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                                  (अंक-1-वर्ष-1)

              LEKHNI-MARCH-2007 (FIRST ISSUE)

                    Celebrating Womenhood

                  संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल

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बहुत दिनों से आँखों में एक सपना पल रहा था कि हम विश्व में फैले भारतीयों का ( भारतीयों का ही क्यों, हर उस इन्सान का जो सुन्दर और कल्याणकारी का हिमायती है) एक ऐसा मंच हो जहाँ से आप सभी (एक सी सोच वालों) तक पहुँचा जा सके, अपनी कही और आपकी सुनी व समझी जा सके--- प्रयास यही रहेगा कि विश्व की हर संस्कृति और साहित्य में जो जानने और समझने लायक जो है और हमारी पहुँच के अन्दर है, आपतक पहुँचे। जो बचाने लायक है, बचाया जा सके। आने वाली पीढ़ियों के मन से भेदभाव दूर करते हुए उन्हें कुछ ऐसा दिया जा सके जो नफरत और कुकर्मों की ढलान पर खड़ी मानवता के लिए ठोकर या फिसलन का नही, सहारे का काम करे और एक दूसरे से जोड़े--- संस्कृति और विचारों की एक ऐसी साँझी धरोहर --- एक ऐसी त्रिवेणी, जिसमें डुबकी मारते ही सारे गिले शिकवे भूलकर  हम एक दूसरे के पास आ सकें—कुछ पल के लिए ही सही सुखद सानिध्य पा सकें। कोई दावा नही कर रही कि पूरी तरह से ऐसा हो ही पाएगा परन्तु एक प्रयास तो है  ही और आप सबका,  अपने मित्रों का सहयोग भी चाहूँगी---इरादे नेक हों और अपनों का साथ हो तो रास्ते भी तो खुद ब खुद निकल ही आते हैं।
कोपल कोपल ही जब नव-जीवन संदेश ले आया है और बसंत ( हर्ष-उल्लास और रंग-रूप) की तैयारी में है तो इससे अच्छा और कौन सा समय हो सकता है लेखनी के इन्द्रजाल पर  आने या  प्रथम प्रयास के लिए----चाहती तो थी कि बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती के आशीष के साथ पत्रिका इंद्रजाल पर आए, परन्तु  बसन्त पंचमी की कौन कहे अब तो होली  भी आकर चली गई---चलिए, जब जो हो जाए वही शुभ है। एकबार फिर जुड़ने का आग्रह करतेहुए और सहस्त्र शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर नारी के विभिन्न रूपों को उकेरती आपकी अपनी लेखनी--- आशीर्वाद और प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा...

                                                                                              -शैल अग्रवाल 

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                                                                                                                                           मंथन

साहित्य और नारीः एक खोज वेदों से खेदों तक

                                                                                                                                           शैल अग्रवाल


"सारी बिच नारी है कि नारी बिच सारी है। सारी की ही नारी है कि नारी की ही सारी है।''

आदिकाल से ही साहित्य और नारी भी कुछ ऐसे ही एक दूसरे से लिपटे हुए हैं। इन्द्र-धनुषी शब्दों के जाल से नारी का रूप-रंग निखारता साहित्य कभी तो कृष्ण की तरह उसका रक्षक बन जाता है, कभी दुश्साशन की तरह उसका नग्न रूप देखना और दिखाना चाहता है। एक शाश्वत सत्य सी खड़ी नारी को तत्कालीन साहित्य जाने कबसे दर्पण की तरह उसके अपने ही बिम्ब-प्रतिबिम्ब दिखलाता चला आ रहा है। अब छवि कितनी स्पष्ट या कलुषित होगी, यह तो दर्पण की शुद्धता और प्रखरता पर ही निर्भर है। वैसे भी ''जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी '' की तरह यह चित्रण लेखक की मन:स्थिति, पात्र-कल्पना और व्यक्तिगत अनुभवों का संकलन और संस्मरण ही तो है। भौगोलिक और सामाजिक विषमताओं के बाद भी विश्व-साहित्य में तत्कालीन नारी की छवि लगभग एक सी ही उभरकर आती है---चाहे वह वैदिक काल की भारतीय नारी हो या दान्ते की बीयट्रिस।

आदि नारी नैसर्गिक सौंदर्य के साथ एक ठहराव लिए हुए है। यहां भाव और भाषा दोनों ही सरल हैं। नारी पूज्य है और सुख-शान्ति देने वाली है। फिर आया कालीदास और शेक्सपियर जैसे लेखकों का स्वर्ण-युग, जब मन-मोती भावनाओं के अति सुकुमार धागों से बिंध गया, क्योंकि अबतक आध्यात्मिकता भौतिकता से मिल चुकी थी। भाव बहुरंगी हो गये और चरित्र-चित्रण गूढ़। अब छंद जबतक तुरीण से निकले तीर की तरह अंत:स्थल को न बींधे, व्यर्थ था। कालीदास की शकुन्तला हो या शेक्सपियर की औफीलिया, दोनों के अधर प्रणय गीतों से सजे हुए थे और सपने बुनती आंखें अश्रु-पूर्ण । यही विरोधाभास इस साहित्य की शक्ति और सौंदर्य बना। कुमार संभवम् और कामसूत्र जैसे ग्रन्थों ने मन के साथ-साथ नारी के तन को भी खोजना शुरु कर दिया था। शील का आंचल सरकने लगा। प्रि-रैफेलाइट्स के आते-आते तो नारी के मांसल शरीर को चित्रित करना भी शुरु हो चुका था। जबकि मैटाफिजिकल कवियों ने नारी को बौद्धिकता का एक झीना आवरण पहना रखा था। इधर भारत में भी हवा का रुख कुछ-कुछ ऐसा ही था, श्रृंगार-रस के कवि खुसरो, भृतहरि, केशव, बिहारी वगैरह भी भक्तिरस और सूफीबाद की आड़ में नारी के नयन और वक्षस्थल में ही खोये रहे। उसका कामुक और उद्दाम चित्रण करते रहे। ''कसके छाती पकड़े रहे, मुंह से न बात कहे, ऐसा है कामिनी का रसिया। क्यों सखि साजन, ना सखि अंगिया। '' या फिर '' खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग, तन मन मेरा पीउ का भयो इक रंग। '' 

उन्नीसवीं सदी के आते-आते हार्डी, टॉल्सटॉय, शरदचंद्र, बंकिम बाबू और टैगोर व प्रेमचन्द जैसे लेखकों ने स्त्रियों के दलित, उपेक्षित जीवन और उनकी सिसकियों को अपने साहित्य का केन्द्र बिन्दु बनाया। विधवा-विवाह, बाल -विवाह और सती-प्रथा उन्मूलन जैसे प्रश्नों से साहित्य के पन्ने जल उठे। शरद की अर्ध सुलगती पारो की घुटन, टेस का दर्द और निर्मला का असहाय जीवन आज भी मन को कचोटता है। सहानुभूति ने जोर पकड़ा और शुरु हो गया नारी जागरूकता का युग, साहित्य में भी और समाज में भी। जेन ऑस्टिन जैसी लेखिकाओं की नायिकाओं ने सोचना शुरु कर दिया और प्रश्नोचित उत्तरों के अलावा वह घटनाओं को इच्छानुसार मोड़ भी देने लग गईं। भारत में भी प्रसाद जैसे संवेदन शील कवियों ने रूढ़िगत मूल्यों और खोखले समाज पर प्रश्न चुन्ह लगा दिए, '' मत कहो यही सफलता कलियों के लघु जीवन की। मकरंद बनी खिल जाएं, तोड़ी जाएं बेमन की।''         

रांगेय राघव, चतुर सेन शास्त्री, कन्हैया लाल मुंशी, अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती, शिवानी, मन्नू भंडारी जैसे लेखक और लेखिकाओं ने नारी के लिए आवाज उठाई और खुद नारियों ने भी अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना शुरु कर दिया। महादेवी वर्मा, सरोजिनी नायडू, सुभद्रा कुमारी चौहान और सुमित्रा कुमारी सिन्हा जैसी लेखिकाओं की कविता में नारी जोश और सोच की धूप-छांव में खड़ी दिखलाई दी।

''शशि मुख पर घूंघट डाले, आंचल में दीप छुपाए '' नारी कौतुहल सी साहित्य चेतना में आ चुकी थी। उसका हर रूप एक आल्हाद और उन्माद था। नारी के छलनामय रूप में भी पुरुष जाति को एक सुख, एक आश्वासन मिल रहा था।

'' इतना सुख जो न समाता, अन्तरीक्ष में जल थल मे। उनकी मुठ्ठी में बन्द था, आस्वासन के छल में।'' जयशंकर प्रसाद।

उसका रोना, हंसना, चलना, देखना, सभी कुछ मनमोहक है।

'' कांस सी मेरी व्यथा बिखरी चतुर्दिक, बाढ़ सा उमड़ता प्यार

मेघ भावों के झमाझम झर रहे जो, शरद सी तुम कर रही होगी कहीं श्रंगार।'' शिवमंगल सिंह सुमन।

शायद यही वजह थी कि समुद्र मंथन के बाद जब देवताओं और असुरों को अमृत और विष पिलाना था तो विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। रत्नावली के प्रेम में विवश शव को नैया बनाकर तूफानी रात में पत्नी से मिलने जाने वाले तुलसीदास की यह आत्म-विह्वल परवशता ही तो थी जो ज्ञान और वैराग के दिनों में इतने कठोर शब्दों में अभिव्यक्त हुई। '' ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी। '' जीवन की धूप छांवी यात्रा में या तो पुरुष द्वारा नारी छली जाती है या फिर नारी की मायावी छलना में वह खुद ही अपना सर्वस्व निछावर कर देता है।

'' One day in lovely spring a woman came in my lovely woods

In the lovely form of beloved, came to give my songs melodies; to give my dreams sweatness.

