुंदर के नीचे शंख के अंदर भी समाया हुआ है जो शब्द युद्धों में शब्दों की झनझनाहट शोर शरावे में शब्दों का जमावड़ा भीड़ में शब्द हैं शब्द के बिना भी भीड़ कहाँ है निशब्द।
वाँसुरी के अंदर से कोयल की कूक से सितार के तारों से मर्मर शब्द पत्तों के हिलने से भी झर झर गिर पड़ते हैं पतझर जैसे चरचर्राहट भरकर।
खामोशियों से अकेले पन से भी शब्द पनपते हैं खिलते हैं गुनगुनाते हैं शब्द फिर तैयार हो रहे होते हैं फिर एक शोर के लिए शब्द जन्मते हैं शब्द मरते हैं शब्दों की आत्मा फिर फिर बदल देती हैं अपनी काया घट से घटांतर जन्म से जन्मांतर शब्दों की यात्रा निरंतर...निरंतर...।
ओं शब्द ही ब्रह्म है ओं शब्द और शब्द और शब्द और शब्द ओं प्रणव, ओं नाद, ओं मुद्राएँ ओं वक्तव्य, ओं उदगार, ओं घोषणाएँ ओं भाषण ... ओं प्रवचन ... ओं हुंकार, ओं फटकार , ओं शीत्कार ओं फुसफुस, ओं फुत्कार, ओं चित्कार ओं आस्फालन, ओं इंगित, ओं इशारे ओं नारे और नारे और नारे और नारे ओं सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ ओं कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं ओं पत्थर पर की दूब, खरगोश के सींग ओं नमक-तेल-हल्दी-जीरा-हींग ओं मूस की लेंड़ी, कनेर के पात ओं डायन की चीख, औघड़ की अटपट बात ओं कोयला-इस्पात-पेट्रोल ओं हमी हम ठोस, बाकी सब फूटे ढोल
जबसे जाना पिता को लगभग तबसे ही जानता हूँ कि एक दिन नहीं होंगे पिता जैसे नहीं रहा उनका वह क्रोध जैसे चला गया धीरे-धीरे उनका भय और चुपचाप करुणा ने भर दी वह जगह जैसे ख़त्म होती गयीं उनसे जुड़ीं आदतें तमाम
अब बोलते हैं वह तो ज़रा रुक कर आती है आवाज़ जैसे रास्ते में कहीं ठिठक गयी हो आशंका से चलते हैं तो निगाहें मेरे कदमों पर स्वाद पर हावी होती जा रही सावधानी नींद में भी आते हैं पता नहीं कौन से स्वप्न कि उठ कर टहलने लगते हैं मुह अंधेरे ख़ुश होने से पहले सोचते हज़ार बार
दुःख कभी भी कर जाता पलकें गीली कितना मुश्किल होता है दुनिया के सबसे ताक़तवर इंसान को कमज़ोर होते देखना… इतना भी बलवान तो नहीं होता समय… कौन सी पदचाप जिसका भय इतना असीम…
कितना क्रूर यह सोचना कितना कठिन इसे लिख पाना मैं लिखता हूँ कि एक दिन नहीं रहेगी पृथ्वी एक दिन टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जायेगा सूर्य और एक दिन मैं भी नहीं रहूँगा यहाँ…
ख़बर
किसी अख़बार में नहीं है वह ख़बर जिसे सारा शहर जानता है
थोड़ी सी कसरत से बन सकता था ख़बर और शहर का तुक
एक शायराना रुमान उस ख़बर को शराब का सबसे अच्छा साथी बना सकता था
मुश्किल नहीं इतनी वह कसरत जितनी अश्लील है इन वक़्तों में
दोपहर के बाद नहीं पढ़ता कोई अख़बार और नशे में ख़लल डालती है हमारी कविता
किसी उत्सव में नहीं आ सकता काम ‘हम लड़ेंगे साथी’ चीखता हुआ वह दीवाना
किसको फ़ुर्सत कि जवाब दे उस मुश्क़िल सवाल का ‘तुम्हारी पालिटिक्स क्या है पार्टनर’
कौन चिंता करे किसी निरुपमा की उदासी की
पर्दों पर मचलती कितनी जवानियां है और शराब की शोखी बढ़ाता वह नारा – सब साले चोर हैं!
हमारी कविता उस अनकही ख़बर को दर्ज़ करने की जद्दोजेहद है जिसे सब जानते हैं लेकिन कोई नहीं करता अपने रोज़नामचे में दर्ज़
लगभग अनामन्त्रित
उपस्थित तो रहे हम हर समारोह में अजनबी मुस्कराहटों और अभेद्य चुप्पियों के बीच अधूरे पते और गलत नंबरों के बावजूद पहुंच ही गये हम तक आमंत्रण पत्र हर बार
हम अपने समय में थे अपने होने के पूरे एहसास के साथ कपड़ों से ज्यादा शब्दों की सफेदियों से सावधान हम उन रास्तों पर चले जिनके हर मोड़ पर खतरे के निशान थे हमने ढ़ूंढ़ी वे पगडंडियां जिन्हें बड़े जतन से मिटाया गया था
भरी जवानी में घोषित हुए पुरातन और हम नूतन की तलाश में चलते रहे...
पहले तो ठुकरा दिया गया हमारा होना ही चुप्पियों की तेज धार से भी जब नहीं कटी हमारी जबान कहा गया बड़े करीने से - अब तक नहीं पहचानी गयी है यह भाषा हम फिर भी कहते ही गये और तब कहा गया एक शब्द- खूबसूरत
जबकि हम खिलाफ थे उन सबके जिन्हें खूबसूरत कहा जाता था जरूरी था खूबसूरती के उस बाजार से गुजरते हुए खरीदार होना हमारे पास कुछ स्मृतियां थी और उनसे उपजी सावधानियां और उनके लिये स्मृति का अर्थ गौरव प्राचीन
एक असुविधा थी कविता हमारे हिस्से और उनके लिये सीढ़ियां स्वर्ग की हमें दिखता था घुटनों तक खून और वे गले तक प्रेम में डूबे थे प्रेम हमारे लिये वजह थी लड़ते रहने की और उनके लिये समझौतों की...
हम एक ही समय में थे अलग-अलग अक्षांशों में समकालीनता का बस इतना ही भ्रमसेतु था हमारे बीच हम सबके भीतर दरक चुका था कोई रूस और अब कोई संभावना नहीं बची थी युद्ध में शीतलता की
ये युद्ध के ठीक पहले के समारोह थे समझौतों की आखिरी उम्मीद जैसी कोई चीज नहीं बची थी वहां फिर भी समकालीनता का कोई आखिरी प्रोटोकाल कि उन महफिलों में हम भी हुए आमन्त्रित जहां बननी थी योजनायें हमारी हत्याओं की!
परिचय
यहां दर्ज करना है अपना नाम वे डिग्रियां जिन्हें पलट कर भी नहीं देखा वर्षों से विस्तार से देनी है जानकारी उस दफ्तर की जिसमें घुसते ही थोड़ा और छोटा हो जाता हूं मैं पता लिखना है उस घर का जिसके लिये गिरवी पड़े हैं मेरी जिन्दगी के बीस साल
यहां दर्ज करनी है एक जाति जिसके दांतों पर लहू है हजार बरस पुराना एक धर्म... जिसे वर्षों पहले कर चुका जीवन से बहिष्कृत लिखना है एक देश का नाम जो कभी हो ही नहीं सका मेरा
यहां दर्ज करनी हैं तमाम ऐसी कार्यवाहियां जिनके बदले लिखा जा सकता है सिर्फ एक शब्द ... समझौता!
एक तस्वीर चिपकानी है सबसे अस्वाभाविक मुद्रा में एक तिथि लिखनी है उस घटना की जिसके लिये कतई जिम्मेदार नहीं मैं
कितना कठिन है इन सबके बाद कविता लिखने वाले हाथों से एक अजनबी भाषा में दर्ज करना अपना हस्ताक्षर
झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ? आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ? है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी, बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।
हो रहे खड़े
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हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले, पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले। इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ? है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ?
विजयी के सदृश जियो रे
वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो चट्टानों की छाती से दूध निकालो है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है चिनगी बन फूलों का पराग जलता है सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है तलवार प्रेम से और तेज होती है छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है मरता है जो एक ही बार मरता है तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे जब कभी अहम पर नियति चोट देती है कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!
रघुवीर दयाल तथा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानियों में अभिव्यंजना शिल्प
कहानी में शैली का संबंध रचनाविधान और भाषा से आता है, जहाँ रचनाकार की अभिव्यक्ति संक्षिप्त एवं सांकेतिक होगी, वहाँ उसकी रचना शैली भी समास-प्रधान होगी।‘‘लिखने व बोलने का ढंग लेखक के मस्तिष्क की विषय-वस्तु एवं रुचि वैचित्रय का प्रदर्शन करता है। इसलिये शैली मनुष्य की प्रतिच्छाया है। मनुष्य का मस्तिष्क ही उसका व्यक्तित्व है और जिस प्रकार उसका मस्तिष्क विविध गुणों एवं विशेषताओं से युक्त होता है, वैसी ही उसकी भाषा एवं भाषण होंगे। अपने स्व की अन्तर्मुखी अनुभूति उसके मस्तिष्क की वह सामग्री है, जिससे वह बना है और भाषण की विधि उसकी स्वानुभूति का ताना-बाना है।’’(1) परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि कहानीकार का व्यक्तित्व हमें अभिभूत किए रहे। अच्छी शैली वही है जो अपनी, अपने राष्ट्र की जान पड़े। जिसमें देशी शब्दों का अधिक समन्वय हो और जिसके द्वारा उचित प्रभाव डाला जा सके।रघुवीर सहाय की कहानियों का नया शिल्प और विशिष्ट आतंरिक संरचना और उनके बहुमुखी रचनाकार होने की वजह से है। उनकी सृजनात्मकता सबसे पहले एक कवि की सृजनात्मकता है इसलिये उनकी दूसरी विधाओं की रचनाशीलता इससे अक्सर निर्धारित होती है। रास्ता इधर से है कथा संग्रह की भूमिका में उन्होंने स्वयं लिखा है ‘‘और कुछ न लिख पाने पर मैंने यह कहानियां लिखी है आपके लिये निश्चय ही इनका कोई महत्व न है न होना चाहिये कि मैंने यह कहानियां क्यों और कैसे लिखी पर यह जानकर मुझे एक रचनाकार को संतोष मिलता है कि इनमें से प्रत्येक रचना एक न एक विधा का विकल्प है।
शब्द भण्डार, मुहावरें
शब्द भण्डार की दृष्टि से रघुवीर सहाय का चिंतन, उनकी रचनायें और अभिव्यक्ति पक्ष कहानियों के माध्यम से सशक्त बनकर प्रकट हुआ है। कथाकार ने अपनी कहानियों के माध्यम से भाषा का पारम्परिक मोह त्यागकर सरल और बोलचाल की भाषा जो आम आदमी के समीप होती है का उपयोग अपनी कहानियों में बखूबी किया है। रघुवीर सहाय की कहानियां हमें यह संदेश देती है कि भाषा के विविध स्तरों का यथोचित उपयोग कैसे किया जाये। रघुवीर सहाय ने अपनी अधिकतर कहानियों की विषय-वस्तु के रूप में राजनीति, राष्ट्र, महिलाओं, शोषितों, पीड़ितों, सामाजिक सम्बन्धों एवं जन समस्याओं सम्बन्धी विषयों की प्रकृति को विशेष स्थान दिया है। रघुवीर सहाय की कहानियों में मोटर, फिल्म, चीक, भूख, कुण्ठा, रोटी से लेकर झोपड़ी, आग तथा संस्कृत जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया है। अतः निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि रघुवीर सहाय की कहानियों में शब्द भण्डारों का अथाह सागर समाहित है।
संस्कृत निष्ठ शब्द
संस्कृत का हिन्दी से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। संस्कृत हिन्दी की जननी कहलाती है। इसीलिए शायद सर्वेश्वर जी ने अपने साहित्य में संस्कृत के शब्दों को शामिल किया है। जैसे - अति, प्रति, दुः, दुस, क्रमशः, परि, सम, सु, सं, अधः, उत्, आभि, पुष्प, चतुर्थ, कृतः, मध्य, अग्नि, चतुर्दश, प्रिय, वत्स, वचन इत्यादि अनेक शब्दों का प्रयोग इनके लेखन में देख सकते हैं।
फारसी शब्द
फारस वैसे तो फारसी अर्थात ईरान की भाषा है, किन्तु जहाँ भी मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग रहते हैं वहाँ यह साहित्य की भाषा रही है। मुसलमानों ने भारत पर कई सौ वर्षों तक राज्य किया ऐसे में जो हिन्दू लोग उनके सम्पर्क में आए अथवा जिन्होंने उनके सम्पर्क में लाभ उठाना चाहा उन्होंने फारसी भाषा और साहित्यिक अध्ययन किया। सभी मुसलमान शासकों की राज भाषा फारसी रही है उनका समस्त शासकीय कार्य फारसी में होता था। धीरे-धीरे फारसी भाषा के बहुत सारे शब्द हिन्दी में आ गए हैं।सर्वेश्वर जी ने अपने साहित्य में फारसी भाषा के शब्दों का अनोखा मिश्रण किया है उन्होंने अपने सृजन में पर्याप्त फारसी शब्दों का प्रयोग किया है।जो इस प्रकार है:-
अंग्रेजों ने लगभग 200 वर्ष तक भारत पर राज्य किया। स्वतंत्रता के पश्चात् अंग्रेजी का अध्ययन व व्यवहार बहुत बढ़ गया है। आज हिन्दी बोलने वालों की स्थिति यह है कि एक वाक्य भी ऐसा नहीं बोल सकते जिसमें कुछ अंग्रेजी के शब्द न हो। हिन्दी में प्रचलित अंग्रेजी के शब्दों की पूर्ण एवं वास्तविक सूची बनाना संभव नहीं है, क्योंकि अभी भी अंग्रेजी के नये शब्द हिन्दी में आ रहे हैं। अंग्रेेजी के कुछ शब्द तो हिन्दी में आकर इतने पुराने हो गए है कि गाँव का अनपढ़ आदमी तक उसका प्रयोग करने लगे हैं।
सर्वेश्वर जी का लेखन भी अंग्रेजी के प्रभाव से अछूता न रह सका, उनकी रचनाओं में अंग्रेजी शब्दों का भरपूर प्रयोग किया गया है। रिजर्वेशन, दे आर मर्डरर्स, स्ट्रांगमैन, एम्बीशन, पावर, रजिस्टर्ड, अक्टूबर, ब्लैकमैल, डिस्ट्रिक्ट, असेम्बली, अफसर, ओनेस्ट, एनानिमिटी, आविडिएंस, हिस्ट्री, फिट, गर्वमेन्ट, यूनिट, इट, सेक्रेटेरियट, मिनिस्ट्री, स्टेट, बैक पाकेट, बैरिस्टर, परमिट, अरेस्ट, पेडिंग, आर्टिकल, कौंसिल, अपील, पोस्टिंग, ड्यूटी, कन्ट्रोलर, एडमिशन, हेड, सोशल, गेदरिंग, ड्रामा, सीन, स्ट्राइक, वीक, पोस्ट आफिस, सेविंग, लेटर, बाक्स, कॉल, सूप, कलर, शूटिंग, क्रीम, सोप, ब्रश, परफ्यूम, गेलरी, साइट, प्लान, डोर, बेडरूम, सीनियर, पॉलिश, फाइन इत्यादि शब्दों को आसानी से उनके साहित्य में देखा जा सकता है।
उर्दू शब्द
वैसे तो उर्दू हिन्दी की एक शैली है जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है जो अरबी, फारसी लिपि के बहुत समीप है। सर्वेश्वर जी ने उर्दू शब्दों का प्रयोग भी काफी किया है। खुराफात, तरजीह, कफन, कौम, जाहिर, तकुल्लुफ, अलबत्ता, इबादत, पोशाक, जन्नत, शुक्रिया, बादशाह, मैयत, तलाश फिरंगी, नफरत, हुकूमत, हकीकत इत्यादि शब्दों का कहीं-कहीं प्रयोग दिखाई देता है।
चीनी व रूसी भाषा
सर्वेश्वर जी ने अपनी रचनाओं में कहीं चीनी व कहीं रूसी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया है। उन्होंने उनका स्वरूप न बदलकर रूसी व चीनी भाषा के शब्दों का ही प्रयोग किया है। चाउ मिएन, वर्डस, नेस्ट, सूप, सुकिमाकी, चापस्टिक, चाय, लीची जैसे चीनी शब्द एवं बोदका (शराब), कोपक, रूबल, चाइ, पशीबा, (धन्यवाद) रास्ते, दस्यूदानिया (फिर मिलेंगे) जार, जैसे रूसी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया है।
मुहावरे और कहावतें
रघुवीर सहाय ने अपनी कहानियों में मुहावरों एवं कहावतों का प्रयोग किया है। साहित्य में रोचकता एवं सौन्दर्य वृद्धि के लिये इनका बहुत ही महत्व है - न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी, आधा तीतर आधा बटेर, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, ‘‘जीवन में मृत्यु नहीं होती, मृत्यु तो ममत्व का दूसरा नाम है, सदैव सत्य बोलो, गाँवों का उजड़ना और शहरों का उखड़ना, गुलामी के मजे और आजादी का भय, नारी शक्ति की मूर्त्त मूर्ति है, फूल से फूल की शोभा है,’’(3)
सर्वेश्वर जी की कहानियों में मुहावरों और कहावतों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है इससे शैली स्वाभाविक एवं प्रभावोत्पादक बन गई है। सर्वेश्वर जी की चलती हुई मुहावरेदार शैली हिन्दी बेजोड़ हैं। कुछेक उदाहरण दृष्टव्य हैं -
सत्तर नाच नचाना, पानी-पानी होना, शर्म से गड़ना, लोहा मानना, नाक में दम, रोंगेटे खड़े होना, दाने-दाने को मोहताज होना, खाक छानना, ऐड़ी चोटी का पसीना एक करना, रफुचक्कर होना, नौ-दो ग्यारह होना, आखें पत्थराना, कान पर जूँ न रेंगना, छक्के छूटना, उड़ती चिड़िया भॉपना, अपना उल्लू सीधा करना, पौ बारह, चुल्लू भर पानी में डूब मरना, श्री गणेश होना, ढपौर शंख, चोली-दामन का साथ होना, मोहरों की लूट, कोयलों पर छाप, एक तीर से दो शिकार, सूत न कपास जुलाहे से लट्ठम-लट्ठा, जाको राखे साइयाँ मार सके न कोई, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा, भैंस के आगे हार्न बजाना, भैंस खड़ी पगुराये, पूत के पाँव पालने में दिखना, पिद्दी न पिद्दी का शोरबा, आम के आम गुठलियों के दाम जैसी अनेक फिट बैठती कहावतों का उनकी कहानी में उल्लेख दिखाई देता है।
प्राकृतिक उपादानों का प्रयोग
सर्वेश्वर जी ने अपनी शैली में प्रकृति का बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से सफल चित्रण किया है। इसी कारण प्रकृति मानवीय भावनाओं की उत्प्रेरक बन गई है। नवीन भाव-बोधों को व्यक्त करने के लिए अभिव्यक्ति के नये रूपों की आवश्यकता होती है। आचार्य नेमीचन्द्र जैन ने ठीक ही कहा है कि प्रत्येक नया भाव - बोध और सौंदर्य बोध अनिवार्य रूप से नये शिल्प की आवश्यकता अनुभव करता है। अपनी अभिव्यक्ति के लिये नये रूपों की खोज करता है और उन्हें जन्म देता है। इस नई आत्मा को पुराने-शिल्प शरीर में धारण करना संभव नहीं होता, क्योंकि कथावस्तु और रूप को अलग करना संभव नहीं है। वे तो एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।’’(4)
भाषा की सक्षमता को प्रकट करने के लिए सर्वेश्वर जी ने प्राकृतिक उपादानों तथा बिम्ब प्रतीकों का प्रयोग एक सिद्धहस्त शैलीकार के रूप में किया है। कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं -
1. सबसे पहले उनकी बिजली आप पर ही गिरेगी।
2. इतनी जल्दी तो गिरिगट भी रंग नहीं बदलता, जितनी जल्दी देश के नेता रंग बदलते हैं।
3. जाँच कमेटी हाथी का दाँत है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भाषा की संरचना में सर्वेश्वर जी सिद्धहस्त हैं। उनकी सभी रचनाओं में भाषा अपने अपूर्व सौंदर्य के साथ परिलक्षित होती है। यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि सर्वेश्वर जी अपने भावों को भाषा की तरणि से संप्रेषित करने में पूर्ण सफल हुए हैं उनकी भाषा अंग्रेजी, लोकभाषा, रूसी व चीनी भाषा को अपने अंदर आत्मसात किए हुए है।
अलंकार
आचार्य वामन के अनुसार, जो किसी वस्तु को अलंकृत करे, वह अलंकार है - अलङकृतिरलङकारः। जिस प्रकार आभूषण स्वर्ण से बनते हैं उसी प्रकार अलंकार भी सुवर्ण (सुन्दर वर्णों) से बनते हैं। ‘‘काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म को अलंकार कहते हैं।’’(5) काव्य शोभा करान् धर्मानलंकार प्रचक्षते (काव्यादर्श) अर्थात् काव्य की शोभा करने वाले धर्मों को अलंकार कहा जाता है। अलंकार का शब्दार्थहोता है - आभूषण या गहना, आभूषण द्वारा शरीर को सजाया जाता है जिससे वह अधिक आकर्षक प्रतीत हो। ‘‘अलंकारों द्वारा भाषा में लालित्य एवं चमत्कार का समावेश होता है।’’(6) गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि ‘‘बिधुवदनी सब भाँति संवारी, सोह न जथा बसन बिनु नारी।’’ आचार्य केशवदास ने तो अलंकार को काव्य की आत्मा, काव्य का सर्वस्व ही माना है। काव्य शरीर अर्थात् भाषा को शब्दार्थ से सुसज्जित तथा सुन्दर बनाने वाले चमत्कारपूर्ण ढंग को अलंकार कहते हैं।’’(7) अलंकार के तीन भेद माने गए हैं:-
1. शब्दालंकार - जहाँ शब्दों के विशिष्ट या चमत्कारिक प्रयोग द्वारा काव्य की शोभा में वृद्धि की जाए।
2. अर्थालंकार - जहाँ अर्थ को सुन्दर और चमत्कारपूर्ण बनाने की चेष्टा की जाए वहाँ अर्थालंकार होते हैं।
3. उभयालंकार - जहाँ शब्दों और अर्थ दोनों का ही चमत्कारपूर्ण मिश्रण हो वहाँ उभयालंकार माने जाते हैं।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने वीप्सा, अनुप्रास तथा रूपक अलंकार के प्रयोग के अतिरिक्त मानवीकरण अलंकार का भी प्रयोग किया है। यह पाश्चात्य अलंकार है। इसमें प्रकृति को सचेतन मानव के रूप में ग्रहण करके मानव के समान उसके क्रियाकलापों का वर्णन किया जाता है। हमारी संस्कृति व व्यवस्था का जीवित और यथार्थ चित्रण किया है, ऐसे जीवंत प्रयोग नये कवियों की विलक्षण प्रतिभा के संकेत हैं। सर्वेश्वर जी के काव्य में मानवीय समस्याओं के अलंकारों के आलम्बन को ही व्यक्त किया गया है, वे इस उद्देश्य में सफल रहे हैं।
(ख) संवाद योजना
मनुष्य के भावों विचारों के प्रकटीकरण और संप्रेषण का सर्वप्रथम माध्यम भाषा है। भाषा यादृच्छिक वाचिक ध्वनि संकेतों की वह पद्धति है। जिसके द्वारा मानव परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करता है। लेखक एक संवेदनशील मनुष्य होता है उस पर अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं का प्रभाव अपेक्षा शीघ्र और अधिक होता है। वह जो कुछ सोचता, समझता, देखता और अनुभव करता है उसको अपने भाषिक संवादों के द्वारा रचनाओं में उभारता रहता है। लेखक अपनी अनुभूतियों तथा विचारों को अपने विशिष्ट संवाद के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। उसकी भाषा में रस, छन्द, अलंकार, प्रतीक बिम्ब, नाटकीयता, व्यंग्य, सुन्दर वर्ण विन्यास संवाद के माध्यम से एक नया आयाम लेते है। संवादों के द्वारा कहीं गयी यह बात साहित्यिक भाषा कहलाती है।
रघुवीर सहाय की कहानियों में संवाद योजना सामान्य बातचीत एवं भाषा की सम्प्रेषणीयता के कारण यथार्थ का बोध कराते हैंं। विजेता कहानी के एक उदाहरण द्वारा इसे समझा जा सकता है - ‘‘मैं सब ठीक कर दूँगा, तुम डरो नहीं।’’ तुमकरहीक्यासकते हों ? वह बोली।
‘‘क्यों, जब मैं एक काम कर सकता हूँ तो दूसरा भी कर सकता हूँ।’’ .......... तुम घबराती क्यों हो ? सिर्फ तुम्हें थोड़ी सी तकलीफ होगी।(8) इसी तरह रघुवीर सहाय की एक कहानी ‘चालीस के बाद प्रेम’ का उदाहरण भी दिया जा सकता है। श्यामलाल जी ने कहा बिल्ली है।’’
‘‘आपकी बिल्ली है ?’’ नौजवान ने पूंछा
श्यामलाल ने कहा ‘‘जी हाँ, मेरी बिल्ली है।’’
‘‘पुलिया के नीचे चली गई है ?’’(9)
सीमा के पार का आदमी कहानी में संवाद योजना को भाषा की सरलता का एक उदाहरण देखा जा सकता है। ‘‘तो क्या आपने उन सबको भूखा-प्यासा मार डाला, यानी भूखे-प्यासे को गोली से मार डाला ?’’ नहीं जनाब, आखिर उनको अकल आई और उन्होंने समर्पण किया मगर इस शर्त पर कि हम शर्त पर कि हम उनकी जान बख्श देंगें-‘‘और आपने उनकी जान बख्श दी ?’’
