सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर लेखनी- मार्च-अप्रैल 2011
"मन टेसू टेसू हुआ तन ये हुआ गुलाल अंखियों, अंखियों बो गया, फागुन कई सवाल।"
-दिनेश शुक्ल
( बासंती सवाल)
( अंक 49-50- वर्ष-5 )
इस अंक मेः कविता धरोहरः रमानाथ अवस्थीः। माह विशेषः कुमार अम्बुज, कृष्ण कुमार यादव । वसंतः सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, केदरनाथ अग्रवाल, महेश चन्द द्विवेदी, नीरजा द्विवेदी, रचना श्रीवास्तव। कविता आज और अभीः सुबोध श्रीवास्तव, कुसुम सिन्हा, रंजन विशदा, मुथा राकेश, देवी नागरानी । माह के कविः विजय सत्पति। बाल कविताः महावीर प्रसाद द्विवेदी।...
यह भी सुखद संयोग ही था कि बीसियों वर्ष बाद , अनजाने में ही सही, उस रागरंग भरे दृश्य का आनंद लेने, मैं काशी में सही वक्त व सही स्थान पर ही रुकी खड़ी थी। रंग-बिरंगे गुलाल भरे बादलों के बीच से उठती, वे ढोल–तांसे की मधुर और जयजयकार के साथ मिलीजुली, गूंजती हुई आवाजें और साथ में नाचती-झूमती, रुक-रुककर आगे बढ़ती भक्तों की वह टोली, पूर्णतः होली का आस्थामय समां था मेरे सामने। यातायात रुक जाए, तो रुके। शहर खड़ा हो जाए, तो खड़ा रहे, अब किसे परवाह! काशी में होली का हुड़दंग पूरे जोश-खरोश के साथ शुरू हो चुका था। कहते हैं शिवरात्रि के दिन शिव पार्वती का विवाह हुआ था और रंग-भरी एकादशी के दिन गौना। आल्हादित भक्तों की मानूँ, तो पार्वती गौना करवाकर, वापस घर लौट रही थीं..अपने शिव के पास... पूरे एक जन्म और सोलह वर्ष की कठिन तपस्या उपरान्त ...फिर इतना हर्ष ...इतना उन्माद कैसे और क्यों न छलके !
बात चाहे होली की हो या बसंत की, हमारी संस्कृति में राग-रंगमय त्योहारों की कमी नहीं; करीब-करीब हर मौसम और हर वर्ण के लिए एक अलग और अनूठा त्योहार है। यदि व्यंजनों की विविधता को भूल भी जाएं, उनकी बात न भी करें, तो भी हर त्योहार सामाजिक और धार्मिक, दोमुखी चेतना और दोहरा आयाम लिए हुए है । आज भी पुराने को नए से जोड़ने का अद्भुत प्रयास हैं ये त्योहार और अपना दायित्व बखूबी निभा भी रहे हैं।
चांदी के सिंहासन पर सोलह श्रंगार के साथ फूलों से लदी गौरा ईष्ट भोलेनाथ के साथ बेहद फब रही थीं। संतुष्ट लग रही थीं। और वह नाचती, कूदती बेसुध भीड़, उसी आस्था, उसी अटूट प्रेम के पुनर्मिलन का ही तो उत्सव मना रही थी। नाचते- झूमते, आधे-भूखे-नंगों की वह टोली ... वाकई में शिव की बारात और सेना दोनों का ही अहसास दे रही थी। विश्वास नहीं होता आज की व्यस्त जिन्दगी में भी कैसे जुट जाते हैं इतने लोग? ... पर, शिव तो सदा से ही निर्बल और असहायों के ही साथ रहे हैं। सांप तक को गले में लपेटने की क्षमता रखने वाले एक यही तो हैं, जो असहाय और दीन-दुखियों के सहायक हैं, दीनानाथ हैं । बनारस वैसे भी फक्कड़ और भूखे-नंगों का ही शहर है। यहां पर आस्था और उत्तेजना की भंग की एक चुटकी मात्र, आज भी भूख और प्यास दोनों को ही भगाने और बेसुध रखने में पूर्णतः समर्थ है।
यातायात पूरी तरह से रुक चुका था। काफी देर तक ड्राइवर कोशिश में रहा कि अगल-बगल कहीं से भी गाड़ी निकाल ले। अंत में हार कर उसने भी इंजिन बन्द कर दिया था और भीड़ में जा खड़ा हुआ था।
रूप, श्रंगार , उल्लास, सबकुछ अद्भुत, और अभिभूत करने वाला था। आते-जाते भक्त दणडवत् प्रणाम कर रहे थे तो कई पंक्तिबद्ध हाथ जोड़े विभोर और आत्म-समर्पित थे। दृश्य भव्य और अलौकिक था ...शिवमय था और शिव की काशी सा ही निराला व अनूठा भी था। आज भी यहाँ हर छोटा-बड़ा त्योहार बेहद हर्ष और उल्लास के साथ ही मनाया जाता है। श्रद्धालुओं का उन्माद यहां सदा से ही संक्रामक रहा है और जाने कितने हजारों वर्ष पहले हुई घटना को लेकर उसदिन भी, चारो तरफ से उमड़ ही नहीं, आसपास रिसता-सा चला जा रहा था... बनारस की उन पतली गलियों को भावनाओं की दलदल से पुनः पुनः पाटता-समेटता हुआ।
विदेशी पर्यटक, दुकान खोलते दुकानदार, ग्राहक सब धंसते जा रहे थे और उस सबके बीच बैठी, मैं इन्तजार कर रही थी जलूस के गुजर जाने का, सबकुछ बीत और चुक जाने का, वह भी एक कसैली कसक के साथ। सोचकर हैरान हूँ, कि आखिर ऐसा क्यों...पूर्णतः डूब क्यों नहीं पा रही थी मैं ? भीड़भाड़ भरे जुलूस में डूबता-उबरता मन आस्था और समर्पण के उन पलों में भी इतना निर्लिप्त कैसे रहा? क्या वाकई में हमारे अहसास मात्र मस्तिष्क का एक रसायनिक आंदोलन ही हैं या जैसा कि मैं मानती हूँ, उनकी जड़ें अतीत और संस्कारों तक जाती हैं...? और ज्यादा सोचना-समझना चाहा तो खुद को और भी भ्रमित पाया, कहीं आत्मरक्षण और आत्म संरचना की एक नैसर्गिक क्रिया और प्रतिक्किया ही तो नहीं सारी भावनाएँ ? फिर क्यों इतनी लड़ाइयां जीती और हारी गई हैं इसी राग-अनुराग पर...क्यों इतने न्योछावर हुए...आखिर क्यों इतने ग्रन्थ लिखे और पढ़े गए इस छलनामय दुरूह विषय पर। लेखनी का यह अंक भी इसी फागुनी उन्माद या वासंती बयार पर है, उसकी खुशबू. और उस बेखुदी से उठे हजारों उलझे-अटके प्रश्नों पर है। सामीप्य के सुख और कामना पर ही नहीं, उलझन धोखा और मजबूरियों पर भी है...क्योंकि इसी का तो नाम प्यार है....जिन्दगी है। किसी भी परिस्थिति में हठी मन के हार न मानने पर है।
क्या है यह प्यार, जिसके लिए कभी-कभी एक जन्म भी काफी नहीं पड़ता...कैसे जन्म-जन्मांतर इंतजार कर लेते हैं लोग जैसे कि पार्वती जी ने कभी किया था और फिर अपनी लगन की एकाग्रता से हासिल भी कर लिया था अपना खोया स्वर्ग...सब कुछ वापस।...क्या संभव भी है ऐसा... नटखट मन जबाव देने की बजाय कन्हैयैलाल नंदन की हाल ही में पढ़ी कविता की पंक्तियां सुनाने लग जाता है-
“ नदी की कहानी कभी फिर सुनाना मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना मुझे वो मिलेगा ये मुझको यकी हैं बहुत जानलेवा है ये दरम्याना मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था भंवर देखना कूदना डूब जाना। ”
पार्वती हो या सीता, राधा हो या मीरा...यहां तक कि अनुसूइया और श्रवण कुमार को ही क्यों न लें, चाहे ध्रुव और प्रहलाद के बारे में ही क्यों न सोचें, हर उद्दाम और अलौकिक लगन, एक धोखे, एक विनाश ...नश्वरता और चाहे-अनचाहे विछोह से गुजरकर ही अमरत्व प्राप्त कर पाती है...धोखा भी ऐसा-वैसा नहीं प्रायः अपनों द्वारा ही दिया हुआ...या फिर अपनी ही जानी-अनजानी गलती से आमंत्रित विनाश। वाकई में बहुत कठिन है ‘ डगर पनघट की’। कभी समाज साथ नहीं देता तो कभी परिस्थितियां, तो कभी ग्रीक ही क्या, हर बड़ी कहानी के नायक की तरह, एक छोटी-सी भूल भी आत्मघातक सिद्ध होती है। नेह जितना प्रगाढ़ होगा...कुशाग्र तीली-सी कसक या पीड़ा भी उतनी ही तीव्र। तो क्या विछोह और धोखा कसौटी है प्यार की...एक अनिवार्यता है इंतिहा चाह की...या मात्र भय है अनागत और अनचाहे का, बिछुड़ने का, जो बेचैन किए रहता है। सही निर्णय में बाधक सिद्ध होता है। सही ही तो है हादसे प्रायः गलती से ही नहीं, साहस की कमी से भी तो होते रहते हैं । वजह जो भी हो, सच तो यह है कि हम इन कहानियों को उनकी विफलता के लिए नहीं, लगन और निष्ठा के लिए , हार न मानने वाली प्रवृत्ति के लिए ही याद रखते हैं।
लौकिक अलौकिक ये दास्तानें आज भी बहुत कुछ कहना और सिखलाना चाहती हैं, यदि हम सुनना और सीखना चाहें। सती और फिर पार्वती के रूप में वह पुनर्जन्म की कहानी, मन के किसी कोने को बचपन से ही अशांत और उद्वेलित करती आई है। क्या बेटियां वाकई में पराया धन और उधार की धरोहर मात्र हैं , या शादी के बाद वे खुद बदल जाती हैं...मान-अपमान के कांटे कुछ ज्यादा ही चुभने लगते हैं मन में...कुछ भी अनदेखा और माफ करना भूल जाती हैं? पुराने को ढूँढते-ढूँढते नए का अस्तित्व तक तोड़ने-फोड़ने पर आमदा हो जाती हैं... क्या जरूरत थी सती को ज़िद करके मायके जाने की...फिर यूँ पल भर में प्राण तज देने की...क्या वह शिव से ज्यादा प्यार करती थीं अपनी इच्छाओं से... अपने मान-सम्मान से ? क्या यह भावनाओं का अनियंत्रित आवेश ही है जो आजीवन भटकाता है, समस्या, हर हार की जड़ बन जाता है ...फिर चाहें वे मनुष्य हों या देवी-देवता...या फिर कुछ और है, जो पूर्व निश्चित और निर्धारित रहता है...बस बुद्धि और बहाने बन जाते हैं वैसे-ही?
बात यदि मात्र संयम और समर्पण की ही होती, तो यंत्रवत् सब सही चलता ही रहता, बिना किसी विद्रोह या संशय के...जैसे कि प्रकृति में चलता रहता है-क्रम से ग्रीष्म, बरखा, शिशिर, और आते जाते बसंत की तरह। पर मानव मन तो अपनी ही राग अलापता है और बसंत पर ही अड़ा रहना चाहता है। मनमाफिक सातवें मौसम की तरह नयी छटा , नई सदाबहार सातवीं ऋतु ही रखना चाहता है बारहों महीने।
पर यह कैसे संभव हो? हजार आंसू और मुस्कानों में लिपटी , लू की अंधड़ और बरखा की रिमझिम शीतलता एक साथ समेटे जीवन इसकी अनुमति कैसे दे दे। हम इसे धोखा कहें या नियति, अधिकांशतः प्रेम कहानियां ...सफल या असफल, जीवन की तरह ही, निराशा, आंसू और धोखे के तानेबाने पर नहीं, यथार्थ की जरूरतों पर, पल के निर्णय पर स्वतः बुन जाती है। मन का क्या...यह तो सिर्फ वही याद रखता है, जो रखना चाहता है। हाँ इतना अवश्य है कि व्यक्ति और समाज दोनों की ही अपेक्षाओं का पहाण सदा से ही इतना अधिक दुर्गम और अपार है कि कठिनाइयों से जूझते , अपनी अदम्य इच्छा की प्राप्ति के लिए, मानव को निराशा की अंधेरी गर्तों से गुजरना ही पड़ता है...पड़ेगा ही। जो इसे जीत ले या नियंत्रित कर ले वही कहानी अमर है, याद रह जाती है। इसीमें इसकी परीक्षा भी है और उपलब्धि भी। हैरान हूँ, तो उस विधाता पर जिसने इस खेल के कुछ ऐसे नियम बनाए। मन के साथ मस्तिष्क जोड़ा और गुलाबों को कांटों पर उगाया। सिर्फ उगाया ही नहीं, उसकी गंध और रूप को इतना मादक बनाया कि आताजाता हर व्यक्ति कसक महसूस करे.. .दर्द से कटे और आजीवन चिलकता रह जाए।
... पाप पिशाचनी पर मां पार्वती का सिंहासन संजोता मानव मन सतत क्रियाशील है... और यही तो है इसकी सबसे बड़ी उलझन और ताकत दोनों ही। लेखनी का यह अंक इसबार ऐसे ही अनगिनित वासंती सवालों और गुत्थियों को समर्पित है। उस रहस्यमय गुत्थी के नाम है, जिसे हृदय के नाम से जाना जाता है। मनमानी करने के बाद, जीवन का नाम दिया जाता है। जिसे जानते ही नहीं हम, बस आजीवन जानने की कोशिश में ही लगे रहते हैं।
आप सोच रहे होंगे कैसी है यह वसंत अंक की प्रस्तावना जिसमें न कोयल की कूक है न बोऱाई आम की अमराई। ध्यान से देखें, तो सब हैं यहीं पर। यह बात दूसरी है कि इसबार हम बात स्पष्टतः कोयल की कूक की नहीं, उस मूक पीर की, उस धोखे की कर रहे हैं, जिसके तहत वह अपने अंडे दूसरों के घोंसलों में रख आती है,,,,रख ही नहीं आती, रखकर खुश भी रहती है।
बरखा में मल्हार गाता है मन और फागुन में बौराता है। कोई भी मौसम हो, झरझर झरना ही स्वभाव है इसका। हल्के से झोंके से मिट जाता है यह, पर मिट के नष्ट नहीं होता, फिर से उग आता है। नए-नए स्वांग रचाता है। दया, करुणा और परोपकार के हजारों गुणों से पूर्ण होकर भी, पल भर में ध्वस्त कर सकता है यह समस्त बृह्मांड और अगले पल ही खुद भी धाराशायी होने की क्षमता कहूँ या बावरापन भी रखता है। नई उर्जा, नई आणविक शक्ति के नित नए-नए भट्टे बनाते देर नहीं लगती इसे और फिर उन्हींके हाथों विनाश होते देख...घबराया, बेचैन, बचने के रास्ते ढूंढ़ता फिरता है। फिरता ही नहीं, ढूंढ लाने की सामर्थ भी रखता है, ढूँढ लाता है।
शरीरहीन, अदृश्य और भस्म यह राग-रंग वाकई में अमरत्व का वरदान लिए हुए है। यही तो वजह है कि बसंत कभी बस-अंत नहीं, एक नई शुरुआत, नए उल्लास का द्योतक है। हर आलोचना, हर शिकायत, हर भ्रान्ति के बाद भी जीवित ही नहीं प्रतिक्षित और मनभावन है। उसी सुख... सृजनहारा की छलना या सृजन के नाम है यह अंक , जो पतझड़ में भी बहारों के बीज बचाता और छुपाता ही नहीं, रोपता है। संजीवनी है।... जो ‘जी’ भी है और जान भी, जिसके बिना जीना संभव नहीं।
7 मार्च 2007 को आपकी लेखनी पत्रिका ने इंद्रजाल पर पहला कदम रखा था , इस अंक के साथ चार वर्ष पूरे करके पांचवें में प्रवेश करने जा रही है यह और हजार कोशिशों के बाद भी, जनवरी-फरवरी की तरह ही, पहली मार्च को नहीं, पहली अप्रैल , यानी मार्च-अप्रैल का संयुक्तांक, मूर्ख दिवस के दिन आप तक पहुंच पा रहा है, अपनी गंभीर और रसमय संरचना के साथ । पहली को मूर्ख और तीसरी को मातृ दिवस...यह दिवस संस्कृति और परंपरा भी हमें पश्चिम से मिला हुआ ही तो तोहफा है...वरना अपने यहां तो आए दिन ही मूर्ख दिवस भी मनता है और मातृदिवस भी।
याद आया अप्रैल के लिए हमने हास्य विशेशांक की योजना बनाई थी...जो अब फिर कभी सही...। विश्वास मानिए यह एक अप्रत्याशित अनहोनी ही है कि अचानक ही भारत जाने का कार्यक्रम बना और अंक योजना और संरचना दोनों ही स्थगित करनी पड़ी ।
चाहें न चाहें, हर घटित और फलित की भी तो अपनी-अपनी पूर्व निर्धारित तिथियां और पल होते हैं , जिनपर हजार कोशिशों के बाद भी हमारा कोई वश नहीं।
जीत कहूं या विधना से विद्रोह, जो अदम्य और निरंतर है और उसकी रची सृष्टि-सा ही अपराजेय और हठी भी, वाकई में उसी को संजोने की एक और कोशिश है यह अंक। हां, इतना पूछने पर अवश्य मजबूर हूँ, कि क्या आप संतुष्ट हैं इन दो-दो महीनों के संयुक्तांकों से? पाठकों और मित्रों के पत्र, सुझाव और प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा...
ये सिर्फ किवाड़ नहीं हैं जब ये हिलते हैं माँ हिल जाती है और चौकस आँखों से देखती है क्या हुआ।
मोटी साँकल की चार कड़ियों में एक पूरी उम्र और स्मृतियाँ बँधी हुई हैं जब साँकल बजती है बहुत कुछ बज जाता है घर में।
इन किवाड़ों पर चंदा सूरज और नाग देवता बने हुए हैं एक विश्वास और सुरक्षा खुदी हुई है इन पर इन्हें देख कर हमें पिता की याद आती है।
भैय्या जब इन्हें बदलवाने को कहते हैं माँ दहल जाती है और कई रातों तक पिता उसके सपनो में आते हैं।
ये पुराने हैं लेकिन कमजोर नहीं इनके दोलन में एक वजनदारी है
ये जब खुलते हैं एक पूरी दुनिया हमारी तरफ खुलती है जब ये नहीं होंगे घर-घर नहीं होगा।
--कुमारअम्बुज
माँ
मेरा प्यारा सा बच्चा गोद में भर लेती है बच्चे को चेहरे पर नजर न लगे माथे पर काजल का टीका लगाती है कोई बुरी आत्मा न छू सके बाँहों में ताबीज बाँध देती है ।
बच्चा स्कूल जाने लगा है सुबह से ही माँ जुट जाती है चौके बर्तन में कहीं बेटा भूखा न चला जाये ।
लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से माँ के आँचल में छुप जाता है अब उसे कुछ नहीं हो सकता ।
बच्चा बड़ा होता जाता है माँ मन्नतें माँगती है देवी देवताओं से बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है माँ भर लेती है उसे बाँहों में अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।
फिर एक दिन आता है शहनाइयाँ गूँज उठती हैं माँ के कदम आज जमीं पर नहीं कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर बहू के कदमों का इंतजार है उसे आशीर्वाद देती है दोनों को एक नई जिन्दगी की शुरुआत के लिए।
माँ सिखाती है बहू को परिवार की परम्पराएँ व संस्कार बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख बोलती है बहुत नाजों से पाला है इसे अब तुम्हें ही देखना है।
माँ की खुशी भरी आँखों से आँसू की एक गरम बूँद गिरती है बहू की हथेली पर।
आए महंत वसंत मखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीला बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला चंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंत आए महंत वसंत
श्रद्धानत तरुओं की अंजलि से झरे पात कोंपल के मुँदे नयन थर-थर-थर पुलक गात अगरु धूम लिए घूम रहे सुमन दिग-दिगंत आए महंत वसंत
खड़ खड़ खड़ताल बजा नाच रही बिसुध हवा डाल डाल अलि पिक के गायन का बँधा समा तरु तरु की ध्वजा उठी जय जय का है न अंत आए महंत वसंत - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
वसंती हवा
हवा हूँ , हवा मैं, वसंती हवा हूँ। सुनो बात मेरी- अनोखी हवा हूँ। बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला।
नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ। जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ, मुसाफिर अजब हूँ।
न घरबार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ। हवा हूँ , हवा मैं, वसंती हवा हूँ।
जहाँ से चली मैं. जहाँ को गई मैं- शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत निर्जन, हरे खेत, पोखर, झुलती चली मैं। झुमाती चली मैं!
हवा हूँ , हवा मैं, वसंती हवा हूँ।
-केदारनाथ अग्रवाल
धरती का डोले मन
धरती का डोले मन के बसंत ऋतू आई
सूरज जो छुप के बैठा था खिड़की खोल ले मुस्काया उसकी सुनहरी धूप ने धरती का कण कण चमकाया हर्ष हर्ष बोले सुमन के बसंत ऋतू आई धरती का डोले मन के बसंत ऋतू आई
ओढ़ बसंती चूनर धरा सुन्दरी इतराए बादल जो राही बन भटके उस का मन भी भरमाये बहे बसंती बयार होके मगन के बसंत ऋतू आई धरती का डोले मन के बसंत ऋतू आई
फूलों ने घूँघट खोले तो भवरे ने ली अंगड़ाई पी का संग पाने को प्रकृति सुन्दरी बौराई प्रेम राग से गूंजे गगन के बसंत ऋतू आई धरती का डोले मन के बसंत ऋतू आई
-रचना श्रीवास्तव
मन मेरा भी...
मन मेरा भी महक उठा सूरज ने गिराए परदे तपिश धूप की कम हुई खोल दी गांठ हवाओं ने मौसम की आंख नम हुई बदली ऋतू तो कण कण चहक उठा मन मेरा भी महक उठा गदराये पेड़ मादमाई किरणे वन में खग उपवन में मृग हो आतुर विचरें छटा ऐसी वैराग्य बहक उठा मन मेरा भी महक उठा आँचल पर आकाश के ज़रदोज़ी से तारे कुसमित पवन सजा दीप आरती उतारे रूठी जो ऐसे में चांदनी चाँद कसक उठा मन मेरा भी महक उठा
-रचना श्रीवास्तव
किसलय वसना प्रकृति सुन्दरी
पहन शाटिका पीली-पीली,
प्रकृति प्रिया ने रूप सजाया.
परिमल के मिस भेज सन्देशा,
प्रिय बसन्त को पास बुलाया.
त्याग निशा की श्याम चूनरी,
पहनी अंगिया आज सुनहरी.
पूर्व दिशा के स्वर्ण रंग में,
रंगी खड़ी है प्रकृति छरहरी.
शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन है,
वन-उपवन छाई हरियाली.
फ़ूले फ़ूल खड़े हैं लेकर-
कर में नव पराग की थाली.
नाच रहीं तितलियां मनोहर,
भौंरे गुन-गुन करते गुन्जन.
हरी-मखमली दूब बिछी है,
जहां ओस करती है नर्तन.
श्यामा अनिली भी कोयल से,
करती अन्ताक्षरी मनोहर.
फ़ैलाये निज बांह सभी को,
न्योता देते कमल सरोवर.
बौरा उठे आम बागों में,
मह-मह महुआ मदिरा ढारे.
कचनारों की गन्ध उड़ाकर,
खेल खेलते हैं सब न्यारे.
किसलय वसना प्रकृति सुन्दरी,
दुल्हन सी सजकर है आई.
प्रिय वसंत की बांहों में आकर
लेती हो प्रमुदित अंगड़ाई.
-नीरजा द्विवेदी
वसंत मुआ लगा रहा
चूड़ियां क्यों खनक रहीं, दमक रही मांग है, प्रियतम की याद क्यों, मन में रही जाग है?
कली क्यों मुसका रही, क्या भर गया पराग है, हवा क्यों पगलाई है, क्या लग गया माघ है?
श्वान का छौना तक श्वानिन पीछे रहा भाग है, नागिन पर क्यों प्यार से फुफकार रहा नाग है?
पहले से जानती है उसका प्रियतम बड़ा घाघ है, गोरी आज क्यों घबरा रही, लग न जाये दाग़ है?
उसकी याद में रमेसर रात भर गाता रहा फाग है, कब वह आयेगी, कब होगा झंकृत भैरवी राग है?
क्या पाहुन आ रहा, क्यों मुंडेर पर बैठा काग है? वसंत मुआ लगा रहा, प्रेमियों के हृदय में आग है।
आज फिर नाइट लैम्प की रोशनी में देर तक अंगुलियां कोरे कागज पे कलम से खींचती रहीं शब्द रेखाएं और टेबिल के नीचे इकट्टï होते रहे कागज़ के गुत्थड़ इनमें से एक पे भी नहीं उभर पाया तुम्हारा नाम। मेरे अपने- तुम्हारे हर सामीप्य ने हमेशा इतना अपनापन दिया है मुझे कि तुम्हें नाम देने को कभी मचले ही नहीं होंठ और, तुम्हें- शायद इंतज़ार रहा कि मैं ही पूरी करूं रस्म तुम्हे नाम देने की..। - सुबोध श्रीवास्तव
देखा तुम्हें तो...
देखा तुम्हें तो आंख में तुमको छुपा लिया जैसे युगों की प्यास ने दरिया को पा लिया। अंचल तेरा उड़ा तो फूल रंग पा गए बाकि बचे जो रंग तितलियों ने पा लिया। खुशबू का कोई झोंका लाइ हवा अभी जुल्फे खुली तो आसमा को घटाओं ने छा लिया । जो दिल के जख्म हैं उन्हें अश्कों की प्यास है निगाहें उठी जो उनकी लगा मरहम को पा लिया । क्यों भूलकर करेंगे फिक्र मेरे गम का वे किया है मैंने प्यार तो ग़मों को पा लिया ।
-कुसुम सिन्हा
मधुमास गीत
देखकर तुमको हँसते फूल और कलियाँ मुस्काती हैं। लताएँ झूम-झूमकर अभिनन्दन के गीत सुनाती हैं। तुम्हारा नाम क्या है?
तुम्हारा उजला-उजला रूप लगे पूनम की रात कोई। बसी चंचल चितवन में हो जैसे स्वप्निल सौगात कोई।
चाँद की किरणें भी दो बातें करने को शरमाती है। तुम्हारा नाम क्या है?
तुम्हारी बोली का अभ्यास कुहुक कर करती कोयलिया। ख़नक का वैभव पाने हेतु छनकती हर दम पायलिया।
विफलता लेकिन अपनी देख तड़पती है, पछताती है। तुम्हारा नाम क्या है?
चाहता है मेरा भी हृदय बनाना तुमको अपना मीत। निछावर करने को है विकल तुम्हीं पर अपने सारे गीत।
मगर मन से उठ शंकाएँ फिर अपना प्रश्न उठातीं है। तुम्हारा नाम क्या है?
- रंजन विशदा
जाने कब तक ?
बहुत बातें करने की इच्छा मन मैं होती है शुरू सम्बन्ध के पलों मैं दो अजनबी चाहते है हर पल साथ रहना कहना अपने मन का सुनने उसके मन का जरा सी देर भी अगर दूर हो जाये तो बैचैन हो जाते है
बार बार एक दूजे का ध्यान आता है प्रेम का रास्ता विकट है हर पल व्याकुल है देह नहीं एक दूजे की छाया है जिसे ओढ़ दोनों एक दूजे को तलाशते है
हाँ पता है .. रहस्यों की डोरी खुले तब तलक ! प्रेम पथिक-- उतावला होता है फिर ..बैठ सुस्ताता है देर तक ..... जाने कब तक ? -मुथा राकेश
जुदाई के मौसम में....
जुदाई के आलम में जीते रहे हम तुम्हारी क़सम अश्क पीते रहे हम.
बिना पर उड़ी जो मैं आकाश छूने खुले जख्म वो फिर दिये थे जो तूने उड़ी जितना ऊँचा मिले उतने ही गम.
है आंसू -भरा दिल, मगर खुश्क आँखे मेरा दर्द पिघला अगर कोई झांके किसी ने भी अब तक लगाया न मरहम.
बडी संगदिल सी चली वो हवाएं मिटा कर गईं आशियां वो खिजाएं लुटी राह में कैसे, गाऊँ मैं सरगम.
सिसकती रही दर्द की चीख़ ऐसे हवाओं में आवाज़ गूंजी हो जैसे मनाता हो ज्यूं कोई अपना ही मातम.
कहो बादलो से न बरसें वो ऐसे अभी तो हैं पुरनम नयन आंसुओं से चलो आज खोजें नया और मौसम.
-देवी नागरानी
सलाह
तुम, कहते जाओ, रुकना नहीं बिना कहे पूरी बात। दरअसल होठों से न फूटने पर तुम्हारा दर्द बह निकलेगा नमकीन पानी के रूप में और तुम साबित न कर पाओगे आंसुओं की शुद्धता क्योंकि अपने शहर का मिजाज़ बहुत 'पानीदार ' है।
-सुबोध श्रीवास्तव
कई बार
कई बार जल्दी हो जाती है कुछ बातें कहने मैं कुछ देर का धैर्य अगर रखा होता तो शायद ये निराशा... ये दुःख सामने नहीं होता मगर वह जल्दी ..वह तुरंत पाने की अभिलाषा आपको बौना कर जाती है फिर आने वाले हर पल बोनसाई की तरह सजे हुए आप ताकते है फटी आँखों से खुदको ...
-मुथा राकेश
लौ दर्दे दिल की
सिमटतीजो जाएगी लौ दर्दे-दिल की तो किस काम आएगी लौ दर्दे-दिल की
अँधेरे ज़माने में बे-इन्तहा हैं बहुत काम आएगी लौ दर्दे-दिल की
करें चाहे कितनी शरारत हवाएं कभी मिट न पाएगी लौ दर्दे-दिल की
बिछेंगे उजाले जो हरसू ख़ुशी के तो पहचान पाएगी लौ दर्दे-दिल की
उदासी के आँगन में शह्नाइयों के सुरों को सजाएगी लौ दर्दे-दिल की
ग़ज़ल की इबादत जहाँ पर भी होगी वहीँ सर झुकाएगी लौ दर्दे-दिल की
ज़मीरों का ज़ामिन जहाँ झूठ होगा वहीं तिलमिलाएगी लौ दर्दे-दिल की
सुकूँ पा सकेगा जहाँ दर्द "देवी" वहीं मुस्कराएगी लौ दर्दे-दिल की
बहुत दर्द होता था मुझे, सोचता था, कोई खुदा ; तुम्हारे नाम का फाहा ही रख दे मेरे दर्द पर…
कोई दवा काम ना देती थी… कोई दुआ असर न करती थी…
और फिर मैं मर गया ।
जब मेरी कब्र बन रही थी, तो; मैंने पूछा कि मुझे हुआ क्या था। लोगो ने कहा; " प्यार "
इन्तज़ार है...
हमेशा की तरह , आज भी अजनबी शाम को ढलते हुए सूरज के संग , उदास रंगों को आसमान में बिखरते हुए देख रहा था ; और सोच रहा था , उन शामो के बारे में , जब तुम मेरे साथ थी ...!!
ऐसा लगता है कि वो किसी और जनम की बात थी , जब मैं इन्ही रंगों को तेरे चेहरे पर अपने प्यार के साथ घुलते हुए देखता था ....
सच में वो किसी और जन्म की बात लगती है , जब हम हाथो में हाथ डाल कर ; किसी पुराने शहर की गलियों में घुमते थे ; जब मंदिर के सारे देवता ; गर्भगृह में हमारी ही प्रतीक्षा करते थे . या , वो नदी के बहते पानी में अपने अक्स को देखना .. और वो लम्बी लम्बी सडको पर ; बिना किसी मंजिल के दूर तक बहते चले जाना और वो अनजान जंगलो की , फूलो की झुकी हुई डालियों पर तेरे प्यार को ठहरा हुआ देखना , किसी तेरे शहर की झील में ; सूरज, शाम और पानी के साथ तुम्हे disk jockey जैसे mix करना और ज़िन्दगी के रुके हुए पलो में तुम्हे अपने camera में ; एक immortal तस्वीर की तरह कैद कर लेना ... सब कुछ किसी और जन्म की बात ही लगती है ..जानां ..