Suddenly a wild wave broke over my heart-shores and drowned all language.'' Tagore.

प्रसाद कहते हैं '' मानव जीवन वेदी पर परिणय है विरह मिलन का। सुख दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आंख का मन का। '' चूँकि आंख और मन के इस खेल में दोनों सहभागी हैं , बराबर के दोषी हैं। '' कलियों को उन्मुक्त देखा, सुनते वह कपट कहानी, फिर देखा उड़ जाते मधुकर को कर मनमानी।'' छल का यह प्रश्न तो हमेशा से नारी पुरुष के संदर्भ में उमड़ता घुमड़ता रहा है, पर नारी अपनी मोहक सतरंगी छाया में बार बार प्रवंचना को ही पकड़ पायी है। शरदचन्द्र ने देवदास में लिखा है कि नारी हृदय तो एक स्वच्छ आइने की तरह होता है। जिसकी भी छाया उसपर  पहले पड़ती है वही उसके अंत:स्थल में बस जाता है। टैगोर के अनुसार नारी एक सुकुमार लता की तरह पास खड़े वृक्ष का सहारा ले लेती है। अमृता प्रीतम अपने उपन्यास सागर, सीपी और समन्दर में लिखती हैं कि डायरी सिर्फ वह नही होती जो कलम से कागज पर लिखी जाए, कभी कभी यह मन के पन्नों पर दर्द की स्याही से भी लिखी जाती है। पुरुष ने नारी की इस कमजोरी को भलीभांति समझा, परखा और उसे छला। पुरुषों द्वारा अभिसारित, फिर प्रताड़ित नारियों के इतिहास से साहित्य भरा पड़ा है।, चाहे वह कालीदास की शकुन्तला हो, रामायण की अहल्या, उर्मिला, सीता या फिर मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा। इसी संदर्भ में लिखी गईं उनकी निम्न पंक्तियां तो नारी के भाग्य पर पाषाण-शिला सी अंकित हॉ गयी हैं। '' अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंख में पानी। ''  

प्रगतिवादी और आद्यात्मवादी कन्हैयालाल मुंशी जी की नायिका तन्मन ज्यादा तत्कालीन है। वह लिखते हैं  ''मैने एक ऐसी स्त्री की रचना की है जिसे इच्छानुसार प्रेम करने और अपने ढंग से रहने का अधिकार है। यही नहीं, उसे भी पुरुषों की तरह एकीकृत मन और इच्छाओं का आनन्द मिलना चाहिए। जीवन को पूर्णत: सहज भाव से जीने का आनन्द। और इन सबसे ऊपर छद्म लज्जा, रूढ़िवाद परम्परा और पीढ़ियों के नश्वर फैशन से भी ऊपर और परे सुन्दरता की खोज और चित्रण का आनन्द। इससे भूखी आत्मा तृप्त होती है और जीवन आनन्द की तीर्थ-यात्रा बन जाता है।'' पर क्या समूचा पुरुषवर्ग ऐसा सोच पाया ! मनु से य़ाज्ञलव्य तक जिन काम-कलाओं का विकास किया गया वे सभी औरतों को जीतने, उसे गुलाम बनाने की विधियां हैं। कालीदास लिखते हैं कि जीवन-वाटिका की सबसे अद्भुत लता नारी है, जो राग-ऋतु में अमृत-फल और द्वेष-ऋतु में विषाक्त फल लाती है। पर क्या यह मानव- जाति का ही सस्वभाव नहीं? अरस्तू, नीत्से, शौपेनहावर, तुलसीदास , कौटिल्य आदि ने जिस दृष्टिकोण का परिचय दिया है , वही आजभी कायम हैं। न तो समाज नारी के साथ न्याय कर पाया है और ना ही साहित्य।

जीवन के सुख-दु:ख , संयोग-वियोग, सफलता-विफलता, आदि विरोधी त्तवों से बनी समग्रता ही साहित्य को जन्म देती है , परन्तु जीवन में सम की अपेक्षा की जाती है। इसके लिए सन्तोषजनक समाधान समझना आवश्यक है। हमारे ऋषि-मुनि इस बात को हजारों साल पहले ही समझ चुके थे। ''प्रजनार्थ स्त्रिय़: सृष्टा सन्तान कार्य: मानवत्।'' अर्थात दोनों  ही एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए साधारण से साधारण धर्म-कार्य का अनुष्ठान भी पत्नी के साथ ही होना चाहिए। जहाँ पति-पत्नी  एक-दूसरे को बहु भांति खुश रखते हैं, उसी कुल में सब सुख और ऐश्वर्य निवास करते हैं। ऋगवेद में नारी को प्रसन्न रखने का एक ही उपाय बताया गया है, 'हृदय की शुद्धि' जो मन में हो, वही व्यवहार में , और व्यवहार मन से हो। अन्यथा स्त्रियों का मन नाना रूपवाला है और विविध बातें सोचने पर मजबूर हो जाता है। (श्लोक. 36)। नारी के लिए ओजस्विनी होना आवश्यक है । उसमें अपने चरित्र की रक्षा करने की सामर्थ हो और वह समाज में अपना अधिकार प्रस्थापित कर सके। (51) । नारी अजेय और शत्रु-विजयनी है। उसे सहस्त्र-वीर्या कहा गया है, अर्थात एक नही, सहस्त्र सामर्थ वाली है। (47)संकोच छोड़कर आगे बढ़ती है और अज्ञानरूपी अंधकार दूर करती है। (50)। ऐसी नारी की शिक्षा का दायित्व समाज का है। जहां नारी की पूर्ण सुरक्षा हो वही राष्ट्र सुरक्षित है।(83)। वह नृत्यकला आदि सीखती है। सुन्दर वस्त्र, स्वर्णाभूषण आदि पहनती और सुगन्ध लगाती है। पलंग पर सोती है। अर्थात वैदिक नारी तिरस्कृत और उपेक्षित तो कदापि नहीं थी। ऋगवेद में नारी को ''कल्याणीजया '' यानि  सुमंगला और '' कुलपा '' अर्थात परिवार का पालन-पोषण करने वाली कहा गया है। गृहिणी ही घर है ऐसा भी कहा गया है। लज्जाशील, मधुर-भाषिणी और प्रसन्नचित होना उसके प्रमुख गुण बताए गए हैं। उसे प्रेम या स्वयंबर विवाह करने का अधिकार है। प्रेम या योग्यता के आधार पर हुआ विवाह ही श्रेष्ठ है। मनु स्मृति में कन्या के रजस्वला होने के तीन वर्ष उपरान्त ही विवाह का विधान बताया गया है, इस तरह बाल विवाब वर्जनीय हुआ। आत्मरूप पुत्र, पुत्री समान हैं। '' य़थैव आत्मा तथा पुत्र: , पुत्रेण दुहिता सम:।'' नारी हित का जितना सुन्दर वर्णन वेदों में है , अन्यत्र कहीं नहीं। यदि हम आज अपनी हजारों साल पुरानी वैदिक संस्कृति पर चल रहे होते तो भारत आज एक सशक्त समाज होता और यहां देवताओं का वास होता। मनु स्मृति से उद्धृत '' यत्र नार्या: पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता '' तो प्राय: सभी ने सुना होगा, पर ऋगवेद में भी माता, पिता, आचार्य और अतिथि के साथ स्त्री के लिए पति और पति के लिए पत्नी ये पांच देवता बताए गए हैं। । इनकी पूजा पंचायतन और वेदानुकूल देव-पूजा है। इतनी सहनशील और स्वार्थ-हीन संस्कृति कम समाजों में ही देखने को मिलती है, परन्तु सैकड़ों साल की पराधीनता ने भारत को अपंग और असहनशील समाज बना दिया। साहित्य और संस्कार नष्ट से हो गए। कौटिल्य शास्त्र में लिखा है कि जिस समाज को नष्ट करना हो उसका साहित्य नष्ट कर दो। विदेशी अतिक्रमण सहते सहते भारत की सहस्त्रवीर्या और कुलपा नारी अबला बन गई। जर और जोरू की तरह उसका भी आरक्षण जरूरी हो गया और घूंघट डालकर उसे घर में बिठा दिया गया।