‘‘जी हाँ, हमने उन्हें कत्ल नहीं किया। हम उनकी इज्जत कर रहे थे, क्योंकि वे आखिरी दम तक लड़े थे।’’(10)
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानियों में संवाद योजना में भाषा की किलिष्टता एवं नीति वाक्यों की अधिकता तथा सलाह के रूप में जीवन का यथार्थ बोध परिलक्षित होता है। डूबता हुआ चाँद कहानी का एक उदाहरण दृष्टव्य है - ‘‘स्नेह और सहानुभूति की कीमत वही समझ सकते हैं, उनसे ही मिल सकती है, जो इससे जीवन में वंचित हों।’’ इसके बाद वे कुछ गम्भीर हो गयीं। बोली - ‘‘तुम लोग पढ़ लिखकर भी ऐसी बातें करते हो। कोई किसी पर एहसान नहीं करता। एहसान का बोझ वे मानते है जो स्वार्थी होते हैं, जिनका हृदय उदार नहीं होता। मेरे एहसान का बदला लेने को क्या इतनी बड़ी दुनिया कम है तुम्हारे लिये ? और अगर मुझे ही बदला देना चाहते हो तो मारने पर मेरी लाश फूँक जाना।’’(11)
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कहानी सोने के पूर्व में संवाद योजना का एक उदाहरण और भी दृष्टव्य है - ‘‘तुम मुस्कराना नहीं जानती, कल सीखकर आना, अगर काम करना हो।’’
‘‘मैं तिलमिला उठी हूँ। नीच, कुत्ता। मुस्कराना सीखकर आओ। मैं नहीं आऊँगी। नहीं काम करूँगी। पर यह आवाज गूँज रही है आँधी की तरह, तूफान की तरह मेरे कानों में।’’
‘‘तुम बड़ी गम्भीर हो। मुस्कराना तक नहीं जानती।’’ मेरी आकृति पता नहीं कैसे एक सफेद फ्रंाक पहने वहाँ खिंच गई है। मैंने हाथ बढ़ाकर लाल पंखों वाली एक तितली पकड़ ली है, और उसके नाजुक पंखों को कसकर ओठों में दबा लिया है। एलेक की आँखें परेशानी से चमक रही हैं। मुझे हँसी आ रही है - मैं खिलखिलाकर हँस पड़ी हूँ। अधर खुल गये हैं और तितली उड़ गई है। अपने रूमाल से मेरे ओठों पर तितली के पंख के लगे लाल रंग को पोछता हुआ एलेक कहता है - ‘‘तुम्हारी मुस्कान में बड़ी कला है।’’(12)
टूटे हुये पंख कहानी का उदाहरण सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानियों का मर्मभेदी संवाद योजना अपने आप मंेें कई अर्थ लिये हुए है - ‘‘तभी न उस दिन शीला से यह पूंछने पर कि जिन्दगी क्या है ? उसने जबाव दिया था ‘‘मस्ती और आनन्द’’ मैं उन्हें बेवकूफ समझती हूँ जो तुम्हारी तरह मुँह बनाये गम्भीर होकर सोचा करते हैं कि जिन्दगी क्या है ? जिन्दगी मस्ती, है, मस्ती-एक गर्म-गर्म चाय का प्याला। खुद पियो; दूसरों को पिलायो।’’(13)
सूक्तियाँ
आलोच्य कथाकार अपनी कहानियों में संवाद योजना के माध्यम से कभी-कभी सूक्तियों का प्रयोग भी व्यक्ति के समक्ष प्रभाव डालने के लिये करते है। सूक्तियों का प्रयोग सर्वेश्वर जी की अपनी विशेषता है। इन सूक्तियों में कल्पना और अनुभव के साथ चिन्तन का योग भी है। सूक्ति प्रयोग से शैली की रोचकता और प्रभावात्कता में अभिवृद्धि हुई है। महान् उपन्यासकारों की अनुभव सिद्धवाणी से ही सूक्तियों के स्रोत प्रवाहित होते हैं। सर्वेश्वर जी की कुछ उत्कृष्ट सूक्तियाँ यहाँ उद्धृत की गई हैं -
1. पागल स्त्री के अंदर पागल पुरुष से अधिक लज्जा रहती है।’’(14)
2. स्नेह और सहानुभूति की कीमत वही समझ सकते हैं, उनसे ही मिल सकती है जो इससे जीवन में वंचित हो।’’(15)
3. मोहब्बत का ताल्लुक जिस्म से नहीं, बल्कि रूह से होता है।’’(16)
4. किसी को शरण देकर फिर दुत्कार देना सबसे ज्यादा बुरा है।’’(17)
5. शक्ति और छल से प्यार नहीं खरीदा जा सकता। प्यार स्वयं बिक जाता है, जिधर पवित्रता और सफाई होती है।’’(18)
6. जो चीज कष्ट उठाकर मिलती है, उसका मूल्य अधिक होता है; वह अधिक सुख देती है।’’(19)
7. जो भय से मुक्त नहीं होता, वही अपने लिये और दूसरों के लिये सीमाएँ बनाता है।’’(20)
8. मन की मार, आत्मा की मार, कहीं बड़ी होती है। शरीर की मार उसके सामने गौण है, कुछ नहीं। असली जीत और हार मन की होती है, शरीर की नहीं।’’(21)
9. नारी का स्वास्थ्य ही उसका सौंदर्य है।’’(22)
10. वह सिद्धांत जो कर्म से न जुड़ सके पिरामिड में इसी खूबसूरत ममी की तरह होता है।’’(24)
11. कामुकता कमजोरी का लक्षण है।’’(25)
12. कवि को सदैव विद्यार्थी की तरह सीखते रहना चाहिए ........... अपने सभी पूर्ववर्ती कवियों से।’’(26)
(ग) वाक्य विन्यास
वाक्य विन्यास शैली का प्रमुख तथ्य होता है। रघुवीर सहाय एवं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी कहानियों में वाक्य विन्यास के रूढ़ नियमों से अपने को दूर रखा। रघुवीर सहाय ने अपने वाक्य विन्यास के माध्यम से अपनी कहानियों को एक नया आयाम दिया। हालांकि उनकी कहानियाँ वैयक्तिक होने के कारण उन्हें पूर्णतया समझ पाना तो कठिन है किन्तु सामान्यतः कहा जा सकता है कि वे सभी प्रयोगों के लिये सभी प्रकार के वाक्यों के प्रयोग को योग्य मानते है। किसी दृश्य को जब वह कृमिक बिम्बों का रूप देना चाहते है तो उनके व्याकरण चिन्हों का प्रयोग द्वारा लम्बे वाक्यों का प्रयोग उन्हें उपर्युक्त लगता है। लगता है जैसे सब कुछ सहज स्वाभाविक रूप से सामने आ रहा है। वास्तव में उनका विषय उसमें आई भावना और विचारधारा तथा उसे प्रकट करने की अत्यन्त संक्षिप्त वाक्य रचना भी पर्याप्त रूप से दिखाई देती है। जो दृढ़ और ठण्डी भंगिमा से शक्ति पाकर नग्न यथार्थ की भयावयता तथा संश्लिष्ट मानव रागों की उत्कटता व्यंजित करता है। सच्चिदानन्द वात्स्यायन अज्ञेय के अनुसार अपने छायावादी समवयस्कों के बीच बच्चन की भाषा जैसे एक अलग अस्वाद रखती थी और शिखरों के की ओर न ताककर शहर के चौक की ओर उन्मुक्ति, उसी प्रकार अपने विभिन्न मतवादी समवयस्कों के बीच रघुवीर सहाय भी चट्टान पर चढ़ नाटकीय मुद्रा में बैठने का मोह तोड़ साधारण घरों की सीढ़ियों पर धूप में बैठकर प्रसन्न है। सीढ़ियों पर धूप में भूमिका से।(27) यह स्वस्थ भाव उनकी कहानियों को एक स्निग्ध मर्मदर्शिता दे देता है। जाड़ों के घाम की तरह तात्क्षणिक गरमाई भी है और एक उदार खुलापन जिसको हम दे दिये जाते हैं। जैसे वाक्य विन्यास आलोच्य कहानीकारों की कहानियों में जगह-जगह दिखाई देते हैं।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी कहानियों में वाक्य संरचना, पात्रानुकूल, वातावरण के अनुकूल तथा अन्य अनेक स्थितियों की विभिन्न विधाओं में शब्दों की एकरूपता को व्याख्यायित किया है। उनके शब्द कहीं भी बिखरे या टूटे से प्रतीत होते है। हाँ यदि वाक्य में से यदि एक भी शब्द हटा दिया जाये तो शब्दरूपी ईंट के गिरने से वाक्यरूपी मकान ढह सकता है। यह सक्सेना जी के शब्द चयन और शब्दों की एकरूपता का ही परिणाम है। जिस कहानी में जैसे कहीं-कहीं भावुक कलाकार की भांति शैली परिवर्तित हो गयी है। परन्तु वाक्य का क्रम नहीं टूटा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानियों में भाषा और संवेदना का एक अलग रूप उभरकर सामने आता है। सर्वेश्वर जी की कहानियाँ भाषा के एक नये मुहावरे की दुनियाँ में प्रविष्ट कराती है।
शब्द चयन-सर्वेश्वर जी ने अपनी भाषा के लिये शब्द चयन उदारता से किया है। उन्होंने यथास्थान संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी और हिन्दी के ठेठ शब्दों का प्रयोग किया है। शब्द चयन में विषय की अधिकाधिक अभिव्यक्ति की सामर्थ्य पर कहानीकार की दृष्टि रही है। भाषा की स्वाभाविकता बढ़ाने के लिए सर्वेश्वर जी ने लोक भाषा के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया है जैसे - नागौरी, गुरियों, के दॉतू, अइ या, भोजाई, रसबुनिया, चुएला, पगिया, होरिलवा, ओंधेला, चमकौआ, सुमच, पोल्ख आदि। अंग्रेजी के कुछ शब्द तो हिन्दी में खप गये हैं। अंग्रेजी के शब्दों का भी कहानियों में यत्र-तत्र प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ - मिल्टिरी, सी. आई. डी., आमलेट, पोलिटिकल, रिमार्क, मिनिस्टर, क्यूरेटर, म्यूजियम, कम्पीटीशन, वी हैप्पी आदि। हिफाजत, वाशिन्दा, गुलिस्ताँ, शख्त, मोहब्बत, ताल्लुक, जिस्म जैसे उर्दू शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
पंजाबी भाषा का प्रयोग भी सर्वेश्वर जी की कहानियों में हुआ है। अप्रचलित पंजाबी भाषा केवल हिन्दी से परिचित व्यक्ति के लिये समझना संभव नहीं। कदाचित इसीलिये लेखक ने पंजाबी अभिज्ञ पाठकों की सुविधा के लिये प्रचलित पंजाबी शब्दों का अर्थ कोष्ठक में दिया है - जैसे ‘‘की भा दित्ते ने ?’’ (क्या भाव दिए है ?) ‘‘तू मेरी भेन होन्नी एं ना।’’ (तू मेरी बहिन होती है न) ‘‘एदा की है ? (इसका क्या)’’(28)
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि सर्वेश्वर जी की भाषा का शब्द भंडार व्यापक और समृद्ध है। उन्होंने अभिव्यंजना को सशक्त करने वाले समस्त शब्दों का यथास्थान प्रयोग किया है उन्होंने कृत्रिमतापूर्ण शब्दों की योजना की अपेक्षा स्वाभाविक भाषा दिखलाने में अपना विश्वास प्रकट किया।
पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग
सर्वेश्वर जी की भाषा का आधार पात्रों के सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर के आधार पर बना। इनकी कहानियों के अधिकांश पात्र बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, कहीं-कहीं ग्रामीण पात्रों के माध्यम से लोक भाषा का भी प्रयोग किया है। लेकिन ऐसे स्थल बहुत कम हैं।
चित्रात्मकता
सर्वेश्वर जी की कहानी की भाषा की एक बड़ी विशेषता चित्रात्मकता है। ये चरित्रों के परिवेश, वातावरण, रहन-सहन और वेश-भूषा आदि का ऐसा चित्रण करते हैं कि पाठक के सम्मुख पात्र वातावरण आदि का चित्र सजीव हो उठता है।
वाक्य विन्यास का भाषा की एकरूपता से सम्बन्धित उदाहरण रघुवीर सहाय की एक कहानी में देखा जा सकता है। ‘‘मैं उसे केवल भयभीत कर सका था और मैं कुछ कर भी नहीं सकता था पर उसने अपनी सारी ताकत जुटा ली थी और यह सिर्फ वही कर सकती थी। मैंने मौन रहकर उसे आँख भर देखा जैसे सम्मोहित होकर वह एक पल स्थिर आँखों से मुझे देखती रही फिर काँपकर ऐसे भड़भड़ायी जैसे यह उसका आखिरी फड़फड़ाना हो फिर उसने पंख खोल दिये और उन्हें तान दिया। अचानक वह छूट गयी।’’(29)
़भाषा शैली
मेरी दृष्टि में रघुवीर सहाय जी की भाषा को गद्य और पद्य में विभाजित करना एक दुष्कर कार्य है। वह परम्परागत रूप से अर्जित किये गये मानक गद्य को गद्य नहीं रहने देते और उनका पद्य-पद्य नहीं रह जाता। भाषा को अपने तरीके से तोड़ना शब्दों को नए अर्थ अनुषंगों से जोड़ना, वाक्य रचना में व्याकरण के मानकों की अवहेलना हर कहीं, उनकी हर विधा में देखी जा सकती है। कहानी के एक अनुच्छेद को अगर पंक्तियों में विभाजित करके शब्दों के क्रम को जरा इधर-उधर टुकड़े-टुकड़े करके लिख दिया जाय तो वह कविता हो जाएगा और कविता को गद्य के धारा प्रवाह रूप में समेंट लिया जाय तो वह किसी कहानी का अनुच्छेद बन जाएगा।
रघुवीर सहाय जी की भाषा इतनी प्रयोगात्मक है कि उसने अपनी विधात्मक अस्मिताओं को बिसरा दिया है। कहानी की भाषा कविता के निकट और कविता की भाषा कहानी के निकट दिखाई देती है, इसीलिए रघुवीर सहाय जी की उन कहानियों में जहाँ जिन्दगी अपने पूरे कद में व्यक्त हुई है भाषा अधिक ठोस, सार्थक और यथार्थ है। जैसे इस कथात्मक सूक्ति में एक साथ ही कविता, कहानी और निबन्ध की भाषाएँ सिमट गईं हैं - ‘‘गरीबी और गिरावट का एक दिन होता है, जब आदमी अपने से जरा मजबूत आदमी से डरने लगता है। इसको लोग कर्तव्य और संतुलन कहते हैं।(30)
कहानियों में काव्य भाषा का प्रयोग
‘‘आकाश नील से धोए भीगे वसन की भांति स्वच्छ है। साड़ी में टँके सितारों की तरह तारे जगमगा रहे हैं। उनमें न कोई क्रम है न कोई शैली। उच्छृंखलता में भी कितना सौन्दर्य है।’’(31) मुहावरेदार भाषा का प्रयोग देखिये - मैंने सोचा बस मगर इसे ही काफी अफसोस की बात होनी चाहिए क्योंकि एक तो गाड़ी वैसे ही ठचर-मचर हो रही थी, ऊपर से इस नट के गिर जाने से वह बिल्कुल ठप हो जाएगी, क्या कहावत है वह गरीबी में आटा गीला कितना दर्द है इस कहावत में और कितनी सीधी चोट है। आटा जरूरत से ज्यादा गीला हो गया और अब दुखिया गृहिणी परात लिए बैठी है उसे सुखाने को आटा नहीं है। यानी आटा है मगर रोटियाँ नहीं पक सकती।(32)
भाषा का उत्कृष्ट रूप देखिये - ‘‘रूखे सूखे केश क्यों बिखरे हैं ? सफेद आँखे क्यों फटी पड़ रही हैं ? छाती की हड्डियाँ क्यों उभरती आ रही है ? कोई समझेगा ? है कोई पीड़ा का मर्मज्ञ ? विडंबना का महाकाव्य लिखने वाला आदि कवि कहाँ है ?’’(33)
रघुवीर सहाय जी की कहानियाँ विशेषकर रास्ता इधर से है कि कहानियाँ उनकी कविताओं से अधिक जीवन के निकट पहुंची है। उनमें जीवन का वैविध्य है जीवन की ऊष्मा है और उसकी रंगत है। किले में औरत कहानी में होटल के कमरों में अभिजात्य एकांत को चित्रित किया गया है। लेखक को लगता है इतने महंगे हैं ये कमरे कि इनमें पहुंचते ही ख्याल दिमाग में घर करने लगता है कि यहां अपना एकदम निजी व्यक्ति व्याभिचार करने लायक आदर्श एकांत है। शीशे को दरवाजा पार करते ही एक बरोठा मिला जिसमें आदमी के शरीर से बड़े आकार की कुछ कुर्सियों पर लोग बैठे हुए थे। ये न जाने क्या समझकर इतने भड़कीले कपड़े पहनकर आए थे। शायद उनके पास पैसा बहुत था जिसे ये कपड़ों पर खर्च कर डालना चाहते थे। शायद इनके पास अपनी अक्ल इतनी कम थी कि ये तय नहीं कर सकते थे कि उन्हें क्या पहनना चाहिए। वे बैठे इस शान से थे जैसे होटल के रहने के सच्चे हकदार नहीं है जिनके पास ज्यादा और अक्ल कम है।’’(34)
रघुवीर सहाय जी पहले कवि थे बाद में कहानीकार इसलिए उनकी मूल संवेदना कवि की है। जिस प्रकार वह नितांत भिन्न प्रकार के कवि हैं, उसी प्रकार भिन्न प्रकार के कहानीकार भी थे। रघुवीर सहाय जी ने अपनी कहानियों में गद्य को जगह-जगह तोड़ा है और एक नए किस्म का गद्य लिखने की कोशिश की है। इसमें उनकी कहानी के गद्य की भाषा अधिक अभिव्यक्तिपूर्ण और सर्जनात्मक हो गई है। प्रेमिका कहानी की कुछ पंक्तियां हैं - ‘‘क्या दिन थे वह भी या वह भी क्या दिन थे। हम दोनों भागे हुए थे। गनीमत यह थी कि किसी लक्ष्य को लेकर नहीं भागे थे और दोनों के दो घर में जहाँ रात या दिन के किसी समय हम लौट जा सकते थे। वह रोज घर से भागते और रोज घर के लोगों के पास स्वीकृत हो जाते, यहां तक कि अपनी बड़ी बहन के पास भी जो उसके और मेरे प्रेम में सबसे बड़ी बाधा थी। स्कूल के रास्ते से मैं उसे रोज उड़ा ले जाता। सारे दिन उसके साथ निरूद्देश्य खेलकर उसे फिर से वहीं छोड़ आता जहां से शुरू किया था।’’(35)
रघुवीर सहाय जी सर्वथा नए शिल्प और नई भाषा में कहानियां लिखते हुए कहानी लिखने के अपने बड़े उद्देश्य को कभी नहीं भूलते। वे अपनी कहानियों के माध्यम से पाठकों में परिवर्तन की इच्छा और सामर्थ्य पैदा करना चाहते हैं। इसीलिए अपनी कहानियों के द्वारा उनकी कोशिश एक संपूर्ण मनुष्य बनाने की होती है। उन्होंने अपने अंतिम कथा संग्रह का नाम ही रखा था, ‘जो आदमी हम बना रहे हैं।’ इस कहानी संग्रह का समर्पण वाक्य था, किशोर को जो तरूण हो रहे हैेें।’’ तरूण के रूप में निर्मित हो रहे किशोरों से रघुवीर सहाय जी का यह जुड़ाव यों ही नहीं है। वे जानते हैं कि तरूण बनते किशोर को एक ऐसे आदमी के रूप में आसानी से ढाला जा सकता है जो समता, न्याय और अपने अधिकारों के लिए आसानी से जागरूक हो। जो आदमी हम बना रहे हैं कि भूमिका में उन्होंने इन मूल्यों से अपनी कथा रचना के रिश्ते को रेखांकित करने का प्रयास किया है। स्पष्टतः कहानी की रचना प्रक्रिया की यह शल्य क्रिया कोई कोरा बुद्धि विलास या खिलंदड़ापन नहीं था। रचना को जीवन के कितने करीब लाकर उसकी सांस का स्पंदन और उसकी ऊष्मा को अनुभव किया जा सकता है ? आखिर कितने करीब ? ‘मेरे और नंगी औरत के बीच’ इसी को व्यक्त करती कहानी है। जैसे - ‘‘हम दोनों फिर आमने-सामने बैठे हुए थे। इस बार वह घोर जाड़े में बिना किसी दूसरे वस्त्र के ठिठुरी हुई एक स्त्री थी और मैं अपने कोट की गरमाई में लगभग सम्प्रक्त एक पुरूष जिसके हृदय में केवल एक इच्छा थी या कि वह विचार था या भावना थी नहीं जानता पर जो कुछ थी वह एक भी उसे उड़ा दूँ अपना कम्बल, यह मैंने, बाद में जाना जब देखा कि अपना कम्बल मैं नहीं ओढ़े हूँ। बाद में मैंने यह भी जाना कि जिस इच्छा से समस्त शरीर और संपूर्ण मन एकाकर हो गया है और जो मेरे जीवन के संपूर्ण अनुभवों में से संपूर्णतम है वह स्वयं अमर नहीं है जिस क्षण उसे कार्यरूप मिलेगा वह क्षय हो जाएगी। पर मुझे वह अमर करेगी और मुक्त रखेगी और स्वयं मर जाएगी, मैंने संतोष से कहा।’’(36)
(घ) प्रयुक्त विभिन्न शैलियाँ
आवश्यकतानुसार शैली में ओज प्रसाद एवं माधुर्य गुणों की सत्ता होनी चाहिए। शैली के माध्यम से कहानीकार अपनी कहानी को अधिक आकर्षण एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। कहानीकार की शैली का निश्चिय करते समय शब्द शक्ति का ज्ञान भी अनिवार्य है तभी उसकी शैली प्रभावोत्पादक बन सकती है। जो तत्व कहानीकार के समस्त विचारों, भावों आदि को बाह्य रूप से सजाती-संवारती है उसी को शैली कहते हैं। सरसता, सुबोधता, सरलता, प्रभावपूर्णता आदि इसके विशिष्ट गुण हैं।