क्या तुम्हे वो सारे लम्हे याद है , जब तुम्हारी साँसे मेरे नाम थी , जब तुम्हारी धड़कने भी मेरे नाम थी , जब तुम मुझे देखती थी प्यार के अद्बुत क्षणों में .. जानां.. आज मैं बहुत उदास हूँ. तुम बहुत याद आ रही हो ..
जाने ,तुम दुनिया के किस जंगल में खो गयी हो .. आ जाओ जानां, मुझे तेरा इन्तजार है ....!!!
अपरिचित जिन्दगी...
जब कभी सोचा की ज़िन्दगी क्या है तो बस वही पल याद आये जो तेरे साथ उस अनजानी दुनिया में गुजारे थे... उन अजनबी रास्तो पर अक्सर यूँ भटकते थे जैसे वो हमारे साँसों के लिए ही बने हुए है मौन के संग धडकती हुई हमारे दिल की अनजान धड़कने कुछ न कह पाती थी... सिर्फ प्यार के मीठे बोल ही होते थे जुबान पर….
हम बहुत दूर तक यूँ ही साथ साथ चला करते थे.. कुछ तन्हाईयाँ तुम्हारी होती थी और कुछ मेरी कुछ मेरे सवाल होते थे , कुछ तुम्हारे जवाब . कोई साया नहीं होता था , हमारी अपनी ज़िन्दगी का ;उस सफ़र में . न तुम छेडती थी ; अपनी बीती ज़िन्दगी की कोई बात न मैं कहता था अपनी कोई आपबीती बस चुपचाप चलते ही जाते थे ...एक दूजे के लिए बनकर , हाथो में हाथ डाल कर …. मैं कौन या तुम कौन इन बातो का क्या वास्ता , जब आलिंगन में तुमने मुझे अपने बाँध लिया हो . सारी बातो को अब बस रहने दो . आओ एक बार फिर से चले उन रास्तो पर जो अजनबी होकर भी नहीं थे अजनबी और जो साँसे सिर्फ हमारी ही थी और उन पर एक दूजे का नाम लिखा हुआ था
तुम ही बताओ जानां कौनसी ज़िन्दगी अपरिचित है , तुम्हारे संग जिन साँसों ने ख्वाब देखे ,वो ज़िन्दगी.......!!!! या वो,जो इस जानी हुई दुनिया में अनजाने से गुजार रहे है ..
तेरा चले जाना...
जब मैं तुझे छोड़ने उस अजनबी स्टेशन पर पहुंचा ; जो की अब मेरा जाना पहचाना बन रहा था …. तो एक बैचेन सी रात की सुबह हो रही थी ......
एक ऐसी रात की , जो हमने साथ बिताई थी ज़िन्दगी के तारो के साथ .. जागते हुए सपनो के साथ और प्यार के नर्म अहसासों के साथ ...
हमारे प्रेम की मदिरा का वो जाम जो हम दोनों ने एक साथ पिया था .. उसका स्वाद अब तक मेरे होंठों पर था...
मैंने धुंधलाती हुई आँखों से देखा तो पाया कि ; तेरे चेहरे के उदास उजाले मेरे आंसुओ को सुखा रहे थे......
मौन की भी अपनी भाषा होती है ये आज पता चला ....... जब तुमने मेरा हाथ पकड़ कर कुछ कहना चाहा.... और कुछ न कह सकी ..... मैं भी सच कितना चुप था !!
हम दोनों क्या कहना सुनना चाहते थे ; ये समझ में नहीं आ रहा था .....और सच कहूँ तो मैं समझना भी नहीं चाहता था !
फिर थोडी देर बाद तुझे ; तेरे शहर को ले जाने वाली ट्रेन आयी .... ये वही स्टेशन था ,जिसने तुम्हे मुझसे मिलाया था और हम दोनों ने ये जाना था कि ; किसी पिछले जनम के बिछडे हुए है हम...
मैंने मरघट की खामोशी के साथ ; तुझे उस ट्रेन में बिठाया .. तेरा चले जाना जैसे ; मेरी आत्मा को तेरे संग लिए जा रहा था ..
जिस जगह हम मिले , उसी जगह हम जुदा हुए.. ये कैसी किस्मत है हमारे प्यार की ......
फिर ट्रेन चल पड़ी .... बहुत दूर तलक मैं उसे जाते हुए देखते रहा और उसे ; तुझे ले जाते हुए भी देखते रहा ..
मेरी आँखों ने कहा , सुन यार मेरे .. अब तो हमें बहने दे..... बहुत देर हुई ..रुके हुए ...
मैं अपने कदमो को खीचंते हुए वापस आया .... देखा तो ; कमरा उतना ही खामोश था .. जितना हमने उसे छोड़ा था ....
बिस्तर पर पड़ी चादर को छुआ तो , तुमने उसे अपनी ठोडी तक ओड़ ली ... और अपनी चमकीली आँखों से मुझे देखकर मुस्करा दिया ...
और फिर कोने में देखा तो तुम मेरे संग चाय पी रही थी .. सोफे पर शायद तुम्हारा दुपट्टा पड़ा था ... या मेरी धुंधलाती हुई आँखों को कोई भ्रम हुआ था ...
आईने में देखा तो तुम थी मेरे पीछे खड़ी हुई ... मुझे छूती हुई .....मेरे कानो में कुछ कहती हुई.. शायद I LOVE YOU कह रही थी......
वर्तमान उत्तरशती के संदर्भ में भावी पूर्व शती का साहित्य
( गतांक से आगे)
प्रसिद्ध बाल साहित्यकार और ‘नंदन ‘ के यशस्वी संपादक डॉ. जयप्रकाश भारती के शब्दों में, ‘ 19वीं सदी के उत्तरार्ध तथा बीसवीं सदी के प्रारंभ में, जब मनोविज्ञान का विकास हुआ, तो बालमनोविज्ञान भी महत्वपूर्ण हुआ। 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में बालक पर ध्यान केन्द्रित हुआ। मेरे विचार में 21 वीं सदी बालक की सदी होगी। इसमें निश्चित तौर पर बाल साहित्य की वृद्धि में सहायता मिलेगी तथा बच्चों से संबंधित विभिन्न प्रश्नों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य. मनोरंजन आदि पर ध्यान दिया जाएगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा बाल साहित्य के सामने नई चुनौतियां भी आएंगी। यह भी मानने की बात है कि आज का बच्चा बहुत सी बातें बिना बताए, सीख जाता है। पहले 10-11 कक्षा तक का बच्चा, टी.वी., टेलिफोन, कंप्यूटर, वीडियो से खेलते हैं।
आज पुस्तकों की स्थिति के बारे में उन्होंने कहा,- आज पुस्तकें पढ़ने का माहौल ही खत्म हो गया है। आज स्थिति यह है कि बड़े लोग बच्चों को पुस्तकें पढ़ने के लिए नहीं देते। होना तो यह चाहिए कि जब बच्चा पैदा हो, पिता उसी दिन से घर में पुस्तकें पढ़ने का वातावरण बनाना शुरु करें। आज लोग बच्चे के जन्मदिन पर हजारों रूपया खर्च करने को तैयार हैं, मगर उसे उपहार में पुष्तकें देना या पश्रिकाओं का वार्षिक शुल्क देना, जरूरी नहीं समझते। बाल साहित्य को लोकप्रिय बनाने, उसे पढ़ने की आदत डालने में अध्यापकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, मगर दुःखद बात यह है कि नौकरी मिलते ही ज्यादातर अध्यापक पढ़ना बन्द कर देते हैं, उन्हें आधुनिक साहित्य का पता ही नहीं होता। सभी गोष्ठियों, सभा सम्मेलनों, पुरस्कार समीतियों में कुछ गिनेचुने बूढ़े लोग ही होते हैं। समीक्षा भी पक्षपात पूर्ण है। सब ओर अंध दृष्टि, गुटों का पोषण है, ऐसी हालत में अच्छा साहित्य कहां से आएगा? लेकिन अन्य भाषाओं की तुलना में अभी भी हिन्दी की स्थिति बहुत बेहतर है। यह भी सच है कि आज हिन्दी में ही सर्वाधिक अच्छी और श्रेष्ठ पुस्तकें छप रही हैं। आज के इस बदले हुए माहौल में भी साहित्य-साधक बचे हुए हैं। कितनी भी गिरावट आए, संस्कार तो बचे ही रहते हैं। हालांकि यह प्रचार का युग है, मगर फिर भी नागरीप्रचारणी सभा जैसी संस्थाएं हैं, जो पिछले सौ वर्षों से निरंतर निस्वार्थ भाव से हिंदी की सेवा कर रही हैं। आज लोगों को पता भले ही न चले, लेकिन काम लगातार हो रहा है। हिंदी के अखबार तथा उसकी प्रसार संख्या बढ़ रही है। पिछले दो दशक में, हिन्दी में, जितनी किताबें छपीं, उतनी पहले कभी नहीं छपीं। मेरे ख्याल से अगले दो दशकों में उनकी सेख्या दुगनी हो जाएगी। हिंदी में, प्रतिवर्ष केवल बच्चों की लगभग 500 पुष्तकें छपती हैं, जिनमें पाठ्यपुस्तकें शामिल नहीं हैं।
पिछले 50 सालों में जो साहित्य लिखा गया, उसमें सारा बढ़िया नहीं है और जो बढ़िया है –गुटबाजी के चलते, उसकी चर्चा कम हुई। मौलिक चिंतन प्रधान साहित्य कम लिखा गया, फिर भी कुल मिलाकर साहित्य की रचनात्मक भूमिका से मैं संतुष्ट हूं। ‘
पत्रकारिता और साहित्य के संबंध में डॉ. भारती ने कहा कि पत्रकारिता दो प्रकार की होती है-अखबारी पत्रकारिता और बौद्धिक या साहित्यिक पत्रकारिता। अखबारी पत्रकारिता में लूटपाट, राजनीति, हिंसा, बलात्कार जैसे समाचार होते है। वे इस ढंग से प्रस्तुत किए जाते हैं कि उनका विचार तत्व खत्म हो जाता है, इसविए वे तुरंत बासी हो जाते हैं। जबकि साहित्यिक, मासिक, त्रैमासिक पत्रिकाएं लोग संभालकर रखते हैं। क्योंकि उनमें विचार तत्व प्रधान होता है। मगर विडंबना यह है कि अखबारी पत्रकारों को सारी सुविधाएँ मिलती हैं और पत्रिकाओं में काम करने वालों को प्रायः न तो सुविधाएँ मिलती हैं, न मान्यता। सच्चाई यह है कि इन्ही पत्रिकाओं से साहित्य का विकास होगा, बौद्धिक चेतना बढ़ेगी और नए दौर की चुनौतियों का सामना किया जा सकेगा। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के बंद होने को डॉ. भारती कोई निऱाशाजनक या चिंताजनक बात नहीं मानते. उनके अनुसार जैसे लोग बूढ़े होते हैं, मरते हैं, उसी प्रकार पत्र-त्रिकएँ भी बूढ़ी होती हैं, मरती हैं। फिर पुनर्जन्म भी होता है, जैसे ‘हंस‘ का हुआ। आज की समय की आवश्यकता के अनुसार नई-नई पत्रिकाएँ छप रही हैं, जो खेल, सौंदर्य, महिला स्वास्थ्य, ज्योतिष जैसे नए विषयों को उभार रही हैं। इसके अलावा पत्रिकाओं की गिनती के साथ-साथ उनकी प्रसार संख्या भी महत्वपूर्ण है। आज ‘ नंदन‘ ढाई लाख छापते हैं, इससे पहले केवल पराग 1लाख तक छपती थी, बाकी सभी पत्रिकाएँ केवल 20-25 हजार तक छपती रहीं। ‘कादंबिनी ‘ भी लगभग 1लाख छप रही है, जबकि अन्य पत्रिकाएँ 8-10 हजार छपती हैं, ऐसे में, अच्छी पत्रिका ही दस के बराबर हैं।
बाल-साहित्य को लोकप्रिय बनाने के प्रश्न पर डॉ. जयप्रकाश भारती जी का उत्तर था , ‘ बाल पत्रिकाओं द्वारा ही बाल-साहित्य को बच्चों तक पहुंचाया जा सकता है, उसे लोकप्रिय बनाया जा सकता है। यदि माता-पिता तथा अध्यापक बाल पत्रिका पढ़ने के लिए बच्चों को प्रेरित करें, तो अच्छे परिणाम आएँगे। अभी दिल्ली पब्लिक स्कूल, वसंतविहार के हिंदी विभाग ने एक नवीन, अद्भुत प्रयोग शुरु किया है। हिंदी शिक्षण को रोचक बनाने का यह सर्वथा मौलिक तथा अत्याधिक महत्वपूर्ण प्रयोग है। यदि बाकी स्कूल भी, कुछ इसी प्रकार का प्रयास करें, तो आने वाली सदी में, निश्चित रूप से बाल-साहित्य के क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी।‘
हिंदी के स्थापित गीतकार डॉ. रमानाथ अवस्थी की दृष्टि में, ‘ पिछले पचास सालों में से शुरू के कुछ सालों लगभग 1955-1960 तक, कहानी, नाटक, निबंध, कविता, लगभग सभी विधाओं में अच्छा सृजन हुआ। उसके बाद ज्यों-ज्यों आदमी भौतिक जाल में फंसता गया तो वह साहित्यकार होने के साथ-साथ सुविधापरस्त होता गया। ये सुविधाएं कला को पैना नहीं होने देती। सौभाग्य से मुझे इलाहाबाद में महान साहित्यकारों-पंत, निराला, महादेवी, बच्चन जी के साथ रहने का अवसर मिला। निराला जी ने दारुण जीवन जीया, वही उनकी रचनाओं में व्यक्त हुआ। आज साहित्यकार शब्द से अवश्य जुड़े हैं, मगर वह भीतरी दर्द नहीं समझते, जो साहित्य को शाश्वत बनाता है। तुलसी, सूर, मीरा, कबीर आदि संतों का जैसा जीवन था, वैसा जीवन यदि आज का रचनाकार जीने को तैयार हो जाए, तो जनमानस पर उसकी रचनाएओं का भी प्रभाव अवश्य पड़ेगा। यदि मैं जो लिखता हूँ, उसे मैंने जिया हो, तो वह पाठक श्रोता को अच्छा लगेगा, उनके भीतर को छुएगा। आज हम सुविधा पाने के लिए कष्ट उटा रहे हैं। इसी चक्रव्यूह में साहित्यकार भी फंसा है। सन् 1960 तक आदर्श स्थिति रही । उस दौर में धर्मवीर भारती, इलाचंद्र जोशी, कमलेश्वर, विजयदेव नारायण साही आदि से रोज कॉफी हाउस में मुलाकात होती थी। पास में रिक्शे के पैसे नहीं होते थे, इसलिए पैदल ही चलना पड़ता था। तब हम अभाव में थे, तो अच्छी रचनाएं जन्म लेती थीं। आज हम ठाठ-बाट में हैं, तो कविता ठाट से गिर गई है। आज रचनाकार ही प्रकाशक भी बन गए हैं। यह बुरा नहीं है, मगर अपना रचना धर्म छोड़ना ठीक भी नहीं है। मेरे लिए रचना तो प्रभु का प्रसाद है, मगर आज ज्यादातर रचनाकार सोचते हैं कि इससे मुझे क्या लाभ होगा ? आज दृष्टि पुरस्कारों पर केन्द्रित हो गई है। नए प्रलोभनों ने रचनाधर्मिता को कुंठित किया है, उसे घोटिल किया है। मेरे आदर्श तो आज भी बाबा तुलसीदास हैं। वे ही सच्चे अर्थों में जनकवि थे। आज ड्राईंगरूम कवि, जिन्हें न कोई पढ़ता है, न सुनता है, जनकवि बने बैठे हैं। आज का साहित्यिक परिवेश भौतिक घटाओं के नीचे दबा है।‘
इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से साहित्य के विकास के प्रश्न पर डॉ.अवस्थी तपाक से बोले, ‘ मेरा मानना है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया साहित्य का उद्धार कभी नहीं कर सकता। आज हमारा इलेक्ट्रानिक मीडिया उस नारी को सरेआम बेइज्जत करने पर तुला है, जिसकी पूजा की जाती थी। वहाँ विज्ञापन ही कार्यक्रम की सफलता का आधार है। यदि कवि सम्मेलन टी.वी. पर दिखाया भी जाता है तो रात 11 बजे क्योंकि और कार्यक्रमों को उससे ज्यादा विज्ञापन मिलते हैं। ‘ श्री भीष्म साहनी के ‘तमस‘ को टी.वी. के माध्यम से अधिक लोकप्रियका मिली, इस सवाल के जबाब में डॉ. अवस्थी का मानना है कि तमस की भाव भूमि अत्यधिक गहन है। टी.वी. ने जो दिखाया, वह बुरा नहीं है, मगर जो गहन विचार रचना पढ़कर मिलता है, वह टी.वी. पर उसे देखने से नहीं मिलता। गीतकार के रूप में आज की मंचीय कविता पर उनकी टिप्पणी बड़ी तीखी तथा बेबाक है-‘ आज मंच की कविता चुटकुले बाजी तक सीमित हो गई है। नेताओं पर चुटकुले चलते हैं। अच्छी कविता कोई सुनने को तैयार नहीं है। लालकिले के कवि सम्मेलन के बारे में, मैंने वहीं मंच से साफ साफ कहा था कि लालकिले के इस सम्मेलन से ज्यादा भ्रष्ट कवि सम्मेलन देश में दूसरा नहीं होता। कविता लिखना ‘ ए ‘ श्रेणी का काम है, तो कविता सुनना ‘बी‘ श्रेणी का। क्या आज के नेता इस लायक हैं कि इन पर कविता लिखी जाए? ‘
वर्तमान कविता की स्थिति डॉ. रमानाथ अवस्थी के शब्दों में ‘ मैं अभी निराश हूं। अभी शब्द पर बड़ा अंधेरा है। आज का साहित्य प्रचार-प्रसार और सुख की तवाश में, जनमानस ले दूर हो गया है। भगवान करें कि वे मेरी निराशा को आशा में बदव दें।‘
वरिष्ठ साहित्यकार तथा दैनिक भाष्कर, राजस्थान के प्रधान संपादक श्री कमलेश्वर जी के अनुसार-‘ पिछले 50 वरषों में जो भी साहित्य आया है, उसने साहित्य की सरहदों को अनुभव तथा अभिव्यक्ति के क्षेत्र में आगे बढ़ाया है। फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन से शुरु हुई आंचलिकता, प्रयोगवादी कविता, नई कहानी से होते हुए, काफी आगे बढ़ी। रचनाकारों ने बहुत ही मोहक प्रयोग किए, जिनसे हमारी क्षेत्रीय अस्मिता उजागर हुई। भाषा के स्तर पर हिंदी, जिसके साथ कई बोलियां जुड़ी हुई हैं, में राजस्थान, बिहार तथा कई अनजान क्षेत्रों में अच्छा काम हुआ है। हिंदी में बनारस और इलाहाबाद की केन्द्रियता को व्यापक विस्तार मिला। वर्तमान उत्तरशती में अन्याय के प्रति चेतना जागृत हुई। इसे दलित साहित्य, महिला साहित्य आदि खांचों में रखकर देखना, साहित्य के इतिहास की दृष्टि से भले ही ठीक हो, व्यापक पाठक वर्ग की दृष्टि से बिल्कुल उचित नहीं है। इसी के साथ-साथ इस दौर की सीमाएं भी साफ उजागर होती हैं। शोषित वंचित लोगों के दुःख एक ही प्रकार से बारबार दोहराए गए, जिससे साहित्य में नवीवीकरण बाधित हुआ तथा एकरसता बढ़ी। इसी प्रकार व्यंग्य साहित्य राजनीति तक सीमित होकर रह गया। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी का जो ललित लेखन था, वैसा अब दिखाई नहीं देता। मंचीय व्यावसायिकता भी बढ़ी है।
भावी पूर्वशती के साहित्य के संबंध में. अपने विचार व्यक्त करते हुए कमलेश्वर ने कहा कि आने वाले समय में, शब्द बहुत महत्वपूर्ण होगा। वाचिक शब्द की अपेक्षा लिखित शब्द ज्यादा स्थाई होगा। शब्दों को बारबार बोलकर हमने उन्हें खोखला कर दिया है, आज रचनाकार को उन्हें नए अर्थों से भरना पड़ रहा है। आज राजनेता, प्रशासनिक तंत्र, पुलिस, विलंबित न्याय मिलकर जो अव्यक्त अन्याय पैदा करते हैं, उससे अपने शब्दों को बचाना तथा उनकी अर्थवत्ता को जीवित रखना आने वाले समय में साहित्यकार के लिए एक जरूरी मगर मुश्किल काम होगा।
क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया साहित्य का विकास करेगा या उसे मार देगा? इस प्रश्न के उत्तर में कमलेश्वर जी ने तुरंत कहा, ‘ इलेक्ट्रानिक मीडिया शब्दों की बहुलता से जीवित रहता है, उसमें भाषा और शब्द का संस्कार दिखाई नहीं देता। महादेवी वर्मा का गद्य पढ़िए और आज इलेक्ट्रानिक मीडिया पर दिए जाने वाले गद्यात्मक परिचय सुनिए, तो दोनों का अंतर स्पष्ट दिखाई देगा। लिखित शब्द अपनी छायाओं के साथ आते हैं, उनमें अतीत की झंकार होती है, जबकि मीडिया में शब्द की यह झंकार गायब रहती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया को साहित्य पर निर्भर होना ही पड़ेगा, साहित्य के बिना यह लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ पाएगा। टी.वी. पर समाचार आखिर कितनी देर देखे-दिखाए जा सकते हैं। यही वजह है कि सारे समझदार तथा सोचने वाले, इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ-साथ, पुस्तक लेखन से भी जुड़े हैं क्योंकि वही स्थाई है। प्रिंट मीडिया का वैज्ञानिक प्रबंधन भी अगली पूर्वशती में जरूरी हो जाएगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया साहित्य को विश्वव्यापी बनाएगा। पूरे दक्षिणी गोलार्द्ध में फारसी तथा हिंदी साहित्य की ही गूंज है क्योंकि इन दोनों भाषाओं में ही पुरानी परंपरा मौजूद है। हिंदी ने तो फारसी को भी अपनाया है। इसलिए इलेक्ट्रानिक मीडिया से घबराने की जरूरत नहीं है।
हिंदी साहित्य के इन दैदीप्यमान नक्षत्रों से हुई बातचीत से एक बात तो यह स्पष्ट हुई कि सभी प्रबुद्धजन आज जीवन मूल्यों में आई गिरावट और पश्चिम के अंधानुकरण से चिंतित तथा व्यथित हैं। सभी रचनाकार वर्तमान साहित्य की स्थिति से असंतुष्ट हैं। उनका मानना है कि साहित्यकार को ऐश्वर्य से ऊपर उठकर ईश्वर प्राप्ति हेतु सक्रिय होना चाहिए। सुविधापरस्ती के आदर्श से, नीचे नहीं उतरना चाहिए। भावी पूर्वशती के साहित्य के स्वरूप के संबंध में भले ही विद्वत समाज एकमत न हो, परन्तु इलेक्ट्रानिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव से सब सहमत हैं। साहित्य को जीवित रखने तथा उसका समुचित प्रचार-प्रसार करने के लिए संप्रेषण के माध्यमों में भी समय के अनुसार परिवर्तन लाना आवश्यक है। हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के शुभचिन्तकों को कम्प्यूटर, इंटरनेट जैसी सुविधाओं को अपनाना होगा। इनका अधिकतम उपयोग करके ही, भावी पूर्वशती में एक नई क्रान्ति लाई जा सकती है।
'मुझे क्या पता था कि एक दिन मैं साहित्य की दुनिया में सदस्यता हासिल कर लूंगी? मैंने कब सोचा था कि कलम और कागज मेरी जुबान हो जाएंगे और मैं मनचाही इबारत दर्ज कर पाऊंगी। हां, इतना जरूर था कि मैं कक्षा में पढ़ाए जाने वाले कवियों-लेखकों के जीवन परिचय अपनी बाल्यावस्था में ही गौर से पढ़ने लगी थी। उनकी तस्वीरें घंटों देखती रहती। तस्वीर के बाद उनकी कविता पढ़ती और फिर चित्र देखती। कैसा विलक्षण समय था। वह अपने आप को भूलकर दूसरों की प्रतिभा क्षमता में खो जाना और फिर नन्ही सी आस संजो लेना।
सुभद्रा कुमारी और मैथिली शरण गुप्त की कविताएं आज तक उस पुराने रजिस्टर में दर्ज हैं, जिसके पन्ने भी पुराने हो चुके हैं। मैथिली शरण गुप्त की पंक्तियां 'जितने कष्ट-संकटों में, जिनका जीवन पुष्प खिला। गौरवगंध उन्हें उतना ही, यत्र तत्र सर्वत्र मिला' मेरे हृदय में ऐसे बस गई जैसे कोई कारगर मंत्र हो। यह अनजाने ही मुझे आगे बढ़ाती रही उन मुश्किलों में भी,जिनमें घिरकर मुझे पीछे लौटने का रास्ता न मिलने पर खत्म हो जाना चाहिए था। मगर खत्म तो क्या, मैं तो थमी तक नहीं। लोग कहते हैं, साहित्य क्या करता है? कोई बदलाव करता है क्या? मैं तब क्या कहूं?
मैं तो यही कह सकती हूं कि प्यार करना तो मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति होती है, लेकिन उसको पुष्ट करता चलता है साहित्य। जब किशोरावस्था के दिन शुरू हुए गोपालदास नीरज की कविताएं हाथ लग गई। किशोरी को प्यार करने का हक समाज देता ही कहां है? बार-बार समझाया गया कि विपरीत सेक्स के साथ प्रेम करना अपराध है। फिर यह कौन कह रहा था कि 'प्यार अगर थामता न उंगली, पथ में इस बीमार उमर की। हर पीड़ा वेश्या बन जाती, हर आंसू बंजारा होता' यह कविता मुझे ठीक उस वक्त मिली थी जब मेरे कच्चे कोमल प्यार भरे दिल को मनमाने उपदेशों के साथ सजाओं के थपेड़े दिए जाते रहे थे। और मैं बराबर उसी ओर बढ़ती चली जा रही थी, जहां से हाथ-पांव बांधकर मुझे खींचा जा रहा था। मन में ये पंक्तियां पुरजोर तरीके से गुंजायमान थीं-'वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गीत। निकलकर नयनों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।' बेशक मैं कच्ची उम्र की वियोगिनी थी और समझ रही थी कि एक दिन मेरे आंसुओं में से किसी कविता का बहना अवश्यंभावी है।
अखबार, पत्रिकाएं और कुछ कविता संग्रहों का खजाना हाथ लगता रहा और मैं मोहर-अशर्फियां चुनती रही। रजिस्टर के पन्नों पर लिख-लिखकर उन कविताओं का कोष तैयार कर लिया। और देखिए, जहां चाह तहां राह! मैं कविता तो नहीं लिख पाई, लेकिन सुंदर अनुपम सौगात सा प्रेम-पत्र आ गया। क्या मेरा विरही प्रेमी मुझसे भी पहले वियोगी कवि बन गया? उसके नयनों से कविता चुपचाप बही और कमल-फूलों के रेखांकन के साथ कापी के पन्ने पर रंगोली सी रच गई। वह काव्यात्मक रंगोली जब मुझ तक आई, मेरी आंखों के सामने अपने स्वास्तिक पद्मों की छवियां बिखरने लगी, मेरी आंखें, आंखें नहीं, आकाश हो गई, जिनमें हजारों सुनहरे सितारे झिलमिलाए। लोग कहते हैं-यह कविता-फविता क्या करती है आखिर? क्यों समय बरबाद करती हो इसमें? उनसे क्या बतलाऊं कि सारे जगत का सौंदर्य, दुनियाभर में जितना सुकून होगा, वह सारा का सारा, दोस्ती का प्रगाढतम जुनून मुझे अपने उस स्कूल में मिला था, जिसके पीछे ऊंचा श्योरा पहाड़ सूरज की रोशनी और चंद्रमा की चांदनी में चमकता-दमकता था।
पहाड़ की चोटी से स्कूल के प्रांगण तक इंद्रधनुषों की डोरियां रंगीन बंदनवार बना देती थीं। मेरे जीवन को सुंदर से सुंदरतम बना दिया था कविता ने। मुझे नहीं पता कि दूसरे लोग कविता के मौसम को आखिर किस कठोरता के शिकंजे में फंसकर नजरंदाज कर जाते हैं? सचमुच जीवन के सुंदर सत्य से वंचित रह जाते हैं क्या इसलिए ही दूसरों से भाषात्मक धरातल पर जुड़ नहीं पाते। फिर वे कल्याणकारी चेतना को कैसे हासिल करेंगे? और लगाव जुड़ाव के बिना जीवन बीहड़ होता जाए तो इसमें किसी का क्या दोष? कविता से लगाव हुआ, कविता लिखने का मन बहुत किया। कविता लिखी तो उसे साधने के यत्न में खुद को अनुशासित करने का संकल्प लिया।
मगर जरूरी तो नहीं कि आप जिसे [कविता को] चाहें, वह भी आपके आगोश में आ जाए। यह तो बेलाग बात है कि कविता लिखने वाला लड़का कविता को साध चुका था और इसी कारण उसका हृदय विशाल था। मेरी बचकानी रचनाओं को भी प्यार सहित स्वीकार कर रहा था। अब यह अलग बात है कि हम साहित्य पर बात करने लगे थे और वह अपने उद्गार गद्य के रूप में मुझे भेजने लगा था। गद्य भी कैसा कि मैं चकित-सी पढ़ती चली जाऊं। क्या वे गद्यात्मक कविताएं थीं? शायद उन पत्रों ने ही मेरी रुचि को आज लिखी जाने वाली कविताओं से जोड़ा है। जो कुछ मैंने लिखा, लगा कि यही मेरे लेखन का रास्ता है। कविता, कहानी, उपन्यास सिर्फ विधाओं के नाम हैं, वरन् हैं ये सब अपने लगाव-जुड़ाव, हमदर्दी और चेतना को व्यक्त करने के रास्ते।
इसी तरह किशोर-किशोरियों का प्रेम, आकर्षण, मिल-बैठने की तीव्र इच्छा, संवाद की सहभागिता को आशनाई कहें या आवारापन, दोस्ती मानें या याराना, महज शब्दों के संबोधन हैं। असलियत में तो मनुष्य होने के नाते सामूहिक और सामाजिक होना ही है। वह भी अपनी-अपनी पहचान के साथ। साहित्य व्यक्ति की पहचान का हिमायती है, वरन इस संसार के तमाम जालों में आदमी को खोते हुए देर नहीं लगती। मुझसे कितनी बार कहा गया है, बार-बार समझाया गया है कि एक शादीशुदा औरत को कुंवारेपन में बने मित्रों/प्रेमियों को भुला देना ही उसके सतीत्व की निशानी है।
'सतीत्व' यह शब्द हमारी जिंदगी में उस भारी पत्थर के मानिंद है, जो भावनाओं को बेरहमी से कुचल डालता है। जिसने कविता के रूप में मेरे जीवन में प्रवेश किया और मुझे मोहब्बत का संदेश दे दिया, जिससे हमदर्दी के सोते फूटे, वह क्या साधारण था? साधारण से असाधारण होकर कोई अपना वजूद कायम रखे, क्या यह करिश्मा है? नहीं, करिश्मा तो क्षणजीवी होता है। सब जानते हैं कि साहित्य जो जमीन पर रचा गया, आसमानों तक पहुंचता है। शब्द जो कविता और कथाओं में जज्ब हो गए सदियों तक अपना अस्तित्व कायम रखते हैं। कितनी लंबी उम्र होती है उन हृदयस्पर्शी रचनाओं की जिनको इनके रचयिताओं ने कुछ दिन या महीनों में कागज पर उतार दिया था।
इतनी लंबी कि रचनाकार अपने शारीरिक रूप में भले बूढ़ा हो जाए, स्वर्गवासी हो जाए, हमारे बीच बराबर बना रहता है। जब-जब हम नफरत के जंजालों में फंस जाते हैं, प्रेम हमें एक पंक्ति के सहारे निकाल लेता है। जब कभी हम बाधाओं में रुक जाते हैं, कुछ शब्दों का आह्वान आगे बढ़ने के लिए काफी होता है।
कैसी हास्यास्पद बात है कि साहित्य जगत में ही चिंताएं होने लगती हैं साहित्य के पाठक नहीं रहे। अब साहित्य कौन पढ़ता है? इन बातों के उत्तर में क्या कहा जाए? यही कि जो साहित्य नहीं पढ़ता मनुष्यता से वंचित हो जाता है! प्रवचन और उपदेश देने वालों की अपने समाज में कोई कमी नहीं, लेकिन मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने में उपदेशों का दखल सबसे कम होता है। आदमी की प्रवृत्ति ही ऐसी होती है कि वह ऊपर से थोपे हुए को ज्यादा देर वहन नहीं कर पाता। वह उसे आत्मसात कर लेता है, जिसमें अपनी आंतरिक झलक पाता है। बार-बार यही सोचती हूं, वे कौन से मुहूरत होते हैं जिनमें रचना जन्म लेती है, हर बार यही सामने आता है कि जब मैंने कुछ लिखा, रचना तब नहीं हुई थी, बल्कि जब मैंने मन-भावन कुछ पढ़ा रचना वहीं से फूट निकली। यह मेरा अपना किया धरा नहीं, कई कवियों-लेखकों यहां तक कि साहित्य की ओर ले जाने वाले मित्रों का सामूहिक प्रयास था। बीज उन पत्रों में था जो मुझे लिखे या मैंने लिखे।
आज यह दुख तो है कि पत्र लिखने का चलन निरंतर कम हो रहा है, चिंता यह है कि हार्दिक भावनाएं अपने विस्तार में क्षीण होती जा रही हैं। मेरी तरह न जाने कितने साहित्यकार पत्रों से प्रेरणा पाकर रचना में उतरे होंगे। याद करने पर अपने वे प्यारे-दुलारे याद आ जाएं। मोहब्बत के लिए यह भी कम तो नहीं। स्मृतिया रचनाकार का निजी खजाना होती हैं, मगर कितने लोग यादों को सहेज पाते हैं?