कौटिल्य ने कहा, स्त्रियों का विश्वास मत करो, उनमें समझदारी और समाज का अनुभव नहीं होता। उनका अति सहवास दोष उत्पन्न करता है। शायद यही वजह थी कि तुलसीदास ने भी उसे ताड़ना का अधिकारी बताया। मूढ़ अधम जड़मति नारी कहा। कोमल और कमजोर तो वह हमेशा से ही थी और पुरुष के बिना अभूरी भी, ''जिउ बिन देह, नदी बिन बारी, तैसेहु नाथ पुरुष बिन नारी।'' फिर भला आरक्षण में कैसे वह अपने को सबला सिद्ध कर पाती? मनचलों का मनोरंजन जरूर बनकर रह गई। '' अबला जीवन अब तुम्हारी बदल गई कहानी, आंचल में छिपी आरक्षित जवानी।'' या फिर '' एक नहीं, दो दो मात्रायें, नर से भारी है नारी। '' 

विश्व चाहे कितना भी उन्नतिशील क्यों न हो जाए, नारी आजभी वहीं-की-वहीं खड़ी है। पुरुष पर आश्रित। आश्रय चाहे पिता का हो, भाई का , पति का या पुत्र का। आज की नारी पुरुष की समस्या नहीं कठपुतली बनगई है। पुरुष प्रधान समाज में उसे पुरुष के बताए मार्ग पर ही चलना होगा। यदि वह स्वयं स्वतंत्र मार्ग अपनाती है तो पग-पग पर शोषण और विघटन का शिकार बनती है। वस्तुत: समाज और साहित्य की सबसे बहिष्कृत और बदनाम वही नारियां हैं ,जो अपने शरीर और मन को अपने अभिभावकों और स्वामियों तक सीमित नहीं रख पाई हैं। सतीत्व पर उंगली उठने पर सीता को भी अग्नि-परीक्षा देनी होगी। बुद्धत्व की खोज में निकला गौतम पत्नी यशोधरा को यूं ही, बिना बताए ही त्याग सकता है। द्रोपदी का जुआरी पति उसे दांव पर लगा सकता है। नारी वास्तव में एक वस्तु ही तो है। भोग व संतानोत्पत्ति का साधन। संपति की तरह उसे लूटा जा सकता है। लड़कर जीता जा सकता है। और जरूरत पड़ने पर द्रौपदी की तरह आपस में बांटा भी जा सकता है।

अपराधी चाहे कोई भी हो, अपराध हमेशा नारी का ही सिद्ध होता है। क्योंकि जज और ज्यूरी दोनों ही पुरुष हैं। गौतम की अहिल्या की तरह सैकड़ों नारियां आजभी पाषाण प्रतिमा बनी आत्म-संताप के जंगल में तिरस्कृत खड़ी हैं, क्योंकि छलने वाला इन्द्र और श्राप देनेवाला गौतम दोनों ही पुरुष हैं। राम जैसे सहृदय और उद्धारक तो बिरले ही इनकी कुटिया में आते हैं। सारा ढांचा ही पुरुष के पक्ष में है। वस्तुत: वह चारो तरफ से नारी को घेरे हुए है और अपने चंगुल में फंसाने के प्रयत्न में निरंतर रत भी है। जो नहीं फंसती, या बलात्कारी कहकर न्याय मांगती हैं, बदचलन सिद्ध होती हैं। यदि कहीं किसी स्त्री ने पुरुष को पाना चाहा तो उसे क्रोध और पश्चाताप की अग्नि में जलना पड़ता है। शूर्पणर्खां की तरह नाक-कान कटवाने पड़ते हैं। पति कैसा भी हो, '' वृद्ध,रोगवश, जड़, धनहीना,अंध, बधिर, क्रोधी, अति दीना/ऐसेहु पति का किया अपमाना, नारी पावहु जमपुर दुख नाना।'' उसके लिए तो '' सपनेहु अन्य पुरुष जग नाही।'' काश ! तुलसीदास भी सूरदास की तरह नारी का हृदय पहचान पाते ! जान पाते कि नारी के पास तो बस एक ही हृदय होता है, जिसे वह प्यार और समर्पण के साथ एक ही आराध्य को सौंप पाती है। '' ऊधो मन नाही दस बीस/एक हुतो जो गयो श्याम संग / को आराधै ईस। '' प्रेम-विह्वल मीरा के भी तो सिर्फ एक ही गिरधर गोपाल हैं। ''दूसरा न कोई। ''

परन्तु मां के रूप में नारी की हर साहित्य और समाज, दोनों ने ही भरपूर प्रशंस्ति की है। '' जननी, जन्मभूमि स्वर्गातपि गरीयसी।'' (वाल्मीकि रामायण) । '' नास्ति मातृसम गुरु।'' या '' माता निर्माता भवति।'' (महाभारत) वगैरह वगैरह। श्रद्धा के रूप में प्रसाद द्वारा वर्णित नारी समस्त भारतीय समाज और साहित्य का गौरव बनी। ''नारी तुम केवल श्रद्धा हो, पीयूष श्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में।'' निश्चय ही पुरुष ने नारी की पूजा भी की है और उसके लिए बड़े से बड़े त्याग भी किए हैं। पर आधुनिक नारी को इस एकाग्र आस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए। वह अब और दीवारों पर टंगी तस्बारों सी चुप नही रह सकती , सुन्दर सजी गुड़िया बनकर जीते-जीते ऊब चुकी है वह। खोखले पुरुषत्व का शून्य उसे दिखाई देने लगा है। '' तुम इतने रीते से, बीते से, चटकती धूप के निर्वीकार उजीते से, अपने व्यक्तित्व को मुझमें उड़ेल देना चाहते हो/ मैं कैसे जानूँ यह बड़ा सा शून्य तुम्हारा स्वभाव है या अभाव।''(ममता कालिया)।

परन्तु राजा और रानी दोनों में से एक भी अनुपस्थित हो तो न तो कोई कहानी बनती है , ना ही जीवन। नर और नारी, दोनों को ही  समस्त आपसी अभाव और विषमताओं को भूलकर एक दूसरे को अपनाना होगा। वैसे भी नारी की महत्ता को तो नर और नारायण सभी जानते हैं, शायद यही वजह है कि मां के आगे प्रकृति ने शिशु को नतमस्तक ही भेजा है और शिव भी परमत्व अर्धनारीशवर रूप में ही पा सके हैं। अपने वात्सल्यपूर्ण हृदय और सृजनात्मक क्षमता के संग नारी बहु कल्याणी है और सहज रूप से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में योगदान का सामर्थ रखती है। अनसूइया की तरह गंगा बहाकर ला सकती है। सावित्री बन मृत-पति सत्यवान को पुन: जीवन दिला सकती है। वह तो झांसी की रानी की तरह शूर वीरा है और उर्मिला व सुमित्रा सी त्याग-मूर्ति है। मदर टेरेसा की तरह दीन-हीनों की मां बनना जानती है। राजनीति, समाज-सेवा, साहित्य, हर क्षेत्र में उसने नेतृत्व किया है। इतिहास इसका साक्षी है। सरस्वती, दुर्गा, काली, सीता, राधा, शारदा, शैव्या जैसी देवियां आजभी हमारे बीच में ही रहती हैं। जरूरत है उनके सात्विक गुणों को उभारने की। जरूरत है उस साहसी जन-समुदाय की, जो एक प्रज्वलित प्रकाश-पुंज-सी दीप्त नारी को मशाल की तरह हाथ में उठाकर पथ को उजागर करने की क्षमता रखता हो। कोई स्वयं को जला ले तो यह अग्नि का दोष नहीं होता। त्रसित, क्षुब्ध नारी, क्षुब्ध अग्नि की तरह सिर्फ कलुषित धूमिल रेखा ही है, यह सच नहीं। उसके अंश-अंश में बसी सौंदर्य और कल्याण की चिनगारियां भला कब और कौन बुझा पाया है!

Mock me not

As a weaker sex

I will rise again and again

From my own ashes

Like the Phoenix

But who gave this

Woe to my name

In this man dominate world

Yes, I'm the wo(e)man

Power absolute.

King maker.

Not a mere king!

(extract from Woman by Shail Agrawal)

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                                                                                                                                       कविता धरोहर


                                                                                                                                          महादेवी वर्मा

मैं नीर भरी दुख की बदली!

क्रंदन में आहत विश्व हंसा,

नयनों में दीपक से जलते,

पलकों में निर्झरणी मचली

मेरा पग पग संगीत भरा,

श्वासों में स्वप्न पराग भरा,

नभ के नवरंग बनते दुकूल,

छाया में मलय बयार पली!