शमशेर बहादुर के अनुसार रघुवीर सहाय ने भी शैली को व्यक्तित्व का अंश माना है। व्यक्तित्व के साथ ही शैली का विकास होता है। शैली का विकास होते-होते वह दिन भी आता है कि बिना नाम मुहर के भी लाखों के बीच व्यक्तित्व की ही तरह शैली भी आप से आप पहचानी जा सकती है। छोटे-छोटे वाक्य, चलते फिरते मुहावरें, साफ सुधरे शब्द यहाँ तक कि छोटे से छोटे पैराग्राफ को भी उत्तम उपादान माना है। शैली अभ्यास खोजती है और व्यक्तित्व के निर्माण की तरह शैली का निर्माण भी प्रारम्भ से कुछ पथ प्रदर्शन चाहता है। रघुवीर सहाय की शैली पर उनके व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप है उपर्युक्त गुण उनकी शैली में मिल जाते है।
रघुवीर सहाय की कहानियों में विभिन्न शैलियों के रूप दृष्टिगोचर होते हैं। भावात्मक शैली, काव्यात्मक शैली, व्यंग्य विनोद शैली, लाक्षणिक शैली, प्रतीकात्मक शैली, आत्मकथात्मक शैली, डायरी शैली, चित्रात्मक शैली, संस्मरणात्मक शैली, अलंकारिक शैली, मनोवैज्ञानिक शैली, खोजपूर्ण शैली इत्यादि। वर्णनात्मक शैली का एक उदाहरण रघुवीर सहाय की एक रचना में देखा जा सकता है - ‘‘बर्फ सड़कों पर फुटपाथों पर और दरवाजों के सामने ढ़ेर भी ज्यादातर सफेद कहीं-कहीं धूल से मैली मगर कहीं-कहीं दूध से उज्जवल। मस्क्वा की और सड़कों की तरह वह भी चौड़ी और साफ थी रद्दी या कचड़ा का एक टुकड़ा भी उस पर नहीं था। फुटपाथ पर पत्रहीन वृक्षों के थालों में काली भींगी मिट्टी तक साफ दिखती थी। हवा में धूल का कहीं नाम तक नहीं था। स्कूल से लौटते लड़के लड़कियाँ सौदे के बाजार जाती औरतें और नौजवान पुरूष फुटपाथ पर चलते हुये एक अजनबी हिन्दुस्तानी को देखने के लिये क्षण भर ही सिर उठाते, अन्यथा वे अपने में मस्त थे।(37)
प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन जैसे फल पकता है, पूरब की दिशा लाल होने लगी और फिर प्रभात हुआ। रेत में फँसी हुई नौका की भाँति पश्चिमी का चाँद उधर उस कोने में आधे उजले आकाश में धँसा हुआ था।(38)
रघुवीर सहाय की रचनाओं में भावात्मक शैली का एक उदाहरण देखा जा सकता है। भावात्मक शैली रघुवीर सहाय के नाटकों, कहानी, उपन्यास, यात्रा साहित्य आदि सभी विधाओं में देखने को मिल जाते हैं। रूद्ध स्वर पश्चाताप है इस प्रकार भूल मानकर सरल रामू की माँ मैं समझ गया मैं भूल कर रहा था। तुम ठीक कहती हो मैं किसी भी वर्ग समाज से नहीं डरूँगा। मैं तो केवल आदमी हूँ जिसे जीवित रहना है। क्योंकि उसने जीवित रहने के लिये ही जन्म लिया है। यदि मैं स्वयं भूख से मर जाऊँ तो यह खुद मेरे लिये लज्जा की बात होगी। फिर मुझ पर तुम्हारा जिम्मा है, उठो, दिया जलाओ, मुझे घर में अंधेरा अच्छा नहीं लग रहा है।(39)
अन्य प्रयुक्त विभिन्न शैलियाँ
अन्य शैलियों के अन्तर्गत प्रयुक्त मनोवैज्ञानिक शैली का एक उदाहरण दृष्टव्य है - ‘‘अकृतज्ञ की तरह मैंने पूँछना शुरू किया, मैं इसे कम्बल क्यों देना चाह रहा हूँ ? क्या इस पर मुझे दया आ रही है क्योंकि इसके पास नहीं है और मेरे पास है ? सावधान, मैंने अपने को अपनी पिछली कहानियों की तरह याद दिलायी एक मानव को दूसरे पर दया करने का क्या अधिकार है ? प्यार मैं कर सकता हूँ पर क्या मैं सचमुच प्यार कर रहा हूँ दया बिल्कुल नहीं ? क्या मैं विश्वास से कह सकता हूँ।
सजीवता
कहानी की आत्मा को प्रकट करने की कलात्मकता सामर्थ्य शैली में होती है। इस दृष्टि से सर्वेश्वर जी की शैली सर्वगुण सम्पन्न है। सर्वेश्वर जी की सशक्त गद्य शैली उनके शिल्पविधान और कला की देन से कम नहीं है। वह भावना और विचार से परिपूर्ण है। सर्वेश्वर जी की भाषा शैली में सजीवता दृष्टव्य है -
‘‘निर्जन पर्वतीय प्रान्त। दूर-दूर तक पहाड़ियाँ और सौन्दर्य की आभा बिखेरती हुई किसी की प्रतीक्षा में सजी खड़ी थी। चाँदनी रात थी। श्वेत बादलों से बंधी हुई पहाड़ों की चोटियों पर शशि-किरणों की धवल-धारा ऐसी लगती मानो असंख्य परियाँ एक साथ नृत्य प्रारंभ करने के लिए एक विचित्र भंगिमा सजाती हुए थिरक रहीं हों।’’(40)
प्रवाहपूर्णता
शैली का प्रवाह रसानुभूति में सहायक होता है। यदि शैली का समतल प्रवाहपूर्ण व परिष्कृत होना आवश्यक है नहीं तो रचना की गाह्य शक्ति क्षीण हो जाती है। सर्वेश्वर की प्रवाहपूर्ण परिष्कृत शैली का एक उदाहरण दृष्टव्य है -
‘‘गंगा की निर्मल धारा, जल की लहरियों में झूलता हुआ पुल का प्रतिबिम्ब, तट पर बालुकी राशि में अंधकार की लुका-छिपी, पार दूर-दूर पर चित्र सी खिंची हुई गाँवों की झोपड़ियों पर कोहरे का जाल, चारों ओर अखंड नीरवता और निर्जनता।’’(41) इसमें प्रवाहपूर्ण शैली के समतल स्निग्ध रूप के यथेष्ठ प्रभावात्मकता है। शैलीगत ममस्पर्शिता का चरमोत्कर्ष रूप सर्वेश्वर जी के साहित्य में अन्यत्र भी मिलता है।
भावुकता एवं मार्मिकता
लेखक ने अनेक स्थानों पर भावुकतापूर्ण गद्य शैली का उत्कर्ष अंकित किया है। सर्वेश्वर जी की शैली मनोभावों के अनुरूप अपना परिवेश विद्यमान करती है। जहाँ कोमल और मधुर भावों की व्यंजना है, वहाँ शैली उसी के अनुरूप कोमल और मधुर हो गई है। जहाँ उग्र भावों की व्यंजना है, वहाँ शैली का ओज भी देखते बनता है। अभिव्यंजना सम्पन्न शैली के प्रयोग से भाव मूर्तिमान सा हो जाता है। शैली का यह रूप-परिवर्तन और वेश विधान उनकी समस्त कहानियों में दृष्टिगत होता है। शैली की प्रभावात्मकता बढ़ाने के लिये उन्होंने उपमाएँ प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त की हैं यथा -
1. बिजली का-सा स्पर्श उसके रोम-रोम को झटके दे रहा है।’’(42)
2. उसकी मुस्कान कंटिए के हूक में फंसे केंचुए की तरह मेरे अस्तित्व के जल में गहरे डूब रही थी।’’(43)
3. गौर मुख - मंडल पर मचलती सी चाँदी भरी श्वेत आभा, नील सिंधु पर उमड़ती हुई जवान खामोशी-सी शराब भरी आँखे और उस छवि के सागर में मूँगियाँ परी-सी तैरती हुई मुस्कान।’’(44)
साम्य वैषम्य
रघुवीर दयाल तथा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानियों में अभिव्यंजना शिल्प में काफी समानता देखने को मिलती है। दोनों कथाकारों ने सर्वथा नये शिल्प और नई भाषा में कहानी लिखने के अपने बड़े उद्देश्य को कभी नहीं भूला। भाषा एवं शिल्प के माध्यम से वह पाठकों में परिवर्तन की इच्छा और सामर्थ्य करना चाहते है। इसलिये इन कथाकारों की कहानियों में यह उनकी कोशिश रहती है कि व्यक्ति एक अच्छा इन्सान बन सके। आलोच्य कथाकारों की संवाद योजना, वाक्य विन्यास एवं इसमें प्रयुक्त विभिन्न शैलियों में मानवीय संवेदना का मनोवैज्ञानिक चित्रण गैररूमानी यथार्थ बोध उन्हें अपनी संवेदनाओं का, अपनी करूणा का निर्मम विश्लेषण करने को बाध्य करता है। आलोच्य कथाकारों की कई कहानियों में यह आत्म परीक्षण का स्वर एक लगातार चलते आत्मालाप की तरह दिखाई पड़ता है।
रघुवीर सहाय ने अपनी कहानियों में देशी-विदेशी और देशज शब्दों का प्रयोग खुलकर किया है। रघुवीर सहाय की भाषा साधारण जनसमूह द्वारा समझे जा सकने वाली हिन्दी है। वह उसके संस्कृतनिष्ठ होने को जनता से अलग कर दिया समझते है। पत्रकार होने के कारण उनकी भाषा लोकभाषा है जनभाषा है या कहें की अखबारी भाषा है। जिसका प्रयोग आपकी कहानियों में सर्वत्र दिखाई पड़ता है। इसलिये अरबी एवं फारसी की शैली आपकी भाषा में घुल मिल गई है। आपकी कहानियों में हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली तथा उर्दू आदि शब्दों का प्रयोग मिलता है। वहीं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी कहानियों में विभिन्न शैलियों का प्रयोग वर्णनात्मक, विचारात्मक, भावात्मक तथा मनोवैज्ञानिक, चित्रात्मकता एवं अलंकृत का प्रयोग किया है। आपके शब्दों का चयन विषयों की विविधता लिये हुये हैं। सक्सेना जी की कहानियों में संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी, उर्दू, चीनी व रूसी भाषा के ठेठ शब्दों का प्रयोग स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
ओसामा के उन्मूलन ने पाकिस्तान को बेनकाब कर दिया है। यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान ही विश्व आतंकवाद का अड्डा है। उन सभी पाकिस्तानी शासकों के मुंह पर कालिख पुत गई है, जो बार-बार दावा करते थे कि ओसामा या तो मर गया है या अफगान पहाड़ों की अगम्य गुफाओं में छिपा हुआ है। पिछले पांच साल से वह उनकी नाक के नीचे रह रहा था। इस्लामाबाद से सिर्फ 50 किमी दूर एबटाबाद में और काकुल सैन्य अकादमी सेदो फर्लाग की दूरी पर!
अमेरिकी नीति निर्माता पाकिस्तान के इस दोमुंहे खेल को समझ गए थे, इसलिए उन्होंने कोई झगड़ा मोल नहीं लिया। पाक सरकार या फौज को सुराग तक न लगने दिया और ओसामा को मार गिराया। पाकिस्तानी सरकार हतप्रभ है। लगभग 12 घंटे तक उसकी घिग्घी बंधी रही। वह बोले तो क्या बोले? अगर वह यह कहती है कि ओसामा को मारने में उसने मदद की है तो जनता उसके खिलाफ हो जाएगी और अगर वह यह कहती है कि यह काम अमेरिकियों ने खुद-ब-खुद किया है तो लोग कहेंगे कि तुम अमेरिकियों की कठपुतली हो! यही बात मुशर्रफ ने लंदन में यों घुमाकर कही कि अमेरिकियों ने पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया है। इस प्रश्न को पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री टाल गए। उन्होंने ओसामा के उन्मूलन पर सिर्फ संतोष प्रकट कर दिया। आश्चर्य की बात है कि पाकिस्तान के लोगों ने अपनी इस ‘निकम्मी’ सरकार के विरुद्ध अभी तक कोई हुड़दंग क्यों नहीं मचाया?
असली प्रश्न यही है कि पाकिस्तान के प्रति अब अमेरिका का रुख क्या होगा? जाहिर है कि अमेरिकी रवैये में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं होगा, क्योंकि उसे पाकिस्तान की जरूरत अभी भी है। ओसामा के मरने से आतंकवादियों का मनोबल जरूर ध्वस्त होगा, लेकिन वे अपनी दुकानें एकदम बंद कैसे कर देंगे? पिछले दस वर्षो में आतंकवाद अपने आप में एक महाउद्योग बन गया है, जिसका सबसे बड़ा शेयर होल्डर पाकिस्तान का सत्ता-प्रतिष्ठान है। अलकायदा और तालिबान की शाखाएं दुनिया के लगभग 40 देशों में खुल गई हैं और उनमें से ज्यादातर स्वायत्त और आत्मनिर्भर हैं। पाकिस्तान चाहेगा कि उसे डॉलर और हथियार लगातार मिलते रहें, इसीलिए वह आतंकवादी प्रतिक्रिया को बढ़ा-चढ़ाकर चित्रित करेगा। अमेरिका उसकी बात पर विश्वास भी करेगा, क्योंकि पिछले दिनों ही विकीलीक्स से पता चला था कि अलकायदा के लोगों ने भयंकर धमकी दी है। उन्होंने कहा है कि यदि ओसामा को पकड़ा या मारा गया तो वे कुछ यूरोपीय शहरों को परमाणु बमों से उड़ा देंगे। यों भी सीआईए को पता है कि अलकायदा के लोगों ने उक्रेन, कजाकिस्तान और पूर्वी यूगोस्लाविया के राज्यों से परमाणु हमले के पूरे साधन जुटा रखे हैं।
अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे राष्ट्रों को ऐसे हमलों के प्रति सतर्क तो रहना ही होगा, लेकिन अमेरिका का सबसे बड़ा सिरदर्द यह है कि अगले दो-तीन साल में अफगानिस्तान से उसकी ससम्मान वापसी कैसे हो? ओसामा के सफाये ने ओबामा की छवि में चार चांद जरूर टांक दिए हैं, लेकिन अगर उन्हें चुनाव जीतना है तो वे अफगानिस्तान को अधर में लटकाकर भाग नहीं सकते। अधर में लटका हुआ अफगानिस्तान अमेरिका के लिए अभी से भी ज्यादा खतरनाक और खर्चीला सिद्ध होगा। वह अनेक ओसामाओं की जन्मस्थली बन जाएगा। इसीलिए अमेरिका को अब आतंकवाद के समूल नाश का संकल्प लेना होगा। यह समूल नाश अफगान लोग ही करेंगे। यदि पांच लाख जवानों की शक्तिशाली अफगान फौज खड़ी कर दी जाए तो वह आतंकवादियों से ही नहीं, उनके संरक्षकों से भी निपट लेगी। यह काम बहुत कम समय और बहुत कम खर्च में भारत कर सकता है। इस समय अफगानिस्तान में भारत की लोकप्रियता शिखर पर है। यदि अफगान फौज खड़ी करने में पाकिस्तान सहयोग करे तो बहुत अच्छा, वरना उसके बिना भी अमेरिका को इस लक्ष्य की पूर्ति हर कीमत पर करनी ही चाहिए। खासतौर से यह सिद्ध हो जाने के बाद कि पाकिस्तान ने ही ओसामा को छिपा रखा था।
राष्ट्रपति ओबामा ने यह स्पष्ट करके ठीक ही किया कि अमेरिका की लड़ाई इस्लाम के विरुद्ध नहीं है। वास्तव में ओसामा का आचरण इस्लाम के उच्च और शांतिपूर्ण सिद्धांतों के विरुद्ध था। जिहाद के नाम पर उसने हजारों बेकसूरों को मौत के घाट उतारा। उसने इस्लाम को आतंकवाद और हिंसा का पर्याय बना दिया। आश्चर्य है कि भारत के कुछ जाने-माने तथाकथित मुसलमान नेताओं ने ओसामा को आतंकवादी कहने पर एतराज जताया है। अमेरिका के विरुद्ध उनका गुस्सा बहुत हद तक जायज है, क्योंकि यदि ओसामा छोटा आतंकवादी है तो अमेरिका बड़ा आतंकवादी है, जिसने झूठे बहाने से सद्दाम को खत्म किया और अब गद्दाफी पर ताकत आजमा रहा है, लेकिन यह कैसे माना जा सकता है कि ओसामा आतंकवादी ही नहीं था? बड़ा कांटा छोटे को उखाड़ रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि हम छोटे कांटे को गुलाब कहने लगें।
ओसामा का उन्मूलन जिस तरीके से हुआ, वह भारत के लिए काफी फायदेमंद है। यदि इसमें पाकिस्तान को जरा भी श्रेय मिल जाता तो वह अमेरिकियों को जमकर निचोड़ता। अमेरिकियों से जो भी अतिरिक्त मदद मिलती, उसका इस्तेमाल वह भारत के विरुद्ध करता। अब अमेरिका अपना हाथ थोड़ा खींच सकता है और पाकिस्तान की टांग ज्यादा खींच सकता है। वह उसे मजबूर कर सकता है कि दक्षिण एशिया की समग्र नीति में वह भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चले। भारत की मांग होनी चाहिए कि अब अमेरिका उस आतंकवाद की भी सुध ले, जो भारत के खिलाफ हो रहा है। मुंबई हमले के दोषियों को तो दंडित किया ही जाए (ओसामा की तरह) और उन सब आतंकवादी शिविरों पर भी सीधा हमला किया जाए, जो भारत विरोधी प्रशिक्षण देते हैं। ओसामा समेत सभी आतंकवादी पाकिस्तान की संप्रभुता का निरंतर उल्लंघन करते रहे हैं। पाकिस्तान की सच्ची संप्रभुता की रक्षा तभी होगी, जबकि निरंकुश आतंकवादियों को जड़-मूल से उखाड़ा जाएगा। ओसामा के उन्मूलन ने भारत को नया अवसर दिया है कि वह दक्षिण एशिया में अग्रगण्य भूमिका निभाए। यदि अब भी वह अमेरिका का मौन सहयात्री बना रहा और उसने पहल नहीं की तो वह अमेरिकी वापसी की बेला में स्वयं को सर्वथा निरुपाय और असहाय पाएगा।
अँधेरा अभी भी चारो तरफ पसरा पड़ा था और इक्की-दुककी कारों के अलावा ट्रैफिक शांत ही था, वरना लंदन कब सोता है! घड़ी देखी तो आठ बजकर दस मिनट हो चुके थे। रौशनी हल्की-हल्की फटनी शुरू हो ली थी। कितना वक्त लगता है उसे रोज मात्र दो मील के इस सफर में; सुबह सात बजे घर छोड़ देती है वह । ...आज बस, पांच मिनट लेट हो गई, तो नतीजा यह कि दस की जगह तीस मिनट लग गए, छोटे से उस रास्ते में। ट्रैफिक में फंसी तीन बार मुझसे झड़प चुकी है —” यह सुबह-सुबह अखबार लेकर बाथरूम में बन्द होने की आदत छोड़ो।.खुद तो लेट होते ही हो, देखना, मुझे भी मरवाओगे एक दिन। ”
सच कहूं तो इन छोटी-मोटी नोकझोंकों के बिना तो हमारी सुबह ही नहीं होती, कभी।
घर से चली थी तो आज भी हमेशा की तरह ही, वैसे ही मुस्कुराती, दौड़ती-भागती और व्यस्त ही थी मेरी नन्दिनी। सबकुछ सामान्य होने के बावजूद भी, पर जाने क्यों मैं पल भर के लिए भी खुद को उससे, उसके ख्यालों से अलग नहीं कर पा रहा हूँ। इम्तहान की तैयारी के लिए छुट्टी ली थी, पर पढ़ाई तो दूर, बेवजह ही फ्लैट में बिखरी यह खामोशी और बेचैनी, एक अपराधबोध...जाने किस अनजाने अनिष्ट की आशंका बनकर ले डूबी है मुझे।
रिया तो ठीक है ना...कहीं उसकी तबियत तो... आज फिर गोदी से ही नहीं उतर रही थी। कितना परेशान करती है रिया भी सुबह–सुबह! पर वह भी क्या करे, नौ महीने की ही तो है और फिर नैनी भी नई; इतना विश्वास तो नहीं किया जा सकता कि दिनभर के लिए अकेला छोड़ दें हम उसे अपरिचित के साथ। अस्पताल से पांच मिनट दूर यह अस्पताल के कर्मचारियों के लिए बनी नर्सरी ही ज्यादा सुरक्षित जगह लगती है; मन चाहे जब आसानी से देख तो लेती है नंदिनी रिया को वहाँ जाकर।‘
थोड़ी और अनमनी और चुप थी आज। कहीं... छि. छि, मैं भी बेवजह ही पता नहीं क्या-क्या सोचने लग जाता हूँ । अपनी सोच को धिक्कारते हुए मैने सामने रखी हंसती मुस्कुराती रिया की तस्बीर पर एक प्यार भरी नजर डाली। इतनी सुबह-सुबह उठना, तैयार होना कभी-कभार तो ठीक है, पर रोज-रोज तो कोई भी बच्चा परेशान करेंगा, मां-बाप की तरह उसकी भी तो डूयूटी लग गई है न; सुबह साथ-साथ उठकर तैयार होना और फिर क्रैश के लिए चल देना, दिन भर के लिए, मानो क्रैश नहीं, काम पर जाने की ड्यूटी हो, उसकी भी। ‘मानो’ क्या है ही, जाए बिना जिन्दगी भी तो नहीं चल सकती उनकी। महत्वाकांक्षा की आंच पर रखा यह पतीला थोड़ा बहुत तो उबले और खनकेगा ही। उबलेगा और खनकेगा क्या, वक्त बेवक्त जलेगा भी और बदरंग भी होगा, पर खाना खाना है, तो बर्दाश्त करना पड़ता है, यह भी। व्यस्त मां-बाप के रहते बच्चों को ऐसी परेशानियों से तो गुजरना ही पड़ता है। देखना, पर ठीक रहेगी हमारी रिया भी...ऐसे ही हंसती-मुस्कुराती, उसीके लिए तो सारी खुशियां सहेजना चाह रहे हैं आखिर, हम दोनों भी।