अक्सर ही मान लिया जाता है कि पुराने दोस्तों का अब जिंदगी में क्या अर्थ? कि कच्ची उम्र के आकर्षण आदमी की भूल हुआ करते हैं कि भावनाओं से जिंदगी नहीं चला करती ये सारी बातें जिंदगी से जोड़ दी जाती हैं और इनके जुड़ते चले जाने से हमारा जीवन सूखा काठ होता जाता है। जिसे सदा ही मुझे 'नादानी' कहकर दरकिनार करने के लिए कहा, सच मानिए इस कृत्य की कल्पना से ही मैं घबरा गई। सोच-समझ वालों से दूर रहकर सुकून मिला, शायद इसलिए कि रचनात्मक जीवन सिद्धांतों पर नहीं चलता, अनुभवों से निकली तपिश ही विचारों को जन्म देती है। और ये विचार कविता कथाओं में ही नहीं, मामूली आदमी की बोली बानी के मुहावरे में बड़ी सहजता से मिल जाते हैं।
जब कोई पूछता है, आपको लेखक बनने की प्रेरणा कहां से मिली तो मैं क्या उत्तर दूं? जिंदगी चली जा रही थी, रास्ते में कवि लेखक ही नहीं, वे लोग भी मिले जो हल चला रहे थे, पत्थर तोड़ रहे थे, पल्लेदारी कर रहे थे, अध्यापक थे और थे डॉक्टर, नायब तहसीलदार, विकास खंड के लोग और मेरे सहपाठी, इनमें से कौन क्या-क्या देता चला, वह सब रचनाओं में शामिल होता गया। मेरे लिए उनकी दी हुई वह ऐसी दौलत थी, जिसे मैंने दोनों हाथ लुटाया और वह निरंतर बढ़ती फैलती चली गई। यहां जो कुछ समृद्ध हुआ, वह था हमारी मोहब्बत का जज्बा।
हम एक जादू के अन्दर थे उसी तरह, जैसे प्रेम, स्वप्न या दुख के अन्दर होते हैं।
इस तरह हम पहली बार थे हालांकि, दूसरी सारी चीजें वैसी ही थीं जैसे कई बार पहले भी रहती थीं, छोटा सा लॉन अमरूद का पेड सुबह दो बजे की चांदनी अक्टूबर के आखिरी दिन ओस सन्नाटा चहारदीवारी की मुंडेर पर ऊंघती बिल्ली। ये सब हमेशा ही इस जादू का हिस्सा होते थे या कि उसे रचते थे, पर हम इसके अन्दर इस तरह पहले कभी नहीं होते थे। आज थे।
'' मैं एक बार मां को देख आऊं? '' वह बैंच से उठ गई। शराब का गिलास उसने बेंच के एक कोने पर रख दिया। '' तुम्हें कुछ चाहिये?'' '' नहीं।'' मैं ने सिर हिलाया। पहला कदम बढाने पर वह एक क्षण के लिये लडख़डाई फिर पांव संभाल कर रखती हुई अन्दर चली गई।
मैं चुपचाप उसे जाते हुए देखता रहा। धीरे धीरे चलती हुई वह बाहर वाले कमरे के अंधेरे में गुम हो गई। मैं ने पहली बार महसूस किया कि इस तरह अचानक उठ जाने से वह अपने पीछे कुछ छोड ग़ई है। बहुत समीप का खालीपन। बैंच का एक रिक्त हिस्सा।
मैंने फिर कमरे की तरफ देखा। उसके भी अन्दर वाले कमरे का पर्दा हिला। वह फिर आती हुई बाहर वाले कमरे के अंधेरे में दिखी उसे और गाढा करती हुई। धीरे - धीरे बाहर आई वह। मैं उसे देख रहा था। उसकी काया में एक विलक्षण आलोक था। स्निग्ध तरल उसके बाल खुले थे। उसकी छोटी देह छोटे अंग उस आलोक में थे। पंजे हथेलियां गर्दन चेहरा।
वह बैंच पर अपनी उस जगह पर बैठ गई। गिलास उसने फिर हाथ में ले लिया। कुछ क्षण उसने गहरी सांस ली फिर मुझे देखकर मुस्कुराई। '' देर हो गई?'' '' नहीं, पर अन्दर क्या था? इतनी रात को क्या हो सकता है, सिवाय सोने के।'' '' मैं नींद की गोली रख आई थी वही देखने गई थी कि खाई कि नहीं।'' '' फिर?'' '' खा ली।'' मैं चुप हो गया। मैं ने उसे देखा। उसके चेहरे की खाल खिंची हुई थी तबले के चमडे क़ी तरह। ऐसा सिर्फ शराब पीने के बाद होता था। खाल के इस तरह खिंचने पर उसकी लाली, उसकी बनावट, उसकी नसें और पूरी खाल का सांस लेना ज्यादा साफ और चमकदार हो जाता था।
वह एक बार और कांपी। उसके पंजे गीली घास पर थे। ओस गिरने से ठण्ड बढ रही थी। उसने पंजे उठा कर बेंच पर रख लिये। ''ढक लो '' मैं ने उसे अपनी चादर का एक कोना पकडा दिया '' या अन्दर चलें? '' वह कुछ नहीं बोली। चादर के उस कोने में उसने अपने पंजे छुपा लिये। वह बेंच पर थोडा घूम आई। अब उसका नन्हा चेहरा पूरी तरह मेरी तरफ था। घुटने मोडे हुए वह मेरे सामने बैठी थी। हम कुछ देर चुप रहे। '' बताओ जिन्दगी के फैसले किस तरह करने चाहिये?'' उसने पूछा। उसकी आवाज धीमी थी। '' कैसे फैसले?'' मैं ने पूछा। '' ऐसे जिन पर पूरा जीवन टिका हो या कि जिनसे जीवन का पूरी तरह बदल जाना तय हो।''
मैं चुप रहा। मैं ने सर घुमाकर देखा। मुंडेर पर बिल्ली ने अंगडाई ली। दूर किसी पेड पर एक परिन्दा चीखा। मैंने फिर उसे देखा। वह मुझे देख रही थी। मैं ने एक उंगली चादर के नीचे छुपे उसके पंजे पर रखी। उसकी उभरी नस मैं ने अपनी उंगली पर महसूस की। मैं ने उस उभरी नस पर धीमे - धीमे उंगली फेरी। उसकी आंखों में एक उदासी उतर आई। वह उस नस के छूने से नहीं बल्कि उस समग््रा आलोक से उतर रही थी जो उसकी काया में था।
'' ऐसे संशय भरे फैसले कभी आत्मा से नहीं लेने चाहिये। इसमें उसे सिर्फ दर्शक रहने दो।'' '' क्यों?'' उसने मुझे देखा। '' दो कारण हैं। पहला तो यह कि आत्मा को कभी ऐसे फैसलों की जरूरत नहीं पडती क्योंकि उसे कभी संशय नहीं होता। जीवन की दूसरी चीजों को यह जरूरत होती है। संशय बुध्दि को होता है, चेतना को होता है, अर्जित अनुभवों को होता होता है। जहां कहीं भी संशय है, वहां आत्मा नहीं होगी क्योंकि वह उसका नैसर्गिक सत्य नहीं है। या यूं कह लो कि जिससे आत्मा नहीं जुडती वहां संशय होता है। वास्तव में वह तुम्हारे अन्दर रहने वाला सत्य नहीं है। तुम उसे चुन रहे हो। दूसरा कारण यह है कि कभी ऐसे फैसले गलत हुए भी तो वह दुख नहीं होगा जो पूरे जीवन को एक गहरी अंधेरी गुफा में ढकेल देता है। आत्मा तब भी मुक्त होगीउस गलत निर्णयों के परिणामों में सिर्फ साक्षी होगी दर्शक होगी। निर्लिप्त निरपेक्ष नाटक के पात्रों पर ताली बजाती हुई।''
वह कुछ नहीं बोली। उसने अपने पंजे की उंगलियां हिलाईं। अपनी नस पर रेंगती हुई मेरी उंगली उसने अपने पंजों की उंगलियों के बीच दबा ली। उसकी आंखों में अब एक गीलापन उतर आया। वह अब जिन्दा मछलियों की तरह लग रही थी। उसकी उंगलियों की पकड बढ रही थी जैसे वह मेरी उंगली तोड देगी। धीरे - धीरे उसके होंठ फैले। मैं ने पहली बार देखा कि होंठ भी उदास होते हैं।
मैं ने अपनी उंगली खींच ली। मेरा गिलास खाली हो गया था। उसे मैं ने नीचे घास पर रख दिया। '' मैं चलूंगा।'' मैं ने कहा '' अभी नहींरुको।'' वह थोडा आगे झुक गयी। कुछ क्षण मैं बैठा रहा। वह मुझे देख रही थी। '' कब तक? '' '' जब तक बिल्ली मुंडेर पर है।''
मैं ने मुंडेर की तरफ देखा। बिल्ली उस पर चिपकी थी। गहरी नींद में थी शायद उसे सुबह तक वहीं होना है। मैं ने घास पर रखा गिलास उठा लिया। उसमें थोडी - सी शराब बनाई। उसने सर झुका कर अपने गिलास से घूंट भरा। '' तो आत्मा को दर्शक होना चाहिये जीवन के नाटक का दर्शक।'' उसने कहा। उसकी आवाज अब भारी हो गयी थी। ठण्ड से या शराब से या फिर अन्दर की तरल उदासी से। '' हां जब वैसे निर्णय करना हो।'' '' क्या यह संभव है?'' '' हां।'' '' आसान है? '' '' हां।'' '' नहीं इतना गणित जीवन में नहीं चलता। दृष्टि ऐसा हंस नहीं होती। तुम कर पाए ऐसा कभी?'' '' क्या?'' '' वही ऐसा कोई निर्णय जिस पर तुम्हारा पूरा जीवन टिका हो बिना आत्मा की लिप्तता के उसे सिर्फ दर्शक बनाकर।''
मैं ने सुना और उसी क्षण, बिलकुल उसी क्षण मेरे अन्दर एक बिंदु चमका। उद्भासित होता हुआ शिराओं में फैलता गहरा विचार बन कर। अदम्य लालसा बनकर। मैं हैरान था या कि संज्ञाशून्य। जिसे हम अपना जीवन कहते हैं, जिसे अदृश्य स्थितियों से निर्मित, पर एक अत्यन्त परिचत शरण मानते हैं, वह वास्तव में कितना अपरिचित, रहस्यमय, अविश्वसनीय होता है।
''बताओ? '' उसने फिर पूछा।
वह मुझे देख रही थी। मैं ने उसे ध्यान से देखा इस बार इस बार सिफ एक देह की तरह। उस चांदनी में उस जादू में उतरी हुई एक देह। कोमल लघु गीली सफेदी में आलोकित। उसके हाथों के सुनहरे रोएं उसके पंजों की नन्हीं उंगलियां उसकी सफेद गर्दन उसकी तबले - सी कसी खाल और उस पर उतरा हुआ कामुक गंध का एक जंगल।
मुझे पता था कि वह पिछले चार सालों से मेरे विवाह के प्रस्ताव की प्रतीक्षा कर रही है। मूक शांत अव्यक्त। हमारे सारे परिचित विस्मित थे कि हर तरह से योग्य और समर्पित दिखती हुई, उस ऐसी लडक़ी के साथ मैं ने अब तक ऐसा क्यों नहीं किया। मुझे भी नहीं पता था कि मैं ने क्यों नहीं किया। मुझे यह भी पता था कि वह बहुत आंतरिकता में गहनता से मुझसे प्रेम करती है। इतना गहन कि वह अन्तत: मौन हो गया था। किसी भी प्रतिक्रिया या अपेक्षा से रहित। मैं इसी तरह कभी - कभी उसके साथ बैठता था। मैं ने सिर्फ एक बार उसकी हथेली छुई थी। उसका भविष्य पढने के लिये। मुझे उसकी खाल का वह स्पर्श हमेशा याद रहा। उसकी आंखों में कौंधा उस एक क्षण का सुख या स्वप्न भी।
उस क्षण, बिलकुल उसी क्षण वही स्पर्श मेरे अन्दर एक परिन्दे की तरह फडफ़डाता उछला था। उसकी पूृरी देह मेरे सामने थी। प्रस्तुत तत्परआश्वस्त करती हुई। उसकी देह का विचार उसकी गहरी लालसा उसी जादू का असर थी। उसने पूछा था कि मेरा वह निर्णय, जिस पर मेरा जीवन टिका हो और जिसमें आत्मा सिर्फ साक्षी रहे नाटक का दर्शक बन कर ताली बजाये, मैं ने कब लिया? वह यही था। उसकी देह छूने का अर्थ था उसके सारे स्वप्नों सारी आकांक्षाओं को पंख देना। एक नये सम्बन्ध को जन्म देना। उसकी अपेक्षाएं, उसके अधिकार, उसके अस्तित्व की सततता को, उसकी कल्पनाओं को गतिशील करना था। एक अव्यक्त भ्रूण को जीवन का प्रकाश देना था। संभव था इस देह भोग के बाद हमारे बीच सिर्फ अपेक्षाएं शेष रह जायें संभव था सिर्फ निर्मम और सम्वेदनहीन और सम्वेदनहीन प्रतिक्रियाएं जीवित रहें संभव था कि यह सम्बन्ध कुरूप और बेहूदा हो जाये।
यह एक कठोर निर्णय था। हम दोनों के जीवन में एक ऐसा रन्ध्र पैदा करना था, जिसके पार एक दूसरी दुनिया थी और वह दुनिया मेरा अभीष्ट नहीं थी। मेरी वांछा नहीं थी। मेरा स्वभाव, मेरा सत्य नहीं थी। मेरी आत्मा निश्चित रूप से इसके लिये तैयार नहीं थी। मेरी लालसा, मेरे संशय, मेरी उत्तेजना और मेरी आत्मा की निर्लिप्तता? यही द्वन्द्व, यही द्वैत था जिसका प्रश्न वह मुझसे कर रही थी जो मैं ने उसे अभी एक दर्शन की तरह दिया था।
'' तो? '' उसने पूछा। '' हां, मैं ने ऐसा निर्णय लिया है'' मैं ने कहा। मेरा स्वर धीमा था। बहुत धीमा। उसमें मेरी आत्मा की शक्ति नहीं थी। सिर्फ देह की उत्तेजक फुसफुसाहट थी। '' क्या?'' '' फिर कभी'' मैं ने अपना हाथ आगे बढाया। निर्द्वन्द्व, निसंकोच वह मुस्कुराई। अपनी नन्ही सी हथेली उसने मेरे पंजे में रख दी। मैं ने उसे दबाया। उसने मेरी आंखों में देखा। मेरे पंजे में उसकी हथेली एक चिरौटे की तरह फडफ़डाई। उसके चेहरे पर धीरे - धीरे एक सुख उतरने लगा। उसके चेहरे पर कसी खाल ढीली पडने लगी।
मुझे पता था कि मैं पूरी तरह आमंत्रित हूं। मैं ने धीरे से उसे अपनी तरफ खींचा। ''रुको।'' उसने कहा। वह घास पर खडी हुई। अपने गिलास की बची हुई शराब उसने एक सांस में पी ली। गिलास घास पर लुढक़ा कर वह मेरे पास बैठ गई।
'' बिल्ली उठने वाली है।'' उसने मुंडेर की तरफ इशारा किया और मेरे सीने में दुबक गई। मैं ने उसके कान पर से बालों को हटा कर उस पर अपनी जीभ फेरी, '' यह याद रखना इसके पहले भी हमारे बीच कुछ नहीं था इसके बाद भी कुछ नहीं होगा। बस यही, इतनी देर का सत्य है यहजितनी देर हम इसे जियेंगे। बिलकुल इतना ही। जन्मा और मर गया। '' मुझे अपनी आवाज पहली बार कमजोर, निरीह, कांपती हुई लगी। मुझे यह भी लगा कि जीवन के जिस अंश में आत्मा नहीं होती, वह जीवन की सिर्फ छाया होती है छद्म होता है।
उसने अपना सर ऊपर उठाया। उसकी आंखें मेरी आखों के पास थीं। बहुत पास। मुझे उनका कत्थईपन दिख रहा था। चांदनी उसके चेहरे पर दिख रही थी। होंठों पर चिपका गीलापन भी। कांपती ओस उसकी फूली नसों पर थी। उसने कुछ क्षण मुझे देखा। उस दृष्टि में एक महाख्यान था। सृष्टि के सारे रहस्य थे। जीवन के सारे गुह्य और सूक्ष्मतम अणु थे। उस दृष्टि में एक क्षण के लिये पानी उतरा। उसमें थरथराहट थी वैसे ही जैसी शाख से टूटकर गिरती पत्ती में होती है। दृष्टि का वह पानी फिर उड ग़या। वहां प्रेम उतर आया। मद की शिथिलता और कामना की चमक से से संतृप्त। अलग से दिखता हुआ।
वह मुस्कुराई। मैने जो कहा यह उसकी स्वीकृति थी। मुझे पता था यही होगा। मुझे मालूम था मेरा कोई भी सुख उसे स्वीकार होगा। उसने मेरे सीने में सिर गडा दिया। '' यहीं '' वह धीरे फसफुसाई '' इसी जादू में।''
मैं ने इस बार उसके होंठों के गीलेपन पर जीभ फेरी। मुझसे अलग होकर वह बैंच पर लेट गई। उस पर झुकने से पहले मैं ने मुंडेर की तरफ देखा। वहां अब बिल्ली नहीं थी। वहां मेरी आत्मा बैठी थी अब। दर्शक की तरह ताली बजाती हुई। मैंने उसकी बंद होती आंखों में देखा। उसकी आत्मा वहीं थी।
इसके सात महीने बाद उसने शादी कर ली।
उस रात सब कुछ जल्दी खत्म हो गया था। मैं अनुभवहीन था। मुझे स्त्रीदेह के सूत्र, उसका तन्त्र, उसकी लय, उसके आरोह - अवरोह का ज्ञान नहीं था। उसने मुझे बर्दाश्त ही किया था बस। जाने से पहले मैं ने एक बार फिर अपने भय से मुक्ति चाही थी।
'' जितनी देर भी थे, हम एक गुफा में थे देह की यह गुफा हमारा सच नहीं है उसके बाहर की दुनिया, इसकी हवा रोशनी सच है।'' उसने मुझे चुपचाप देखा था एक बार, फिर झुककर घास पर उलटे दोनों गिलास उठा लिये थे। '' जाओ अब'' उसने धीरे से कहा था। मैं चला आया था।
उसके बाद मैं दो बार फिर उससे मिला। हमारे बीच उस रात की कोई बात नहीं हुई।
उसी के बाद उसने शादी करने का फैसला कर लिया। मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। उसे एक पुरुष की जरूरत थी। उसकी बीमार मां को भी। लडक़े के सामने उसने एक ही शर्त रखी। वह शहर कभी नहीं छोडेग़ी। उसे पता था कि मैं जीवन भर इसी शहर में रहने वाला हूं।
शादी के बाद मां को वह अपने साथ अपने नये घर ले गई थी। मैं उसके नए घर में कभी नहीं गया था। उसने बुलाया भी नहीं। मैं ने उसे शादी के बाद, कई महीनों तक नहीं देखा।
हम अपने जीवन अलग - अलग तरीकों से जी रहे थे।
मुझे नहीं पता दुख का उत्स कहां होता है? कहां से जन्मता है वह और कैसे तिरोहित हो जाता है? उसकी सत्ता, उसकी व्याप्ति की परिधि भी मुझे नहीं मालूम। पर सर्दियों की उस दोपहर को एक नन्हें से धूप के टुकडे से मेरा वह दुख जन्मा था। निस्तब्ध, निर्मल, दीप्तिमान।
मैं छत पर था। मेरे पंजों के पास धूप का एक टुकडा था। सूप की शक्ल का। छत के एक कोने में कपडे सूख रहे थे। छत पर पौधे थे चिडियां थीं अन्न के दाने थेरुका हुआ पानी था। मेरी दृष्टि की परिधि में पूरा आकाश था। नीला - चमकदार। उसके नीचे धूप का सुनहरापन था। हल्का - हल्का कांपता आंच देता हुआ। उस सुनहरेपन के पार मिल की ठण्डी चिमनी थी चर्च की मीनार थी कोतवाली की घडी थी पुरानी इमारतें थीं। उनकी विशाल छतें, सौ साल पुरानी दीवारेंनक्काशीदार खिडक़ियों के झरोखे थे उभरे पत्थरों पर लिखे नाम थे। उससे भी पुराने पेड थे उनकी शाखें थीं। खामोशी का अनन्त विस्तार था। सृष्टि की अपरिमेय सत्ता का स्पर्श था और उसमें एक नन्हीं सी नाव सा तैरता मेरा अस्तित्व था।
उस पूरी संरचना में मैं एकाकी थानितान्त एकाकी। मेरी दृष्टि इन सब को देख रही थी पर उस तरह नहीं जैसे हमेशा देखती थी । मैं एक द्रष्टा था। तभी उस दुख ने जन्म लिया। मेरे अपने साक्षात्कार से अपने अस्तित्व के स्पन्दन से अपनी आत्मा के स्पर्श से। समाधि निष्क्रमणपरित्याग निर्लिप्तता और गहन एकांत से बुने दुख ने। मेरा द्रष्टा विराट हो रहा था। मैं खुद को भी देख पा रहा था। हल्की सूखती सी खाल थकी आंखें निरुत्साहित चेहरा शिथिल शिराएं सुप्त संज्ञाएं एक पुराना अप्रासंगिक अनावश्यक जीवन। द्रष्टा होने का यह दुख आक्रान्त नहीं कर रहा था। इसमें पीडा नहीं थी यातना नहीं थी। इससे मुक्त होने की छटपटाहट भी नहीं थी। उसे स्वयं तक आने देने का, स्वयं को आच्छादित कर लेने का सुख था। उसी क्षण बिलकुल उसी क्षण मुझे उसकी याद आई। उसकी अलौकिक काया की। एक भयानक तडप के साथ। मुझे छीलती हुई, अग्निपुंज की तरह दहकाती हुई। मुझे लगा कि इस पूरी सृष्टि पूरी प्रकृति में इस धूप छत के एकान्त, आत्मनिर्वासन असहायता में, मुझे उसकी देह की जरूरत है। बहुत जरूरत है। उसी क्षण मुझे एक नया बोध हुआ। गहरे दुख में स्त्री देह एक शरण है। चूल्हे की आंच में जैसे कोई कच्ची चीज परिपक्व होती हैउसी तरह पुरुष के क्षत - विक्षत, खंडित अस्तित्व को वह देह संभालती है धीरे - धीरे अपनी आंच में फिर से पका कर जीवन देती है। स्त्री देह कितनी ही बार, चुपचाप, कितनी ही तरह से पुरुष को जीवन देती है, पुरुष को नहीं पता होता।
मैं नीचे उतर कर आया। मेरे पास उसका फोन नम्बर था। इस बीच बहुत लम्बा समय बीत गया था, मुझे उसे देखे हुए या उससे बात किये हुए। कुछ देर घंटी बजने के बाद उसीने फोन उठाया। ''कैसी हो तुम?'' '' तुम? '' '' मैं ठीक हूं। आना चाहता हूं।'' मैं ने कहा। वह एक क्षण चुप रही फिर बोली - '' क्या होगया?'' '' कुछ नहीं।'' '' फिर?'' '' बस चाहता हूं।'' '' कब?'' '' अभी, इसी समय।''
वह फिर कुछ क्षण चुप रही फिर बोली - '' रुको मैं देख लूं जरा।'' उसने फोन रख दिया। कुछ देर बाद वह वापस आई। '' तुम्हें यह घर मालूम है?'' '' हां और सब कहां हैं?'' '' मां पीछे आंगन में लेटी है।'' '' और?'' '' वह बाहर है उसे रात को आना है।'' '' मैं आ रहा हूं।'' मैं ने फोन रख दिया।
मैं उसके घर गया। पहली बार। दो सीढियां चढने के बाद पीछे तक फैला हुआ, दोपहर का सन्नाटा था। इतना कि बाहर हवा में उडते पत्तों के दौडने की आवाज आ रही थी।
उसी ने दरवाजा खोला। एक क्षण मुझे देखा फिर दरवाजे से हट गई। मैं अन्दर आया।
कमरे में अंधेरा था। ऊपर के रोशनदान से एक चमक आ रही थी। वह ऊपर ही ऊपर थी। उसके नीचे अंधेरा था। वह मुझे और अन्दर के कमरे में ले गई। उसके सोने के कमरे के पहले का कमरा। छोटा सा एक हिस्सा था। फर्श पर बैठने का इंतजाम था। गद्दा कालीन कुशन कोने में लैम्प जल रहा था। उसी का प्रकाश था।
'' बैठो।'' उसने ईशारा किया। मैं सहारे से बैठ गया। वह भी पास बैठ गई। '' कुछ लोगे?'' '' नहीं।'' '' क्या हो गया?'' '' क्यों?'' '' बस यूं ही इस तरह अचानक।''
मैं ने उसे ध्यान से देखा। उसका चेहरा थोडा फूल गया था। खाल की चमक थोडी क़म हो गई थी। देह थोडी भारी हो गई थी। '' कोई आएगा तो नहीं? '' मैं ने पूछा। उसने मुझे एक बार देखा। '' नहीं।'' '' बन्द कर दो।'' मैं ने लैम्प की तरफ इशारा किया। वह उठी। उसने लैम्प बुझा दिया। मेरे पास फिर आकर बैठ गई वह। मैं ने उसकी वही नन्हीं हथेली अपने पंजों में दबा ली। उसे खींचा मैं ने। उसका चेहरा मेरे बिलकुल पास आ गया।
'' उसी गुफा में चलें।'' मैं उसके कान में फुसफुसाया। वह कुछ नहीं बोली। सर उठाया उसने। मेरी आंखों में देखा। उस अंधेरे में भी मैं साफ देख रहा था। उसकी आत्मा उस रात की तरह फिर उसकी आंखों में थी। मेरी कालीन के एक कोने पर तनी बैठी थी।
इसके बाद छह साल बीत गये। वह मुझे बाजार में मिली। उसके साथ एक छोटा बच्चा था। वह दुबली हो गयी थी। चेहरा निस्तेज हो रहा था। उसने बताया कि मां की मृत्यु हो गयी। वह अकसर बाहर रहता है।
'' यह कब हुआ? '' मैं ने बच्चे की तरफ ईशारा किया। '' देख सकते हो।'' वह धीरे से हंसी। उसकी हंसी के साथ तीखी गंध फैली। '' तुमने शराब पी है? '' मैं ने हैरानी से पूछा। '' थोडी सीडॉक्टर से पूछ कर।'' उसे सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी। वह हांफ रही थी। '' रोज पीती हो?'' '' हां।'' '' पूरा दिन?'' '' नहीं।'' '' क्यों?'' उसने सर घुमा लिया। '' चलूंगी।'' उसने बच्चे का हाथ पकड लिया। '' तुम ठीक तो हो?'' चलने से पहले उसने पूछा। मैं कुछ नहीं बोला। उसने एक बार मुझे देखा फिर बच्चे का हाथ पकड क़र चली गयी।
तीन साल बाद वह फिर मिली।दूसरे शहर की एक शादी में।
इन तीन सालों में उसने बस एक बार मुझे फोन किया था। अपने बच्चे के जन्मदिन पर बुलाने के लिये। मैं नहीं गया था।
उस शादी से हम साथ लौटे थे। उन दिनों रेल में दो बर्थ वाला फर्स्ट क्लास का कूपे होता था। मैं ने घूस देकर एक कूपे रिजर्व करा लिया था। स्टेशन पर ही मुझे वह मिल गई थी। उसका बच्चा अब बडा हो गया था। बोलने लगा था। वह मजबूती से उसका हाथ पकडे थी। हमारा सफर पूरी रात का था।
कूपे में हम बैठ गये। कुछ ही देर में गाडी ने स्टेशन छोड दिया। मैं ने कूपे अन्दर से बन्द कर लिया।
'' तुमने कुछ खाया? '' मैं ने पूछा। '' हाँ'' उसने बच्चे को कपडे से ढकते हुए कहा।
खिडक़ी से तेज हवा आ रही थी। अक्टूबर के ही दिन थे। रात हो चुकी थी। उसने बर्थ के सबसे किनारे पर बच्चे को लिटा दिया। उसके बाद वह बैठी थी। फिर मैं था।बच्चा हाथ पैर चला रहा था। वह उसे थपक रही थी उससे बात कर रही थी।
''यह कब सोता है?'' मैं ने पूछा। '' अभी सो जायेगा।''
मैं ने खिडक़ी के बाहर देखा। खेतों के पार चांद निकलना शुरु हो गया था। लाल बिलकुल। पूरा एक वृत्त ऐसा चांद शहरों में नहीं दिखता था। '' देखो।'' मैं ने उसका कंधा हिलाया। उसने सर घुमा कर चांद को देखा। देर तक देखती रही वह, उसकी देह मेरी देह को छू रही थी। मैं देख रहा था। बहुत तेजी से उसकी देह गल रही थी। उसकी काया का आलोक नष्ट हो चुका था। '' तुम ठीक नहीं हो।'' मैं ने कहा। '' क्यों? '' '' बहुत कमजोर हो चुकी हो।'' '' हां, बहुत बोझ है मां के बाद कोई नहीं है वह हमेशा बाहर रहता है बच्चा भी बडा हो रहा है।'' '' इन बातों से शरीर ऐसा नहीं होता। तुम बहुत ज्यादा शराब पी रही हो।'' '' हां वह भी है।'' वह धीरे से हंसी।
एक हाथ से वह लगातार बच्चे को थपक रही थी। उसका दूसरा हाथ मैं ने अपनी हथेली में दबा लिया। उसकी छोटी मुलायम उंगलियों की हड्डियां उभर आईं थीं। मैं उन्हें सहलाता रहा। '' तुम ऐसा क्यों करती हो?'' मैं ने धीरे से पूछा। वह कुछ नहीं बोली। '' हम अपना जीवन बहुत दूसरी तरह से जी सकते थे न।'' कुछ देर बाद वह बोली। '' पर तुम डर गए थे उस रात तभी तुमने वह दर्शन गढा था।'' मैं ने सर घुमा कर देखा उसका चेहरा साफ नहीं था। कूपे के अन्दर पूरा अंधेरा था। चांद थोडा ऊपर आ गया था। उसकी लाली खत्म हो गयी थी। उसकी रोशनी कूपे के एक हिस्से में थी। उसी में चेहरा दिख रहा था। माथे की सिलवटें उसके कानों पर गिरे बाल उदास थकी - थकी आंखें।
'' उतना और उस तरह मैं जीवन में कभी नहीं रोई जितना उस रात। मां के मरने पर भी नहीं। तुम्हारे जाने के बाद मैं ने पूरे कपडे पहने, बाहर निकली और खाली सडक़ों पर घूमती रही। बुरी तरह रोती हुई। मेरे आंसू बह रहे थे। मैं सडक़ों पर बदहवास तेज - तेज चल रही थी। हवा में कपडे उड रहे थे बाल बिखर गये थे।चांदनी ओस की ठंडक और घरों की दीवारों के नीचे फैले अंधेरे के गुच्छे। कोई मुझे उस वक्त देखता तो एक आवारा, बदचलन लडक़ी समझता या फिर शायद पागल। मुझे याद है उस रात मैं दोनों थी। मुझे याद है ठीक उसी क्षण ऊपर से एक जहाज ग़ुजरा, उसी क्षण एक कुत्ता मुंह उठा कर रोया, उसी क्षण मेरा पांव जले हुए राख पर पडा और उसी क्षण मैं ने तय किया कि शादी कर लूंगी। उसी क्षण मैं ने यह तय किया कि आत्मा को इससे अलग रखूंगी जैसा तुमने बताया था। यह संशय का दुविधा का निर्णय था अच्छा है पहले ही इसे अलग कर दो। उस रात मैं जब घर लौटी तो सब कुछ मेरे सामने साफ था। सारे सत्य प्रकाशित थे। गुफा के आत्मा के मां के भविष्य के।'' वह सांस लेकर चुप हो गयी। उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों में कांप रही थीं। हल्की सी पसीज गई थीं।
मैं खिडक़ी के बाहर देखने लगा। खिडक़ी के बाहर सब सफेदी में डूब चुका था। झोंपडे मवेशी खेत कुंए सूखी नहर थरथराते पुल। मैं निर्निमेष बाहर देखता रहा।
जीवन मृत्यु प्रेमस्वप्न जय पराजय पूरी सृष्टि, पूरा इतिहास इन्हीं का है। सबकी अपनी - अपनी सत्ताएं हैं अर्थ है व्याप्ति है। किसको जीवन में कितना क्या मिलता है और क्यों ह्न यह गहरा रहस्य है। अपरिभाषेयअविविेचित। मेरा भय और उसका सुख एक थे। उसकी आत्मा मेरी देह के सत्य एक थे। मेरे भय और उसके भय का तर्क, उसका सुख और उस सुख का तर्क एक ही परिधि में थे। मैं दोषी था या वह? यह हमारे बीच में फैला हुआ सृष्टि का वह निरंतर सनातन रहस्य जो दो आत्माओं को एक दूसरे में समाहित नहीं होने देता? यह क्यों होता है? क्यों इतना छोटा - सा जीवन सरल और परिभायेय नहीं होता? एक क्षण का शतांश भी क्यों हजारों लोग अलग - अलग तरह से जीते हैं? देह और आत्मा के सूत्र क्यों गणित के सूत्रों की तरह सिध्द और ज्ञात नहीं होते?