 

मैं क्षितिज पर घिर धूमिल,

चिंता का भार बनी अविरल,

रजकण पर जलकण हो बरसी,

नव जीवन अंकुर बन निकली!

 

पथ न मलिन करता आना,

पद चिन्ह न दे जाता जाना,

सुधि मेरे आगम की जग में,

सुख की सिहरन हो अंत खिली!

 

विस्तृत नभ का कोई कोना,

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना इतिहास यही,

उमड़ी कल थी मिट आज चली!  


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                                                                                                                                कविता आज और अभी


माँ

 

क्या सूरत क्या सीरत थी

माँ ममता की मूरत थी

 

पाँव छुए और काम हुए

अम्माँ एक महूरत थी

 

बस्ती भर के दु:ख-सुख में

मां एक अहम ज़रूरत थी

 

सच कहते हैं माँ हमको

तेरी बहुत ज़रूरत थी

 मंगल नसीम 

  

 

मुक्त किया



 जाओ बेटे,

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

मैने ही नही,

हर माँ ने अपने बेटे को मुक्त कर दिया।

 

तुम्हे बाँध लिया था

मैने अपने आँचल में।

लेकिन बँध गई मैं

अपने ही बंधन में।

तुमने रेशमी डोर तोड़कर

स्वयं को स्वतंत्र कर लिया,

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 

तुम तो अतिथि थे मेरे,

अपना बसेरा बनाने से पूर्व

आश्रय लेने मेरे घर आए थे।

मैने ही घर की दीवारों पर,

तुम्हारा नाम लिख दिया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 

अपने अंक में भरकर,

तुम्हे अपना मान बैठी।

तुम्हारे सपनों पर,

अपना अधिकार जमा बैठी।

तुमने ही तो मुझे,

स्वयं को स्वयं से अलग करना सिखलाया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 

तुम्हारी अंगुली पकड़कर,

जिस राह पर चलना सिखलाया।

वह तो पगडंडी थी,

तुम्हे मुख्य मार्ग तक ले जाने वाली 

 उसी दोराहे पर आकर,

तुमने मेरा हाथ छुड़ाकर अपना रास्ता अपना लिया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 ईश्वर द्वारा नियुक्त

मैं धाय थी तुम्हारी,

जिसका दायित्व आज पूर्ण हुआ।

हे मेरी अनमोल निधि,

मैने तुम्हे आज जगत के हवाले कर दिया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।।

 रेणु 'राजवंशी' गुप्ता 

 

** 

मां

द्वार पर बिछी हुई

मां के माथे की शिकन

प्रतिरात कुचली जाती है

मेरे पांवों तले,

न वह छोड़ती है

प्रतीक्षा करना

न मैं कभी आता हूँ समय से पहले

पद्मेश गुप्त

 

*

 एक प्रश्न

यह जो भाई हमारे हैं

तेरी आँखों के तारे हैं

मैं कौन हूँ माँ

मेरा तुम्हारा रिश्ता क्या है?

बूढ़ी माँ के छुर्रियों वाले हाथों ने

मेरा सर सहलाया

मुझे बतलाया----

'' तू मेरा हृदय है बेटी

तेरे ही सहारे

मैने हर सुख-दुख

यह जीवन जिया है।

साँसों के इस रिश्ते को

समझ ले मेरी लाडली

मैने तुझे और तूने मुझे रोज ही

एक नया जन्म दिया है।''

 शैल अग्रवाल


मां

पूछा जब सूरज ने

घास के तिनके से

सूख सूख कैसे तू हरियाता है

इतनी ज्वाला सह जाता है

बोला वह हंसकर

बैठा हूँ मां की गोद में।

शैल अग्रवाल

(मातृ दिवस विशेष)

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                                                                                                                                         कहानी-धरोहर


अनुपमा का प्रेम

        -शरदचन्द्र

ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा '' वह एक माधवी लता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढृ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु गृहण करने से पूर्व सहयोगी को भी आवश्यकता होती है। यहीं आकर माधवीलता कुछ विपत्ति में पड़ गई। नवीन नीरोदकान्त को वह किस तरह जताए कि वह उसकी माधवीलता है, विकसित होने के लिए खड़ी हुई है, उसे आश्रय न देने पर इसी समय मंजरियों के पुष्पों के साथ वह पृथ्वी पर लोटती-पोटती प्राण त्याग देगी।

परन्तु सहयोगी उसे न जान सका। न जानने पर भी अनुमान का प्रेम उत्तरोत्तर वृद्धि पाने लगा। अमृत में विष, सुख में दु:ख, प्रणय में विच्छेद चिर प्रसिद्ध हैं। दो-चार दिन में ही अनुपमा विरह-व्यथा से जर्जर शरीर होकर मन-ही-मन बोली, '' स्वामी, तुम मुझे गृहण करो या न करो, बदले में प्यार दो या न दो, मैं तुम्हारी चिर दासी हूँ। प्राण चले जाएं यह स्वीकार है, परन्तु तुम्हे किसी भी प्रकार नही छोड़ूंगी। इस जन्म में न पा सकूँ तो अगले जन्म में अवश्य पाऊंगी, तब देखोगे सती-साध्वी की क्षूब्द भुजाओं में कितना बल है।'' अनुपमा बड़े आदमी की लड़की है, घर से संलग्न बगीचा भी है, मनोरम सरोवर भी है, वहां चांद भी उठता है, कमल भी खिलते है, कोयल भी गीत गाती है, भौंरे भी गुंजारते हैं, यहां पर वह घूमती फिरती विरह व्यथा का अनुभव करने लगी। सिर के बाल खोलकर, अलंकार उतार फेंके, शरीर में धूलि मलकर प्रेम-योगिनी बन, कभी सरोवर के जल में अपना मुंह देखने लगी, कभी आंखों से पानी बहाती हुई गुलाब के फूल को चूमने लगी, कभी आंचल बिछाकर वृक्ष के नीचे सोती हुई हाय की हुताशन और दीर्घ श्वास छोड़ने लगी, भोजन में रुचि नही रही, शयन की इच्छा नहीं, साज-सज्जा से बड़ा वैराग्य हो गया, कहानी किस्सों की भांति विरक्ति हो आई, अनुपमा दिन-प्रतिदिन सूखने लगी, देख सुनकर अनु की माता को मन-ही-मन चिन्ता होने लगी, एक ही तो लड़की है, उसे भी यह क्या हो गया ? पूछने पर वह जो कहती, उसे कोई भी समझ नही पाता, ओठों की बात ओठों पे  रह जाती। अनु की माता फिर एक दिन जगबन्धु बाबू से बोली, ''अजी, एक बार क्या ध्यान से नही देखोगे? तुम्हारी एक ही लड़की है, यह जैसे बिना इलाज के मरी जा रही है।''

जगबन्धु बाबू चकित होकर बोले, '' क्या हुआ उसे?'' 

'' सो कुछ नही जानती। डॉक्टर आया था, देख-सुनकर बोला, '' बीमारी-वीमारी कुछ नही है।''  

'' तब ऐसी क्यों हुई जा रही है?'' जगबन्धु बाबू विरक्त होते हुए बोले, '' फिर हम किस तरह जानें?''

  '' तो मेरी लड़की मर ही जाए?''

'' यह तो बड़ी कठिन बात है। ज्वर नहीं, खांसी नहीं, बिना बात के ही यदि मर जाए, तो मैं किस तरह से बचाए रहूंगा?'' गृहिणी सूखे मुँह से बड़ी बहू के पास लौटकर बोली, '' बहू, मेरी अनु इस तरह से क्यों घूमती रहती है?''

'' किस तरह जानूं मां?''

'' तुमसे क्या कुछ भी नही कहती?''

'' कुछ नहीं।''

गृहिणी प्राय: रो पड़ी, '' तब क्या होगा?'' बिना खाए, बिना सोए, इस तरह सारे दिन बगीचे में कितने दिन घूमती-फिरती रहेगी, और कितने दिन बचेगी? तुम लोग उसे किसी भी तरह समझाओ, नहीं तो मैं बगीचे के तालाब में किसी दिन डूब मरूँगी।''

बड़ी बहू कुछ देर सोचकर चिन्तित होती हुई बोली, '' देख-सुनकर कहीं विवाह कर दो; गृहस्थी का बोझ पड़ने पर अपने आप सब ठीक हो जाएगा।''

'' ठीक बात है, तो आज ही यह बात मैं पति को बताऊंगी।''

पति यह बात सुनकर थोड़ा हंसते हुए बोले, '' कालिकाल है! कर दो, व्याह करके ही देखो, यदि ठीक हो जाए।'' 

दूसरे दिन घटक आया। अनुपमा बड़े आदमियों की लड़की है, उस पर सुन्दरी भी है; वर के लिए चिन्ता नही करनी पड़ी। एक सप्ताह के भीतर ही घटक महाराज ने वर निश्चित करके जगबन्धु बाबू को समाचार दिया। पति ने यह बात पत्नी को बताई। पत्नी ने बड़ी बहू को बताई, क्रमश: अनुपमा ने भी सुनी।दो-एक दिन बाद, एक दिन सब दोपहर के समय सब मिलकर अनुपमा के विवाह की बातें कर रहे थे। इसी समय वह खुवे बाल, अस्त-व्यस्त वस्त्र किए, एक सूखे गुलाब के फूल को हाथ में लिये चित्र की भांति आ खड़ी हुई। अनु की माता कन्या को देखकर तनिक हंसती हुई बोली, '' व्याह हो जाने पर यह सब कहीं अन्यत्र चला जाएगा। दो एक लड़का लड़की होने पर तो कोई बात ही नही !'' अनुपमा चित्र- लिखित की भांति सब बातें सुनने लगी। बहू ने फिर कहा, '' मां, ननदानी के विवाह का दिन कब निश्चित हुआ है?''