बेटी को याद करते ही तने चेहरे पर खुद-ब-खुद मुस्कुराहट आ गई...है भी तो बेहद नटखट..गोलगोल रूई के फाए-सी..नरम और प्यारी, बिल्कुल कैंडी फ्लौस की तरह। जब अपने नीचे के नन्हे-नन्हे दो दांतों के साथ लार गिराती मुझे देखकर मुस्कुराती है , तो मन करता है कि उठा कर खा जाऊँ इसे। अब तो पा..पा..पा..पा. कहती, देखते ही लपककर गोदी में भी आ जाती है, जैसे मानो कितना मिस किया हो दिनभर उसने हमें।
फ्लैट से रिया का क्रश और फिर अस्पताल...बस यही रोज का सफर रहता है नन्दिनी का। पौने आठ तक पहुंच जाए तो ठीक, वरना अगले दस मिनट में ही कार पार्क इतना भर जाता है कि मनचाही जगह तो छोड़ो, एक खाली जगह तक ढूंढने के लिए भी अस्पताल के उस वी.आई. पी. कार पार्क के चार-चार चक्कर लगाने पड़ जाते हैं सीनियर रजिस्ट्रार डॉ. नन्दिनी सिंह को, जबकि सिर्फ डाक्टरों के लिए ही सुरक्षित है पूरा कार पार्क । बॉस मिस्टर रौबिन्सन तो उससे भी पहले ही पहुंच जाते हैं वार्ड में।
”.पहले? क्या पता, रात भर सोते भी हैं या सुबह अस्पताल जाने की तैयारी में ही बैठे-बैठे पूरी रात गुजार देते हैं ...या फिर शायद घर जाते ही न हों... बीबी से पटती ही न हो और घबराकर यहीं दुबके बैठे रहते हों, देखो तुम कितने लकी हो, कम-से-कम घर लौटने से डरना तो नहीं पड़ता ”.. नन्दिनी का हमेशा-से यही सबसे बड़ा कौतुक और मज़ाक था मिस्टर रौबिन्सन के बारे में। सही-सही जान पाती तो कम-से-कम चेहरे पर चिपकी उस अविश्वनीय और खिसियाई मुस्कान से तो छुटकारा पा लेती हमेशा के लिए ।... सोचते-सोचते उस तनाव भरी मनःस्थिति में भी आखों में एक क्षीण चमक गुदगुदा गई। ...आखिर किस दम्पति में नोंक-झोंक नहीं होती...दो बर्तन साथ-साथ होंगे तो खटकेंगे ही। क्या हमारी कम लड़ाई होती है? कॉफी के कप में गरम पानी डालते हुए मैने सोचा।
अस्पताल से छुट्टी ली थी कि थोड़ा पढ़ूँगा, थोड़ा आराम करूंगा पर अपने ही घर में आराम करना मुश्किल और असंभव हो सकता है, मुझे पहली बार पता चला था! बेचैन परिंदे की तरह कहीं भी थिर नहीं हो पा रहा था मैं। वक्त गुजारने को बेवजह ही टेलिविजन खोलकर चैनल बदलने लगा। मन था कि कहीं टिक ही नहीं रहा था। शेयर बाजार में नहीं, देश-विदेश की खबरों में नहीं, गरमागरम चटपटे बौलीवुड के छवि संसार या मनभावन संगीत तक में नहीं। फिर सोचा, फुरसत मिली है तो महीनों से बिखरे और जमा इन पत्रों का ही जबाव दे दिया जाए; शायद उस व्यस्तता में ही मन की इस निरर्थक दुश्चिंता से मुक्ति मिले…।
टेलिविजन बन्द करने ही जा रहा था कि अचानक ही चल रहा कार्यक्रम रोकते हुए, आपदकालीन ”अभी–अभी खबर मिली है” की अप्रत्याशित और बेचैन करने वाली आवाज ने और धुंए भरी एक-के-बाद एक आती तस्बीरों ने मुझे कुरसी से उठाकर वापस वैसे ही तानकर सीधा खड़ा कर दिया, जैसे कि पहले मैं खिड़की के पास बेहद उद्विग्न मनःस्थिति में खड़ा था... एकबार फिर दोनों मुट्ठियां कसकर भिंची हुयी थीं, माथे की नस किसी अप्रत्याशित आशंका में बेवजह लपलप कर रही थी।
टेलिविजन को वैसे ही खुला छोड़ फिरसे वरांडे में खड़ा था और फिर तुरंत ही रेलिंग छोड़, हाथ बांधकर कमरे में वापस चहलकदमी कर रहा था। नन्दिनी से सम्पर्क तो हर हाल में करना ही होगा और तुरंत ही करना होगा। जो भी सुना और देखा था, पूर्णतः विचलित करने के लिए पर्याप्त था। अब तो उस अनचाहे भय ने अजगर बनकर पूरा ही निगल लिया था मुझे। सूखते गले से बारबार थूक निगलता मैं बेचैन था, नंदिनी का हाल-चाल जानने के लिए, रिया को वापस घर लाने के लिए। प्रार्थना कर रहा था दोनों की पूर्ण सलामती की...बेहद डर रहा था, कहीं किसी अप्रिय खबर का सामना न करना पड़ जाए। कैसा बेवकूफ हूँ मैं , खुद ही अपने प्रियजनों के अनिष्ट के बारे में सोच रहा हूँ, खुद को धिक्कारते हुए मैंने वापस अपने काम में मन लगाना चाहा , पर हाथ-पैर बेवजह ही सुन्न हुए जा रहे थे। नन्दिनी मेरी बेहद व्यस्त पत्नी और रिया हमारी नौ महीने की असहाय, लाडली, बेहद नाजुक, फूल-सी बेटी..कैसी हैं, कहाँ हैं, मुझे कुछ भी तो नहीं मालूम था।
बाहर अचानक ही उठे पुलिस कारों और एम्बुलेंस के दिल दहला देने वाले शोर ने मेरी तंद्रा को अब पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया था। बात इतनी उलझ जाएगी और एक आम सी दिखती सुबह यूँ आत्म परीक्षण के अड़तालिस घंटों में परिवर्तित होकर हमारे धैर्य की, साहस की इस तरह से अग्नि परीक्षा लेगी, यह सब कब सोच पाया था मैं भला। अगले अड़तालीस घंटे में जो भी हुआ, कल्पनातीत था।नंदिनी के लिए भी तो यह सब उतना ही अप्रत्याशित् और विचलित करने वाला रहा होगा, जितना कि मुझे महसूस हो रहा है। भय भी तो आखिर संक्रामक ही होता है। मेरी भयभीत और बेचैन उंगलियां अब बारबार नंदिनी के मोबाइल का नंबर मिलाने की कोशिश कर रही थीं जो मन की सारी व्यग्रता और तत्परता के रहते भी लग कर ही नहीं दे रहा था।...
... रोज के पहचाने रास्ते हो कर घर से घर तक आना-जाना भी इतना लम्बा और भयावह हो सकता है सुबह-सुबह सोचा नहीं था नंदिनी ने! सुबह की औपरेशन लिस्ट का क्रम तो निर्धारित करके ही गई थी वह कल रात ही, फिर भी मन-ही-मन एक-एक मरीज के क्रम और खास जरूरतों को याद करती, दोहराती नन्दिनी ने अपने उसी पुराने मनचाहे कोने में कार खड़ी कर दी। जाने क्यों उसे लगता है कि यही कोना भाग्यशाली है उसके लिए। जिस दिन यहां पर जगह मिल जाती है, दिन अच्छा गुजरता है उसका। न मरीज परेशान करते हैं, न सहकर्मी और ना ही खुद को भगवान समझने वाले उसके बौस मिस्टर रौबिन्सन।
अभी वह मुश्किल से गाड़ी के बाहर निकल ही पाई थी कि मोबाइल की घंटी और तीन-तीन कॉल वेटिंग की फ्लैशिंग लाइट्स ने पुकारना शुरु कर दिया। मां, शोभित और मिस्टर रौबिन्सन तीनों ही एक साथ याद कर रहे थे उसे। नन्दिनी की जिन्दगी के तीन प्रमुख वी.आई. पी। ....किसको जबाव दिया जाए और किसे रोका जाए, पल भर की ही उलझन थी। स्पष्ट था कि कितना भी जरूरी हो, अस्पताल की कॉल ही ड्यूटी के वक्त की प्राथमिकता और पहली पुकार है। एक कर्तव्यनिष्ठ और अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरुक डॉ.नन्दिनी सिंह ने मिस्टर रौबिन्सन का नम्बर ही सबसे पहले घुमाया था। आवाज रौबीली, घबराहट भरी और शीघ्रता की तत्परता लिए हुए थी- ‘ तुरंत ही थियेटर नं. 2 के बाहर मिलो। आपदकालीन स्थिति है।‘
‘आपदकालीन स्थिति...? ‘नन्दिनी भौंचक्की थी, थोड़ी-सी भयभीत भी।
कैसे भी कार का दरवाजा बन्द करती, खुद को संभालती दौड़ पड़ी थी वह।
अच्छी खासी भीड़ जमा थी वहां पर। नर्स, डॉक्टर, लैब टैक्नीशियन, व पूरा-का पूरा थियेटर स्टॉफ सभी मौजूद थे। किंगक्रास रेलवे स्टेशन पर और तीन चार जगह और आतंकवादी हमले हुए हैं। भारी क्षति हुई है और बड़ी संख्या में लोग घायल भी। तीन मुख्य अस्पताल जहां घायल अगले दस मिनट में आने शुरू हो जाएँगे, उनमें से एक उनका अस्पताल भी था और अब सैनिक क्षमता की तैयारी के साथ पूरी टीम को तैयार व सतर्क रहना होगा। सोच मात्र से पेट में उमड़ती ऐंठन को काबू करती नन्दिनी ने कैसे भी खुद को संयत करने की कोशिश की...उसके सामने एक व्यस्त और जिम्मेदारी भरा दिन खड़ा था। जाने कैसे-कैसे भयावह निर्णय लेने पड़ेंगे, नन्दिनी उस कठिन दिन के बारे में सोचने तक में खुद को अक्षम पा रही थी।
स्थिति की गंभीरता और सारी बातें समझती-बूझती नन्दिनी पांच मिनट को लेडीज टॉयलेट के एकांत में ही, बात करने लायक वक्त निकाल पाई थी। उसे पता था कि घर पर संपर्क करना कितना जरूरी है इस वक्त, शोभित और मां भी यह घबर सुनकर जरूर ही उसका हाल चाल जानने के लिए परेशान हो रहे होंगे जितना कि वह खुद रिया की सुरक्षा को लेकर है। पता चला है कि लंदन ब्रिज के आसपास का सारा इलाका सील कर दिया गया है और रिया की नर्सरी भी तो ठीक वहीं पर है। बाहर सन्नाटे को चीरती पुलिस कारों और एम्बुलैंसों का शोर स्थिति और वातावरण को और भी गंभीर और असह्य कर रहा था। कई बार फोन लगाने के बाद पल भर को बड़ी मुश्किल से शोभित से बात हो पाई थी ...” थियेटर जा रही हूं। ..आपदकालीन स्थिति है...कबतक लौटूंगी , अभी कुछ कह नहीं सकती। तुम अपना और रिया का ध्यान रखना” बस! इतना ही कहकर तुरंत फोन वापस रख दिया था नंदिनी ने । हमेशा की तरह आज भी बेहद जल्दी में थी नन्दिनी।
“अभी-अभी पता चला है कि लंदन ब्रिज के आसपास का सारा इलाका सील कर दिया गया है। माना, अपनी रिया की नर्सरी वहीं पर है, पर देखना, उसे कुछ नहीं होगा...बहुत लम्बी उम्र है हमरी रिया की।”
कहते-कहते रो पड़ी थी नन्दिनी। उसकी कांपती आवाज की गूंज खुद मेरे अपने गले में भी तो आ अटकी है।
”तुम परेशान मत होना। मैं अभी, तुरंत ही, कैसे भी रिया को घर, सुरक्षित लेकर आता हूँ।“
अपनी तरफ से समझाने और सांत्वना देने की भरपूर कोशिश की थी मैने, परन्तु कहीं कुछ था जो भय और घबराहट बनकर अटक गया था आसपास और मेरे गले में भी।
कार में रिया की सीट तक नहीं थी। रिया हमेशा नन्दिनी के साथ और उसीकी ही कार में घर से बाहर आती-जाती है। कैसे भी कार के फर्श पर अपना कोट बिछाकर और अपनी पैंट की बेल्ट से अगली सीट के पाए के साथ उसे सीक्योर कर धीरे-धीरे कार चलाता, इधर उधर गलियों से बचता निकलता, मैं नन्ही रिया को घर तो ले आया, पर मुझे यह अनुमान नहीं था कि अगले अड़तालीस घंटे तक न सिर्फ मुझे रिया के मां बाप दोनों का ही फर्ज निभाना था अपितु हफ्तों रिया की मां और खुद को...पूरे विक्षिप्त परिवार को भी इस अप्रत्याशित सदमे से उबरने में गुजराने होंगे। बाहर का आतंक बन्द दरवाजों से कैसे बेहद सुरक्षित आम घरों तक में घुस आता है, अचंभा था मुझे .. . ’ बेफिक्र और एक खुशहाल जिन्दगी जीते, यार दोस्तों के संग हर शाम बीयर के पैग पर ठहाके लगाने वाले डॉ. शोभित सिंह दुनिया में ऐसे अनुभवों से भी गुजरना पड़ता है कभी-कभी।‘ यही तो जिन्दगी है- मैने खुद को समझाने की कोशिश की- मर्द और वह भी सिंह..कमसेकम मुझे तो विचलित नहीं ही होना चाहिए। परन्तु यह एक अप्रत्याशित, हताशा भरा, कठिन अनुभव था मेरे लिए भी।
मैं स्तंभित था । ग्लानि से भरा, चुप था। नन्दिनी इतनी व्यस्त है... अकेली ही सब कुछ झेल रही है और मैं कुछ नहीं कर सकता। स्थिति चिन्तित करने वाली और कल्पनातीत थी। चिन्ता थी मुझे नन्दिनी के आराम को लेकर, उसके स्वास्थ्य को लेकर। पेट में हजारों घुमावदार एँठन देने वाली वह बेचैनी जब असह्य हो चली तो बेमतलब ही फिर से कमरे के चक्कर लगाने लगा। बारबार फोन के ठीक से रखे रिसीवर को उठाकर चेक करता कि रिसीवर ठीक से रखा भी है या नहीं। क्या पता कब नन्दिनी को मेरी जरूरत पड़ जाए!
अड़तालिस घंटों तक पत्नी का मोबाइल अनुत्तरित रहने के बाद, पहली बार जबाब के रूप में वह अपरिचित हलो भी बेहद सांत्वना दे रही थी।
“ हां, हां, डॉ. सिंह। मैं थिएटर नर्स सान्ड्रा बोल रही हूं। आपकी पत्नी ठीक हैं। आखिरी केस अभी-अभी सिलकर बन्द किया है उन्होंने। केस पूरा होते ही, औपरेशन थियेटर के बाहर आते ही, तुरंत आपसे बात करेंगीं। आप उन्हें लेकर कतई परेशान न हों। बेहद थकी हुई जरूर हैं, पर ठीक हैं और सुरक्षित हैं। मुझे आपको यही संदेश देने को कहा गया है।“
मां के बिना बड़ी मुश्किल से रो-रोकर सोई रिया की भी चिन्ता थी मुझे। सोती रिया उठ न जाए, इसलिए अपनी बेचैनी को बेआवाज दबाते हुए जैसे-तैसे अगले तीस मिनट निकाल दिए मैने। नन्दिनी के फोन का बेसब्री से इन्तजार था। 48 घंटे हो चुके थे नन्दिनी से बात किए बगैर। पता नहीं पल भर को भी सोई भी थी या नहीं वह!
फोन की वह घंटी एक करेन्ट की-सी तीव्रता के साथ मेरे हाथ पैरों से गुजर गई। “हां नन्दू कैसी हो? ठीक तो हो, ना ? बेहद थकी हो? सुनो अपनी कार को वहीं पार्क में ही रहने दो। मैं लेने आता हूं तुम्हें।“ नन्दिनी कुछ बोले भी , इसके पहले ही सवालों की झड़ी लगा दी थी मैंने। वाकई में बेहद चिंतित था मैं।
“नहीं मैं ठीक हूं। दस ही मिनट का तो रास्ता है। फ्रेश होकर आती हूं, अभी।“
बेहद थकी और टूटी-फूटी भारी आवाज में इतना ही कह पाई थी नन्दिनी।
“तुम रिया के पास ही रहो। सुनो, घर के खिड़की दरवाजे सब बन्द रखना और बेवजह ही बाहर झांकना, घूमना मत। अपना और रिया का ध्यान रखना। मैं बस आती हूँ। “
नन्दिनी को सुनकर मन भर आया। उसे बस हमारी ही फिक्र थी, इस समय भी। इस समय तो उसे भी घर के अन्दर और सुरक्षित होना चाहिए था...पास और साथ होना चाहिए था। खैर...जहां भी है, सुरक्षित रहे और सुरक्षित ही घर पहुंच जाए। पहली बार खुद को बेहद कमजोर, बेबस... परिस्थितियों के आगे पूरी तरह से लाचार महसूस कर रहा था मैं। पलभर में ही सब कुछ ...जीवन... परिवार.. एक ऐसे फूल की तरह लगने लगा था, जिसे किसी भी हालत में झरने नहीं दे सकता था मैं, पर फूलों की तरह ही जिन्दगी को भी मुठ्ठी में बन्द करके भी तो नहीं रख सकता था!
नन्दिनी के लिए, अपने और रिया के लिए, बेहद धार्मिक न होते हुए भी, मन-ही-मन भगवान से निरंतर प्रार्थना किए जा रहा था मैं। पूरे परिवार के जाने-अनजाने सब अपराधों के लिए बारबार माफी मांग रहा था अब मैं। सब कुछ ठीक था फिर भी मेरे आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
इन्तजार जब मेरे लिए असह्य हो गया तो रिया को गोदी में लेकर खुले दरवाजे की ड्योढ़ी पर जा खड़ा हुआ मैं और नन्दिनी की कार के बगैर बेहद सूनी लगती सड़क को घूरने लगा। ‘.क्यों इतनी उथल-पुथल, इतना उपद्रव करते हैं ये आतंकवादी, क्या सैकड़ों मासूमों की जानें और हजारों का दुख ही जबाव है इनकी मांगों का ? ‘
बंधी मुठ्ठियां और माथे की तड़कती नस अब चेहरे को ही नहीं, मेरे पूरे शरीर की एक-एक मांस पेशी तक को कसे जा रही थी।
आखिर... नन्दिनी की कार ड्राइव में आ ही गई और नन्दिनी बिना कुछ बोले, हाथ पकड़कर मुझे और रिया को झपटती-सी कमरे के अन्दर ले आई। मैं जानता हूं रात के उस नीरव सन्नाटे में हमारी ड्योढ़ी पर कोई बम नहीं था, पर उसकी आंखें बेहद डरी-डरी और आंसू भरी थीं।
”...कैसे समझाऊँ तुम्हें, यह वक्त दरवाजे पर खड़े होकर इन्तजर करने का नहीं है।” भरे गले से बस इतना ही कह पाई थी वह उस समय।
घर के बाहर का खुला पड़ा दरवाजा भी उसने ही चाभी से बन्द किया था, पर कमरे मे आते ही जूतों को वहीं फेंक सोफे पर निढाल गिरी-सी बैठ गई थी बेहद थकी नन्दिनी...ठीक मेरे सामने और चलचित्र-सी अभागी उस सुबह के हर पल को बन्द आंखों के नीचे फिर-फिरके जीने लगी थी, शायद...। भरे गले से निकले वे शब्द बीचबीच में टूट रहे थे...और असह्य वह सदमा अन्दर-ही-अन्दर अभी तक तोड़े जा रहा था उसे।
” कार तो मैने आज भी अपनी लकी जगह पर ही पार्क की थी शोभित, फिर दिन ऐसा क्यों गुजरा? ”
अनुत्तरित और बेबस, मैं देख रहा था कि चेहरे की एकएक मांसपेशी और आँखों के नीचे पड़े काले गढ्ढे, सारी कोशिशों के बाद भी, उसकी अभूतपूर्व थकान की चुगली किए जा रहे थे। सोई रिया को उसके बगल से उठाकर उसके अपने बिस्तर में सुलाकर, एकबार फिर से मैं पत्नी की बगल में जा बैठा था और आहिस्ता-आहिस्ता उसके आवेश से कांपते कन्धों को दबाने लगा था। शायद थोड़ी थकान से ही राहत दे पाऊँ।... पर वह तो इतनी थकी हुई थी कि मेरे हाथों का बोझ भी असह्य था मेरी अपनी ही नन्दिनी के लिए।
”चाय बना दूं, पिओगी? ” उसका ध्यान बांटने को मैने पुनः पूछा उससे।
पूछते ही, ढह गई वह। फफक-फफककर रोने लगी। ‘ ऐसा क्यों शोभित...ऐसा क्यों? जानते हो चार-चार औपरेटिंग थिएटर लगातार चल रहे थे और डस्टबिन वाले बडें-बड़े काले बैग भर-भरकर इन्सानों के अवयव फेंक रहे थे हम लोग। कितने मरे...यह तो छोड़ो। कितने अभागे अंग-भंग हुए, यह पूछो तुम। संज्ञाहीन हो गया था मन और मस्तिष्क। हमने प्रश्न पूछने बन्द कर दिए थे। मशीनवत् अपना-अपना काम करते जा रहे थे सभी। एम्बुलेंस तो एम्बुलेंस बसों में भरभर कर घायल आए हमारे पास। जिसे जो मिला उसी में बैठकर अस्पताल ले आया गया...चाहे किसी भी हालत में हो। जिन्दा-मुर्दा कैसे भी, पहले अस्पताल तो पहुंचे, फिर सोचा जाएगा कि क्या हो सकता है, बच पाएगा या नहीं। बात इतनी ज्यादा आपदकालीन थी। क्या यह सब करते समय उन हत्यारों ने कुछ भी नहीं सोचा... कैसे कोई इतना क्रूर, हृदयहीन हो सकता है, शोभित! बिना सोचे-समझे इतनी तबाही ला सकता है! और हम कैसे इन्हें ऐसा करने दे सकते हैं! बात बर्दाश्त के बाहर है! कैसे सिर्फ इसलिए कोई अपना सब कुछ खो दे कि वह गलत समय पर गलत जगह पर था! कोई जातीय दुश्मनी नहीं, कोई राग-द्वेश नहीं, असल में तो कोई जान-पहचान ही नहीं! फिर भी कीड़े मकोड़े की तरह यूँ इतनी निर्दयता से, बेमलब ही मसल दिए जाएं, जिन्दगी से हाथ धोना पड़े?