उसका दूसरा हाथ मेरी हथेली पर आया। मैं ने सर घुमा कर देखा। उसने बच्चे को थपकना बन्द कर दिया था। '' सो गया।'' वह धीरे से बोली। उसकी पसीजती उंगलियां मेरी उंगलियों से फिसल गईं। वह बर्थ से उठ गई। उसने बच्चे को बर्थ के बिलकुल किनारे लिटा दिया। बर्थ पर पूरी जगह बन गई थी।
वह वापस नहीं बैठी। मेरे सामने आकर खडी हो गयी। उसने हाथ बढा कर मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में दबाया। मेरे कानों को सहलाया। मेरे सिर को फिर अपने सीने में दुबका लिया। मैं देर तक उसी तरह दुबका रहा। मेरे कानों पर दो गर्म बूंद गिरीं। उसने मेरा सर अपने से अलग किया। उसे ऊपर उठा कर मेरी आंखों में देखा।
'' उसी गुफा में चलें? '' उसने पूछा। उसका चेहरा अभी अंधेरे में था। उसकी आंखों का गीलापन दिख रहा था। मैं ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।
बर्थ पर वह लेटी तो पूरी चांदनी उसके चेहरे पर थी। मैं ने देखा। उसकी आत्मा वहीं थी जहां रहती थी। मैं ने एक क्षण के लिये खिडक़ी से बाहर देखा।
मेरी आत्मा चांद पर बैठी तालियां बजा रही थी।
दो साल बाद।
कब्रिस्तान के पीछे पुरातत्व विभाग की छोटी सी पुरानी इमारत थी। मैंउन दिनों वहीं बैठ रहा था। कुछ पुराने सिक्के किसी खुदाई में मिले थे। उनकी लिपि पढनी थी।
यह शहर से बाहर का हिस्सा था। शांत और खुला हुआ। मेरी मेज क़े सामने खिडक़ी थी। वहां से कब्रिस्तान का एक साफ हिस्सा दिखता था। पुराने टूटे पत्थर भूले हुए समाधि लेख कब्रों पर उगी जंगली घास सूखे पत्ते जंग लगा लोहे का फाटक। उस कब्रिस्तान के साथ - साथ एक सडक़ जाती थी। यह सडक़ दोनों तरफ से ढाल से आकर उंचाई पर मिलती थी। मेरे सामने वाली सडक़ से जो भी आता था, हिस्सों में दिखना शुरु होता था, पहले बाल फिर माथा फिर चेहरा, फिर पूरा शरीर।
सिक्कों पर खरोष्ठी लिपि में कुछ लिखा था। बहुत देर तक अक्षर मिलाने के बाद मैं थक गया था। कुर्सी की पुश्त से टिका हुआ मैं सामने की खिडक़ी से आते हुए लोगों को देख रहा था। शाम का समय था, सडक़ खाली थी। मेरी सहयोगी लडक़ी कॉफी बनाने अन्दर गई थी।
तभी मैं ने उसे देखा। सडक़ की चढाई से वह धीरे - धीरे दिखना शुरु हुई। पहले बाल फिर माथा फिर गला, फिर धीरे - धीरे आती हुई थकी देह। वह मुझे अब पूरी तरह दिख रही थी। वह अब सडक़ पर आ गई थी। एक घर की दीवार के साथ हाथ टेक कर खडी हो गई। वह गहरी सांसे ले रही थी। उसकी देह कांप रही थी। उसक हाथ खाली थे। वह कब्रिस्तान के पीछे से निकली थी। शायद किसी की कब्र पर आई थी। इतने दिनों में उसकी देह और पतली हो गई थी।
स्तब्ध संज्ञाशून्य मैं उसे देखता रहा। कुछ देर इसी तरह खडी रह कर उसने सांसे अंदर भरीं। दीवार से हाथ हटाया और फिर धीरे - धीरे ढाल पर उतरती हुई ओझल हो गयी।
एक साल बादमुझे पता चला कि वह दस दिन अस्पताल में रह कर घर लौटी है। मैं ने उसे फोन किया। उसी ने फोन उठाया।
'' क्या हुआ था? '' मैं ने पूछा। '' कुछ नहीं बस यूं ही।'' '' यूं ही कोई अस्पताल में भरती नहीं होता है। अब ठीक हो?'' '' हां।'' '' कौन है घर में? '' '' कोई नहीं है वह बाहर है।'' '' मैं आ रहा हूँ।'' वह कुछ नहीं बोली। उसने फोन रख दिया।
मैं दूसरी बार उसके घर गया। दरवाजा अन्दर से खुला था। मैं ने पल्ले धकेले। उसे मेरी आहट सुनाई दी या कि शायद मैं दिखा उसे। '' बन्द करके आ जाओ।'' एक कमरे के अन्दर से उसकी आवाज आई। मैं ने दरवाजा बन्द कर दिया। अन्दर एक दूसरा कमरा था। वह उसमें थी। पलंग पर लेटी हुई। कमरे की खिडक़ियों की जाली से थोडी धूप आ रही थी। उसी की रोशनी से कमरा भरा था।
वह पलंग पर थी। तकिए पर उसका सर था। बाल खुले थे। गले तक वह कम्बल से खुद को ढके हुए थी। मैं पास की कुर्सी पर बैठ गया। उसने पलंग पर हाथ थपथपाया। मैं उठ कर सिरहाने पलंग पर बैठ गया।
'' क्या हुआ था? '' मैं ने पूछा। '' खून की खराबी थी दस दिन अस्पताल में रहना पडा।'' '' क्यों हुआ? '' वह कुछ नहीं बोली। '' शराब से? '' सर घुमा लिया उसने। '' अब? '' '' अब नहीं छोड दी है।'' उसने सर घुमा कर देखा मुझे। '' दवाएं चलेंगी, मरूंगी नहीं अभी।'' '' इस हालत में अकेली क्यों हो? '' '' काम वाली अभी गई है। तुम आ रहे थे इसलिये भेज दिया।'' बोलने में वह थक रही थी।
बहुत कमजोर हो गई थी। पूरी देह सिकुड ग़ई थी। उसने कम्बल के नीचे से अपना एक हाथ बाहर निकाला। मेरी हथेली पर रखा। मैं ने उसकी हथेली देखी, पूरी झुर्रियों से भरी हुई। खाल चटक गई थी। उंगलियों की हड्डी से अलग पडी थी।
'' कैसे हो? '' उसने धीरे से पूछा। उसकी दृष्टि में स्नेह था। '' ठीक हूँ।'' '' तुम्हारे कुछ बाल सफेद हो गए।'' '' हाँ उमर हो रही है।'' '' हम बहुत जीवन जी लिये शायद? '' '' हाँ।'' '' उसे समझते हुए, स्वीकार करते हुए। अपने - अपने सुखों के साथ एक दूसरे को सुख देते हुए।'' मैं कुछ नहीं बोला, उसे देखता रहा। '' मैं ने तुम्हें सुख दिया न? '' उसने अचानक पूछा। '' हाँ।'' '' मैं कभी पीछे नहीं हटी। जितनी भी देर जब भी तुमने चाहा। बिना संसय के अपनी आत्मा के साथ। हर बार वह मेरी आंखों में थी वह सुख देने में थी तुमने उसे देखा होगा।'' '' हाँ क्यों किया ऐसा?'' '' पता नहीं शायद पिछले जन्म का कुछ हो शायद प्रेम ऐसा ही होता हो।''
मैं उसे देख रहा था। उसकी हथेली मेरी हथेली पर थी। ''क्या देख रहे हो?''उसने धीरे से पूछा। '' तुम्हारा हाल।'' उसने कम्बल गले से हटा दिया। '' देखो ठीक से।'' कम्बल के नीचे एक कपडा था बदन से खिसका हुआ।
वह एक डरावनी बुढिया में बदल चुकी थी। उसकी छातियां बिलकुल पिचक गईं थीं। जांघ और नितम्बों का मांस लटक गया था। उसके चेहरे से दुर्गन्ध आ रही थी। इस काया का अद्वितीय आलोक मैं ने कई बार देखा था। काया का ऐसा क्षरण भी पहली बार देखा था।
उसने मेरी हथेली पकड क़र मुझे खींचा। मैं उसकी देह पर झुक गया। वह मेरी हथेली पर उंगलियां फेरती रही। उसकी निर्वसन देह मेरे नीचे दबी थी। हम देर तक इसी तरह पडे रहे। वह गहरी सांसे ले रही थी। उसके नथुनों से आवाज अा रही थी। पिचकी छाती ऊपर नीचे हो रही थी। उसने अपनी हथेली मेरी देह के दूसरे हिस्से पर फेरी
'' औरत पुरुष की इस लालसा को समझने में कभी गलती नहीं करती।'' मैं हैरान था कि उसकी इस अवस्था में इस घृणा पैदा करती देह के लिये भी मेरे अन्दर सचमुच लालसा जाग रही थी।
'' कंबल ढक लो।'' उसने कहा। मैं ने कम्बल ऊपर खींच लिया। कंबल पूरा ढकने से पहले मैं ने देखा। उसकी आत्मा फिर उन निस्तेज आंखों में थी। मेरी खिडक़ी पर बैठी थी साक्षी थी ताली बजा रही थी।
कुछ क्षण बाद मैं उससे अलग हुआ। उसके अंगों में सूखापन था। आयु अवसाद या फिर मेरी हमेशा की अकुशलता के कारण। मैं पलंग से उतर गया। '' मुझे सहारा दो।'' कुछ देर बाद वह भी पलंग से थोडा उठी। मैं ने उसे हाथ से पकड लिया। वह पलंग से नीचे उतर आई। कमरे में गहरी नीरवता थी। उसके हांफने की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। वह दीवार का सहारा लेकर खडी थी। झुकी हुई। घृणा पैदा करती हुई। कुछ देर वह मुझे देखती रही। ''आज फिर तुमने सुनी होगी? '' वह धीरे से बोली। '' क्या? '' '' हर बार की तरह नाटक खत्म होने पर अपनी दर्शक आत्मा की तालियों की आवाज? '' मैं चुपचाप उसे देखता रहा। हांफती हुई वह बोल रही थी - '' मैं ने उसे हर बार देखा है। उसकी तालियां सुनी हैं। मुंडेर पर कालीन पर चांद पर और आज खिडक़ी पर। मैं हर बार इंतजार करती रही कि शायद इस बार ऐसा नहीं हो। पर आज भी जब सबका अंत हो रहा है मृत्यु है समाप्ति है पूरा जीवन जी चुके हम तब भी वह तुम्हारे अन्दर नहीं थी। उसका चेहरा तेजी से पीला पड रहा था।
मैं कुछ नहीं बोला। सर झुका कर चुपचाप कपडे पहनने लगा।अचानक मैं लडख़डाया और चौखट से टकरा गया। उसने मुझे लात मारी थी।
मैं ने घूम कर देखा। वह हंस रही थी। उसकी निस्तेज आंखों में वही पुराना आलोक था। उसकी आत्मा हर बार की तरह उसकी आंखों में थी। उस विलक्षण रोशनी के निर्झर में नहाई हुई।
मैं ने एक क्षण उसे देखा, फिर चुपचाप बाहर निकल आया।
वह कौन-सा दिन था, मुझे याद नहीं। ना ही मुझे याद रह गया कि अंकु ने किस दिन ज्वाईन किया था ऑफिस। उसका वेतन कितना, यह भी याद नहीं। ना ही मैंने याद रखना चाहा। उसको मिलनेवाली फैसलिटीज को. प्रमोशन को। मैंने बस यह याद रखने की कोशिश की, कैसे अंकु को बहलाए रखा जाए। कैसे उसके काले दिन की स्लेट पर से उन घंटों की इबारत मिटा दी जाए हमेश-हमेशा के लिए। उसकी जिंदगी के चमचमाते आईने को नील के पानी, अखबारी कागज़, या फिर कॉलीन स्प्रे से ही कैसे सदा के लिए साफ कर दिया जाए....
चमचमाता आईना...हुँह!...चमचमाता? मैं घबराकर उठ बैठी। अंकु बगल में ही सोई थी। पता नहीं सोई भी थी या....लेटी तो थी मेरे पास। इतने पास कि मैं उसे छू सकती थी। इतने पास कि मैं उसके गेसुओं की महक सूँघ सकती थी...देह की भी। इतने पास कि मैं उसके मन के घाव देख सकती थी. पर क्या वह सच में इतना पास थी?
उस दिन...दिन नहीं, रात...उस रात अंकु के फर्स्ट प्रमोशन की पार्टी थी। बॉस के स्पेषल फर्माइश पर. ऑंफिशियल पार्टी में हम घरवाले क्या जाते। गए भी नहीं। दस का समय कोई समय होता आजकल रात को। डर-वर कतई नहीं लगा था। पूरा शहर उस समय जगा रहने लगा है। बल्कि इस मेट्रोपालिटन सिटी बनने की दौड़ और होड़ में शामिल शहर में दस के बाद ही तो कारें दौड़ने लगीं हैं। लड़कियॉं, औरतें, बुढ़ियॉं खुद ड्राइव करतीं। अंकु को साढ़े दस तक लौट आना था, उसने पापा की फियेट को ही तरजीह दी थी....अपनी कार ऑल्टो पोर्टिको में ही में ही छोड़ दी थी।
‘‘ पापा, प्लीज! मेरी गाड़ी को आप गैरेज में ले जाना...प्लीज...पापा, प्लीज!’’
‘‘ इस प्ली...ज से तुम पापा से और क्या-क्या हामी भरवाओगी अंकु? बस! घिसकर प्ली...ज बोल दिया और पापा बने बेटी की फरमाईश पूरी करने के लिए हनुमान! संजीवनी के लिए पूरा पहाड़ ही उठा लाएँगे । ’’
उसकी दादी आदतन टोक बैठीं थीं।
काश! ...काश दादी की टोकने की आदत पर ही गौर फरमा लेते हम।
‘‘ अश्विनी साथ जा रहा है ना ?’’
दादी ने फिर चिल्लाकर टोका था।मैंने अंकु की ओर देखा तो वह ऑंख दबाती चिल्लाई थी।
‘‘ हॉं दादी, फिकर नॉट। आपके अश्विनी के बिना हिल भी सकती हूँ मैं कभी। वह साथ है।’’
‘‘ देखो, मंगला, मेरी बात सुनो, इतना भी छूट देना ठीक नहीं। जो चाहा, उसने मनवाया। उसकी जिद पर नौकरी करवा रही हो ब्याह की उम्र में। पर यह रात- बिरात की सैर मुझे नहीं जॅंचती।’’
स्वाभाविक था. उनकी सेाच और हमारी सोच के बीच बीस-चौबीस साल का अंतर था. एक पूरी पीढ़ी का. उनकी सोच और अंकु की सोच, रहन-सहन के बीच पचास सालों का।
चंद सालों में ही यहॉं कितना अंतर हो गया है. हम देखते- देखते कितना आगे निकल आए. खासकर हमारी नई जेनरेशन।
‘‘ कैसे अंकुश लगा दूँ अंकु की उड़ान पर।’’
मैंने कहा था. कहीं उसके पॅंखों को स्त्रियों ने अपनी उड़ानें तो नहीं दे डालीं थीं...अपने बॅंधे पॅंखों के सपने...अपनी आधी-अधूरी उड़ानें? कभी-कभार मैं सोचती. हमारे सामाजिक बंधनों को काट डालने का हौसला हम स्त्रियॉं अपनी बेटियों से ही पूरा कर पा रहीं थीं।
‘‘ अम्मा, तुम उसको ज्यादा रोका-टोका मत करो।’’
उसके पापा थे. बदलाव की ऑंधी उनके अंदर की आदि मानसिकता को भी उड़ाए लिये जा रही थी।
‘‘ क्यों? तुमलोग तो टोकते नहीं, एक प्लीज...न.....नहीं, प्...लीज उछाली उसने और बस तुम दोनों लट्टू!’’
अम्मा ने जिस ढंग से कहा था, हॅंस पड़े थे हम।
हॅंसते हुए ही कहा था उसके पापा ने-‘‘ अब तुम्हारा-हमारा जमाना नहीं रहा अमा!’’
‘‘ अब तुम? तुम्हारी ही बेटी ठहरी. अमा कहकर खूब बात मनवाते थे तब.’’ अम्मा जी क्यों चुप रहतीं.
‘‘ सब तो समझती हो. फिर....’’ उन्होंने बात खत्म करनी चाही,
‘‘ उसकी सगाई भी तो हो गई है अम्मा, अब और कितने दिन रहेगी हमारे संग. उड़ने दो आजाद. फिर तो अष्विनी के साथ ही ऑफिस भी आना-जाना होगा उसका. एक ही रास्ते मे ऑफिस होने से यही तो फायदा है.......’’
‘‘...त...तो क्या आज अष्विनी साथ नहीं गया....तुमलोग ना.....’’
‘‘अम्मा! फिकर नॉट....हमारी बेटी बहुत स्मार्ट है।’
‘‘ज्यादा ही स्मार्ट है.’’ अम्मा ने मुँह बना लिया।
अब भी नहीं चिढ़ते उसके पापा क्या? चिढ़ ही गए थे।
00 ‘‘ देखो अम्मा, उसे हमने शुरू से ही बोर्डिंग मे पढ़़़ाया है। उसने पुणे में रहकर एम. बी. ए. किया। आखि़र सारे झमेले उसने अकेले झेले ना।रात दिन. हर पल के। हम-तुम साथ थे क्या? अब तो वह मैच्योर है। इतनो बड़े ऑफिस में....’’
ये हुई प्रतिरोध की हवा उड़नछू! ऐसा हमें लगा था। गाल पर हाथ धरे एकटक दादी को देखती हुई मुस्कुराती रही अंकु। वह एकदम रेडी। बस! उॅंट के करवट बदलने की परख कर रही थी। उसके पापा ने आगे बढ़कर हाथ पकड़ लिया अम्मा का।
‘‘ उड़ने दो न अम्मा।’’
‘‘ मत समझो तुम सब।’’
क्या बात है? अम्मा की जुबान से काल ही बोल रहा था क्या? इतनी भी तो जिद्दी नहीं हैं वे।
उस दिन भी अम्मा खूब रुठ गईं थीं। बात अंकु के पसंद की शादी की हो रही थी। पहले मेरा मन भी कहॉं मान रहा था। अब बारी अम्मा के मनाने की थी। अपनी दादी को मनाने के लिए उसने हम दोनों को ढेर सारा मक्खन लगाया था। उस दिन भी ऐसे ही हाथ, कंधे थाम रखे थे अंकु के पापा ने अम्मा के।
‘‘ अपना दिन याद करो। कैसे रात को भी पिताजी का चेहरा नहीं देख पाती थी। वह दिन अच्छा था क्या?’’
फिर वे उनका हाथ सहलाने लगे। ‘‘ जिसके पल्ले बॉंध दिया गया, बॅंध गई। अँधा-लंगड़ा, काला-कलूटा. बेराजगार-लफॅंगा! उससे तो अच्छा है ना।’’
‘‘ दादी, आप इतनी गोरी, दादा जी इतने काले। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का अंतर। पहले देख लेतीं तो करतीं मैरेज? ह ! ह !!.... ’’
बीच में ही अंकु की हॅंसी फूट पड़ी। वह देर तक हॅंसती रही। उसके दोनों डिम्पल गहरा उठे। चेहरा लाल हो गया। उसने ऐसी बात कभी नहीं कही थी। फिर वह खुद ही अपदस्थ हो गई।
कैम्पस सलेक्षन के बाद जब वह हैदराबाद में पोस्टेड थी, तब हम साथ रहने गए थे। नहीं! उसके पैरों की ताकत इंज्वॉय करने। पूरे दो महीने उसके नए घर में साथ उसके बिताकर लौटे थे। उसकी उड़ान से आष्वस्त। उसी समय उसने हिंट दी थी मुझे। अश्विनी से मिल नहीं पाई थी। मैंने मिलना चाहा ही नहीं था। मन थोड़ा खट्टा भी हो गया था। उसकी कोशिश तो थी कि हर कीमत पर हम अभी ही उसकी पसंद पर मोहर लगा दें।
‘‘ सोचूँगी। तुम्हें पढ़ने के लिए पुणे भेजा था हमने।’’
वह अपने दोनों पैर सिकोड़कर अपने सोफे पर बैठी थी। नितांत अपने विचारों के साथ. अपने घर में। पल भर में ही परायेपन का एहसास होने लगा था। उसकी बातें उस दिन बहुत कड़ीं हो उठीं थीं। चार दिन में ही लौट आने की इच्छा हो आई थी।
‘‘ मॉं अब माना लिव इन रिलेशनशिप का हे और मैं मैरेज की बात कर रही हूँ, तुम चाहों तो उसे अरेंज मैरेज का नाम देकर खानदान की इज्जत बचा लो।’’
मैं यह भी नहीं कर सकती थी। वह दूसरे स्टेट से था। दूसरे कास्ट से था।
‘पावर, ताकत, आत्मनिर्भरता कहीं लड़कियों में दंभ तो नहीं...?’ पहली बार मन में उठा था।
....ओह! नहीं! नन्हीं चिड़िया....नए पॅंख....उड़ते जाने की चाहत.....उड़ान के बीच की बाधाएँ....उफ!
अरे! उसके प्ली....ज को क्या हुआ? उड़ान की बाधाएँ...कौन?...हम?.....मैं?
अब तो उसके पापा से भी बात करनी होगी। उसने मुझ पर ही यह गुरुतर भार सौंपा है. एक तो विजातीय, उपर से साउथ-नॉर्थ का चक्कर। जेनरेशन गैप की शुरुआत! करवट लेते देश-समाज, बच्चे! बच्चों की करवटों से आहत हुई थी मैं? उसके नन्हें शरीर की करवटें याद आ गईं थीं। कितना खुश होते थे हम।
और यह करवट? बदल न दे सब कुछ....सब कुछ उलटा-पुलटा! ‘ नादान लड़कियॉं! अपने पापा-मम्मी पर भी भरोसा करो जरा। हम मैरेज अच्छी जगह करेंगे।’
मैं ठहर नहीं पा रही थी। अंततः जिद कर वापस आ गई थी अपने छोटे से शहर में।
बाद में वह भी घर आई। एक अजीब दिन था। उस दिन उसने अपने मन की बात नहीं, जिद कही थी। ऐसी जिद, जो बस मानने के लिए ही होती है।
अंकु के पापा मान गए थे। मान नहीं, समझ गए थे। समझना पड़ा था। बहुत सारे कड़क, पुरातनपंथी पापा-गण समझ रहे थे, एक और सही। और वह. उसका वही पुराना प्ली....ज! प्लीज नहीं, प्....लीज! इंगेजमेंट! यही परिणति हुई उस प्....लीज की। जिद की भी। चारा हाथ में न होने की भी।
उसकी दादी को भी मानना ही पड़ा। मुझे अम्मा को मनाने के लिए रंग गिरगिट से उधार लेने पडे़। अंदर कहीं इंकार की बदली थी। सॉउथ का लड़का, नॉर्थ के हम। कोई मेल कहॉं। खान-पान, रहन-सहन सब अलग। मेरे सामने ‘अम्मा! अइयो’ कहनेवालों की भीड़ लग गई। और एक शब्द भी तो गले नहीं पड़ता।
द्रविड़ भाषाई परिवार की ये भाषाएँ बहुत कठिन! उसके परिवार में कैसे खपेगी? ठीक है अश्विनी के साथ अंग्रेजी से काम चल जाएगा....लेकिन फैमली मेंम्बर्स....?
‘‘ ओह! ममा फिकिर नॉट। ’’
उसने उँगलियों से मेरे पेट में गुदगुदी की। मुझे मनाने का पुराना, शरारती, अचूक नुस्खा। पर अब वह बड़ी थी। उसके फैसले बड़े थे। उसकी सोच बड़ी थी। और समस्यां भी। मैंने धीरे से उसकी तर्जनी थामी और परे कर दिया । बाद में उन लोगों से मिलने पर तो हतप्रभ रह गई ।
‘‘ अरे! ये लोग इतनी अच्छी हिंदी बोलते हैं अंकु! ’’
‘‘ आजकल कहॉं हिंदी नहीं बोली जाती मॉं।’’
उसके होठों पर मुस्कान की धूप और उसने उसी उजाले में सब मनवा लिया।
मॉं
मैं इंतजार कर रही हूँ। अंकु कहकर गई थी-‘‘ दस बजे...निश्चित।’’
अभी नौ ही बजे हैं. पतझड़ की रातें इतनी काली, सुनसान भी कि जाड़े की रातों का भ्रम दें। लो, दस भी बज गए। उसने साफ कहा था,
‘‘ इस ग्रैंड पार्टी को हर हाल में साढ़़े नौ में खत्म हो जाना है। वह होटल नाइन थर्टी तक ही बुक है...कोई कारण नहीं कि पार्टी लंबी चले।’’
‘‘ सब कुछ रेडीमेड. कोई टेंशन नहीं। न कुक खोजने की आवश्यकता, न सब्जी छॉंटने-खरीदने की। न गेस्ट की आवभगत में कमी की शिकायतें। न कुछ मान मनौव्वल। बस! सब आनंद ही आनंद...खाओ, गाओ, मौज करो। ’’ अंकु की आवाजें।
‘‘....या डी. आई. डी.-आजा नच ले के तर्ज पर नाचते रहो...नाचते रहो।’’
‘‘ मम्मी! आप भी न....’’
फिर उसने छौंक लगाया- ‘‘ आपके जमाने की तरह नहीं कि रिलेटिव्स को मनाते रहो। गेस्ट रुठना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लें, होस्ट लुटकर भी उन्हें खुश न कर पाए। ’’
‘‘ फॉरेन में देखो। नो रिलेटिव्स, नो टेंशन। खैर! दो -चार मंथ के बाद तो हमारा एब्रॉड जाना श्योर!’’
‘‘ बेटे कहीं हमें भी झटक न दो.? मॉ- बाप को भी तो फॉरेन में... ’‘
‘‘ मम्मी! तुम चिंता मत करो. आई विल रिर्टन एट टेन थर्टी....श्योर.’’ कीमती ब्रेसलेट बॉंधते हुए वह हवा हो गई। उसने मेरी बात सुनी कहॉं।
उसके गहराते सपनों को एक और मौका। बहुत जल्द प्रमोशन. खुशी में पार्टी।
‘‘ ओनली कुलीग एण्ड फ्रेंड्स। ’’
साढे़ दस बज गए। बस, आती ही होगी। मैं एलबम लेकर उसी के कमरे में जम गई। घबराहट, भय के कद तथा बेचैनी सबको डुबो डालना चाहा इंगेजमेंट के स्नैप्स में। एक प्यारी जोड़ी की ख़ुश्बू हवा में तैरने लगी। क्या डैसिंग पर्सनाल्टी है अश्विनी की। ज्यादा देर तक ख़ुश्बुओं ने रोके नहीं रखा इंतजार को। उसके पापा भी वेट कर रहे थे। उसकी ‘‘फिकर नॉट! ’’ हमने कब मानी। मॉ-पिता अपना गुण-धर्म कैसे छोड़ दें। पौने ग्यारह. ग्यारह....साढ़े ग्यारह... साढे़ बारह. एक. एक बजे गैराज के बाहर लाइट चमकी। मैं हड़बड़ाकर बढ़ी। जरा गैराज तक चलूँ। एक पॉंच में गैराज का दरवाजा खुले बिना कॉल बेल बजी।
उस पर बरस पड़ने के लिए भरी खड़ी थी मैं। आज दो टुक बात हो ही जाए। यह सब नहीं चलेगा। मैंने मन में ठान लिया था। और उठकर पहले ही दरवाजा खोलने के लिए आगे आ गई थी। कॉलबेल पहले बजी थी कि मैंने पहले दरवाजा खोला था, अब तो ठीक से याद भी नहीं।
‘‘ अरे! कहॉं चोट लगी ? एक्सीडेंट हो गया?’’ मेरा गुस्सा पल भर में काफूर होना था, हुआ। उसके बाल चिड़िया का घोंसला, उसके गालों पर खून की लकीरें। मिनी टॉप नीचे से फटा हुआ। जिंस घुटने के पास फटी हुई। घुटने पर बड़ा-सा नीला धब्बा। माथे पर दो-दो गूमड़। मैं जोर से चिल्ला पड़ी थी शयद। तभी दैाड़ते हुए उसके पापा पहुँच गए थे।
दरवाजे पर खड़े-खड़े ही वह भरभराकर मेरे उपर गिरी। उसकी चुप्पी बहुत मारक। हदयविदारक. रहस्यमयी. काली रात का साया। रात भर वह जगी रही। रात भर वह डरती रही। रात भर वह कॉंपती रही। रात भर उसने कुछ नहीं कहा। रात भर उसकी चुप्पी बोलती रही। मैंने गोद में थमकी दे-देकर सुलाना चाहा। भर रात वह सो न सकी। न मैं। न उसके पापा। वह दो साल की अंकु बन गई थी। दादी को कानोंकान खबर नहीं। कौन घर के सर पर उठ जाने का खतरा मोल ले।
सुबह-सुबह मेरी थपकियों का असर। छोटी-सी झपकी! फिर ‘‘ मम्मी!’’ एक गजब की चीख के साथ वह तुरंत उठ गई।
‘‘ मुझे छोड़ दो... मुझे छोड़ दो....’’
‘‘ मॉ- बहन नहीं है ????’’
...........