'' दिन अभी कोई निश्चित नही हुआ।''

'' ननदोई जी क्या पढ़ रहे हैं?''

'' इस बार बी. ए. की परीक्षा देंगे।''  

  '' तब तो बहुत अच्छा वर है।'' इसके बाद थोड़ा हंसकर मज़ाक करती हुई बोली, परन्तु देखने में खूब अच्छा न हुआ, तो हमारी ननद जी को पसंद नही आएगा।''

'' क्यों पसंद नही आएगा? मेरा जमाई तो देखने में खूब अच्छा है।''

इस बार अनुपमा ने कुछ गर्दन घुमाई, थोड़ा सा हिलकर पांव के नख से मिट्टी खोदने की भांति लंगड़ाती लंगड़ाती बोली, '' विवाह मैं नही करूंगी।'' मां ने अच्छी तरह न सुन पाने के कारण पूछा, '' क्या है बेटी?'' बड़ी बहू ने अनुपमा की बात सुन ली थी। खूब जोर से हंसते हए बोली, '' ननद जी कहती हैं, वे कभी विवाह नही करेंगी।''

'' विवाह नही करेगी?''

'' नही।''

'' न करे? '' अनु की माता मुंह बनाकर कुछ हंसती हुई चली गई। गृहिणी के चले जाने पर बड़ी बहू बोली,'' तुम विवाह नही करोगी?''

अनुपमा पर्ववत गम्भीर मुंह किए बोली,'' किसी प्रकार भी नहीं।''

''क्यों?''

''चाहै जिसे हाथ पकड़ा देने का नाम ही विवाह नहीं है। मन का मिलन न होने पर विवाह करना भूल है !'' बड़ी बहू चकित होकर अनुपमा के मुंह की ओर देखती हुई बोली, '' हाथ पकड़ा देना क्या बात होती है? पकड़ा नहीं देंगे तो क्या ल़ड़कियां स्वयं ही देख-सुनकर पसंद करने के बाद विवाह करेंगी?''

''अवश्य!''

''तब तो तुम्हारे मत के अनुसार, मेरा विवाह भी एक तरह क भूल हो गया? विवाह के पहले तो तुम्हारे भाई का नाम तक मैने नही सुना था। ''

'' सभी क्या तुम्हारी ही भांति हैं?''

बहू एक बार फिर हंसकर बोली, '' तब क्या तुम्हारे मन का कोई आदमी मिल गया है?'' अनुपमा बड़ी बहू के हास्य-विद्रूप से चिढ़कर अपने मुंह को चौगुना गम्भीर करती हुई बोली, ''भाभी मज़ाक क्यों कर रही हो, यह क्या मज़ाक का समय है?''

''क्यों क्या हो गया?''

'' क्या हो गया? तो सुनो---'' अनुपमा को लगा, उसके सामने ही उसके पति का वध किया जा रहा है, अचानक कतलू खां के किले में, वध के मंच के सामने खड़े हुए विमला और वीरेन्द्र सिंह का दृश्य उसके मन में जग उठा, अनुपमा ने सोचा, वे लोग जैसा कर सकते हैं, वैसा क्या वह नही कर सकती? सती स्त्री संसार में किसका भय करती है? देखते देखते उसकी आंखें अनैसर्गिक प्रभा से धक्-धक् करके जल उठीं, देखते देखते उसने आंचल को कमर में लपेटकर कमरबन्द बांध लिया। यह दृश्य देखकर बहू तीन हाथ पीछे हट गई। क्षणभर में अनुपमा बगल वाले पलंग के पाये को जकड़कर, आंखें ऊपर उठाकर, चीत्कार करती हुई कहने लगी, '' प्रभु, स्वामी, प्राणनाथ! संसार के सामने आज मैं मुक्त-कण्ठ से चीत्कार करती हूँ, तुम्ही मेरे प्राणनाथ हो! प्रभु तुम मेरे हो, मैं तुम्हारी हूँ। यह खाट के पाए नहीं, ये तुम्हारे दोनों चरण हैं, मैने धर्म को साक्षी करके तुम्हे पतिरूप में वरण किया है, इस समय भी तुम्हारे चरणों को स्पर्श करती हुई कह रही हूं,'' इस संसार में तुम्हें छोड़कर अन्य कोई भी पुरुष मुझे स्पर्श नहीं कर सकता। किसमें शक्ति है कि प्राण रहते हमें अलग कर सके। अरी मां, जगत जननी---!''

बड़ी बहू चीत्कार करती हुई दौड़ती बाहर आ पड़ी, ''अरे, देखते हो, ननदरानी कैसा ढंग अपना रही हैं।'' देखते-देखते गृहिणी भी दौड़ी आई। बहूरानी का चीत्कार बाहर तक जा पहुंचा था,'' क्या हुआ, क्या हुआ, क्या हो गया?'' कहते गृहस्वामी और उनके पुत्र चन्द्रबाबू भी दौड़े आए। कर्ता-गृहिणी, पुत्र, पुत्रवधू और दास दासियों से क्षणभर में घर में भीड़ हो गई। अनुपमा मूर्छित होकर खाट के समीप पड़ी हुई थी। गृहिणी रो उठी, '' मेरी अनु को क्या हो गया? डॉक्टर को बुलाओ, पानी लाओ, हवा करो,'' इत्यादि। इस चीत्कार से आधे पड़ौसी घर में जमा हो गए।

बहुत देर बाद आंखें खोलकर अनुपमा धीरे धीरे बोली, ''मैं कहां हूं?'' उसकी मां उसके पास मुंह लाती हुई स्नेहपूर्वक बोली,''कैसी हो बेटी? तुम मेरी गोदी में लेटी हो।''

अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़ती हुई धीरे धीरे बोली,'' ओह तुम्हारी गोदी में? मैं समझ रही थी, कहीं अन्यत्र स्वप्न नाट्य में उनके साथ बही जा रही थी?'' पीड़ा-विगलित अश्रु उसके कपोलों पर बहने लगे।

माता उन्हें पोंछती हुई कातर स्वर में बोली, ''क्यों रो रही हो बेटी?''

अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़कर चुप रह गई। बड़ी बहू चन्द्रबाबू को एक ओर बुलाकर बोली, ''सबको जाने को कह दो, ननदरानी ठीक हो गई हैं।'' क्रमश: सब लोग चले गए।

रात को बहू अनुपमा के पास बैठकर बोली, ''ननदरानी, किसके साथ विवाह होने पर तुम सुखी होओगी ?'' अनुपमा आंखें बन्द करके बो

ली, '' सुख दु:ख मुझे कुछ नही है, वही मेरे स्वामी हैं---''  

'' सो तो मैं समझती हूँ, परन्तु वे कौन हैं?''

'' सुरेश! मेरे सुरेश---''

'' सुरेश ! राखाल मजमूदार के लड़के ?''

''हां, वे ही। ''

 रात में ही गृहिणी ने यह बात सुनी। दूसरे दिन सबेरे ही मजमूदार के घर जा उपस्थित हुई। बहुत सी बातों के बाद सुरेश की माता से बोली, '' अपने लड़के के साथ मेरी लड़की का विवाह कर लो।'' सुरेश की माता हंसती हुई बोलीं '' बुरा क्या है?''

'' बुरे-भले की बात नहीं, विवाह करना ही होगा!''

'' तो सुरेश से एक बार पूछ आऊं। वह घर में ही है, उसकी सम्मति होने पर पति को असहमति नही होगी।'' सुरेश उस समय घर में रहकर बी.ए. की परीक्षा की तैयारी कर रहा था, एक क्षण उसके लिए एक वर्ष के समान था। उसकी मां ने विवाह की बात कही, मगर उसके कान में भी नही पड़ी। गृहिणी ने फिर कहा, ''सुरो, तुझे विवाह करना होगा।'' सुरेश मुंह उठाकर बोला, '' वह तो होगा ही! परन्तु अभी क्यों? पढ़ने के समय यह बातें अच्छी नहीं लगतीं।'' गृहिणी अप्रतिभ होकर बोली '' नहीं नहीं, पढ़ने के समय क्यों? परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह होगा।''

''कहां?''