क्या आज की इक्कीसवीं सदी में भी यह सब, ऐसे ही होना चाहिए! क्यों होने देते हैं हम लोग ऐसा! आखिर यह सब तोड़फोड़ और भयानक जान-माल का नुकसान करने वाले भी तो हममें से ही एक हैं। हमारे बीच में रहते हैं और बीच में रहते हुए ही यह सारी खूँखार तैयारी करते हैं...घिनौने षडयंत्र रचते हैं! कोई-न-कोई तो जानता ही होगा उन्हें ! किसी के तो भाई, पति, बेटे होंगे ही वे! इतनी बड़ी साजिश रचते हैं, उसे अंजाम देते हैं और किसी को पता तक नहीं चल पाता? क्या संभव है ऐसा, शोभित? थक गए थे हम लोग, लोगों के बम-विष्फोट में चिथड़े-चिथड़े हुए हाथ पैर सिलते और काटते-छांटते, आँखें निकालते-निकालते। पिछले अड़तालिस घंटे पलक तक नहीं झपकाई है हम में से किसी ने। यंत्रवत् काम करती रही है पूरी टीम। कोई संवेदना नहीं, कोई जान नहीं। सुन्न थे हम सभी..। काश वे जिन्होंने ऐसा किया, देख पाते इस विनाश को, अपनी इस खूनी लिप्सा के विनाशकारी ताणडव को ! मेरी सहेली रेहाना को जानते हो ना तुम।‘
अचानक ही नन्दिनी की आवाज बेहद भारी हो गई और वह पूरी तरह से टूटकर बिखरने लगी। मैने पानी का भरा हुआ गिलास उसके सूखते होठों से लगा दिया और उसकी पीठ को धीरे-धीरे सहलाने लगा। पर नंदिनी तो अपने दुख में डूबी मानो किसी दूसरी ही दुनिया में जा पहुंची थी।
‘ हां, वही रेहाना, जो तुम्हें बहुत सुन्दर लगती थी।..हाँ वही, जो फैशन माडेल थी...या यूं कहूं कि बनने जा रही थी...एक बेहद सफल और सुन्दर माडेल। जिसके सामने एक शानदार कैरियर और भविष्य बांहें फैलाए खड़ा था। वही जिन्दादिल और खूबसूरत रेहाना भी थी, वहां किंग क्रास पर, उसी अभागी ट्रेन में। और साथ में उसका सोहम भी। ...वही सोहम शर्मा, जिसके साथ अगले महीने उसकी शादी होने वाली थी। बम ठीक सोहम की सीट के नीचे फटा था और जानते हो शोभित, सोहम के पैर की सारी हड्डियां चूर-चूर होकर एक बड़े धमाके के साथ किरच-किरच कांच के टुकड़े-सी, हवा में बिखर गई थीं। चारो तरफ गिरती सामने बैठी रेहाना के चेहरे में जा धंसी थी। उसकी दोनों आंख ले डूबी थीं। जीवन भर जिसने इतना प्यार किया, मरते-मरते इतने सारे दुख एक साथ ही दे गया उसे...या फिर हमेशा के लिए समा गया उसमें।...तिरोहित हो गया उसके अन्दर । बत्तीस टांके तो सिर्फ आँखों के आसपास ही लगे। चेहरे पर जो लगे, सो अलग...। फिर भी तो कुछ भी नहीं बचा पाए हम, शोभित। ...कोई जीवन नहीं, जीवन- साथी नहीं। और-तो-और रोटी-रोजी कमाने के लिए जिस रूप का सहारा ले रही थी, वह रूप तक नहीं रहा अब तो उसके पास...। चेहरा ऐसा कि अगर देख पाती तो खुद ही डर जाती। अब कोई सोहन नहीं है इस दुनिया में उसे प्यार करने के लिए, शादी करने के लिए...एक आम और खुशहाल जीवन देने और जीते रहने के लिए। वैसे तो अच्छा ही है कि आंखें नहीं रहीं, भयावह यह चेहरा कैसे देख पाती भला वह, तुम खुद ही सोचो। विश्वास मानो शोभित, हम सबने मिलकर बहुत कोशिश की थी कि कम-से-कम एक आंख तो बचा ही लें। कम-से-कम जी तो पाए वह। माना, बिना हाथ पैर के जीवन कठिन है पर बिना आंख के तो भयावह और नीरस है...वह भी पच्चीस साल की उम्र में? कैसे जियेगी अब ? कुछ भी तो नहीं कर पाई मैं, शोभित। कुछ नहीं कर पाई मैं उसके लिए।‘ ग्लानि और दुःख में डूबी नन्दिनी बारबार खुद से ही सवाल पूछे जा रही थी और गोलगोल उन यातनाओं के भंवर में डूबती-उतराती, हर पल पुनः-पुनः जी रही थी, सह रही थी अकेले-अकेले ही सब कुछ। अब वह सिसकियों के साथ रोने लगी थी और मैं उसका दर्द बांटने की कोशिश में, कुछ करने की बजाय, निशब्द बुत बना उसे सुन रहा था। बीच-बीच में उसकी पीठ सहला लेता था, आंसू पोंछ लेता था।
‘ आखिर ऐसा क्यों शोभित...तुम्ही बताओ ऐसा क्यों, क्यों हम इतने लाचार हैं?‘
कोई उत्तर नहीं था उसके सभी दंश देते सवालों का मेरे पास। अन्दर से उठती विचारों की उबकाई चैन नहीं लेने दे रही थी। कैसे सहा होगा मेरी नन्दिनी ने यह सब अकेले-अकेले ही। मुझसे जो सुना तक नहीं जा रहा था, नन्दिनी उसी के बीच से गुजरी है। झेला है..। वह भी, पलपल जीवन मृत्यु की गंभीर जिम्मेदारी, युवाओं को अंगभंग करते समय एक असह्य अपराध बोध कांधे पर लिए हुए, बिना किसी विश्राम या ठहराव के..लगातार और यंत्रवत्।
रोते-रोते जब थक गई, तो थकी नन्दिनी का सिर मेरे काधे पर एक ओर ढुलक गया और वैसे ही रोते–रोते ही सो भी गई वह। बह आए झाग और आंसुओं को थके मुँह और कंधे से पोंछकर मेने वहीं सोफे पर आराम से लिटा दिया उसे। सिर के नीचे पास पड़ा कुशन लगा दिया और पास पड़ा कंबल उढ़ाकर चुपचाप कमरे के बाहर निकल आया।
नंदिनी को आराम की जरूरत थी। शरीर पर ही नहीं आत्मा पर भी बहुत कुछ झेला और सहा था उसने पिछले अड़तालीस घंटों में।
बाहर बरामदे की रेलिंग पर झुककर सिर बाहर की ओर लटकाया तो अजीबो गरीब तस्बीरों ने मुझे एकबार फिर से घेर लिय़ा। कहीं रिया की आंखों के गोले पड़े दिखलाई देने लगे तो कहीं अपने और नन्दिनी के रेशे-रेशे हुए हाथ पैर...सिर और धड़ , खून में लथपथ शरीर दूर कहीं...अलग-अलग बिखरे हुए। घबराकर अंदर को वापस दौड़ा। आक्सीजन की बेहद कमी महसूस होने लगी थी मुझे। ताजी हवा मानो गायब हो चुकी थी चारो तरफ से और अपनी ही धड़कनें इस कदर शोर कर रही थीं मानो कान में नगाड़े बज रहे हों।
‘ पर, यह तो एक सभ्य समाज है...विकसित देश है ...यहां पर कैसे हो पाया यह सब ?‘ कायर पड़ चुकी बुद्धि ने एक और सहमी-सी दस्तक देने की कोशिश की।
अंधेरी रात के उस नीरव सन्नाटे को चीरते, गश्त लगाती पुलिस कारों के सायरन अभी भी मुझे दहला रहे हैं और अपने ही फ्लैट की बालकनी में अकेला खड़ा मैं बुत बन चुका हूँ, सोचे ही जा रहा हूँ-
‘ यह कैसा भय है, जो हादसे के पश्चात भी उद्विग्न कर रहा है, मन को ले डुबा है? हम तो खुशकिस्मत हैं। लंदन के बीचोबीच, उसी क्षेत्र में रहते हुए भी हाथ, पैर, आँख, नाक, कान, सब सही-सलामत हैं हमारे। हममें से कोई भी ट्रेन पर या स्टेशन के आसपास नहीं था वहाँ, जहाँ वे बम फटे थे। हमारा कोई नुकसान नहीं हुआ, फिर क्यों बेचैन हूँ मैं? थकी जरूर है, पर नन्दिनी जिन्दा है, मेरे पास है। रिया हमारे साथ है; मेरा परिवार और मैं सुरक्षित हूँ...फिर किस आशंका से इतना सहमा और भयभीत हूँ मैं? ...आखिर क्यों? ‘...
अन्दर कमरे में नन्दिनी बेसुध सो चुकी है, पर उसके द्वारा उठाए सवालों और पिछले अड़तालीस घंटों की उन अप्रत्याशित घटनाओं ने हजारों अन्य लोगों की तरह मेरे अन्दर भी एक आतंकी विस्फोट का रूप ले लिया है। सारे टूटे बिखरे विचारों को समेटता-सहेजता, मैं बारबार अन्दर से उठती अपनी ही इस आवाज से परेशान हूँ- ‘ऐसा और कबतक.. आखिर ऐसा क्यों...उन मृत और घायलों की जगह हम भी तो हो सकते थे।... थे क्या, हो सकते हैं ...कहीं पर, और कभी भी। पर, .. क्या हम कुछ भी नहीं कर सकते?... ‘
हम जब उनके बंगले में पहुंचे, आसमान बिल्कुल साफ था, धूप खिली हुई थी और बंगले में खड़े नीम, आम, अमरूद, अनार---के पेड़ों पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। बंगले के एक ओर एक कोने में केले के वृक्षों का समूह एक-दूसरे से मुंह जोड़े खड़े थे और उनमें घारें और खिलने को विकल फूल लटक रहे थे। लगभग एक हजार वर्गमीटर में फैले उस बंगले, जी हां उन्होंने बंगला ही कहा था और वह था भी, में आगे के आधे भाग में फैला था उनका वह उद्यान।
मेन गेट से बंगले तक जाने के लिए लाल बजरी का पंद्रह फीट चौड़ा गलियारा था, जिसके दोनों ओर ईटों को टेढ़ा करके गाड़ा गया था। गलियारे के दोनों ओर लॉन और उससे हटकर पेड़। बंगले के चारों ओर बाउण्ड्रीवॉल और उस दीवार के साथ फूलों की क्यारियां ---खिले रंग-बिरंगे फूल। बजरी के गलियारे के बायीं ओर के लॉन में झूला पड़ा हुआ था और बराम्दे में गद्दीदार चार कुर्सियों के साथ एक आराम कुर्सी थी जिसपर वह अधलेटे हुए थे। सामने कुर्सी पर उनकी पत्नी आंखों पर चश्मा संभालती, जो बार-बार खिसककर नाक पर आ टिकता था, अखबार पढ़ रही थीं। उन्होंने हम पर कुछ इस प्रकार दृष्टि डाली मानों कहना चाहती थीं कि सुबह हमारा आगमन उन्हें अप्रिय लगा था। सामने अधलेटे उनके चेहरे पर भी प्रसन्नता का कोई भाव नहीं था, लेकिन चूंकि उन्होंने आने की इज़ाजत दी थी इसलिए चेहरे पर हल्की स्मिति ला बोले, ‘‘बैठें--- जो भी पूछना है पूछ लें--- दस बजे मुझे सी.एम. से मिलने जाना है। ग्यारह का समय दिया है उन्होंने।’’ उनके चेहरे पर स्मिति का स्थान गंभीरता ने ओढ़ लिया था और वह पूरी तरह हमारे प्रश्नों के लिए अपने को तैयार कर चुके थे किसी नेता की तरह।
हमारे कुछ पूछने से पहले उन्होंने यथावत गंभीरता बरकरार रखते हुए पूछा,‘‘ कुछ लोगे?’’
ना में सिर हिलाने के बाद वह बोले, ‘‘आप पत्रकार लोग ठंडा-गर्म कहां लेते हैं!’’
हमने उनके व्यंग्य को समझा और बोले,‘‘सर पहले हम अपने परिचय----।’’
हमारी बात बीच में ही काटते हुए उन्होंने कहा, ‘‘परिचय मैं भूल जाया करता हूं --- क्या होगा जानकर --- आप पत्रकार हैं--- आप लोगों ने मेरे विरुद्ध बहुत विषवमन किया है। प्रारंभ में मैंने उत्तर भी दिए--- लेकिन आप लोगों के दिमाग में जो कीड़ा प्रवेश कर गया उसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं, फिर मेरी क्या औकात--- मैं एक साधारण लेखक----।’’
‘‘आप अपना वही घिसा-पिटा प्रश्न दोहरा रहे हैं। नहीं बन्धु मैं आज भी कुछ न कुछ लिखता रहता हूं। फिर यह आवश्यक भी नहीं कि लेखक कागज पर कलम ही घिसता रहे, यदि वह कुछ भी साहित्य के लिए अपना योगदान दे रहा है तो क्या वह साहित्य की सेवा नहीं! और जहां तक लिखने का प्रश्न है-- कुछ दिन पहले-- यही कोई दो महीने पहले-- ‘पुस्तक सदन प्रकाशन’ की स्मारिका में उसके संस्थापक स्व. डॉ. सदाशिव शांडिल्य पर मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था। स्व. डॉ. शांडिल्य राज्य के शिक्षा मंत्री डॉ. शिवानंद शांडिल्य के पिता थे यह तो आप जानते ही होगें।’’
‘‘जी हां, मेरी पुस्तकें उसी प्रकाशन से प्रकाशित हुई थीं और स्व. शांडिल्य जी के जीवन काल में प्रकाशित हुई थीं। मेरा गहरा संबन्ध था उनसे। वे मेरे आत्मीय थे--- कहना चाहता हूं कि साहित्य में उन्होंने मुझे पहचान दी और जब तक वे जीवित रहे उनकी मुझ पर विशेष कृपा रही। यह आलेख मुझे बहुत पहले ही लिख लेना चाहिए था, और सच यह है कि लिखा भी गया था, लेकिन प्रकाशित यह देर से हुआ --- तो आपका यह कहना कि मैं लिख ही नहीं रहा, उचित नहीं है। आप मेरी व्यस्तता भी तो देखें--- कितनी ही संस्थाओं से जुड़ा हुआ हूं। आप लोगों को पता होना चाहिए। कितनी ही संस्थाओं का मैं अध्यक्ष हूं, कितनी ही का सलाहकार और ये सभी संस्थाएं साहित्य के लिए समर्पित हैं।’’
‘‘यह प्रश्न कितना विचित्र है आपका--- इतने बड़े बंगले में अकेले क्यों रहता हॅंू ! बच्चे बाहर हैं, एक अमेरिका में, दूसरा दुबई में--- आते-जाते रहते हैं--- और अंततः उन्हें आकर रहना यहीं है।’’
‘‘यह सच है कि जब मैं क्लर्क था ---उन दिनों मैंने बहुत लिखा। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर मेरी कहानियां प्रकाशित होती थीं--- एक साहित्यिक दायरा था---।’’
‘‘अब वह बात नहीं है। लोग कम ही एक-दूसरे से मिलते हैं।’’
‘‘क्यो? आपको जानना चाहिए। साहित्य में राजनीति प्रवेश कर गयी है। लोग अपने-अपनों को स्थापित करने की राजनीति कर रहे हैं। आपसी विश्वास घटा है।’’
‘‘राजनीति पहले भी थी। आजादी के पहले भी---लेकिन आजादी के बाद वह बढ़ी और अब---तौबा----।’’
‘‘आपका यह आरोप सही नहीं है कि मैं भी अपने मित्रों के साथ मिलकर अपने समकालीनों को उखाड़ने में सक्रिय रहता था---सब बकवास है। तब भी मेरे विरोधियों की कमी न थी, आज भी नहीं है--- तब कम थे आज अधिक हैं, लोग ईर्ष्या-द्वेष रखते हैं--- कुप्रचार करते हैं---यह क्या कुप्रचार नहीं है कि मेरी साहित्यिक मृत्यु हो चुकी है---या मैं कल का लेखक हूं---।’’
‘‘आप मेरी व्यस्तता देखें-- जब मात्र क्लर्क था-- क्लर्की के बाद समय ही समय था मेरे पास। लिखता था--मित्रों से मिलता था, रचनाओं पर - पढ़ी हुई पुस्तकों पर चर्चा करता था। लेकिन अब हर बात में मेरी व्यस्तता आड़े आ जाती है। पुराने मित्र कट गए--।’’
‘‘नहीं, यह सच नहीं है। मैंने उन्हें अपने से नहीं काटा--वे मेरी व्यस्तता के कारण स्वयं ही अलग हो गए।’’
‘‘संभव है, जैसाकि आप कह रहे हैं, उन्हें कुंठा हो। मैं क्या कर सकता हूं। कुंठा बहुत घातक होती है---।’’
‘‘यह लोगों का कुप्रचार है। यह सच है कि मैं सरकारी नौकरी में पांच वर्षों तक लक्ष्यद्वीप में रहा था।’’
‘‘मिसेज भरुनी-- साहित्य मर्मज्ञ --अच्छी हिन्दी कथाकार थीं। मेरे संपर्क में आने के बाद वह बहुत अच्छा लिखने लगी थीं--- बहुत ही नेक महिला थीं। उनके दो कहानी संग्रह प्रकाशित हुए थे ---।’’
‘‘जी हां, उन संग्रहों के प्रकाशन में मेरी इतनी ही भूमिका थी कि उनका परिचय मैंने प्रकाशक से करवा दिया था। वह रिटायरमेण्ट के करीब थीं और लंबे समय से लक्ष्यद्वीप में सेवारत थीं---आई.ए.एस. थीं---।’’
‘‘यह संयोग ही था कि मैं उनके संपर्क में आ गया था। उनकी बड़ी कृपा थी मुझ पर। मेरी पत्नी को छोटी बहन मानती थीं वह। छोटे भाई की तरह मुझे स्नेह देती थीं।’’
‘‘यह मेरे विरोधियों का निराधार दुष्प्रचार है। मैंने उन पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं डाला था। कहा न कि वह मुझ पर बहुत कृपालु थीं-- मेरी पत्नी को इतना अधिक प्रेम करती थीं कि उन्होंने स्वेच्छया अपनी वसीयत मेरी पत्नी के नाम कर दी थी, जिसमें यह बंगला भी था।’’
‘‘जी हां , वे अकेले थीं। उनके पति की मृत्यु लगभग दस वर्ष पहले हो चुकी थी और पति की मृत्यु के पश्चात् इस बंगले में एकाकी जीवन बिताना कठिन जान उन्होंने अपना स्थानांतरण लक्ष्यद्वीप करवा लिया था।’’
‘‘लतिका सरकार -- आप मिसेज भरुनी की तुलना उनसे क्यों कर रहे हैं ? मैंने कहा न, उन्होंने स्वेछया मेरी पत्नी के नाम वसीयत की थी। उनके परिवार में कोई नहीं था। दूर-दराज के रिश्तेदारों को वह पसंद नहीं करती थीं। मेरे परिवार के प्रति उनकी आत्मीयता प्रगाढ़ थी। वे देवीस्वरूपा थीं---बड़ा दिल पाया था उन्होंने।’’
‘‘नहीं, वह वापस दिल्ली नहीं आ पायीं। मेरी पत्नी के नाम वसीयत करने के कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी थी।’’
‘‘मैंने पहले ही कहा कि मेरे विरोधी हर प्रकार से मुझे बदनाम करने की नीयत से यह दष्प्रचार कर रहे हैं। उस नेक महिला की मृत्यु स्वाभाविकरूप से हुई थी। कोई रहस्य नहीं था। फूडप्वायजनिंग से हुई थी उनकी मृत्यु। मेडिकल रपट आज भी मेरे पास है। आप कभी भी देख सकते हैं--- लेकिन आज नहीं--- मुझे सी.एम. से मिलने जाना है।’’
‘‘मुझे अपने विरोधियों के दुष्प्रचार का कोई उत्तर नहीं देना। उत्तर न देना ही सबसे बड़ा उत्तर है।’’ वह उठ खड़े हुए ‘‘क्षमा करेगें---मुझे--।’’
‘‘जी सर, आपको सी.एम. से मिलने जाना है।’’ हमने उनकी बात लपक ली थी।
जब हम उनके बंगले से बाहर निकल रहे थे चिड़ियां नहीं चहचहा रही थीं। आम के पेड़ पर कौआ कांव-कांव कर रहे थे और आसमान पर घने काले बादल घिरते दिख रहे थे।
डैंडिनाँग से फिलंडर्स स्ट्रीट की आखिरी ट्रेन में बैठे-बैठे आकाश सुस्ता ही रहा था कि अचानक उसके सामने वाली सीट पर एक एशियन लडक़ी आ बैठी । कुछ डरी-सहमी सी लडक़ी को आश्वस्त करने के लिए आकाश ने मुस्कुराते हुए पूछा-
‘आर यू फ्रौम इन्डिया ?’
लडक़ी ने मुस्कुराते हुए हामी भरी । थके हारे आकाश को नींद आने को ही थी कि वह लडक़ी पूछ बैठी-
फिलंडर्स स्ट्रीट से फेट स्क्रू के लिए ट्रेन मिलेगी?
' मैं भी तो वहीं जा रहा हँ ।
थैंक गाड' मेरा टेंशन कम हुआ ।
नो वरी' यू आर सेफ ।
थैंक यू' बाय द वे' आप कहाँ से हैं ? सकुचाते हुए वह पूछ बैठी
यू मीन मेल्बर्न आर इंडिया ?
मेरा मतलब इंडिया से था ।
मैं मुंबई से हूँ और आप ?
मैं दिल्ली से हूँ । यहाँ आप फेटसक्रू में ही रहते हैं ।
हाँ' शायद आप भी वहीं रहतीं हैं ।
फिल्हाल तो मैं एक रिश्तेदार के यहाँ वहीं रुकी हूँ । यहाँ स्प्रिंगवेल में एक लडक़ी से मिलने आयी थी ।
इतनी रात गये ?