‘‘ दस-दस, बीस-बीस में आसानी से मिल जएँगी....तुम्हारे लिए ही बैठीं हैं। मुझे छोड़़ दो।’’
‘‘ दादी....! पपा.... !! मॉं....!!! ’’
वह सकते में थी। कुछ क्षण जो उसके अंदर ठिठके रह गए थे, अब मुखर हो रहे थे। वह बेहोश हो गई। वह रात, वह सुबह बहुत भारी थी।अब तक है।
बहुत दिन लगे उसे ठीक कराने में। पर एक असहजता चुप्पी बनकर उसके ऊपर हावी हो गई है। समझ नहीं पा रही हूँ, कैसे उसकी सरलता वापस लाउॅं। सदा उसके चेहरे पर खेलनेवाला आत्मविश्वास अब उसके चेहरे से गायब रहने लगा है। वह नेगेविटी की खाई में गिरने लगी है। उसकी सारी पॉजेटिव थिंकिंग खत्म! मेरे लाख समझाने के बावजूद वह न तो टी. वी. में मन लगाती और न की कहीं बाहर किसी से मिलने जाती। उसके अंदर कुछ खो रहा था। अश्विनी राव भी तो नहीं आता अब।
‘‘ चलो अंकु ! मेरी पूजा की थाल सजाने में मेरी मदद करो।’’
‘‘ मेहता के बगीचे से लाल उड़हुल और सदाबहार ला दो।’’ दादी कहती तो वह विस्फारित नेत्रों से देखती रह जाती।
उस दिन भी वे कहती रहीं - ‘‘जरा दीया के लिए बती बना दो, दीया में घी भी डाल देना।’’
‘‘ जा न अंकु, दादी का हाथ बंटा दे।’’
उसके पापा भी कह उठे। वह टस से मस नहीं हुई.।बुत बन गई थी, बुत बनी बैठी रही।
‘‘ अश्विनी को बुला लो। ’’
तिनके का सहारा। पर इतना कुछ नहीं सुना उसने। यह सुन लिया। तीखी नजरों की आग बरस पड़ी। मैं सहम गई। झुलस गई। अश्विनी क्या, किसी को बुलाना संभव न हुआ।
उसके पथराए चेहरे से अब मुझे भय लगने लगा था। न किसी को चाय पूछा करती, न नाश्ता ! खुद भी खाना मिलने पर बहुत कहने पर दो चार ग्रास मुँह में डाल चुभलाती रहती है। कहीं खींच कर ले जाना चाहती हूँ, तो यूँ घिसटती चलती है जैसे कसाई खींच कर ले जा रहा हो। दफ्तर जाने की बात दूर की बात, सहेली के घर जाने की बात सुनना तक गवारा नहीं। एक दिन मंजुला आई, उसने अपने को कमरे में बंद कर लिया। क्या हैदराबाद में वह सुरक्षित रहती? छोटे विकसित होते शहर की बड़ी वारदात नहीं बनती? कितने शौक से उसने यहॉं नई कंपनी ज्वाईन की थी। अश्विनी भी इसी में था। हैंडसम पैकेज! मैंने पुलिस के पास नहीं जाने के लिए उसके पापा के पैर तक पकड़ लिये थे।
‘‘ मैं क्या करुं, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा।’’ - उसके पापा से कहा मैंने।
‘‘ किसी तरह उसकी चुप्पी तोड़ो। ’’
‘‘ कैसे ? ’
‘‘ किसी भी तरह। रुला ही दो।’’
‘‘ आप कुछ .... ’’
‘‘ ....मेरी हिम्मत जवाब दे चुकी है, मैं.....’’ गला अवरुद्ध हो उठा उनका।
‘‘ मैं ही सबसे अधिक हिम्मती हूँ? ’’
‘‘ पता नहीं क्यों, शाख से गुल तोड़ डालते हैं लोग !’’
उनके पास मेरे प्रश्न का जवाब न था? पर कमरे से निकलते हुए टूटे शब्द बाहर आए थे-‘‘ तुम मॉं हो।’’
महीने बीतते रहे। अंततः पतंगों के लहराने के दिन आए। आसमान में लाल, हरे ,पीले काले ,सफेद गुड्डियों का स्केटिंग प्रारंभ हो गया। अंकु को पतंग उड़ाना कितना प्रिय था।
‘‘ चलो बेटा, छत पर चलते हैं। ’’
.........
‘‘ चलो न !’’
उसके चेहरे पर अबूझ भाव। मेरी हिम्मत जवाब देने पर अमादा। आज भी मैं फेल्योर हो जाउॅंगी क्या? पतंगे कट जाने पर दुबारा आकाश के दामन पर बेल-बूटे-से नहीं लहरा उठते क्या ? हम भारतीय ही अपनी बेटियों को इस तरह पालते हैं कि वह एक घेरे, दबाव में घिरी रहतीं हैं। घेरा टूटा नहीं कि सब कुछ लूट गया का भाव भरा। हममें भी। बेटियों में भी। सारी पवित्रताओं का ठेका भारत की नारी ने ही ले रखा है। यह मात्र एक हादसा है। सामान्य एक्सीडेंट!
जैसे अन्य एक्सीडेंट के बाद भी सब जुड़ते, लड़ते, हॅंसते, जीते हैं, वैसी ही जिजीविषा चाहिए।
हर बुरा के अंदर कुछ भला गर्भस्थ, यह भावना भरनी चाहिए। बुरी से बुरी परिस्थिति भी लड़की का मनोबल न तोड़ सके, यह परवरिश चाहिए।
मैं चौंक उठी, मैं कैसे विपरीत दिषा में सोचने लगी? मेरी अपनी परवरिश भी तो.... अपने पर थोपी-रोपी गईं स्थापनाओं से परे .... मुझे सच में खुद पर हैरानी हुई। अपने अंदर एक ज्योत सी जली -शायद जमी बर्फ पिघला सकूँ।
ग्लेशियर पिघला सकूँगी, तभी आगे कुछ सोचा जा सकता है। मेरी जिद पर वह छत के एक किनारे तक आई। हथेलियों में सर दे वहीं बैठ गई। उसका चेहरा सर्द! उसने नजर उठाईं ही नहीं। उसने अपनी कुर्ती के चारों ओर कसकर दुपट्टा लपेट रखा था....जिंस-शर्ट की शौकीन अंकु.....गले तक लपेटा गया, हाथ की उॅंगलियों तक ढंक डालनेवाला उसका दुपट्टा ऑंखों में मिर्ची भर रहा था। कितना लड़ती थी वह अपने पापा से जिंस-शर्ट के लिए। लॉंग, शौर्ट स्कर्ट-टॉप के लिए। दुपट्टे से आजादी के लिए उसने मुझे कम लेक्चर पिलाए थे।
‘‘ हमारी गुड्डी कट गई है। आपकी छत पर गिरी है। दे दीजिए न !’’ नीचे से एक मासूम आवाज आई।
‘‘ तुम रुको यहीं, मैं लाकर देती हॅूं ’’- सोना थी। मेरे घर की ऑल इन वन!
मैंने अंकु का चेहरा देखा, सख्त! एकदम सख्त!!
‘‘ सोना , उसे यहीं भेज दो।’’
‘‘ हिम्मते मरदॉं, मददे खुदा।’’ बेसाख्ता होठों से निकलने को मचला। अभी समय नहीं आया था। मेरी चुप्पी ज्यादा जरुरी थी।
सीढ़ियों पर मासूम पदचाप गूँजे। मासूम, गदबदा, सॉंवला बच्चा सामने था....गोलू.
‘‘ दीदी, मै गुड्डी ले लूँ? ’’
इघर-उधर देख पतंग पर नजर पड़ते ही वह अंकु से पूछ बैठा तो एक हल्की औपचारिक स्मित के साथ अंकु ने हॉं में सर हिलाया। मैं धोखा खा गई। अंकु के होंठ पपड़ाए हुए थे। भिंचे हुए भी। पूर्ववत, कोई स्मित नहीं... हल्की-सी भी नहीं।
साबुत पतंग ने बच्चे के अंदर पुलक भर दी। उसकी ऑंखें चमक से भर गईं। वह लपककर सीढ़ियों की ओर बढ़ा। बाहर की गली अधीरता से उसे बुला रही थी।
‘‘ गोलू, रुको, तुम आज मेरी छत पर ही पतंग उड़ाओ न। ’’
‘‘ सच? सच में ऑंटी?’’
मेरे इसरार करते ही वह अपनी लटाई संभाल, धागे से पतंग बॉंधने लगा। थोड़ी देर में उसकी कटी पतंग दुबारा हवा में कलाबाजियॉं खा रही थी। ‘‘ऐ मारा।’’ ‘‘ऐ काटा’’ की घ्वनि से सारी छत गुलजार हो उठी।
मैंने कनखियों से अंकु को देखा। वह जार-जार रोए जा रही थी। उसका सर घुटनों से जा लगा था। हिलक-हिलक कर रोने के कारण उसकी सारी देह कॉंप रही थी। मुझे बेचैनी होनी चाहिए थी। नहीं हुई। मेरे हदय पर रखा बोझ कम होने लगा... आहिस्ता...आहिस्ता। मैंने न टोका, न ही उसके ऑसू पोंछें। सारा सिंचित दर्द बह जाए। मन को पता था, अब शिला उसकी आत्मा को फ्री छोड़ देगी।
मैंने अपनी पनीली हो गईं ऑंखों को हल्के से मला। बेआवाज रूलाई थी कि रुकती न थी. मैंने मुँह फेर लिया। बच्चा अपनी गुड्डी में एकदम रम चुका था, नए घर से बेखबर ! उसके गले, ललाट से धारदार पसीना। उसकी ऑंखें केवल अपने लक्ष्य पर। उसकी तन्मयता देखने लायक। अंकु भी तो ऐसे ही पसीने-पसीने होकर पूरी तन्मयता से पतंग उड़ाया करती थी कभी। आज वह किसी अंतर्द्वंद को जी रही है, साफ लग रहा था। उसकी ऑंखें पतंग पर टिकी थीं। अब देखते- देखते उसकी ऑंखों में ठहराव आने लगा। ऑंखें कुछ सोचती- समझती हुईं लगने लगीं। मेरा दिल धड़-धड़! दिल के बल्लियों उछलने का समय अब भी नहीं आया था। पर मुझे विष्वास हो चला, समय आएगा। जल्द ही। नीले, स्वच्छ आकाश में लहराती-बलखाती पतंगें थीं अब भी। मेरा ध्यान उन पर था, मेरा घ्यान उन पर न था।
अंकु
पतंगें...चिड़िया....पतंगे.....चिड़ियॉं ?....क्या सच? ...मॉं-बुआ, दादी सब कहतीं हैं।
‘‘ हम चिड़ियॉं नहीं, पतंगें हुआ करतीं हैं,....डोर किसी और के हाथ....उतनी ही ढील जिससे डोर थामे रहे गुड्डियों को....बॅंधी-जुड़ी रहें वे डोर की छोर से....’’
नहीं! नहीं! मैंने तो चिड़िया बनना चाहा था. चहचह...चहचह....चहचहाना।
कोयल की तरह कुहू! कुहू! कुहुकना भी....
‘‘ नहीं, पतगें एकदम नहीं। क्यों थामे कोई डोर ?’’- मैं कहती।
पक्षियों का गगन ज्यादा विस्तृत।
पतंगें नहीं....चिड़िया. चिड़िया बनना था मुझे।
विस्तार में जीना हमारा हक..... ‘‘ कल्चर-कल्चर का शोर मचाकर काफी दबा लिया हमें। अब और नहीं।’’ मेरे साथ मेरे फ्रेंड्स की भी तो यही राय थी।
दादी कहती थी. कहती है- ‘‘ लड़के रात के बारह-दो तक भी बाहर रहें , क्या फर्क.’’
दादी ठीक ही कहती है, अब ऐसा लगता है. एक हद जरुरी है।
और अश्विनी तुम ?
अष्विनी, तुम मुझे समझ नहीं सके, अभी मुझे सबसे अधिक जरूरत तुम्हारी थी। रिश्ते ऐसे भी कमजोर होते हैं भला? रिश्तों की कीमत तुम क्यों नहीं समझ सके, अश्विनी? मैंने एक बार अपनी कविता तुम्हें सुनाई थी - जो सदा रहे रिसते, वे कैसे रिश्ते?....क्या इसी दिन के लिए? तुम्हारे न आने से मेरे अंदर जो रिसाव शुरू हुआ है, उसे कैसे बयां करूँ?
एक बार...एक बार आ जाते। मेरे गालों-बालों पर एक बार अपने हाथों का मरहम फेर जाते। आई मिस यू।
जानते हो, मुझे थपकियॉं दे-देकर थक चुकी मॉं के सोने के बाद मैंने कई बार अपने को घायल कर डाला है। गालों को नोच कर, घुटने को जमीन पर पटक कर। टॉवेल से अपनी गंदी देह को रगड़कर। छिल जाने की हद तक। सवेरे मॉं बेहद बेचैन होकर खून साफ करती, मरहम लगाती। पर....पापा-मॉं का दर्द देखा नहीं जाता। बड़े नाजों से पाला है उन्होंने मुझे।
तुम्हें कोई दर्द नहीं छू पाया? स्वाति बूँद की तरफ कब तक आस लगाए रखॅूं? जानती हूँ, अब कभी नहीं मिलोगे कायर!
मिलूँगी यदि कभी तो जरुर पूछूँगी- ‘‘ मेरा क्या कुसूर था? ’’
रास्ते के मोड़ पर भी कभी नजर आए, कस कर थाम लूँगी। तुम्हें सिर्फ एक सवाल का जवाब देना होगा।
जवाब दिए बिना जाने नहीं दूँगी। कहॉं हो तुम? अपने घर चेनई में? एब्रॉड जाने का ड्रीम पूरा हो गया? कहॉं हो? फ्रांस में? या इंग्लैंड में? फ्रांस- इंग्लैंड में एक्सीडेंट नहीं होते ? यह एक्सीडेंट है। केवल एक्सीडेंट! आज समझ में आ रहा है।
फिर क्यों ? याद है, तुमने कितने चाव से अपने वर्जिन न होने की बात कही थी। मैंने स्वीकारा था न तब भी तुम्हें। क्यों अश्विनी राव ? क्यों? यह फर्क क्यों?
अरे! उस बच्चे की पतंग फिर कटी....लो यहीं तो गिर पड़ी है....मैं उठा दूँ?...छोड़ो...खुद उठा ही लेगा....मन ही नहीं करता। किसी काम, बात में मन नहीं रमता।
मंझदार से तुम ही निकाल सकते थे। तुम ही कन्नी काट चल दिए। हम कितनी मुष्किल से अपने पैरेंट्स को मना पाए थे और.....गुड बा...य अश्विनी राव!
ओह! बच्चा है होशियार..... थर्ड टाइम पतंग बॉंध लटाई चलाने लगा....य....य...ये देखो, हवा से बातें कर रही है.....अरे! उसने दूसरे की लहराती पतंग काट दी।
देखो तो, अपनी फट गई पतंग को दुबारा चिपका कर उसने....
मुझे बहुत-बहुत रोना क्यों आ रहा है? इत्ती कमजोर...? नहीं मैं नहीं रोउॅंगी.....एकदम नहीं......अरे! गोलू कहीं मेरा रोना न देख ले.....मैं ...मैं कैसे कंट्रोल...?
........
मॉं देख रहीं हैं, लेकिन रोक क्यों नहीं रहीं? मेरे ऑंसू उन्हें जार-जार रूलाते थे। आज?
आज रोने दो मॉं, आज रो लेने दो। जी भरकर. एकदम मत रोकना।
ऑसुओं के सैलाब में सिंचित दर्द सच में बह जाता है?....देह फूल की तरह हल्का क्यों लग रहा है? मैं ऊपर उठ रही हूँ...उ पर और उ पर... एकदम हल्की...वेदना की कुहेलिका से बाहर का जीवन बुला रहा है..... ईश्वर ने ऑंसू न बनाए होते तो?...
एक्सीडेंट तो एक्सीडेंट है। छोटी हो या बड़ी, लेकिन फिर से खड़ा होना होता है। उठना होता है। उबरना होता है. भाड़ में जाए अश्विनी और उसकी घटिया मानसिकता?
या पतंगें.....या चिड़िया.....या दोनों में से कुछ भी.....पर धरती पर रेंगनेवाला कीड़ामात्र नहीं बन सकती मैं.....पतंगें भी बुरी नहीं. कटकर भी कम से कम फिर से लहरा तो सकती हैं. आकाष के घमंड को तोड़ तो सकती हैं।
0000
‘‘ ऐई गोलू! मुझे अपनी पतंग उड़ाने दोगे? ’’
‘‘ आप? दीदी आप गुड्डी उड़ाना जानतीं हैं....ऐ काटा...देखिए वह काली-कलूटी पतंग भी कट गई।’’
‘‘ तुम तो बड़े उस्ताद हो. लाओ, मुझे भी उड़ाने दो. चार मैं भी काटूँ। बड़े घमंड से लहरा रहे हैं।’’
‘‘ आप जानती भी हैं ? ’’
‘‘ मैं क्या नहीं जानती गोलूमल। बचपन में सौ पतंगों को काट चुकी हूँ।’’
मॉं
‘‘ मॉं ! मैं कल से ऑफिस जॉंउ ?’’ एक मद्धिम सी आवाज!
मेरे कान बज नहीं रहे थे , वह अंकु ही थी।
‘‘ नहीं चाहिए मुझे कोई अष्विनी-उश्वनी. नहीं बनना मुझे चातक-वातक! ’’
मैंने हाथ बढा़कर उसकी पीठ सहला दी। माथे पर हाथ रखा।
‘‘ मैं आफिस जाउँ?’’
इस बार स्वर तेज! उसकी ब्याकुल ऑंखें शांत लग रहीं थीं। चेहरे का झॅंवलायापन कुछ कम।
उसके होठों पर गौरैया की तरह एक छोटी-सी मुस्कान आ बिराजी थी। वह गौरैया मेरी ओर हसरत से ताक रही थी।
लगा, मैं उसके साथ उसे ढंग से उड़ना सिखलाने के लिए निकल पड़ूँ, साफ-शफ्फाक गगन में। और देर-देर तक उड़ती चली जाउँ दूर और दूर!. ऊँचे और ऊँचे!
कल की बात है। कल हुई थी हत्या। सुबह छह बजे। कल भी, आज सुबह जैसी ही ठंड थी। हाड़-हाड़ कँपा देने वाली ठंड। दिसम्बर महीने की शुरुआत में ऐसी ठंड पहले नहीं पड़ती थी। कल सुबह, जब मैं बन-सँवरकर घर से निकला, घना कोहरा था। ओस से गीली हो रही थी धरती। शहर की गंदगी समेटकर बहते नाले के बाँध पर पसरी दूब की नोक से शीत की बूँदें टपक रही थीं।
इसी नाले के किनारे, बाँध के उस पार हमारी बस्ती थी। कुछ झुग्गियाँ.... कुछ टिन के टप्परों वाले घर, ....और कुछ छोटे-छोटे कमरोंवाले छतदार पक्के मकान थे। अपने घर से निकलकर इसी बाँध की पगडन्डी पर चलते हुए मैं आता। दूसरी ओर के बाँध पर सड़क थी, जिसे एक पतली पुलिया जोड़ती थी। मैं सड़क किनारे इसी पुलिया पर खड़ा होकर सिगरेट सुलगाता और स्कूल बस आ जाती। कभी चैथाई, ....कभी आधी, ....तो कभी पूरी सिगरेट और स्टेडियम वाली सड़क से इस सड़क की ओर मुड़ती हुई बस दिखती। बस पास आए इसके पहले मैं सिगरेट बुझा देता। पुलिया के ठीक सामने आकर बस रुकती और मैं सवार होता। बस में बच्चे होते, ....मैथ पढ़ाने वाली एक खूसट बालकटी बुढ़िया मिस तनेजा, और ऐंठी हुई मूँछों वाले पीटी सर पी.के.सिंह राठौर, ....और मैं। दो स्टॉप आगे विद्या चढ़ती। अपने स्टॅाप पर वह हमेशा देर से पहुँचती। बस रुकती। दो-चार मिनट उसका इन्तज़ार करती और तब वह सब्ज़ीमंडीवाली गली से गिरती-पड़ती हुई निकलती। हाँफती हुई वह बस में घुसती और मेरे पास की सीट पर धम्म से गिर पड़ती। वह हमेशा मेरे साथ ही बैठती हालाँकि, पी.के.सिंह राठौर, जिन्हें हम सब पीठ पीछे हल्दीघाटी का भगोड़ा कहते, हर रोज़ अपने पास की सीट इस उम्मीद में ख़ाली रखते कि विद्या..... लम्पट साला।
इतनी सुबह, नींद से अलसायी आँखों वाले छोटे-छोटे बच्चों का स्कूल जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। स्कूल की बस से जाना मजबूरी थी वरना, मैं कभी उनके साथ न जाता। अक्सर मेरा जी करता, कहीं किसी खुले मैदान या पार्क के पास पहुँचकर बस रुकवाऊँ और बस का दरवाज़ा खोलकर बच्चों को खेलने के लिए आज़ाद कर दूँ।
हाँ तो, मैं कल की बात कर रहा था। कल ग़ज़ब की ठंड थी। मैं हल्के आसमानी रंग की जैकेट और गहरे नीले रंग की जींस पहने, अपनी ज़ुल्फ़ें सहेजते हुए पुलिया के किनारे पहुँचा। बाँध पर चलते हुए मेरे जूते गीले हो चुके थे और पैरों तले रौंदी गई दूब के सूखे तिनके उनसे चिपके हुए थे। पहले मैंने सीमेन्ट की स्लैबवाली पुलिया पर पैर पटकते हुए जूतों को झाड़ने की कोशिश की और सिगरेट सुलगाने लगा। सिगरेट सुलगा ही रहा था कि वारदात हो गई।
वे चार थे। दो मोटरसाइकिलों पर दोहरा सवार होकर पहुँचे। पल भर को रुके। मैंने उनकी तरफ़ देखा। मैं मुस्कराने ही वाला था कि आगे वाली मोटरसाइकिल के पीछे बैठे सवार ने दाग़ दिया... एक.....दो....तीन.....चार.....।.....और चारों भड़-भड़ करती मोटरसाइकिलों के साथ उड़ गए।
औंधें मुँह गिरी थी देह। आधी पुलिया पर और आधी सड़क पर। एक हल्की जुम्बिश के बाद सब कुछ शान्त हो गया। ख़ून बहकर पहले पुलिया पर पसरा। फिर रिसते हुए कोलतार की सड़क पर फैलने लगा। अफ़रा-तफ़री मच गई। बाँध से सटकर नाला के पेट में छिपे सूअरों के झुंड में सबसे पहले अफ़रा-तफ़री मची। वे सब चीत्कार की अजीब ध्वनि निकालते हुए भागे, जैसे कोई उनका गला रेत रहा हो। दूध के लिए बूथ पर जाते हुए लोग,.......सुबह की सैर के लिए निकले लोग,.....चाय की दुकानों पर चाय सुड़कते हुए लोग,.....और वे तमाम लोग, जो सुबह की चर्या में शामिल होते हैं, पहले तो बदहवास भागे और फिर थोड़ी दूर पर धीरे-धीरे जमा होने लगे। इतने में बस आ गई। बस में बैठे बच्चे,.....पी.के.सिंह राठौर,.... मिस तनेजा,.....बस का ड्राइवर और खलासी - सब हतप्रभ। लगभग आधा घंटा तक मजमा लगा रहा। बस में बैठे बच्चे डर के मारे आँखें मूँदे हुए अपनी सीट से चिपके थे। फिर पुलिस पहुँची और सबकुछ वैसे ही हुआ, जैसे ऐसी वारदातों के बाद हुआ करता है। पुलिस ने पहले स्कूल बस को रिलीज किया। अब इस अँाखों-देखा हाल में क्या रखा है! रोना-बिलखना,......पोस्टमार्टम,.....दाह-संस्कार सब बीत चुका है।
मेरी टाँगे थरथरा रही हैं।
तीस घंटे कम नहीं होते। मैंने अपने पैरों को धरती में रोप दिया है। बहुत ज़ोर से नीचे की ओर पैरों को दबा रहा हूँ। हालाँकि मेरे टखने काँप रहे हैं। घुटने बार-बार मुड़ने लगते हैं। दोनों जाँघों का मांस ऐसे थलथला रहा है, जैसे किसी ने वाइव्रेटर बाँध दिया हो।
लोग जमा हो रहे हैं। लगभग जमा हो चुके हैं। अधिकांश मेरी ही उम्र के हैं। मेरे ही दोस्त-साथी हैं सब। कुछ अधेड़ और कूछ बूढ़े भी हैं। एक है वह दुबला-पतला धँसी हुई आँखोंवाला एक्टर, जो एक नाटक में गाँधी क्या बना, लोग उसे बापू पुकारने लगे। टोपी लगाए घूमनेवाले वह बैंक बाबू भी हैं, जो अपने थियेटर और संगीत प्रेम के कारण बैंक में कलाकारजी के नाम से प्रसिद्ध हैं। वह आँखे मूँदे खड़े हैं। बाँसुरी भी वह आँखें मूँदकर ही बजाते हैं। कभी नाटक, तो कभी बाँसुरी - दोनों के प्रेम में यह आदमी आधा तीतर और आधा बटेर है। लेखक मधुसूदन कुमार हैं। खिचड़ी दाढ़ीवाला यह आदमी कभी लेखक बन जाता है, तो कभी रंगकर्मी। एक सड़ियल नाटक लिखकर थियेटर में नाक घुसाए फिरते हैं मधुसूदन कुमार। सुना है, पहले कुछ नाटकों में अभिनय भी किया है। चुक्की दाढ़ीवाले आलम भाई हैं। क्रांतिकारी नाट्य-निर्देशक हुआ करते थे पहले, पर इन दिनों अधिकतर गुमसुम रहते हैं आलम भाई। सबसे उम्रदराज़ हैं पकी हुई दाढ़ीवाले चित्रकार। वह लकड़ियों को चीरकर उनके भीतर छिपी प्राकृतिक रेखाओं के छापे तैयार करते हैं। उनकी आँखें बहुत तीक्ष्ण हैं। कठोर तने को छेदकर प्रकृति की लीला को देखनेवाली आँखें। कजरारी आँखों वाला वह कवि, जिसकी बकबक से लोग आजिज रहते हैं - सबसे आगे, बैनर लिये खड़ी लड़कियों के बीच खड़ा है। इस जुलूस में भाँति-भाँति के लोग शामिल हो रहे हैं।
अब जुलूस निकलनेवाला है। तैयारी हो चुकी है। सबसे आगे लड़कियाँ हैं - गहरे नीले रंग का बैनर लिये। कवि उनके बीच है, अपनी ज़ुल्फ़ों में अँगुलियाँ फिराते, तो कभी अपनी कजरारी आँखों से बगल में खड़ी हुई विद्या को निहारते हुए।
एक रिक्शा आगे और एक पीछे है। दोनों पर लाउडस्पीकर लगे हैं। पीछेवाले रिक्शा पर अमित है। मेरा दोस्त अमित। वह मेरे साथ चार-पाँच नाटकों में काम कर चुका है। अमित बोल रहा है-‘‘हलो......हलो.....माइक टेस्टिंग......हलो......वन टू थ्री......हलो......हत्यारों को गिरफ़्तार करो.......गिरफ़्तार करो,.......और वाल्युम बढ़ाओ....।.....अरे और तेज़ करो यार.......कलाकार की हत्या क्यों ?.......जवाब दो।.....हाँ,.....थोड़ा-थोड़ा गैप बनाकर.......बीच में नहीं।......सबसे आगे लड़कियाँ रहेंगी बैनर के साथ।.......ठीक उनके पीछे बीच में सीनियर्स रहेंगे....।’’
मेरे पैर मेरा साथ छोड़ रहे हैं। पर अब चलना होगा। जुलूस में शामिल आगे बढ़ना ही होगा। धरती में रोपे गए पैर के तलुओं को उखाड़कर क़दम-ब-क़दम रोपना होगा। रोपना......उखाड़ना..... रोपना।
‘‘आप आगे चलिए।.......बीच में,....सीनियर्स को बैनर लेकर चलती लड़कियों के पीछे, बीच में चलना है....चलिए सर।......चलिये भाई जी....।’’ मेरे नाट्यदल के निर्देशक कुछ लोगों को पीछे से आगे ले जा रहे हैं।
चित्रकार, बाँसुरीवादक अभिनेता, इलेक्ट्रिशियन से लाइट डायरेक्टर बने बूढ़े बंगाली दादा, दढ़ियल लेखक, आलम भाई और खादी का सफ़ेद कलफ किया कुर्ता पहने नाटक अकादमी के अध्यक्ष का चमचा-सब आगे आ जाते हैं। बैनर लिये लड़कियाँ और ठीक उनके पीछे ये कुछ लोग। इन सबों के पीछे दो पंक्तियों में शेष लोग। विद्या से सटकर खड़ा कजरारी आँखोंवाला कवि पीछे खिसक आता है।
‘‘रंगकर्मी प्रशांत की हत्या क्यों ?......हत्यारी सरकार जवाब दो।’’
जुलूस अब चलने को है। नारों की आवाज़ गूँजने लगी है।
‘‘प्रशांत के हत्यारों को....गिरफ़्तार करो-गिरफ़्तार करो।’’
प्रेस और इलेक्ट्रॅानिक मीडिया के लोग जुलूस के सामने खड़े हैं। कैमरों के फ़्लैश चमक रहे हैं। कवि फिर धीरे-से खिसककर लड़कियोंवाली पाँत में ठीक विद्या के पास खड़ा है।
विद्या रो रही है। कैमरों की मचलती आँखों से बेख़बर विद्या रो रही है। उसके हाथों में तस्वीर है - गत्ते पर सटी हुई, जिसे वह सीने से लगाए खड़ी है और रो रही है। विद्या की बड़ी-बड़ी कोया सी आँखें रोते-रोते सुर्ख़ हो गई हैं। सूज गई हैं उसकी आँखें। रोती हुई विद्या को लक्ष्य करते कैमरों की भीड़ उसके सामने जुटी है। देखते-देखते उसके चेहरे के सामने माइक्रोफ़ोन का गðर बन जाता है। एक बाईट के लिए तरसते टेलीविजनवालों को विद्या एक शब्द भी नहीं दे पाती।
जुलूस चलने लगा है। गाँधी मैदान की वलयनुमा बाहरी सड़क पर धीरे-धीरे चलता जुलूस,.....दुःख और क्षोभ से चीख़ता जुलूस, रंगकर्मी प्रशांत की हत्या का जवाब माँगता जुलूस आगे बढ़ रहा है।
मैं पीछे से आगे आ गया हूँ। पीछे शोर ज़्यादा है। वैसे भी पैर घसीटते हुए पीछे-पीछे चलना मुझे कभी नहीं भाया। पर क्या करूँ ? थक गया हूँ। अब तो तीस घंटे से भी आगे निकल गया समय। आलम भाई और मधुसूदन कुमार साथ-साथ चल रहे हैं।
‘‘शोक सभा गाँधी मैदान में होगी ?’’ आलम भाई पूछते हैं।
‘‘सुना तो है।.......ठीक वहीं, .....जहाँ पिछले दिनों पुस्तक मेला में उसने नुक्कड़ नाटक किया था।’’ मधुसूदन कुमार के स्वर में थरथराहट है।
‘‘तुमने उसे उस दिन परफ़ॅार्म करते हुए देखा था ?’’ आलम भाई फिर पूछते हैं।
‘‘हाँ, देखा था। ..... कुछ समझ में नहीं आता कि आख़िर क्यों मार डाला उसे।’’
‘‘विद्या को देखा आपने ?’’ फुसफुसाती हुई आवाज़ में इस नए सवाल के साथ कवि पीछे खिसक आया है।
‘‘हाँ, सब देख रहे हैं।’’ आलम भाई अपनी चिढ़ दबाते हुए कहते हैं।
‘‘बहुत रो रही है। कल भी दिन भर रोती रही। आज भी, जबसे आई है,.......रो ही रही है।’’ बनावटी दुख चिपकाए कवि के चेहरे की त्वचा के भीतर से शरारत छलक रही है।
‘‘दोस्त था उसका। मैं जानता हूँ, बहुत अच्छा दोस्त था उसका। कई नाटकों में दोनों ने साथ-साथ काम किया था।.......दोनों एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ाते भी थे। वह संगीत टीचर था और विद्या ड्रामा टीचर।’’ मधुसूदन कुमार सारी सूचनाएँ देकर कवि से पीछा छुड़ाना चाहते हैं।
कवि फिर फुसफुसाता है - ‘‘आँखें लाजवाब हैं विद्या की।........और रोती हुई आँखें! बड़ी-बड़ी सुर्ख़ आँखें! जादूगरनी है यह लड़की।’’
‘‘चुप रहो यार।’’ आलम भाई कवि पर झपटते हैं।
‘‘चुप तो हूँ, पर जाने क्यों मुझे लगता है..... कि कहीं कुछ मामला था ज़रूर।.......रोना तो ठीक है, पर ओवर एक्टिंग से सन्देह पैदा होता है कि....।’’
‘‘बेहूदगी बन्द कीजिए आप।........चुप रहिए।.......कवि हैं या हत्यारे ?’’ मधुसूदन कुमार दाँत पीसते हुए दबी जुबान में डपटते हैं।
बिना बुरा माने कवि फिर आगे खिसक लेता है। नारे तेज़ हो गए हैं। पुलिस की गाड़ियों ने इस छोटे से जुलूस को अपने घेरे में ले लिया है। जुलूस के साथ मंथर गति से चलती एक गाड़ी आगे और एक पीछे। जुलूस आगे बढ़ रहा है। पीछे चलती पुलिस की जिप्सी में आगे बैठा पुलिस अधिकारी अपने कन्ट्रोल रुम में बैठे अधिकारी को सन्देश दे रहा है-‘‘....सर!.....सौ के आसपास लोग हैं सब,.....कलाकार हैं सब,......नाटक-वाटक करनेवाले हैं सब,......बैरिकेटिंग की ज़रूरत नहीं है सर,.......सेक्रेटारियट नहीं जायेगा सब,......एग्रेेसिव नहीं है सर,.......हाँ सर,.......एक्ज़ीविशन रोड,........डाकबँगला रोड ...फ्ऱेज़र रोड होते हुए,.......वापस गाँधी मैदान।.......यही रूट है सर,......वहीं कन्डोलेंस करेगा सब......सर......यस सर.......ओवर एण्ड आउट सर.....।’’