'' इसी गांव में जगबन्धु बाबू की लड़की के साथ।''

'' क्या? चन्द्र की बहन के साथ ? जिसे मैं बच्ची कहकर पुकारता हूं?'' 

'' बच्ची कहकर क्यों पुकारेगा, उसका नाम अनुपमा है।''  

 सुरेश थोड़ा हंसकर बोला, '' हां अनुपमा! दुर वह?, दुर, वह तो बड़ी कुत्सित है!''

'' कुत्सित कैसे हो जाएगी? वह तो देखने में अच्छी है!''

'' भले ही देखने में अच्छी! एक ही जगह ससुराल और पिता का घर होना, मुझे अच्छा नही लगता।''

 '' क्यों? उसमें और क्या दोष है ?''

 ''दोष की बात का कोई मतलब नहीं! तुम इस समय जाओ मां, मैं थोड़ा पढ़ लूं, इस समय कुछ भी नहीं होगा!'' 

सुरेश की माता लौट आकर बोलीं, '' सुरो तो एक ही गांव में किसी प्रकार बी विवाह नही करना चाहता।'' 

'' क्यों?''

'' सो तो नही जानती!''

अनु की माता, मजमूदार की गृहिणी का हाथ पकड़कर कातर भाव से बोलीं, '' यह नही होगा बहन! यह विवाह तुम्हे करना ही पड़ेगा।''

'' लड़का तैयार नहीं है; मैं क्या करूं, बताओ?'' 

'' न होने पर भी मैं किसी तरह नहीं छोड़ूंगी।'' 

 '' तो आज ठहरो, कल फिर एक बार समझा देखूंगी, यदि सहमत कर सकी।'' ---

 अनु की माता घर लौटकर जगबन्धु बाबू से बोलीं,''उनके सुरेश के साथ हमारी अनुपमा का जिस तरह विवाह हो सके, वह करो!''

 ''पर क्यों, बताओ तो? राम गांव में तो एक तरह से सब निश्चिन्त हो चुका है! उस संबन्ध को तोड़ दें क्या?'' 

'' कारण है।''

'' क्या कारण है?''  

'' कारण कुछ नहीं, परन्तु सुरेश जैसा रूप-गुण-सम्पन्न लड़का हमें कहां मिल सकता है? फिर, मेरी एक ही तो लड़की है, उसे दूर नहीं ब्याहूंगी। सुरेश के साथ ब्याह होने पर, जब चाहूंगी, तब उसे देख सकूंगी।''

''अच्छा प्रयत्न करूँगा।''

'' प्रयत्न नहीं, निश्चित रूप से करना होगा।'' पति नथ का हिलना डुलना देखकर हंस पड़े। बोले,'' यही होगा जी।''

संध्या के समय पति मजमूदार के घर से लौट आकर गृहिणी से बोले, ''वहां विवाह नही होगा।---मैं क्या करूं बताओ उनके तैयार न होने पर मैं जबर्दस्ती तो उन लोगों के घर में लड़की को नहीं फेंक आऊंगा!''

'' करेंगे क्यों नहीं?''

'' एक ही गांव में विवाह करने का उनका विचार नहीं है।''

गृहिणी अपने मष्तिष्क पर हाथ मारती हुई बोली, ''मेरे ही भाग्य का दोष है।''

दूसरे दिन वह फिर सुरेश की मां के पास जाकर बोली, '' दीदी, विवाह कर लो।''

''मेरी भी इच्छा है; परन्तु लड़का किस तरह तैयार हो?''

'' मैं छिपाकर सुरेश को और भी पांच हजार रुपये दूंगी।''

रुपयों का लोभ बड़ा प्रबल होता है। सुरेश की मां ने यह बात सुरेस के पिता को जताई। पति ने सुरेश को बुलाकर कहा, ''सुरेश, तुम्हे यह विवाह करना ही होगा।''

''क्यों''

''क्यों, फिर क्यों? इस विवाह में तुम्हारी मां का मत ही मेरा भी मत है, साथ-ही-साथ एक कारण भी हो गया है।'' 

सुरेश सिर नीचा किए बोला, ''यह पढ़ने लिखने का समय है, परीक्षा की हानि होगी।''

''उसे मैं जानता हूँ बेटा! पढ़ाई लिखाई की हानि करने के लिए तुमसे नही कह रहा हूं। परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह करो।''  

 '' जो आज्ञा!''

 अनुपमा की माता की आनन्द की सीमा न रही। फौरन यह बात उन्होंने पति से कही। मन के आनन्द के कारण दास दासी सभी को यह बात बताई। ब़ड़ी बहू ने अनुपमा को बुलाकर कहा, '' यह लो! तुम्हारे मन चाहे वर को पकड़ लिया है।''

अनुपमा लज्जापूर्वक थोड़ा हंसती हुई बोली, '' यह तो मैं जानती थी! ''

 '' किस तरह जाना? चिट्ठी पत्री चलती थी क्या?''

 '' प्रेम अन्तर्यामी है! हमारी चिठ्ठी पत्री हृदय में चला करती है।''

 '' धन्य हो, तुम जैसी लड़की!''

 अनुपमा के चले जाने पर बड़ी बहू ने धीरे धीरे मानो अपने आप से कहा,

''देख-सुनकर शरीर जलने लगता है। मैं तीन बच्चों की मां हूँ, और यह आज मुझे प्रेम सिखाने आई है। ''


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                                                                                                                           चांद परियां और तितली







बच्चों,

चाँद परियाँ और तितली नाम के इस स्तंभ में हम आपके लिए इसबार दो कविता और  पंचतंत्र से एक कहानी लेकर आए हैं। भविष्य में और भी नए नए स्तंभ आपकी पसंदानुसार लाएंगे। आप यहाँ जो भी पढ़ना या देखना चाहते है, उसके बारे में लिखें, आपके सुझाव और फरमाइशों का हमें इन्तजार रहेगा।

 

   
1)

 आम और कबूतर

आ से आम और क से कबूतर

बोले एक दिन पन्नों के अन्दर

चलो उड़ें आकाश में हम

देखें चन्दा और सूरज के घर

आम छुपा चन्दा पर जाकर

थके कबूतर के टूटे पर

मुन्ना ढूँढे अब पलटके पन्ने

ब से बिल्ली और ख से खरगोश

उछलेंगे जो घास पे आकर

खेलेगा वह हंस-हंसकर।

 शैल अग्रवाल*



2) 

बिल्ली मासी

बिल्ली मासी बिल्ली मासी

घूमी आज फिर तुम मनमानी

कभी छतपर तो कभी पेड़पर

देखे जाकर चंदा मामा और

फूलों पर उड़ती तितली रानी

डराया क्या पर चूहो को भी

कुतर किताब फाड़के चुन्नी

करता जो हमसे शैतानी ?



 शैल अग्रवाल

 


कहानी

जंगल का राजा शेर ( पंचतंत्र की कहानियों पर )

 हुत दिन पहले की बात है जंगल का राजा शेर था--एक ऐसा शेर जो घमंडी और क्रूर था और अपनी प्रजा को बहुत सताता था उसका हुक्म था कि हर दिन एक जानवर खुद ही उसके पास आए, जिसे वह मारकर खा जाया करता था। सारे जानवर बहुत परेशान थे पर फिर भी डर के मारे एकएक करके हर रोज ही उसके पास पहुँच जाते थे और चुपचाप उसका शिकार भी बन जाते थे। पर जब चालाक लोमड़ी की बारी आई तो वह दिनभर आराम से सोती रही और जब शाम हो गई तब भी बहुत ही आराम से उठी और जानबूझकर बहुत ही धीरे धीरे चलकर शेर के आगे जा पहुँची। भूखा शेर उसे देखते ही गुस्से में दहाड़ा, इतनी देर कैसे कर दी, जानती नही कि मैं सुबह से ही भूखा हूँ?