दिन में तो वह नर्सिग होम में जाब करती है और शाम को कालेज जाती है
रात दस बजे बाद ही वह घर लौट पाती है ।
उससे मिलना क्या जरूरी था कि इतनी रात को------
दर असल मैं उसका रुम शेयर करने के सिलसिले में मिलने आयी थी' रिश्तेदारों के यहाँ कब तक रुकती ?
सो तो है । यहाँ अपनी लडाई खुद ही लडऩी पड़ती है
और इसीमें अपनी शान बनी रहती है (लडक़ी ने बात पूरी की)
ये---आप यहाँ स्टूडेंट वीसा पर आयीं होंगी न ?
मैं टूरिज़म का कोर्स करने आई हूँ लेकिन फिलहाल तो जाब की तलाश है
सारी' आपका नाम तो मैंने पूछा ही नहीं । मैं आकाश और आप ?
कुसुम' (थोड़ा सकुचाते हुए लडक़ी ने जवाब दिया)
हाँ तो कुसुमजी' मैं जिस रेस्तराँ में शेफ हूँ वहाँ एक वेटर की जरूरत है' आपको बुरा न लगे तो आपको रेफर कर सकता हँ ।
इसमें बुरा मानने वाली तो कोइ बात नहीं है । काम कोई छोटा-बड़ा नहीं होता । काम मिल जाये' यही काफी है ।
तो लीजिए यह कार्ड। कल सुबह ११ बजे के बाद कभी भी आ जाइए ।
थैंक यू आकाशजी' आपने तो मेरा बहुत बड़ा टेंशन दूर कर दिया ।
बातों ही बातों में पता ही न चला कब वे दोनों खिलडर्स में उतरे और वेरिबी की ट्रेन में चढ़े । देखते-देखते फेटस्क्रू आ चुका था ।
तो मैं कल टाइम पर वहाँ पहुँच रही हूँ ।
नो वरी' विश यू गुड लक।
बाय आकाशजी' सी यू।
दोनों तेजी से अपने-अपने घर का रास्ता नापने लगे ।
-२-
एक ही रेस्तराँ में काम करते हुए आकाश-कुसुम एक दूसरे के करीब आ चुके थे । सप्ताह की छुट्टी भी एक ही दिन होने की वजह से वे अर्सरडैंडिनोंग की पहाडिय़ों में और कभी यारा नदी के किनारे घंटों साथ होते ।
उनका प्यार जब परवान चढऩे लगा तो एक दिन आकाश ने बात छेड़ ही दी
यार केसि' कभी सोचा है कि ऐसा कब तक चलेगा !
मतलब ! शरारत भरी मुसकान बिखेरते हुए कुसुम ने पूछा ।
यही कि मैं और तू दोनों अकेले अपनी-अपनी जि़दगी से लड़ रहे हैं' क्या हम एक साथ नहीं रह सकते ?
रह सकते हैं लेकिन पति-पत्नी बनकर' रूम पार्टनर बनकर नहीं।
तू मजाक़ तो नहीं कर रही ? आय एम सीरियस !
जि़दगी के अहम फैसले मज़ाक में नहीं लिए जाते । लेकिन तेरे मम्मी-पापा इस रिश्ते को मानेगे ?
क्यों नहीं ? उनका भी तो लव मैरेज था' माँ गुजराती और पापा मराठी हैं।
तू अपनी सोच ।
मेरी माँ बंगाली है और पापा पंजाबी । उनका भी लव मैरेज ही था । वे तो उल्टे खुश होंगे ।
फिर तो कोई प्रोब्लम ही नहीं' आज ही उन चारों की रजा़मंदी ले लेते हैं।
और बसंत पंचमी के दिन आर्य समाज में शादी कर लेते हैं ।
ओ हो ! तो जनाब के मन में लड्डू भी फूटने लगे हैं ।(शरारत भरी मुसकान बिखेरते हुए कुसुम चहक उठी ।
-३-
शादी के बाद आकाश- कुसुम स्प्रिंगवेल में ही किराये के मकान में रहने लगे । उनका विवाहित जीवन बड़े सुख-चैन से बीतने लगा था, परंतु उसी रेस्तराँ में वही काम करते करते दोनों ऊब चुकेथे । अब जाँए भी तो कहाँ ? पढ़ाई पूरी कर चुकने के बाद भी दोनों की स्थिति यथावत् थी । आकाश अपनी होमियोपैथिक डाक्टरी की अच्छी खासी प्रेक्टिस छोड़ कर आया था और कुसुम भी अच्छी भली सरकारी नौकरी छोड़ आयी थी । एक बेहतर जि़ंदगी के सपने सँजोए वे मेल्बर्न आए थे और अपना सपना साकार होते न देख दोनों अंदर ही अंदर दुखी थे लेकिन कोई भी कुछ कहने-सुनने को तैयार नहीं था । इस तनाव पूर्ण स्थिति का एक कारण और परिणाम उनका निःसंतान होना भी था । मकान खरीदने के जुगाड़ में दोनों दो साल से भारत भी नहीं गए थे' जब कि दोनों के परिवारों में सगे भाई-बहनों की शादियाँ थीं । आत्म ग्लानि का यह गुबार एक दिन तो फटना ही था -
टेलीफोन की घंटी बजते ही रिसीवर कुसुम ने उठाया -
हलो मम्मी ! अभी-अभी तुझे ही याद कर रही थी । कैसी हो और पापा ? क्या कहा ? ब्लड कैंसर ! ओह नो (जैसे बेहोश होकर सोफे पर बैठ गई) रिसीवर आकाश को थमा दिया ।
प्रणाम मम्मीजी अचानक यह सब कैसे हुआ ? क्या लास्ट स्टेज पर हैं ?
केसी को जल्द ही भेज रहा हूँ । आप धीरज रखें।' पापा को कुछ नहीं होगा । मैं एक घंटे में आपको फोन करता हँ। (रिसीवर रखते हुए कुसुम से )
मैं अभी आन लाइन बुकिंग करता हूँ। तू तैयारी शुरू कर दे । अनमनी सी कुसुम अपने कपड़े समेटने लगी ।
वह बड़बड़ाने लगी-
भाड़ में जाये यह करिअर और ऐशो आराम की जि़दगी के सपने । हमें अपनों से अलग किया है इस मृग-तृष्णा ने । अपने इकलौते भाई की शादीमें न जा सकी और अब पापा---(दहाड़ मार कर रो पड़ी)
धीरज रख केसी' इतनी जल्दी कुछ नहीं होगा पापा को ।
तुम चुप भी करो । जिसे चोट लगती है वही जानता है कि उस पर क्या गुजऱ रही है ।
क्या मैंने नहीं खोयी अपनी माँ ? क्या मैं जा सका था अपनी इकलौती बहन की शादी में ? आय एम सारी' ये सब बातें बाद में भी हो सकतीं हैं । एक वीक के बाद की है तेरी टिकिट । पीक सीजन चल रही है- इससे पहले की कोई कन्फर्म टिकिट नहीं मिल रही ।
चार-पाँच दिन कुसुम ने ऐसे गुज़ारे मानो पाँच साल हो गए हों । कल सुबह की फ्लाइट पकडऩी थी । अचानक फोन धनधना उठा और आकाश ने ही रिसीवर उठाया -
जी हाँ मैं आकाश ही बात कर रहा हूँ चाचाजी । क्या ? कब की बात है ?
कल सुबह की फ्लाइट से केसि वहाँ के लिए रवाना हो रही है । अभी तो फोन रखता हँ ।
कुसुम ताड़ गई । किसका फोन है' कुछ बोलते क्यों नहीं ?
केछ बोलने जैसा हो भी तो ! पापा नहीं रहे ।
रोते-रोते कुसुम कहने लगी- अब मैं वहाँ कौन सा मुँह लेकर जाऊँ' कैसे मुँह दिखाऊँगी अपनी मामा को ? कैसी बात कर रही हो ! इस वक्त तो मम्मी को तेरी सख्त जरूरत है । होनी को कौन टाल सका है केसी ? थोड़े और कपड़े रख लो । महीना-दो महीना मम्मी के पास रह लो ।
-४-
मम्मी के पास महीना भर रह लेने के बाद मौका देखकर कुसुम ने माँ से कहा - मैं एक शर्त पर जाने को तैयार हूँ - यदि तू भी मेरे साथ वहाँ चले तो? अरे नहीं रे केसि. अभी नहीं । फिर कभी । ऐसे कई मौके आएँगे जब मुझे
चाहे-अनचाहे वहाँ आना ही होगा । (फीकी मुसकान बिखेरते हुए) तेरी गोद भराई भी तो मुझे ही करनी होगी-तब आ जाऊँगी ।
तब की तब देखी जायगी : अभी तो चल । जऱा हमारी दुनिया भी देख तो ले- कुसुम ने ज़ोर देकर कहा ।
जानती हूँ बेटी उस दुनियाँ को । तेरा मामा दस साल के बाद यहाँ लौटा था अपने मरे हुए बाप का मुँह देखने । चौथ के दिन ही भाग गया - अपनी विधवा माँ को विलखता छोडक़र । पता नहीं कौन सा खज़ाना लेट रहा है मुए अमरीका में । दाल-रोटी तो यहाँ भी मिल ही जाते थे उसे । वहाँ गया था आकाश के तारे तोडऩे और अब अपनी कमर तोड़ रहा है बारह-बारह घंटे टैक्सी चला-चला कर ।
कुसुम खूब समझ रही थी कि मम्मी का तीर कौन था और निशाना कौन । बेबस कुसुम जानती थी कि आकाश की नियति में तंदूरी ओवन की भट्टी और उसकी नियति में झूठे बर्तनों के अंबार लिखे थे । डबडबायीं आँखों से उसने अपना सामान पैक किया- भोर सवेरे की मेल्बर्न की फ्लाइट पकडऩे के लिए।
‘बेबे, तुहानूं पता ए न कि सिक्खाँ दे दस गुरु सन, ते तुहानूं ए वी मलूम है कि तुस्सी सन इक्तालीस विच पैदा हुए सन. साड्डे फ़्लैट दा कोड किना क ईज़ी है, दस ते इक्ताली, टेन फ़ोर्टि वन?’ अमर माँ को समझा रहा था.
‘पुत्तरजी, ऐ तो तूं मैन्नु चंगा दस्या, हुन ते ऐ कोड मैं कदे नईं पुलांगी.’ प्रभजोत आश्वस्त हो गई.
‘राम भजा जो जीता जग में राम भजा जो जीता’ या ‘मैं निर्गुनिया गुण नहीं जाना, एक धनी के हाथ बिकाना’ जैसे भजन प्रभजोत रोज़ सुनती थी. अमर और रत्ना हैरान थे कि सुबह सुबह उठकर प्रभजोत कम्प्यूटर पर गुरबानी लगाना कैसे नहीं भूलती थी.
‘सूती कमीज पैने के जिस तरैं प्राणी बारिश विच आपणे नूं डुब्ब्न दिन्दा ए, औस्से ई तरां रब दे नाम दी बून्दा विच जब तक तुस्सी पिज्जोगे नई, नाम लेने दा कोई फ़ैदा नईं.’ टीवी पर लम्बे लम्बे और बोरिंग भाषण सुन सुन कर रत्ना और अमर परेशान हो जाते कि माँ को यह क्या एक नया शौक चढ़ा था. प्रभजोत को याद भी नहीं रहता था कि वह क्या सुन रही थी और कब से सुन रही थी. कहने को वह भजन और गुरबानी सुन रही होती किंतु उसका दिमाग़ न जाने कहाँ होता.
प्रभजोत अभी पैंसठ साल की भी नहीं हुई थी कि उसे भूलने की बीमारी लग गई. शुरु शुरु में उसने अपनी छोटी छोटी भूलें यह सोचकर टाल दीं कि बुढ़ापे में ऐसा ही होता था. कुकर पर पकने को रखी हुई दाल और सब्ज़ियाँ जलीं, कई बार दरवाज़ा खुला छोड़ कर वह पड़ौस में गप्पें मारती रहीं. इमारत के अन्दर बाहर जाने वाला कोड तक अब प्रभजोत को याद नहीं रहता था. याकोब्सबरी के निवासियों के लिए अख़बार और कागज़ फेंकने के लिए भी एक कोड था, जिसके बग़ैर बक्से नहीं खुलते थे. कार पार्क में घुसने और निकलने के लिए एक दूसरा कोड था; एक आम आदमी को जब इतने कोड्स याद रखना मुश्किल लगता था; प्रभजोत को तो बीमारी थी भूलने की.
एक दिन जब प्रभजोत आर्ची को स्कूल से लाना भूल गई तो बहु बेटे को फ़िक्र हुई कि कहीं वह डिमैंशिया या एल्ज़ाइमर से तो ग्रस्त नहीं थी. रत्ना उन्हें एक विशेषज्ञ के पास ले गई, जिसने उनका अच्छे से मुआयना किया और बताया कि प्रभजोत को कोई चिंताजनक बीमारी नहीं थी. बुढ़ापे में अक्सर लोग नाम और नम्बर भूल जाते हैं. दिमाग़ी कसरत के लिए उसने प्रभजोत से कम्प्यूटर गेम्स खेलने को कहा. दफ़्तर जाने से पहले रत्ना सारे कामों की सूची फ़्रिज पर लगा देती और फिर फ़ोन पर भी उन्हें याद दिलाती रहती. प्रभजोत ख़ुद भी सजग रहने लगी पर डरती थी कि कहीं अपनी पड़ौसन, कमलजीत की तरह उन्हें भी ओल्ड-एज-होम में जाकर न रहना पड़े. पिछली बार जब वह कमलजीत से मिलने गईं थीं तो उसने प्रभजोत को पहचाना तक नहीं था. ऐसे जीवन का भी क्या फ़ायदा?
‘रब्ब, एस्थों पैल्ले कि मैं बच्च्यां नूं पुल्ल जावां, मैंन्नु ते तूं अपने कोल बुला लईं,’ प्रभजोत जब तब प्रार्थना करतीं. अमर और रत्ना उन्हें तसल्ली देते रहते कि ऐसा कुछ नहीं होगा. वे दोनों उन्हें याददाश्त तेज़ करने के लिए नुस्खे बताते रहते.
हरजीत सिंह भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत था और स्वीडन के भारतीय दूतावास में उसकी आख़िरी पोस्टिंग थी, जहाँ वह पत्नी प्रभजोत और छोटे बेटे अमर के साथ चार साल रहा. उसका बड़ा बेटा गोविन्द सिंह और उसकी पत्नी परमजीत कौर, जिनके एक बेटा और एक बेटी थे, उनके लुधियाने वाली कोठी और उनकी कपड़े की दो दुकानें सम्भालते थे. स्वीडन में अपनी पोस्टिंग के दौरान ही हरजीत सिंह ने अपनी दोनों बेटियों की शादियाँ समृद्ध परिवारों में कर दी थीं और उनके परिवार भी लुधियाने में ही बसे थे. प्रभजोत अपने को बड़ा भाग्यशाली मानती थी. घर-बार, धन, पोता-पोती और नाती-नातिन सभी कुछ तो थे प्रभजोत और हरजीत के पास.
चार साल के बाद जब भारत वापिस लौटने का समय आया तो हरजीत सिंह प्रभजोत और अमर स्टौकहोम में बने बड़े गुरुद्वारे में मत्था टेकने के लिए गए. ज़मीन पर माथा टिकाया ही था कि हरजीत सिंह को दिल का भारी दौरा पड़ा और वह वहीं ढेर हो गया.
‘किन्नी सोनी मौत हुई, बड़े पागां वाल्या नूं ही नसीब हुन्दी ए.’ शोकातुर प्रभजोत को लोग यही कहकर ढाढस बन्धा रहे थे.
‘हरजीत और अमर स्वीडन विच ई रैना चाहुन्दा सी, तुस्सी ते पैंजी अमर नाल हुन इत्थे ही टिक जावो.’ उसकी सहेलियों ने सलाह दी. यह सच था कि हरजीत सिंह स्वीडेन में ही रहना चाहता था. गुरुद्वारे में उसके मित्र थे; जब देखो तब वह वहीं टिका रहता, एक प्रतिबद्ध सेवक के अलावा वह एक अच्छा तबला वादक भी था. अमर के गले में भी मिठास थी और जब वभी उसे समय मिलता, वह गुरुद्वारे में गुरबानी के लिए पेश हो जाता. एक तरह से पूरा परिवार ही गुरुद्वारे को समर्पित था. गुरुद्वारे में इस परिवार की बहुत इज़्ज़त थी.
‘लुधियाने विच की रख्या है, प्रभजोत? निक्का पुत्तर एत्थे एन्ना वधिया पढ़दा पया है, ओन्नु न तूं रोड़ दईं.’ प्रभजोत की एक अन्य सहेली बोली.
हरजीत सिंह का क्रिया कर्म पूर करने के बाद अमर और प्रभजोत स्वीडन लौट आए. प्रभजोत अमर को अकेला नहीं छोड़ सकती थी. स्टौकहोम से सतरह किलोमीटर की दूरी पर याकोब्सबरी शहर में उन्हें एक अच्छा फ़्लैट मिल गया. क़तारों में बनी बीसियों इमारतें के हज़ारों फ़्लैट्स में सैंकड़ों भारतीय बसे थे; बहुत से सिख परिवार भी थे, जिनसे प्रभजोत की अच्छी निभती थी. पड़ौस में ही बसे आनन्द कुमार की बेटी, रत्ना, से अमर को प्यार हो गया तो प्रभजोत बड़ी ख़ुश हुई क्योंकि रत्ना सचमुच एक रत्न थी; पढ़ी लिखी, सुन्दर और सुघढ़.
हरजीत की मृत्यु के ठीक एक साल बाद अमर और रत्ना का विवाह हो गया और जल्दी ही उसे स्वीडिश नागरिकता भी मिल गई. अमर अपनी प्यारी बेबे का बहुत आदर करता था और रत्ना भी उनका बहुत ध्यान रखती थी. स्वीडन में जब कभी ठंड पड़ती; प्रभजोत कुछ महीनों के लिए लुधियाने चली जाती, जहाँ बेटे-बहु और बेटियों के परिवारों से अच्छी तरह से मिलना जुलना हो जाता था.
दो साल के अन्दर अन्दर अमर और रत्ना दो बच्चों के माँ बाप बन गए; सिमरन कौर और अर्जुन सिंह, जिन्हें वे प्यार से सिम्मी और आर्ची बुलाते थे. प्रभजोत उनके बहुत लाड़ करती थी; आर्ची के लिए हलवा बनाती तो सिम्मी खीर के लिए ज़िद करती, आर्ची को कहानी सुनाती तो सिम्मी पंजाबी गीत की फ़र्माइश करती. कभी कभी भंगड़े और गिद्दे के संगीत पर तीनों ख़ूब नाचते; जिसमें रत्ना और अमर भी भाग लेते.
सिम्मी और आर्ची जब छोटे ही थे, प्रभजोत ने बेटे-बहु से आग्रह किया था कि उन्हें बच्चों को हिन्दी और पंजाबी दोनों भाषाएं सिखानी चाहिए ताकि वे अपनी संस्कृति से जुड़े रहें. अड़ौस-पड़ौस में प्रभजोत ने देखा था कि भारतीय परिवार के बच्चे अपने घरों में सिर्फ़ स्वीडिश में ही बात करते थे. कोई मेहमान आ जाता तो स्वीडिश को टूटी फूटी अंगेज़ी में ढाल लेते. रत्ना का कहना था कि यदि स्वीडन में रहना है तो उनकी स्वीडिश भी कमज़ोर नहीं होनी चाहिए. सोच समझकर यह तय किया गया कि बेबे उनसे पंजाबी में बात करेंगी, अमर हिन्दी में और रत्ना स्वीडिश में. जो अंग्रेज़ी उन्हें स्कूल में सिखाई जाती थी; वह काफ़ी थी.
प्रभजोत ने तो सिम्मी को पंजाबी बोलने के अलावा हिन्दी लिखना और पढ़ना भी सिखा दिया था. आर्ची अभी दो साल का ही था पर वह स्वीडिश, हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी चारों भाषाओं में बात कर सकता था. स्वीडन में सभी बच्चे आमतौर पर तीन या चार भाषाएं जानते थे किंतु प्रभजोत को अपने पोता पोती पर बहुत गर्व था. जब वह उन्हें लुधियाने ले जाती तो बच्चे हाथ जोड़ कर सबसे ‘सत श्री अकाल’ करते और गुरुद्वारे जाते तो वे ज़ोर से ’वाहे गुरु का खालसा ते वाहे गुरु की फ़तह,’ कहते तो लोग दांतों तले उंगली दबा लेते.
प्रभजोत स्वीडन में बहुत ख़ुश रहती थी. ठंड में जब उसे लुधियाने जाना पड़ता तो कुछ दिन के बाद ही उसका मन न जाने क्यों उड़कर स्वीडन पहुंच जाने को करता. घर में दसियों नौकर-चाकर थे, जो प्रभजोत को खाने के समय खाना और चाय के समय चाय को पूछते रहते थे पर स्वीडन वाले घर जैसी बात नहीं थी; जहाँ हर बात में उसकी राय ली जाती थी; सुबह उठकर अमर और रत्ना ‘पैरी पौना’ और बच्चे ‘सत श्री अकाल’ कहते थे.
गोविन्द और उसकी पत्नी, परमजीत, दोनों को प्रभजोत से यही शिकायत रहती कि वह अमर और रत्ना को अधिक चाहतीं थीं. परमजीत एक स्थानीय स्कूल में पढ़ाती थी; स्कूल से दो बजे घर आने के बाद भी वह कभी प्रभजोत की पास नहीं बैठती थी. प्रभजोत को महसूस होता कि वह ज़बरदस्ती वहाँ टिकी थी. गोविन्द के बच्चे अवश्य उसे चाहते थे पर परमजीत उन्हें जल्दी ही पढ़ने को बैठा देती या किसी और काम में लगा देती. बेटियाँ अपने पतियों और बच्चों में व्यस्त थीं. हर बार ढेरों उपहार लिए जब वह मिलने जाती तो यही सुनती कि स्वीडन के उपहार और चाकलेट्स तो गोविन्द के परिवार ने छांट लिए, उनके हिस्से तो वही लुधियाने की मिठाइयाँ ही आईं. प्रभजोत का मन करता कि वह उनसे पूछे कि कभी उनका मन नहीं होता कि अमर, रत्ना या उनके बच्चों के लिए कुछ भेजें. उनसे तो बस शिकायतें करवा लो; बेटियाँ कहतीं कि भाई-भाभी उन्हें पूछते नहीं, बेटा-बहु की शिकायत थी कि दस बार खाने के बाद कभी बहनों को भी तो उन्हें अपने घर बुलाना चाहिए.
‘आप ते अमर स्वीडन में मज़े कर रए ओ. अस्सां नुं निभानियाँ पड़्दिया ने त्वाड्डी कुड़ियों दी सारी रस्मां.’
अमर या रत्ना से कभी शिकायत नहीं की. वे यही सोचते रहे कि माँ लुधियाने में आराम से थीं.