जुलूस को पीछे से ठेलती हुई जिप्सी चली जा रही है। गाँधी मैदान की यह वलयनुमा बाहरी सड़क छूट रही है। लगभग दो किलोमीटर का चक्कर काटकर फिर इसी सड़क में इसे मिलना है और उत्तरी गेट से भीतर प्रवेश करना है।
मैं अब चलना नहीं चाहता। धूप निकल आई है। कोहरे और ठंड के मौसम में धूप का मज़ा ही अलग होता है। बेहतर होगा मैं, अपने निर्धारित रास्ते पर जाते इस जुलूस को छोड़ दूँ,.....बाहर निकल आऊँ और इस दक्षिणी गेट से गांधी मैदान के भीतर चला जाऊँ। पुस्तक मेला में जहाँ नुक्कड़ नाटक हुआ था, ठीक उसी जगह पर बैठकर धूप सेंकते हुए जुलूस के वापस आने का इन्तज़ार करुँ।
मैं सड़क पार करता हूँ और फिर गाँधी मैदान की फेंस। जैसे-तैसे फूलों की क्यारियाँ लाँघकर टाँगें घसीटते हुए मैदान की ओर बढ़ता हूँ। इन तीस-बत्तीस घंटों में सबसे बड़ा फ़र्क़ यही आया है कि मैं टाँगें घसीटकर चलने लगा हूँ। पहले मैं बहुत तेज़ चलता था,...... मस्ती में।
मैं ठीक वहीं खड़ा हूँ, जहाँ हम सबने नाटक किया था। यहीं,.......ठीक यहीं सैकड़ों लोग एक गोल घेरे में जमा थे और हम सब नाटक कर रहे थे। चारों तरफ़.....बहुत बड़े दायरे में पुस्तकों के स्टॉल थे.....हज़ारों लोगों की आवाजाही थी,....... संस्कृति के पहरुओं की ठनकती हुई आवाज़ें थीं। आज फिर यहीं आएँगे सब। यहीं आकर जुलूस को शोकसभा में बदल जाना है।
"जग देखत मुख चँद्र को, मैं देखूँ मुख तोय/ तू ही मेरा चँद्रमा मुख देखे सुख होय।" ये कवि भी कितने पागल होते हैं-- आखिर चँद्रमा में ही ऐसा क्या है? सुरभी ही क्या अब तो सभी गढ्ढे और पत्थरों से भरे चाँद के उस रहस्य को जान चुके हैं---फिर क्यों ये पँक्तियाँ सुरभी के मष्तिष्क में गूँज रही हैं ? मुख तक तो ठीक है--अच्छा लगता है सुन्दर और प्यारे चेहरों को, अपनों के चेहरों को देखना--जैसे मा, पापा, कीर्ति वगैरह के-- पर आकाश में लटके चँदा को देखकर सुख पाने वाली बात सुरभी की समझ में बिल्कुल ही नहीं आ रही थी। शायद अभी तक वह बचपन के उसी मोड़पर थी, जब मन चँदा से खेलना तो चाहता है पर दूरसे ही। उन परछाँईयों को देखकर ही बस खुश हो लेता है। न उनके पास जाता है, न ही कभी पकड़ने की कोशिश करता है और गाहे-बगाहे अगर कहीं चँदा खुद-बखुद मन की खिड़की से उतरकर बगल में आ बैठे तो उसकी रौशनी से, गढ्ढों में डूबने के डर से, आँखें बन्द कर लेता है। करवट बदलकर सो जाता है-- कोई कमजोर, डरी-सहमी, काल्पनिक तानों-बानों से बुनी चादर मुँह पर डालकर। सुरभी अक्सर सोचती क्यों ये साथ-साथ खेलती परछाइयाँ कभी गुम नहीं हो पातीं-- चाहे इनसे कितने भी दूर क्यों न भागो ? कितना भी पीछे अकेला भटकता हुआ क्यों न छोड़ आओ? क्यों एक मजबूर प्रेत-सी यह बस हमारे आगे-पीछे ही घूमती रहती हैं ? वैसे भी तो कितना तेज, झूठा और बेइमान है यह मजबूर शब्द भी। शेर और चीते का शिकार करने वाले तक पकड़ नहीं पाते होंगे इसे, क्योंकि अपने असली रूप में तो शायद ही कभी, यह किसीके सामने आता है-- जादूगर सा तिलिस्मी और चालाक-- अपने लम्बे काले कोट की अनगिनित परतों में सबकुझ ढके और झुपाए हुए? मिनटों पहले अच्छा-खासा दिखता आदमी भी बिल्कुल ही मजबूर नजर आने लगता है इसकी मजबूत छत्र-छाया में। पर क्या इस रँग-बिरँगी दुनिया में हर आदमी बस मजबूर ही नहीं-? ' वैसे तो मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करता पर क्या करूँ मजबूर हूँ। '--एक जादूई मँत्र की तरह दिनमें दस बार हमारे कानों से, होठों से टकराते हैं ये वाक्य। कभी-कभी तो हम इनकी सच्चाई पर विश्वास भी कर लेते हैं। पर ज्यादातर एक मजबूर सी मुस्कान के साथ सुनने वाला सब समझता-जानता, चुपचाप आँख नीचे किए आगे बढ़ जाता है। ना--ना--कोई जरूरी नहीं, यह मजबूरी हमेशा झूठी ही हो-- अक्सर यह किसी और सच, किसी और पहलू से भी जुड़ी हो सकती है-- कई और विकल्प लिए हुए। यूँ तो बच्चा-बच्चा इस मँत्र के जादू को जानता है पर उनका क्या हो जो कुछ जानना ही नहीं चाहते, सीखना ही नहीं चाहते--इस बाहर की दुनिया में रहकर भी रहना ही नहीं चाहते ! सुरभी भी एक ऐसी ही लड़की थी। किताबों की दुनिया में रहने वाली। कहानी और किस्सों की दुनिया में, अपने अन्दर के रँगों में डूबी सुरभी। पर क्या कहानी एक ऐसा इँद्र-धनुष नहीं जो सच्चाई के आकाश में तो कभी निकलता ही नहीं। बस बन्द आँखों के सँग ही देखने वाला हर रँग और उष्मा को महसूस कर लेता है---उस सतरँगी आभा में नहा लेता है। ऐसी काल्पनिक दुनिया में रहने वालों को हम शायद बच्चा ही तो कहेंगे , क्योंकि यथार्थ की दुनिया से, इस धरती से तो, इनका--सुरभि जैसों का, कोई रिश्ता होता ही नहीं। वह तो चलती भी अक्सर बन्द आँखों के सँग ही थी। उसका हर दिन, हर रात बस इसी इँद्र-धनुषी छाँव में ही तो गुजरता था। किताबों की एक उँची दीवार खड़ी कर रखी थी उसने अपने इर्द-गिर्द और आगे-पीछे। पुराने दोस्तों-सी ये हरदम उसे घेरे रहतीं। नित नए रूप में आतीं, जी बहलातीं और चली जातीं, फिर एक नये रूप में आने का वादा करते हुए। पर यह किताब तो अब उसके ज़हन से ही नहीं जा रही थी -पीछा ही नहीं छोड़ रही थी।--- सुरभी परेशान थी-- क्या यह सच है--क्या ऐसा भी हो सकता है ? आखिर कैसे कोई भी किसी को इतना प्यार कर सकता है कि उसका हर सुख-दुख जान ले, महसूस कर ले--सैकड़ों मील दूर बैठकर भी उसके मन की हर पुकार सुनले? क्या उसे भी ऐसे ही कभी कोई दीवानगी की हदतक चाह सकता है-- क्या उसका भी एक देवदास हो सकता है? और उस दिन से सुरभी की अबोध-आतुर आँखें ढूँढने लगीं, एक नये देवदास को, जो बस उसका हो, किताब के देवदास की तरह हर ऐरे-गैरे के हाथों में नहीं। शायद परिमल ठीक रहे। उसकी सुनता भी है और उसे पसँद भी करता है पर उसमें वह देवदास जैसी लगन और तीव्रता नहीं। बात-बात पर मुस्कुराता है। वैसे भी यह अमीरों के बच्चे कभी देवदास बन ही नहीं सकते--पर-- पर देवदास भी तो जमींदार का ही बेटा था--जरूर ही किसी बिगड़े जमीदार का रहा होगा-- जिसका पैसा-वैसा सब खतम हो चुका होगा---रियासत बगैरह सब बिक-खप गई होगी-- बिल्कुल उसी कहावत की तरह कि खँडहर बता रहे हैं कि इमारत कभी बुलँद थी। अपनी सयानी सोच पर सुरभि खुद ही मुस्कुरा पड़ी, पर खन्ना एँड सन्स तो आज भी शहर की सबसे विख्यात जेवरात की दुकान है। उनकी कोठी पूरे शहर में सबसे अलग और शानदार है। परिमल खन्ना की तो अभी आने वाली दो-तीन पीढियों को अच्छी तरह से सम्भाल ले जाए, शायद इतना पैसा तो आज भी है ही उनके पास। नहीं श्रीकाँत ही ठीक रहेगा। श्रीकाँत त्रिपाठी-- नाम भी पूरा पुराने जमाने का है। यहाँतक कि उसके तो चश्मे, बाल, कपड़े, सबकुछ ही एक पुरानेपन का, बुजुर्गियत का एहसास दिलाते हैं-- बिल्कुल शरदचन्द के देवदास की तरह ही। हाँ, श्रीकाँत ही ठीक रहेगा और उस दिन से सुरभि ने श्रीकाँत को ध्यान से देखना, पढ़ना और तौलना शुरु कर दिया। 'तुम यह किताब पढ़ो सुरभी। बहुत अच्छी लिखी है टैगोर ने'।' लाइब्रोरी में उसे किताब पकड़ाते हुए वह बोला था और अचानक ही सुरभी को हँसी आगई थी--रहता भी अभी उसी युग में है वरना आज क्रिस्टीना रौजेटी और टेड ह्रूज के युग में कौन शरद और टैगोर की बातें करता है? श्रीकाँत सुरभी की आँखों की इस नयी नटखट चमक से बेचैन था। यह गँभीर, सुलझी सुरभी की आँखें आज तितलियों का रँग लिए नटखट जुगनुओं सी क्यों चमक रही हैं ? यह रँग--यह चमक-- क्या हो गया है इसे आज। " अच्छा तो मैं चलता हूँ--" हाथ जोड़े खड़ा श्रीकाँत हाथ में पकड़ी किताब देना भूलकर तेज कदमों से मुड़ा और पलभर में ही दूर चला गया, मानो सुरभि लड़की नहीं नदी में आती बाढ़ हो जो अपने साथ छह फुटे श्रीकाँत को किसी गिरे हुए पेड़-सा जड़ से उखाड़कर ही बहा ले जाएगी। पर नियति तो शायद सुरभी का ही साथ दे रही थी। अगले दिन ही दादाजी ने श्रीकाँत से कहा कि जाओ सक्सेना जी के यहाँ से बबूल और नीमकी दातूनें तोड़ लाओ। तुम्हें तो पता ही है मैं रात को बस उन्ही से दाँत साफ करता हूँ। और श्रीकाँत दादाजी की बात भला कैसे टालता ? न चाहते हुए भी चुपचाप पड़ौसियों के बगीचे में जा पहुँचा। सुबह-सुबह उस सँकोची और बौखलाए श्रीकाँत को देखकर सुरभी को नई शरारत सूझी। श्रीकाँत को छेड़ने के इरादे से वह उठी और चुपचाप उन टहनियों के गठ्ठर पर 'तुम्हारी किताब वाकई में बहुत अच्छी थी। इतनी अच्छी किताब के लिए धन्यवाद।' लिखकर रख आई --वह भी पास में खिले एक लाल गुलाब के साथ। असल में सुरभि को हर काम सुन्दरता और सुरुचि से करना ही पसँद था। अपनी धुन में वह यह भी भूल गई कि अभी-अभी पिछले सप्ताह ही उसने श्रीकाँत को एक किताब पढने के लिए दी थी---जिसका नाम था ' फूल क्या कहते हैं-'- और जिसमें लिखा था कि नन्ही पैन्जियों का अर्थ है कि तुम मेरा अतीत हो। नीले छोटे-छोटे फौरगेट मी नॉट अपने नाम की तरह याद दिलाते हैं कि मुझे भूलना मत और लाल गुलाब ज्वलँत प्रेम की घोषणा करते हैं। पर चलो जाने भी दो इन बुद्धि की दलीलों को --वैसे भी कौन सा वह लैला-मजनूँ वाला रोमाँस करने जा रही है श्रीकाँत से। छि:-छि:-- ऐसा तो वह सोच भी नहीं सकती। उसे तो बस यह पता करना है कि क्या आज की दुनिया में भी देवदास रहते हैं, या नही? वह तो बस एक प्रयोग मात्र करना चाहती है--जानना चाहती है---किताबों में पढ़े को सच की दुनिया में परखना चाहती है---बस--- और कुछ नही? श्रीकाँत जब लौटा तो धूप सर पर चढ़ चुकी थी। पता नहीं धूप से या उस शोख लाल-गुलाब की चटक से श्रीकाँत का सर घूमा और वह वहीं धम् से थककर जमीन पर बैठ गया। हिम्मत नहीं हुई कि बोझ उठाए, पर उठाना तो था ही। जाने क्यों मन डर रहा था। वह पहले भी सक्सेनाजी के यहाँ से दादाजी के लिए दातूनें ले गया है, पर अब नहीं ले जा पाएगा। आज सब कुछ बदल गया था। एक बहुत ही साधारण सी दिनचर्या अचानक उसके लिए बहुत बड़ी समस्या बन गई थी-- बिल्कुल इस लाल गुलाब की तरह--सुरभी की तरह। क्या समझती है अपने आपको यह--नादान छोटी सी बच्ची ? कलतक फ्रॉक में घूमती थी और आज अचानक इतनी बड़ी होगई कि उसे लाल गुलाब दे रही है-- क्या जरूरत थी यह सब करने की ? बगल में सफेद और गुलाबी भी तो खिले हुए थे-- गेंदे के फूल भी तो थे-- कुछ भी रख सकती थी-- कुछ भी दे सकती थी ? किताब ही तो देना भूल गया था ना ? सोच ही रहा था कि आज शाम को दे दूँगा पर अब नहीं दे पाउँगा। वैसे देने में तो कोई बुराई भी नहीं-- गीतँजली एक साफ-सुथरी और अच्छी किताब है। इसमें तो कोई ऐसी-वैसी कविता तक नहीं। यह कोई प्रसाद की कविताएँ या बिहारी और विद्यापति के दोहे तो नहीं-- प्रेम और विरह के रस में डूबे, श्रँगार से ओत-प्रोत। पर कल ही तो उसने सुरभी को आँसू पढ़ते देखा था। खुद ही कीर्ति से माँगकर ले गई थी। कीर्ति, श्रीकाँत की छोटी बहन और सुरभी की खास सहेली। कितना खतरनाक होता है यह छोटी बहन का होना भी-- इसी रिश्ते से तो सुरभी भी श्रीकाँत की किताबों पर अपना पूरा अधिकार जताती आई है। अचानक श्रीकाँत को पसीना आने लगा। याद आया कि उसने तो अपनी पसँद की कुछ पँक्तियाँ पेन से अँकित भी कर रखी हैं---'शशि मुख पर अँचल डाले, आंचल में दीप छुपाए, जीवन की गोधूलि में, कौतुहल से तुम आए।' कौन आया--कहाँ से आया-- क्या जरूरत थी यह सब करने की,-- ज्यादा विद्वत्व दिखाने की--रस में डूब जाने की ? पता नहीं यह सरफिरी सुरभी जाने और क्या-क्या सोचे ? श्रीकाँत उठा और सुरभि से आँखें चुराता, उस उपद्रवी गुलाब को जेब में छुपाए-छुपाए अपने घर लौट आया। उस दिन उसने रात में भी कुछ नहीं खाया-पिया। माँ ने कई-कई बार पूछा, क्या बदन और सर में दर्द है और वे पूरी-की-पूरी नीम की पत्तियाँ उसके फ्लू के लिए काढ़ा बनाने के ही काम आर्इं। श्रीकाँत सबकुछ पी गया। एक दिन, दो दिन-- क्या पूरा हफ्ता निकल गया ऐसे ही। किसीने उसे नहीं देखा। सुरभी ने भी नहीं। श्रीकाँत सिवाय नीम के काढ़े के, कुछ भी नहीं ले पा रहा था और उस जेब में रखे लाल गुलाब की महक उसकी आत्मा तक में उतरती जा रही थी। मा कमरे में रोज धूपबत्ती जलातीं, गँगाजल से धोतीं, पर मानो कमरे में तो कोई और था ही नहीं। बस एक वही महक रच-बस गई थी। श्रीकाँत फेंक भी तो नहीं पा रहा था उस जिद्दी, अक्खड़ लाल गुलाब को। इसके पहले कि मा कमरे में आएँ, कोई ऐसा-वैसा शक करें-- श्रीकाँत ने उठकर गुलाब पास पड़ी गीताँजली में छुपा दिया। अगले दिन जब सुरभी कीर्ति से मिलने आई तो श्रीकाँत ने मौका पाकर उसे घेर लिया। बीमार श्रीकाँत बहुत कमजोर और परेशान लगरहा था। बढ़ी दाढ़ी, उदास काली आँखों के नीचे न सोने की वजह से पड़े काले गढ्ढे जो चश्मे के नीचेसे और भी ज्यादा चमक रहे थे--वह वाकई में बीमार था। ' यह क्या शकल बना रक्खी है तुमने श्रीकाँत---क्या हुआ है तुम्हें ? कॉलेज भी नहीं आए हफ्ते भर से तुम-?' बिना रुके, सुरभी उससे पूछे जा रही थी। ' क्या तुम भी मेरा इन्तजार कर रहीं थीं, सुरभी-?' बुखार में तपता श्रीकाँत आज सबकुछ जान लेना चाहता था। ' क्या तुम भी मेरे साथ आजीवन रहना चाहती हो-?' बोलो सुरभी---क्या तुम भी यही नहीं चाहतीं कि हमें कभी एक-दूसरे का इन्तजार न करना पड़े ?' श्रीकाँत की सँतप्त आँखों के सवालों की झुलस से सुरभि के सब इरादे उसी पल राख हो गए। उस समय तो बस 'नहीं' ही कह पाई वह। फर्श में गड़ी उसकी आँखों ने श्रीकाँत के आँखों से गिरे उन मोतियों को देख लिया था पर उसकी तरफ देखने या तस्सली देने की, उन्हें समेटने का, अब साहस नहीं था उसके पास। और गलत-फहमी बढ़ाने से क्या फायदा ? उन चन्द बूदों का बोझ मन पर लिए चुपचाप वह अपने घर लौट आई। अगले दिन सुरभी श्रीकाँत को 'आँसू' लौटा गई। उसने तप्त श्रीकाँत से, उसके इरादों से दूर रहना ही अधिक उचित समझा। वैसे भी पराई आग में झुलसने का, जलने का, उसका कोई इरादा कभी था ही नहीं। श्रीकाँत, नहीं जानती इसके अलावा, अब मैं तुमसे कभी और कुछ कह भी पाँउँगी या नहीं-? तुम्हें यूँ परेशान या दुखी करने का मेरा कभी कोई इरादा नहीं था। यह जीवन, यह शरीर जो मा-बाप का दिया हुआ है-- इसपर तो मेरा कोई अधिकार है ही नहीं-- हाँ, इस परिवार में जन्म लेने के कुछ उत्तरदायित्व जरूर हैं मेरे ऊपर। और फिर हर लड़की सीता की तरह साहसी नहीं होती। लक्ष्मण-रेखा पार नहीं कर सकती। मागने वाले की तरह देने वाले की भी अपनी मर्यादा और मजबूरियाँ होती हैं। यदि तुम चाहो तो यह आत्मा आज और अभी मैं तुम्हें सौंपती हूँ। तुम ही सोचो श्रीकाँत, कैसे चपरासी दीनदयाल, कमिश्नर सक्सेना का समधी बन सकता है। उम्मीद है मेरी मजबूरी समझोगे तुम और मुझे माफ कर दोगे। पुनश्च: तुम यदि चाहो तो हम जैसे दोस्त थे, अब भी वैसे ही दोस्त रह सकते हैं। श्रीकाँत बार-बार पत्रको पढ़ता गया। हर शब्द जलते अँगार सा था। क्या करँगा मैं इस अदृश्य आत्मा को लेकर सुरभी ? क्या यह मेरे सुख-दुख, दिन-रात, यह साँस लेता जीवन बाँट पाएगी ? क्यों सुरभी, क्यों-- ऐसी क्या कमी है मुझमें---मेरे परिवार में ? माना रिश्ते जरूरतों से पैदा होते हैं, पर मत बाँधो इस असीम को इन आज और अभी के निर्णय में। क्योंकि कुछ रिश्ते शाश्वत होते हैं, उनसे टूटा या भागा नहीं जा सकता। तुम यदि चाहो तो मैं भी तुम्हारे पापा की तरह आई.ए.एस ऑफिसर बनकर दिखा सकता हूँ। गोश्त खा सकता हूँ। तुम्हारे सारे तौर-तरीके सीख लूँगा। तुमसा ही बन जाउँगा सुरभी। तुम बस कहकर तो देखो। कुछ भी कर सकता हूँ मैं तुम्हारे लिए। अगर बस मेरे एक गरीब ब्राहृण होने पर ही तुम्हे ऐतराज है-- तो मैं खूब पैसा भी कमा सकता हूँ। और यदि तुम इन्तजार करो तो अगले जन्म में कायस्थ तक बनकर आ सकता हूँ मैं तो--बस मुझे यूँ अकेले मत छोड़ना। शरद के देवदास की तो पता नहीं, पर श्रीकाँत के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसे पता था कि उसकी कश्ती किनारे पर ही डूब चुकी है और उसे तैरना नहीं आता-- इतना भी नहीं कि इस उथले पानी से निकलकर खड़ा तक हो पाए। पर सुरभी ने तो बस वही किया था जो हर शरीफ और समझदार लड़की आमतौर से करती रही है। पापा के कहने पर चुपचाप परिमल खन्ना के रिश्ते को स्वीकार कर लिया था सुरभी ने। घर पैसा, इज्जत सबकुछ है आज उसके पास। सुरभी, कमिश्नर सक्सेना की बेटी, एक घर-घर सीधे के लिए कथा पढ़ने वाले दादा के घर उनकी पौत्र-वधु बनकर तो नहीं बैठ सकती थी--वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका पोता श्रीकाँत यही चाहता था। मन की सारी कसक को वह घूँट-घूँट पी गई। माना श्रीकाँत अच्छा ही नहीं, बहुत अच्छा है---पर समाज के भी तो कुछ अपने नियम होते हैं। जोड़-तोड़ होते हैं। रिश्ते-नातों का मेल-मिलाप है। यह देवदास वगैरह बस किताबों में ही अच्छे लगते हैं। और सुरभी ने बड़ी समझदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी ओढ़ ली। बस आज यही सच है कि परिमल उसका पति है और एक अच्छा पति है। पराग जैसा उसका बेटा है और महक सी एक प्यारी बेटी है। पर, सुरभी का आकाश इतना रीता क्यों है--- क्यों अब वहाँ कोई इन्द्र-धनुष नहीं निकलता। सुरभी कैसे भूल गई कि इँद्र-धनुष के सतरँगी रँग तो काली घनघोर बरसात के बाद ही निकल पाते हैं-- या शायद उसे पता था कि इन्द्र धनुष तो बस आकाश में होता है--धरती पर तो बस इसकी परछाँई ही दिखती है। और आजतो उसे शायद इतना भी याद नहीं कि उसने अपनी इस परछाँई को भी, स्वयँ ही एक अवहेलना की काली चादर से ढक दिया था। छुपने पर मजबूर कर दिया था-- पीछे छोड़ दिया था। क्या इसलिए कि किसी और की उसपर नजर न पड़े-- या इसलिए कि न चाहते हुए भी उसके लुभावने रँग उसकी आत्मा पर खिंचने लगे थे---उसका अस्तित्व बदल रहे थे। उसे ललचा रहे थे और सुरभी सचमें डर गई थी। क्यों मन में छुपा वह दूसरा सच आजभी उसे सालता रहता है--छलता है? क्यों आजभी वह श्रीकाँत के बारे में सब कुछ जानना चाहती है ? क्यों आजभी आवाजों के समुन्दर में गूँजती वह आवाज डूब नहीं पाती। चेहरा धुँधला नहीं हो पाता। एक दम तोड़ती अधमरी याद मर नहीं पाती। क्यों आज भी अक्सर हर गली, हर कोने पर सुरभी की आँखें श्रीकाँत को ढूँढती रहती हैं ? और क्यों सुरभि किसी से पूछ तक नहीं पाती कि श्रीकाँत कहाँ है--कैसा है ? सुरभि कोई चालाक या मक्कार लड़की नहीं थी जो बस वैभव के सपने देखती थी। और नाही श्रीकाँत मूर्ख और कुपात्र था। फिर गलती कहाँ हुई--- आखिर दोष किसका था--?-क्या श्रीकाँत सचमें अगले जन्म में भी उसका इँतजार करेगा-?-चलो मान लें कि करेगा ही--- पर अगर अगला जन्म ही न हुआ तो--? शायद देवदास और पारो हर युग में नहीं होते--वे तो बस किताबों के पन्नों में, तरुण मनों में ही रहते हैं। और अगर मिल भी जाएँ तो जरूरी तो नहीं कि हम उन्हें जान लें, पहचान ही जाएँ। सुरभी जान गई थी कि एक और देवदास के लिए पहले एक और पारो बनना पड़ता है। पर क्या बस बनने से पारो बन जाती हैं--और फिर क्या आज भी समाज उन्हे एक होने देता-- और क्या एक हो जानेपर उस कहानी का वह जादू रह पाता ? वह भी तो न जाने क्या-क्या अटर-शटर सोचती रहती है---क्या जरूरत है इतना सरदर्द मोल लेने की ? फिर भी सुरभी अक्सर अकेले बैठे-बैठे, घर का काम-काज करते सोचती रहती। दुखी नहीं थी वह अपनी जिन्दगी से। शहर के जाने-माने व्यापारी अभिषेक खन्ना की पुत्रवधु थी वह। सुन्दर और होनहार परिमल की पत्नी थी। गर्व करने जैसा परिवार था उसका और खुश होने जैसा सभी कुछ तो उसके पास था। बस यूँ ही एक आदत सी हो जाती है विकल्प में जीने की। समय के बिस्तार को ओढ़कर अतीत से आँखें मिलाने की। खामखाह ही, बैठे-बिठाए अगर-मगर की पूँछ से खेलने की। आकाश के चन्दा को लपककर तोड़ लाने की और बारबार जगकर फिरसे सो जाने की। आजफिर सुरभि बस सोचे ही जा रही थी--क्या श्रीकाँत भी कभी ऐसे उसके बारे में सोचता होगा--जाने कहाँ होगा अबतो वह- अपने परिवार के साथ-- जाने कैसा दिखता होगा--किस हालत में होगा ? कीर्ति की तो अबतक शादी भी हो चुकी होगी--कीर्ति की ही क्यों, श्रीकाँत ने भी तो शादी कर ली होगी-- किसी सुन्दर, समझदार लड़की से। गरीब जरूर था पर था तो तेज और सुरुचि-पूर्ण। शायद उसके पास भी पराग और महक की तरह प्यारे-प्यारे बच्चे हों? एक सुगढ़ जीवन हो? पता नहीं मिलने पर उसे पहचानेगा भी या नहीं - वैसे भी क्या बात करेगी उससे अब वह ? पता नहीं श्रीकाँत ने उसे माफ भी किया या नहीं ? सुरभी की सोच रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और उसकी सपने बुनती आँखों के आगे दीवार पर एक मकड़ी बहुत देर से जाला बुनने में लगी हुई थी। अचानक मकड़ी का पैर फिसला और वह अपने ही बुने जाले में उलटी लटक गई। अपने बुने जाले में, खुद कैसे, और कितनी आसानी से लटका जा सकता है, सुरभी अच्छी तरह से जानती थी-- पर अब और नहीं।
मुस्कुराती सुरभी, अविश्वास में सर झटक-झटककर, बार-बार खुद को विश्वास दिलाती गई कि आखिर वह तो कोई मकड़ी नहीं-- और फिर जरूरी तो नहीं कि हर मकड़ी जाले में लटक ही जाए--? सुरभि उठी और जाला साफ करने वाला ब्रश उठा लाई।--
हमारे पड़ोस में रहने वाले बाबूजी की उम्र यही कोई अस्सी के लगभग होनी चाहिए।इस उम्र में भी स्वास्थ्य उनका ठीक-ठाक है। ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते व्यक्ति आशाओं-निराशाओं एवं सुख-दुःख के जितने भी आयामों से होकर गुज़रता है,उन सब का प्रमाण उनके चेहरे को देखने से मिल जाता है।इक्कीस वर्ष की आयु में बाबूजी फौज में भर्ती हुए थे।अपने अतीत में डूबकर जब वे रसमग्न होकर अपने फौजी जीवन की रोमांचकारी बातों को सुनाने लगते हैं तो उनके साथ-साथ सुनने वाला भी विभोर हो जाता है।विश्व युद्ध की बातें,कश्मीर में कबाइलियों से मुठभेड़,नागालैण्ड, जूनागढ़ आदि जाने कहां-कहां की यादों के सिरों को पकड़कर वे अपने स्मृति कोष से बाहर बहुत दूर तक खींचकर ले आते हैं। ऐसा करने में उन्हें अपूर्व आनन्द मिलता है।
एक दिन सुबह-सवेरे उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया।मैं समझ गया कि आज बाबूजी अपने फौजी जीवन का कोई नया किस्सा मुझे सुनाएंगे। एक बार तो इच्छा हुई कि मैं जाऊं नहीं, मगर तभी बाबूजी ने हाथ के इशारे से बड़े ही भावपूर्ण तरीके से एक बार फिर मुझे बुलाया।यह सोचकर कि मैं जल्दी लौट आऊंगा, मैं कपडे बदलकर उनके पास चला गया। कमरे में दाखिल होते ही उन्होंने तपाक से मेरा स्वागत किया।चाय मंगवायी और ठीक मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए। घुटनों तक लम्बी नेकर पर बनियान पहने वे आज कुछ ज़्यादा ही चुस्त-दुरुस्त लग रहे थे।मैंने कमरे के चारों ओर नज़र दौड़ाई। यह कमरा शायद उन्हीं का था।दीवार पर जगह-जगह विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र टंगे थे। सामने वाली दीवार के ठीक बीचोंबीच उनकी दिवंगत पत्नी का चित्र टंगा था।कुछ चित्र उनके फौजी-जीवन के भी थे।बाईं ओर की दीवार पर एक राइफल टंगी थी जिसको देखकर लग रहा था कि अब यह राइफल इतिहास की वस्तु बन चुकी है। बाबूजी को अपने सामने एक विशेष प्रकार की मुदा में देखकर मुझे लगा कि वे आज कोई खास बात मुझ से करने वाले हैं तथा कोई खास चीज़ मुझे दिखाने वाले हैं।तभी सवेरे से ही उनकी आखें मुझे ढूंढ़ रही थीं।इस बीच मेरा ध्यान सामने टेबिल पर रखे विभिन्न बैजों, तमगों प्रशस्तिपत्रों,मेडलों आदि की ओर गया जिन्हें इस समय बाबूजी एकटक निहार रहे थे।इन मेडलांे,प्रशस्तिपत्रों आदि का ज़िक्र उन्होंने मुझ से बातों-ही-बातों में पहले कई बार किया था,मगर इन्हें दिखाने का मौका कभी नहीं मिला था।आज शायद वे इन सब को मुझे दिखाना चाह रहे थे। गौरवान्वित भाव से वे कभी इन मेडलांे को देखते तो कभी मुझे। हर तमगे, हर बैज, हर प्रशस्तिपत्र आदि के पीछे अपना इतिहास था, जिसका वर्णन करते-करते बाबूजी, सचमुच, गद्गद् हो रहे थे। यह तमगा फलां युद्ध में मिला, यह बैज अमुक पार्टी में अमुक अंग्रेज़ अफसर द्वारा वीरताप्रदर्शन के लिए दिया गया आदि आदि।बाबूजी अपनी यादों के बहुमूल्य कोष के एक-एकपृष्ठ को जैसे-जैसे पलटते जाते वैसे-वैसे उनके चेहरे पर असीम प्रसन्नता के भाव तिर आते।मेरे कन्धे पर अपना दायां हाथ रखते हुए वे अचानक बोल पड़े-
‘और भी कई बैज व तगमे ह,ैं मगर बुढ़िया को ज़्यादा यही पसन्द थे।’
बुड़िया का नाम सुनते ही मैं चौंक पड़ा। पूछा-
‘कौन बुढ़ि़या?’