लोमड़ी हाथ जोड़कर बोली, जानती हूँ महाराज, जानती हूँ। और मैं तो सुबह ही आपके पास पहुँच भी जाती पर क्या करूँ रास्ते में उस बब्बर शेर ने जो रोक लिया मुझे। कहने लगा,  अब मैं ही तुम्हारा राजा हूँ। तुम सबको बस मेरी ही बात माननी चाहिए, क्योंकि तुम्हारा वह राजा तो अब बिल्कुल ही बूढ़ा और बेकार हो चुका है। बड़ी मुश्किल से जान छुड़ाकर आपतक पहुँच पाई हूँ। इसी चक्कर में तो शाम हो गई। शेर का गुस्सा अब काबू से बाहर था। ऐसा कहा उसने--यह बहरूपिया कौन है जो मेरे राज्य में घुसपैठ कर बैठा है, मुझे अभी उसके पास ले चलो? तुरंत ही चल पड़े वे दोनों (गुस्से में अंधा शेर और चालाक लोमड़ी) इस नए शेर को ढूँढने। अब आगे आगे लोमड़ी और पीछे पीछे शेर। सारा जंगल छानने के बाद पास ही के कुँए के आगे जाकर लोमड़ी रुकगई और बोली, महाराज देखिए यहींपर रहता है वह बदमाश शेर। शेर ने कुँए में झाँककर देखा तो अपनी परछाँई को दूसरा शेर समझकर गुस्से में दहाड़ा। परछांई भी जब उसपर वापस दहाड़ी तो शेर पूरी तरह से गुस्से से बेकाबू हो गया और अपना सारा विवेक खो बैठा और बिना सोचे समझे ही, दुश्मन को खतम करने के इरादे से कुँए में कूद भी गया। और तब शेर को मरने के लिए वहीं कुँए के अन्दर छोड़कर चालाक लोमड़ी वापस जंगल में लौट गई और सब जानवरों को बता दिया कि अब किसी को भी शेर से डरने या उसके पास जाने की जरूरत नहीं, क्योंकि शेर नही रहा। इस तरह से अपनी बुद्धि के बल पर शेर से कम ताकतवर होते हुए भी उसने ना सिर्फ खुदको, बल्कि जंगल के बाकी सभी जानवरों को भी शेर के पंजों से छुड़ा दिया।    

                                                                                                                       शैल अग्रवाल
 

      

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                                                                                                                                       My Column.



 They burnt their bras and broke free from all sorts of shackles and slavery. there was a big outcry and upheaval when women demanded their rights and equality in early 19'th century.  But that was then, today women have established themselves in each and every power corridor. They are successfully running not only their own households but countries. Seated in shops offices and parliaments, they are changing the thinking of society world-wide.Truelly they are now a force to reckon with. 17'th march is recognised as an International Women's day. Bringing out first issue of Lekhni on this day may suggest that it believes in all sorts of 'isms' , but truth is far from it. ---a voice against any sort of social unjustice---yes! But not the one for power struggle! One is most child like and helpless when one wants to exert power--be it a man, woman or even an e.magjine. Anyway word exert implies resistence and true power comes from within----trust and understanding oneself and his surroundings..  heritage and culture---joy and sorrow---.so to you all, with much love--- your very own 'lekhni' with its first issue---on this very special mother's day! 

                                                                                                                    -shail Agrawal.

 

 
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                                                                                                              favourites Forever


Warning


When I am an old woman I shall wear purple

With a red hat which doesn't go, and doesn't suit me,

And I shall spend my pension on brandy and summer gloves 

And say we've no money for butter.

I shall sit down on the pavement when I'm tired

And gobble up samples in shops and press alarm bells

And run my stick along the public railings

And make up for the sobriety of my youth.

I shall go out in my slippers in the rain

And pick the flowers in other peoples gardens

And learn to spit.

 

You can wear terrible shirts and grow more fat

And eat three pounds of sausage at a go

Or only bread and pickle for a week

And hoard pens and pencils and beermats and things in boxes.

 

But now we must have clothes that keep us dry

And pay our rent and not swear in the street

And set a good example for the children.

We must have friends to dinner and read the papers.

 

But maybe I ought to practice a little now?

So people who know me are not too shocked and surprised

When suddenly I am old, and start to wear purple.

Jenny Joseph.



 

  


An Ordinary Women


Let me tell you something of myself.

I was then rather young,

Someone was touched by the grace of the green age.

That knowledge used to send

A thrill through my body.

I forgot, I am rather ordinary.

There are thousands and thousands of women

Very much like me,

Those who have only the magic of youthfulness

To show for their youth

 

I beg of you,

Write a story about an ordinary women.

She is long suffering.

If within the depth of her nature

Something uncommon does lie burried.

How would she prove it?

How many are there, who could even come to know it;

Most people's eye are open only to the magic of age,

Their minds do not thurst for truth.

Rabindra Nath Tagore


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                                                                                                                   Here and Now

Witch 


 


The witch lived down our street

They all said she was, so it was true

--And I believed it more than anyone

(being the youngest).

Her house was dark, the curtains never pulled 

And every time I passed it

I knew she was castung spells just then

Because a nasty feeling ran my back.

I knew she was watching.

She had a cat as well, which sat and looked.

It wasn't like other cats, who wandered up

And rubbed arround and purred and went away.

This one sat and looked.

It looked right through you, thinking--

And then it went indoors to tell her.

(It didn't run, it turned and walked away,

Tail up, no looking back:

Down the alley, up the steps, to her door--

Which always opened just as it arrived

And closed again as soon as it was through.

Once they dared me to go and knock.

As I reached for the bell, the door opened.

I could see her white smile in the gloom.

'' I've come to-----------''

'' Yes, I know, she said,'' come in.''

I didn't

I ran away.

What was she waiting for?

The voice of a child once again, perhaps,

Brightly, chattering in her kitchen?

An old lady with her cat.

 

Martin Underwood 

 

 



Departure


Gently cusping my face

In her old wrinkled hands
She kissed lovingly again and again

On my forehead and red hot cheeks.

“Do not cry my precious,

It breaks my heart to see these tears.

Take care of yourself and yours.

Come back soon.

I will only be here

sitting in the same place, alive and well

waiting for you, you know where

When you come next time.”

 

Wiping those tears she spoke

in a soft far away voice.

I felt proud and content in her silky soothing touch.

And warm loving eyes.

For I was her entire world

From the beginning right to the end

Each day and evry night .

Searching aimlessly in my bag

I managed to say goodbye.

Yes, I did not have the courage

to look in those tearful eyes.

 

Feeling mean and selfish

I dragged myself towards the door.

Suddenly the big airport corridors opened wide

swallowing everything familiar and mine.

A choking pain shot upward inside

leaving me weak and void.

Shaking knees refused to support.

Gasping for air, I held the nearby wall.

Slowly, a realisation was dawning

No, there will not be any more next time.

 

Held back tears ran riot

drenching me from head to toe.

“Passport please,” an officer asked,

“Is this your first time ever.”

“No, not really.” clearing my throat,

I mumbled the meaningless words. 

Shail Agrawal 

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                                                                                                             Story-Here & Now 


                                                                                                             by; Shail Agrawal

   

                                                                                                                                      

Good Morning Mrs Singh.




I said “ Good morning Mrs. Singh.---”

But there was no response. That woman lying in front of me , was just a heap of bones ---I felt scared even to turn her over --forget about washing or changing ---in-case she falls apart---in-case she just crumbles in my hands like a dry- dead flower head----

I should have understood it all first thing in the morning, when Barbara rang ---”  Please Shai help us, There is an Indian women here in our crisis centre, who hasn’t eaten anything for a week now. She hasn’t even washed or brushed for the whole of a week-----doesn’t talk to anyone---doesn’t let anyone come near her.----just sits at one place ,gazing at her toe nails or sits  with her eyes closed--- all withdrawn within----We all are very worried for her.

Perhaps you can do something for her----perhaps she doesn’t understand English language-- may be she will be less withdrawn to an Indian lady and you might really help her---- -"

' Perhaps I might!'----I thought and sighed!

It wasn’t  just the question of a language- or communication gap---it was something much more deep-rooted ---looks like she didn’t have a will to live anymore, any interest in herself or in her surroundings . I was lost for words ----how can someone call one back from that land of the dead..!

 Just by looking at her it was difficult to tell whether she was sleeping or awake---conscious or unconscious; but one thing was clear that she has cut herself off from this world and wasn’t bothered , when and what happens to her now.

Air in the room was heavy and suffocating. There was a definite stink of death and decay. It was difficult to breath --I opened the curtains and windows first---We both needed some fresh air badly.

There was a slight movement now in that heap of a dirty and crumbled sari and those bony legs silently folded themselves up towards her chest.

I unfolded that untouched, unslept blanket and gently covered her cold and frail body. That blanket started to heave now with her each tiny sob-- So she wasn’t unconscious after all---gathering all my strength I  put my hands on her shoulder.--

“Perhaps I can help you if you let me--- share your pain.”

There was no reply. Even the sobs subsided now.

I just sat by her side stroking her dry uncombed hair. She needed her own time---it is not easy to open up, when one is so knotted inside. ---I tried once again--

 “Where do you come from?”

“ Abbergavani ”

Her voice was hoarse and sad as if she has been just crying and crying all this time. ---or really never spoke at all.

“No, I’m not talking about this country---I’m asking about back home--Where You originally came from?”

I tried to reach her a bit more.

I don’t know whether it was the world ‘back-home ‘or my gentle caring touch, she opened her eyes and was looking at me now---a most beautiful round face and big brown eyes. She was so beautiful!

“What is your name?”