इस बार सितम्बर होने को आया और लुधियाने से गोविन्द की तरफ़ से कोई फ़ोन नहीं आया कि अमर माँ को कब भेज रहा था. जब अमर ने भाई से बात की तो उसने बताया कि वे छुट्टियां मनाने मसूरी जा रहे थे. पन्द्रह दिनों के बाद जब अमर ने फिर फ़ोन किया तो परमजीत बीमार थी. उनकी इस टालम टोल को देखकर अमर और रत्ना ने तय किया कि जब तक गोविन्द प्राजी ख़ुद नहीं बुलाएंगे, वे माँ को लुधियाने नहीं भेजेंगे. इस तरह प्रभजोत पहली बार भरी ठंड में स्वीडन में ही बनी रही; बेटा-बहु और पोता पोती के प्यार और सेवा की गर्माई ने उसे कभी ठन्ड महसूस नहीं होने दी.
दफ़्तर की तरफ़ से क्रिसमस के एक बड़े उत्सव में अमर और रत्ना को बुलाया गया था, जिसमें वे सिम्मी को ले जा सकते थे. उसी दोपहर को स्टौकहोम में रत्ना के परिवार में सुन्दरकाण्ड का पाठ भी था, जिसमें प्रभजोत अवश्य जाना चाहती थी. अमर और रत्ना ने सोचा कि पाठ के बाद वे माँ और आर्ची को घर छोड़ते हुए क्रिसमिस पार्टी के लिए निकल जाएंगे. पाठ और फिर लम्बे कीर्तन के बाद प्रसाद और भोजन समाप्त होते होते चार बजने को आए. फिर बर्फ़ की वजह से सड़क पर एक बड़ी लौरी उलट गई थी. ट्रैफ़िक एक घंटे तक रुका रहा. तापमान बहुत गिर गया था और सड़कें बर्फ़ की सिल्लियां बनी हुई थीं.
घर के पास पहुंचे ही थे कि बच्चों को पार्क में खेलता देख आर्ची ज़िद करने लगा. बच्चे बर्फ़ के पुतले बना रहे थे. प्रभजोत और आर्ची को पार्क के बाहर उतारकर अमर, रत्ना और सिम्मी चले गए.
बर्फ़ साफ़ करके प्रभजोत एक बैंच पर बैठ गई और आस पास के नज़ारे देखने लगी. अभी क्रिसमस को पूरा एक महीना था पर पूरा स्वीडन रंग बिरंगे बिजली के बल्बों से सुसज्जित हो चुका था, पेड़ और झाड़ियाँ चमक रही थीं, अपने अपने फ़्लैटों की खिड़कियों को लोगों ने बिजली के ख़ूबसूरत उपकरणों से सजा लिया था. अपने घर की ख़िड़की को ढूंढते हुए प्रभजोत को यकायक अपने फ़्लैट की याद आई और फिर आर्ची की. इतनी जल्दी अन्धेरा कैसे हो गया? उसका दिल दहल उठा. सारे बच्चे कहाँ गए, आर्ची कहाँ है? वह घबराई हुए इधर से उधर दौड़ने लगी.
‘ओ मेरे रब्बा, ख़ैर करीं.’ अपने पर्स को उसने ज़मीन पर उलट दिया पर उसे मोबाइल फ़ोन नहीं मिला. याद आया कि सुबह उसने चार्ज करने को रखा था, शायद पर्स में डालना भूल गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि पहले घर जाए या आर्ची के गुम हो जाने की रिपोर्ट थाने में लिखवाए. वह पार्क से भी दूर जाना नहीं चाहती थी कि कहीं आर्ची उसे ढूंढता हुआ उधर न आ निकले.
‘आर्ची, आर्ची.’ चिल्लाती हुई प्रभजोत छिपकली की कटी पूंछ की तरह तड़पने लगीं.
‘बेबे, बेबे.’ पुकारते हुए आर्ची आकर अपनी दादी से लिपट गया.
‘रब्बा तेरा लख लख शुक्र ए.’ एक दूसरे से चिपटे हुए दोनों रोने लगे.
’चल पुत्तर, आज मैं अपने आर्ची नुँ वधिया खीर खिलांवांगी.’
‘बेबे जी, मैन्नु हलवा खाना ए.’ हमेशा की तरह आर्ची ने ज़िद की.
’मेरा पुत्तर हलवा खाऊगा, चल छेत्ती कार चलिए, मैं अपने प्यारे पोते लई हलवा ते खीर दोन्यां ई बनावांगी.’
आर्ची को छाती से लगाकर प्रभजोत घर की ओर चल दी. ठंड काफ़ी बढ़ गई थी. तन और मन से थकी और डरी हुई प्रभजोत अभी तक सामान्य नहीं हुई थी, बिना सोचे समझे वह चलती चली जा रही थी गहराते अन्धेरे और जाड़े की धुन्ध में उसे सारी इमारतें एक ही जैसी दिख रही थीं. बर्फ़ पर धीरे धीरे चलते वह किसी तरह अपनी इमारत तक पहुंच गई. बोर्ड पर बटन दबाने के लिए हाथ उठाया तो लगा कि दिमाग़ बिल्कुल खाली हो गया हो, फ़्लैट का कोड क्या था?
‘अमर ने मैन्नु की दस्या सी? सन इक्तालीस विच कोई जन्मया सी? ओन्ने मैन्नुं होर की दस्सया सी? हाँ, साड्डे सिखाँ दे दस गुरु सी. इक्तालीस ते दस. ए होई न गल्ल.’ प्रभजोत को तसल्ली हुई कि उसे फ़्लैट का कोड याद आ गया था.
‘ए बुआ खुल क्यूं नई रहा?’ प्रभजोत बुड़बुड़ाने लगी. उसने 4110 के आस पास के सारे कौम्बिनेशंस दबा डाले पर दरवाज़ा था कि खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था. यह सोचकर कि शायद दस्ताने की वजह से नम्बर ठीक न दबे हों; उसने अपने एक हाथ का दस्ताना दाँतों से पकड़ कर उतार दिया और सारे कौम्बिनेशंस दोबारा दबाए कि पर वही ढाक के तीन पात. प्रभजोत के बैंक का कोड भी 1941 था जो उसके जन्म का साल था. बच्चों के जन्मदिन उसे सब याद थे; शायद कोड शायद अमर या आर्ची के जन्मदिन पर आधारित हो? इतना तो उसे याद था कि इकतालीस और दस से सम्बन्धित था वह कोड पर लगे तब न.
गोद की गर्माई पाकर आर्ची शायद सो गया था. थोड़ी ही देर में ठंड से उसके हाथ और पांव यूँ अकड़ने लगे कि जैसे बर्फ़ की सिल्लियों में गाड़ दिये गए हों. दीवार से लगकर किसी तरह वह आर्ची को सम्भाले थी. उसे आशा थी कि कोई न कोई निवासी वापिस आएगा तो इमारत का मुख्य दरवाज़ा खुल जाएगा. अन्दर जाकर तो वह चाबी से अपने घर का दरवाज़ा खोल ही लेगी. ऐसा लगा कि जैसे सदियाँ गुज़र गईं, कोई नहीं आया. क्रिसमस की छुट्टियाँ चल रही थीं, सब अपनी अपनी गर्म बैठकों और आरामदायक सोफ़ों पर बैठे चौकलेट और पर्व सम्बन्धित पकवान के साथ शराब पी रहे होगें.
प्रभजोत ने चाहा कि अपना दस्ताने को वापिस चढ़ा ले पर आर्ची को सम्भाले यह सम्भव न हुआ; उसका हाथ ऐंठने लगा. एकाएक उसे सफ़ेद बर्फ़ की चमक में कहीं कहीं काले धब्बे नज़र आने लगे. अपने से अधिक उसे आर्ची की चिंता थी. अपने कोट के बटन खोलने में उसे बहुत समय लगा; उसकी उंगलियों जम गई थीं. आर्ची को अपने सीने से लगाकर उसने अपना कोट उसके ऊपर ओढ़ा लिया पर बटन बन्द न कर पाई. इसके पहले की आर्ची उसके अशक्त हाथों से फिसल कर गिर जाता, उसे लगा कि उसे बैठ जाना चाहिए पर उसकी लातें कहाँ थीं? वह दीवार के साथ लगे लगे नीचे की ओर सरकने लगी और फिर धम्म से बर्फ़ पर गिर गई. उसके हाथ और पैर अब पूरी तरह से सुन्न हो चुके थे. टाँगो में भयानक दर्द उठा; शायद रक्त-स्त्राव बन्द हो चुका था. उसके प्राण बचें न बचें; उसे हर हालत में आर्ची को बचाना होगा.
’रब्ब, मेरे आर्ची नुं बचाईं.’ प्रार्थना करते करते प्रभजोत न जाने कब बेहोश हो गई. कुछ ही पल में बर्फ़ ने अपनी औकात दिखा दी. फटे थैले से निकलती रेत की मानिंद प्रभजोत का जीवन कुछ देर तक आर्ची की गर्म सांसों पर टिका रहा, जो उसके गले को छू रही थीं.
मुनक्का राय के टूटने की यह इंतिहा थी। पांच बेटे और तीन बेटियों वाले इस पिता की जिंद़गी में पहले भी कई मोड़ आए थे, परेशानियों और झंझटों के कई ज़ख्म़, कई गरमी बरसात और चक्रवात वह झेल चुके थे, पर कभी टूटे नहीं थे। पर आज तो वह टूट गए थे। उन का सब से छोटा बेटा राहुल कह रहा था, 'ऐसे मां बाप को तो चौराहे पर खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए।` पिता पर ज़ोर उस का ज्य़ादा था। सतहत्तर-अठहत्तर साल की उमर में क्या यही सुनना अब बाक़ी रह गया था? वह अपने दुआर पर खड़े सोच रहे थे और दरवाज़े पर लगी अपने ही नाम की नेम प्लेट को घूर रहे थे; मुनक्का राय, एडवोकेट! गऩीमत यही थी कि बेटा घर के आंगन में ही तड़क रहा था और वह बाहर दुआर पर चले आए थे। बेटे में जोश भी है, जवानी भी और पैसे का गुरूर भी। एन आर आई है। यही सोच कर वह उस से उलझने या कुछ कहने की बजाय आंगन से निकल कर दुआर पर आ गए हैं। बेटा राहुल चिग्घाड़ रहा है, 'इस आदमी की यही पलायनवादिता पूरे परिवार को ले डूबी है।` वह बोल रहा है, 'यह आदमी सीधा किसी बात को फेस़ ही नहीं कर सकता। बात को टाल देना और घर की बातों में भी कचहरी की तरह तारीख ले लेना इस आदमी की फ़ितरत हो गई है।` ज़हर का घूँट पी कर रह गए हैं, मुनक्का राय। पर चुप हैं। बेटे राहुल की ज़िद है कि बहन की विदाई अभी और इसी वक्त़ हो जानी चाहिए। और मुनक्का राय की राय है कि, 'बेटी को इस तरह वह मर जाने के लिए उस की ससुराल नहीं भेज सकते।` 'तो यहीं अपनी छाती पर बिठा कर उसे आवारगी के लिए छुट्टा छोड़ देंगे? रंडी बनाएंगे?` बेटा बोल रहा है, 'पूरे बांसगांव में इस की आवारगी की चर्चा है। इतनी कि किसी की दुकान, किसी के दरवाज़े पर बैठना मुश्किल हो गया है। यहां तक कि अपने दरवाज़े पर भी बैठने में शर्म आती है।` लेकिन मुनक्का राय अड़ गए हैं तो अड़ गए हैं। बेटे को बता दिया है कि, 'बांसगांव में मैं रहता हूं तुम नहीं। मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। न अपने दरवाज़े पर बैठने पर न किसी और के दरवाजे या दुकान पर। कचहरी में मैं रोज़ बैठता ही हूं।` और कि, 'मेरी बेटी रंडी नहीं है, आवारा नहीं है।` 'आप की बुजुर्गियत का, आप की वकालत का लोग लिहाज़ करते हैं, इस लिए आप से कुछ नहीं कहता कोई। पर पीठ पीछे सब कहते हैं।` कहते हुए वह बहन के बाल पकड़ कर खींचते हुए कमरे में से बाहर आंगन में आ जाता है, 'अब यह यहां नहीं रहेगी।` मां रोकती है तो वह मां को भी झटक देता है, 'इस का कपड़ा-लत्ता, गहना-गुड़िया सब बांधो। इसे मैं अभी इस की ससुराल छोड़ कर आता हूं।` 'मैं नहीं जाऊंगी भइया, अब बस कीजिए।` वह सख्त़ी से भाई से अपने बाल छुड़ा लेती है। पलट कर वह बोलती है, 'मुझे मरना नहीं, जीना है। और अपनी शर्तों पर।` 'तो क्या इसी लिए आठ-दस लाख रुपए खऱ्च कर तुम्हारी शादी की थी?` 'मेरी शादी नहीं की आप ने आठ-दस लाख खऱ्च कर के।` वह बोली, 'अपना बोझ उतार कर मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी।` 'क्या बात करती हो?` 'ठीक कह रही हूं।` वह लपक कर एक फ़ोटो अलबम दिखाती हुई बोली, 'देखिए इस घर के एक दामाद यह हैं, दूसरे दामाद यह हैं और यह रहे तीसरे! क्या यह भी इस घर के दामाद होने लायक़ थे? आप देख लीजिए ध्यान से अपने तीनों बहनोइयों को फिर कुछ कहिए।` 'तुम्हारी ये अनाप शनाप बातें मुझे नहीं सुननीं।` वह बोला, 'तुम बस चलो।` वह आंगन में से झटके से उठी और अपने कमरे में चली गई। भीतर से दरवाज़ा धड़ाम से बंद करती हुई बोली, 'भइया अब आप जाइए यहां से, मैं कहीं नहीं जाऊंगी।` 'मुनमुन सुनो तो!` उस ने दरवाज़ा पीटते हुए दुहराया, 'सुनो तो!` पर मुनमुन ने नहीं सुना। न ही वह कुछ बोली। 'तो तुम यहां से जाओगी नहीं?` राहुल ने फिर से अपनी बात दुहराई। पर मुनमुन फिर कुछ नहीं बोली। थोड़ी देर चुप रह कर राहुल फिर बोला, 'पिता जी के तो नाक रही नहीं। तेरी मोह में अपनी नाक उन्होंने कटवा ली है। पर सोच मुनमुन कि तेरे भाइयों की नाक अभी है।` मुनमुन फिर चुप रही। 'इतने बड़े-बड़े जज, अफ़सर, बैंक मैनेजर और एन आर आई की बहन इस तरह आवारा फिरे यह हम भाइयों को मंज़ूर नहीं है।` राहुल बोला, 'मत कटवाओ हम भाइयों की नाक!` मुनमुन फिर चुप रही। 'लो तो जब तुम नहीं जा रही तो मैं ही जा रहा हूं।` राहुल बोला, 'अम्मा जान लो अब मैं भी फिर कभी लौट कर बांसगांव नहीं आऊंगा।` अम्मा भी चुप रही। 'तुम लोगों की चिता को अग्नि देने भी नहीं।` राहुल जैसे चीखते हुए शाप दे रहा था अपनी अम्मा को। फिर अम्मा बाबू जी के बिना पांव छुए ही वह घर से बाहर आया और बाहर खड़ी कार में बैठ कर छोड़ गया बांसगांव। इस के पहले तो नहीं पर अब मुनमुन राय एक खब़र थी। खब़र थी बांसगांव की सड़कों पर। गलियारों, चौराहों से चौबारों और बाज़ारों तक।
यह मुनमुन जब पैदा हुई थी तो यही राहुल उसे गोदी में ले कर खिलाता-पुचकारता घूमता और गाता-मेरे घर आई एक नन्हीं परी! और राहुल ही क्यों बड़े भइया रमेश, मझले भइया धीरज और छोटे भइया तरुण भी गाते। अम्मा बाबू जी तो खै़र भाव विभोर हो गाते-मेरे घर आई एक नन्हीं परी! साथ में बड़ी दीदी विनीता और रीता भी सुर में सुर मिलातीं; चांदनी के हसीन रथ पे सवार मेरे घर आई एक नन्हीं परी! सचमुच पूरा घर चांदनी में नहा गया था। घर के लोग जैसे समृद्धि की सीढ़ियों पर सीढ़ियां चढ़ने लगे। उन्हीं दिनों एक बुआ आई थीं। अम्मा से कहने लगीं, 'ई पेट पोंछनी तो बड़ी क़िस्मत वाली है। आते ही देखो रमेश को हाई स्कूल फ़र्स्ट डिविज़न पास करवा दिया। बाप की कचहरी की लुढ़की प्रैक्टिस फिर से चमका दी।`
'ये तो है दीदी!` मुनमुन की अम्मा कहतीं। मुनमुन नाम की यह नन्हीं परी जैसे-जैसे बड़ी होती गई, परिवार की खुशियां भी बड़ी होती गईं। इसी बीच घर में पट्टीदारी की नागफनी भी उगने लगी। यह पट्टीदारी की नागफनी ही मुनमुन के घर परिवार को आज इस राह पर ला पटके थी।
रोज़ की तरह आज भी राजरानी की आँख जल्दी खुल गई। ज़रा-सी भी आहट किए बिना उसने दरवाज़ा खोला और वह बाहर बरामदे में आ गई। कमरे में अंदर पडे़-पडे़ उसका जी घुट रहा था। गेट तक दो बार चक्कर काटकर वह बरामदे में लगी कुरर्सी पर बैठ गई। पास पड़ोस के घरों के दरवाज़े खुलने लगे थे। सड़क पर इक्का-दुक्का दूधवाला या अखबार वाला गुज़रने लगा था। हवा में रातरानी की महक अभी भी व्याप्त थी। आसपास की बातों से बेखबर राजरानी किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी।
यह शहर राजरानी के लिए नया न था। पिछले दस सालों से वह प्रायः हर साल यहाँ सदिर्यां में दो-तीन महीनों के लिए अपने बड़े बेटे सुशील के पास आती थी। सुशील यहाँ एक कम्पनी में मुलाज़िम था। कई जगह किराए के मकानों में रह लेने के बाद अब उसने अपना मकान बनवा लिया था और पिछले दो सालों से उसी में रह रहा था। कार भी उसने इसी वर्ष ले ली थी। अपने इस बेटे की तरक्की देखकर राजरानी बहुत प्रसन्न थी , किंतु कभी-कभी मन-ही-मन सुशील की उन्नति की तुलना अपने छोटे बेटे उपेन्द्र से करती। अगरचे उपेन्द्र अपने बडे़ भाई जितना संपन्न न था, फिर भी दोनों मियां-बीबी नौकरी करते थे। पुश्तैनी मकान था। दो बच्चों वाले छोटे-से परिवार की उनकी गृहस्थी बडे़ आराम से चल रही थी। घर में उनके किसी तरह का कोई अभाव नहीं था। पर जब राजरानी इस शहर में अपने बडे़ बेटे सुशील के पास होती तो उसे अपने छोटे बेटे के घर में अभाव ही अभाव नज़र आते और वह किसी भी तरह से उन अभावों को दूर करने की उधेड़-बुन में लगी रहती। बड़ी बहू को सास की यह आदत अक्सर खटकती और वह कभी-कभी कह भी देती-
'माताजी, आप तो केवल शरीर से हमारे पास होती हैं, अन्यथा मन तो आपका देवरजी और उसके परिवार के साथ होता है।' इस पर राजरानी बहू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहती - 'बहू, तुम ऐसा क्यों सोचती हो ? मेरे लिए तो जैसा सुशील वैसा उपेन्द्र। हाँ, जिन हालात में उपेन्द्र इस वक्त रह रहा है, उसकी कल्पना करते ही मन उदास हो जाता है।'
दरअसल, सच भी यही था। उसका छोटा बेटा उपेन्द्र पिछले दो साल से अपने परिवार सहित जमू में विस्थापितों के लिए बने एक कैंप में रह रहा था। दो साल पहले राजरानी और उपेन्द्र का थोड़ा-सा सामान लेकर रातोंरात श्रीनगर से भागकर जमू आना पड़ा था। विस्थापन की वह घटना राजरानी को एक दुःस्वप्न के समान आज तक याद थी। उसे याद आया कि जब आस-पास के लोग चुपचाप घर छोड़कर जाने लगे तो उसे तब कितना गुस्सा आया था। अपने बेटे-बहू को उसने समझाया भी था- 'हमें यहाँ कोई डर नहीं है। ये सब लोग हमारे अपने हैं। यह मुहल्ला हमारा है, इसी मुहल्ले में हमारी कई पीढिय़ों ने जन्म लिया है और इसी मुहल्ले में हम सबने सुख-दुःख के दिन बिताए हैं। होगा झगड़ा शहर में कहीं। इस मुहल्ले में कुछ नहीं होगा। मगर राजरानी के हकीकत तब समझ में आई जब सारा मुहल्ला एक-एककर खाली हो गया ओर आखिरकर एक दिन मुहल्ले के एक बुजुर्गवार के समझाने पर राजरानी और उसके बेटे को भी रातोंरात अपना घर-बार छोड़कर जमू आना पड़ा। लड़का सुशील चूंकि पहले से ही इस बडे़ शहर (दिल्ली) में स्थाई तौर पर रह रहा था, इसलिए राजरानी अब उसके पास ही आ गई थी।
यहाँ पहुंचज़्र राजरानी को हमेशा इस बात की चिंता सताती रहती कि जाने उपेन्द्र और उसका परिवार कैंप में कैसे रह रहा होगा ? सुना है, कैंप में रहने वालों को सरकार सहायतार्थ राशन, कपडे़ और नगदी भी देती है। शिविरार्थी सरकारी मुलाज़िम हुआ तो उसे पूरी तनख्वाह दी जाती है।
उपेन्द्र और उसकी पत्नी को भी पूरी तनख्वाह मिलती थी क्योंकि दोनों सरकारी मुलाज़िम थे। एक बार तो राजरानी ने उपेन्द्र से कहा भी था कि चल तू भी दिल्ली, वहीं रह लेना भाई के पास। अब तो उसका अपना मकान हो गया है। मगर उपेन्द्र माना नहीं था। दरअसल, दिल्ली चले आने पर सरकार की ओर से उन दोनों पति-पत्नी को हर महीने जो वेतन मिलता था, सभवतः वह वहाँ नहीं मिलता।
राजरानी ने एक दिन सुशील से बातों ही बातों में कहा भी था-
'बेटा ज़रा उपेन्द्र को चिट्ठी तो लिखना। बहुत दिनों से उसकी कोई चिट्ठी नहीं आई। उसका हाल-चाल पूछना। कहना, किसी चीज की चिन्ता न करे। मन नहीं लगे तो कुछ दिनों के लिए चला आए यहाँ। बच्चों को भी साथ ले आए।'
मां का अन्तिम वाक्य सुनकर सुशील तनिक सोच में पड़ गया था।
माँ ने पूछा था - ' क्या बात है बेटा, किस सोच में पड़ गए ?'
