( पांचवीं वर्षगांठ पर काव्य गोष्ठी- वाराणसी, 15'th March 2012)
जमावड़ा अपनों का था और जगह थी मां गंगा की पावन गोद। मंथर-मंथर बहती वे लहरें मानो हमारे हर सपने को झूम-झूम कर अपनी सहमति दे रही थीं । हो भी क्यों नहीं, ऐसा रोज-रोज तो नहीं होता कि लेखनी पांच वर्ष की हो और हम इसका उत्स मनाने को बनारस में हों भी। बहुत मन से संजोया था हमने यह आयोजन। हवाओं के तेज झोके और खुले बजड़े की छत पर पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ जलाया गया वह दिया तक पूर्णतः आश्वस्त था और अपनी भर सामर्थ झिलमिल और समर्पित था, पीली चूनर ओढ़े सजी संवरी बैठी माँ सरस्वती के चरणों में।
कितनी देर जल पाएगा यह, कुछ आँखों में कौतुक भरा वह प्रश्न अभी बस उभरा ही था कि कल्पना स्वयं पतंग-सी आखों के आगे लहलहा उठी और डोर भी स्वतः ही आ गिरी अभी अभी दीप प्रज्वलित करके बैठे, डॉ.नरेन्द्र कुमार अग्रवाल जी के हाथों में। अगले पल ही गंगा की गोद में विसर्जित वह पतंग मानो मां का इंगित आशीष था उस काव्यमय संध्या के आगाज का सबके चेहरे नव उल्लास से गमक उठे और काव्य संध्य़ा स्वतः खिलखिला पड़ी।
सूरज की सिंदूरी आभा में नहाया बजड़ा तैयार था और हम शीतल मन्द बयार के झोकों का आनंद लेते, मां सरस्वती का आशीर्वाद लेकर अपनों की पूरी उमंग और सद्भावना समेटे गायघाट से राजघाट की ओर चल पड़े । बिना किसी औपचारिक परिचय के ही हम सब ऐसे घुल मिल चुके थे, जैसे बरसों से एक दूसरे को जानते हों। दशाश्वमेध घाट पर हमारे अन्य मित्र डॉ. मुक्ता व संगीता श्रीवास्तव व कुछ अन्य मित्रों को अभी आना था और तय हुआ कि दशाश्वमेध घाट पर हुई मां गंगा की भव्य आरती के बाद ही काव्य गोष्ठी का शुभारंभ होगा। कुछ स्थानीय पत्रकार जिन तक रस बौझारें पहुंच चुकी थीं अब साक्षात्कार लेने के लिए बेचैन थे और हर कवि से मनपसंद चन्द पंक्तियां सुनने का बारबार आग्रह कर रहे थे। तय हुआ कि जब मां सरस्वती का आवाहन अपनी ओजस्वी आवाज में प्रिय रचना शर्मा जी कर ही चुकी हैं तो क्यों न प्रस्तुत कवियों का स्वागत गुलाब के पुष्प गुच्छ और मालार्पण व टीका लगाकर कर ही दिया जाए। यह तो बहती गंगा है, जैसे-जैसे मित्र आएंगे स्वागत होता रहेगा और लोग जुड़ते रहेंगे और काफिला बढ़ता रहेगा। स्वागत का मोर्चा संभाला रचना शर्मा और श्यामा अग्रवाल ने। समर्पित दिए की जिम्मेदारी ली ड्राइवर मनोज ने , जो खुद भी अबतक काव्य उर्जा से भर चुका था और उसके गुनगुनाते शब्द वातावरण में एक नई उर्जा और कौतुक भर रहे थे-'शहर कहां हमरे काशी जैसा, बाबा नहीं भोले बाबा जैसा , मइया कहाँ गंगा मइया जैसी , सांझ नहीं आज जैसी.'।
..बज़ड़े की खुली छत के बावजूद भी दिया जला ही नहीं खूब जला। पूरे पांच घंटे तक काव्य नेह और उष्मा से भरा जगमगाता रहा। सबके चेहरे खिले हए थे। गुलाब की पंखुड़ियों की मादक महक और ठंडी औरेंज पेय का स्वाद... आँखों में एक संभावनाओं से भरपूर काव्यात्मक शाम और अनौपचारिक व मनभावन संगोष्ठी के सपने थे। और तभी मानो सपनों को पूरा करताहमारे अपने ओम निश्चल जी का मधुर गीत हवा में गूंजने लगा। वैसे भी काव्य संध्या के संचालन की बागडोर इन्ही के हाथ थी।
"यह वेला प्यार की आराधन की अर्चन नीराजन की स्वस्तिपूर्ण जीवनके सुखमय आवाहनकी यह वेला सपनों के मोहक विश्राम की। यह वेला शामकी।।