‘अरे, वही मेरी पत्नी, जो पिछले साल भगवान को प्यारी हो गई।--बड़ी नेक औरत थी वह। मुझे हमेशा कहती थी- निक्के के बाबू, ये तगमे तुम को नहीं,मुझे मिले हैं--।बेचारी घंटों तक इन पर पालिश मल-मलकर इन्हें चमकाती थी।’
मैंने बाबूजी की ओर नज़रें उठाकर देखा।उनकी आंखें गीलीं हो गईं थीं।शब्दों को समेटते हुए वे आगे बोले-
‘बुढ़िया ज़्यादातर गांव में ही रही और मैं कभी इस मोर्चे पर तो कभी उस मोर्चे पर,कभी इस शहर में तो कभी उस शहर में--।वाह! क्या डिसिप्लिन था। क्या रोबदाब था! अंग्रेज़ अफसरों के साथ काम करने का अपना अलग ही मज़ा होता था।’
कहते-कहते बाबूजी फिर यादों के समुद्र में डूब गए।इस बात का अंदाज़ लगाने में मुझे देर नहीं लगी कि बाबूजी आज कुछ ज़्यादा ही भावुक हो गए हैं।पहले जब भी मैं उनसे मिला हूं हमारी बातें पड़ौसी के नाते एक दूसरे का हाल-चाल जानने तक ही सीमित रही हैं।प्रसंगवश वे कभी-कभी अपने फौजी जीवन की बातें भी कह देते जिन्हें मैं अक्सर घ्यान से सुन लिया करता।बाबूजी के बारे में मेरे पास जो जानकारी थी उसके अनुसार बाबूजी पहाड़ के रहने वाले थे।बचपन उनका वहीं पर बीता, फिर फौज में नौकरी की और सेवानिवृत्ति के बाद वर्षों तक अपने गांव में ही रहे।पत्नी के गुज़र जाने के बाद अब वे अपने बड़े बेटे के साथ इस शहर में मेरे पड़ौस में रहते हैं।बड़े बेटे के साथ रहते-रहते उन्हें लगभग पांच-सात साल हो गए हैं।बीच बीच में महीेन दो महीने के लिए वे अपने दूसरे बेटों के पास भी जाते हैं।मगर जब से उनकी पत्नी गुज़र गई,तब से वे ज़्यादातर बड़े बेटे के साथ ही रहने लगे हैं।
इससे पहले कि मैं उनसे यह पूछता कि क्या ये बैज और मेडल दिखाने के लिए उन्होंने मुझे बुलाया है,वे बोल पड़े-
‘बुढ़ि़या को ये बैज और तगमे अपनी जान से भी प्यारे थे।पहले-पहल हर सप्ताह वह इनको पालिश से चमकाती थी। फिर उम्र के ढलने के साथ-साथ दो-तीन महीनों में एक बार और फिर साल में एक बार--। और वह भी हमारी शादी की सालगिरह के दिन--।
‘सालगिरह के दिन क्यों?’मैंने धीरे-से पूछा।
मेरा प्रश्न सुनकर बाबूजी कुछ सोच में पड़ गए।फिर सामने पड़े मेडलों पर नज़र दौड़ाते हुए बोले-
‘यह तो मैं नहीं जानता कि सालगिरह के ही दिन क्यों? मगर,एक बात मैं ज़रूर जानता हूं कि बुड़िया पढ़ी-लिखी बिल्कुल भी नहीं थी। पर हां, ज़िंदगी की किताब उसने खूब पढ़ रखी थी।मेरी अनुपस्थिति में मेरे मां-बाप की सेवा,बच्चों की देखरेख,घर के अन्दर-बाहर के काम आदि उस औरत ने अकेलेदम बड़ी लगन से निपटाए। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो सहसा विश्वास नहीं होता कि उस बुढ़ि़या में इतनी समर्पण-भावना और आत्मशक्ति थी।’ कहते-कहते बाबूजी ने पालिश की डिबिया में से थोड़ी-सी पालिश निकाली और सामने रखे मेडलों और बैजों पर मलने लगे।वे गद्गद् होकर कभी मुझे देखते तो कभी सामने रखे इन मेडलों को। मेडल और बैज धीरे-धीरे चमकने लगे। मुझे लगा कि बाबूजी मुझ से कुछ और कहना चाह रहे हैं किन्तु कह नहीं पा रहे हैं।एक मेडल अपने हाथों में लेकर मैंने कहा-
‘लाइए बाबूजी, इसपर मैं पालिश कर देता हूं।’
मेरे इस कथन से वे बहुत खुश हुए। शायद मेरे मुंह से वे भी यही सुनना चाहते थे।कुछ मेडलों की वे पालिश करने लगे और कुछ की मैंें।इस बीच थोड़ा रुककर उन्होंने सामने दीवार पर टंगी अपनी पत्नी की तस्वीर की ओर देखा और गहरी-लम्बी सांस लेकर बोले-
‘आज हमारी शादी की साल गिरह है।बुढ़ि़या जीवित होती तो सुबह से ही इन मेड़लों को चमकाने में लग गई होती।ये मेडल उसे अपनी जान से भी प्यारे थे।--जाते-जाते डूबती आवाज़ में मुझे कह गई थी- निक्के के बाबू,यह मेडल तुम्हें नहीं,मुझे मिले हैं।हां-मुझे मिले हैं।इन्हें संभालकर रखना- हमारी शादी की सालगिरह पर हर साल इनको पालिश से चमकाना--’ कहते-कहते बाबूजी कुछ भावुक हो गए। क्षणभर की चुप्पी के बाद उन्होंने फौजी अन्दाज़ में ठहाका लगाया और बोले-
‘बुढ़ि़या की बात को मैंने सीने से लगा लिया।हर साल आज के ही दिन इन मेडलों को बक्से से निकालता हूं,झाड़ता-पोंछता हूं और पालिश से चमकाता हूं। पालिश करते समय मेरे कानों में बुढ़ि़या की यह आवाज़ गूंजती है-‘निक्के के बाबू! ये मेडल तुम को नहीं,मुझे मिले हैं--तुम को नहीं मुझे मिले हैं---’
" अमोघ शक्ति का संचार है तथास्तु । असीम भक्ति का प्रसार है तथास्तु ।"
तथास्तु
वसंत के आल्हादक और मदभरे वातावरण में, पूर्ण कला स्वरूप, देखते ही प्रेम रस जागृत करने वाली, नाज़ुक,सुंदर एक कन्या, जिसका नाम भी रुप की तरह सुंदर `पर्णसि` था । पर्णसि के पिता ओमकारनाथजी भारत के माने हुए नामाँकित भजनिक थे । माता का नाम ऋचा, संस्कारी गृहिणी । ओमकारनाथजी और ऋचा की ईकलौती संतान, पर्णसि थीं ।
ओमकारनाथजी की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, मगर अपने ईश्वर के प्रति अपार श्रद्धा के कारण, दिल के वह अत्यंत अमीर थे । ओमकारनाथजी का घर, संगीत सिखनेवाले अनेक शिष्यों से, सदा भरा-भरा रहता था । अपनी आर्थिक स्थिति सामान्य होने के बावजूद, दिल के अमीर होने के कारण, ओमकारनाथजी कभी किसी से कोई अपेक्षा कभी न रखते थे । भजनानंद परोसने के बाद, प्रेम से जो भी पुरस्कार मिलता, उसे भगवान का प्रसाद-आशीर्वाद समझ कर, सहजता से ओमकारनाथजी स्वीकारते थे । शायद इसी लिए, भगवान को मानो अपने परम भक्त ओमकारनाथजी की चिंता लगी रहती थी और आज यहाँ तो कल वहाँ, सारे भारतवर्षमें उनके भजन-संध्या के अगणित कार्यक्रम आयोजित होते रहते थे ।
पर कहावत है ना..!! सूरज हमेशा ढलने के लिए ही उगता है..!!ओमकारनाथजी की अब उम्र हो चली थीं । भजन के कार्यक्रम के लिए शारीरिक कष्ट उठाना अब मुश्किल हो चला था । मगर अपने ईश्वर और अपने समर्थ ज्ञानी गुरु पूज्य नंदबाबा के प्रति अपार आस्था के कारण, ओमकारनाथजी कोई भी मुश्किल घड़ी में सदैव स्वस्थ रहते थे । ओमकारनाथजी अपने गुरूजी नंदबाबा के साथ सत्संग-सानिध्य कृपा पाकर सारे दुःख-दर्द से मुक्त हो जाते थे ।
गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन पर, प्रातःकाल में ओमकारनाथजी, अपनी पत्नी ॠचा, पर्णसि और अपने सारे शिष्यगण के साथ पूजनीय गुरु नंदबाबा के पूजनार्चन और दर्शन हेतु, गुरूजी के आश्रम में उपस्थित थे । श्री गुरु पूजा संपन्न होने के बाद, ओमकारनाथजी को उदासीन और चिंता में लिप्त पाकर, पूज्य नंदबाबा ने बड़े प्रेम और आत्मीयता से, उनके चिंतातुर होने का कारण जानना चाहा ।
ओमकारनाथजीने गुरूजी को आदर सहित कारण बताया," गुरूजी, एक अच्छे, संस्कारी परिवार में पर्णसि का रिश्ता तय हुआ है । चातुर्मास के पश्चात विवाह भी होंगें । अपने संबंध की दुहाई देकर, मेरे समधीजीने किसी भी प्रकार का दहेज़ लेने से विवेक पूर्ण ढंग से इनकार किया है । मगर फिर भी मैं कन्या का पिता हूँ ना ? हजार हाथ वाले ईश्वर पर भरोसा कायम रखने का, आपने उपदेश दिया है, फिर भी मेरी आर्थिक विवशता के कारण, मेरा मन आज विचलित हो गया है ।"
पिताजी का प्रेम देखकर, पर्णसि और माता ॠचा की आँख सजल हो गई । सब का हृदय भारी हो गया । पर्णसिने, पिताजी को आश्वासन देते हुए कहा," पिताजी, आप चिंता न करें, मुझे कुछ नहीं चाहिए । अपने परिवार के संस्कार अनुसार आप कन्या दान-दहेज़ में मुझे, सिर्फ कान की दो बाली और श्रीभगवत गीता जी का एक छोटा सा गुट्टा (लघु पुस्तक) ही देना ।"
वैसे, पू.गुरूजी नंदबाबाने ओमकारनाथजी को सिर्फ इतना ही कहा," आपकी फ़िक्र करने वाला भगवान आपके हृदय में बिराजमान है । आप कल सुबह ब्रह्ममूहुर्त में, स्नानादि क्रिया के बाद आश्रम में उपस्थित रहना ।भगवान आपकी सारी मनोंकामनाएँ पूर्ण करेगा ।"
पूज्य गुरूजी के आदेश को, साक्षात ईश्वर का आदेश मानकर, शिरोधार्य करके, ओमकारनाथजी, दूसरे दिन प्रातःकाल, सूरज उगने से पहले ही, आश्रम में उपस्थित हो गये । आश्रममें आते ही ओमकारनाथजीने अपने सदगुरु पूज्य श्रीनंदबाबा को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया । गुरुजीने आशिर्वचनमें ओमकारनाथजी को सिर्फ,` तथास्तु` कहा ।
ना ओमकारनाथजी ने कुछ माँगा, ना पू.नंदबाबाने `तथास्तु` के अलावा कुछ दिया ।
समय रहते, विवाह का दिन भी आ गया । कल पर्णसि पराए घर विदा होनेवाली थीं और आज उसके पिता के पास अपनी प्यारी बच्ची को देने के लिये `आशीर्वाद` के अलावा और कुछ न था । कल दोपहर को बारात आने वाली थी और आज यहाँ शादी के नाम पर ओमकारनाथजी के कुछ रिश्तेदार और शिष्यों की चहल-पहल के अलावा कोई बड़ी ताकझाँक न दिखाई दे रही थी ।
इतने में मानो सभी को सानंदाश्चर्य हुआ, दोपहर होते ही, एक विवाह योग्य कन्या को, करियावर में देने लायक सारा साज़ो सामान से भरे दो बड़े ट्रक (TRUCK) ओमकारनाथजी के घर के आंगनमें आ कर खड़े हो गये ।
क्या था दोनों ट्रक में..!! कीमती ज़ेवर, रसोई के सभी प्रकार के बर्तन, सूटकेस, महंगी बनारसी साडीयाँ, तिजोरी, बड़ी अलमारी, पलंग, गद्दी-तकिया, और न जाने क्या-क्या...!! साथ में था मुंबई के एक बड़े करोड़पति उद्योगपति, बुजुर्ग शेठ का पत्र ।
" पूज्य ओमकारनाथजी, आप शायद मुझे भूल गये होंगें । मेरे यहाँ, करीब पाँच साल पहले आयोजित श्रीमद भगवतकथामृत में, हम सभी भक्तों को आपने दस दिन तक, भजनामृत पान करवाया था । आपके अकिंचन व्रत के कारण, कथा समाप्ति के बाद, ना आपने कुछ पुरस्कार माँगा, ना मैंने याद करके आपको कभी पुरस्कार भेजा । मुझे दो दिन पहले ही आपकी लाडली पर्णसि के विवाह के बारे में पता चला । वृद्धावस्था के कारण, मेरा स्वास्थ्य आजकल ठीक नहीं है । ज़िंदगी का भी क्या भरोसा, आप का ऋण चुकाने का इससे अच्छा मौका मुझे कब मिलने वाला था? मैंने अत्यंत जल्दबाजी में यह तूच्छ भेंट अपनी लाडली पर्णसि के लिए भेजी है, जिसे स्वीकार कर के मुझे ऋण मुक्त होने का अवसर दिजीएगा । आपका सदैव ऋणी........शिष्य ।"
यह पत्र पढ़कर ओमकारनाथजी के नयन आंसुओं से छलक उठे । उनको करोड़पति शेठ के नाम की जगह, भक्त नरसिंह मेहता की कुंवरबाई का करियावर समय पर पहूँचानेवाले, साक्षात शामळ शाह शेठ (श्री कृष्ण) के नाम का आभास हुआ । उपस्थित सभी आप्तजन, ईश्वर की प्रत्यक्ष उपस्थिति महसूस करने लगे ।
आप को जानकर हैरानी एवं आश्चर्य होगा कि, करियावर के साज़ो सामान में, कान के लिये दो सुंदर बाली और श्रीभगवत गीता जी का एक छोटा सा गुट्टा (लघु पुस्तक) भी शामिल था ।
स्वाभाविक सवाल यह है कि, क्या `तथास्तु` इतना असरदार हो सकता है? शायद सच्चे संत के हृदय से निकला हुआ `तथास्तु` अवश्य असरदार होता है ।
क्या हमें एक और ऑनर किलिंग का इंतजार करना चाहियें..
एक आदिवासी युवक के साथ अन्तर्जातीय विवाह करने वाली मंजू चौधरी की जान खतरे में हैं....
(श्रवण कुमार भील अपनी पत्नी मंजू चौधरी के साथ शादी करते हुए..)
पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले की सिवाणा तहसील के राणी देशी पुरा के 21 वर्षीय आदिवासी युवक श्रवण कुमार भील को अपने ननिहाल की 18 वर्षीय युवती मंजू कुमारी से प्यार करना मंहगा पड़ गया है, बी़ एस सी तक पढे लिखे श्रवण ने न केवल मंजू को चाहा बल्कि उससे कानूनन अन्तर्जातीय विवाह करने की भी हिम्मत दिखाई लेकिन आज जातिवाद की इस जंग में श्रवण अकेला पड़ गया है और वह अपने प्यार को पाने के लिए दर-दर भटक रहा है।
हुआ यूं कि बचपन की परिचित मंजू से श्रवण की ऑखे चार हो गईं, प्यार परवान चढ़ा तो साथ जीने मरने की कसमें खाई गईं और अन्ततः उन्होने 19 नवम्बर 2010 को घर से भाग कर वलसाड़ जिले की उमरसाडी में बकायदा शादी कर ली। रजिस्ट्रार से शादी का सर्टिफिकेट प्राप्त हो जाने तथा बालिग होने और आपसी रजामंदी से साथ रहने के चलते श्रवण को कोई चिन्ता नहीं थी लेकिन जल्द ही बाड़मेर के समदड़ी थाने की पुलिस गुजरात पहुंच गई। वहीं से पुलिस ने श्रवण व मंजू दोनों को गिरफतार कर लिया।
राजस्थान पुलिस ने उन दोनों के साथ बहुत मारपीट की, उन्हें पीटते हुए बाड़मेर लाया गया, जहां पर उनकी और भी निर्मम तरीके से मारपीट की गई। श्रवण कुमार भील बताते हैं कि समदड़ी थाने में पुलिस वालों ने हम दोनों के साथ इतनी मारपीट की कि- हम दोनों बेहोश हो गये। हमें जान से मारने की धमकी दी तथा डण्ड़ों एवं पट्टों से मारते हुए गले में रस्सी डाल कर उपर टांग दिया। एक दूसरे के हाथ में डण्डा देकर आपस में भी पिटवाया। हमने कहा हमें मार डालो पर अलग मत करो। हमने शादी कर ली है, हमें कोर्ट में पेश कर दो पर किसी ने हमारी नहीं सुनी।
अन्त में कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप के बाद पुलिस यातना का दौर थमा और गिरफतारी के छह दिन बाद बालोतरा कोर्ट में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। लड़की मंजू ने मजिस्ट्रेट के समक्ष 164 के बयानों में साफ कहा कि - वह बचपन से श्रवण भील से प्यार करती है तथा वह अपनी मर्जी से उसके साथ गई तथा उससे शादी की, उसे श्रवण भगा कर नहीं ले गया है, बल्कि वह अपनी सहमति से गई तथा अव वह उसकी पत्नी के नाते साथ रहना चाहती है।
इतने स्पष्ट बयानों के बावजूद श्रवण और मंजू का मिलाप नहीं हो सका, मंजू को उसके परिजन कोर्ट से जबरदस्ती उठा कर ले गये, श्रवण को भनक तक नहीं लगने दी कि मंजू ने उसके पक्ष में बयान दिया है और अन्ततः मंजू की जबरन शादी 17 दिसम्बर को लूणी थाना के धुंधाड़ा गांव में कर दी गई। मंजू की मर्जी के खिलाफ यह सब कुछ हुआ, उसकी एक नहीं सुनी गई।
वह अब भी धुंधाड़ा में बंदी के रूप में जी रही है। उसने हाल ही में श्रवण को संदेश भिजवाया कि उसे जल्दी से बचाया नहीं गया तो वे लोग उसे मार डालेगें। श्रवण को भी डर हेैं कि उसकी पत्नी मंजू चौधरी की समाज के लोग इज्जत के खातिर हत्या कर सकते हैं।
जान से मारने की धमकिया तो श्रवण को भी मिल रही हैं पर वह अपने प्यार को पाने के लिए अडिग है तथा व्यवस्था में हर स्तर पर न्याय की गुहार लगा रहा है उसे मलाल है कि वह भील परिवार में पैदा हुआ और मंजू चौधरी समाज में, इसीलिए पूरा जमाना उनका दुश्मन बना हुआ है।
श्रवण की एक मार्मिक चिठ्ठी मुझे मिली जिसमें उसने खुदा से अपने प्यार को मिलाने की अरदास की है, वरना मौत की दुहाई! क्या हम नागरिक समाज के लोग इन दो प्यार करने वालों को एक कर सकते हैं ? क्या हमारी पुलिस, प्रशासन और न्याय व्यवस्था दो प्रेमियों का मिलन करवा सकती हैं ?
इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम मंजू की जान बचा पायेंगे और श्रवण को उसका प्यार वापिस दिला पायेंगे ? समय रहते हमें ऐसा जरूर करना चाहिए।
कल बसन्तोत्सव था। कवि बसन्त के आगमन की सूचना पा रहा था--
प्रिय, फिर आया मादक बसन्त' ।
मैंने सोचा, जिसे बसन्त के आने का बोध भी अपनी तरफ से काराना पड़े, उस प्रिय से तो शत्रु अच्छा। ऐसे नासमझ को प्रकृति- विज्ञान पढ़ायेंगे या उससे प्यार करेंगे। मगर कवि को न जाने क्यों ऐसा बेवकूफ पसन्द आता है ।
कवि मग्न होकर गा रहा था –
'प्रिय, फिर आया मादक बसन्त !'
पहली पंक्ति सुनते ही मैं समझ गया कि इस कविता का अन्त ‘हा हन्त’ से होगा, और हुआ। अन्त, सन्त, दिगन्त आदि के बाद सिवा 'हा हन्त' के कौन पद पूरा करता ? तुक की यही मजबूरी है। लीक के छोर पर यही गहरा गढ़ा होता है। तुक की गुलामी करोगे तो आरम्भ चाहे 'बसन्त ' से कर लो, अन्त जरूर ' हा हन्त ' से होगा। सिर्फ कवि ऐसा नहीं करता। और लोग भी, सयाने लोग भी , इस चक्कर में होते है। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तुक पर तुक बिठाते चलते है। और 'वसन्त ' से शुरू करके 'हा हन्त' पर पहुंचते हैं। तुकें बराबर फ़िट बैठती हैं , पर जीवन का आवेग निकल भागता है। तुकें हमारा पीछा छोड़ ही नहीं रही हैं। हाल ही में हमारी समाजवादी सरकार के अर्थमन्त्री ने दबा सोना निकालने की जो अपील की , उसकी तुक शुध्द सर्वोदय से मिलायी -- 'सोना दबाने वालो , देश के लिए स्वेच्छा से सोना दे दो।' तुक उत्तम प्रकार की थी; साँप तक का दिल नहीं दुखा। पर सोना चार हाथ और नीचे चला गया। आखिर कब हम तुक को तिलांजलि देंगे ? कब बेतुका चलने की हिम्मत करेंगे ?
कवि ने कविता समाप्त कर दी थी। उसका 'हा हन्त' आ गया था। मैंने कहा, 'धत्तोरे की !' 7 तुकों में ही टें बोल गया। राष्ट्रकवि इस पर कम -कम-कम 51 तुकें बॉधते। 9 तुकें तो उन्होंने 'चक्र' पर बांधी हैं। ( देखो 'यशोधरा ' पृष्ठ 13 ) पर तू मुझे क्या बतायेगा कि बसन्त आ गया। मुझे तो सुबह से ही मालूम है। सबेरे वसन्त ने मेरा दरवाजा भी खटखटाया था। मैं रजाई ओढ़े सो रहा था। मैंने पूछा – “कौन?” जवाब आया-- मैं वसन्त। मैं घबड़ा उठा। जिस दूकान से सामान उधार लेता हूँ, उसके नौकर का नाम भी वसन्तलाल है। वह उधारी वसूल करने आया था। कैसा नाम है, और कैसा काम करना पड़ता है इसे ! इसका नाम पतझड़दास या तुषारपात होना था। वसन्त अगर उधारी वसूल करता फिरता है, तो किसी दिन आनन्दकर थानेदार मुझे गिरफ्तार करके ले जायेगा और अमृतलाल जल्लाद फॉसी पर टांग देगा !