'कुछ नहीं माँ, यों ही।'
'यों ही क्या ? लिख दे ना चिट्ठी। कब से कह रही हूँ। तुझे तो अपने काम से फुरसत ही नहीं मिलती।'
इससे पहले कि सुशील कुछ कहता, उसकी पत्नी बीच में बोल पड़ी थी-
'माताजी, इन्होंने चिट्ठी कबकी लिख दी होती। असल में बात यह है कि मेरे माता-पिता कुछ ही दिनों में जमू से यहाँ आ रहे हैं। कैंप में रहते-रहते पिताजी की तबियत बिगड़ गई है। उन्होंने यहाँ आने को लिखा है। यहाँ बडे़ अस्पताल में उनका इलाज चलेगा।'
'तो क्या हुआ, वे लोग भी रह लेंगे। तुम लोगों के पास अपना मकान है। किस बात की कमी है ? राजरानी सहज भाव से बोली थी।'
'माताजी, यह दिल्ली है। जितना बड़ा यह शहर है, उतने ही बडे़ यहां के खर्चे भी होते हैं। और फिर इस मकान में कमरे भी तो कुल तीन हैं। इतने सारे लोग कैसे रह सकेंगे एक साथ। हर परिवार को एक-एक कमरा तो चाहिए।'
'अरे, तुम मेरी चिन्ता मत करो। मैं बाहर बरामदे में खाट डालकर सो जाया करूँगी। निकल जाएँगे ये कष्ट के दिन भी,' राजरानी ने समस्या का निदान सुझाते हुए कहा था और सुशील की तरफ आशा-भरी दृष्टि से देखने लगी थी।
सुशील ने चुप्पी साध ली थी। बेटे की इस चुप्पी में उसकी विवशता साफ झलक रही थी। बेटे की इस चुप्पी ने राजरानी के तन-मन में उदासी भर दी। उसके चेहरे ज़ रंग फीका पड़ गया। उसे लगा जैसे उसका सिर घूम रहा है और वह धम से फर्श पर गिरने वाली है। शक्ति बटोरकर वह केवल इतना कह पाई थी-
'अच्छा बेटा, जैसी तुम लोगों की मर्ज़ी।'
कुछ ही दिनों में बहू के माँ-बाप आदि जमू से आ गए। घर में अच्छी चहल-पहल रही। रिश्तेदारों की बातें, कैंप की बातें, मौसम की बातें। राजरानी ये सारी बातें सुन तो लेती पर मन उसका कैंप में पडे़ अपने छोटे बेटे उपेन्द्र के साथ अटका रहता। आज भी उसे उपेन्द्र की बहुत याद आ रही थी। सुशील ने टोकते हुए कहा-
'माँ, ऐसे गुमसुम-सी क्यों रहती हो ? चलो, आज तुहें मन्दिर घुमाकर लाते हैं। ये सब लोग भी चलेंगे।' कार में जाएँगे और कार में ही लौंटेंगे। चलो जल्दी करो, कपडे़ बदल लो।'
राजरानी कुछ नहीं बोली।
'उठो ना माँ, कपडे़ बदल लो।' सुशील ने हाथ पकड़कर माँ को उठाना चाहा।
'नहीं बेटा, मैं मन्दिर नहीं जाऊँगी।' राजरानी गुमसुम-सी बोली।
'मगर क्यों ?'
'देखो बेटा, तुम इन्हें लेकर मन्दिर चले जाओ। लौटती बार मेरे लिए जमू का एक टिकट लेते आना। मैं भी कैंप में ही रहूंगी वहां। सुना है, घाटी में हालात ठीक होने वाले हैं। शायद वापस जाना नसीब में लिखा हो।
'यह एकाएक तुमने क्या सोच लिया माँ ?'
मैंने ठीक ही सोच लिया बेटा। मुझे अपने वतन, अपने घर की याद आ रही है। मैं वही जाना चाहती हूँ। मेरा टिकट ले आना।
'माँ ? ' सुशील के मुँह से बरबस ही निकल पड़ा।
'मेरा टिकट ले आओगे तो समझ लेना मैंने मन्दिर के दर्शन कर लिये।' राजरानी सुशील को एकटक निहारते हुए बोली।
सुशील अवाक्-सा माँ को देखता रहा। दोनों की आँखें सजल थीं।
यह मात्र संयोग नहीं है कि भारत के विरूद्ध सुपर बग तथा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की अमेरिकियों के सस्ते इलाज के लिए भारत या मैक्सिकों जाने की चिन्ता हो, दोनो ही मामलों में भारत के विरूद्ध कुप्रकार की गन्ध तो मिलती ही है और साथ ही भारत की धीरे-धीरे बढ़ती ताकत का एहसास भी पूरी दुनियॉ महसूस कर रही है। ज्ञान के युग में जिस सर्वाधिक संसाधन की आवश्यकता होती है वह मानव संसाधन है, जिसकी पूँजी भारत की झोली में नैसर्गिक तौर पर है। उदारीकरण के बाद आई टी की धूम ने भारतीय मेधा की पहचान अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार कराई। आई टी के साथ-साथ दवा उद्योग, वाहन उद्योग सहित कई उद्योगों ने अन्तर्राष्ट्रीय पहचान इन बीते २० वर्षों में देश की मेधा ने बनाई। इन सारे उद्योगों या इनके इतर अन्य मामलों में भारत की वैश्विक बढ़त का मुख्य कारण भारतीय मेधा ही थी। अमेरिका सहित सारे विकसित देश इस उभरती भारतीय क्षमता को हतोत्साहित करने का प्रयास नये-नये तरीकों से करते रहते है। अमेरिका द्वारा आऊट सोर्सिंग पर प्रतिबन्ध या आऊट सोर्स कराने वाली कम्पनियों पर कर वृद्धि का मामला, एच१बी बीजा को आठ गुना महॅगा करने का विषय, सुपर बग का कुप्रचार या अमेरिकी नागरिकों का भारत में इलाज के लिए आने का मसला हो, हर तरह से अपनी श्रेष्ठता से पीडित अमेरिका और अमेरिकी राष्ट्रपति भारत को घेरने की हर संभव कोशिश करते दिखते है और भारत को बदनाम कर उसकी व्यवसायिक क्षमता की धार को कुन्द करने का प्रयास करते है।
अभी आल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बर्जीनिया के एक कार्यक्रम में कहा कि मेरी प्राथमिकता होगी कि अमेरिकी जनता सस्ते इलाज के लिए मैक्सिकों या भारत न जायें। भारतीय स्वास्थ्य जगत में जबर्दश्त प्रतिक्रिया स्वाभाविक तौर पर हुई जिसकी अपेक्षा इस खुली और तथाकथित बराबर के मौकों वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था में होनी चाहिए थी। प्रतिस्पर्धा के लिए समतल मैदान की बाते तथा मुक्त अर्थव्यस्था का पैरोकार अमेरिका लगातार अपने देश की कृषि तथा उद्योगों को अतिरिक्त संरक्षण दे रहा है तथा दूसरे अन्य संभावना वाले देशों की राह में रूकावट पैदा कर रहा है। यह सच है कि अमेरिका की स्वास्थ्य सेवायें भारत की स्वास्थ्य सेवाओं के मुकाबले कई गुना मंहगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति अपने यहॉ 'हेल्थ केयर रिफार्म पैकेज' से काफी उम्मीदें लगाये बैठे है जिसके अनुसार अमेरिका में इलाज आम आदमी की पहुॅच के अन्दर आ जायेगा। अमेरिका के स्वास्थ्य सेवायें निजी हाथों में है तथा यह काफी महॅगी है। जो आम जनता की पहुॅच से काफी बाहर है। अमेरिका में भारत के सापेक्ष इलाज १० से १५ गुना तक महॅगा है। अमेरिकन मेडिकल एशोसियेशन के एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में भारत के मुकाबले हार्ट बाईपास १३ गुना, हार्ट वाल्व बदलना १६ गुना, एन्जियोप्लास्टी ५ गुना, कूल्हा प्रत्यारोपण ५ गुना, घुटना प्रत्यारोपण ५ गुना तथा स्पाइनल फ्यूजन लगभग ११ गुना महॅगा है। अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा महॅगे होने के कारण लगभग ४ करोड़ लोग बिना बीमा के जीवन यापन कर रहे है। पूरे देश में महॅगी स्वास्थ सेवाओं के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति सवालो के घेरे में है। अत खर्चों में कटौती की बात कर स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता करने का प्रयास भारत की किफायती और उच्चस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं को लांक्षित करके नहीं किया जा सकता है। अमेरिका की आबादी का लगभग ४ गुना है। अतः स्वास्थ और शिक्षा के क्षेत्र में किसी विदेशी मॉडल की बजाय अपने देश के हिसाब से मॉडल बनाकर हर वर्ग को समाहित करने का प्रयास करना चाहिए।
अर्थात् मनुष्य को बीती हुई बात पर दुख नहीं करना चाहिए और न ही आने वाले समय की चिंता करनी चाहिए क्योंकि बुद्धिमत्ता इसी में है कि वर्तमान में जैसा समय चल रहा है उसके अनुसार ही अपना आचरण करें। पर क्या यह संभव है? क्या अतीत की दुखद घटनाओं को सरलता से भुलाया जा सकता है? क्या तनावपूर्ण संबंधों को बआसानी नज़रअंदाज़ करना मुमकिन है? हाँ, यह संभव है लेकिन तभी जब व्यक्ति में क्षमा की क्षमता का विकास हो। हमारे संबंधों में; चाहे वे व्यक्तिगत या पारिवारिक हों अथवा सामाजिक, राजनीतिक, व्यावसायिक या आर्थिक; सुधार न होने या न सुधरने का प्रमुख कारण है क्षमा का अभाव। क्षमाशील व्यक्ति ही बीती हुई बातों को भूलकर दुख से मुक्ति पा सकता है और वर्तमान में सम्यक् आचरण कर सकता है। ऐसा व्यक्ति ही भविष्य की चिंता से भी मुक्त रह सकता है।
क्षमा एक अद्भुत गुण है पर क्या क्षमा माँगना और क्षमा करना इतना सरल है? वस्तुतः यह इतना आसान नहीं लेकिन असंभव तो बिल्कुल नहीं। क्षमा माँगने वाला और क्षमा करने वाला दोनों ही बड़े माने जाते हैं। जिसने क्षमा देना सीख लिया वह बहुत बड़ा वीर है। ‘‘क्षमा वीरस्य भूषणम्।’’ बहादुर ही क्षमा नामक आभूषण को धारण कर सकते हैं। यहाँ बहादुरी से तात्पर्य बाहुबल से नहीं है अपितु मन की शक्ति से है। सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण से है। जो अपने मन को वश में कर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर सकता है वही आत्मज्ञान को प्राप्त हो सकता है। आत्मज्ञान प्राप्त होने पर ही व्यक्ति मिथ्या अहंकार और दूसरे घातक मनोभावों से मुक्त होकर दूसरों को क्षमा कर सकता है, अथवा क्षमा-याचना कर सकता है। वस्तुतः ‘क्षमा’ एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को आत्मज्ञान का अवसर प्रदान करती है। क्षमा द्वारा सही अर्थों में व्यक्ति का आध्यात्मिक उत्थान संभव है। यही सच्ची वीरता है और वास्तविक उपचार भी।
आम लोगों की सोच है कि क्षमा कमज़ोरी का प्रतीक है और क्रोध और हिंसा में ताक़त दिखलाई पड़ती है लेकिन वास्तविक ताक़त वहीं है जहाँ क्षमा का भाव है। बदले की भावना या घृणा हिंसा उत्पन्न करती है जबकि क्षमा में निहित है अहिंसा का भाव। अहिंसा द्वारा ही सात्त्विक व स्थायी परिवर्तन संभव है। क्षमा द्वारा अहिंसा का अनुपालन होता है जो योगमय जीवन का प्रारंभ है। येाग के आठ अंगों में पहला अंग है ‘यम’ और ‘यम’ का पहला तत्त्व है ‘अहिंसा’। इस प्रकार क्षमा धारण करने वाला व्यक्ति वास्तव में एक योगी की श्रेणी में ही आ जाता है।
जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर हुए हैं जिनमें सबसे पहले तीर्थंकर हुए हैं भगवान ऋषभदेव। गोम्मटेश इन्हीं के पराक्रमी पुत्र हुए हैं जिन्हें बाहुबली के नाम से जाना जाता है। बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे और न ही आदि तीर्थंकर के ज्येष्ठ पुत्र ही लेकिन फिर भी वे जैन धर्म में तीर्थंकरों से भी बढ़कर प्रतिष्ठित और पूज्य हुए। क्या अपने नाम बाहुबली के अनुरूप ही शारीरिक बल और परम पराक्रमशीलता के कारण ही वे प्रतिष्ठित और वंदनीय हुए? शायद नहीं। बाहुबली की प्रतिष्ठा का कारण वह बल था जो सामान्य जनों में ही नहीं बड़े-बड़ों में भी दुर्लभ होता है।
तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र सम्राट भरत दिग्विजय के लिए निकले लेकिन उनके अनुज युवराज बाहुबली ने उनका आधिपत्य स्वीकार करने से मना कर दिया। दोनों के बीच द्वंद्व हुआ और इसमें बाहुबली विजयी हुए। लेकिन बाहुबली की प्रतिष्ठा का कारण युद्ध में विजय नहीं है। युद्ध में पराजित होने पर भरत ने बाहुबली को पराजित करने के लिए अमोघ शस्त्र चक्ररत्न का वर्जित प्रयोग भी किया लेकिन चक्ररत्न निष्पफल होकर वापस लौट आया।
बाहुबली अपराजेय रहे लेकिन अपने अग्रज भरत की साम्राज्य लिप्सा और विजय प्राप्त करने के लिए अपने ही अनुज पर चक्ररत्न के वर्जित प्रयोग को देखकर वे अत्यंत आहत हुए और उनमें इस असार संसार के प्रति विरक्ति का भाव उत्पन्न हो गया। उन्होंने राज्य त्याग करने का निर्णय ले लिया और अपने अग्रज सम्राट भरत से क्षमायाचना करके अपना राज्य उन्हें सौंप धर्म की शरण में चले गए। बाहुबली के इस अत्यंत विनम्र व्यवहार और त्याग से विमुग्ध उनके भाई सम्राट भरत ने कहा कि तुम सचमुच बाहुबली हो अन्यथा कौन समर्थ व्यक्ति विजय के उपरांत त्याग और शांति स्वीकार करता है।
ऋषभदेव के इस पुत्र ने विजय के उपरांत भी न केवल अपने अग्रज को क्षमा न कर अपमानित नहीं किया अपितु उनसे ही क्षमायाचना की। ऐसा महान बल उनमें उदित हुआ। रामधरी सिंह ‘दिनकर’ ने भी कहा है:
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसका क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो।
अपने इसी अद्वितीय त्याग के कारण बाहुबली तीर्थंकरों से भी अधिक पूजनीय हो गए। उन्होंने इस असार संसार पर नियंत्रण करने की अपेक्षा स्वयं पर नियंत्रण किया और जो स्वयं पर अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण कर सके वही सच्चा वीर है। जो दूसरों को उसकी ग़लतियों के बावजूद क्षमा कर सकता है वही सच्चा वीर है। स्वतंत्रता, आत्मज्ञान, आत्मनियंत्रण, नम्रता और क्षमाशीलता ही वीरता के लक्षण हैं बाहुबल नहीं। जो हिंस्र पशु का वध नहीं उसको पालतू बना कर उसे हिंसा से विरत कर सके वही बाहुबली है। क्षमा किसी भी प्रकार तपस्या से कम नहीं है। लिखा है:
क्षमापरं तपो नास्ति, न सन्तोषात् परं सुखम् ।
न च लोभात् परो व्याधिर्नच धर्मो दयापर:।।
क्षमा से बढ़कर तप, संतोष से अधिक सुख, लोभ से अधिक व्याधि और दया से श्रेष्ठ धर्म नहीं है।
लू गर्मी के दिनों में होने वाला रोग है। गर्मी के महीनों में दोपहर के समय घर से बाहर निकलने पर तेज गर्म हवाओं के चलने और धूप की तेजी से अंशुघात होने की अधिक संभावना होती है। अंशुघात होने पर रोगी को बहुत बेचैनी होती है। अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाये तो लू लगने से मनुष्य की जान भी जा सकती है।
कारण गर्मी के दिनों में तेज धूप के कारण वातावरण की नमी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है। इन दिनों में सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों का शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जिससे शरीर का तापमान बढ़ जाता है। इस कारण शरीर में गर्मी नियंत्रण की प्रक्रिया बन्द हो जाती है।
लक्षण शरीर में अधिक बुखार और बेचैनी होने के साथ ही साथ बार-बार उल्टियां होती है। उल्टियां अधिक होने से शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है। जिस कारण रोगी को अधिक प्यास लगती है। रोगी के सिर में तेज दर्द होता है। उसे चक्कर आते है। रोगी के हाथ-पांव में तीव्र कंपन, शारीरिक क्षीणता, पीड़ा और अधिक प्यास के लक्षण प्रकट होते है। रोगी की त्वचा लाल,गर्म और शुष्क हो जाती है।
सावधानी •धूप से बचना चाहिए। •खाली पेट घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। •भीड़-भाड़ तथा घुटन भरे इलाकों से बचना चाहिए क्योंकि ऐसे क्षेत्रों में गर्मी अधिक होती है। •ठंडा पानी, नमक प्याज व कैरी के पानी का प्रयोग करना चाहिए।
जी हॉं. मैं समोसा हूँ। हलवाई अपनी सारी ताकत लगाकर मुझे गूँथता है‚ मेरे पेड़े बनाता है और उतनी ही ताकत से मैं बेला भी जाता हूँ। फिर मुझे तेज धार वाले चाकू से दो टुकड़ों में चीरा जाता है। मेरे धैर्य की परीक्षा यहीं पर तो समाप्त नहीं होती। मेरे आग़ोश में अगणित आलू व मिर्च मसाले डाल मानो जले पर नमक छिड़का जाता है। गरम– गरम तेल के कड़ाहे में तल कर मैं अग्नि परीक्षा के दौर से गुज़रता हूँ। जितनी देर तक मैं धीमी–धीमी ऑंच में तला जाता हूँ उतना ही करारा बन कर कड़ाहे से बाहर निकलता हूँ।
फिर देखो मेरा जलवा- मजाल है कि मेरे बिना कोई महफिल या साहित्य संध्या हो जाय- आयोजक को जवाब देना भारी पड़ जाता है। पता नहीं–मेरे तीन कोने मानव की तीन प्रवृत्तियों ‘सत्व‚ रजस् और तमस् के प्रतीक हैं या भूत‚ वर्तमान और भविष्यत् काल के‚ लेकिन मानव समाज और खास तौर पर भारतीय समुदाय का काम तो मेरे बिना हर्गिज नहीं चलता। मालदार आदमी मुझे जलेबी या श्रीखण्ड के साथ ‘अरोगता’ है तो खस्ताहाल आदमी मुझे पोहे या पॉंव के साथ मसल कर अपना पेट भर लेता है। आपको भी यदि फ्लिंडर्स स्ट्रीट में भूख के मारे न रहा जाता हो तो मैं हूँ ना! आपको सही–सलामत् घर तक पहुँचाने की गारंटी मेरी।
कड़ाके की ठंड हो या बारिश की रिमझिम –मेरी गरमी और करारापन कुछ देरके लिए ही सही‚ आपको सुकून तो पहुँचाएगा ही। ’ बाल–वृद्ध–नर–नारी’ सबका प्रिय होने के कारण एक बार तो मैं भारत की गंदी राजनीति में भी घसीटा जा चुका हूँ। एक राजनीतिक दल का नारा कभी बुलंदियों पर था। ’जब तलक समोसे में आलू है तब तक भारतीय राजनीति में लालू है’। पता नहीं‚ लालूजी कहॉं हैं–आपका प्रिय समोसा‚ मय आलू के‚ कल भी था‚ आज भी है और कल भी रहेगा – ठीक वैसै ही‚ जैसै
‘सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था‚ आज भी है और कल भी रहेगा’
बच्चों इसबार हम हितोपदेश की वह कहानी सुनेंगे, जो बचपन में सुनी शायद मेरी पहली कहानी थी और जिसे पिताजी ने सुनाया था।
बन्दर और मगर
गांव के किनारे नदी में एक मगर रहता था और वहीं किनारे पर जामुन के पेड़ पर बन्दर। बन्दर मीठे मीठे फल मगर के लिए तालाब में गिराता और मगर बंदर को अपनी पीठ पर ठंडी-ठंडी हवा में नदी की सैर करवाता। मगर और बंदर में अच्छी दोस्ती हो गई। दोनों एक दूसरे के काम के थे। एकदिन मगर ने कुछ जामुन अपनी पत्नी को भी दिए और अपने दोस्त बंदर के बारे में भी बताया। परन्तु मगर मच्छिनी का दिमाग तो अब दूसरी तरफ चल रहा था। उसने कहा कि अगर तुम्हारा दोस्त इतने मीठे फल खाता है, तो उसका कलेजा सोचो कितना मीठा होगा। मुझे तो वही खाना है।
मगर सोच में पड़ गया, दोस्त को कैसे खाए, पर मगर मच्छिनी के आगे उसकी एक न चली। हारकर एकदिन मगर बंदर से बोला -दोस्त तुम्हारी भाभी ने तुम्हें खाने के लिए बुलाया है। खुश-खुश बंदर मगर की पीठ पर आ बैठा और दोनों मगर की खोह की तरफ चल पड़े। आधे रास्ते में बंदर ने पूछा-भाभी ने दावत में क्या-क्या बनाया है? मगर और झूट न बोल सका, बोला -बनाया नहीं, अभी बनाएगी। तुम्हारा कलेजा बनाना है उसे। बंदर को सारी बात समझ में आ गई। बंदर चालाक था। तुरंत बोला-अरे पहले क्यों नहीं बताया मैं कलेजा साथ लेकर आता? क्या कलेजा साथ नहीं तुम्हारे ? नहीं पेड़ पर ही छोड़ आया , सूखने के लिए, आज धोया था ना ! चलो चलो वापस चलो अभी लेकर आता हूँ।
मगर लौटा तो बन्दर कूदकर पेड़ पर यह जा वह जा। फिर कभी मगर के पास लौटकर वापस नहीं आया वह।
हितोपदेश की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कभी भी अनजान या धूर्त व्यक्तियों से मित्रता नहीं करनी चाहिए, वरना जान तक गंवानी पड़ सकती है।
बच्चे मन के सच्चे
बच्चे मन के सच्चे सारी जग के आँख के तारे ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे
खुद रूठे, खुद मन जाये, फिर हमजोली बन जाये झगड़ा जिसके साथ करें, अगले ही पल फिर बात करें इनको किसी से बैर नहीं, इनके लिये कोई ग़ैर नहीं इनका भोलापन मिलता है, सबको बाँह पसारे बच्चे मन के सच्चे ...
इन्सान जब तक बच्चा है, तब तक समझ का कच्चा है ज्यों ज्यों उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ का मैल चढ़े क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे, लालच की आदत घेरे बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे बच्चे मन के सच्चे ...
तन कोमल मन सुन्द हैं बच्चे बड़ों से बेहतर इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं भाषा की तक़रार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं इनकी नज़रों में एक हैं, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे बच्चे मन के सच्चे ...