यह वेला जीत की यह वेला हार की यह वेला शब्दों के नख-शिख श्रृंगारकी दिन भर की मेहनत के बेहतर परिणामकी। यह वेला शामकी।।
यह वेला गीत की यह वेला छंद की, मौसम के नए नए फूलों के गंध की और थके-हारों के किंचित आराम की। यह वेला शाम की।।
यह वेला नृत्य की संस्कृति साहित्य की। कोमल बतकहियों की सर्जन-सामर्थ्य की मित्रों के संग बैठे-- टकराते जाम की।
यह वेला शाम की।।
यह वेला मिलने की संग-साथ जुड़ने की, हाथो में हाथ लिए
आजीवन रमने की चितवन के नए नए खुलते आयाम की। यह वेला शाम की।।
यह वेला प्यार की अथक इंतजार की, प्राणों से प्राणों के उत्कट अभिसार की यह घड़ी मोहब्बत के हक़ के पैग़ाम की।
यह वेला शाम की।।"
शाम का रंग अमर श्रीवास्तव जी पर भी चढ़ चुका था और नाश्ते के बाद बंटने वाले ठंडई के कुल्लड़ों को उसी वक्त उन्होंने सबके हाथों में थमाना शुरु कर दिया। हम सभी यानी कि ओम जी, मंजुला चकुर्वेदी जी, दिनेश चंद्र मुगलसराय, अजात शश्रु , रचना शर्मा, नजीर बनारसी, मिर्जापुर से पधारी छोटी बहन श्यामा व बहनोई श्री सतीश चन्द्र अग्रवाल जी, हमारे संवाददाता और फोटो ग्राफर और मैं और नरेन्द्र, सभी के लिए काव्यसंध्या की अनौपचारिक शुरुआत हो चुकी थी।
फिर तो काशी विद्यापीठ के कला विभाग से पधारी डॉ. मंजुला चतुर्वेदी जी ने भी कई छोटी-छोटी मनोहारी पंक्तियों की रसगंगा से हमें आप्लावित करना शुरु कर दिया। अब कविताएं हर ओर से मस्त मौजों सी बहने लगीं । चन्द बानगी देखें-
शराफत आज गाली है, व्यवस्था ने उछाली है , एक चिड़िया थी आजादी किसी ने मार डाली है
-दिनेश चन्द्र मुगलसराय
उसकी याद में आँखों का कोना जब भींग जाता है | मौन मन मेरा तब भी हौले से मुस्कुराता है || -.रचना शर्मा | पूछा जब सूरज ने घास के तिनके से सूख-सूख कैसे तू हरियाता है इतनी ज्वाला सह जाता है बोला वह हंसकर बैठा हूँ माँ की गोद में....
- शैल अग्रवाल
अचानक हवा ने रुख बदला और बजड़ा मणिकर्णिका घाट पर पहुँच गया। मां की गोद वही थी परन्तु अंतिम बार दुलराती सी। फैलते सुरमई अंधरे में एकसाथ धू-धू जलती वे पीँच छह चिताएँ मानो बिम्ब नहीं, खुद लहरों में भी आग लगा रही थीं। अजीब शान्त और वीतराग भरा दृश्य था ।
वातावरण हर हर महादेव से गूंज रहा था पर मन गहरे जीवन मृत्यु के दर्शन में डूब गया। वातावरण में सनी उदासी हवा में उड़ते राख के कणों सी कई-कई परत-दर परत मन के अंदर तक जाकर जम गई। जाने कौन-कौन थे ...पीछे किन-किन को रोता बिलखता ...कितने सपने, कितनी ख्वाइशों से जुदा हो रहे थे। मन लहरों सा ही उमड़ आया। जापानी और यूरोपी टूरिस्ट जरूर नावें रोक कर मधुमक्खी के छत्ते से वहीं जमे खड़े थे और इस वीभत्स अजूबे के चित्र पर चित्र लिए जा रहे थे। हमारा बजड़ा उन विदा लेती आत्माओं को अंतिम प्रणाम करता दशाश्वमेध की तरफ आगे बढ़ चला था, जहाँ डॉ.मुक्ता, विनीता श्रीवास्तव व तीन चार अन्य कवि व मेरा भइया आनंद व भाभी हमारा इन्तजार कर रहे थे।
दशाश्वमेध घाट अपनी गंगा आरती की दिव्य आभा के साथ आँखों के आगे था। और कानों में गूँज रही था मीरा का मनोहारी भजन- माई री मैंने गोविन्द लीन्हो मोल, कोई कहे सस्तो, कोई कहे मंहगों , लीन्हो तराजू तोल। आँखों और लहरों पर कई झिलमिल दिए थे और आंखों की पुतलियों में ही नहीं आत्मा तक में जगमग थे।