वसन्तलाल ने मेरा मुहूर्त बिगाड़ दिया। इधर से कहीं ऋतुराज वसन्त निकलता होगा, तो वह सोचेगा कि ऐसे के पास क्या जाना जिसके दरवाजे पर सबेरे से उधारीवाले खड़े रहते हैं ! इस वसन्तलाल ने मेरा मौसम ही खराब कर दिया।
मैंने उसे टाला और फिर ओढ़कर सो गया। ऑखें झंप गयीं । मुझे लगा, दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। मैंने पूछा --कौन? जवाब आया—“मैं वसन्त !” मैं खीझ उठा - कह तो दिया कि फिरआना। उधर से जवाब आया—“मै। बार-बार कब तक आता रहूंगा ? मैं। किसी बनिये का नौकर नहीं हूं ; ऋतुराज वसन्त हूं। आज तुम्हारे द्वार पर फिर आया हूं और तुम फिर सोते मिले हो। अलाल , अभागे, उठकर बाहर तो देख। ठूंठों ने भी नव पल्लव पहिन रखे हैं। तुम्हारे सामने की प्रौढ़ा नीम तक नवोढ़ा से हाव -भाव कर रही है -- और बहुत भद्दी लग रही है।
मैने मुंह उधाड़कर कहा-, भई, माफ़ करना , मैंनेतुम्हें पहचाना नहीं। अपनी यही विडम्बना है कि ऋतुराज वसन्त भी आये, तो लगता है , उधारी के तगादेवाला आया। उमंगें तो मेरे मन में भी हैं, पर यार, ठण्ड बहुत लगतीहै। वह जाने के लिए मुड़ा। मैंने कहा, जाते -जाते एक छोटा-सा काम मेरा करतेजाना। सुना है तुम ऊबड़ -खाबड़ चेहरों को चिकना कर देते हो ; 'फेसलिफ्टिंग' केअच्छे कारीगर हो तुम। तो जरा यार, मेरी सीढ़ी ठीक करते जाना, उखड़ गयीहै।
उसे बुरा लगा। बुरा लगने की बात है। जो सुन्दरियों के चेहरे सुधारने का कारीगर है, उससे मैंने सीढ़ी सुधारने के लिए कहा। वह चला गया।
मैं उठा और शाल लपेटकर बाहर बरामदे में आया। हज़ारों सालों के संचित संस्कार मेरे मन पर लदे हैं ; टनों कवि - कल्पनाएं जमी हैं। सोचा, वसन्त है तो कोयल होगी ही । पर न कहीं कोयल दिखी न उसकी कूक सुनायी दी। सामने की हवेली के कंगूरे पर बैठा कौआ 'कांव-कांव' कर उठा। काला, कुरूप, कर्कश कौवा-- मेरी सौदर्य-भावना को ठेस लगी। मैंने उसे भगाने के लिए कंकड़ उठाया। तभी खयाल आया कि एक परम्परा ने कौवे को भी प्रतिष्ठा दे दी है। यह विरहणी को प्रियतम के आगमन का सन्देसा देने वाला माना जाता है। सोचा , कहीं यह आसपास की किसी विरहणी को प्रिय के आने का सगुन न बता रहा हो। मै विरहणियों के रास्ते में कभी नहीं आता ; पतिव्रताओं से तो बहुत डरता हूं। मैंने कंकड़ डाल दिया। कौआ फिर बोला। नायिका ने सोने से उसकी चोंच मढ़ाने का वायदा कर दिया होगा। शाम की गाड़ी से अगर नायक दौरे से वापिस आ गया , तो कल नायिका बाजार से आनेवाले सामान की जो सूची उसके हाथ में देगी, उसमें दो तोले सोना भी लिखा होगा। नायक पूछेगा , प्रिये, सोना तो अब काला बाजार में मिलता है। लेकिन अब तुम सोने का करोगीक्या? नायिका लजाकर कहेगी , उस कौए की चोंच मढ़ाना है, जो कल सेबेरेतुम्हारे आने का सगुन बता गया था। तब नायक कहेगा, प्रिय, तुम बहुत भोली हो।मेरे दौरे का कार्यक्रम यह कौआ थोड़े ही बनाता है; वह कौआ बनाता है जिसे हम 'बड़ासाहब' कहते हैं। इस कलूटे की चोंच सोने से क्यों मढ़ाती हो? हमारी दुर्दशा का यहीतो कारण है कि तमाम कौए सोने से चोंच मढ़ाये हैं, और इधर हमारे पास हथियार खरीदनेको सोना नहीं हैं। हमें तो कौओं की चोंच से सोना खरोंच लेना है। जो आनाकानी करेंगे, उनकी चोंच काटकर सोना निकाल लेंगे। प्रिये, वही बड़ी ग़लत परम्परा है, जिसमें हंसऔर मोर की चोंच तो नंगी रहे, पर कौए की चोंच सुन्दरी खुद सोना मढ़े। नायिका चुप हो जायेगी। स्वर्ण - नियन्त्रण कानून से सबसे ज्यादा नुकसान कौओं और विरहणियों का हुआ है। अगर कौए ने 14 केरेट के सोने से चोंच मढ़ाना स्वीकार नहीं किया, तो विरहणी को प्रिय के आगमन की सूचना कौन देगा? कौआ फिर बोला। मैं इससे युगों से घृणा करता हूं ; तब से, जब इसने सीता के पांव में चोंच मारी थी। राम ने अपने हाथ से फूल चुनकर, उनके आभूषण बनाकर सीता को पहनाये। इसी समय इन्द्र का बिगडै़ल बेटा जयन्त आवारागर्दी करता वहां आया और कौआ बनकर सीता के पांव में चोंच मारने लगा। ये बड़े आदमी के बिगडैल लड़के हमेशा दूसरों का प्रेम बिगाड़ते हैं। यह कौआ भी मुझसे नाराज हैं , क्योंकि मैंने अपने घर के झरोखों में गौरैयों को घोंसले बना लेने दिये हैं। पर इस मौसम में कोयल कहां है ? वह अमराई में होगी। कोयल से अमराई छूटती नहीं है, इसलिए इस वसन्त में कौए की बन आयी है। वह तो मौक़ापरस्त है ; घुसने के लिए पोल ढूंढता है। कोयल ने उसे जगह दे दी है। वह अमराई की छाया में आराम से बैठी है। और इधर हर ऊंचाई पर कौआ बैठा 'कॉव-कॉव' कर रहा है। मुझे कोयल के पक्ष में उदास पुरातन प्रेमियों की आह भी सुनायी देती है, ' हाय, अब वे अमराइयां यहां कहां है कि कोयलें बोलें। यहां तो ये शहर बस गये हैं, और कारखाने बन गये है।' मैं कहता हूं कि सर्वत्र अमराइयां नहीं है, तो ठीक ही नहीं हैं। आखिर हम कब तक जंगली बने रहते? मगर अमराई और कुंज और बगीचे भी हमें प्यारे हैं। हम कारखाने को अमराई से घेर देंगे और हर मुहल्ले में बगीचा लगा देंगे। अभी थोड़ी देर है। पर कोयल को धीरज के साथ हमारा साथ तो देना था। कुछ दिन धूप तो हमारे साथ सहना था। जिसने धूप में साथ नही दिया , वह छाया कैसे बंटायेगी ? जब हम अमराई बना लेंगे , तब क्या वह उसमें रह सकेगी? नहीं, तब तक तो कौए अमराई पर क़ब्जा कर लेंगे। कोयल को अभी आना चाहिए। अभी जब हम मिट्टी खोदें , पानी सींचे और खाद दें, तभी से उसे गाना चाहिए। मैं बाहर निकल पड़ता हूं। चौराहे पर पहली बसन्ती साड़ी दिखी। मैं उसे जानता हूं। यौवन की एड़ी दिख रही है -- वह जा रहा है -- वह जा रहा है। अभी कुछ महीने पहले ही शादी हुई है। मैं तो कहता आ रहा था कि चाहे कभी ले, 'रूखी री यह डाल वसन वासन्ती लेगी' - (निराला )। उसने वसन वासन्ती ले लिया। कुछ हजार में उसे यह बूढ़ा हो रहा पति मिल गया। वह भी उसके साथ है। वसन्त का अन्तिम चरण और पतझड़ साथ जा रहे हैं। उसने मांग में बहुत -सा सिन्दूर चुपड़ रखा है। जिसकी जितनी मुश्किल से शादी होती है, वह बेचारी उतनी ही बड़ी मांग भरती है। उसने बड़े अभिमान से मेरी तरफ देखा। फिर पति को देखा। उसकी नजर में ठसक और ताना है, जैसे अंगूठा दिखा रही है कि ले, मुझे तो यह मिल ही गया। मगर यह क्या? वह ठण्ड से कांप रही है और 'सीसी' कर रहीं है। वसन्त में वासन्ती साड़ी को कंपकंपी छूट रही है।
यह कैसा वसन्त है जो शीत के डर से कांप रहा है? क्या कहा था विद्यापति ने-- ' सरस वसन्त समय भल पाओलि दछिन पवन बहु धीरे ! नहीं मेरे कवि, दक्षिण से मलय पवन नहीं बह रहा। यह उत्तर से बर्फ़ीली हवा आ रही है। हिमालय के उस पार से आकर इस बर्फ़ीली हवा ने हमारे वसन्त का गला दबा दिया है। हिमालय के पार बहुत- सा बर्फ बनाया जा रहा है जिसमें सारी मनुष्य जाति को मछली की तरह जमा कर रखा जायेगा। यह बड़ी भारी साजिश है बर्फ की साजिश ! इसी बर्फ क़ी हवा ने हमारे आते वसन्त को दबा रखा है। यों हमें विश्वास है कि वसन्त आयेगा। शेली ने कहा है, 'अगर शीत आ गयी है, तो क्या वसन्त बहुत पीछे होगा? वसन्त तो शीत के पीछे लगा हुआ ही आ रहा है। पर उसके पीछे गरमी भी तो लगी है। अभी उत्तार से शीत -लहर आ रही है तो फिर पश्चिम से लू भी तो चल सकती है। बर्फ और आग के बीच में हमारा वसन्त फॅसा है। इधर शीत उसे दबा रही है और उधर से गरमी। और वसन्त सिकुड़ता जा रहा है।
मौसम की मेहरबानी पर भरोसा करेंगे, तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी। मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होगा। वसन्त अपने आप नहीं आता ; उसे लाया जाता है। सहज आनेवाला तो पतझड़ होता है, वसन्त नहीं। अपने आप तो पत्ते झड़ते हैं। नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं। वसन्त यों नहीं आता। शीत और गरमी के बीच से जो जितना वसन्त निकाल सके, निकाल लें। दो पाटों के बीच में फंसा है, देश का वसन्त। पाट और आगे खिसक रहे हैं। वसन्त को बचाना है तो ज़ोर लगाकर इन दोनों पाटों को पीछे ढकेलो - इधर शीत को, उधर गरमी को। तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसन्त।
शरीर स्थूल होता हैं, उसमें होने वाली हर हलचल को बड़ी आसानी से न केवल देखा जा सकता है बल्कि पकड़ा भी जा सकता है और ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि, स्थूल की एक सीमा होती है, मन, स्थूल का अगला चरण है अर्थात् मन बड़ा ही चंचल होता है, इसकी गति तीव्र होती है, इसकी कोई सीमा नहीं होती, दिखता नहीं, पल-पल में बदलता ही रहता है, बाहर से आदमी इसे पकड़ ही नहीं सकता, मन होता ही तरल जिस पात्र में डाला वैसा ही रूप हो गया, जैसी परिस्थिति देखी उसी में ढल गया, रम गया, कहते भी है मन मिला तो सब मिला, ऊपर से शांत दिखने वाले व्यक्ति के मन में क्या तूफान क्या शांति या चल रही भयंकर उथल-पुथल या कर्म को हम नहीं पकड़ सकते। मन में होने वाले विस्फोट की परिणिति के संकेत शक्ति या लाचारी के शब्द के रूप में देखने को मिलती है। ऐसी ही कुछ घटना 16 फरवरी को देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ कुछ मीडिया चेनलों के संपादकों के साथ 70 मिनट के सवाल-जवाब के मोर्चे के दौरान देखने को मिली। जिसे पूरे देश ने न केवल देखा बल्कि उनके मन से फूट बह निकले ज्वालामुखी के उद्गार में उनके अर्न्तमन की छटपटाहट की पीडा भी स्पष्ट देखने को मिली। यहां मुझे अटल बिहारी की दो लाईन याद आ रही है ‘‘बेनकाब चेहरे है, दाग बड़े गहरें हैं, टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूं।’’ मनमोहन के मन ने दबी जबां एवं सपाट लहजे में बहुत कुछ कह डाला, बहुत कुछ भड़ास निकाल डाली एवं बहुत कुछ देशवासियों एवं बुद्धिजीवियों को सोचने एवं बहस के लिए छोड दिया जैसे ‘‘मैं मजबूर हूं, दोषी नहीं।’’ गठबंधन की मजबूरियां है कुछ समझौते करने पड़ते है फिर भी असाह नहीं हूं। भ्रष्टाचार पर गंभीर हूं, दोषी किसी भी पद पर हो, बख्शे नहीं जायेंगे, गलतियां तो हुई है लेकिन उतनी नहीं जितना प्रचार किया जा रहा हैं, बहुत सी चीजें मेरे मिजाज से मेल नहीं खाती, अभी भी बहुत कुछ सीख रहा हूं, मजबूर मन में नहीं आता इस्तीफे का ख्याल आदि आदि। डॉ. मनमोहन की यहां मेैं तारीफ करना चाहूगी कि उनमें न केवल सच कहने का साहस है बल्कि सच को स्वीकार करने की भी हिम्मत है लेकिन, उनके भोलेपन की इस स्वीकारोत्ति से उनके गुनाह कम नहीं हो सकते, डॉ. मनमोहन पर इल्जाम हैं गुनाह करने का, गुनाह सच को छिपाने का, गुनाह मजबूरी में गुनाहगारों का साथ निभाने का, गुनाह विरोध न करने का।
महाभारत में दो पात्र मजबूरी में काम करने के अव्वल उदाहरण है। पहला घृतराष्ट्र दूसरा भीष्म। एक पुत्र मोह की मजबूरी से बंधा तो दूसरा कुर्सी के प्रति प्रतिबद्धता से। दोनों ने ही अपनी-अपनी मजबूरियों के चलते न केवल अनीतियों का साथ दिया बल्कि देश को भयंकर युद्ध में झौंक गर्त में पहुंचा अंत में अपयश ही प्राप्त किया। मीडिया के सामने प्रधानमंत्री ने अपने टूटे मन से केवल अपनी लाचारी ही प्रकट की। मुझे यहां फिर अटल बिहारी की एक लाईन याद आ रही है- ‘‘टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता, मन हारकर मैदान नहीं जीते जाते।’’
यूं तो प्रधानमंत्री ने मीडिया के सामने उपस्थित हो एक तीर से कई निशाने साधे हैं। मसलन प्रेस के एक घटक इलेक्ट्रानिक मीडिया को बुला प्रिन्ट मीडिया की अपेक्षाा कर दरार डाली, दूसरा अपनी स्वच्छ छवि पर लगे दागों को धोने का प्रयास, तीसरा अपने को काफी हद तक ठीक बताने की बात, चौथा गठबंधन की मजबूरियां, पांचवा विपक्ष का वांछित सहयोग न मिलना।
यहां प्रधानमंत्री को मीडिया पर अति उत्साह में देश की छवि पर आरोप लगाने के पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि अधिकांश घोटालों को मीडिया ने ही उजागर किया है। यदि वह उजागर नहीं करता तो ये सभी घपलों के राज दफ़न ही रहते। ऐसे में प्रधानमंत्री ने अपने कर्त्तव्यों एवं दायित्वों का निर्वहन कहा किया? अब, जब घोटालों का पुराण खुल ही गया है तो क्यों नहीं? एक-एक कर शीघ्र निर्णय ले अपराधियों को जेल भिजवा देते? देरी किस बात की? कानून अपना काम कर रहा, जांच चल रही है कहने मात्र से अब काम नहीं चलेगा। भारत की जनता अब तक के सभी घोटालेबाजों फिर वो चाहे मंत्री ही क्यों न हो को जेल में देखना चाहती है।
प्रधानमंत्री का एक और महत्वपूर्ण वक्तव्य, देश हर छह महीनें में चुनाव नहीं झेल सकता। बड़ा ही अहम हैं। अहम इस मायने में कि मात्र इसी डर से क्या पूरे देश में लूट-खसोट, भ्रष्टाचार करने दिया जाए? या शख्त कदम उठा संविधान में संशोधन की बात सोची जाए? संशोध्न भी इस बाबत् की चुनाव 5 वर्ष के पहले किसी भी सूरत में नहीं होंगे? यदि कोई भी पार्टी बहुमत सिद्ध करने में असफल होती हैै तो राष्ट्रपति शासन पूरे देश में लागू रहेगा। इससे दो फायदे होंगे पहला भ्रष्टाचार, दबाव की राजनीति, सांसदों, विधायकों की खरीद-फरोख्त रूकेगी वहीं कानून एवं न्यायालयों को अपने तैवरों के साथ कार्य करने की पूर्ण आजादी होगी, दूसरा देश में पारदर्शिता एवं सुशासन का नया सूर्योदय होगा।
जब अंतरिक्ष में भी वैज्ञानिकों को ओम की ही ध्वनि सुनाई पड़े, परन्तु देश के कोने-कोने से भृष्टाचार और अपराधों की ही अवर्णनीय और अवांछनीय कहानियाँ ही सामने आ रही हों तो देश की हर आर्थिक और वैज्ञानिक प्रगति और चकाचौंध फीकी-सी लगती है। हमारे लिए यह जानाना और समझना और भी जरूरी हो जाता है कि स्वराज्य और स्वतंत्रता दो भिन्न शब्द हैं और आज के वैश्विक परिवेश में, एक स्वस्थ व स्वच्छ भारत के लिए हमें इस भेद, जरूरत और इसकी उपयोगिता को भलीभांति समझना ही होगा। स्वराज्य पवित्र और वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्म-शासन और आत्म-संयम से है। यह अंग्रेजी शब्द इंडिपेंडेस की तरह निरंकुश आजादी या स्वच्छंदता का बोध नहीं देता , इसमें आत्म संयम और अनुशासन है , जरूरत पड़ने पर त्याग और कष्ट सहने की, सिद्धांतों पर न्योछावर होने की ताकत है। सर्वोच्च कोटि की स्वतंत्रता सर्वोच्च अनुशासन के साथ-साथ, स्व-रहित विनम्रता, सहानुभूति और सहनशक्ति की मांग करती है। हम कितने ही पाश्चात्य चकाचौंध से भ्रमित हों. संयमहीन स्वच्छंदता आज भी संस्कार हीनता की ही ध्योतक है और हमें स्वार्थ की गंदी गहराइयों में धकेलनी वाली कीचड़ का काम आसानी से कर सकती है।
आज की फिसलती, दौड़ती-भागती परिस्थितियों में भारत ही नहीं, पूरे विश्व को, हर मानव को स्वतंत्रता से अधिक स्वराज्य की जरूरत है। पराधीन देश को स्वतंत्र करने के लिए कई संघर्ष हुए , त्याग और आहुतियां दी गईं, परन्तु आज उसी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए दृढ़ संयम और अनुशासन की जरूरत चारो तरफ बड़ी शिद्दत से महसूस हो रही है। लोकतंत्र एक बड़ी संस्था है और मनुष्य द्वारा बनाई कोई भी पद्धति पूर्णतः दोषहीन या संपूर्ण नहीं हो सकती, यह बात हम सभी भलीभांति जानते हैं । मानव रचित हर नीति, हर पद्धति में दुरुपयोग और भ्रष्टाचार या फिसलन और विघटन की संभावना रहती है। जिस समाज में जितना असंतोष और विषमताएं होंगी, भृष्टाचार और अपराध भी उतने ही अधिक होगे वहाँ पर। लालच व हिंसा फले फूलेगी, क्योंकि निराशा और अन्याय अकर्मठता को ही तो जन्म देते हैं और अपराध व हिंसा, यानी छीनने और लूटने की प्रवृत्ति, निष्ठुरता को बढ़ावा। सच झूठ और सही गलत को भूल, आज इस इक्कीसवीं सदी का समाज मानदंड बदलने पर मजबूर हैं। पहले जो खराब था अब वह सामान्य हो चुका है और पहले जो साधारण व सबसे अपेक्षनीय व्यवहार था, आज प्रशंसनीय बन चुका है। यही वजह है कि पुराने आदर्श अब असंभव और कठिन जान पड़ते हैं और और आज की युवा मानसिकता से पूर्णतः निरर्थक और अदृश्य-से होते जा रहे है।
पाश्चात्य देशों में व्यक्ति वह प्रमुख बिन्दु है जिसके इर्द-गिर्द परिवार, समाज और विश्व घूमता है जबकि पूर्वीय संस्कृति मे आदर्श व्यक्ति केन्द्र का वह बिन्दु है जो अपने कंधे पर परिवार, समाज और देश को लेकर घूमने की सामर्थ और इक्षा रखता है। इसीमें उसकी सार्थकता और बल दोनों निहित हैं। पर आज जब पाश्चात्य की नकल में मानसिकता अपने ही इर्दगिर्द घूम रही है, तो पुरानी मान्यताओं और धारणाओं का विघटन भी स्वाभाविक है। यही वजह है कि संयुक्त परिवार और शादी आदि जैसी धारणाएं टूट रही हैं या अपना स्वरूप बदल रही हैं। अब हर आदमी अपने आप में संपूर्ण है। न उसे किसी और की जरूरत है और ना ही किसी और के लिए फुरसत। नतीजा यह है कि हम सुखदुख जानना और बांटना दोनों ही भूलते जा रहे हैं। कैसे हम इस कुंठित समाज की मानसिक फिसलन को रोक सकते हैं, इसकी वजह क्या है...हमें मिलजुलकर गंभीरता से सोचना और समझना होगा तभी हम पूर्णतः सनातन भारतीय मूल्य न सही, आज की परिस्थितियों के अनुकूल नए मूल्यों को ऩिर्धारित और उनके साथ सामंजस्य कर पाएंगे। एक प्रगतिशील और खुशहाल भारत को देख पाएंगे।
जिस समाज में कर्मठता न हो, जहां हर कोई घोर अंधविश्वासी हो, जहां हर व्यक्ति अपनी ही तानाशाही में विश्वास रखता हो, पूर्णतः भ्रष्ट और स्वार्थी हो, कानून और सरकारी नियमों का लाभ उठा रहा हो, वहां परिवर्तन की बात करना बेमानी और दिखावा है, क्योंकि अक्सर इस स्वार्थलिप्त समाज में सामंजस्य और त्याग की बातें असर ही नहीं करेंगी। और निकम्मी, बेईमान, और आलसी जनता को ऐसे ही नेता भी मिलते ही जाएंगे, या वे खुद ही उन्हें ढूँढ़-ढूँढकर स्वार्थवश चुनते रहेंगे , जो उनकी तरह ही भृष्ट और लालची हो, क्योंकि उन्ही से तो उनका काम निकल सकता है ।
यह बदलाव अब खोखली बातों से नहीं, हर व्यक्ति के अपने आप में एक आदर्श बनने के प्रयास से...वैचारिक और व्यवहारिक मूलभूत और स्वार्थहीन परिवर्तन से ही आ पाएगा।
अर्थहीन निराशा की जरूरत नहीं। आज भी सबकुछ खोया और लुटा नहीं है हमारा। कहते हैं जब जगो तभी सबेरा है। आज भी स्वार्थहीनता और स्नेहभरी समझ, आम आदमियों को सबकुछ छोड़, सबकुछ त्याग, साथ चलने को तैयार कर सकती है, प्रेम और सद्भाव का पाठ पढ़ा सकती है, यदि यह सिद्ध किया जा सके, विश्वास दिलाया जा सके कि लक्ष्य स्वार्थहीन ही नहीं, पूरे समाज के हित में है।
भयमुक्त होने की मुख्य शर्त होती है कि लोग एक-दूसरे पर विश्वास कर पाएँ... एक दूसरे के लिए सबकुछ करने को तैयार हों, जैसा कि हाल ही में काहिरा के तहरीर चौक में हुआ था, जहां आम नागरिकों ने पुलिस और शासन की कमी कुछ घंटों में ही दूर कर ली थी और सड़कों पर यातायात की सुचारु व्यवस्था, नियंत्रण और जांच अपने हाथों में ले ली थी। यही नहीं शान्ति और सफाई का जिम्मा भी सबने मिलजुल कर निभाया था। यही वजह है कि उनका यह निस्वार्थ पूर्वाग्रह गांधी जी के उस अहिंसक सत्याग्रह की याद दिला रहा था, जिसने बड़े-से-बड़े तानाशाहों तक को झुका दिया था।
असली लोकतंत्र या असली समूहशक्ति तभी हो सकती है जबलोग कानून और नियमों को समझें या खुद बनाएं उन्हें मन से सोच-समझकर स्वीकृति भी दें, और आत्मसात भी करें। किसी तानाशाह या स्वार्थी ब्यूरोकैट के बंद कमरे में चन्द स्वार्थी व्यक्तियों द्वारा बनाये गए कानून भय और विद्रोह को ही जन्म देंगे, लोगों को साथ लेकर नहीं चलेंगे। ना ही 1,300 साल पहले लिखे कानून और नियम, आज की परिस्थितियों के अनुकूल ही हैं।
भारत आज भले ही गांधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को , उनकी ताकत को भूल चुका हो परन्तु हाल ही में काहिरा के तहरीर चौक की घटनाओं और आन्दोलन में इसकी ताकत जबर्दस्त स्पष्टता के साथ उभरी है। आज भी आत्म संयम और आत्म त्याग एक जबर्दस्त ताकत है जिसे किसी भी काल व परिस्थिति में नकारा नहीं जा सकता । भारत जो गांधी जी का कर्म स्थली था, आज राजनीतिक भ्रष्टाचार , लोकतंत्र के आवरण में छिपी तानाशाही, अपना घर भरने की होड़ की धूलभरी आंधी से ढक चुका है। दिल्ली और उसकी सरकार गांधी और उनके सिद्धांतों से भले ही दूर हो चुकी हो, पर दुनिया भर के दूसरे देश, जैसे कि मिश्र और वियतनाम आदि ने साबित कर दिया है, कि सत्याग्रह ईश्वर सा ही अनश्वर है, और इसे किसी भी हालत में दफनाया व भुलाया नहीं जा सकता। शान्ति और समझ से कही गई बात आज के शोर-शराबे में भी तबतक गूंजती रहेगी, जबतक दूसरों की समझ में न आ जाए, उन्हें बदलने को मजबूर न कर दे।
यूरोपिय सभ्यता यूरोप के निवासियों के लिए अनुकूल हो सकती है पर उनका आक्रामक और स्वार्थी, भौतिकवाद में लिप्त रवैया...अहं और स्व का आधिपत्य भारत में आज नैतिक पतन का कारण बन रहा है। हमारे समाज में व्यक्ति या स्व वह केन्द्रबिन्दु है जो समाज और परिवार की परिधि को साथ लेकर घूमता है। तभी उसके अस्तित्व की सार्थकता व संपूर्णता है। इस जिम्मेदारी को दूसरों की भावनाओं की समझ और संवेदनशीलता के बिना नहीं उठाया जा सकता। अंग्रेजी की एक कविता है जिसकी पहली पंक्ति है I was drowning not waving. आज हर जगह वही स्थिति नजर आती है, हम दूसरों का मन , उनका दुख-दर्द और जरूरत समझने के लिए नहीं रुकते और मदद करना भूल चुके हैं। शारीरिक सुख और भोगविलासिता दाल में नमक की तरह तो सही हैं पर उनमें ही पूर्णतः लिप्त हो जाना, उन्हीं के पीछे भागना, हमारे अधोपतन का कारण है। ऐसा भारत हमें वह आध्यात्मिक भरण पोषण देने में असमर्थ रहेगा जिसके बल पर सदियों से भारत फल फूल रहा था, प्रेम, सत्य और धर्म से अबतक नियंत्रित रहा था, गौतम और गांधी का भारत था।
गांधी जी ने कहीं कहा था कि-
"मैं ऐसे संविधान की रचना करवाने का प्रयत्न करूंगा, जो भारत को हर प्रकार की गुलामी और परवलम्बन से मुक्त कर दे और उसे, आवश्यकता हो तो, पाप करने तक का अधिकार दे। इतनी अपने प्रति निरासक्ति और परोपकार के लिए पूर्ण समर्पण महात्मा के लिए ही संभव है। आगे वे लिखते हैं-मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा , जिसमें गरीब-से-गरीब लोग भी यह महसूस करेंगे कि वह उनका देश है-जिसके निर्माण में उनकी आवाज का महत्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें ऊंचे और नीचे वर्गों का अन्तर नहीं होगा और जिसमें विविध सम्प्रदायों में पूरा मेलजोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता के या शराब और दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। उसमें नारियों को वही अआधिकार होंगे जो पुरुषों को होंगे। चूँकि शेष सारी दुनिया के साथ हमारा संबंध शान्ति का होगा, यानी न तो हम किसी का शोषण करेंगे और न किसी के द्वारा अपना शोषण होने देंगे, अतः लोगों के हितों से कोई विरोध नहीं है, पूरा सम्मान किया जायेगा, फिर वे हित देशी हों या विदेशी अपने लिये तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि मैं देशी और विदेशी के फर्क से नफरत करता हूं।"
सहको सहृदयता और निस्वार्थ भाव से साथ लेकर आगे बढ़ना ही किसी भी देश की खुशहाली का मूलमंत्र है-चाहे वह भारत हो या कोई अन्य देश। कोई भी बगल में आकर तभी खड़ा होता है, निष्ठा के साथ सुख-दुख तभी बांटता है जब हमने भी ऐसा किया हो। गांधी जी भी अपने सपनों के भारत को खुशहाल भारत की तरह देखना चाहते थे एक कुंठित और बीमार भारत नहीं। उनका सपनों का स्व-शाषित भारत वह भारत था जिसपर शिक्षित और धनवानों का एकाधिकार नहीं था। वह स्वराज्य सबके लिए, सबके द्वारा और सबके कल्याण के लिए था। पूर्णतः हीनभावना से मुक्त था। वह गरीब मजदूर और आत्महत्या करते किसानों के हक में तो था ही, लूले , लंगड़े , विकलांग भी आत्म सम्मान के साथ जीने के अधिकारी थे वहाँ।
बहुमत से बहुकल्याण की अवधारणा पर आधारित रामराज्य का सपना था वह भारत। बहुमत से हमें बहुसाख्यिक धर्म से भ्रमित होने की जरूरत नहीं। जो सबका है वह किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकता, असंतोष का कारण नहीं बनेगा। अगर स्वतंत्रता का अर्थ सभ्य बनाना नहीं , यह हमें और मजबूत नहीं बनाती, हमारा चारित्रिक और नैतिक विकास नहीं करती तो हमारे किसी काम की नहीं। जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपयोग अमीर और सशक्त करते हैं वह निर्बल और गरीबों को भी मिले तभी वास्तविक समृद्धि है। अक्सर तर्क में कहा जाता है कि यह कैसे संभव है जब भगवान ने भी पांचों उंगलियां भिन्न बनाईं । भगवान ने उँगलियां भिन्न बनाईं क्योंकि उनसे भिन्न काम लेने है पर उनकी भी असली ताकत मुठ्ठी बनकर जुड़ने के बाद ही सामने आती है।सच्ची लोकसत्ता कभी भी हिसा या छद्म और असत्य से, बल प्रदर्शन के आधार पर नहीं ली जा सकती। यदि ऐसे प्रयास होते भी हैं तो उन्हें या तो दबा और नष्ट कर दिया जाएगा या फिर उनसे अधिकार छीन लिया जाएगा। बली से बली को मारने के लिए और बली हमेशा मौजूद रहता है इस संसार में। पर आत्मबल और सच्चाई की ताकत आज भी वह ताकत है जिससे सबको जीता जा सकता है और जीता गया है। इतिहास साक्षी है इसका।
हमें इसे मंत्रोच्चारण की तरह जानना और समझना होगा। सपने देखना बुरा नहीं, उनके पीछे भटकना और खुद को अपने मूल्यों को भूलना गलत है। हमें उनकी यथार्थ की कसौटी पर परखना ही होगा। तभी वे फूलफल पाएंगे, हमारे किसी काम के होंगे।
वैश्विक इस संस्कृति में नए का आकर्षण और लोभ स्वाभाविक है । पर एकरसता नीरसता भी तो पैदा कर सकती है। यदि हम सब पीजा और बर्गर ही पूरे वक्त खाते रहें तो ऊब का अन्दाजा किया जा सकता है। जैसे मनुष्यों के डी.एन.ए होते हैं वैसे ही संकृतियों के भी होते हैं। हिन्दी को भूलकर मात्र अंग्रेजी बोलने से हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को तेजी से भूल रहे हैं। भूल रहे हैं कि हमारा समाज निस्वार्थ और सबका आदर करने वाला समाज है , तभी तो यहां नदी, गैया , धरती जिसने भी हमें पोषण और आश्रय दिया उन सबको मातृवत सम्मान ही नहीं माता कहा जाता है। और यही है हमारी परंपरागत् संस्कृति जहां क्षुद्र चूहा भी गणेश जी का वाहन है उनके साथ पूज्यनीय है। ऐसे छोटे-छोटे परंपरागत संस्कारों और मूलभूत सिद्धांतो को , जिनमें छोटे बड़े सब साथ ही नहीं एकसाथ हैं , विश्वीकरण की आंधी में हम भूले या इनसे फिसले, तो वह दिन भी दूर नहीं जब खुद हम अपने स्वाभिमान और पहचान की हत्या कर लेंगे और भारत कौनसा भारत हम खुद से ही पूछने लग जाएंगे...भारतियों का भरा मन मरा मन रह जाएगा। बात मात्र मात्रा के भूलने की नहीं, बदलते दम तोड़ते संस्कारों की है। ...
बच्चों क्या तुम्हें पता है कि वियतनाम में 15 अगस्त को मनाया जाता है बच्चों का त्योहार टंग थू। इस दिन मम्मी-पापा अपने बच्चों का विशेष ध्यान रखते हैं और उन्हें हर तरह से खुश करते हैं। स्कूल में बच्चे लालटेन के साथ परेड करते हैं, इसलिए यहां के बाजार में लालटेन खूब बिकती है। लेकिन स्टार लैंटर्न्स सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। इनका फ्रेम बांस का बना होता है और बीच में एक कैंडल लगा होता है, ताकि परेड के दौरान पूरी रोशनी रहे। बच्चे इस दिन तरह-तरह के मास्क भी पहनते हैं। इस मौके पर उन्हें एक खास कहानी सुनाई जाती है, जिसमें एक मछली ड्रैगन बनना चाहती है और खूब मेहनत करके वह ड्रैगन बनने में कामयाब भी हो जाती है। कहानी के जरिए यह सीख दी जाती है कि यदि बच्चे भी मेहनत करें, तो उनके लिए कुछ भी हासिल करना मुश्किल नहीं है।
भारत के रंगारंग त्योहार होली की कहानी भी कुछ इसी प्रकार की है। इसके द्वारा भी आस्था और विश्वास के जीत की बात समझाई गई है। घमंडी का सिर नीचा -यह बात समझाई गई है ईश्वर की महत्ता का भरपूर संदेश देकर । इस कहानी से स्पष्ट हो जाता है कि षडयंत्र कितना भी बड़ा हो, दुश्मन कितना भी ताकतवर हो परन्तु जीतता वही है जो सच या भगवान के साथ होता है। कहानी कुछ इस तरह से हैः
होली
असुरराज हरिण्यकश्यप को अपने बल और धन पर बहुत ही दंभ था और उसके राज्य में उसके अलावा किसी और का स्मरण या प्रसंशा वर्जित थी...भगवान की भी नहीं। एकदिन सातवर्षीय युवराज प्रहलाद जो राजमहल के बाहर खेल रहा था देखता है कि सामने एक कुम्हार अपने कच्चे घड़ों को भट्टी में पकाने की तैयारी कर रहा है। बड़े जतन से उसने अपने कच्चे बर्तन अंदर रखकर भट्टी में आग लगाई ही थी कि नवजात बिल्ली के बच्चों के रोने की आवाज सुनकर उसकी कोमल-हृदया कुम्हारिन रोने लग गई। लगता था बाहर सूख रहे बरतन-भांड़ों के अंदर बिल्ली ने बच्चे दे दिए थे, अब इन बिल्ली के बच्चों को जलती इस आग से कैसे बचाया जाए..कुम्हार-कुम्हारिन दोनों सोच-सोचकर परेशान हो गए। लपटें धू-धू कर रही थीं और भट्टी में तापमान काफी बढ़ चुका था। अब भट्टी को बुझाकर भी बिल्ली के बच्चों को बचाना संभव नहीं था। निराश कुम्हार ने आंसू भरी आंखों से –अब तो भगवान ही इन्हें बचा सकता है-कहकर उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ दिया। भगवान तो दीनानाथ हैं ही और गरीब व असहायों की, सच्चे मन से निकली प्रार्थना को तुरंत ही सुनते हैं। उनकी प्रार्थना भी भगवान ने तुरंत ही सुन ली और भट्टी के ठंडे होते ही कुम्हार-कुम्हारिन को आश्चर्य-चकित करते बिल्ली के बच्चे सही-सलामत कूदकर बाहर निकल आए। उन बच्चों को खरोंच तक नहीं आई थी। बालक प्रहलाद भी इस चमत्कार से बहुत प्रभावित हुआ और उसने पूरी घटना ज्यों-की-त्यों महल के अंदर जाकर पिता हरिण्यकश्यप को सुना दी। यही नहीं अभिभूत प्रह्लाद ने उन्हें भी हरि नाम स्मरण करने की सलाह दी परन्तु प्रसन्न होने की बजाय , राजा ने खुद अपने ही राज्य में अपने खिलाफ आवाज उठाने के जुर्म में प्रह्लाद को मृत्यु-दंड की सजा सुना दी। इसमें हरिण्यकश्यप की बहन होलिका का भी पूरा साथ था जिसने अपने तप के आधार पर भगवान से वरदान स्वरूप एक ऐसी चादर प्राप्त कर ली थी जो आंच में जल नहीं सकती थी। होलिका जब चादर ओढ़कर प्रहलाद को गोदी में लेकर उस चलती चिता में बैठी , तो उसकी सोच थी कि आंच में प्रहलाद तो जल जाएगा पर इस जादुई चादर की वजह से उसका बाल भी बांका नहीं होगा। परन्तु प्रभु की इच्छा तो कुछ और ही थी, आंचमें बैठते ही चादर उसके कंधों से फिसल कर प्रहलाद के ऊपर जा गिरी। फलतः प्रहलाद तो बच गया परन्तु होलिका न बच सकी। हमारी होली की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उसने एक बार फिर प्रहलाद को ललकारा, यदि तेरा भगवान इतना ताकतवर है , तो उसे बुला। यहां मेरे सामने प्रकट कर। उसके द्वारा या तो अपनी रक्षा करवा ले या मैं तुझे मरवा दूँगा। वह जानता था कि उसके पास वरदान है दिन हो या रात, घर के अंदर या बाहर, अस्त्र या औजार, पशु या पुरुष किसी भी द्वारा उसका अंत नहीं हो सकता, और उसे अपनी इसी अपराजेय ताकत पर बहुत घमंड था, बिल्कुल अपनी बहन की तरह ही।
गुस्से में दंभी हरिण्यकश्यप फिर दहाड़ा कहां है तेरा भगवान...हिम्मत है तो प्रकट कर उसे और उसकी ताकत को मेरे सामने अभी। इसबार हरिण्यकश्यप के यह कहते ही –न दिन न रात, गोधूलि के संधि काल में उसके सामने के खंभे से न मानव न पशु, शेर का मुख और पुरुष का शरीर लिए नरसिंह भगवान प्रकट हुए और न घर के अंदर न बाहर, वहीं ड्योढ़ी पर बैठकर भगवान ने बिना हाथ और हथियार के, मात्र नाखूनों से ही उस दंभी हरिण्यकश्यप का अंत कर दिया। तभी से घमंडी और अत्याचारी का अंत अवश्यंभावी है इसी संदेश को घर-घर पहुंचाने के लिए भारत में आज भी बड़े धूमधाम से होली का त्योहार मनाया जाता है।
वर्णनः शैल अग्रवाल
कोकिल
कोकिल अति सुदर चिड़िया है,सच कहते हैं अति बढ़िया है। जिस रगत के कुवर कन्हाई,उसने भी वह रगत पाई। बौरों की सुगध की भाती,कुहू-कुहू यह सब दिन गाती। मन प्रसन्न होता है सुनकर,इसके मीठे बोल मनोहर। मीठी तान कान में ऐसे,आती है वशीधुनि जैसे। सिर ऊंचा कर मुख खोलै है,कैसी मृदु बानी बोलै है! इसमें एक और गुण भाई,जिससे यह सबके मन भाई। यह खेतों के कीड़े सारे,खा जाती है बिना बिचारे। अति सुदर चिड़िया है,सच कहते हैं अति बढ़िया है।