“kanak Lata! I’m from Bhagalpur Bihar.”

Her English was flawless.

Now she wasn’t only listening to me but even understanding and answering . Her sindoor and bindi were the sure signs that not only she was married but her husband was alive and well. I responded with an affectionate smile-

“Where is your husband and what is his name?”

“ Harry Prasad Singh ”

“Harry Prasad” I just repeated the name in an astonishment.

Then for the first time I saw a little sparkle in her eyes-- a cheeky pink glow on her face all over----

“ Yes, you are thinking right. My in-laws called him Hari only. But once here in this country ---he told everybody that his name is Harry not Hari--All his patients call him doctor Harry only.”

“Patients---”----Both my interest and eagerness were mounting now---

“What does he do ---I mean profession-wise?”

“He is a GP here in Abbergavani, Wales.”

“Why didn’t you tell me that before that you are the wife of Dr. Singh?”

Dr Singh, that famous psychologist and a successful professional--- and his wife here--- in this condition---My brain was refusing to believe----

“No not his wife --just married to him.”-She replied hurriedly as if she has read my mind again.

“The one who shares his life and bed both is Alva only.”

“Who is this Alva?”-Now it was difficult for me to hide my interest and curiosity.

“The other-one!”-She replied  in a whispering and trembling voice.

“Why  the Other-one---why not his second wife or even a  mistress or a lover?”-I was almost intruding her thoughts. 

“Because there is no love or commitment there --No vows were taken, no promises were made----She is just an opportunist--she doesn’t give anything in that relationship ; just takes and takes---Anyway what difference it makes now---”

She left her sentence unfinished as if there was no need to tell me anymore as if she didn’t trust enough yet.

“You see they didn’t even exchanged a ring between them. It is just a pure felicity--- a simple convenient agreement. Be my employee in the day  and partner in the night and I will pay you back---be my partner in the sin for the rest of life .”

Her face was red in anger and disgust and now her sorrow was disturbing me also.

“Why didn’t you put a stop to all this or rebel ”

“Yes, I could have done that only if I was here ...allowed to.  I was  there in Motihari bringing up my son Rakesh---Waiting for those necessary papers ---passport and visa ---his sponsorship--- and dreaming day and night with open eyes about our happy life together here in England----playing a constant happy family game --.”

Then she paused for a moment and wiped her streaming tears. She showed me the photograph of a seven or eight year old healthy and beautiful boy ----which she proudly kept hidden inside her blouse closer to her bosom..

“But when my family came to know that he has got someone here and she is expecting his child too--- that is also out of wedlock ---there were tempers and abuse for him everywhere. But I calmed them down. It was the question of my son’s future . Within weeks I was here with my father-in-law.

He threatened him- ' You have married her in the presence of the whole community.  These bonds cannot be broken so easily .You got to give her rightful place in your life!'

And see I got my right-full place here in the corner of his servant-quarter---cooking and cleaning for them ----away from my family---away from my son---”wiping her tears she told me in a wry and painful tone. Her jaw and neck muscle were stiff in pain as she spoke-“This was my work ---my duty.--my door to heaven--and my father’s princess  Kanak Lata was reduced to a domestic maid only, that also on the wages of food and lodging only. But I accepted all as my fate because in return he promised to send regular money to educate and look after my son”

“He is studying in prestigious mount-view school Banglore now.”-she told me proudly, wiping her face with her palloo. 

A smile glowed her face as she remembered her growing up son

“But how all this happened?”-I wanted to know  all about those wounds and scars on her back. and her long suffering ill health..

 “Oh this,”
Her lips quivered with a tearful smile -“These were the perks of my job.”

“An everyday occurrence---Sometime when I accidentally used to drop something or was unable to do the housework because of the fever or illness or some other minor or major problem, I used to get beaten with belt shoes or whatever used to be handy or nearby. Can’t you see how thick skin I have become now and still surviving it all. ”

“It didn’t stop there-----”

She kept on talking, unstopped uninterrupted now--- as if I wasn’t there---- as if she won’t get another chance-----
“ One day I met Sheila in the supermarket while doing some shopping for their house-hold. She used to be my brother’s  class-mate in his medical school. They had come to England only few months back.--have made their house here in Abbergavani only.  They expressed their desire there and then, that they would like to pay me a friendly visit sometime soon . I couldn’t say ‘no’ to them. And they came one day and saw everything!  In his shock and mad frenzy, her husband an upright man questioned Harry about his irresponsible and unethical behavior . Even threatened him . Warned him that if he doesn’t mend his ways towards me he will take him to the court for living in sin... with two women at the same time---.which is not allowed . ..neither in law , nor in religion . It will ruin both his name and career. Told him again and again that he was a shame to such a noble profession. But that was the opening of the Pandora’s box for me. After that day, my beatings became regular and more severe. I was not allowed to go out or visit or talk to anyone and he used to lock my room in the night in case I might try to escape----One day when Sheila and her husband came uninvited to meet me  they found out how I have been...really used to live ---Their anger was out of control then. They used lot of foul words for him.. But once they left,  he was mad with rage. He  kept on kicking and punching me till I fainted.

You probably know the rest of the story. I don’t know who brought me here----and who wants to save my life ----certainly I don’t----”

Kanak was looking very tired and frail now---It's not good for her to get this excited and tired. I went and warmed some vegetable broth for her.  It took some hard persuasion from my side to let her sip those few spoons.

“You must rest now Kanak. I will come to see you tomorrow again.”

Making her comfortable in that bed I assured her gently.

“If pain goes severe take these two tablets again...no more.”

Putting water of jug and few pain-killers on her bed -side table,  I told her again.

She smiled and just said. ”bye”

“Don’t forget to ring me anytime if you feel-like or want anything.--Here is my phone number.”

She just waved this time but her eyes, in spite all those tears, were full of affection and gratitude.

I felt guilty and uncomfortable----she was so week, so vulnerable and lonely.

 * *

Phone rang again next morning.

It was Barbara again ----all in a rush and full of worry ---

“Shai come straight---It's a crisis----I will tell you all, once you are here.”

She put the phone down. Didn’t wait even for my response. I was there in that crisis centre within few minutes.

Barbara was waiting for me on the door only.

All were very worried and tense there.

She just pointed me towards Kanak’s room.

Pressing the lift’s button I just ran towards the stairs. I wasn’t going to wait anymore. -----What happened to Kanak now----She was getting so much better ---Or was she -----I ran faster---

Door was flung open---

I said, '' Good -Morning Kanak !”

--but there was no response--

Has she gone back in her depressive mood again---But she is looking so peaceful ---I turned  to inquire---

“ I’m afraid she is no more..  Passed away last night. Probably it was an overdose.. We found this on her floor.” Lee, the attendant nurse told me all in one breath.

In utter shock and horror I looked at the bottle on Lee's stretched palm. Yes, it was that same fateful medicine bottle, I gave  her last night. 

" I don't know how she got hold of this, we keep all the medicines locked, even the ordinary pain-killers a?" -Lee was all puzzled. 

' But why Kanak-why-?when things were getting  so  much better for you--- ! '- I was hopelessly confused and repeating myself again and again.

I felt very angry and very depressed  ---‘What a waste of a young life! !..Sso young and so beautiful! Everything was getting so much better for her! Just few hours back, I was thinking of training her as a nurse or helper once she gets better and comes out of her depression.  I was thinking- because she herself has gone through so much---will understand other’s pain and suffering better …Would have  made an excellent and understanding nurse. I wasn't expecting this from her! She could have started a fresh and happy life with her son--away from that monster of a man.--!’ - she looked so kind and gentle even in her sorrow---there was no trace of bitterness on her face--as if she has forgiven them all---

With a heavy heart I dragged myself back to the office.

''These are her belongings --I don’t know what to do with them--perhaps you can help----?''

Barbara handed me the photograph of her son ---and of course that sindoor she wore so proudly on her forehead all the time.---

Two things in her life she lived for-----she loved- and valued most .But the two people always away from her reach---Perhaps I’m the only friend left for her--a friend in death and misery only--What have I done to be called a friend----My thoughts turned to her son. I can’t help  KanakLata anymore, but  I should find and inform Rakesh...make sure that his education is not interrupted. Suddenly I was feeling  very close and all responsible for him.

She did tell me he was studying in mount view school Banglore and Dr. Singh was paying for him.

I rang the school. But they told me there was no boy in that school with that name--- for last ten or twelve years at least.

What a treachery--she worked like a slave for nothing. My tears were betraying my cool controlled exterior.

“ Sleep  peacefully  Kanak ----I  promise  you that I won’t let your son’s life be neglected and wasted like yours. He will get all the things in life a child should---” Wiping those tears with a steely determination, I was promising not to her( she was gone beyond these promises or betrayals) but to myself . And first thing after her funeral, I found myself busy on phone, booking a flight to India, organizing a trip to Motihari, Bihar. I was still hopeful ------!