बची आधी टोली आ चुकी थी। यानी कि मुक्ता जी, संगीता श्रीवास्तव गौतम अरोड़ा सरस व वासुदेव उबेराय। रजनीश भाई का आखिरी पल तक इंतजार रहा और चकाचौंध ज्ञानपुरी आखिरी मिनट पर किसी मजबूरी के तहत आने में असमर्थ थे। पर वक्त किसी के लिए कब रुका है। हमारा काफिला भी आगे बढ़ता गया।
हाथों में गुलाब की अधखिली कली और गले में चम्पई माला व माथे पर अभिनंदन तिलक। स्वागत का भार एकबार फिर संभाला प्रिय रचना और श्यामा ने और खाने पीनेका मनोज, अमर व अन्य स्टाफ टीम ने।बनारस के मशहूर व्यंजनों और सामने चल रही आरती व दीपदान का आनंद लेने के बाद अब हमारी काव्य संध्या अपनी पूरी रवानी पर आ चुकी थी...घाट के शोर से दूर गंगा के मध्य खड़े हम एक के बाद एक रसमय कविताओं का आनंद ले रहे थे। मंजुला जी, मुक्ता जी, ओम जी, नजीर भाई , विनीता, दिनेश भाई व गौतम अरोड़ा सरस व वासुदेव उबेराय, सभी एक से बढ़कर एक थे।
बहुत कुछ लिखना चाह रही हूँ। कई कविताओं ने मन को छुआ ..विशेषतः मंजुला जी मुक्ता जी और नजीर बनारसी, सरस जी, व अन्य सभी मित्रों की रागरंग, देशप्रेम और अन्य उदात्त भावों से भरी ओजभरी कविताओं ने।ओम जी की कविता रसमय थीं और आवाज बेहद सुरीली। भीतर एक नदी बहती है तो आज तक संग-संग बह रही है। नजीर बनारसी की कविताओं ने अपना अलग ही प्रभाव छोडा। उनमें युवा बेचैनी और विद्रोह के स्वर थे । जबकि मुक्ता जी, मंजुला जी, रचना और विनीता जी की कविताओं में गहरी संवेदना के साथ-साथ नारी मुद्दे तो थे ही समाज की कुरीतियों की तरफ भी इशारा था। मेरा मन गंगा की लहरों से और उनमें बहते दिए और किनारे पर जलती चिताओं से आलोड़ित हो चुका था अतः मेरे काव्य पाठ की शुरुआत स्वतः ही 'कल जब मैंने यादों का एक और दिया / गंगा की बहती लहरों पर बहाया था ' मेरी कविता ' बनारस में' से शुरु हुई। समय के दबाव के तहत हर पंक्ति हूबहू याद रख पाना संभव नहीं। शीघ्र ही लेखनी के पाठकों के लिए कार्यक्रम का पूरा विडिओ भी अपलोड करूँगी वीथिका में, ताकी आप उस यादगार शाम का पूरा आनंद ले सकें।
..वक्त कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चल पाया और हर अच्छी चीज की तरह इस रंगभरी शाम की भी समापन वेला आ पहुँची । फोटो खींचते, गले लगते सभी मित्रों ने एक दूसरे से विदा ली। चलते-चलते दिनेश भाई की एक कविता जो उन्होंने कल ही ई मेल से भेजी है और बजड़े पर पढ़ी थी ।
"बहेलिये का दर्द"
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बहेलिये से पूछ लेना , दर्द उसका जान लेना . क्या होता है जब कभी , हाथ आई चिड़िया का उड़ जाना .........
मेहनत पर पानी का फिर जाना , आकर सपनों का धोखा दे जाना , परायी साँस के सहारे का , साथ बीच में ही छोड़ जाना .
खुद से छले जाने का सच , उस निरूपाय से तुम जान लेना....... .
करके गैरतमन्दों का भरोसा
दुनिंया में कब तक जियोगे . फट चुकी चादर में पैबंद , कहाँ -कहाँ ,किस जगह सिलोगे. .
पैबंद भी नोच लेंगे इस दुनियां में , साथ के ही लोग ,तुम इतना जान लेना .........
टूटती साँस का क्या भरोसा , किससे कहोगे , दुःख किसने परोसा , धूप चली आती तेरे आँगन तक , अपनों ने दीवार खड़ी करके रोका .
आँख वाले अन्धो की दुनियां में , अपनों से रार मत तुम ठान लेना .....
आदमी हो तुम इतना जान लेना , हर किसी की बात मत मान लेना . निष्प्राण हो चली किसी बूढ़ी काया से , उसके घावो से उठती टीस को जान लेना .
घरोंदे तिनको के बिखर जाते है आंधियो में , आसमान तले जीने की कला को जान लेना.......